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GK नोट्सभारतीय राजव्यवस्थानियंत्रक-महालेखापरीक्षक और महान्यायवादी

नियंत्रक-महालेखापरीक्षक और महान्यायवादी: अनुच्छेद 148 से 151 तथा 76

भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक और महान्यायवादी के पूर्ण नोट्स: अनुच्छेद 148 से 151 तथा 76, नियुक्ति, कार्यकाल, निष्कासन, लेखापरीक्षा, परामर्श और परीक्षोपयोगी तथ्य।

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नियंत्रक-महालेखापरीक्षक और महान्यायवादी: अनुच्छेद 148 से 151 तथा 76 — GK24 title card
नियंत्रक-महालेखापरीक्षक और महान्यायवादी: अनुच्छेद 148 से 151 तथा 76 — GK24 title card

सरकार को दो बातों का उत्तर देना होता है, वह धन जो वह खर्च करती है और वह विधि जिस पर वह टिकी है, और संविधान ने इन दोनों के लिए दो पद बनाए हैं। नियंत्रक-महालेखापरीक्षक संघ और राज्यों की संचित निधि से निकाले गए प्रत्येक रुपये की लेखापरीक्षा करता है, और महान्यायवादी संघ को विधि पर परामर्श देता है तथा उच्चतम न्यायालय में उसकी ओर से उपस्थित होता है। एक पद को जानबूझकर सरकार से अलग रखा गया है, जिसमें निश्चित कार्यकाल और न्यायाधीश जैसी निष्कासन प्रक्रिया है; दूसरे को जानबूझकर ऐसा नहीं रखा गया, वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को संविधान के अंतर्गत सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी कहा था, और परीक्षक इन दोनों को एक ही अध्याय मानते हैं क्योंकि लगभग हर प्रश्न इनके अंतर पर ही टिकता है।

नियंत्रक-महालेखापरीक्षक: अनुच्छेद 148 से 151

यह पद इसी नाम के ब्रिटिश पद के आदर्श पर बनाया गया है और संविधान के भाग 5 के अध्याय 5 में रखा गया है। अनुच्छेद 148 इस पद का सृजन करता है, अनुच्छेद 149 संसद को इसके कर्तव्य और शक्तियां निर्धारित करने देता है, अनुच्छेद 150 संघ और राज्यों के लेखाओं के प्रारूप में इसकी भूमिका देता है, और अनुच्छेद 151 इसके प्रतिवेदनों से संबंधित है। अनुच्छेद 149 के अंतर्गत संसद ने नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (कर्तव्य, शक्तियां और सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1971 पारित किया।

अनुच्छेदविषय
148नियुक्ति, शपथ और सेवा की शर्तें
149कर्तव्य और शक्तियां, जैसी संसद निर्धारित करे
150संघ और राज्यों के लेखाओं का प्रारूप
151राष्ट्रपति और राज्यपालों को लेखापरीक्षा प्रतिवेदन

राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की नियुक्ति करता है, और वह तीसरी अनुसूची में दिए प्रारूप में राष्ट्रपति के समक्ष शपथ लेता है। कार्यकाल छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो। उसका निष्कासन उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की ही रीति से और उन्हीं आधारों पर होता है, अर्थात सिद्ध कदाचार या असमर्थता के आधार पर दोनों सदनों के विशेष बहुमत से पारित समावेदन पर, इसलिए कोई सरकार असुविधाजनक लेखापरीक्षक को अपने बल पर नहीं हटा सकती। वेतन उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के बराबर है, कार्यकाल में घटाया नहीं जा सकता, और इस पद का वेतन, पेंशन तथा प्रशासनिक व्यय भारत की संचित निधि पर भारित है, इसलिए संसद उन पर मतदान नहीं करती। अनुच्छेद 148(4) एक नियम जोड़ता है जिसे अभ्यर्थी भूल जाते हैं: पद छोड़ने के बाद वह भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी भी अन्य पद के लिए पात्र नहीं रहता।

वह क्या लेखापरीक्षा करता है और किसे प्रतिवेदन देता है

वह संघ और प्रत्येक राज्य के व्यय तथा प्राप्तियों, सरकारी विभागों के व्यापारिक और निर्माण लेखाओं, लोक राजस्व से पर्याप्त रूप से वित्तपोषित निकायों तथा सरकारी कंपनियों और निगमों के लेखाओं की जांच करता है, जहां विधि अनुमति देती है, और वह भारतीय लेखापरीक्षा तथा लेखा विभाग का प्रमुख है। लेखा और लेखापरीक्षा 1976 में अलग कर दिए गए, इसलिए संघ के लिए अब वह लेखापरीक्षा करता है, लेखा नहीं रखता। संघ के लेखाओं से संबंधित प्रतिवेदन राष्ट्रपति को जाते हैं, जो उन्हें संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाता है, और किसी राज्य से संबंधित प्रतिवेदन राज्यपाल को जाते हैं, जो उन्हें राज्य विधानमंडल के समक्ष रखवाता है। संसद में इनकी जांच लोक लेखा समिति करती है, जिसका कार्य इन प्रतिवेदनों पर इतना निर्भर है कि नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को उस समिति का मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक तथा लोक धन का संरक्षक कहा जाता है।

महान्यायवादी: अनुच्छेद 76

अनुच्छेद 76 महान्यायवादी को भारत सरकार का प्रथम विधि अधिकारी बनाता है। राष्ट्रपति ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करता है जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्हित हो, और महान्यायवादी राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है तथा ऐसा पारिश्रमिक पाता है जो राष्ट्रपति निर्धारित करे, इसलिए संविधान न कोई कार्यकाल तय करता है न निष्कासन की प्रक्रिया; परंपरा से सरकार बदलने पर यह पद भी बदल जाता है। उसके कर्तव्य हैं भारत सरकार को उन विधिक विषयों पर परामर्श देना जो उसे निर्देशित किए जाएं, राष्ट्रपति द्वारा सौंपे गए विधिक स्वरूप के कार्य करना, और संविधान या किसी विधि द्वारा प्रदत्त कृत्यों का निर्वहन करना। वह उच्चतम न्यायालय में तथा संघ से संबंधित मामलों में किसी उच्च न्यायालय में संघ की ओर से उपस्थित होता है।

अनुच्छेद 88 के अंतर्गत महान्यायवादी को संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही, किसी संयुक्त बैठक तथा किसी समिति, जिसका वह नामित सदस्य हो, में बोलने और भाग लेने का अधिकार है, परंतु मत देने का अधिकार नहीं, और अनुच्छेद 105 के अंतर्गत उसे संसद सदस्य जैसी विशेषाधिकार और उन्मुक्तियां प्राप्त हैं। वह मंत्रिमंडल का सदस्य नहीं है और पूर्णकालिक सरकारी सेवक भी नहीं, इसलिए वह निजी वकालत कर सकता है, परंतु भारत सरकार के विरुद्ध परामर्श या पैरवी नहीं कर सकता, आपराधिक अभियोजन में अभियुक्त की पैरवी या किसी कंपनी का निदेशक पद सरकार की अनुमति के बिना स्वीकार नहीं कर सकता। भारत का महाधिवक्ता यानी सॉलिसिटर जनरल तथा अपर सॉलिसिटर जनरल उसकी सहायता करते हैं, और ध्यान देने योग्य बात यह है कि संविधान में उनका उल्लेख नहीं है, वहां केवल महान्यायवादी का नाम है। राज्य के लिए समकक्ष अधिकारी अनुच्छेद 165 के अंतर्गत महाधिवक्ता है, जिसकी नियुक्ति राज्यपाल करता है।

दोनों पदों की तुलना

बिंदुनियंत्रक-महालेखापरीक्षकमहान्यायवादी
अनुच्छेद148 से 15176
नियुक्तिराष्ट्रपति, अधिपत्र द्वाराराष्ट्रपति
कार्यकालछह वर्ष या 65 वर्ष की आयुराष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत
निष्कासनउच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की रीति सेकोई प्रक्रिया निर्धारित नहीं
शपथहां, राष्ट्रपति के समक्षकोई शपथ निर्धारित नहीं
बाद का पदसंघ या राज्य में वर्जितवर्जित नहीं
संसदबैठने या बोलने का अधिकार नहींअनुच्छेद 88 से बोल सकता है, मत नहीं

परीक्षा की दृष्टि से

सबसे तीखे प्रश्न दोनों पदों को आमने-सामने रखते हैं, इसलिए अंतर तैयार रखें: नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का छह वर्ष का कार्यकाल, शपथ, न्यायाधीश जैसी निष्कासन प्रक्रिया और आगे पद पर रोक है, जबकि महान्यायवादी के साथ इनमें से कुछ नहीं है और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत रहता है। अनुच्छेद सीधे पूछे जाते हैं, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के लिए 148, उसके प्रतिवेदनों के लिए 151, महान्यायवादी के लिए 76, उसके बोलने के अधिकार के लिए 88 और राज्य के महाधिवक्ता के लिए 165। एक बार-बार दोहराया जाने वाला जाल प्रतिवेदन का गंतव्य है, जो संघ के लिए राष्ट्रपति और राज्य के लिए राज्यपाल है, और दूसरा यह कथन है कि महान्यायवादी मंत्रिमंडल का सदस्य होता है, जो गलत है। उधार लिए गए उपबंध का प्रश्न भी आता है, जिसमें नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का पद ब्रिटेन से लिया गया है, और लोक लेखा समिति से संबंध भी पूछा जाता है। यह भी याद रखें कि सॉलिसिटर जनरल संवैधानिक पद नहीं है और 1976 के पृथक्करण के बाद संघ के लेखे वह नहीं रखता।

महत्वपूर्ण तथ्य

नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के अनुच्छेद148 से 151, भाग 5, अध्याय 5
कार्यकालछह वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो
निष्कासनउच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की ही रीति से
वेतनउच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के बराबर, भारत की संचित निधि पर भारित
पद के बाद रोकसंघ या किसी राज्य के अधीन कोई पद नहीं, अनुच्छेद 148(4)
संबंधित अधिनियमनियंत्रक-महालेखापरीक्षक (कर्तव्य, शक्तियां और सेवा शर्तें) अधिनियम, 1971
संघ का लेखापरीक्षा प्रतिवेदनराष्ट्रपति को, संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष
राज्य का लेखापरीक्षा प्रतिवेदनराज्यपाल को, राज्य विधानमंडल के समक्ष
स्वतंत्र भारत के प्रथम नियंत्रक-महालेखापरीक्षकवी. नरहरि राव
लेखा और लेखापरीक्षा का पृथक्करण1976
महान्यायवादी का अनुच्छेद76
महान्यायवादी की अर्हताउच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने योग्य
महान्यायवादी का कार्यकालराष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत; कोई अवधि तय नहीं
संसद में अधिकारअनुच्छेद 88 से बोलने और भाग लेने का, मत देने का नहीं
राज्य में समकक्षमहाधिवक्ता, अनुच्छेद 165, राज्यपाल द्वारा नियुक्त

इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ

Q1.भारतीय राजव्यवस्थापूछा गया: उत्तर प्रदेश · UPPSC Civil Service 2016 Official Paperमध्यम

निम्नलिखित में से कौन राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत अपना पद धारण करता है?

  1. A.भारत का नियंत्रक-महालेखापरीक्षक
  2. B.मुख्य निर्वाचन आयुक्त
  3. C.लोक सभा का अध्यक्ष
  4. D.भारत का महान्यायवादी
उत्तर देखें

सही उत्तर: D. भारत का महान्यायवादी

व्याख्या

सही उत्तर D, भारत का महान्यायवादी है। अनुच्छेद 76 कहता है कि उसकी नियुक्ति राष्ट्रपति करता है और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है, तथा संविधान उसके लिए न कोई निश्चित कार्यकाल तय करता है न निष्कासन की कोई प्रक्रिया। विकल्प A गलत है क्योंकि नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का कार्यकाल छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक निश्चित है और उसे केवल उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की रीति से हटाया जा सकता है, जो प्रसादपर्यंत पद धारण करने का उलटा है। विकल्प B गलत है क्योंकि मुख्य निर्वाचन आयुक्त को भी वही न्यायाधीश जैसा संरक्षण प्राप्त है और उसे राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत नहीं हटाया जा सकता। विकल्प C गलत है क्योंकि अध्यक्ष लोक सभा द्वारा अपने सदस्यों में से चुना जाता है और वह सदस्यता समाप्त होने, त्यागपत्र देने या सदन के सभी तत्कालीन सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प पर ही पद छोड़ता है।

Q2.भारतीय राजव्यवस्थापूछा गया: दिल्ली · 2 Dec 2020, Shift 2मध्यम

भारत के महान्यायवादी के रूप में नियुक्ति के लिए कौन-सी अर्हता आवश्यक है?

  1. A.विधान सभा का सदस्य
  2. B.राज्य सभा का सभापति
  3. C.उच्च न्यायालय का न्यायाधीश
  4. D.उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश
उत्तर देखें

सही उत्तर: D. उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश

व्याख्या

सही उत्तर D है। अनुच्छेद 76 के अनुसार महान्यायवादी ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्हित हो, इसलिए प्रश्नपत्र उत्तर को उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश लिखता है। इस अर्हता का अर्थ है भारत का नागरिक जो पांच वर्ष तक उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रहा हो, या दस वर्ष तक उच्च न्यायालय का अधिवक्ता रहा हो, या राष्ट्रपति की राय में प्रतिष्ठित विधिवेत्ता हो; उसका वास्तव में न्यायाधीश रहना आवश्यक नहीं। विकल्प C गलत है क्योंकि उच्च न्यायालय का न्यायाधीश होना उस अर्हता को पूरा करने का केवल एक मार्ग है, स्वयं शर्त नहीं। विकल्प A गलत है क्योंकि विधानमंडल की सदस्यता से इस पद का कोई संबंध नहीं, यह विधिक और राजनीतिक नहीं नियुक्ति है। विकल्प B गलत है क्योंकि राज्य सभा का सभापति भारत का उपराष्ट्रपति होता है, जो पूर्णतः भिन्न संवैधानिक पद है।

Q3.भारतीय राजव्यवस्थापूछा गया: दिल्ली · 15 Oct 2018, Shift 3आसान

भारतीय संविधान में नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का पद किस देश से लिया गया है?

  1. A.ब्रिटेन
  2. B.आयरलैंड
  3. C.कनाडा
  4. D.ऑस्ट्रेलिया
उत्तर देखें

सही उत्तर: A. ब्रिटेन

व्याख्या

सही उत्तर A, ब्रिटेन है। संविधान निर्माताओं ने नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का पद, संसदीय शासन, विधि का शासन, एकल नागरिकता और रिट प्रणाली के साथ ब्रिटिश संविधान से लिया, जहां इसी नाम का अधिकारी संसद के लिए सार्वजनिक व्यय की लेखापरीक्षा करता है। विकल्प B गलत है क्योंकि आयरलैंड से भारत ने राज्य के नीति निदेशक तत्व, राज्य सभा में सदस्यों का नामनिर्देशन और राष्ट्रपति के निर्वाचन की पद्धति ली। विकल्प C गलत है क्योंकि कनाडा से सशक्त केंद्र वाला संघ, अवशिष्ट शक्तियां संघ के पास, राज्यपालों की नियुक्ति केंद्र द्वारा और उच्चतम न्यायालय का परामर्शी क्षेत्राधिकार लिया गया। विकल्प D गलत है क्योंकि ऑस्ट्रेलिया से समवर्ती सूची, व्यापार और वाणिज्य की स्वतंत्रता तथा दोनों सदनों की संयुक्त बैठक ली गई। इन चारों सूचियों को अलग-अलग याद रखें, क्योंकि प्रश्नपत्र इन्हें मिला देते हैं।

Q4.भारतीय राजव्यवस्थापूछा गया: दिल्ली · 11 Nov 2019, Shift 3आसान

भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के किसी राज्य के लेखाओं से संबंधित प्रतिवेदन ______ को प्रस्तुत किए जाते हैं।

  1. A.राज्य के राज्यपाल
  2. B.राज्य के मुख्यमंत्री
  3. C.राज्य के वित्त मंत्री
  4. D.राज्य के मुख्य आर्थिक सलाहकार
उत्तर देखें

सही उत्तर: A. राज्य के राज्यपाल

व्याख्या

सही उत्तर A, राज्य के राज्यपाल है। अनुच्छेद 151(2) कहता है कि नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के किसी राज्य के लेखाओं से संबंधित प्रतिवेदन राज्यपाल को प्रस्तुत किए जाएंगे, जो उन्हें राज्य के विधानमंडल के समक्ष रखवाएगा। इसी के समानांतर अनुच्छेद 151(1) संघ के लेखाओं के प्रतिवेदन राष्ट्रपति को भेजता है, जो उन्हें संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाता है। विकल्प B गलत है क्योंकि मुख्यमंत्री उसी सरकार का प्रमुख है जिसके व्यय की जांच हो रही है, इसलिए उसे प्रतिवेदन भेजना स्वतंत्र लेखापरीक्षा के उद्देश्य को ही समाप्त कर देगा। विकल्प C इसी कारण गलत है, क्योंकि वित्त मंत्री भी उसी सरकार का अंग है। विकल्प D गलत है क्योंकि मुख्य आर्थिक सलाहकार केवल सलाहकार अधिकारी है और लेखापरीक्षा में उसकी कोई भूमिका नहीं। याद रखने का नियम है संघ के लिए राष्ट्रपति और राज्य के लिए राज्यपाल।

Q5.भारतीय राजव्यवस्थाआसान

संविधान का कौन-सा अनुच्छेद भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के पद का उपबंध करता है?

  1. A.अनुच्छेद 143
  2. B.अनुच्छेद 148
  3. C.अनुच्छेद 165
  4. D.अनुच्छेद 280
उत्तर देखें

सही उत्तर: B. अनुच्छेद 148

व्याख्या

सही उत्तर B, अनुच्छेद 148 है। यह उपबंध करता है कि भारत का एक नियंत्रक-महालेखापरीक्षक होगा, जिसकी नियुक्ति राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा करेगा, और आगे शपथ, निष्कासन, वेतन तथा आगे के पद पर रोक की बात करता है। इसके बाद अनुच्छेद 149 संसद को उसके कर्तव्य और शक्तियां निर्धारित करने देता है, अनुच्छेद 150 लेखाओं के प्रारूप से और अनुच्छेद 151 उसके प्रतिवेदनों से संबंधित है। विकल्प A गलत है क्योंकि अनुच्छेद 143 राष्ट्रपति की उच्चतम न्यायालय से विधि या तथ्य के प्रश्न पर परामर्श लेने की शक्ति है। विकल्प C गलत है क्योंकि अनुच्छेद 165 राज्य के महाधिवक्ता का उपबंध करता है, जो महान्यायवादी का राज्य स्तरीय समकक्ष है। विकल्प D गलत है क्योंकि अनुच्छेद 280 वित्त आयोग का उपबंध करता है, जो संघ और राज्यों के बीच करों के बंटवारे की सिफारिश करता है।

Q6.भारतीय राजव्यवस्थामध्यम

भारत का नियंत्रक-महालेखापरीक्षक कितनी अवधि तक पद धारण करता है?

  1. A.पांच वर्ष या 62 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो
  2. B.छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो
  3. C.केवल छह वर्ष, आयु से निरपेक्ष
  4. D.70 वर्ष की आयु तक
उत्तर देखें

सही उत्तर: B. छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो

व्याख्या

सही उत्तर B है। अनुच्छेद 149 के अंतर्गत बने नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (कर्तव्य, शक्तियां और सेवा शर्तें) अधिनियम, 1971 के अनुसार वह पद ग्रहण की तिथि से छह वर्ष तक या 65 वर्ष की आयु पूरी होने तक, जो भी पहले हो, पद धारण करता है। विकल्प A गलत है क्योंकि पांच वर्ष और 62 वर्ष अन्य पदों से जुड़े हैं; 62 वर्ष उच्च न्यायालय के न्यायाधीश तथा राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्य की सेवानिवृत्ति आयु है। विकल्प C गलत है क्योंकि 65 वर्ष की सीमा छह वर्ष पूरे न होने पर भी लागू होती है, इसलिए 61 वर्ष की आयु में नियुक्त व्यक्ति केवल चार वर्ष ही रहेगा। विकल्प D गलत है क्योंकि इस प्रकार का कोई संवैधानिक पदाधिकारी 70 वर्ष तक पद पर नहीं रहता; 65 वर्ष उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की भी सेवानिवृत्ति आयु है, जो इस पद को दी गई प्रतिष्ठा से मेल खाती है।

Q7.भारतीय राजव्यवस्थामध्यम

भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को किसकी रीति से पद से हटाया जा सकता है?

  1. A.उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश
  2. B.संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य
  3. C.भारत के महान्यायवादी
  4. D.किसी राज्य के राज्यपाल
उत्तर देखें

सही उत्तर: A. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश

व्याख्या

सही उत्तर A, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश है। अनुच्छेद 148(1) कहता है कि नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर पद से हटाया जाएगा जिस रीति से उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को, अर्थात सिद्ध कदाचार या असमर्थता के आधार पर संसद के प्रत्येक सदन के कुल सदस्यों के बहुमत तथा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पारित समावेदन द्वारा। विकल्प B गलत है क्योंकि संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य को उच्चतम न्यायालय की जांच के बाद राष्ट्रपति हटाते हैं और उसमें संसद की कोई भूमिका नहीं होती। विकल्प C गलत है क्योंकि महान्यायवादी राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है और उसके लिए कोई निष्कासन प्रक्रिया नहीं है। विकल्प D गलत है क्योंकि राज्यपाल भी राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है और उसका स्थानांतरण या प्रतिस्थापन सरलता से हो सकता है।

Q8.भारतीय राजव्यवस्थाकठिन

पद छोड़ने के बाद नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के विषय में निम्नलिखित में से कौन सही है?

  1. A.वह संघ के अधीन किसी पद पर नियुक्त हो सकता है, राज्य के अधीन नहीं
  2. B.वह संघ या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी भी अन्य पद के लिए पात्र नहीं रहता
  3. C.वह स्वतः उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त हो जाता है
  4. D.वह लोक लेखा समिति का पदेन सदस्य बन जाता है
उत्तर देखें

सही उत्तर: B. वह संघ या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी भी अन्य पद के लिए पात्र नहीं रहता

व्याख्या

सही उत्तर B है। अनुच्छेद 148(4) उपबंध करता है कि पद छोड़ने के बाद नियंत्रक-महालेखापरीक्षक भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी भी अन्य पद के लिए पात्र नहीं रहेगा। यह रोक इसलिए है कि कोई लेखापरीक्षक उस सरकार के प्रति उदार होने के प्रलोभन में न पड़े जो आगे उसे पद दे सकती है, और यही सुरक्षा संविधान लोक सेवा आयोगों के सदस्यों को भी देता है। विकल्प A गलत है क्योंकि रोक संघ और राज्यों दोनों पर लागू है। विकल्प C गलत है क्योंकि उच्चतम न्यायालय में नियुक्ति कॉलेजियम प्रक्रिया से होती है और इस पद से उसका कोई संबंध नहीं, चाहे वेतन न्यायाधीश के बराबर हो। विकल्प D गलत है क्योंकि लोक लेखा समिति संसद सदस्यों से बनती है और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक उसका मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक के रूप में केवल सहायता करता है।

Q9.भारतीय राजव्यवस्थामध्यम

नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को संसद की किस समिति का मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक कहा जाता है?

  1. A.प्राक्कलन समिति
  2. B.सार्वजनिक उपक्रम समिति
  3. C.लोक लेखा समिति
  4. D.कार्य मंत्रणा समिति
उत्तर देखें

सही उत्तर: C. लोक लेखा समिति

व्याख्या

सही उत्तर C, लोक लेखा समिति है। यह समिति संघ के विनियोग और वित्त लेखाओं की तथा नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के लेखापरीक्षा प्रतिवेदनों की जांच करती है, और चूंकि उसका सारा कार्य उन प्रतिवेदनों से आरंभ होता है तथा उसके अधिकारी समिति को उन्हें समझने में सहायता करते हैं, इसलिए उसे इस समिति का मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक कहा जाता है। विकल्प A गलत है क्योंकि प्राक्कलन समिति बजट अनुमानों की जांच कर मितव्ययिता के सुझाव देती है और उसमें नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की सहायता नहीं होती। विकल्प B गलत है क्योंकि सार्वजनिक उपक्रम समिति उपक्रमों से संबंधित प्रतिवेदनों का उपयोग करती है, परंतु यह वाक्यांश परंपरा से लोक लेखा समिति से जुड़ा है। विकल्प D गलत है क्योंकि कार्य मंत्रणा समिति केवल सदन में सरकारी कार्य के लिए समय आवंटित करती है। यह भी याद रखें कि लोक लेखा समिति का सभापति परंपरा से लोक सभा में विपक्ष से होता है।

Q10.भारतीय राजव्यवस्थाआसान

संविधान का कौन-सा अनुच्छेद भारत के महान्यायवादी से संबंधित है?

  1. A.अनुच्छेद 72
  2. B.अनुच्छेद 76
  3. C.अनुच्छेद 78
  4. D.अनुच्छेद 88
उत्तर देखें

सही उत्तर: B. अनुच्छेद 76

व्याख्या

सही उत्तर B, अनुच्छेद 76 है। यह उपबंध करता है कि राष्ट्रपति ऐसे व्यक्ति को भारत का महान्यायवादी नियुक्त करेगा जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्हित हो, उसका कर्तव्य भारत सरकार को विधिक विषयों पर परामर्श देना बताता है, और कहता है कि वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करेगा तथा ऐसा पारिश्रमिक पाएगा जो राष्ट्रपति निर्धारित करे। विकल्प A गलत है क्योंकि अनुच्छेद 72 राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति है। विकल्प C गलत है क्योंकि अनुच्छेद 78 प्रधानमंत्री के राष्ट्रपति को सूचना देने के कर्तव्य से संबंधित है। विकल्प D आकर्षक पर गलत है: अनुच्छेद 88 केवल महान्यायवादी को, मंत्रियों के साथ, किसी भी सदन की कार्यवाही में बोलने और भाग लेने का अधिकार देता है, वह पद का सृजन नहीं करता। अनुच्छेद 76 को पद और अनुच्छेद 88 को बोलने के अधिकार के रूप में पक्का कर लें।

Q11.भारतीय राजव्यवस्थामध्यम

संसद में भारत के महान्यायवादी के विषय में कौन-सा कथन सही है?

  1. A.वह दोनों सदनों में बोल सकता है और मत भी दे सकता है
  2. B.वह दोनों सदनों में बोल सकता है परंतु मत नहीं दे सकता
  3. C.वह केवल राज्य सभा में उपस्थित हो सकता है
  4. D.उसे किसी भी सदन में प्रवेश का अधिकार नहीं है
उत्तर देखें

सही उत्तर: B. वह दोनों सदनों में बोल सकता है परंतु मत नहीं दे सकता

व्याख्या

सही उत्तर B है। अनुच्छेद 88 महान्यायवादी को संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही, किसी संयुक्त बैठक तथा उस समिति में, जिसका वह नामित सदस्य हो, बोलने और अन्यथा भाग लेने का अधिकार देता है, और अनुच्छेद 105 उसे सदस्य जैसे विशेषाधिकार और उन्मुक्तियां देता है। वह मत नहीं दे सकता, क्योंकि मतदान केवल सदन के सदस्यों का अधिकार है। इसलिए विकल्प A अपने दूसरे भाग में गलत है। विकल्प C गलत है क्योंकि उसका अधिकार दोनों सदनों पर है, केवल राज्य सभा पर नहीं। विकल्प D गलत है क्योंकि अनुच्छेद 88 का पूरा उद्देश्य ही यह है कि सरकार का प्रथम विधि अधिकारी सदन को विधिक प्रश्न समझा सके। समानांतर बात याद रखें: एक सदन का सदस्य मंत्री भी अनुच्छेद 88 के अंतर्गत दूसरे सदन में बोल सकता है, परंतु मत केवल अपने सदन में दे सकता है।

Q12.भारतीय राजव्यवस्थामध्यम

किसी राज्य सरकार का सर्वोच्च विधि अधिकारी कौन होता है और यह पद किस अनुच्छेद से बना है?

  1. A.महाधिवक्ता, अनुच्छेद 165 के अंतर्गत
  2. B.सॉलिसिटर जनरल, अनुच्छेद 76 के अंतर्गत
  3. C.महान्यायवादी, अनुच्छेद 165 के अंतर्गत
  4. D.लोक अभियोजक, अनुच्छेद 148 के अंतर्गत
उत्तर देखें

सही उत्तर: A. महाधिवक्ता, अनुच्छेद 165 के अंतर्गत

व्याख्या

सही उत्तर A, महाधिवक्ता, अनुच्छेद 165 के अंतर्गत है। राज्यपाल ऐसे व्यक्ति को राज्य का महाधिवक्ता नियुक्त करता है जो उच्च न्यायालय का न्यायाधीश होने के लिए अर्हित हो, जो राज्य सरकार को विधिक विषयों पर परामर्श देता है और राज्यपाल द्वारा सौंपे विधिक कार्य करता है; वह राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है और अनुच्छेद 177 के अंतर्गत राज्य विधानमंडल में बोल सकता है, मत नहीं दे सकता। विकल्प B दो कारणों से गलत है, क्योंकि सॉलिसिटर जनरल का संविधान में उल्लेख ही नहीं है और अनुच्छेद 76 महान्यायवादी से संबंधित है। विकल्प C गलत है क्योंकि महान्यायवादी अनुच्छेद 76 के अंतर्गत संघ का विधि अधिकारी है, राज्य का नहीं। विकल्प D गलत है क्योंकि लोक अभियोजक की नियुक्ति दंड प्रक्रिया विधि के अंतर्गत होती है और अनुच्छेद 148 नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के पद का सृजन करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का कार्यकाल कितना होता है?

पद ग्रहण की तिथि से छह वर्ष, या 65 वर्ष की आयु पूरी होने तक, जो भी पहले हो। वह राष्ट्रपति को लिखकर पहले भी त्यागपत्र दे सकता है, और उसे केवल उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की ही रीति से हटाया जा सकता है, अर्थात सिद्ध कदाचार या असमर्थता के आधार पर दोनों सदनों के विशेष बहुमत से पारित समावेदन द्वारा।

नियंत्रक-महालेखापरीक्षक अपने प्रतिवेदन किसे देता है?

संघ के लेखाओं से संबंधित प्रतिवेदन राष्ट्रपति को जाते हैं, जो उन्हें संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाता है, जहां लोक लेखा समिति उनकी जांच करती है। किसी राज्य के लेखाओं से संबंधित प्रतिवेदन उस राज्य के राज्यपाल को जाते हैं, जो उन्हें राज्य विधानमंडल के समक्ष रखवाता है। राष्ट्रपति और राज्यपाल का यह विभाजन अनुच्छेद 151 में है।

नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को लोक धन का संरक्षक क्यों कहा जाता है?

क्योंकि संचित निधि से निकाला गया कोई भी धन उसकी लेखापरीक्षा से नहीं बचता। वह देखता है कि धन उसी प्रयोजन पर और उसी सीमा में खर्च हुआ जो विधानमंडल ने स्वीकृत किया था, और उसके प्रतिवेदन विधानमंडल को कार्यपालिका से जवाब मांगने का आधार देते हैं। इसी कारण डॉ. अंबेडकर ने इस पद को संविधान के अंतर्गत सबसे महत्वपूर्ण कहा था।

भारत के महान्यायवादी के लिए क्या अर्हता आवश्यक है?

वह ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्हित हो। अर्थात भारत का नागरिक जो पांच वर्ष तक किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रहा हो, या दस वर्ष तक किसी उच्च न्यायालय का अधिवक्ता रहा हो, या राष्ट्रपति की राय में प्रतिष्ठित विधिवेत्ता हो। उसका वास्तव में न्यायाधीश रहना आवश्यक नहीं है।

क्या महान्यायवादी संसद की कार्यवाही में भाग ले सकता है?

हां। अनुच्छेद 88 उसे दोनों सदनों की कार्यवाही, किसी संयुक्त बैठक तथा उस समिति में, जिसका वह नामित सदस्य हो, बोलने और भाग लेने का अधिकार देता है, और अनुच्छेद 105 उसे सदस्य जैसे विशेषाधिकार देता है। मत देने का अधिकार उसे नहीं है, क्योंकि वह किसी सदन का सदस्य नहीं होता।

क्या भारत का सॉलिसिटर जनरल संवैधानिक पद है?

नहीं। संविधान के अनुच्छेद 76 में केवल महान्यायवादी का उल्लेख है। सॉलिसिटर जनरल और अपर सॉलिसिटर जनरल उसकी सहायता करते हैं और सरकार द्वारा नियुक्त किए जाते हैं, इसलिए उनका पद संवैधानिक नहीं है; यही अंतर प्रश्नपत्रों में बार-बार पूछा जाता है।

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