जनहित याचिका और न्यायिक सक्रियता: अनुच्छेद, प्रमुख वाद और तथ्य
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए जनहित याचिका और न्यायिक सक्रियता के संपूर्ण नोट्स: अनुच्छेद 32, 226, 39क तथा 142, वाद योग्यता, प्रमुख वाद और सीमाएँ।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 5 मिनट

जनहित याचिका (Public Interest Litigation, संक्षेप में PIL) वह याचिका है जो कोई भी लोकहितैषी व्यक्ति उन लोगों की ओर से अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय में या अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय में दायर करता है, जो स्वयं न्यायालय तक नहीं पहुँच सकते। इसने न्यायालय को, जो परंपरा से केवल व्यक्तिगत शिकायत सुनने का स्थान था, ऐसा मंच बना दिया जहाँ गरीबी, बंधुआ मजदूरी, जेलों की दशा, प्रदूषण और भ्रष्टाचार जैसे प्रश्न कोई तीसरा व्यक्ति भी उठा सकता है। न्यायिक सक्रियता इसके पीछे की व्यापक प्रवृत्ति है, अर्थात न्यायाधीशों की वह तत्परता जिसमें वे अधिकारों की उदार व्याख्या करते हैं और संवैधानिक कर्तव्य की उपेक्षा होने पर कार्यपालिका को निर्देश देते हैं। परीक्षाओं में यह अध्याय हर वर्ष आता है, क्योंकि इसमें अनुच्छेद 32, 226, 39क और 142 तथा कुछ प्रमुख वादों के नाम और वर्ष एक ही पंक्ति में पूछे जा सकते हैं।
कोई याचिका जनहित याचिका कब बनती है
साधारण मुकदमे में केवल वही व्यक्ति न्यायालय जा सकता है जिसका अपना अधिकार भंग हुआ हो। इस शर्त को लोकस स्टैंडाई (locus standi) अर्थात वाद योग्यता कहते हैं। जनहित याचिका में यह शर्त ढीली कर दी जाती है, याचिकाकर्ता का स्वयं पीड़ित होना या कोई व्यक्तिगत हानि दिखाना आवश्यक नहीं है। विषय में वास्तविक लोकहित होना चाहिए, निजी विवाद को जनहित का रूप देकर लाना पर्याप्त नहीं है, और प्रचार, निजी लाभ या राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के लिए दायर याचिका न्यायालय स्वीकार नहीं करता। प्रोफेसर उपेंद्र बक्षी ने इसके लिए सामाजिक कार्यवाही याचिका (Social Action Litigation) नाम सुझाया था, क्योंकि भारत में यह गरीबों की दशा से उपजी थी।
संवैधानिक आधार
जनहित याचिका के लिए संविधान में कोई अलग अनुच्छेद नहीं है, यह पहले से मौजूद उपबंधों पर टिकी है। अनुच्छेद 32 प्रत्येक व्यक्ति को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उच्चतम न्यायालय जाने का अधिकार देता है और डॉ. भीमराव आंबेडकर ने इसे संविधान की आत्मा कहा था। अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को इससे व्यापक रिट शक्ति देता है, जो मौलिक अधिकारों के साथ किसी भी विधिक अधिकार के लिए प्रयोग की जा सकती है। अनुच्छेद 39क एक नीति निदेशक तत्व है जिसे 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया; यह राज्य को समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता देने का निर्देश देता है ताकि निर्धनता के कारण किसी नागरिक को न्याय से वंचित न होना पड़े। अनुच्छेद 142 उच्चतम न्यायालय को पूर्ण न्याय करने के लिए कोई भी आदेश देने की शक्ति देता है और जनहित याचिकाओं में दिए गए अनेक निर्देश इसी से निकले हैं।
जनहित याचिका का आरंभ
इसके दो शिल्पकार माने जाते हैं, न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती और न्यायमूर्ति वी. आर. कृष्ण अय्यर। सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन वाद में उच्चतम न्यायालय ने एक बंदी द्वारा अपने साथी बंदी के साथ हो रहे व्यवहार पर लिखे पत्र को ही रिट याचिका मान लिया; पत्र या पोस्टकार्ड को याचिका मान लेने की इस पद्धति को पत्राचार क्षेत्राधिकार (epistolary jurisdiction) कहते हैं। हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य, 1979 में बिहार के उन विचाराधीन बंदियों का मामला था जो अपने अपराध की अधिकतम सजा से भी अधिक समय जेल में बिता चुके थे; न्यायालय ने उन्हें छोड़ने का आदेश दिया और कहा कि शीघ्र विचारण अनुच्छेद 21 के जीवन के अधिकार का भाग है। इसी वाद को भारत की पहली जनहित याचिका कहा जाता है। एस. पी. गुप्ता बनाम भारत संघ, 1981 अर्थात न्यायाधीश स्थानांतरण वाद में न्यायालय ने वाद योग्यता के शिथिल नियम को स्पष्ट शब्दों में रखा और आगे की सभी जनहित याचिकाओं का मार्ग खोल दिया।
प्रमुख जनहित याचिकाएँ
| वाद | वर्ष | न्यायालय ने क्या कहा |
|---|---|---|
| हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य | 1979 | शीघ्र विचारण अनुच्छेद 21 का भाग; विचाराधीन बंदी रिहा |
| एस. पी. गुप्ता बनाम भारत संघ | 1981 | वाद योग्यता शिथिल; न्यायाधीश स्थानांतरण वाद |
| बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ | 1984 | बंधुआ मजदूरों की मुक्ति और पुनर्वास |
| ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे नगर निगम | 1985 | जीविका का अधिकार अनुच्छेद 21 में शामिल |
| एम. सी. मेहता बनाम भारत संघ (ओलियम गैस रिसाव) | 1987 | संकटमय उद्योग का आत्यंतिक दायित्व |
| सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य | 1991 | प्रदूषणमुक्त जल और वायु का अधिकार अनुच्छेद 21 में |
| वेल्लोर सिटिजन्स वेलफेयर फोरम बनाम भारत संघ | 1996 | एहतियात का सिद्धांत और प्रदूषक भुगतान सिद्धांत |
| विशाखा बनाम राजस्थान राज्य | 1997 | कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के विरुद्ध दिशानिर्देश |
| उत्तरांचल राज्य बनाम बलवंत सिंह चौफाल | 2010 | जनहित याचिका के दुरुपयोग को रोकने के दिशानिर्देश |
न्यायिक सक्रियता, संयम और अतिरेक
न्यायिक सक्रियता शब्द अमेरिकी इतिहासकार आर्थर श्लेसिंजर जूनियर ने 1947 में गढ़ा था। भारत में यह उस न्यायालय का वर्णन करता है जो अधिकार की उदार व्याख्या करता है, विधायिका द्वारा छोड़े गए रिक्त स्थान को भरता है और संवैधानिक कर्तव्य पूरा होने तक कार्यपालिका की निगरानी करता है। विशाखा दिशानिर्देश इसका मानक उदाहरण हैं, क्योंकि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न पर कोई कानून न होने पर न्यायालय ने स्वयं बाध्यकारी दिशानिर्देश बनाए जो 2013 में संसद का अपना कानून आने तक लागू रहे। न्यायिक संयम इसके विपरीत रुख है, जिसमें न्यायालय नीति का प्रश्न निर्वाचित अंगों पर छोड़ देता है और स्वयं को वैधता तक सीमित रखता है। न्यायिक अतिरेक वह स्थिति है जहाँ सक्रियता संवैधानिक रेखा पार कर जाती है और न्यायालय व्यवहार में नीति बनाने या प्रशासन चलाने लगता है। शक्तियों का पृथक्करण और केशवानंद भारती वाद का आधारभूत ढाँचा सिद्धांत वह सीमा रेखा खींचते हैं जिस पर यह बहस टिकी है।
न्यायालय द्वारा तय की गई सीमाएँ
- विशुद्ध निजी शिकायत या सेवा विवाद के लिए जनहित याचिका दायर नहीं की जा सकती।
- तुच्छ और दुर्भावनापूर्ण याचिकाओं पर अनुकरणीय हर्जाना लगाया जाता है, और बलवंत सिंह चौफाल वाद में न्यायालय ने हर उच्च न्यायालय से याचिकाकर्ता की साख जाँचने के नियम बनाने को कहा।
- याचिका स्वीकार करने से पहले न्यायालय देखता है कि याचिकाकर्ता का परिणाम में कोई निजी स्वार्थ तो नहीं है।
- बजट में क्या हो जैसे नीतिगत निर्णय कार्यपालिका और विधायिका के ही क्षेत्र में रहते हैं।
परीक्षार्थी के लिए व्यावहारिक बात यह है कि जनहित याचिका कोई नया अधिकार नहीं, एक प्रक्रिया है। यह इसलिए चलती है क्योंकि अनुच्छेद 32 स्वयं एक मौलिक अधिकार है, इसलिए उच्चतम न्यायालय अधिकार हनन की वास्तविक शिकायत सुनने से मना नहीं कर सकता, और अनुच्छेद 39क राज्य को उन लोगों तक न्याय पहुँचाने के लिए बाध्य करता है जो उसका मूल्य नहीं चुका सकते।
परीक्षा की दृष्टि से
इस अध्याय से चार बातें पूछी जाती हैं। पहली, अनुच्छेद संख्याएँ: उच्चतम न्यायालय के लिए 32, उच्च न्यायालयों के लिए 226, निःशुल्क विधिक सहायता के लिए 39क और पूर्ण न्याय के लिए 142, जिनमें 39क प्रायः 42वें संशोधन के साथ पूछा जाता है। दूसरी, वाद और विषय का मिलान: हुसैनारा खातून के साथ विचाराधीन बंदी और शीघ्र विचारण, एस. पी. गुप्ता के साथ वाद योग्यता, विशाखा के साथ कार्यस्थल उत्पीड़न, ओल्गा टेलिस के साथ जीविका, सुभाष कुमार के साथ प्रदूषणमुक्त पर्यावरण। तीसरी, पारिभाषिक शब्द: वाद योग्यता, पत्राचार क्षेत्राधिकार, सामाजिक कार्यवाही याचिका, न्यायिक सक्रियता, संयम और अतिरेक। चौथी, व्यक्ति: प्रवर्तक के रूप में भगवती और कृष्ण अय्यर, शब्द के लिए श्लेसिंजर, वैकल्पिक नाम के लिए बक्षी। सामान्य भूल यह है कि पहली जनहित याचिका (हुसैनारा खातून) और वाद योग्यता तय करने वाले वाद (एस. पी. गुप्ता) को आपस में मिला दिया जाता है।
महत्वपूर्ण तथ्य
| भारत की पहली जनहित याचिका | हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य (1979) |
|---|---|
| वाद योग्यता शिथिल | एस. पी. गुप्ता बनाम भारत संघ (1981), न्यायाधीश स्थानांतरण वाद |
| उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका | अनुच्छेद 32, जो स्वयं मौलिक अधिकार है |
| उच्च न्यायालय में जनहित याचिका | अनुच्छेद 226, जो विषयवस्तु में अनुच्छेद 32 से व्यापक है |
| निःशुल्क विधिक सहायता | अनुच्छेद 39क, 42वें संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा जोड़ा गया |
| पूर्ण न्याय | अनुच्छेद 142 |
| प्रवर्तक न्यायाधीश | न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती और न्यायमूर्ति वी. आर. कृष्ण अय्यर |
| न्यायिक सक्रियता शब्द | आर्थर श्लेसिंजर जूनियर द्वारा 1947 में गढ़ा गया |
| वैकल्पिक नाम | सामाजिक कार्यवाही याचिका, उपेंद्र बक्षी द्वारा सुझाया गया |
| दुरुपयोग रोकने के दिशानिर्देश | उत्तरांचल राज्य बनाम बलवंत सिंह चौफाल (2010) |
| विशाखा दिशानिर्देश | 1997, कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न |
| प्रदूषणमुक्त पर्यावरण | सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य (1991), अनुच्छेद 21 के अंतर्गत |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
निम्नलिखित में से कौन सी रिट उच्च न्यायालय द्वारा किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित करने के लिए जारी की जा सकती है?
- A.परमादेश
- B.अधिकार पृच्छा
- C.बंदी प्रत्यक्षीकरण
- D.प्रतिषेध
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हेबियस कॉर्पस का लैटिन में अर्थ है शरीर को प्रस्तुत करो। उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के अंतर्गत और उच्चतम न्यायालय अनुच्छेद 32 के अंतर्गत यह रिट उस व्यक्ति या प्राधिकारी को जारी करता है जिसने किसी को हिरासत में रखा है, और आदेश देता है कि बंदी को न्यायालय के…
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारत की पहली जनहित याचिका सामान्यतः किस वाद को माना जाता है?
- A.एस. पी. गुप्ता बनाम भारत संघ
- B.हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य
- C.विशाखा बनाम राजस्थान राज्य
- D.बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ
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1979 में निर्णीत यह वाद बिहार के उन विचाराधीन बंदियों पर छपी समाचार रिपोर्ट से उठा था, जो अपने कथित अपराध की अधिकतम सजा से भी अधिक समय विचारण की प्रतीक्षा में जेल में बिता चुके थे।
पूरी व्याख्या पढ़ें →न्यायाधीश स्थानांतरण वाद के नाम से प्रसिद्ध किस वाद में उच्चतम न्यायालय ने वाद योग्यता का शिथिल नियम दिया?
- A.केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य
- B.मेनका गांधी बनाम भारत संघ
- C.एस. पी. गुप्ता बनाम भारत संघ
- D.मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ
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उच्चतम न्यायालय ने कहा कि जहाँ किसी व्यक्ति या व्यक्ति समूह के साथ विधिक अन्याय हुआ हो और वह निर्धनता, निःशक्तता या सामाजिक रूप से पिछड़ी स्थिति के कारण न्यायालय तक न पहुँच सके, वहाँ सद्भावपूर्वक कार्य करने वाला कोई भी नागरिक उसकी ओर से न्यायालय जा सकता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →संविधान का कौन सा अनुच्छेद राज्य को निःशुल्क विधिक सहायता देने का निर्देश देता है ताकि आर्थिक अक्षमता के कारण न्याय से वंचित न होना पड़े?
- A.अनुच्छेद 38
- B.अनुच्छेद 39क
- C.अनुच्छेद 41
- D.अनुच्छेद 43क
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यह नीति निदेशक तत्व राज्य से अपेक्षा करता है कि वह ऐसी विधिक व्यवस्था सुनिश्चित करे जो समान अवसर के आधार पर न्याय को बढ़ावा दे, और विशेष रूप से उपयुक्त विधान या योजनाओं द्वारा निःशुल्क विधिक सहायता दे ताकि आर्थिक या अन्य अक्षमताओं के कारण कोई नागरिक न्याय पाने…
पूरी व्याख्या पढ़ें →अनुच्छेद 39क को संविधान में किस संशोधन द्वारा जोड़ा गया?
- A.24वाँ संशोधन अधिनियम, 1971
- B.42वाँ संशोधन अधिनियम, 1976
- C.44वाँ संशोधन अधिनियम, 1978
- D.86वाँ संशोधन अधिनियम, 2002
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इतने उपबंधों को छूने के कारण इसे लघु संविधान कहा जाता है। इसने कई नीति निदेशक तत्व जोड़े, जिनमें समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता का अनुच्छेद 39क, प्रबंध में कर्मकारों की भागीदारी का अनुच्छेद 43क तथा पर्यावरण, वन और वन्य जीव के संरक्षण का अनुच्छेद 48क शामिल हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →न्यायिक सक्रियता शब्द 1947 में किसने गढ़ा था?
- A.आर्थर श्लेसिंजर जूनियर
- B.उपेंद्र बक्षी
- C.अलेक्जेंडर हैमिल्टन
- D.रॉस्को पाउंड
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यह पद भारतीय संवैधानिक लेखन में आया और अब उस न्यायालय का वर्णन करता है जो अधिकारों की उदार व्याख्या करता है, विधायी रिक्तता को भरता है और संवैधानिक कर्तव्य पूरा होने तक कार्यपालिका की निगरानी करता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →उच्चतम न्यायालय द्वारा 1997 में जारी विशाखा दिशानिर्देश किस विषय से संबंधित थे?
- A.पत्थर खदानों में बंधुआ मजदूरी
- B.कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न
- C.गंगा नदी का प्रदूषण
- D.पुलिस हिरासत में यातना
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यह याचिका ग्रामीण राजस्थान में एक सामाजिक कार्यकर्ता के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के बाद दायर हुई थी, जिसने बाल विवाह रोकने का प्रयास किया था।
पूरी व्याख्या पढ़ें →कौन सा अनुच्छेद उच्चतम न्यायालय को अपने समक्ष लंबित मामले में पूर्ण न्याय के लिए कोई भी डिक्री या आदेश देने की शक्ति देता है?
- A.अनुच्छेद 32
- B.अनुच्छेद 136
- C.अनुच्छेद 142
- D.अनुच्छेद 226
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इसमें कहा गया है कि उच्चतम न्यायालय अपनी अधिकारिता का प्रयोग करते हुए अपने समक्ष लंबित किसी वाद या विषय में पूर्ण न्याय करने के लिए आवश्यक ऐसी डिक्री या आदेश दे सकता है, और ऐसी डिक्री संपूर्ण भारत में प्रवर्तनीय होती है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा विकसित पत्राचार क्षेत्राधिकार का अर्थ है कि
- A.न्यायालय को लिखे पत्र या पोस्टकार्ड को रिट याचिका माना जा सकता है
- B.केवल पंजीकृत अधिवक्ता ही रिट याचिका दायर कर सकता है
- C.याचिका अंग्रेजी में ही दायर होनी चाहिए
- D.अधिकरण से सीधे उच्चतम न्यायालय में अपील होती है
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पत्राचार क्षेत्राधिकार वह पद्धति है जिसमें उच्चतम न्यायालय ने और बाद में उच्च न्यायालयों ने अधिकार हनन बताने वाले साधारण पत्र या पोस्टकार्ड को ही औपचारिक रिट याचिका मान लिया, और रूप, न्यायालय शुल्क तथा वकील की सामान्य अपेक्षाएँ छोड़ दीं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →किस वाद में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि प्रदूषणमुक्त पर्यावरण का अधिकार अनुच्छेद 21 के जीवन के अधिकार का भाग है?
- A.ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे नगर निगम
- B.सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य
- C.उन्नीकृष्णन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य
- D.डी. के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य
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इसमें उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 21 के जीवन के अधिकार में प्रदूषणमुक्त जल और वायु का उपभोग करने का अधिकार सम्मिलित है, और नागरिक जीवन को अस्वस्थकर बनाने वाले प्रदूषण को हटवाने के लिए अनुच्छेद 32 के अंतर्गत न्यायालय जा सकता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारत में जनहित याचिका के प्रवर्तक प्रायः किन दो न्यायाधीशों को कहा जाता है?
- A.न्यायमूर्ति एच. आर. खन्ना और न्यायमूर्ति एम. हिदायतुल्लाह
- B.न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती और न्यायमूर्ति वी. आर. कृष्ण अय्यर
- C.न्यायमूर्ति के. सुब्बा राव और न्यायमूर्ति ए. एन. रे
- D.न्यायमूर्ति वाई. वी. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पी. बी. गजेंद्रगडकर
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दोनों सत्तर के दशक के अंत और अस्सी के दशक के आरंभ में उच्चतम न्यायालय में थे, दोनों ने वे निर्णय लिखे जिन्होंने वाद योग्यता शिथिल की और पत्रों को याचिका माना, तथा दोनों ने न्यायालय के माध्यम से निःशुल्क विधिक सहायता और जेल सुधार को आगे बढ़ाया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →उत्तरांचल राज्य बनाम बलवंत सिंह चौफाल (2010) में उच्चतम न्यायालय ने मुख्यतः
- A.सेवा विषयों में जनहित याचिका समाप्त कर दी
- B.जनहित याचिका के दुरुपयोग को रोकने के दिशानिर्देश संकलित किए
- C.कहा कि केवल महान्यायवादी जनहित याचिका दायर कर सकते हैं
- D.सभी जनहित याचिकाएँ उच्च न्यायालयों को भेज दीं
उत्तर देखें
2010 के इस निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने जनहित याचिका का इतिहास देखा और इस चिंता से कि यह साधन प्रचार, निजी लाभ तथा राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के लिए प्रयोग हो रहा है, न्यायालयों के लिए निर्देशों का संकलन दिया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
जनहित याचिका और साधारण रिट याचिका में क्या अंतर है?
साधारण रिट याचिका में केवल वही व्यक्ति न्यायालय जा सकता है जिसका अपना अधिकार भंग हुआ हो। जनहित याचिका में वाद योग्यता का नियम शिथिल होता है, इसलिए कोई भी लोकहितैषी व्यक्ति उन लोगों की ओर से याचिका दे सकता है जो निर्धनता, निःशक्तता या पिछड़ी स्थिति के कारण न्यायालय तक नहीं पहुँच सकते। विषय वास्तविक लोकहित का होना चाहिए, निजी विवाद का नहीं।
भारत की पहली जनहित याचिका किस वाद को कहा जाता है?
हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य, जो 1979 में बिहार के विचाराधीन बंदियों की दशा पर निर्णीत हुआ। उच्चतम न्यायालय ने उनकी रिहाई का आदेश दिया और कहा कि शीघ्र विचारण अनुच्छेद 21 के जीवन के अधिकार का भाग है।
क्या न्यायालय को साधारण पत्र लिखकर जनहित याचिका दायर की जा सकती है?
हाँ। पत्राचार क्षेत्राधिकार के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों ने अधिकार हनन बताने वाले पत्रों और पोस्टकार्डों को भी रिट याचिका माना है। इसका आरंभ सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन वाद से हुआ, जहाँ एक बंदी का पत्र याचिका के रूप में लिया गया।
न्यायिक सक्रियता और न्यायिक अतिरेक में क्या अंतर है?
न्यायिक सक्रियता में न्यायालय अधिकारों की उदार व्याख्या करता है और कार्यपालिका को संवैधानिक कर्तव्य पूरा करने का निर्देश देता है, जैसे विशाखा दिशानिर्देशों में। न्यायिक अतिरेक तब होता है जब न्यायालय संवैधानिक रेखा पार कर व्यवहार में नीति बनाने या प्रशासन चलाने लगता है, जिससे शक्तियों का पृथक्करण प्रभावित होता है।
क्या जनहित याचिका हर्जाने के साथ खारिज हो सकती है?
हाँ। प्रचार, निजी लाभ या राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के लिए दायर याचिकाओं पर न्यायालय अनुकरणीय हर्जाना लगाते हैं। उत्तरांचल राज्य बनाम बलवंत सिंह चौफाल (2010) में उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालयों से याचिकाकर्ता की साख जाँचने और बाहरी कारणों से दायर याचिकाओं को हतोत्साहित करने को कहा।
भारत में निःशुल्क विधिक सहायता का आधार कौन सा अनुच्छेद है?
अनुच्छेद 39क, जो 1976 के 42वें संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ा गया नीति निदेशक तत्व है। यह राज्य को समान न्याय सुनिश्चित करने और निःशुल्क विधिक सहायता देने का निर्देश देता है ताकि आर्थिक या अन्य अक्षमताओं के कारण कोई नागरिक न्याय से वंचित न रहे।
स्रोत
- भारत का संविधान (अनुच्छेद 32, 39क, 142 और 226) — विधायी विभाग, विधि और न्याय मंत्रालय
- भारत का संविधान सिद्धांत और व्यवहार (कक्षा 11), अध्याय 6: न्यायपालिका — एनसीईआरटी





