राज्य विधानमंडल: अनुच्छेद, गठन और विधेयक
राज्य विधानमंडल के पूर्ण नोट्स: अनुच्छेद 168 से 212, विधान सभा और विधान परिषद की संख्या, कार्यकाल, गणपूर्ति, धन विधेयक तथा राज्यपाल की अनुमति।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 5 मिनट

राज्य विधानमंडल राज्य का विधि निर्माण करने वाला अंग है और वही मंच है जहाँ राज्य सरकार को उत्तरदायी ठहराया जाता है। संविधान का भाग छह अनुच्छेद 168 से 212 तक इसकी व्यवस्था करता है और इसकी बनावट जानबूझकर संसद जैसी रखी गई है: एक राज्यपाल जो सदन में बैठे बिना विधानमंडल का अंग होता है, एक प्रत्यक्ष निर्वाचित निचला सदन और कुछ राज्यों में एक अप्रत्यक्ष निर्वाचित उच्च सदन। परीक्षक इस अध्याय पर हर वर्ष लौटते हैं क्योंकि यहाँ का लगभग हर नियम संसद के किसी नियम का जुड़वाँ है जिसमें केवल एक संख्या बदली होती है, और जिस अभ्यर्थी ने केवल संघ के अनुच्छेद रटे हैं वह सीधे जाल में फँस जाता है।
राज्य विधानमंडल के सदन
अनुच्छेद 168 कहता है कि प्रत्येक राज्य के लिए एक विधानमंडल होगा जिसमें राज्यपाल तथा एक सदन या दो सदन होंगे। जहाँ एक सदन है वह विधान सभा है, और जहाँ दो सदन हैं वहाँ दूसरा सदन विधान परिषद कहलाता है। अधिकांश राज्यों में एक ही सदन है। विधान परिषद केवल गिने-चुने राज्यों में है, जिनमें बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक सम्मिलित हैं।
अनुच्छेद 169 संसद को विधान परिषद के सृजन या उत्सादन यानी समाप्ति की शक्ति देता है। संसद ऐसा तभी कर सकती है जब उस राज्य की विधान सभा विशेष बहुमत से संकल्प पारित कर दे, अर्थात सभा की कुल सदस्य संख्या के बहुमत से और उपस्थित तथा मत देने वाले सदस्यों के कम से कम दो तिहाई बहुमत से। ऐसा कानून अनुच्छेद 368 के अर्थ में संविधान संशोधन नहीं माना जाता, इसलिए संसद उसे साधारण बहुमत से पारित करती है। पश्चिम बंगाल ने 1969 में, आंध्र प्रदेश ने 1985 में और तमिलनाडु ने 1986 में अपनी परिषद समाप्त की थी; आंध्र प्रदेश ने 2007 में उसे पुनः स्थापित कर लिया।
गठन और कार्यकाल
अनुच्छेद 170 विधान सभा की सदस्य संख्या अधिकतम 500 और न्यूनतम 60 निर्धारित करता है, जो राज्य के प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने जाते हैं; संविधान के विशेष उपबंध कुछ छोटे राज्यों में इससे छोटी विधान सभा की अनुमति देते हैं। अनुच्छेद 171 विधान परिषद की सदस्य संख्या को उस राज्य की विधान सभा की संख्या के एक तिहाई तक सीमित करता है, किंतु वह किसी भी दशा में 40 से कम नहीं होगी। परिषद का गठन राजव्यवस्था का सबसे अधिक पूछा जाने वाला भिन्न समूह है: एक तिहाई सदस्य नगरपालिकाओं और जिला बोर्ड जैसी स्थानीय संस्थाओं के निर्वाचक मंडल चुनते हैं, एक बटा बारह तीन वर्ष पुराने स्नातक चुनते हैं, एक बटा बारह माध्यमिक विद्यालय स्तर से नीचे न पढ़ाने वाले तीन वर्ष के अनुभवी शिक्षक चुनते हैं, एक तिहाई विधान सभा के सदस्य ऐसे व्यक्तियों में से चुनते हैं जो सभा के सदस्य नहीं हैं, और शेष एक बटा छह को राज्यपाल साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन तथा समाज सेवा के ज्ञाताओं में से नामनिर्देशित करता है।
अनुच्छेद 172 के अनुसार विधान सभा अपनी पहली बैठक की तारीख से पाँच वर्ष तक चलती है, यदि वह पहले भंग न कर दी जाए, और आपात की उद्घोषणा के प्रवर्तन में रहते हुए संसद उसे एक बार में एक वर्ष तक बढ़ा सकती है, किंतु उद्घोषणा समाप्त होने के छह मास से अधिक नहीं। विधान परिषद एक स्थायी सदन है जिसका विघटन नहीं होता; उसके एक तिहाई सदस्य प्रत्येक दूसरे वर्ष सेवानिवृत्त होते हैं, इसलिए परिषद के सदस्य का कार्यकाल छह वर्ष होता है। अनुच्छेद 173 विधान सभा के लिए 25 वर्ष और विधान परिषद के लिए 30 वर्ष की आयु योग्यता रखता है, और अनुच्छेद 174 दो सत्रों के बीच छह मास से अधिक का अंतर वर्जित करता है।
पीठासीन अधिकारी और प्रक्रिया
| पद | सदन | अनुच्छेद |
|---|---|---|
| अध्यक्ष और उपाध्यक्ष | विधान सभा | अनुच्छेद 178 |
| सभापति और उपसभापति | विधान परिषद | अनुच्छेद 182 |
| गणपूर्ति: 10 सदस्य या सदन का दसवाँ भाग | दोनों सदन | अनुच्छेद 189 |
| 60 दिन की अनुपस्थिति पर स्थान रिक्त | दोनों सदन | अनुच्छेद 190 |
| निरर्हता का निर्णय राज्यपाल करता है | दोनों सदन | अनुच्छेद 192 |
विधान सभा का अध्यक्ष अपना त्यागपत्र उपाध्यक्ष को और उपाध्यक्ष अध्यक्ष को संबोधित करता है, तथा दोनों में से किसी को चौदह दिन की सूचना के बाद सदन के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा हटाया जा सकता है। अनुच्छेद 192 के अधीन किसी बैठे हुए सदस्य की निरर्हता का प्रश्न राज्यपाल के निर्णय के लिए भेजा जाता है, और उसे निर्वाचन आयोग की राय लेकर उसी के अनुसार कार्य करना होता है। अनुच्छेद 194 सदनों और उनके सदस्यों की शक्तियों तथा विशेषाधिकारों की रक्षा करता है, और अनुच्छेद 212 न्यायालयों को प्रक्रिया की कथित अनियमितता के आधार पर विधानमंडल की कार्यवाही की जाँच करने से रोकता है।
विधि निर्माण और धन
द्विसदनीय विधानमंडल में साधारण विधेयक किसी भी सदन में आरंभ हो सकता है, किंतु परिषद केवल विलंब करने वाला सदन है: वह किसी विधेयक को पहली बार तीन मास और दूसरी बार एक मास, कुल मिलाकर चार मास रोक सकती है, उसके बाद विधान सभा की इच्छा ही चलती है। राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक का कोई उपबंध नहीं है, और यही संसद से सबसे तीखा अंतर है, जहाँ अनुच्छेद 108 संयुक्त बैठक की अनुमति देता है। अनुच्छेद 199 धन विधेयक को उन्हीं आधारों पर परिभाषित करता है जिन पर अनुच्छेद 110 संसद के लिए करता है, और अनुच्छेद 198 उसे केवल विधान सभा में, राज्यपाल की सिफारिश पर, पुरःस्थापित करने देता है; परिषद को उसे चौदह दिन के भीतर लौटाना होता है और उसकी सिफारिशें मानना या न मानना विधान सभा पर निर्भर है।
अनुच्छेद 200 राज्यपाल को उसके समक्ष प्रस्तुत विधेयक पर चार विकल्प देता है: अनुमति देना, अनुमति रोक लेना, धन विधेयक न होने की दशा में विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटाना, या उसे राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखना। यदि सदन लौटाए गए विधेयक को संशोधन सहित या रहित फिर से पारित कर देता है तो राज्यपाल अनुमति नहीं रोकेगा। अनुच्छेद 201 ऐसे आरक्षित विधेयक से संबंधित है, और अनुच्छेद 202 से 207 तक राज्य का वार्षिक वित्तीय विवरण, विनियोग, अनुपूरक अनुदान तथा लेखानुदान आते हैं। अनुच्छेद 333 के अधीन विधान सभा में आंग्ल भारतीय समुदाय के सदस्य का नामनिर्देशन 104वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 से समाप्त हो गया।
परीक्षा की दृष्टि से
प्रश्नपत्र सबसे पहले अनुच्छेद संख्याएँ पूछते हैं: 168, 169, 170, 171, 172, 173, 174, 178, 189, 198, 199 और 200। सबसे आम जाल ये हैं कि अनुच्छेद 108 को राज्य विधानमंडल पर लागू मान लेना, जबकि राज्य स्तर पर संयुक्त बैठक होती ही नहीं; यह कहना कि धन विधेयक विधान परिषद में पुरःस्थापित हो सकता है; और परिषद की भिन्नों को आपस में बदल देना, विशेषकर राज्यपाल द्वारा नामनिर्देशित एक बटा छह तथा स्नातकों और शिक्षकों के एक बटा बारह को। कथन आधारित प्रश्न पूछते हैं कि क्या परिषद विधेयक अस्वीकार कर सकती है, क्या वह भंग होती है, और क्या उसे समाप्त करने के लिए संविधान संशोधन चाहिए। 25 और 30 वर्ष की जोड़ी, 60 से 500 की सीमा, चार मास का विलंब और चौदह दिन की धन विधेयक अवधि लगभग हर वर्ष पूछी जाती है।
महत्वपूर्ण तथ्य
| भाग और अनुच्छेद | भाग छह, अनुच्छेद 168 से 212 (राज्य विधानमंडल) |
|---|---|
| विधान सभा की संख्या | अधिकतम 500 और न्यूनतम 60 सदस्य (अनुच्छेद 170) |
| विधान परिषद की संख्या | विधान सभा के एक तिहाई तक, न्यूनतम 40 सदस्य (अनुच्छेद 171) |
| राज्यपाल द्वारा नामनिर्देशन | परिषद का एक बटा छह भाग: साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता और समाज सेवा |
| कार्यकाल | विधान सभा पाँच वर्ष; परिषद सदस्य छह वर्ष, एक तिहाई हर दूसरे वर्ष सेवानिवृत्त |
| न्यूनतम आयु | विधान सभा 25 वर्ष, विधान परिषद 30 वर्ष (अनुच्छेद 173) |
| गणपूर्ति | दस सदस्य या सदन का दसवाँ भाग, जो भी अधिक हो (अनुच्छेद 189) |
| सत्र | दो बैठकों के बीच छह मास से अधिक अंतर नहीं (अनुच्छेद 174) |
| धन विधेयक | परिभाषा अनुच्छेद 199 में, प्रक्रिया अनुच्छेद 198 में; परिषद उसे 14 दिन रख सकती है |
| साधारण विधेयक | परिषद कुल चार मास रोक सकती है; संयुक्त बैठक का उपबंध नहीं |
| राज्यपाल की अनुमति | अनुच्छेद 200: अनुमति, रोक, वापसी या राष्ट्रपति के लिए आरक्षण |
| निरर्हता | निर्वाचन आयोग की राय पर राज्यपाल निर्णय करता है (अनुच्छेद 192) |
| परिषद का सृजन या समाप्ति | अनुच्छेद 169, विधान सभा के विशेष बहुमत संकल्प पर |
| आंग्ल भारतीय नामनिर्देशन | अनुच्छेद 333, 104वें संविधान संशोधन अधिनियम 2019 से समाप्त |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
संविधान का कौन सा अनुच्छेद राज्यों में विधान परिषद के सृजन या समाप्ति का उपबंध करता है?
- A.अनुच्छेद 168
- B.अनुच्छेद 169
- C.अनुच्छेद 170
- D.अनुच्छेद 171
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. अनुच्छेद 169
व्याख्या
सही उत्तर B, अनुच्छेद 169 है। यह संसद को शक्ति देता है कि वह किसी राज्य की विद्यमान विधान परिषद को समाप्त कर दे अथवा जिस राज्य में परिषद नहीं है वहाँ उसका सृजन कर दे, बशर्ते उस राज्य की विधान सभा पहले अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत से तथा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के कम से कम दो तिहाई बहुमत से संकल्प पारित कर दे। यह अनुच्छेद यह भी कहता है कि ऐसा कानून अनुच्छेद 368 के प्रयोजनों के लिए संविधान संशोधन नहीं माना जाएगा, इसलिए संसद में साधारण बहुमत पर्याप्त है। विकल्प A, अनुच्छेद 168, केवल यह घोषित करता है कि प्रत्येक राज्य में राज्यपाल तथा एक या दो सदनों वाला विधानमंडल होगा। विकल्प C, अनुच्छेद 170, विधान सभा के गठन और उसकी 60 से 500 की सीमा से संबंधित है। विकल्प D, अनुच्छेद 171, विधान परिषद के गठन तथा उसके सदस्यों के चयन की भिन्नें निर्धारित करता है।
अनुच्छेद 170 के अनुसार राज्य विधान सभा में सदस्यों की अधिकतम संख्या कितनी हो सकती है?
- A.250
- B.400
- C.500
- D.550
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. 500
व्याख्या
सही उत्तर C, 500 है। अनुच्छेद 170 कहता है कि प्रत्येक राज्य की विधान सभा में 500 से अधिक और 60 से कम सदस्य नहीं होंगे, जो राज्य के प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने जाएँगे। संविधान के विशेष उपबंध कुछ छोटे राज्यों में इससे छोटी विधान सभा की अनुमति देते हैं, यही कारण है कि कुछ विधान सभाओं में 60 से कम सीटें हैं। विकल्प A, 250, राज्यसभा की अधिकतम सीमा है और दोनों सदनों को गड्डमड्ड करने वाला अभ्यर्थी इसे चुन लेता है। विकल्प B, 400, किसी संवैधानिक सीमा से मेल नहीं खाता और शुद्ध भ्रामक विकल्प है। विकल्प D, 550, लोकसभा की अधिकतम निर्वाचित संख्या है, जिसमें राज्यों से 530 और संघ राज्यक्षेत्रों से 20 सदस्य आते हैं, अतः वह संसद से संबंधित है, राज्य विधान सभा से नहीं।
राज्य विधान परिषद के कितने भाग सदस्यों का नामनिर्देशन राज्यपाल करता है?
- A.एक तिहाई
- B.एक बटा छह
- C.एक बटा बारह
- D.एक चौथाई
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. एक बटा छह
व्याख्या
सही उत्तर B, एक बटा छह है। अनुच्छेद 171 विधान परिषद को पाँच भागों में बाँटता है। एक तिहाई सदस्य नगरपालिकाओं और जिला बोर्ड जैसी स्थानीय संस्थाओं के निर्वाचक मंडल चुनते हैं, एक बटा बारह तीन वर्ष पुराने स्नातक चुनते हैं, एक बटा बारह माध्यमिक विद्यालय स्तर से नीचे न पढ़ाने वाले तीन वर्ष के अनुभवी शिक्षक चुनते हैं, और एक तिहाई विधान सभा के सदस्य ऐसे व्यक्तियों में से चुनते हैं जो सभा के सदस्य नहीं हैं। शेष भाग, जो एक बटा छह बैठता है, राज्यपाल द्वारा साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन तथा समाज सेवा में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले व्यक्तियों में से नामनिर्देशित किया जाता है। विकल्प A, एक तिहाई, स्थानीय संस्थाओं तथा अलग से विधायकों के कोटे का भाग है। विकल्प C और D, एक बटा बारह तथा एक चौथाई, क्रमशः स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों तथा किसी भी श्रेणी से संबंधित नहीं हैं।
राज्य विधान परिषद की सदस्यता के लिए निर्धारित न्यूनतम आयु कितनी है?
- A.21 वर्ष
- B.25 वर्ष
- C.30 वर्ष
- D.35 वर्ष
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. 30 वर्ष
व्याख्या
सही उत्तर C, 30 वर्ष है। अनुच्छेद 173 राज्य विधानमंडल की सदस्यता की योग्यताएँ बताता है: व्यक्ति भारत का नागरिक हो, निर्वाचन आयोग द्वारा प्राधिकृत व्यक्ति के समक्ष शपथ ले या प्रतिज्ञान करे, और विधान सभा की सीट के लिए कम से कम 25 वर्ष तथा विधान परिषद की सीट के लिए कम से कम 30 वर्ष की आयु का हो। विकल्प A, 21 वर्ष, वह आयु है जिस पर अधिकांश राज्य कानूनों के अधीन नागरिक पंचायत या नगरपालिका का चुनाव लड़ सकता है, विधानमंडल की सीट का नहीं। विकल्प B, 25 वर्ष, विधान सभा और लोकसभा की आयु है और परीक्षक यही आशा करते हैं कि जल्दबाज़ अभ्यर्थी इसे चुन लेगा। विकल्प D, 35 वर्ष, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और राज्यपाल के पदों की आयु योग्यता है, किसी विधायक की नहीं।
अनुच्छेद 189 के अनुसार राज्य विधानमंडल के सदन की बैठक के लिए गणपूर्ति कितनी होती है?
- A.दस सदस्य या कुल सदस्य संख्या का दसवाँ भाग, जो भी अधिक हो
- B.कुल सदस्य संख्या का एक चौथाई
- C.हर दशा में बीस सदस्य
- D.कुल सदस्य संख्या का एक बटा छह
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. दस सदस्य या कुल सदस्य संख्या का दसवाँ भाग, जो भी अधिक हो
व्याख्या
सही उत्तर A है। अनुच्छेद 189 उपबंध करता है कि किसी राज्य के विधानमंडल के सदन की बैठक गठित करने के लिए गणपूर्ति दस सदस्य या उस सदन की कुल सदस्य संख्या का दसवाँ भाग होगी, इनमें से जो भी अधिक हो। यह नियम वही है जो अनुच्छेद 100 संसद के सदनों के लिए रखता है, और यह छोटे सदन को इस बात से बचाता है कि मुट्ठी भर सदस्य कार्य निपटा दें। विकल्प B, एक चौथाई, कई हटाने संबंधी और संकल्प संबंधी प्रक्रियाओं की बहुमत अपेक्षा है, किंतु गणपूर्ति कभी नहीं। विकल्प C इसलिए गलत है कि संविधान बीस का कोई निश्चित आँकड़ा तय नहीं करता; न्यूनतम दस है और सदन के आकार के साथ वह बढ़ता है। विकल्प D, एक बटा छह, अनुच्छेद 171 के अधीन राज्यपाल द्वारा नामनिर्देशित परिषद सदस्यों का भाग है और उसका गणपूर्ति से कोई संबंध नहीं।
विधान सभा से पारित साधारण विधेयक को विधान परिषद कुल मिलाकर कितने समय तक रोक सकती है?
- A.14 दिन
- B.एक मास
- C.चार मास
- D.छह मास
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. चार मास
व्याख्या
सही उत्तर C, चार मास है। जब विधान सभा कोई साधारण विधेयक पारित करके विधान परिषद को भेजती है तो परिषद उसे पहली बार अधिकतम तीन मास तक रोक सकती है। यदि विधान सभा उस विधेयक को दूसरी बार पारित करके पुनः भेजती है तो परिषद उसे केवल एक मास और रोक सकती है। तीन मास और एक मास मिलकर कुल चार मास का विलंब बनता है, जिसके बाद विधेयक पारित माना जाता है। विकल्प A, चौदह दिन, वह अवधि है जिसके लिए परिषद अनुच्छेद 198 के अधीन धन विधेयक अपने पास रख सकती है। विकल्प B, एक मास, साधारण विधेयक प्रक्रिया का केवल दूसरा चरण है। विकल्प D, छह मास, अनुच्छेद 174 के अधीन सदन के दो सत्रों के बीच अनुमत अधिकतम अंतर है और वह विधेयकों की विलंब अवधि नहीं है।
राज्य विधानमंडल में धन विधेयक कहाँ पुरःस्थापित किया जा सकता है?
- A.केवल विधान परिषद में
- B.केवल विधान सभा में, राज्यपाल की सिफारिश पर
- C.किसी भी सदन में, मुख्यमंत्री की सिफारिश पर
- D.केवल विधान सभा में, राष्ट्रपति की सिफारिश पर
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. केवल विधान सभा में, राज्यपाल की सिफारिश पर
व्याख्या
सही उत्तर B है। अनुच्छेद 198 राज्य में धन विधेयकों की विशेष प्रक्रिया निर्धारित करता है: ऐसा विधेयक विधान परिषद में पुरःस्थापित नहीं किया जा सकता, और विधान सभा में भी वह केवल राज्यपाल की सिफारिश पर ही पुरःस्थापित हो सकता है। विधान सभा से पारित होने पर विधेयक परिषद के पास जाता है, जिसे उसे अपनी सिफारिशों सहित चौदह दिन के भीतर लौटाना होता है; विधान सभा उन सिफारिशों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है, और यदि परिषद समय पर विधेयक न लौटाए तो वह पारित माना जाता है। विकल्प A नियम को पूरी तरह उलट देता है। विकल्प C दोनों बातों में गलत है, क्योंकि परिषद धन विधेयक आरंभ नहीं कर सकती और सिफारिश राज्यपाल की होती है, मुख्यमंत्री की नहीं। विकल्प D राज्यपाल के स्थान पर राष्ट्रपति रख देता है; राष्ट्रपति केवल अनुच्छेद 200 और 201 के अधीन आरक्षित विधेयक की दशा में आते हैं।
अनुच्छेद 200 के अधीन राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत विधेयक पर निम्नलिखित में से कौन सा विकल्प उपलब्ध नहीं है?
- A.विधेयक को अनुमति देना
- B.विधेयक पर अनुमति रोक लेना
- C.धन विधेयक को पुनर्विचार के लिए सदन को लौटाना
- D.विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखना
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. धन विधेयक को पुनर्विचार के लिए सदन को लौटाना
व्याख्या
सही उत्तर C है। अनुच्छेद 200 राज्यपाल को साधारण विधेयक पर तीन विकल्प देता है और विशेष दशाओं के लिए एक चौथा मार्ग जोड़ता है: वह घोषित कर सकता है कि वह अनुमति देता है, अनुमति रोकता है, या विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखता है, और वह विधेयक को संदेश सहित सदन को लौटाकर उस पर या उसके किसी उपबंध पर पुनर्विचार करने को कह सकता है। लौटाने की शक्ति स्पष्ट रूप से केवल तभी उपलब्ध है जब विधेयक धन विधेयक न हो, इसीलिए विकल्प C ही वह अपवाद है जो प्रश्न खोज रहा है। विकल्प A, B और D तीनों स्वयं अनुच्छेद में लिखे हैं। अनुच्छेद यह भी कहता है कि यदि सदन लौटाए गए विधेयक को संशोधन सहित या रहित फिर से पारित कर दे तो राज्यपाल उस पर अनुमति नहीं रोकेगा।
राज्य विधान परिषद के सदस्य का कार्यकाल कितना होता है?
- A.चार वर्ष
- B.पाँच वर्ष
- C.छह वर्ष
- D.विधान सभा के कार्यकाल के बराबर
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. छह वर्ष
व्याख्या
सही उत्तर C, छह वर्ष है। अनुच्छेद 172 कहता है कि किसी राज्य की विधान परिषद का विघटन नहीं होगा, किंतु यथासंभव उसके एक तिहाई सदस्य प्रत्येक दूसरे वर्ष की समाप्ति पर सेवानिवृत्त होंगे। इसलिए सदस्य अपनी सीट छह वर्ष तक रखता है, ठीक वैसे ही जैसे राज्यसभा का सदस्य रखता है, और सदन स्वयं स्थायी रहता है। विकल्प A, चार वर्ष, किसी संवैधानिक कार्यकाल से मेल नहीं खाता। विकल्प B, पाँच वर्ष, विधान सभा का जीवनकाल है, जो अपनी पहली बैठक की तारीख से पाँच वर्ष चलती है यदि पहले भंग न हो। विकल्प D इसलिए गलत है कि परिषद को जानबूझकर विधान सभा के उतार-चढ़ाव से अलग रखा गया है; विधान सभा भंग होने पर भी परिषद बनी रहती है, और स्थायी सदन का यही अर्थ है।
अनुच्छेद 192 के अधीन राज्य विधानमंडल के किसी बैठे हुए सदस्य की निरर्हता के प्रश्न का निर्णय कौन करता है?
- A.विधान सभा का अध्यक्ष
- B.राज्यपाल, निर्वाचन आयोग की राय लेने के बाद
- C.राज्य का उच्च न्यायालय
- D.राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद की सलाह पर
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. राज्यपाल, निर्वाचन आयोग की राय लेने के बाद
व्याख्या
सही उत्तर B है। अनुच्छेद 192 कहता है कि यदि यह प्रश्न उठे कि किसी राज्य के विधानमंडल के सदन का सदस्य अनुच्छेद 191 में गिनाई गई किसी निरर्हता से ग्रस्त हो गया है, तो वह प्रश्न राज्यपाल के निर्णय के लिए भेजा जाएगा और उसका निर्णय अंतिम होगा। कोई भी निर्णय देने से पहले राज्यपाल निर्वाचन आयोग की राय लेगा और उसी के अनुसार कार्य करेगा, जिससे प्रभावी निर्णयकर्ता आयोग बन जाता है। विकल्प A साधारण निरर्हताओं के लिए गलत है, यद्यपि दसवीं अनुसूची के अधीन दल-बदल के आधार पर निरर्हता का निर्णय अध्यक्ष या सभापति ही करता है, और यही इस प्रश्न का जाल है। विकल्प C इसलिए गलत है कि उच्च न्यायालय निर्वाचन याचिका सुनता है, अनुच्छेद 192 का निर्देश नहीं। विकल्प D राष्ट्रपति को रख देता है, जो संसद सदस्यों के लिए अनुच्छेद 103 के अधीन यही भूमिका निभाते हैं।
साधारण विधेयक पर गतिरोध दूर करने के लिए दोनों सदनों की संयुक्त बैठक के बारे में सही कथन कौन सा है?
- A.राज्य विधानमंडल में उपलब्ध है और राज्यपाल उसकी अध्यक्षता करता है
- B.राज्य विधानमंडल में अनुच्छेद 108 के अधीन उपलब्ध है
- C.राज्य विधानमंडल में इसका कोई उपबंध ही नहीं है
- D.राज्य विधानमंडल में अध्यक्ष के अनुरोध पर बुलाई जाती है
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. राज्य विधानमंडल में इसका कोई उपबंध ही नहीं है
व्याख्या
सही उत्तर C है। संविधान दोनों सदनों की संयुक्त बैठक का उपबंध केवल संघ स्तर पर, अनुच्छेद 108 के अधीन, करता है, जहाँ राष्ट्रपति लोकसभा और राज्यसभा को साथ बैठने के लिए बुला सकते हैं और लोकसभा अध्यक्ष उसकी अध्यक्षता करता है। राज्य विधानमंडल के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, क्योंकि विधान परिषद विशुद्ध रूप से विलंब करने वाला सदन है: कुल चार मास तक साधारण विधेयक रोक लेने के बाद विधेयक पारित मान लिया जाता है और बिना किसी संयुक्त बैठक के विधान सभा की इच्छा ही चलती है। विकल्प A इसलिए गलत है कि राज्यपाल किसी भी सदन की बैठक की अध्यक्षता कभी नहीं करता। विकल्प B अनुच्छेद 108 का गलत प्रयोग करता है, जो केवल संसद तक सीमित है। विकल्प D अध्यक्ष को ऐसी शक्ति दे देता है जो उसके पास नहीं है; सदनों को आहूत करना अनुच्छेद 174 के अधीन राज्यपाल का कार्य है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
राज्य विधानमंडल से कौन से अनुच्छेद संबंधित हैं?
संविधान का भाग छह, अनुच्छेद 168 से 212 तक, राज्य विधानमंडल के सदनों, गठन, कार्यकाल, अधिकारियों, प्रक्रिया और विधेयकों को शामिल करता है।
विधान परिषद का सृजन या समाप्ति कैसे होती है?
अनुच्छेद 169 के अधीन संसद कानून बनाकर परिषद बना या समाप्त कर सकती है, किंतु तभी जब उस राज्य की विधान सभा अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत और उपस्थित तथा मत देने वाले सदस्यों के दो तिहाई बहुमत से संकल्प पारित कर दे। ऐसा कानून अनुच्छेद 368 के अर्थ में संविधान संशोधन नहीं होता।
विधान परिषद की अधिकतम सदस्य संख्या कितनी हो सकती है?
अनुच्छेद 171 के अनुसार परिषद में उस राज्य की विधान सभा की कुल संख्या के एक तिहाई से अधिक सदस्य नहीं हो सकते, और किसी भी दशा में 40 से कम नहीं होंगे।
क्या विधान परिषद विधान सभा से पारित विधेयक को अस्वीकार कर सकती है?
नहीं। परिषद केवल विलंब करने वाला सदन है। वह साधारण विधेयक को पहली बार तीन मास और दूसरी बार एक मास, कुल चार मास रोक सकती है, तथा धन विधेयक को केवल चौदह दिन। गतिरोध सुलझाने के लिए राज्य विधानमंडल में संयुक्त बैठक का उपबंध नहीं है।
विधायक और विधान परिषद सदस्य बनने की न्यूनतम आयु क्या है?
अनुच्छेद 173 के अनुसार विधान सभा के लिए कम से कम 25 वर्ष और विधान परिषद के लिए कम से कम 30 वर्ष की आयु आवश्यक है, साथ ही व्यक्ति का भारत का नागरिक होना भी आवश्यक है।
क्या विधान परिषद कभी भंग होती है?
नहीं। परिषद राज्यसभा की तरह एक स्थायी सदन है। उसके एक तिहाई सदस्य प्रत्येक दूसरे वर्ष सेवानिवृत्त होते हैं, इसलिए किसी सदस्य का कार्यकाल छह वर्ष का होता है।
स्रोत
- भारत का संविधान, भाग छह: राज्य, अध्याय तीन — विधायी विभाग, विधि और न्याय मंत्रालय
- भारत का संविधान: सिद्धांत और व्यवहार (कक्षा ग्यारह), अध्याय पाँच: विधायिका — एनसीईआरटी





