संविधान संशोधन और मूल संरचना: अनुच्छेद 368 और प्रमुख वाद
अनुच्छेद 368, संशोधन के तीन प्रकार, राज्यों का अनुसमर्थन, गोलकनाथ से केशवानंद भारती तक मूल संरचना सिद्धांत और परीक्षा में पूछे जाने वाले संशोधनों के नोट्स।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 4 मिनट

भारत का संविधान न अमेरिकी संविधान जितना कठोर है और न ब्रिटिश व्यवस्था जितना लचीला; निर्माताओं ने संशोधन की शक्ति अनुच्छेद 368 में रखी और उसे तीन वर्गों में बाँट दिया, जिससे साधारण उपबंध सरलता से बदले जा सकें पर संघीय ढाँचे को छूने के लिए राज्यों की सहमति आवश्यक हो। 1973 में सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी ओर से एक सीमा जोड़ दी और कहा कि संसद संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, परंतु उसकी मूल संरचना नष्ट नहीं कर सकती। अनुच्छेद 368 और मूल संरचना का सिद्धांत मिलकर भारतीय राजव्यवस्था का सर्वाधिक पूछा जाने वाला भाग बनते हैं।
अनुच्छेद 368 और संशोधन के तीन प्रकार
अनुच्छेद 368 संविधान के भाग 20 में है और उसका शीर्षक है संसद की संविधान संशोधन की शक्ति और उसकी प्रक्रिया। संशोधन तीन वर्गों में आते हैं। कुछ उपबंध साधारण विधि की तरह प्रत्येक सदन के साधारण बहुमत से बदले जाते हैं: अनुच्छेद 4 के अंतर्गत नए राज्यों का प्रवेश या गठन तथा क्षेत्र और नाम में परिवर्तन, अनुच्छेद 169 के अंतर्गत राज्य विधान परिषद का सृजन या उत्सादन, और संघ राज्यक्षेत्रों तथा अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन से जुड़े उपबंध। ये अनुच्छेद 368 के बाहर आते हैं। दूसरे वर्ग के लिए प्रत्येक सदन का विशेष बहुमत चाहिए, अर्थात सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत तथा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के दो तिहाई से अन्यून बहुमत; मूल अधिकार और नीति निदेशक तत्व सहित संविधान का अधिकांश भाग इसी रीति से संशोधित होता है। तीसरे वर्ग में संसद के उस विशेष बहुमत के साथ आधे से अन्यून राज्यों के विधानमंडलों का साधारण बहुमत से अनुसमर्थन भी आवश्यक है।
किन विषयों पर राज्यों का अनुसमर्थन आवश्यक है
- राष्ट्रपति का निर्वाचन और उसकी रीति, अनुच्छेद 54 और 55।
- संघ और राज्यों की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार, अनुच्छेद 73 और 162।
- उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय, तथा संघ और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का वितरण।
- तीन सूचियों वाली सातवीं अनुसूची और संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व।
- स्वयं अनुच्छेद 368।
संसद में प्रक्रिया
संशोधन विधेयक किसी भी सदन में मंत्री या निजी सदस्य द्वारा पुरःस्थापित किया जा सकता है और उसके लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति आवश्यक नहीं है। उसे प्रत्येक सदन में अलग-अलग अपेक्षित बहुमत से पारित होना पड़ता है, क्योंकि दोनों सदनों में असहमति की स्थिति में संयुक्त बैठक का उपबंध नहीं है; राज्य विधानमंडल संशोधन आरंभ नहीं कर सकता, हाँ वह अनुच्छेद 169 के अंतर्गत विधान परिषद के लिए संकल्प पारित कर सकता है। जहाँ अनुसमर्थन आवश्यक है वहाँ उसके बाद विधेयक राष्ट्रपति के पास जाता है, और 1971 के चौबीसवें संशोधन से उनकी अनुमति अनिवार्य हो गई, इसलिए ऐसा विधेयक न रोका जा सकता है और न लौटाया जा सकता है।
मूल संरचना सिद्धांत का विकास
1951 के शंकरी प्रसाद वाद और फिर 1965 के सज्जन सिंह वाद में न्यायालय ने माना कि संशोधन साधारण विधि नहीं है और वह मूल अधिकार छीन सकता है। 1967 के गोलकनाथ वाद में ग्यारह न्यायाधीशों की पीठ ने छह के मुकाबले पाँच से यह दृष्टिकोण उलट दिया और कहा कि मूल अधिकारों को कम नहीं किया जा सकता। संसद ने चौबीसवें संशोधन से उत्तर दिया और प्रश्न 1973 के केशवानंद भारती वाद में लौटा, जहाँ तेरह न्यायाधीशों की पीठ ने सात के मुकाबले छह से कहा कि संसद संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, परंतु उसकी मूल संरचना नहीं बदल सकती। 1976 के बयालीसवें संशोधन ने अनुच्छेद 368 में खंड 4 और 5 जोड़कर संशोधनों को न्यायिक पुनरावलोकन से बाहर करने का प्रयास किया; 1980 के मिनर्वा मिल्स वाद में न्यायालय ने दोनों खंड अपास्त कर दिए और कहा कि न्यायिक पुनरावलोकन तथा संशोधन शक्ति की सीमितता स्वयं मूल संरचना का अंग हैं। 1981 के वामन राव वाद ने केशवानंद के निर्णय की तिथि 24 अप्रैल 1973 को वह रेखा माना जिसके बाद नौवीं अनुसूची में जोड़ी गई विधियाँ परखी जा सकती हैं, और 2007 के आई आर कोएल्हो वाद ने पुष्टि की कि ऐसी विधियों को भी मूल संरचना की कसौटी पर खरा उतरना होगा। इसी सिद्धांत से 2015 में निन्यानवेवाँ संशोधन और राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अपास्त हुए।
याद रखने योग्य संशोधन
| संशोधन | वर्ष | प्रमुख कार्य |
|---|---|---|
| पहला | 1951 | नौवीं अनुसूची जोड़ी और वाक् स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त निर्बंधन बढ़ाए |
| बयालीसवाँ | 1976 | मूल कर्तव्य, प्रस्तावना में समाजवादी और पंथनिरपेक्ष शब्द; लघु संविधान कहा गया |
| चवालीसवाँ | 1978 | लोकसभा का कार्यकाल फिर पाँच वर्ष; संपत्ति का अधिकार अनुच्छेद 300क में विधिक अधिकार |
| बावनवाँ | 1985 | दसवीं अनुसूची में दल बदल विरोधी विधि |
| इकसठवाँ | 1989 | मताधिकार की आयु इक्कीस से अठारह वर्ष |
| तिहत्तरवाँ और चौहत्तरवाँ | 1992 | पंचायतें और नगरपालिकाएँ, ग्यारहवीं तथा बारहवीं अनुसूची |
| छियासीवाँ | 2002 | अनुच्छेद 21क, छह से चौदह वर्ष के बच्चों की निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा |
| एक सौ पहला | 2016 | वस्तु और सेवा कर, अनुच्छेद 246क, 269क तथा 279क |
| एक सौ छठा | 2023 | लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई स्थान |
मूल संरचना के अंग के रूप में बार-बार स्वीकार किए गए तत्व हैं संविधान की सर्वोच्चता, विधि का शासन, शक्तियों का पृथक्करण, अनुच्छेद 32 और 226 के अंतर्गत न्यायिक पुनरावलोकन, संघ का संघीय स्वरूप, पंथनिरपेक्षता, भारत की प्रभुसत्ता और एकता, गणतंत्रात्मक तथा लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली, स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्वाचन, न्यायपालिका की स्वतंत्रता तथा स्वयं संसद की संशोधन शक्ति की सीमितता।
परीक्षा की दृष्टि से
इस विषय से चार प्रकार के प्रश्न आते हैं। पहला, अनुच्छेद और भाग: भाग 20 का अनुच्छेद 368, और कौन से उपबंध साधारण बहुमत से बदलते हैं, जहाँ अनुच्छेद 4 तथा 169 निश्चित उत्तर हैं। दूसरा, गणित: विशेष बहुमत के दो अंग, और आधे से अन्यून राज्यों का साधारण बहुमत से अनुसमर्थन, जिसमें दो तिहाई राज्य लिखकर जाल बिछाया जाता है। तीसरा, वाद और वर्ष, विशेषकर गोलकनाथ 1967, केशवानंद भारती 1973 अपनी तेरह न्यायाधीशों की पीठ और सात के मुकाबले छह के बहुमत के साथ, मिनर्वा मिल्स 1980 तथा आई आर कोएल्हो 2007; यह भी पूछा जाता है कि किस वाद ने किसे उलटा। चौथा, संशोधन संख्या और उनका कार्य, जहाँ बयालीसवाँ, चवालीसवाँ, बावनवाँ, इकसठवाँ, तिहत्तरवाँ, छियासीवाँ, एक सौ पहला और एक सौ छठा पूछे जाते हैं। कथन आधारित प्रश्नों का प्रिय जाल यह है कि संविधान मूल संरचना को कहीं परिभाषित नहीं करता।
महत्वपूर्ण तथ्य
| संशोधन का अनुच्छेद | अनुच्छेद 368, संविधान का भाग 20 |
|---|---|
| साधारण बहुमत के विषय | अनुच्छेद 4, अनुच्छेद 169 और संघ राज्यक्षेत्र संबंधी उपबंध, जो 368 के बाहर हैं |
| विशेष बहुमत | कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित तथा मत देने वालों का दो तिहाई |
| अनुसमर्थन | आधे से अन्यून राज्यों के विधानमंडल, साधारण बहुमत से |
| मूल संरचना का वाद | केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, 1973, तेरह न्यायाधीश, 7 के मुकाबले 6 |
| 1973 में उलटा गया वाद | आई सी गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य, 1967 |
| अनुमति अनिवार्य | चौबीसवाँ संशोधन अधिनियम, 1971 |
| अपास्त खंड | अनुच्छेद 368 के खंड 4 और 5, मिनर्वा मिल्स वाद, 1980 में |
| नौवीं अनुसूची की कट ऑफ तिथि | 24 अप्रैल 1973, वामन राव वाद, 1981 में नियत |
| लघु संविधान | बयालीसवाँ संशोधन अधिनियम, 1976 |
| दल बदल विरोधी विधि | बावनवाँ संशोधन, 1985, दसवीं अनुसूची |
| 2015 में अपास्त संशोधन | निन्यानवेवाँ संशोधन और राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
भारत के संविधान में संशोधन की प्रक्रिया किस अनुच्छेद में दी गई है?
- A.अनुच्छेद 356
- B.अनुच्छेद 360
- C.अनुच्छेद 368
- D.अनुच्छेद 370
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. अनुच्छेद 368
व्याख्या
सही उत्तर है C, अनुच्छेद 368। इसका शीर्षक है संसद की संविधान संशोधन की शक्ति और उसकी प्रक्रिया, और यही अनुच्छेद बताता है कि प्रत्येक सदन में कौन सा विशेष बहुमत चाहिए तथा किन विषयों में राज्यों के विधानमंडलों का अनुसमर्थन भी आवश्यक है।
विकल्प A गलत है क्योंकि अनुच्छेद 356 राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता पर राष्ट्रपति शासन का उपबंध करता है। विकल्प B गलत है क्योंकि अनुच्छेद 360 वित्तीय आपात से संबंधित है। विकल्प D गलत है क्योंकि अनुच्छेद 370 में जम्मू और कश्मीर राज्य के संबंध में अस्थायी उपबंध थे। ये चारों संख्याएँ इतनी निकट हैं कि जल्दबाज़ी में गलत विकल्प भर दिया जाता है, इसलिए परीक्षा से पहले 368 को संशोधन, 352 को राष्ट्रीय आपात, 356 को राष्ट्रपति शासन और 360 को वित्तीय आपात से जोड़ लें।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 368 किस भाग में आता है?
- A.भाग 18
- B.भाग 19
- C.भाग 20
- D.भाग 21
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. भाग 20
व्याख्या
सही उत्तर है C, भाग 20। संविधान का भाग 20 बहुत छोटा है, उसका शीर्षक संविधान का संशोधन है और उसमें केवल अनुच्छेद 368 है। आपात तथा प्रकीर्ण उपबंधों के बाद, संविधान के अंत के निकट इसकी यह स्थिति ही परीक्षा में परखी जाती है।
विकल्प A गलत है क्योंकि भाग 18 में अनुच्छेद 352 से 360 तक के आपात उपबंध हैं। विकल्प B गलत है क्योंकि भाग 19 प्रकीर्ण भाग है, जिसमें अनुच्छेद 361 से 367 आते हैं। विकल्प D गलत है क्योंकि भाग 21 में अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष उपबंध हैं, जिनमें अनुच्छेद 369 से 392 सम्मिलित हैं। ध्यान दें कि यहाँ भाग और अनुच्छेद संख्या साथ-साथ चलते हैं, इसलिए यदि याद रहे कि अनुच्छेद 368 अकेला अपने भाग 20 में बैठा है तो आसपास के भाग स्वयं स्थान पा लेते हैं।
संविधान की मूल संरचना का सिद्धांत सर्वोच्च न्यायालय ने किस वाद में प्रतिपादित किया?
- A.शंकरी प्रसाद वाद, 1951
- B.गोलकनाथ वाद, 1967
- C.केशवानंद भारती वाद, 1973
- D.मिनर्वा मिल्स वाद, 1980
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. केशवानंद भारती वाद, 1973
व्याख्या
सही उत्तर है C, केशवानंद भारती वाद, 1973। तेरह न्यायाधीशों की पीठ, जो उस समय तक की सबसे बड़ी पीठ थी, ने सात के मुकाबले छह के बहुमत से कहा कि संसद मूल अधिकारों सहित संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, परंतु उसकी मूल संरचना को क्षति या नष्ट नहीं कर सकती।
विकल्प A गलत है क्योंकि 1951 के शंकरी प्रसाद वाद ने पहले संशोधन को वैध ठहराया और कहा कि संशोधन साधारण विधि नहीं है। विकल्प B गलत है क्योंकि 1967 के गोलकनाथ वाद ने दूसरा छोर पकड़कर कहा कि मूल अधिकार घटाए ही नहीं जा सकते; केशवानंद ने इसी निर्णय को उलटा। विकल्प D गलत है क्योंकि 1980 के मिनर्वा मिल्स वाद ने इस सिद्धांत को लागू किया, प्रतिपादित नहीं किया। शंकरी प्रसाद, गोलकनाथ, केशवानंद और मिनर्वा मिल्स की यह श्रृंखला क्रम से याद रखें।
केशवानंद भारती वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने किस पूर्व निर्णय को उलट दिया?
- A.गोलकनाथ वाद
- B.बेरुबाड़ी संघ वाद
- C.एस आर बोम्मई वाद
- D.मिनर्वा मिल्स वाद
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. गोलकनाथ वाद
व्याख्या
सही उत्तर है A, गोलकनाथ वाद। 1967 के गोलकनाथ वाद में ग्यारह न्यायाधीशों की पीठ ने छह के मुकाबले पाँच से कहा था कि संसद के पास मूल अधिकारों में संशोधन की शक्ति नहीं है। संसद ने 1971 के चौबीसवें संशोधन से उत्तर दिया और 1973 के केशवानंद भारती वाद में न्यायालय ने गोलकनाथ को उलटते हुए संशोधन शक्ति बहाल की, पर उस पर मूल संरचना की सीमा लगा दी।
विकल्प B गलत है क्योंकि 1960 की बेरुबाड़ी संघ सलाह भारतीय भूभाग के अंतरण और प्रस्तावना की स्थिति से जुड़ी थी। विकल्प C गलत है क्योंकि एस आर बोम्मई वाद बहुत बाद में, 1994 में आया और अनुच्छेद 356 से संबंधित था। विकल्प D तिथि से ही गलत है, क्योंकि मिनर्वा मिल्स 1980 में तय हुआ, केशवानंद के सात वर्ष बाद। ऐसे प्रश्नों में उलटने की दिशा पर ध्यान दें।
संविधान संशोधन विधेयक पर राष्ट्रपति की अनुमति किस संशोधन द्वारा अनिवार्य बनाई गई?
- A.चौबीसवाँ संशोधन, 1971
- B.पच्चीसवाँ संशोधन, 1971
- C.बयालीसवाँ संशोधन, 1976
- D.चवालीसवाँ संशोधन, 1978
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. चौबीसवाँ संशोधन, 1971
व्याख्या
सही उत्तर है A, चौबीसवाँ संशोधन, 1971। यह गोलकनाथ निर्णय के उत्तर में लाया गया था। इसने अनुच्छेद 13 और अनुच्छेद 368 में संशोधन कर स्पष्ट किया कि संसद संशोधन द्वारा किसी मूल अधिकार को छीन या कम कर सकती है, और ऐसे विधेयक पर राष्ट्रपति की अनुमति अनिवार्य कर दी, इसलिए वह विधेयक न रोका जा सकता है और न पुनर्विचार के लिए लौटाया जा सकता है।
विकल्प B गलत है क्योंकि 1971 के पच्चीसवें संशोधन ने संपत्ति के अधिकार को सीमित किया और अनुच्छेद 31ग जोड़ा। विकल्प C गलत है क्योंकि 1976 के बयालीसवें संशोधन ने मूल कर्तव्य जोड़े और अनुच्छेद 368 के खंड 4 तथा 5 से न्यायिक पुनरावलोकन रोकने का प्रयास किया। विकल्प D गलत है क्योंकि 1978 के चवालीसवें संशोधन ने उन परिवर्तनों को पलटा। जोड़ी याद रखें: गोलकनाथ के साथ चौबीसवाँ संशोधन।
भारत के संविधान के किस संशोधन को लोकप्रिय रूप से लघु संविधान कहा जाता है?
- A.बयालीसवाँ संशोधन
- B.चवालीसवाँ संशोधन
- C.बावनवाँ संशोधन
- D.तिहत्तरवाँ संशोधन
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. बयालीसवाँ संशोधन
व्याख्या
सही उत्तर है A, बयालीसवाँ संशोधन। स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिशों पर 1976 में पारित इस संशोधन ने एक ही बार में इतने उपबंध बदले कि उसे लघु संविधान कहा जाता है: भाग 4क में मूल कर्तव्य जोड़े, प्रस्तावना में समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंडता शब्द रखे, लोकसभा का कार्यकाल छह वर्ष किया और शिक्षा तथा वन सहित पाँच विषय राज्य सूची से समवर्ती सूची में भेजे।
विकल्प B गलत है क्योंकि 1978 का चवालीसवाँ संशोधन वह सुधारात्मक संशोधन था जिसने इनमें से बहुत कुछ पलटा। विकल्प C गलत है क्योंकि 1985 के बावनवें संशोधन ने दसवीं अनुसूची में दल बदल विरोधी विधि दी। विकल्प D गलत है क्योंकि 1992 के तिहत्तरवें संशोधन ने पंचायतों को संवैधानिक दर्जा दिया। यह उपनाम केवल बयालीसवें संशोधन का है। परीक्षा में यह प्रश्न सीधे उपनाम पर आता है, इसलिए बयालीसवें संशोधन के साथ स्वर्ण सिंह समिति और 1976 का वर्ष भी जोड़कर याद रखें।
1980 के मिनर्वा मिल्स वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 368 के कौन से खंड अपास्त किए?
- A.खंड 1 और 2
- B.खंड 2 और 3
- C.खंड 3 और 4
- D.खंड 4 और 5
उत्तर देखें
सही उत्तर: D. खंड 4 और 5
व्याख्या
सही उत्तर है D, खंड 4 और 5। बयालीसवें संशोधन ने खंड 4 जोड़ा था, जिसमें कहा गया कि किसी संशोधन को किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जा सकेगा, और खंड 5 जोड़ा था, जिसमें कहा गया कि संसद की संशोधन शक्ति असीमित है। मिनर्वा मिल्स वाद में न्यायालय ने दोनों अपास्त कर दिए और कहा कि न्यायिक पुनरावलोकन तथा संशोधन शक्ति की सीमितता स्वयं मूल संरचना का अंग हैं।
विकल्प A गलत है क्योंकि खंड 1 और 2 संशोधन शक्ति तथा प्रक्रिया के मूल उपबंध हैं और आज भी प्रवर्तन में हैं। विकल्प B और विकल्प C गलत हैं क्योंकि खंड 3, जो कहता है कि अनुच्छेद 13 किसी संशोधन पर लागू नहीं होगा, चौबीसवें संशोधन से जोड़ा गया था और अपास्त नहीं हुआ। सरल सूत्र यह है कि बयालीसवें संशोधन ने खंड 4 और 5 जोड़े और मिनर्वा मिल्स ने वही दो हटाए।
भारत में मताधिकार की आयु इक्कीस वर्ष से घटाकर अठारह वर्ष किस संशोधन द्वारा की गई?
- A.बावनवाँ संशोधन
- B.इकसठवाँ संशोधन
- C.चौहत्तरवाँ संशोधन
- D.छियासीवाँ संशोधन
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. इकसठवाँ संशोधन
व्याख्या
सही उत्तर है B, इकसठवाँ संशोधन। 1989 में पारित इस संशोधन ने अनुच्छेद 326 में परिवर्तन कर लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन के लिए मताधिकार की आयु इक्कीस वर्ष से अठारह वर्ष कर दी, जिससे अगले आम चुनाव में बहुत बड़ी संख्या में युवा मतदाता सूची में आए।
विकल्प A गलत है क्योंकि 1985 के बावनवें संशोधन ने दसवीं अनुसूची और दल बदल विरोधी विधि जोड़ी। विकल्प C गलत है क्योंकि 1992 का चौहत्तरवाँ संशोधन नगरपालिकाओं से संबंधित था और उसने बारहवीं अनुसूची जोड़ी। विकल्प D गलत है क्योंकि 2002 के छियासीवें संशोधन ने अनुच्छेद 21क जोड़कर छह से चौदह वर्ष के बच्चों की निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा को मूल अधिकार बनाया। इकसठवें संशोधन के साथ अनुच्छेद 326 भी याद रखें। इसे इस रूप में भी याद रखा जा सकता है कि इकसठवाँ संशोधन युवा मतदाताओं से जुड़ा है और उसका आधार अनुच्छेद 326 है, जो वयस्क मताधिकार का उपबंध करता है।
भारत के संविधान में नौवीं अनुसूची किस संशोधन द्वारा जोड़ी गई?
- A.पहला संशोधन, 1951
- B.चौथा संशोधन, 1955
- C.सातवाँ संशोधन, 1956
- D.सत्रहवाँ संशोधन, 1964
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. पहला संशोधन, 1951
व्याख्या
सही उत्तर है A, पहला संशोधन, 1951। इसने अनुच्छेद 31क और 31ख के साथ नौवीं अनुसूची जोड़ी, जिससे उसमें रखी गई भूमि सुधार तथा ज़मींदारी उन्मूलन की विधियों को मूल अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर चुनौती न दी जा सके। इसी संशोधन ने लोक व्यवस्था, विदेशी राज्यों से मैत्रीपूर्ण संबंध और अपराध के लिए उद्दीपन को वाक् स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त निर्बंधन के आधारों में जोड़ा।
विकल्प B गलत है क्योंकि 1955 का चौथा संशोधन संपत्ति के अनिवार्य अर्जन से संबंधित था और उसने पहले से बनी अनुसूची में विधियाँ जोड़ीं। विकल्प C गलत है क्योंकि 1956 के सातवें संशोधन ने राज्यों का पुनर्गठन किया। विकल्प D गलत है क्योंकि 1964 के सत्रहवें संशोधन ने नौवीं अनुसूची में और भूमि सुधार विधियाँ जोड़ीं। स्मरण रखें कि बाद के संशोधनों ने अनुसूची भरी, पर बनाई पहले संशोधन ने।
संविधान के संघीय उपबंधों को छूने वाले संशोधन का अनुसमर्थन कितने राज्यों के विधानमंडलों द्वारा आवश्यक है?
- A.आधे से अन्यून राज्यों द्वारा
- B.दो तिहाई से अन्यून राज्यों द्वारा
- C.तीन चौथाई से अन्यून राज्यों द्वारा
- D.सभी राज्यों द्वारा
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. आधे से अन्यून राज्यों द्वारा
व्याख्या
सही उत्तर है A, आधे से अन्यून राज्यों द्वारा। राष्ट्रपति के निर्वाचन, संघ और राज्यों की कार्यपालिका शक्ति के विस्तार, उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों, सातवीं अनुसूची, संसद में राज्यों के प्रतिनिधित्व और स्वयं अनुच्छेद 368 जैसे विषयों में विधेयक पहले प्रत्येक सदन में विशेष बहुमत से पारित होता है और फिर कम से कम आधे राज्यों के विधानमंडल उसे साधारण बहुमत से अनुसमर्थित करते हैं।
विकल्प B गलत है क्योंकि दो तिहाई का अंश संसद में उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों का है, राज्यों का नहीं, और यही मिश्रण जाल बनता है। विकल्प C और विकल्प D गलत हैं क्योंकि संविधान कहीं तीन चौथाई राज्यों या सर्वसम्मति की अपेक्षा नहीं करता; निर्माताओं ने जानबूझकर ऐसी कठोरता से बचा। यह भी ध्यान रखें कि अनुसमर्थन के लिए कोई समय सीमा नियत नहीं है।
लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई स्थानों के आरक्षण का उपबंध किस संशोधन ने किया?
- A.एक सौ पहला संशोधन
- B.एक सौ तीसरा संशोधन
- C.एक सौ चौथा संशोधन
- D.एक सौ छठा संशोधन
उत्तर देखें
सही उत्तर: D. एक सौ छठा संशोधन
व्याख्या
सही उत्तर है D, एक सौ छठा संशोधन। 2023 में पारित और नारी शक्ति वंदन अधिनियम कहा जाने वाला यह संशोधन अनुच्छेद 330क तथा 332क जोड़ता है, जिससे लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा के एक तिहाई स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित होंगे; यह आरक्षण संबंधित जनगणना के आधार पर किए जाने वाले परिसीमन के बाद प्रभावी होगा।
विकल्प A गलत है क्योंकि 2016 के एक सौ पहले संशोधन ने अनुच्छेद 246क, 269क और 279क के माध्यम से वस्तु और सेवा कर लागू किया। विकल्प B गलत है क्योंकि 2019 के एक सौ तीसरे संशोधन ने आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के लिए आरक्षण दिया। विकल्प C गलत है क्योंकि 2020 के एक सौ चौथे संशोधन ने विधानमंडलों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के स्थानों का आरक्षण बढ़ाया और आंग्ल भारतीय नामनिर्देशन समाप्त किया। ये चारों संख्याएँ साथ याद करें।
निम्नलिखित कथनों पर विचार करें: 1. भारत का संविधान अपनी मूल संरचना को संघवाद, पंथनिरपेक्षता, मूल अधिकार और लोकतंत्र के रूप में परिभाषित करता है। 2. भारत के संविधान में न्यायिक पुनरावलोकन का उपबंध नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा और उन आदर्शों को बनाए रखने के लिए है जिन पर संविधान आधारित है। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन सा या कौन से सही हैं?
- A.केवल 1
- B.केवल 2
- C.1 और 2 दोनों
- D.न 1 न 2
उत्तर देखें
सही उत्तर: D. न 1 न 2
व्याख्या
सही उत्तर है D, न 1 न 2। कथन 1 गलत है क्योंकि संविधान में मूल संरचना पद कहीं प्रयुक्त ही नहीं हुआ और उसकी कोई परिभाषा नहीं दी गई है। यह सिद्धांत 1973 के केशवानंद भारती वाद में सर्वोच्च न्यायालय की देन है और न्यायालयों ने हर वाद में उसमें विशेषताएँ जोड़ी हैं, इसलिए कोई बंद सूची नहीं है। कथन 2 इस रूप में गलत है क्योंकि संविधान में ऐसा कोई उपबंध नहीं है जो न्यायिक पुनरावलोकन को इस प्रयोजन के साथ घोषित करता हो; यह शक्ति अनुच्छेद 13, 32, 131 से 136, 226 और 246 जैसे उपबंधों से निकलती है, और स्वतंत्रता की रक्षा तथा आदर्शों को बनाए रखने की भाषा निर्णयों और टीकाओं की है, संविधान के पाठ की नहीं।
इसलिए विकल्प A और विकल्प B गलत हैं, क्योंकि दोनों में से प्रत्येक एक त्रुटिपूर्ण कथन को स्वीकार करता है, और विकल्प C गलत है क्योंकि वह दोनों को स्वीकार करता है। कथन आधारित प्रश्नों में परिभाषित करता है और उपबंध जैसे शब्दों पर कठोर रहें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
मूल संरचना का सिद्धांत क्या है?
यह 1973 के केशवानंद भारती वाद में दिया गया नियम है कि संसद संविधान के किसी भी उपबंध में संशोधन कर सकती है, परंतु उसकी आधारभूत विशेषताओं को नष्ट नहीं कर सकती, जैसे संविधान की सर्वोच्चता, विधि का शासन, न्यायिक पुनरावलोकन, पंथनिरपेक्षता, संघीय ढाँचा, स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्वाचन तथा न्यायपालिका की स्वतंत्रता। संविधान स्वयं मूल संरचना को कहीं परिभाषित नहीं करता; न्यायालय हर वाद में तय करते हैं कि उसमें क्या आता है।
संविधान संशोधन के लिए कौन सा बहुमत चाहिए?
अधिकांश उपबंधों के लिए प्रत्येक सदन का विशेष बहुमत चाहिए, अर्थात उस सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और साथ ही उपस्थित तथा मत देने वाले सदस्यों का दो तिहाई से अन्यून बहुमत। संघीय ढाँचे को छूने वाले उपबंधों के लिए उस विशेष बहुमत के साथ आधे से अन्यून राज्यों के विधानमंडलों का अनुसमर्थन भी आवश्यक है। अनुच्छेद 4 और 169 जैसे कुछ उपबंधों के लिए साधारण बहुमत ही पर्याप्त है।
क्या संविधान संशोधन विधेयक पर संयुक्त बैठक हो सकती है?
नहीं। असहमति की स्थिति में संयुक्त बैठक का उपबंध करने वाला अनुच्छेद 108 संविधान संशोधन विधेयक पर लागू नहीं होता। प्रत्येक सदन को विधेयक अलग-अलग अपेक्षित बहुमत से पारित करना पड़ता है, इसलिए संशोधनों पर राज्यसभा के पास वास्तविक निषेधाधिकार रहता है। यह एसएससी और राज्य परीक्षाओं का प्रिय एक पंक्ति प्रश्न है।
बयालीसवें संशोधन को लघु संविधान क्यों कहा जाता है?
क्योंकि 1976 में उसने एक ही बार में संविधान का बहुत कुछ बदल दिया: भाग 4क में मूल कर्तव्य जोड़े, प्रस्तावना में समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंडता शब्द रखे, लोकसभा का कार्यकाल छह वर्ष किया, शिक्षा और वन सहित पाँच विषय राज्य सूची से समवर्ती सूची में भेजे और संशोधनों के न्यायिक पुनरावलोकन पर रोक लगाने का प्रयास किया। 1978 के चवालीसवें संशोधन ने इनमें से कई परिवर्तन पलट दिए।
नौवीं अनुसूची में रखी गई विधि न्यायालय से सुरक्षित रहती है?
अब नहीं। नौवीं अनुसूची 1951 में पहले संशोधन से जोड़ी गई थी, जिससे भूमि सुधार विधियाँ मूल अधिकारों के आधार पर चुनौती से बच सकें। 1981 के वामन राव वाद में न्यायालय ने कहा कि 24 अप्रैल 1973 के बाद जोड़ी गई विधियाँ परखी जा सकती हैं और 2007 के आई आर कोएल्हो वाद में कहा कि ऐसी हर विधि को मूल संरचना की कसौटी पर खरा उतरना होगा।
स्रोत
- भारत का संविधान, भाग 20: संविधान का संशोधन — विधायी विभाग, विधि और न्याय मंत्रालय
- संविधान संशोधन अधिनियम — विधायी विभाग, विधि और न्याय मंत्रालय
- भारत का संविधान: सिद्धांत और व्यवहार, कक्षा 11 — एनसीईआरटी





