सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 और सुशासन कानून
सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 पर परीक्षोपयोगी नोट्स: धाराएं, तीस दिन और अड़तालीस घंटे की सीमा, छूट, अपील, जुर्माना, सूचना आयोग, लोकपाल और सीवीसी।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 4 मिनट

सुशासन का अर्थ ऐसा प्रशासन है जिसे नागरिक देख सके, प्रश्न पूछ सके और जवाबदेह बना सके। भारत ने इसे एक-एक कानून से बनाया है: 2003 में केंद्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम, 2005 में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2013 में लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम तथा 2014 में व्हिसल ब्लोअर संरक्षण अधिनियम। इनमें परीक्षक हर वर्ष सूचना का अधिकार अधिनियम पर लौटते हैं, क्योंकि यह छोटा है, धाराओं में बंटा है और तारीखों तथा समय-सीमाओं से भरा है। यह नोट पहले इस अधिनियम को धारावार देखता है, फिर जवाबदेही के अन्य कानूनों को उसके साथ रखता है।
सूचना के अधिकार की आवश्यकता
संविधान में सूचना का अधिकार शब्द कहीं नहीं आता। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे अनुच्छेद 19(1)(क) यानी वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में पढ़ा, यह मानते हुए कि जो सरकार अपना कामकाज गुप्त रखती है, उसके बारे में नागरिक राय बना ही नहीं सकता। उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राज नारायण (1975) और एस. पी. गुप्ता बनाम भारत संघ (1981) इसके लिए उद्धृत किए जाने वाले दो निर्णय हैं। इस विषय पर पहला कानून सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम, 2002 था, जो कभी लागू नहीं हुआ और सूचना का अधिकार अधिनियम ने उसे निरसित कर दिया। 2005 में गठित द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने अपनी पहली ही रिपोर्ट का विषय यही चुना और सूचना को सुशासन की मास्टर कुंजी कहा।
अधिनियम की प्रमुख धाराएं
अधिनियम को 15 जून 2005 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली और यह 120 दिन बाद, 12 अक्टूबर 2005 को पूर्ण रूप से लागू हुआ। अभिलेख रखने तथा स्वतः प्रकटीकरण के दायित्व तुरंत लागू हो गए थे। यह अधिनियम पूरे भारत पर लागू है।
| धारा | प्रावधान |
|---|---|
| 2(च) | सूचना की परिभाषा: अभिलेख, दस्तावेज, ई-मेल, राय, प्रेस विज्ञप्ति और नमूने |
| 2(ज) | लोक प्राधिकारी की परिभाषा, जिसमें सरकार द्वारा पर्याप्त रूप से वित्तपोषित निकाय भी आते हैं |
| 4 | प्रत्येक लोक प्राधिकारी द्वारा स्वतः प्रकटीकरण |
| 6 | आवेदन; कारण बताना आवश्यक नहीं; पांच दिन में सही प्राधिकारी को अंतरण |
| 7 | तीस दिन में निपटारा और जीवन या स्वतंत्रता के मामले में अड़तालीस घंटे में |
| 8 और 9 | प्रकटीकरण से छूट तथा अस्वीकृति के आधार |
| 11 | तृतीय पक्ष सूचना की प्रक्रिया |
| 18 और 19 | शिकायत तथा दो अपीलें |
| 20 | लोक सूचना अधिकारी पर जुर्माना |
| 22 | शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1923 तथा अन्य कानूनों पर अध्यारोही प्रभाव |
| 24 | दूसरी अनुसूची में सूचीबद्ध गुप्तचर और सुरक्षा संगठनों को बाहर रखना |
समय-सीमा, शुल्क और अपील
- लोक सूचना अधिकारी द्वारा सामान्य उत्तर के लिए आवेदन प्राप्ति से तीस दिन।
- जीवन या स्वतंत्रता से जुड़ी सूचना के लिए अड़तालीस घंटे।
- सहायक लोक सूचना अधिकारी को आवेदन देने पर पैंतीस दिन, क्योंकि अंतरण के पांच दिन जोड़े जाते हैं।
- धारा 11 के अंतर्गत तृतीय पक्ष को सुनना हो तो चालीस दिन।
- प्रथम अपील उत्तर के तीस दिन के भीतर लोक सूचना अधिकारी से वरिष्ठ अधिकारी को, निपटारा तीस दिन में, अधिकतम पैंतालीस दिन।
- द्वितीय अपील नब्बे दिन के भीतर केंद्रीय या राज्य सूचना आयोग को।
- गरीबी रेखा से नीचे के आवेदकों से कोई शुल्क नहीं; समय-सीमा चूकने पर सूचना निःशुल्क।
धारा 20 परीक्षा की पसंदीदा धारा है: सूचना आयोग ऐसे लोक सूचना अधिकारी पर, जो बिना उचित कारण आवेदन अस्वीकार करता है, विलंब करता है या सूचना नष्ट करता है, विलंब के प्रत्येक दिन के लिए दो सौ पचास रुपये का जुर्माना लगा सकता है, जो अधिकतम पच्चीस हजार रुपये तक होगा।
धारा 8 की छूटें
दस उपखंड संप्रभुता और अखंडता, सुरक्षा तथा सामरिक हित, विदेश संबंध, न्यायालय द्वारा निषिद्ध सूचना, विधानमंडल के विशेषाधिकार का हरण, वाणिज्यिक विश्वास और व्यापार गोपनीयता, न्यासीय संबंध, विदेशी सरकार से विश्वास में प्राप्त सूचना, मुखबिर की सुरक्षा और लोकहित से असंबद्ध व्यक्तिगत सूचना की रक्षा करते हैं। मंत्रिमंडल के कागजात निर्णय हो जाने तक छूट प्राप्त हैं। दो सुरक्षा उपाय महत्वपूर्ण हैं: लोकहित बड़ा हो तो प्राधिकारी फिर भी सूचना दे सकता है, और बीस वर्ष से पुरानी सूचना सामान्यतः देनी ही होती है।
सूचना आयोग
केंद्रीय सूचना आयोग में एक मुख्य सूचना आयुक्त और अधिकतम दस सूचना आयुक्त होते हैं, जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोकसभा में विपक्ष के नेता तथा प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री की समिति की सिफारिश पर करते हैं। राज्य सूचना आयोग में एक राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और अधिकतम दस आयुक्त होते हैं, जिनकी नियुक्ति राज्यपाल मुख्यमंत्री, विधानसभा में विपक्ष के नेता और एक राज्य कैबिनेट मंत्री की सिफारिश पर करते हैं। सूचना का अधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2019 ने पांच वर्ष का निश्चित कार्यकाल तथा निर्वाचन आयोग के समान वेतन की व्यवस्था हटा दी और कार्यकाल एवं सेवा शर्तें केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित करने के लिए छोड़ दीं।
सुशासन के अन्य कानून
केंद्रीय सतर्कता आयोग संथानम समिति की सिफारिश पर 1964 में सरकारी संकल्प से बना और केंद्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम, 2003 ने इसे सांविधिक दर्जा दिया; इसमें एक केंद्रीय सतर्कता आयुक्त तथा अधिकतम दो सतर्कता आयुक्त चार वर्ष या पैंसठ वर्ष की आयु तक पद पर रहते हैं। लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 ने एक अध्यक्ष तथा अधिकतम आठ सदस्यों वाला लोकपाल बनाया, जिनमें आधे न्यायिक सदस्य होते हैं, और राज्यों में लोकायुक्त अनिवार्य किया। प्रधानमंत्री इसके क्षेत्राधिकार में हैं, परंतु अंतरराष्ट्रीय संबंध, बाह्य और आंतरिक सुरक्षा, लोक व्यवस्था, परमाणु ऊर्जा तथा अंतरिक्ष से जुड़े आरोपों में नहीं। व्हिसल ब्लोअर संरक्षण अधिनियम, 2014 भ्रष्टाचार उजागर करने वाले की रक्षा करता है और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (2018 में संशोधित) रिश्वत को दंडित करता है। कानूनों के साथ प्रशासनिक उपाय भी चलते हैं: नागरिक चार्टर, सेवोत्तम मॉडल, सामाजिक अंकेक्षण, शिकायत निवारण के ई-गवर्नेंस पोर्टल और 25 दिसंबर को सुशासन दिवस।
परीक्षा की दृष्टि से
प्रश्न एक-पंक्ति तथ्यों के रूप में आते हैं: लागू होने की तारीख, तीस दिन और अड़तालीस घंटे की सीमा, 250 रुपये प्रतिदिन तथा 25,000 रुपये का जुर्माना, धारा 8, 20, 22 और 24, तथा प्रत्येक अपील किसे की जाती है। दूसरा समूह नियुक्ति की सिफारिश करने वाली समिति पूछता है: केंद्रीय आयोग में प्रधानमंत्री अध्यक्ष होते हैं और राज्य आयोग में मुख्यमंत्री। जाल ये हैं: 15 जून 2005 स्वीकृति की तारीख है, लागू होने की नहीं; प्रथम अपील उसी प्राधिकारी के वरिष्ठ अधिकारी को जाती है, आयोग को केवल द्वितीय अपील; अधिनियम ने 2002 के कानून को निरसित किया, संशोधित नहीं; और 2019 के संशोधन ने कार्यकाल तथा वेतन बदले, आयुक्तों की संख्या नहीं।
महत्वपूर्ण तथ्य
| स्वीकृति और प्रवर्तन | 15 जून 2005; पूर्णतः लागू 12 अक्टूबर 2005 |
|---|---|
| निरसित कानून | सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम, 2002 |
| संवैधानिक आधार | अनुच्छेद 19(1)(क), वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता |
| सामान्य समय-सीमा | 30 दिन (जीवन और स्वतंत्रता पर 48 घंटे, सहायक अधिकारी के माध्यम से 35 दिन) |
| प्रथम और द्वितीय अपील | 30 दिन में वरिष्ठ अधिकारी को; 90 दिन में सूचना आयोग को |
| जुर्माना, धारा 20 | विलंब के प्रति दिन 250 रुपये, अधिकतम 25,000 रुपये |
| अध्यारोही धारा | धारा 22, शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1923 पर |
| केंद्रीय सूचना आयोग | मुख्य सूचना आयुक्त और अधिकतम 10 सूचना आयुक्त |
| नियुक्ति समिति (केंद्रीय आयोग) | प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोकसभा में विपक्ष के नेता, एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री |
| केंद्रीय सतर्कता आयोग | संथानम समिति, 1964; सीवीसी अधिनियम 2003 से सांविधिक; आयुक्त और अधिकतम 2 सदस्य, 4 वर्ष या 65 वर्ष |
| लोकपाल | लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013; अध्यक्ष और अधिकतम 8 सदस्य, आधे न्यायिक |
| सुशासन दिवस | 25 दिसंबर |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 पूर्ण रूप से किस तारीख को लागू हुआ?
- A.15 जून 2005
- B.12 अक्टूबर 2005
- C.1 जनवरी 2006
- D.26 नवंबर 2005
उत्तर देखें
सूचना का अधिकार अधिनियम को राष्ट्रपति की स्वीकृति 15 जून 2005 को मिली थी और इसकी धारा 1(3) में कहा गया था कि शेष प्रावधान अधिनियमन के एक सौ बीसवें दिन लागू होंगे।
पूरी व्याख्या पढ़ें →सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत किसी व्यक्ति के जीवन या स्वतंत्रता से जुड़ी सूचना कितने समय में देनी होती है?
- A.48 घंटे
- B.7 दिन
- C.30 दिन
- D.35 दिन
उत्तर देखें
अधिनियम की धारा 7(1) दो समय-सीमाएं देती है। सामान्य सीमा आवेदन प्राप्ति से तीस दिन है, परंतु जहां मांगी गई सूचना किसी व्यक्ति के जीवन या स्वतंत्रता से जुड़ी हो, वहां लोक सूचना अधिकारी को अड़तालीस घंटे के भीतर सूचना देनी होती है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 20 के अंतर्गत लोक सूचना अधिकारी पर अधिकतम कितना जुर्माना लगाया जा सकता है?
- A.10,000 रुपये
- B.25,000 रुपये
- C.50,000 रुपये
- D.1,00,000 रुपये
उत्तर देखें
धारा 20(1) कहती है कि यदि सूचना आयोग पाता है कि लोक सूचना अधिकारी ने बिना उचित कारण आवेदन अस्वीकार किया, निर्धारित समय में सूचना नहीं दी, गलत या भ्रामक सूचना दी अथवा सूचना नष्ट कर दी, तो वह विलंब के प्रत्येक दिन के लिए दो सौ पचास रुपये का…
पूरी व्याख्या पढ़ें →सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की कौन सी धारा इसे शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1923 पर अध्यारोही प्रभाव देती है?
- A.धारा 8
- B.धारा 18
- C.धारा 22
- D.धारा 24
उत्तर देखें
धारा 22 कहती है कि इस अधिनियम के प्रावधान शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1923, किसी अन्य प्रवृत्त विधि अथवा किसी अन्य विधि के अधीन प्रभावी किसी लिखत में असंगत बात के होते हुए भी प्रभावी होंगे।
पूरी व्याख्या पढ़ें →सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत द्वितीय अपील सूचना आयोग को कितने दिन के भीतर की जाती है?
- A.30 दिन
- B.45 दिन
- C.60 दिन
- D.90 दिन
उत्तर देखें
अधिनियम दो अपीलों की व्यवस्था करता है। धारा 19(1) के अंतर्गत प्रथम अपील उत्तर मिलने या समय-सीमा बीतने के तीस दिन के भीतर की जाती है और वह उसी लोक प्राधिकारी में लोक सूचना अधिकारी से वरिष्ठ अधिकारी, यानी प्रथम अपीलीय प्राधिकारी को जाती है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 ने किस पूर्व कानून को निरसित किया?
- A.शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1923
- B.सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम, 2002
- C.केंद्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम, 2003
- D.लोक अभिलेख अधिनियम, 1993
उत्तर देखें
यह अधिनियम 2002 में पारित हुआ था, परंतु कभी अधिसूचित न होने के कारण लागू ही नहीं हुआ; सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 ने उसकी जगह अधिक सशक्त व्यवस्था दी, जिसमें समय-सीमाएं, जुर्माना और स्वतंत्र सूचना आयोग जोड़े गए, और नए अधिनियम की धारा 31 ने उसे निरसित कर दिया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →सर्वोच्च न्यायालय ने सूचना के अधिकार को संविधान के किस प्रावधान में पढ़ा है?
- A.अनुच्छेद 19(1)(क)
- B.अनुच्छेद 21
- C.अनुच्छेद 32
- D.अनुच्छेद 51क
उत्तर देखें
संविधान में सूचना का अधिकार शब्द कहीं नहीं आता, परंतु सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि अनुच्छेद 19(1)(क) की वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तब तक अर्थहीन है जब तक नागरिक यह न जान सके कि सरकार कैसे काम करती है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →मुख्य सूचना आयुक्त के अतिरिक्त केंद्रीय सूचना आयोग में अधिकतम कितने सूचना आयुक्त हो सकते हैं?
- A.पांच
- B.आठ
- C.दस
- D.बारह
उत्तर देखें
अधिनियम की धारा 12 कहती है कि केंद्रीय सूचना आयोग में एक मुख्य सूचना आयुक्त तथा आवश्यकतानुसार उतने केंद्रीय सूचना आयुक्त होंगे, जो दस से अधिक न हों।
पूरी व्याख्या पढ़ें →केंद्रीय सतर्कता आयोग की स्थापना 1964 में किस समिति की सिफारिश पर की गई थी?
- A.संथानम समिति
- B.कोठारी समिति
- C.बलवंत राय मेहता समिति
- D.अशोक मेहता समिति
उत्तर देखें
के. संथानम की अध्यक्षता वाली भ्रष्टाचार निवारण समिति ने 1964 में रिपोर्ट दी और उसी वर्ष सरकारी संकल्प द्वारा केंद्रीय सतर्कता आयोग को संघीय प्रशासन में सतर्कता की शीर्ष संस्था के रूप में बनाया गया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →लोकपाल के अध्यक्ष की नियुक्ति की सिफारिश करने वाली चयन समिति का अध्यक्ष कौन होता है?
- A.राष्ट्रपति
- B.प्रधानमंत्री
- C.भारत के मुख्य न्यायाधीश
- D.लोकसभा अध्यक्ष
उत्तर देखें
लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के अंतर्गत लोकपाल के अध्यक्ष तथा सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति उस चयन समिति की सिफारिश पर करते हैं जिसमें प्रधानमंत्री अध्यक्ष के रूप में, लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा में विपक्ष के नेता, भारत के मुख्य न्यायाधीश अथवा उनके द्वारा नामित सर्वोच्च न्यायालय का एक न्यायाधीश तथा…
पूरी व्याख्या पढ़ें →सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8 के बारे में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
- A.यह प्रकटीकरण से छूट प्राप्त सूचना की श्रेणियां गिनाती है
- B.यह लोक सूचना अधिकारियों की नियुक्ति का प्रावधान करती है
- C.यह सूचना देने में विलंब पर जुर्माना निर्धारित करती है
- D.यह राज्य सूचना आयोगों की स्थापना करती है
उत्तर देखें
धारा 8(1) सूचना की दस श्रेणियां गिनाती है जिन्हें देने के लिए लोक प्राधिकारी बाध्य नहीं है, जिनमें भारत की संप्रभुता और अखंडता, सामरिक तथा सुरक्षा हित, विदेश संबंध, वाणिज्यिक विश्वास और व्यापार गोपनीयता, न्यासीय संबंध में धारित सूचना तथा किसी लोक गतिविधि से असंबद्ध व्यक्तिगत सूचना शामिल हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या सूचना का अधिकार मूल अधिकार है?
यह सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 से बना सांविधिक अधिकार है, परंतु इसका आधार मूल अधिकार है: सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि अनुच्छेद 19(1)(क) में जानने का अधिकार शामिल है, इसलिए अधिनियम उस अधिकार को लागू करने की व्यवस्था देता है।
आरटीआई आवेदन का उत्तर कितने दिन में मिलता है?
आवेदन प्राप्ति से तीस दिन में; जीवन या स्वतंत्रता से जुड़ी सूचना अड़तालीस घंटे में; सहायक लोक सूचना अधिकारी को आवेदन दिया हो तो पैंतीस दिन में; और धारा 11 के अंतर्गत तृतीय पक्ष को सुनना हो तो चालीस दिन में।
आरटीआई में प्रथम अपील किसे की जाती है?
उसी लोक प्राधिकारी में लोक सूचना अधिकारी से वरिष्ठ अधिकारी, यानी प्रथम अपीलीय प्राधिकारी को, तीस दिन के भीतर। केंद्रीय या राज्य सूचना आयोग को केवल द्वितीय अपील जाती है, जो नब्बे दिन के भीतर की जाती है।
क्या यह अधिनियम गुप्तचर एजेंसियों पर लागू होता है?
धारा 24 दूसरी अनुसूची में सूचीबद्ध गुप्तचर और सुरक्षा संगठनों को अधिनियम से बाहर रखती है, परंतु भ्रष्टाचार तथा मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों से जुड़ी सूचना देनी होती है; मानवाधिकार मामलों में सूचना आयोग की अनुमति आवश्यक है।
2019 के संशोधन ने क्या बदला?
इसने मुख्य सूचना आयुक्त तथा सूचना आयुक्तों का पांच वर्ष का निश्चित कार्यकाल और निर्वाचन आयोग के समान वेतन की व्यवस्था हटा दी, और कार्यकाल, वेतन तथा सेवा शर्तें केंद्र सरकार द्वारा नियमों से निर्धारित करने के लिए छोड़ दीं।
लोकपाल किस कानून से बना?
लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 से, जो केंद्र में एक अध्यक्ष तथा अधिकतम आठ सदस्यों वाला लोकपाल देता है, जिनमें आधे न्यायिक सदस्य होते हैं, और राज्यों में लोकायुक्त की व्यवस्था करता है।
स्रोत
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (अधिनियम संख्या 22, 2005) — भारत सरकार, कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग
- लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 — विधि और न्याय मंत्रालय, भारत सरकार
- केंद्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम, 2003 — विधि और न्याय मंत्रालय, भारत सरकार





