भारत में आरक्षण: अनुच्छेद, आयोग और न्यायिक निर्णय
परीक्षा के लिए आरक्षण पर नोट्स: अनुच्छेद 15, 16, 330 और 338ख, मंडल आयोग, इंदिरा साहनी निर्णय, पदोन्नति में आरक्षण तथा 2019 का ईडब्ल्यूएस कोटा।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 6 मिनट

आरक्षण उन विशेष प्रावधानों का समूह है जिनके द्वारा भारत का संविधान राज्य को यह अनुमति देता है कि वह शैक्षणिक संस्थाओं की सीटों, सरकारी नौकरियों के पदों और निर्वाचित सदनों की सीटों का एक हिस्सा उन वर्गों के लिए सुरक्षित रखे जिन्हें सदियों तक इनसे दूर रखा गया। यह समानता के अधिकार का अपवाद नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 15(4), 15(5), 16(4) और 2019 में जोड़े गए खंडों को समानता का ही अंग माना है, क्योंकि असमानों के साथ समान व्यवहार उतना ही अन्यायपूर्ण है जितना समानों के साथ असमान व्यवहार। परीक्षा की दृष्टि से यह विषय अनुच्छेदों, संशोधनों, आयोगों और निर्णयों का नक्शा है, और लगभग हर प्रश्न इसी नक्शे से आता है।
संवैधानिक आधार
अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समता देता है, अनुच्छेद 15(1) धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है और अनुच्छेद 16(1) लोक नियोजन में अवसर की समता देता है। सक्षम बनाने वाले खंड इन्हीं के साथ हैं। अनुच्छेद 15(4) संविधान के पहले संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा जोड़ा गया था, जब उच्चतम न्यायालय ने मद्रास राज्य बनाम चंपकम दोरईराजन मामले में सांप्रदायिक आधार पर सीटों के बंटवारे को रद्द कर दिया था; यह खंड राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित जातियों और जनजातियों की उन्नति के लिए विशेष प्रावधान करने देता है। अनुच्छेद 15(5) तिरानवेवां संशोधन, 2005 द्वारा जोड़ा गया और इसने यह शक्ति निजी शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश तक बढ़ा दी, किंतु अल्पसंख्यक संस्थाएं इससे बाहर रखी गईं। अनुच्छेद 16(4) राज्य की सेवाओं में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व वाले पिछड़े वर्ग के लिए पदों के आरक्षण की अनुमति देता है। अनुच्छेद 46 नीति निदेशक तत्व के रूप में कमजोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों की विशेष देखभाल का निर्देश देता है और अनुच्छेद 335 कहता है कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों के दावों पर प्रशासन की दक्षता बनाए रखते हुए विचार किया जाएगा।
| प्रावधान | विषय |
|---|---|
| अनुच्छेद 15(4) | पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान (पहला संशोधन, 1951) |
| अनुच्छेद 15(5) | निजी संस्थाओं सहित प्रवेश में आरक्षण; अल्पसंख्यक संस्थाएं बाहर (93वां संशोधन, 2005) |
| अनुच्छेद 15(6) और 16(6) | आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए अधिकतम दस प्रतिशत (103वां संशोधन, 2019) |
| अनुच्छेद 16(4) | अपर्याप्त प्रतिनिधित्व वाले पिछड़े वर्ग के लिए नियुक्तियों में आरक्षण |
| अनुच्छेद 16(4क) | अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए पदोन्नति में आरक्षण तथा परिणामी ज्येष्ठता (77वां और 85वां संशोधन) |
| अनुच्छेद 16(4ख) | अग्रनीत बैकलॉग रिक्तियां अलग वर्ग मानी जाएंगी (81वां संशोधन, 2000) |
| अनुच्छेद 330 और 332 | लोकसभा और विधानसभाओं में अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए आरक्षित सीटें |
| अनुच्छेद 338, 338क, 338ख | अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग राष्ट्रीय आयोग |
| अनुच्छेद 340 | पिछड़े वर्गों की दशा की जांच के लिए आयोग नियुक्त करने की राष्ट्रपति की शक्ति |
| अनुच्छेद 341 और 342 | राष्ट्रपति अनुसूचित जातियों और जनजातियों को अधिसूचित करते हैं; सूची में परिवर्तन केवल संसद कर सकती है |
कालेलकर से मंडल तक: ओबीसी कोटा
हर पिछड़ा वर्ग आयोग का स्रोत अनुच्छेद 340 है। पहला आयोग 1953 में काका कालेलकर की अध्यक्षता में बना, जिसने 1955 में रिपोर्ट दी, परंतु उसके मानदंड अस्पष्ट मानकर रिपोर्ट स्वीकार नहीं की गई। दूसरा आयोग 1979 में बी. पी. मंडल की अध्यक्षता में बना, जिसने 1980 में रिपोर्ट दी और केंद्र सरकार के पदों में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए सत्ताईस प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की। यह आंकड़ा इसलिए चुना गया ताकि कुल आरक्षण न्यायालयों द्वारा तय पचास प्रतिशत की सीमा के भीतर रहे। केंद्रीय सेवाओं के लिए इसकी घोषणा 1990 में हुई और तुरंत चुनौती दी गई। केंद्रीय शिक्षण संस्थाओं में यह कोटा बाद में अनुच्छेद 15(5) और केंद्रीय शैक्षणिक संस्था (प्रवेश में आरक्षण) अधिनियम, 2006 से आया, जिसे उच्चतम न्यायालय ने 2008 में अशोक कुमार ठाकुर मामले में वैध ठहराया।
इंदिरा साहनी और पचास प्रतिशत की सीमा
इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ, 1992 में नौ न्यायाधीशों की पीठ द्वारा तय किया गया, इस विषय का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय है। इसने अन्य पिछड़ा वर्ग के सत्ताईस प्रतिशत कोटे को वैध ठहराया, कहा कि सामाजिक पिछड़ापन सिद्ध होने पर जाति को वर्ग माना जा सकता है, और आदेश दिया कि पिछड़े वर्ग के संपन्न लोगों यानी क्रीमी लेयर को इसके दायरे से बाहर रखा जाए ताकि लाभ वास्तविक जरूरतमंद तक पहुंचे। इसी निर्णय ने कहा कि असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर आरक्षण सामान्यतः पचास प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए, कि यह सेवा में प्रवेश के समय लागू होता है, पदोन्नति में नहीं, और यह कि अनुच्छेद 16(4) का पिछड़ापन सामाजिक और शैक्षणिक है, केवल आर्थिक नहीं। पचास प्रतिशत की बात पहली बार 1963 के एम. आर. बालाजी बनाम मैसूर राज्य मामले में कही गई थी और इस सीमा को तोड़ने वाले अग्रनयन नियम को 1964 में टी. देवदासन मामले में रद्द किया गया था।
पदोन्नति में आरक्षण
इंदिरा साहनी के जिन अंशों से संसद सहमत नहीं थी, उनका उत्तर उसने संविधान संशोधनों से दिया। 1995 के सतहत्तरवें संशोधन ने अनुच्छेद 16(4क) जोड़कर अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए पदोन्नति में आरक्षण की अनुमति दी। 2000 के इक्यासीवें संशोधन ने अनुच्छेद 16(4ख) जोड़ा, जिससे अगले वर्ष में ले जाई गई बैकलॉग रिक्तियां उस वर्ष की सीमा से बाहर अलग वर्ग मानी जाती हैं। 2000 के बयासीवें संशोधन ने अनुच्छेद 335 में अर्हता अंकों में छूट देने की शक्ति बहाल की और 2001 के पचासीवें संशोधन ने अनुच्छेद 16(4क) में परिणामी ज्येष्ठता जोड़ी। एम. नागराज बनाम भारत संघ (2006) में न्यायालय ने इन संशोधनों को वैध ठहराया, पर शर्त रखी कि राज्य पिछड़ापन, प्रतिनिधित्व की अपर्याप्तता और प्रशासनिक दक्षता को देखकर ही यह शक्ति प्रयोग करे। जरनैल सिंह बनाम लछमी नारायण गुप्ता (2018) ने अनुसूचित जाति-जनजाति का पिछड़ापन सिद्ध करने की शर्त हटा दी, क्योंकि राष्ट्रपति की सूची स्वयं उसे स्थापित करती है, और पदोन्नति में क्रीमी लेयर की कसौटी लागू की।
ईडब्ल्यूएस कोटा और संवैधानिक आयोग
संविधान का एक सौ तीसरा संशोधन अधिनियम, 2019 अनुच्छेद 15(6) और अनुच्छेद 16(6) लाया, जो राज्य को उन नागरिकों के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए अधिकतम दस प्रतिशत सीटें और पद आरक्षित करने देते हैं जो पहले से चल रहे जातिगत कोटों में नहीं आते; आर्थिक मानदंड राज्य अधिसूचित करता है। जनहित अभियान बनाम भारत संघ (2022) में पांच न्यायाधीशों की पीठ ने तीन-दो के बहुमत से इस संशोधन को वैध ठहराया। इस व्यवस्था की निगरानी तीन संवैधानिक आयोग करते हैं: अनुच्छेद 338 के अधीन राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, अनुच्छेद 338क के अधीन राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग, जो 2003 के नवासीवें संशोधन से अलग हुए, और अनुच्छेद 338ख के अधीन राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग, जिसे 2018 के एक सौ दूसरे संशोधन ने संवैधानिक दर्जा दिया। उसी संशोधन ने सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की केंद्रीय सूची के लिए अनुच्छेद 342क जोड़ा और 2021 के एक सौ पांचवें संशोधन ने स्पष्ट किया कि राज्य अपनी अलग सूची रख और अधिसूचित कर सकता है।
विधायिका और स्थानीय निकायों में आरक्षण
लोकसभा में अनुच्छेद 330 और विधानसभाओं में अनुच्छेद 332 के अंतर्गत अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें आरक्षित हैं; संसद में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए कोई आरक्षण नहीं है। अनुच्छेद 334 यह अवधि तय करता है जिस तक ये सीटें आरक्षित रहेंगी और इसे कई बार संशोधन द्वारा बढ़ाया गया है, जिनमें 2019 का एक सौ चौथा संशोधन नवीनतम है, जिसने आंग्ल-भारतीय सदस्यों का मनोनयन भी समाप्त कर दिया। पंचायतों और नगरपालिकाओं में अनुच्छेद 243घ और अनुच्छेद 243न अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए जनसंख्या के अनुपात में सीटें आरक्षित करते हैं, राज्य विधानमंडल को पिछड़े वर्गों के लिए सीटें आरक्षित करने देते हैं और कुल सीटों तथा अध्यक्ष पदों में कम से कम एक तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित करते हैं।
परीक्षा की दृष्टि से
पांच प्रकार के प्रश्न बार-बार आते हैं। पहला, अनुच्छेद मिलान: 15(4), 15(5), 15(6), 16(4), 16(4क), 16(4ख), 16(6), 330, 332, 335, 338ख, 340, 341 और 342क; सामान्य भ्रम 15(4) और 16(4) तथा 338 और 338क के बीच कराया जाता है। दूसरा, संशोधन संख्या और वर्ष: पहला (1951), 77वां (1995), 81वां (2000), 82वां (2000), 85वां (2001), 93वां (2005), 102वां (2018), 103वां (2019) और 105वां (2021)। तीसरा, आयोग और अध्यक्ष: कालेलकर 1953 तथा मंडल 1979, रिपोर्ट वर्ष 1955 और 1980। चौथा, न्यायिक निर्णय: चंपकम दोरईराजन, बालाजी, देवदासन, इंदिरा साहनी, नागराज, अशोक कुमार ठाकुर, जरनैल सिंह और जनहित अभियान, जिनमें पूछा जाता है कि किसने क्या तय किया। पांचवां, पीठ की संख्या और बहुमत, जैसे इंदिरा साहनी की नौ न्यायाधीशों की पीठ और ईडब्ल्यूएस पर 3:2 का बहुमत। यह याद रखें कि अनुसूचित सूची में परिवर्तन केवल संसद कर सकती है और लोकसभा में ओबीसी के लिए सीटें आरक्षित नहीं हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य
| प्रवेश में आरक्षण | अनुच्छेद 15(4), 15(5) और 15(6) |
|---|---|
| नौकरियों में आरक्षण | अनुच्छेद 16(4), 16(4क), 16(4ख) और 16(6) |
| पहला पिछड़ा वर्ग आयोग | काका कालेलकर, गठन 1953, रिपोर्ट 1955 |
| दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग | बी. पी. मंडल, गठन 1979, रिपोर्ट 1980, ओबीसी को 27 प्रतिशत |
| प्रमुख निर्णय | इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ, 1992, नौ न्यायाधीशों की पीठ |
| पचास प्रतिशत की सीमा | एम. आर. बालाजी (1963) में सुझाव, इंदिरा साहनी (1992) में स्थापित |
| पदोन्नति में आरक्षण | अनुच्छेद 16(4क), 77वां संशोधन, 1995 |
| परिणामी ज्येष्ठता | अनुच्छेद 16(4क), 85वां संशोधन, 2001 |
| ईडब्ल्यूएस आरक्षण | अनुच्छेद 15(6) और 16(6), 103वां संशोधन अधिनियम, 2019, अधिकतम दस प्रतिशत |
| ईडब्ल्यूएस की वैधता | जनहित अभियान बनाम भारत संघ, 2022, 3:2 बहुमत |
| एनसीबीसी को संवैधानिक दर्जा | अनुच्छेद 338ख, 102वां संशोधन अधिनियम, 2018 |
| राज्यों की ओबीसी सूची | 105वां संशोधन अधिनियम, 2021 |
| प्रशासनिक दक्षता | अनुच्छेद 335; अंकों में छूट की अनुमति 82वें संशोधन, 2000 से |
| स्थानीय निकायों में महिलाएं | कम से कम एक तिहाई सीटें, अनुच्छेद 243घ और 243न |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
बी. पी. मंडल आयोग किनके पिछड़ेपन के कारणों का अध्ययन करने के लिए गठित किया गया था?
- A.अनुसूचित जनजातियां
- B.अनुसूचित जातियां
- C.ग्रामीण महिलाएं और बच्चे
- D.सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग
उत्तर देखें
दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग 1979 में संविधान के अनुच्छेद 340 के अंतर्गत नियुक्त किया गया था, जो राष्ट्रपति को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की दशा की जांच के लिए आयोग बनाने की शक्ति देता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारत के संविधान का कौन सा अनुच्छेद राज्य को उस पिछड़े वर्ग के लिए नियुक्तियां या पद आरक्षित करने देता है जिसका उसकी सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है?
- A.अनुच्छेद 14
- B.अनुच्छेद 15(4)
- C.अनुच्छेद 16(4)
- D.अनुच्छेद 19(1)(छ)
उत्तर देखें
यह कहता है कि अनुच्छेद 16 की कोई बात राज्य को नागरिकों के ऐसे पिछड़े वर्ग के पक्ष में नियुक्तियों या पदों के आरक्षण का प्रावधान करने से नहीं रोकेगी, जिसका राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →संविधान (एक सौ तीसरा संशोधन) अधिनियम, 2019 ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को आरक्षण देने के लिए कौन से खंड जोड़े?
- A.अनुच्छेद 15(5) और 16(5)
- B.अनुच्छेद 15(6) और 16(6)
- C.अनुच्छेद 16(4क) और 16(4ख)
- D.अनुच्छेद 338क और 338ख
उत्तर देखें
2019 के 103वें संशोधन अधिनियम ने शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश के आरक्षण के लिए अनुच्छेद 15 में खंड (6) और नियुक्तियों में आरक्षण के लिए अनुच्छेद 16 में खंड (6) जोड़ा, दोनों में उन नागरिकों के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए अधिकतम दस प्रतिशत, जो पहले से चल…
पूरी व्याख्या पढ़ें →इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (1992) में उच्चतम न्यायालय ने किस वर्ग को आरक्षण के लाभ से बाहर रखने का निर्देश दिया था?
- A.पिछड़े वर्गों की क्रीमी लेयर
- B.सभी सरकारी कर्मचारी
- C.महानगरों के निवासी
- D.चालीस वर्ष से अधिक आयु के अभ्यर्थी
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इंदिरा साहनी मामले में नौ न्यायाधीशों की पीठ ने अन्य पिछड़ा वर्ग के सत्ताईस प्रतिशत कोटे को वैध ठहराया, पर कहा कि इन वर्गों के सामाजिक रूप से उन्नत लोगों को, जिन्हें क्रीमी लेयर कहा गया, बाहर रखा जाए ताकि लाभ वास्तव में पिछड़े लोगों तक पहुंचे; इसी निर्णय ने…
पूरी व्याख्या पढ़ें →पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान की अनुमति देने वाला संविधान का अनुच्छेद 15(4) किस संविधान संशोधन अधिनियम से जोड़ा गया था?
- A.पहला संशोधन अधिनियम, 1951
- B.सातवां संशोधन अधिनियम, 1956
- C.बयालीसवां संशोधन अधिनियम, 1976
- D.तिरानवेवां संशोधन अधिनियम, 2005
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यह उस निर्णय के बाद पारित हुआ जिसमें उच्चतम न्यायालय ने मद्रास राज्य बनाम चंपकम दोरईराजन मामले में महाविद्यालयों की सीटें जातिगत आधार पर बांटने वाले आदेश को अनुच्छेद 15(1) के विरुद्ध मानकर रद्द कर दिया था; संसद ने उत्तर में अनुच्छेद 15 में खंड (4) जोड़ा, जो सामाजिक और…
पूरी व्याख्या पढ़ें →अनुच्छेद 16(4क) के अधीन पदोन्नति में आरक्षण के साथ परिणामी ज्येष्ठता किस संविधान संशोधन से जोड़ी गई?
- A.सतहत्तरवां संशोधन अधिनियम, 1995
- B.इक्यासीवां संशोधन अधिनियम, 2000
- C.बयासीवां संशोधन अधिनियम, 2000
- D.पचासीवां संशोधन अधिनियम, 2001
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इसने अनुच्छेद 16(4क) में संशोधन कर यह व्यवस्था की कि आरक्षण के अंतर्गत पदोन्नत अनुसूचित जाति या जनजाति का कर्मचारी पदोन्नत पद की ज्येष्ठता भी रखेगा, जिसे परिणामी ज्येष्ठता कहा जाता है, और यह परिवर्तन 1995 से प्रभावी माना गया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को किस अनुच्छेद के अंतर्गत संवैधानिक दर्जा दिया गया?
- A.अनुच्छेद 338
- B.अनुच्छेद 338क
- C.अनुच्छेद 338ख
- D.अनुच्छेद 339
उत्तर देखें
संविधान (एक सौ दूसरा संशोधन) अधिनियम, 2018 ने अनुच्छेद 338ख जोड़ा, जो राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक निकाय बनाता है और उसे सामाजिक तथा शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को दिए गए संरक्षणों की जांच और निगरानी का दायित्व देता है; उसी संशोधन ने ऐसे वर्गों की केंद्रीय सूची…
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारत में नियुक्त पहले पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष कौन थे?
- A.बी. पी. मंडल
- B.काका कालेलकर
- C.बी. आर. अंबेडकर
- D.एच. जे. कनिया
उत्तर देखें
पहला पिछड़ा वर्ग आयोग 1953 में अनुच्छेद 340 के अधीन काका साहेब कालेलकर की अध्यक्षता में नियुक्त हुआ और उसने 1955 में रिपोर्ट दी; उस रिपोर्ट पर अमल नहीं हुआ क्योंकि पिछड़ापन पहचानने के उसके मानदंड अस्पष्ट माने गए।
पूरी व्याख्या पढ़ें →किस अनुच्छेद के अधीन राष्ट्रपति पिछड़े वर्गों की दशा की जांच के लिए आयोग नियुक्त कर सकते हैं?
- A.अनुच्छेद 338
- B.अनुच्छेद 340
- C.अनुच्छेद 341
- D.अनुच्छेद 342
उत्तर देखें
यह राष्ट्रपति को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की दशा, उनकी कठिनाइयों और उन्हें दूर करने के उपायों की जांच के लिए आयोग नियुक्त करने की शक्ति देता है, और 1953 का कालेलकर आयोग तथा 1979 का मंडल आयोग दोनों इसी के अधीन नियुक्त हुए थे।
पूरी व्याख्या पढ़ें →लोकसभा में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों का आरक्षण किस अनुच्छेद से होता है?
- A.अनुच्छेद 325
- B.अनुच्छेद 330
- C.अनुच्छेद 332
- D.अनुच्छेद 334
उत्तर देखें
यह लोकसभा में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें आरक्षित करता है; संसद में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए सीटों का आरक्षण नहीं है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →उच्चतम न्यायालय के किस निर्णय ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के आरक्षण को वैध ठहराया?
- A.एम. नागराज बनाम भारत संघ
- B.जनहित अभियान बनाम भारत संघ
- C.जरनैल सिंह बनाम लछमी नारायण गुप्ता
- D.अशोक कुमार ठाकुर बनाम भारत संघ
उत्तर देखें
पांच न्यायाधीशों की पीठ ने 2022 में इसका निर्णय देकर संविधान (एक सौ तीसरा संशोधन) अधिनियम, 2019 को तीन-दो के बहुमत से वैध ठहराया, जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को अधिकतम दस प्रतिशत आरक्षण देता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सरकारी नौकरियों में आरक्षण किस अनुच्छेद से मिलता है?
अनुच्छेद 16(4) से। यह राज्य को उस पिछड़े वर्ग के लिए नियुक्तियां या पद आरक्षित करने देता है जिसका राज्य की सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। अनुच्छेद 16(4क) अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए पदोन्नति जोड़ता है और अनुच्छेद 16(6) आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को जोड़ता है।
क्रीमी लेयर क्या है?
क्रीमी लेयर पिछड़े वर्गों का वह संपन्न हिस्सा है जिसे आरक्षण के लाभ से बाहर रखा जाता है ताकि लाभ वास्तव में पिछड़े लोगों तक पहुंचे। इंदिरा साहनी (1992) ने इसे अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए अनिवार्य किया और जरनैल सिंह (2018) ने पदोन्नति में अनुसूचित जाति-जनजाति पर भी यह कसौटी लागू की।
मंडल आयोग के अध्यक्ष कौन थे और उसने क्या सिफारिश की?
बी. पी. मंडल दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष थे, जो 1979 में अनुच्छेद 340 के अधीन बना और 1980 में रिपोर्ट देकर केंद्र सरकार के पदों में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए सत्ताईस प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की, ताकि कुल आरक्षण पचास प्रतिशत के भीतर रहे।
ईडब्ल्यूएस आरक्षण किस संशोधन से आया?
संविधान के एक सौ तीसरे संशोधन अधिनियम, 2019 से, जिसने अनुच्छेद 15(6) और अनुच्छेद 16(6) जोड़े और उन आर्थिक रूप से कमजोर नागरिकों के लिए अधिकतम दस प्रतिशत आरक्षण की अनुमति दी जो पहले से चल रहे जातिगत कोटों में नहीं आते। उच्चतम न्यायालय ने 2022 में जनहित अभियान मामले में इसे वैध ठहराया।
क्या आरक्षण पचास प्रतिशत से अधिक हो सकता है?
इंदिरा साहनी (1992) ने कहा कि आरक्षण सामान्यतः उपलब्ध सीटों के पचास प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए और केवल असाधारण स्थिति में ही यह सीमा पार की जा सकती है। यह सीमा उस वर्ष की रिक्तियों पर लागू होती है; अनुच्छेद 16(4ख) के अधीन अग्रनीत बैकलॉग रिक्तियां अलग वर्ग मानी जाती हैं।
अनुसूचित जातियों की सूची में कोई जाति कौन जोड़ सकता है?
राष्ट्रपति अनुच्छेद 341 के अधीन किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के लिए अनुसूचित जातियों और अनुच्छेद 342 के अधीन अनुसूचित जनजातियों को लोक अधिसूचना से अधिसूचित करते हैं, किंतु सूची अधिसूचित हो जाने के बाद उसमें किसी जाति को जोड़ना या हटाना केवल संसद विधि द्वारा कर सकती है।
स्रोत
- भारत का संविधान, अनुच्छेद 15, 16, 243घ, 330, 332, 335, 338ख, 340, 341 और 342क — विधायी विभाग, विधि और न्याय मंत्रालय
- संविधान (एक सौ तीसरा संशोधन) अधिनियम, 2019 — इंडिया कोड, भारत सरकार
- पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट, 1980 (मंडल आयोग) — भारत सरकार
- भारत का संविधान: सिद्धांत और व्यवहार (कक्षा 11), समानता और अधिकार अध्याय — एनसीईआरटी





