संसदीय विशेषाधिकार: अनुच्छेद 105 और 194 के तथ्य
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए संसदीय विशेषाधिकार के पूरे नोट्स: अनुच्छेद 105 और 194, सामूहिक तथा वैयक्तिक विशेषाधिकार, विशेषाधिकार हनन और प्रमुख निर्णय।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 5 मिनट

संसदीय विशेषाधिकार वे विशेष अधिकार, उन्मुक्तियां और छूटें हैं जो संसद के दोनों सदनों, उनकी समितियों और उनके सदस्यों को प्राप्त हैं, ताकि वे विधायी कार्य बिना भय, पक्षपात या बाहरी हस्तक्षेप के कर सकें। ये व्यक्तिगत सुविधाएं नहीं हैं। संविधान इन्हें सदन को एक संस्था के रूप में देता है और सदस्य इनका उपयोग तभी तक कर सकता है जब तक वह सदन का सदस्य है तथा केवल सदन के कार्य से जुड़े मामलों में। परीक्षक इस अध्याय को हर वर्ष उठाते हैं, क्योंकि इसका पूरा आधार दो छोटे अनुच्छेदों पर है, संसद के लिए अनुच्छेद 105 और राज्य विधानमंडलों के लिए अनुच्छेद 194, और प्रश्नपत्र सामान्यतः अनुच्छेद संख्या, गिरफ्तारी से छूट की अवधि, शिकायत की जांच करने वाली समिति का नाम, या उन निर्णयों को पूछता है जिन्होंने इस उन्मुक्ति को सीमित किया है।
संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 105
अनुच्छेद 105 के चार खंड हैं और प्रत्येक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। खंड (1) संसद में वाक् स्वतंत्रता की गारंटी देता है। यह स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(1)(क) की साधारण वाक् स्वतंत्रता से अधिक व्यापक है, क्योंकि इस पर अनुच्छेद 19(2) के प्रतिबंध लागू नहीं होते; इस पर केवल संविधान तथा सदन के नियमों और स्थायी आदेशों की सीमा है। खंड (2) कहता है कि संसद या उसकी समिति में कही गई किसी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में कोई सदस्य किसी न्यायालय में किसी कार्यवाही का पात्र नहीं होगा, और सदन के प्राधिकार से प्रकाशित किसी प्रतिवेदन, पत्र, मत या कार्यवाही के लिए कोई व्यक्ति उत्तरदायी नहीं होगा। खंड (3) शेष विशेषाधिकारों को संसद द्वारा विधि बनाकर परिभाषित करने के लिए छोड़ देता है, और जब तक ऐसी विधि नहीं बनती, वे वही रहेंगे जो चौवालीसवें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 की धारा 15 के प्रवर्तन से ठीक पहले विद्यमान थे। संसद ने आज तक वह संहिताकरण विधि नहीं बनाई, इसलिए विशेषाधिकार असंहिताबद्ध हैं। खंड (4) इन्हीं विशेषाधिकारों को उन व्यक्तियों तक विस्तारित करता है जिन्हें सदस्य न होते हुए भी सदन की कार्यवाही में बोलने और भाग लेने का अधिकार है, जैसे भारत का महान्यायवादी और दूसरे सदन का सदस्य कोई मंत्री।
सदन के सामूहिक विशेषाधिकार
- अपनी चर्चाओं और कार्यवाहियों के प्रकाशन का अधिकार तथा उनके प्रकाशन को रोकने का अधिकार।
- दर्शक दीर्घा से बाहरी व्यक्तियों को हटाने और गुप्त बैठक करने का अधिकार।
- अपनी प्रक्रिया और कार्य संचालन के नियम स्वयं बनाने का अधिकार।
- विशेषाधिकार हनन या सदन की अवमानना पर सदस्यों तथा बाहरी व्यक्तियों को चेतावनी, निंदा या कारावास से दंडित करने का अधिकार।
- किसी सदस्य की गिरफ्तारी, निरोध, दोषसिद्धि, कारावास और रिहाई की तत्काल सूचना पाने का अधिकार।
- न्यायालयों के हस्तक्षेप से मुक्ति: कोई न्यायालय सदन या उसकी समिति की कार्यवाही की जांच नहीं कर सकता।
- जांच करने, गवाहों को बुलाने और दस्तावेज मंगाने का अधिकार।
सदस्य के वैयक्तिक विशेषाधिकार
किसी सदस्य को सत्र के चलते हुए तथा सत्र शुरू होने से चालीस दिन पहले और समाप्त होने के चालीस दिन बाद तक सिविल मामले में गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। यह छूट सिविल प्रक्रिया संहिता से मिलती है, संविधान से नहीं, और केवल सिविल कार्यवाहियों तक सीमित है; आपराधिक मामले में या निवारक निरोध विधि के अधीन सदस्य को कभी भी गिरफ्तार किया जा सकता है और अध्यक्ष या सभापति को केवल सूचना दी जाती है। सदस्य को सदन के भीतर वाक् स्वतंत्रता भी है, और सदन के सत्र में होने पर उसे गवाह के रूप में बुलाया या न्यायालय में उपस्थित होने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, जिससे सदन का कार्य प्राथमिकता पाता है।
एक दृष्टि में अनुच्छेद
| उपबंध | क्या कहता है |
|---|---|
| अनुच्छेद 105 | संसद, उसके सदस्यों और समितियों के विशेषाधिकार |
| अनुच्छेद 194 | राज्य विधानमंडलों और उनके सदस्यों के वही विशेषाधिकार |
| अनुच्छेद 122 | न्यायालय संसद की किसी कार्यवाही की वैधता की जांच नहीं कर सकते |
| अनुच्छेद 212 | राज्य विधानमंडल की कार्यवाही की जांच पर वही रोक |
| अनुच्छेद 361क | कार्यवाहियों के सही प्रतिवेदन के प्रकाशन को संरक्षण; चौवालीसवें संशोधन, 1978 द्वारा जोड़ा गया |
| अनुच्छेद 121 | उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के आचरण पर संसद में चर्चा नहीं, सिवाय हटाने के प्रस्ताव पर |
विशेषाधिकार हनन और सदन की अवमानना
विशेषाधिकार हनन सदन या सदस्य के किसी विशेषाधिकार की अवहेलना है। सदन की अवमानना इससे व्यापक है: कोई भी कार्य जो सदन, सदस्य या अधिकारी को कर्तव्य पालन में बाधा पहुंचाए, या सदन की गरिमा घटाए, चाहे कोई विशिष्ट विशेषाधिकार टूटा न हो। कोई भी सदस्य लोक सभा में अध्यक्ष और राज्य सभा में सभापति की अनुमति से विशेषाधिकार का प्रश्न उठा सकता है। पीठासीन अधिकारी उसे सदन में निपटा सकता है या विशेषाधिकार समिति को भेज सकता है, जिसमें लोक सभा में अध्यक्ष द्वारा नामित पंद्रह सदस्य और राज्य सभा में सभापति द्वारा नामित दस सदस्य होते हैं। सदन दोषी को चेतावनी दे सकता है, उसकी निंदा कर सकता है या कारावास दे सकता है, और अपने सदस्य को निलंबित या निष्कासित कर सकता है।
विशेषाधिकार और न्यायालय
सदन और न्यायपालिका का संबंध मामलों के माध्यम से तय हुआ है। 1958 के सर्चलाइट मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि निकाली गई कार्यवाही के प्रकाशन को संरक्षण नहीं है। केशव सिंह प्रकरण में, जिसका निर्णय 1964 में राष्ट्रपति के निर्देश पर हुआ, न्यायालय ने कहा कि सदन अपने विशेषाधिकारों की सीमा का अंतिम निर्णायक नहीं हो सकता और उसके आदेश मूल अधिकारों की कसौटी पर परखे जा सकते हैं। राजा राम पाल बनाम माननीय अध्यक्ष, 2007 में न्यायालय ने प्रश्न के बदले धन प्रकरण में सदस्यों के निष्कासन को सही ठहराया, परंतु स्पष्ट किया कि विशेषाधिकार का प्रयोग सीमित आधारों पर न्यायिक पुनर्विलोकन के दायरे में है। सीता सोरेन बनाम भारत संघ, 2024 में सात न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि मत या भाषण के लिए रिश्वत लेने वाला विधायक अनुच्छेद 105(2) या 194(2) से संरक्षित नहीं है, क्योंकि उन्मुक्ति केवल उन कार्यों को ढकती है जो सदन के संचालन के लिए आवश्यक हैं।
जहां छात्र भूल करते हैं
विशेषाधिकार मूल अधिकार नहीं हैं और अनुच्छेद 105 भाग तीन में नहीं है। ये राष्ट्रपति को उपलब्ध नहीं हैं, जो संसद का अंग है, और महान्यायवादी को ये खंड (4) से मिलते हैं, सदस्य के रूप में नहीं। चालीस दिन की छूट आपराधिक मामलों में नहीं मिलती। विशेषाधिकार कभी संहिताबद्ध नहीं हुए, इसलिए खंड (3) के शब्द आज भी 1978 से पहले की स्थिति की ओर संकेत करते हैं।
परीक्षा की दृष्टि से
प्रश्नपत्र संसद और राज्यों के लिए अनुच्छेद संख्या, चालीस दिन का नियम और यह तथ्य कि वह केवल सिविल मामलों को ढकता है, दोनों विशेषाधिकार समितियों की सदस्य संख्या, हाउस ऑफ कॉमन्स का उल्लेख हटाने वाला संशोधन, तथा कार्यवाही के प्रकाशन की रक्षा करने वाला अनुच्छेद पूछते हैं। कथन आधारित प्रश्न किसी विशेषाधिकार को गलत अनुच्छेद से जोड़ते हैं या आपराधिक मामलों में गिरफ्तारी से उन्मुक्ति का दावा करते हैं। निर्णय आधारित प्रश्न पूछते हैं कि किस निर्णय ने रिश्वत लेने वाले विधायक पर अभियोजन की अनुमति दी और किसने सदस्यों के निष्कासन को सही ठहराया।
महत्वपूर्ण तथ्य
| संसद के विशेषाधिकार | अनुच्छेद 105 |
|---|---|
| राज्य विधानमंडलों के विशेषाधिकार | अनुच्छेद 194 |
| कार्यवाही की जांच पर न्यायालयों पर रोक | अनुच्छेद 122 (संसद), अनुच्छेद 212 (राज्य) |
| कार्यवाही के प्रकाशन को संरक्षण | अनुच्छेद 361क, 44वें संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा जोड़ा गया |
| गिरफ्तारी से मुक्ति | केवल सिविल मामले; सत्र तथा उससे 40 दिन पहले और बाद |
| विशेषाधिकार समिति | लोक सभा 15 सदस्य, राज्य सभा 10 सदस्य |
| गैर सदस्यों के विशेषाधिकार | अनुच्छेद 105(4), उदाहरण के लिए भारत का महान्यायवादी |
| रिश्वत पर उन्मुक्ति नहीं | सीता सोरेन बनाम भारत संघ (2024), सात न्यायाधीशों की पीठ |
| संहिताकरण | नहीं हुआ; अनुच्छेद 105(3) आज भी 44वें संशोधन से पहले की स्थिति की ओर संकेत करता है |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
संविधान का कौन-सा अनुच्छेद संसद, उसके सदस्यों और उसकी समितियों की शक्तियों, विशेषाधिकारों और उन्मुक्तियों से संबंधित है?
- A.अनुच्छेद 100
- B.अनुच्छेद 105
- C.अनुच्छेद 110
- D.अनुच्छेद 112
उत्तर देखें
संविधान का अनुच्छेद 105 संसद, उसके सदस्यों और उसकी समितियों की शक्तियों, विशेषाधिकारों और उन्मुक्तियों से संबंधित है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →संसद का सदस्य सत्र के दौरान तथा सत्र आरंभ होने से कितने दिन पहले और समाप्त होने के कितने दिन बाद तक सिविल मामलों में गिरफ्तारी से मुक्त रहता है?
- A.15 दिन
- B.20 दिन
- C.30 दिन
- D.40 दिन
उत्तर देखें
सिविल मामलों में गिरफ्तारी से मुक्ति सत्र के चलते रहने तक तथा सत्र आरंभ होने से चालीस दिन पहले और समाप्त होने के चालीस दिन बाद तक रहती है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →कौन-सा अनुच्छेद संसद के किसी सदन की कार्यवाही के सारतः सही प्रतिवेदन के प्रकाशन के लिए किसी व्यक्ति को दायित्व से संरक्षण देता है?
- A.अनुच्छेद 105
- B.अनुच्छेद 194
- C.अनुच्छेद 361क
- D.अनुच्छेद 123
उत्तर देखें
अनुच्छेद 361क संसद के किसी सदन या राज्य विधानमंडल की कार्यवाही के सारतः सही प्रतिवेदन के प्रकाशन के लिए किसी व्यक्ति को सिविल या आपराधिक दायित्व से संरक्षण देता है, बशर्ते यह सिद्ध न हो जाए कि प्रकाशन दुर्भावना से किया गया था; गुप्त बैठक के प्रतिवेदन पर यह संरक्षण…
पूरी व्याख्या पढ़ें →किस संविधान संशोधन अधिनियम ने अनुच्छेद 105(3) के विशेषाधिकार खंड से यूनाइटेड किंगडम के हाउस ऑफ कॉमन्स का उल्लेख हटाया?
- A.42वां संशोधन अधिनियम, 1976
- B.44वां संशोधन अधिनियम, 1978
- C.52वां संशोधन अधिनियम, 1985
- D.61वां संशोधन अधिनियम, 1988
उत्तर देखें
मूल रूप से अनुच्छेद 105(3) कहता था कि जब तक संसद विधि द्वारा विशेषाधिकार परिभाषित न करे, वे यूनाइटेड किंगडम के हाउस ऑफ कॉमन्स के विशेषाधिकार होंगे।
पूरी व्याख्या पढ़ें →लोक सभा की विशेषाधिकार समिति में कितने सदस्य होते हैं?
- A.10
- B.12
- C.15
- D.22
उत्तर देखें
लोक सभा की विशेषाधिकार समिति में पंद्रह सदस्य होते हैं, जिन्हें अध्यक्ष नामित करता है, और यह समिति उसे भेजे गए विशेषाधिकार के प्रश्नों की जांच करती है तथा सिफारिश करती है कि सदन क्या कार्रवाई करे।
पूरी व्याख्या पढ़ें →निम्नलिखित में से कौन भारत में संसद सदस्य को उपलब्ध संसदीय विशेषाधिकार नहीं है?
- A.सदन में वाक् स्वतंत्रता
- B.सदन में दिए गए मत के लिए न्यायालयी कार्यवाही से उन्मुक्ति
- C.सत्र के दौरान आपराधिक मामले में गिरफ्तारी से उन्मुक्ति
- D.सदस्य की गिरफ्तारी की सूचना पाने का सदन का अधिकार
उत्तर देखें
ऐसा कोई विशेषाधिकार नहीं है। गिरफ्तारी से मुक्ति केवल सिविल मामलों को ढकती है, और सदस्य को आपराधिक मामले में या निवारक निरोध विधि के अधीन कभी भी गिरफ्तार किया जा सकता है, असाधारण परिस्थितियों में पीठासीन अधिकारी की अनुमति से सदन के भीतर भी।
पूरी व्याख्या पढ़ें →उच्चतम न्यायालय की सात न्यायाधीशों की पीठ ने 2024 में किस मामले में कहा कि मत के बदले रिश्वत लेने वाला विधायक संसदीय विशेषाधिकार से संरक्षित नहीं है?
- A.पी. वी. नरसिंह राव बनाम राज्य (सीबीआई)
- B.सीता सोरेन बनाम भारत संघ
- C.राजा राम पाल बनाम माननीय अध्यक्ष, लोक सभा
- D.किहोतो होलोहन बनाम जाचिल्हू
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2024 में सात न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 105(2) और 194(2) की उन्मुक्ति केवल उन कार्यों को ढकती है जो सदन के संचालन के लिए आवश्यक हैं, इसलिए मत या भाषण के बदले रिश्वत लेने वाले विधायक पर अभियोजन चल सकता है; अपराध रिश्वत स्वीकार करते ही पूरा…
पूरी व्याख्या पढ़ें →संविधान का अनुच्छेद 122 उपबंध करता है कि:
- A.संसद विधि द्वारा अपने विशेषाधिकार परिभाषित कर सकती है
- B.न्यायालय संसद की किसी कार्यवाही की वैधता की जांच नहीं करेंगे
- C.साठ दिन अनुपस्थित रहने पर सदस्य का स्थान रिक्त हो जाता है
- D.कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, यह अध्यक्ष तय करेगा
उत्तर देखें
अनुच्छेद 122 कहता है कि संसद की किसी कार्यवाही की वैधता को प्रक्रिया की किसी कथित अनियमितता के आधार पर किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा, और जिस अधिकारी या सदस्य में प्रक्रिया या व्यवस्था की शक्ति निहित है, वह उस शक्ति के प्रयोग में किसी न्यायालय की अधिकारिता…
पूरी व्याख्या पढ़ें →अनुच्छेद 105(4) के अधीन संसदीय विशेषाधिकार निम्नलिखित में से उस व्यक्ति को भी उपलब्ध हैं जो सदन का सदस्य नहीं है, वह कौन है?
- A.भारत का राष्ट्रपति
- B.भारत का महान्यायवादी
- C.नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक
- D.मुख्य निर्वाचन आयुक्त
उत्तर देखें
अनुच्छेद 105(4) सदन के विशेषाधिकारों को उन व्यक्तियों तक विस्तारित करता है जिन्हें सदस्य न होते हुए भी सदन या उसकी किसी समिति की कार्यवाही में बोलने और भाग लेने का अधिकार है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारत में संसदीय विशेषाधिकारों के संहिताकरण के बारे में कौन-सा कथन सही है?
- A.इन्हें 1952 के विशेषाधिकार अधिनियम से संहिताबद्ध किया गया
- B.संसद ने इन्हें परिभाषित करने वाली विधि नहीं बनाई, इसलिए ये असंहिताबद्ध हैं
- C.इन्हें चौवालीसवें संशोधन ने ही संहिताबद्ध कर दिया
- D.उच्चतम न्यायालय ने केशव सिंह मामले में इन्हें संहिताबद्ध किया
उत्तर देखें
अनुच्छेद 105(3) संसद को विधि द्वारा अपने विशेषाधिकार परिभाषित करने का अधिकार देता है, परंतु संसद ने कभी ऐसी विधि नहीं बनाई, इसलिए विशेषाधिकार असंहिताबद्ध हैं और संविधान, सदनों के नियमों, उनके पूर्व उदाहरणों तथा चौवालीसवें संशोधन से पहले की प्रथा से लिए जाते हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या संसदीय विशेषाधिकार मूल अधिकार हैं?
नहीं। ये संविधान के भाग पांच के अनुच्छेद 105 से मिलते हैं, भाग तीन से नहीं। विशेषाधिकार को मूल अधिकार के रूप में नहीं मांगा जा सकता, और उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि विशेषाधिकार के प्रयोग में दिया गया आदेश स्वयं मूल अधिकारों की कसौटी पर परखा जा सकता है।
क्या सत्र के दौरान संसद सदस्य को गिरफ्तार किया जा सकता है?
हां, आपराधिक मामले में या निवारक निरोध विधि के अधीन, कभी भी। गिरफ्तारी से मुक्ति केवल सिविल मामलों पर लागू होती है और सत्र के दौरान तथा उससे चालीस दिन पहले और बाद तक रहती है। सदस्य की गिरफ्तारी, निरोध या रिहाई की सूचना पीठासीन अधिकारी को देना आवश्यक है।
विशेषाधिकार का प्रश्न कौन तय करता है?
सदस्य इसे लोक सभा में अध्यक्ष या राज्य सभा में सभापति की अनुमति से उठाता है। पीठासीन अधिकारी इसे सदन पर छोड़ सकता है या विशेषाधिकार समिति को भेज सकता है, जो अपने निष्कर्ष का प्रतिवेदन देती है और सदन द्वारा की जाने वाली कार्रवाई की सिफारिश करती है।
विशेषाधिकार हनन और सदन की अवमानना में क्या अंतर है?
विशेषाधिकार हनन सदन या सदस्य के किसी विशिष्ट विशेषाधिकार की अवहेलना है। सदन की अवमानना इससे व्यापक है और उस प्रत्येक कार्य को ढकती है जो सदन या उसके सदस्यों को कर्तव्य पालन में बाधा पहुंचाए या उसकी गरिमा घटाए, चाहे कोई विशिष्ट विशेषाधिकार टूटा न हो।
क्या भारत में संसदीय विशेषाधिकार संहिताबद्ध हुए हैं?
नहीं। अनुच्छेद 105(3) संसद को विधि द्वारा इन्हें परिभाषित करने की अनुमति देता है, परंतु ऐसी कोई विधि नहीं बनी, इसलिए विशेषाधिकार असंहिताबद्ध हैं और संविधान, सदनों के नियमों, उनके पूर्व उदाहरणों तथा 1978 के चौवालीसवें संशोधन से पहले की प्रथा पर आधारित हैं।
स्रोत
- The Constitution of India, Articles 105, 122 and 361A — Legislative Department, Ministry of Law and Justice
- Rules of Procedure and Conduct of Business in Lok Sabha: Committee of Privileges — Lok Sabha Secretariat
- Indian Constitution at Work (Class XI), Chapter 5: Legislature — NCERT





