संवैधानिक सिद्धांत: प्रमुख वाद, अनुच्छेद और परीक्षा तथ्य
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए संविधान के महत्वपूर्ण सिद्धांतों के नोट्स: सार और तत्व, आच्छादित विधान, आच्छादन, पृथक्करणीयता, अधित्याग, संबंध तथा मूल ढांचा।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 4 मिनट

भारतीय संविधान का अर्थ केवल उसके लिखित शब्दों तक सीमित नहीं है। किसी कानून को वैध या अवैध ठहराते समय प्रिवी काउंसिल और उच्चतम न्यायालय ने व्याख्या के जो नियम विकसित किए, उन्हें संवैधानिक सिद्धांत कहा जाता है। ये सिद्धांत दो प्रश्नों का उत्तर देते हैं: जिस विधानमंडल ने कानून बनाया, क्या उसे उस विषय पर कानून बनाने की शक्ति थी, और क्या वह कानून मूल अधिकारों से टकराता है। परीक्षाओं में यह अध्याय प्रिय है, क्योंकि प्रत्येक सिद्धांत के साथ एक छोटी परिभाषा, एक प्रमुख वाद और एक सूत्र वाक्य जुड़ा होता है, जिससे एक अंक का वस्तुनिष्ठ प्रश्न सहज बन जाता है।
सिद्धांतों का स्रोत
इनमें से अधिकांश सिद्धांत संविधान के दो भागों से निकले हैं। अनुच्छेद 246 और सातवीं अनुसूची संसद तथा राज्य विधानमंडलों के बीच विधायी शक्ति का बंटवारा तीन सूचियों के माध्यम से करते हैं, जिनमें आरंभ में क्रमशः 97, 66 और 47 विषय थे। व्यवहार में विषय एक-दूसरे पर आ जाते हैं, इसलिए न्यायालय को यह तय करने के नियम चाहिए कि कानून वास्तव में किस सूची का है। दूसरा स्रोत अनुच्छेद 13 है। अनुच्छेद 13(1) कहता है कि संविधान के पूर्व के कानून मूल अधिकारों से असंगति की मात्रा तक शून्य हैं, और अनुच्छेद 13(2) राज्य को ऐसा कोई नया कानून बनाने से रोकता है जो मूल अधिकारों को छीने या कम करे। अनुच्छेद 13 में आया वाक्यांश असंगति की मात्रा तक पृथक्करणीयता के सिद्धांत का बीज है और शून्य शब्द आच्छादन के सिद्धांत का।
सार और तत्व का सिद्धांत
इस सिद्धांत के अनुसार न्यायालय कानून के वास्तविक स्वरूप और चरित्र, अर्थात उसके सार और तत्व को देखता है, उसके आनुषंगिक प्रभावों को नहीं। यदि कानून सार रूप में उसी सूची में आता है जिस पर उसे बनाने वाले विधानमंडल का अधिकार है, तो वह वैध रहता है, चाहे वह किसी दूसरी सूची के विषय को छू ले। यह सिद्धांत कनाडा की संवैधानिक पद्धति से लिया गया है। प्रमुख निर्णय प्रफुल्ल कुमार मुखर्जी बनाम बैंक ऑफ कॉमर्स, खुलना है, जिसे प्रिवी काउंसिल ने 1947 में दिया और बंगाल साहूकार अधिनियम, 1940 को वैध ठहराया, यद्यपि वह वचन पत्र जैसे संघ सूची के विषय को प्रभावित करता था। बॉम्बे राज्य बनाम एफ. एन. बलसारा, 1951 में बॉम्बे मद्य निषेध अधिनियम, 1949 इसी आधार पर वैध माना गया।
आच्छादित विधान का सिद्धांत
इसका सूत्र है कि जो काम सीधे नहीं किया जा सकता, वह घुमा-फिराकर भी नहीं किया जा सकता। यदि विधानमंडल को किसी विषय पर अधिकार नहीं है, तो वह शब्दों का आवरण बदलकर उस विषय तक नहीं पहुंच सकता। प्रमुख वाद के. सी. गजपति नारायण देव बनाम ओडिशा राज्य, 1953 है, जिसमें न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस सिद्धांत का विधानमंडल की सद्भावना या दुर्भावना से कोई संबंध नहीं है; प्रश्न केवल सक्षमता का है।
आच्छादन और पृथक्करणीयता
आच्छादन के सिद्धांत के अनुसार संविधान के पूर्व का वह कानून, जो किसी मूल अधिकार से टकराता है, विधि पुस्तक से मिटता नहीं। वह ढक जाता है, निष्क्रिय पड़ा रहता है और नागरिकों के विरुद्ध लागू नहीं होता; यदि संविधान संशोधन से वह छाया हट जाए तो कानून पुनर्जीवित होकर फिर प्रभावी हो जाता है। आधार वाद भीखाजी नारायण धाकरस बनाम मध्य प्रदेश राज्य, 1955 है, जिसमें 1947 का मोटर वाहन कानून 1951 के प्रथम संशोधन द्वारा अनुच्छेद 19(6) के विस्तार के बाद पुनर्जीवित हुआ। दीप चंद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 1959 तथा महेंद्र लाल जैनी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 1963 में न्यायालय ने कहा कि संविधान के बाद बना वह कानून, जो मूल अधिकारों का उल्लंघन करता है, आरंभ से ही शून्य है, इसलिए आच्छादन उसे नहीं बचाता।
पृथक्करणीयता का अर्थ है कि जब किसी अधिनियम का केवल एक भाग असंवैधानिक हो, तो न्यायालय उसी भाग को शून्य घोषित करता है और शेष अधिनियम को जीवित रखता है, बशर्ते वैध भाग स्वयं खड़ा रह सके। ए. के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य, 1950 में निवारक निरोध अधिनियम, 1950 की धारा 14 शून्य घोषित हुई और शेष अधिनियम बचा रहा। आर. एम. डी. चमारबागवाला बनाम भारत संघ, 1957 ने वे कसौटियां दीं जो आज भी प्रयोग होती हैं।
अन्य पूछे जाने वाले सिद्धांत
| सिद्धांत | आशय | प्रमुख वाद या अनुच्छेद |
|---|---|---|
| राज्यक्षेत्रीय संबंध | राज्य का कानून राज्य के बाहर की वस्तु पर भी लागू हो सकता है, यदि राज्य से वास्तविक संबंध हो | अनुच्छेद 245(2); बॉम्बे राज्य बनाम आर. एम. डी. चमारबागवाला, 1957 |
| अधित्याग | कोई व्यक्ति मूल अधिकार का त्याग नहीं कर सकता, क्योंकि ये अधिकार लोकहित में हैं | बशेशर नाथ बनाम आयकर आयुक्त, 1959 |
| प्रतिकूलता | समवर्ती सूची के विषय पर केंद्र का कानून राज्य के असंगत कानून पर प्रभावी होता है | अनुच्छेद 254 |
| सामंजस्यपूर्ण व्याख्या | परस्पर व्याप्त प्रविष्टियों को इस प्रकार पढ़ा जाए कि प्रत्येक प्रभावी रहे | कलकत्ता गैस कंपनी बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, 1962 |
| मूल ढांचा | संसद संविधान के आधारभूत लक्षणों में संशोधन नहीं कर सकती | केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, 1973 |
| भावी अभिखंडन | नया निर्णय केवल आगे के मामलों पर लागू होता है, बीती व्यवहारों पर नहीं | आई. सी. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य, 1967 |
दोहराने की विधि
- प्रत्येक सिद्धांत के साथ एक सूत्र, एक वाद और एक अनुच्छेद याद कीजिए।
- आच्छादन और पृथक्करणीयता को अलग रखिए: आच्छादन पूरे कानून और समय से जुड़ा है, पृथक्करणीयता एक ही समय पर कानून के एक भाग से।
- स्मरण रखिए कि आच्छादित विधान का प्रश्न सक्षमता का है, नीयत का नहीं, और सार तथा तत्व आनुषंगिक अतिक्रमण की उपेक्षा करता है।
परीक्षा की दृष्टि से
इस अध्याय से तीन प्रकार के प्रश्न बनते हैं। पहला, सिद्धांत के साथ वाद का मेल: सार और तत्व के साथ प्रफुल्ल कुमार मुखर्जी तथा बलसारा, आच्छादन के साथ भीखाजी नारायण धाकरस, पृथक्करणीयता के साथ ए. के. गोपालन और चमारबागवाला, अधित्याग के साथ बशेशर नाथ, आच्छादित विधान के साथ गजपति नारायण देव। दूसरा, सिद्धांत के साथ अनुच्छेद का मेल: आच्छादन और पृथक्करणीयता के लिए अनुच्छेद 13, संबंध के लिए 245(2), सार और तत्व के लिए 246, प्रतिकूलता के लिए 254। तीसरा, कथन आधारित प्रश्न, जिनमें आच्छादन और पृथक्करणीयता को बदल दिया जाता है, या कहा जाता है कि आच्छादन संविधान के बाद बने कानून को भी बचाता है, अथवा आच्छादित विधान को विधानमंडल की दुर्भावना से जोड़ दिया जाता है। ये दोनों कथन गलत हैं और यही सबसे अधिक लगाया जाने वाला जाल है।
महत्वपूर्ण तथ्य
| सार और तत्व, प्रमुख वाद | प्रफुल्ल कुमार मुखर्जी बनाम बैंक ऑफ कॉमर्स, खुलना, प्रिवी काउंसिल, 1947, बंगाल साहूकार अधिनियम, 1940 पर |
|---|---|
| सार और तत्व, भारतीय वाद | बॉम्बे राज्य बनाम एफ. एन. बलसारा, 1951, बॉम्बे मद्य निषेध अधिनियम, 1949 पर |
| आच्छादित विधान | के. सी. गजपति नारायण देव बनाम ओडिशा राज्य, 1953 |
| आच्छादन का सिद्धांत | भीखाजी नारायण धाकरस बनाम मध्य प्रदेश राज्य, 1955 |
| पृथक्करणीयता | ए. के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य, 1950, निवारक निरोध अधिनियम की धारा 14 शून्य |
| अधित्याग | बशेशर नाथ बनाम आयकर आयुक्त, 1959 |
| राज्यक्षेत्रीय संबंध | अनुच्छेद 245(2); बॉम्बे राज्य बनाम आर. एम. डी. चमारबागवाला, 1957 |
| प्रतिकूलता | अनुच्छेद 254; समवर्ती सूची के विषयों पर केंद्र का कानून प्रभावी |
| मूल ढांचा | केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, 1973, तेरह न्यायाधीश, सात के विरुद्ध छह का बहुमत |
| भावी अभिखंडन | आई. सी. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य, 1967, ग्यारह न्यायाधीश, छह के विरुद्ध पांच |
| सातवीं अनुसूची, आरंभिक विषय | संघ सूची 97, राज्य सूची 66, समवर्ती सूची 47 |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
उच्चतम न्यायालय ने आच्छादन के सिद्धांत का प्रयोग निम्नलिखित में से किस वाद में किया?
- A.ए. के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य
- B.भीखाजी नारायण धाकरस बनाम मध्य प्रदेश राज्य
- C.के. सी. गजपति नारायण देव बनाम ओडिशा राज्य
- D.बशेशर नाथ बनाम आयकर आयुक्त
उत्तर देखें
इस वाद में मध्य प्रांत और बरार का 1947 का मोटर वाहन कानून अनुच्छेद 19(1)(ग) के व्यापार की स्वतंत्रता से टकराने के कारण लागू करने योग्य नहीं रह गया था।
पूरी व्याख्या पढ़ें →न्यायालय सार और तत्व के सिद्धांत का प्रयोग मुख्यतः निम्नलिखित में से किससे जुड़े प्रश्नों के निर्णय के लिए करते हैं?
- A.संविधान के संशोधन
- B.संघ और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों के बंटवारे
- C.रिट द्वारा मूल अधिकारों के प्रवर्तन
- D.उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति
उत्तर देखें
अनुच्छेद 246 के साथ सातवीं अनुसूची संसद और राज्य विधानमंडलों को कानून बनाने के अलग क्षेत्र देती है, परंतु व्यवहार में विषय एक-दूसरे पर आ जाते हैं, इसलिए न्यायालय कानून का वास्तविक स्वरूप और चरित्र, अर्थात उसका सार और तत्व खोजता है और दूसरी सूची पर पड़े आनुषंगिक अतिक्रमण की…
पूरी व्याख्या पढ़ें →यह सूत्र कि जो सीधे नहीं किया जा सकता वह घुमा-फिराकर भी नहीं किया जा सकता, किस सिद्धांत को व्यक्त करता है?
- A.राज्यक्षेत्रीय संबंध का सिद्धांत
- B.आच्छादित विधान का सिद्धांत
- C.आच्छादन का सिद्धांत
- D.अधित्याग का सिद्धांत
उत्तर देखें
इसका आशय है कि विधानमंडल उस काम को अप्रत्यक्ष मार्ग से नहीं कर सकता जिसे संविधान ने सीधे करने से रोका है; यदि उसे किसी विषय पर अधिकार नहीं है तो चतुर शब्दावली उसे वह अधिकार नहीं दे सकती।
पूरी व्याख्या पढ़ें →उच्चतम न्यायालय ने किस वाद में कहा कि मूल अधिकार का अधित्याग उसका धारक नहीं कर सकता?
- A.बशेशर नाथ बनाम आयकर आयुक्त, 1959
- B.दीप चंद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 1959
- C.बॉम्बे राज्य बनाम एफ. एन. बलसारा, 1951
- D.कलकत्ता गैस कंपनी बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, 1962
उत्तर देखें
याची ने अपनी कर देयता का निपटारा उस प्रावधान के अंतर्गत किया था जो बाद में अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता पाया गया, और यह तर्क दिया गया कि निपटारे पर सहमत होकर उसने समता के अधिकार का अधित्याग कर दिया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →राज्यक्षेत्रीय संबंध का सिद्धांत संविधान के किस उपबंध से निकला है?
- A.अनुच्छेद 13(1)
- B.अनुच्छेद 245(2)
- C.अनुच्छेद 254(2)
- D.अनुच्छेद 368
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यह खंड कहता है कि संसद द्वारा बनाया गया कोई कानून इस आधार पर अविधिमान्य नहीं माना जाएगा कि उसका राज्यक्षेत्र के बाहर प्रभाव होगा, और न्यायालयों ने इसी पर यह नियम खड़ा किया कि राज्य का कानून भी राज्य के बाहर की वस्तु या व्यक्ति पर लागू हो सकता…
पूरी व्याख्या पढ़ें →प्रिवी काउंसिल ने सार और तत्व के सिद्धांत का प्रयोग निम्नलिखित में से किस वाद में किया?
- A.शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ
- B.प्रफुल्ल कुमार मुखर्जी बनाम बैंक ऑफ कॉमर्स, खुलना
- C.गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य
- D.केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य
उत्तर देखें
बंगाल साहूकार अधिनियम, 1940 ने साहूकारों द्वारा वसूली जाने वाली ब्याज और राशि को सीमित किया, जो प्रांतीय विषय था, परंतु उसने वचन पत्रों को भी प्रभावित किया, जो केंद्रीय सूची का विषय थे।
पूरी व्याख्या पढ़ें →ए. के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य, 1950 में उच्चतम न्यायालय ने निवारक निरोध अधिनियम, 1950 के किस भाग को शून्य घोषित करते हुए शेष अधिनियम को बचाए रखा?
- A.धारा 3
- B.धारा 7
- C.धारा 14
- D.धारा 12
उत्तर देखें
यह धारा निरुद्ध व्यक्ति को न्यायालय में अपने निरोध के आधार या उसके विरुद्ध दिए गए अभ्यावेदन को प्रकट करने से रोकती थी।
पूरी व्याख्या पढ़ें →समवर्ती सूची के किसी विषय पर संसद के कानून और राज्य विधानमंडल के कानून के बीच प्रतिकूलता का निपटारा संविधान का कौन सा अनुच्छेद करता है?
- A.अनुच्छेद 246
- B.अनुच्छेद 249
- C.अनुच्छेद 254
- D.अनुच्छेद 256
उत्तर देखें
खंड (1) कहता है कि यदि समवर्ती विषय पर राज्य का कानून संसद के कानून के प्रतिकूल है, तो संसद का कानून प्रभावी होगा और राज्य का कानून प्रतिकूलता की मात्रा तक शून्य होगा।
पूरी व्याख्या पढ़ें →मूल ढांचा सिद्धांत उच्चतम न्यायालय ने किस वाद में प्रतिपादित किया?
- A.शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ, 1951
- B.सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य, 1965
- C.केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, 1973
- D.मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ, 1980
उत्तर देखें
तेरह न्यायाधीशों की पीठ ने सात के विरुद्ध छह के बहुमत से कहा कि संसद अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, परंतु उसके मूल ढांचे या आधारभूत लक्षणों को नष्ट नहीं कर सकती।
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारत में भावी अभिखंडन के सिद्धांत का पहली बार प्रयोग किस वाद में हुआ?
- A.आई. सी. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य, 1967
- B.मेनका गांधी बनाम भारत संघ, 1978
- C.इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ, 1992
- D.एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ, 1994
उत्तर देखें
ग्यारह न्यायाधीशों की पीठ ने छह के विरुद्ध पांच के बहुमत से कहा कि संसद संशोधन द्वारा मूल अधिकारों को कम नहीं कर सकती, परंतु न्यायालय पहले से क्रियान्वित भूमि सुधार संशोधनों को अस्थिर नहीं करना चाहता था, इसलिए उसने घोषित किया कि उसका निर्णय केवल आगे के लिए प्रभावी…
पूरी व्याख्या पढ़ें →आच्छादन के सिद्धांत के विषय में कौन सा कथन सही है?
- A.यह मूल अधिकारों का उल्लंघन करने वाले संविधान पूर्व और संविधान पश्चात दोनों कानूनों पर समान रूप से लागू होता है
- B.यह संविधान पूर्व के कानूनों पर लागू होता है, जो निष्क्रिय पड़े रहते हैं और संवैधानिक रोक हटने पर पुनर्जीवित हो सकते हैं
- C.यह न्यायालय को अधिनियम के केवल दोषपूर्ण भाग को शून्य करने देता है
- D.यह नागरिक को स्वेच्छा से मूल अधिकार छोड़ने की अनुमति देता है
उत्तर देखें
अनुच्छेद 13(1) संविधान पूर्व के कानून को मूल अधिकारों से असंगति की मात्रा तक ही शून्य करता है, इसलिए उच्चतम न्यायालय ने भीखाजी नारायण धाकरस, 1955 में कहा कि ऐसा कानून मिटता नहीं, केवल आच्छादित होता है और छाया हटने तक अप्रवर्तनीय रहकर उसके बाद पुनर्जीवित हो जाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
आच्छादन और पृथक्करणीयता के सिद्धांतों में क्या अंतर है?
आच्छादन संविधान पूर्व के पूरे कानून पर काम करता है: कानून विधि पुस्तक में बना रहता है, मूल अधिकार से टकराव की अवधि में निष्क्रिय पड़ा रहता है और संशोधन से टकराव हटने पर पुनर्जीवित हो जाता है। पृथक्करणीयता एक ही समय पर अधिनियम के एक भाग पर काम करती है: न्यायालय असंवैधानिक भाग को काटकर शेष को खड़ा रहने देता है, जैसा ए. के. गोपालन, 1950 में हुआ।
क्या आच्छादन का सिद्धांत संविधान लागू होने के बाद बने कानूनों पर भी लागू होता है?
सामान्यतः नहीं। अनुच्छेद 13(2) के अंतर्गत मूल अधिकार छीनने वाला संविधान पश्चात कानून आरंभ से ही शून्य है, जिसे उच्चतम न्यायालय ने दीप चंद, 1959 तथा महेंद्र लाल जैनी, 1963 में तय किया, अतः पुनर्जीवित होने के लिए कोई निष्क्रिय कानून शेष नहीं रहता।
क्या आच्छादित विधान विधानमंडल की दुर्भावना के कारण अवैध होता है?
नहीं। उच्चतम न्यायालय ने के. सी. गजपति नारायण देव, 1953 में कहा कि सद्भावना या दुर्भावना अप्रासंगिक है। प्रश्न केवल यह है कि विधानमंडल को वह कानून बनाने की शक्ति थी या नहीं; यदि नहीं थी तो कानून किसी भी शब्दावली में गिर जाएगा।
सातवीं अनुसूची की दो प्रविष्टियां परस्पर व्याप्त दिखें तो कौन सा सिद्धांत प्रयोग होता है?
पहले सामंजस्यपूर्ण व्याख्या, जो दोनों प्रविष्टियों को ऐसा पढ़ती है कि प्रत्येक प्रभावी रहे, जैसा कलकत्ता गैस कंपनी बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, 1962 में हुआ; उसके बाद सार और तत्व, जो पूछता है कि कानून अपने वास्तविक चरित्र में किस सूची का है।
राज्यक्षेत्रीय संबंध का सिद्धांत कहां से आया है?
अनुच्छेद 245(2) और उस पर आधारित निर्णयों से। राज्य का कानून राज्य के बाहर के व्यक्ति या वस्तु पर लागू हो सकता है, यदि राज्य से संबंध वास्तविक और काल्पनिक नहीं हो तथा देयता उस संबंध से जुड़ी हो।
स्रोत
- भारत का संविधान, अनुच्छेद 13, 245, 246 और 254 — विधायी विभाग, विधि और न्याय मंत्रालय
- भारत का संविधान सिद्धांत और व्यवहार, कक्षा 11 राजनीति विज्ञान — एनसीईआरटी





