सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय और सिद्धांत
परीक्षा के लिए सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णयों के नोट्स: केशवानंद भारती, गोलकनाथ, मिनर्वा मिल्स, मेनका गांधी, इंद्रा साहनी और पुट्टस्वामी।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 6 मिनट

भारतीय संवैधानिक विधि का बड़ा हिस्सा संविधान में लिखा नहीं है, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय ने मुकदमों का निर्णय करते समय घोषित किया है। अनुच्छेद 141 के अनुसार उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि भारत के सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी है, इसलिए एक ही निर्णय किसी अनुच्छेद का अर्थ प्रत्येक नागरिक के लिए बदल देता है। इसी कारण परीक्षक लगभग बीस निर्णयों का एक निश्चित समूह पूछते हैं: मुकदमे का नाम, वर्ष, संबंधित अनुच्छेद और न्यायालय द्वारा दिया गया सिद्धांत। यह नोट उन निर्णयों को उनके विषय के अनुसार क्रम में रखता है।
परीक्षा में यह विषय क्यों पूछा जाता है
इस विषय के प्रश्न लगभग सदैव मिलान के प्रश्न होते हैं। प्रश्नपत्र किसी मुकदमे का नाम देकर सिद्धांत पूछता है, या सिद्धांत देकर मुकदमा पूछता है, अथवा यह पूछता है कि किस निर्णय ने किस संशोधन को अवैध ठहराया। दूसरा प्रिय प्रारूप शृंखला है: कोई निर्णय संसद की शक्ति सीमित करता है, संसद संशोधन से उत्तर देती है, और न्यायालय उस संशोधन की भी परीक्षा करता है। गोलकनाथ के बाद चौबीसवां संशोधन, और केशवानंद भारती के बाद बयालीसवां संशोधन तथा मिनर्वा मिल्स, ये दो शृंखलाएँ पूरी तरह याद रखने योग्य हैं।
संशोधन की शक्ति: शंकरी प्रसाद से आई आर कोएलो तक
शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ (1951) में न्यायालय ने कहा कि संविधान संशोधन अनुच्छेद 13 के अर्थ में साधारण विधि नहीं है, इसलिए पहला संशोधन वैध है। सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य (1965) ने वही मत दोहराया। आई सी गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967) में ग्यारह न्यायाधीशों की पीठ ने छह के विरुद्ध पाँच के बहुमत से यह मत पलट दिया, संशोधन को अनुच्छेद 13 के अंतर्गत विधि माना, मूल अधिकारों में कटौती को निषिद्ध किया और भावी अभिभावी निर्णय का सिद्धांत लागू किया। संसद ने चौबीसवें संशोधन से उत्तर दिया। विवाद का निपटारा केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य में हुआ, जो 24 अप्रैल 1973 को तेरह न्यायाधीशों की सबसे बड़ी पीठ द्वारा सात के विरुद्ध छह के बहुमत से तय हुआ: संसद संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, परंतु उसके आधारभूत ढाँचे को क्षति नहीं पहुँचा सकती। इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण (1975) ने इसी सिद्धांत से उनतालीसवें संशोधन का वह उपबंध रद्द किया जिसने प्रधानमंत्री के निर्वाचन को न्यायिक परीक्षण से बाहर किया था। मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980) ने बयालीसवें संशोधन के वे उपबंध रद्द किए जिन्होंने संशोधनों को न्यायिक पुनर्विलोकन से मुक्त कर दिया था, और कहा कि न्यायिक पुनर्विलोकन तथा मूल अधिकारों और नीति निदेशक तत्वों का संतुलन आधारभूत ढाँचे का अंग है। वामन राव बनाम भारत संघ (1981) ने नवीं अनुसूची में रखे कानूनों के लिए 24 अप्रैल 1973 की कट ऑफ तिथि नियत की, और आई आर कोएलो बनाम तमिलनाडु राज्य (2007) ने पुष्टि की कि इस तिथि के बाद उस अनुसूची में जोड़े गए कानून आधारभूत ढाँचे की कसौटी पर जाँचे जा सकते हैं।
अनुच्छेद 21 और वैयक्तिक स्वतंत्रता
ए के गोपालन बनाम मद्रास राज्य (1950) में न्यायालय ने अनुच्छेद 21 का संकुचित अर्थ लिया: किसी वैध विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया पर्याप्त मानी गई। पासपोर्ट जब्त किए जाने से जुड़े मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) ने यह अर्थ समाप्त कर दिया। अब प्रक्रिया न्यायपूर्ण, उचित और युक्तियुक्त होनी चाहिए, और अनुच्छेद 14, 19 तथा 21 को स्वर्ण त्रिकोण के रूप में साथ पढ़ा जाता है। बाद की पीठों ने अनुच्छेद 21 में विषयवस्तु भरी: हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य (1979) में निःशुल्क विधिक सहायता और शीघ्र विचारण, ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे नगर निगम (1985) में जीविका का अधिकार, एम सी मेहता बनाम भारत संघ (1987) में संकटपूर्ण उद्योग के लिए पूर्ण दायित्व, डी के बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997) में गिरफ्तारी के सुरक्षा उपाय, और के एस पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) में निजता का मूल अधिकार, जो नौ न्यायाधीशों ने सर्वसम्मति से तय किया। श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66क को अभिव्यक्ति पर अनुचित प्रतिबंध मानकर रद्द किया।
समता, आरक्षण और सामाजिक सुधार
मद्रास राज्य बनाम चंपकम दोराईराजन (1951) ने महाविद्यालय प्रवेश में जाति आधारित आरक्षण रद्द किया और पहले संशोधन का मार्ग खोला, जिसने अनुच्छेद 15(4) जोड़ा। इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) ने अन्य पिछड़े वर्गों का आरक्षण मान्य रखा, पचास प्रतिशत की सीमा नियत की और क्रीमी लेयर को बाहर रखा। एम नागराज बनाम भारत संघ (2006) ने शर्तों के साथ पदोन्नति में आरक्षण मान्य किया। मोहिनी जैन (1992) और उन्नी कृष्णन (1993) ने शिक्षा को जीवन के अधिकार का अंग बनाया, जिसे बाद में छियासीवें संशोधन ने अनुच्छेद 21क में लिख दिया। मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम (1985) ने तलाकशुदा मुस्लिम महिला को दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत भरण पोषण दिलाया, विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997) ने कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न के विरुद्ध दिशानिर्देश दिए जो 2013 में अधिनियम बने, और शायरा बानो बनाम भारत संघ (2017) ने तत्काल तीन तलाक को अपास्त किया।
न्यायपालिका और उसकी नियुक्तियाँ
एस पी गुप्ता बनाम भारत संघ (1981), यानी प्रथम न्यायाधीश मामला, ने वाद लाने के अधिकार को भी विस्तृत किया और जनहित याचिका का द्वार खोला। द्वितीय न्यायाधीश मामला (1993) ने कॉलेजियम बनाया और तृतीय न्यायाधीश मामला (1998), जो अनुच्छेद 143 के अंतर्गत परामर्शी मत था, उसकी संरचना तय की। चतुर्थ न्यायाधीश मामला (2015) ने निन्यानबेवां संशोधन और राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग रद्द कर दिया और कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता आधारभूत ढाँचे का अंग है। एस आर बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) ने अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन को न्यायिक पुनर्विलोकन के दायरे में लाया और सदन के पटल को बहुमत की कसौटी बनाया।
मुकदमा, वर्ष और सिद्धांत एक दृष्टि में
| मुकदमा | वर्ष | दिया गया सिद्धांत |
|---|---|---|
| शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ | 1951 | संशोधन अनुच्छेद 13 के अंतर्गत विधि नहीं |
| चंपकम दोराईराजन | 1951 | पहला संशोधन और अनुच्छेद 15(4) का कारण |
| बेरुबाड़ी संघ | 1960 | उद्देशिका संविधान का भाग नहीं |
| आई सी गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य | 1967 | मूल अधिकार असंशोधनीय; भावी अभिभावी निर्णय |
| केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य | 1973 | आधारभूत ढाँचा सिद्धांत; उद्देशिका संविधान का भाग |
| मेनका गांधी बनाम भारत संघ | 1978 | अनुच्छेद 21 में उचित प्रक्रिया |
| मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ | 1980 | न्यायिक पुनर्विलोकन आधारभूत ढाँचे का अंग |
| इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ | 1992 | पचास प्रतिशत सीमा; क्रीमी लेयर बाहर |
| एस आर बोम्मई बनाम भारत संघ | 1994 | अनुच्छेद 356 पर न्यायिक पुनर्विलोकन; शक्ति परीक्षण |
| विशाखा बनाम राजस्थान राज्य | 1997 | कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न के दिशानिर्देश |
| चतुर्थ न्यायाधीश मामला | 2015 | एन जे ए सी और निन्यानबेवां संशोधन रद्द |
| के एस पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ | 2017 | निजता अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मूल अधिकार |
इस विषय को कैसे दोहराएँ
- मुकदमे को उसके वर्ष और एक पंक्ति के सिद्धांत के साथ याद करें; प्रश्नपत्र इससे अधिक कम ही पूछता है।
- दोनों शृंखलाएँ तैयार रखें: गोलकनाथ से चौबीसवां संशोधन और केशवानंद, तथा केशवानंद से बयालीसवां संशोधन और मिनर्वा मिल्स।
- पीठों की संख्या याद रखें जो पूछी जाती है: केशवानंद में तेरह, गोलकनाथ में ग्यारह, पुट्टस्वामी में नौ।
- ध्यान रखें कि कौन से निर्णय बाद में कानून बने, जैसे विशाखा 2013 में और शायरा बानो 2019 में।
परीक्षा की दृष्टि से
परीक्षक सबसे अधिक मुकदमे और सिद्धांत का मिलान पूछते हैं: किस मुकदमे ने आधारभूत ढाँचा दिया, किसने अनुच्छेद 21 का विस्तार किया, किसने आरक्षण पर पचास प्रतिशत की सीमा नियत की, किसने एन जे ए सी रद्द किया। दूसरा प्रारूप संशोधन शृंखला है, जिसमें प्रश्न संशोधन का नाम देकर पूछता है कि किस निर्णय ने उसे सीमित या रद्द किया। जाल मिलती जुलती जोड़ियों में है: शंकरी प्रसाद और गोलकनाथ अनुच्छेद 13 पर विपरीत मत रखते हैं; बेरुबाड़ी और केशवानंद उद्देशिका पर भिन्न हैं; ए के गोपालन और मेनका गांधी अनुच्छेद 21 पर भिन्न हैं। पीठ की संख्या और वर्ष सीधे पूछे जाते हैं, इसलिए केशवानंद के लिए तेरह न्यायाधीश और 1973, तथा पुट्टस्वामी के लिए नौ न्यायाधीश और 2017 पक्का याद रखें।
महत्वपूर्ण तथ्य
| आधारभूत ढाँचा सिद्धांत | केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973), तेरह न्यायाधीशों की पीठ, 7:6 का निर्णय |
|---|---|
| मूल अधिकार असंशोधनीय माने गए | आई सी गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967), ग्यारह न्यायाधीश, 6:5 |
| अनुच्छेद 21 में उचित प्रक्रिया | मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) |
| न्यायिक पुनर्विलोकन आधारभूत ढाँचा | मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980) |
| नवीं अनुसूची की कट ऑफ तिथि | 24 अप्रैल 1973, वामन राव बनाम भारत संघ (1981) में नियत |
| आरक्षण सीमा और क्रीमी लेयर | इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) |
| अनुच्छेद 356 पुनर्विलोकन योग्य | एस आर बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) |
| कार्यस्थल उत्पीड़न दिशानिर्देश | विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997); अधिनियम 2013 में बना |
| एन जे ए सी रद्द | चतुर्थ न्यायाधीश मामला (2015), निन्यानबेवें संशोधन के साथ |
| निजता का अधिकार | के एस पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017), नौ न्यायाधीश, सर्वसम्मत |
| निर्णयों की बाध्यकारी शक्ति | अनुच्छेद 141: उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
संविधान के आधारभूत ढाँचे का सिद्धांत सर्वोच्च न्यायालय ने किस मुकदमे में दिया?
- A.गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य
- B.केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य
- C.मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ
- D.शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ
उत्तर देखें
यह निर्णय 24 अप्रैल 1973 को तेरह न्यायाधीशों की पीठ ने दिया, जो उच्चतम न्यायालय की अब तक की सबसे बड़ी पीठ थी, और सात के विरुद्ध छह के बहुमत ने कहा कि संसद संविधान के किसी भी उपबंध में संशोधन कर सकती है, परंतु उसके आधारभूत ढाँचे को क्षति…
पूरी व्याख्या पढ़ें →किस मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संविधान संशोधन अनुच्छेद 13 के अर्थ में विधि है और मूल अधिकारों में कटौती नहीं की जा सकती?
- A.सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य
- B.आई सी गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य
- C.वामन राव बनाम भारत संघ
- D.आई आर कोएलो बनाम तमिलनाडु राज्य
उत्तर देखें
वर्ष 1967 में ग्यारह न्यायाधीशों की पीठ ने छह के विरुद्ध पाँच के बहुमत से कहा कि संविधान संशोधन अनुच्छेद 13 के प्रयोजन से विधि है, इसलिए संसद मूल अधिकारों में कटौती नहीं कर सकती, और पुराने संशोधनों को बचाने के लिए भावी अभिभावी निर्णय का सिद्धांत लागू किया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) का निर्णय मुख्य रूप से किस अनुच्छेद के विस्तार के लिए जाना जाता है?
- A.अनुच्छेद 19
- B.अनुच्छेद 21
- C.अनुच्छेद 32
- D.अनुच्छेद 368
उत्तर देखें
यह मुकदमा पासपोर्ट जब्त किए जाने से उठा था और न्यायालय ने कहा कि जिस प्रक्रिया से राज्य प्राण या वैयक्तिक स्वतंत्रता छीनता है वह न्यायपूर्ण, उचित और युक्तियुक्त होनी चाहिए, जिससे अनुच्छेद 21 में उचित प्रक्रिया का सार आ गया और 1950 के ए के गोपालन का संकुचित मत…
पूरी व्याख्या पढ़ें →मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980) में सर्वोच्च न्यायालय ने किस संविधान संशोधन द्वारा जोड़े गए उपबंध रद्द किए?
- A.चौबीसवां संशोधन
- B.उनतालीसवां संशोधन
- C.बयालीसवां संशोधन
- D.चौवालीसवां संशोधन
उत्तर देखें
इस संशोधन ने अनुच्छेद 368 में यह जोड़ा था कि किसी संशोधन को किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती और संशोधन शक्ति पर कोई सीमा नहीं है; न्यायालय ने वे उपबंध शून्य ठहराए क्योंकि न्यायिक पुनर्विलोकन तथा मूल अधिकारों और नीति निदेशक तत्वों का संतुलन आधारभूत ढाँचे का…
पूरी व्याख्या पढ़ें →राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग और निन्यानबेवां संविधान संशोधन सर्वोच्च न्यायालय ने किस वर्ष रद्द किया?
- A.2013
- B.2014
- C.2015
- D.2017
उत्तर देखें
चतुर्थ न्यायाधीश मामले के नाम से प्रसिद्ध इस निर्णय में न्यायालय ने चार के विरुद्ध एक के बहुमत से कहा कि यह आयोग कार्यपालिका को न्यायाधीशों की नियुक्ति में प्रभाव देगा, न्यायपालिका की स्वतंत्रता आधारभूत ढाँचे का अंग है, और इसलिए कॉलेजियम व्यवस्था पुनर्जीवित हो गई।
पूरी व्याख्या पढ़ें →आरक्षण पर पचास प्रतिशत की सीमा और क्रीमी लेयर को बाहर रखने का सिद्धांत किस निर्णय में दिया गया?
- A.मद्रास राज्य बनाम चंपकम दोराईराजन
- B.इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ
- C.एम नागराज बनाम भारत संघ
- D.मोहिनी जैन बनाम कर्नाटक राज्य
उत्तर देखें
नौ न्यायाधीशों की पीठ ने 1992 में केंद्रीय सेवाओं में अन्य पिछड़े वर्गों के आरक्षण को मान्य रखा, कुल आरक्षण पर सामान्यतः पचास प्रतिशत की सीमा नियत की और निर्देश दिया कि पिछड़े वर्गों में संपन्न लोग, यानी क्रीमी लेयर, बाहर रखे जाएँ।
पूरी व्याख्या पढ़ें →निजता को अनुच्छेद 21 से निकलने वाला मूल अधिकार किस मुकदमे में घोषित किया गया?
- A.श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ
- B.डी के बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य
- C.के एस पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ
- D.ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे नगर निगम
उत्तर देखें
नौ न्यायाधीशों की पीठ ने 2017 में सर्वसम्मति से कहा कि निजता का अधिकार अनुच्छेद 21 के प्राण और वैयक्तिक स्वतंत्रता तथा भाग तीन की स्वतंत्रताओं में अंतर्निहित है, और एम पी शर्मा तथा खड़क सिंह मामलों के पुराने मत को पलट दिया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →वर्ष 1997 के विशाखा निर्णय ने किस विषय पर दिशानिर्देश दिए?
- A.किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी के समय पालन किए जाने वाले सुरक्षा उपाय
- B.कार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न
- C.विचाराधीन कैदियों की रिहाई
- D.औद्योगिक प्रदूषण के लिए प्रतिकर
उत्तर देखें
विशाखा बनाम राजस्थान राज्य में न्यायालय ने इस विषय पर कोई कानून न होने के कारण नियोजकों के लिए बाध्यकारी दिशानिर्देश बनाए, जिनमें शिकायत समितियाँ भी थीं, और ये दिशानिर्देश तब तक लागू रहे जब तक संसद ने 2013 में उत्पीड़न के निवारण, प्रतिषेध और प्रतितोष का अधिनियम नहीं बनाया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →एस आर बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) में सर्वोच्च न्यायालय ने मुख्यतः किस अनुच्छेद के प्रयोग पर विचार किया?
- A.अनुच्छेद 352
- B.अनुच्छेद 356
- C.अनुच्छेद 360
- D.अनुच्छेद 365
उत्तर देखें
नौ न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा न्यायिक पुनर्विलोकन के योग्य है, जिस सामग्री पर वह आधारित है वह सुसंगत होनी चाहिए, और सरकार का बहुमत राज्यपाल के प्रतिवेदन से आँकने के बजाय विधानसभा के पटल पर परखा जाना चाहिए।
पूरी व्याख्या पढ़ें →नवीं अनुसूची में रखे कानूनों को मिलने वाले संरक्षण के लिए 24 अप्रैल 1973 की कट ऑफ तिथि किस निर्णय ने नियत की?
- A.वामन राव बनाम भारत संघ
- B.इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण
- C.एस पी गुप्ता बनाम भारत संघ
- D.बेरुबाड़ी संघ मामला
उत्तर देखें
वर्ष 1981 के इस निर्णय ने कहा कि 24 अप्रैल 1973, अर्थात केशवानंद भारती निर्णय के दिन, से पहले नवीं अनुसूची में रखे कानून संरक्षित रहेंगे, जबकि उसके बाद जोड़े गए कानूनों की आधारभूत ढाँचे को क्षति के आधार पर जाँच हो सकती है, और यही मत 2007 में आई…
पूरी व्याख्या पढ़ें →अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
आधारभूत ढाँचे का सिद्धांत किस मुकदमे में दिया गया?
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य में, जो 24 अप्रैल 1973 को तेरह न्यायाधीशों की पीठ ने सात के विरुद्ध छह के बहुमत से तय किया। इसमें कहा गया कि संसद संविधान के किसी उपबंध में संशोधन कर सकती है, परंतु उसके आधारभूत ढाँचे को नष्ट या क्षतिग्रस्त नहीं कर सकती।
संविधान का स्वर्ण त्रिकोण क्या है?
अनुच्छेद 14, 19 और 21 को साथ पढ़ना, यह अर्थ मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) में स्थापित हुआ। अब वैयक्तिक स्वतंत्रता छीनने वाली विधि को तीनों की कसौटी पर खरा उतरना पड़ता है, अर्थात उसे न्यायपूर्ण, युक्तियुक्त और मनमानी से मुक्त होना चाहिए।
किस निर्णय ने उद्देशिका को संविधान का भाग माना?
केशवानंद भारती (1973) ने। इससे पहले बेरुबाड़ी संघ मामले (1960) में मत था कि उद्देशिका संविधान का भाग नहीं है; केशवानंद के बहुमत ने इसे भाग माना और कहा कि उपबंधों का अर्थ निकालने में इसका उपयोग किया जा सकता है।
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग क्यों रद्द हुआ?
चतुर्थ न्यायाधीश मामले (2015) में न्यायालय ने कहा कि निन्यानबेवां संशोधन और उससे बना आयोग कार्यपालिका को न्यायिक नियुक्तियों में प्रभाव देगा, और न्यायपालिका की स्वतंत्रता आधारभूत ढाँचे का अंग है, इसलिए दोनों अवैध ठहराए गए।
किस निर्णय को पहली जनहित याचिका कहा जाता है?
हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य (1979) को सामान्यतः पहली जनहित याचिका कहा जाता है, जिसमें विचाराधीन कैदी रिहा हुए और शीघ्र विचारण को अनुच्छेद 21 का अंग माना गया। इसके बाद एस पी गुप्ता (1981) ने वाद लाने के अधिकार का विस्तार किया।
स्रोत
- भारत का संविधान, यथासंशोधित — विधायी विभाग, विधि और न्याय मंत्रालय
- भारत का संविधान सिद्धांत और व्यवहार (कक्षा ग्यारह), न्यायपालिका अध्याय — एनसीईआरटी
- उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ के प्रतिवेदित निर्णय — भारत का उच्चतम न्यायालय





