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GK नोट्सभारतीय राजव्यवस्थादल-बदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची)

दल-बदल विरोधी कानून: दसवीं अनुसूची, आधार और प्रश्न

परीक्षाओं के लिए दल-बदल विरोधी कानून के नोट्स: दसवीं अनुसूची, 52वां और 91वां संशोधन, अयोग्यता के आधार, विलय, अध्यक्ष की भूमिका और प्रमुख निर्णय।

लेखक · प्रकाशित · 5 मिनट

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दल-बदल विरोधी कानून: दसवीं अनुसूची, आधार और प्रश्न — GK24 title card
दल-बदल विरोधी कानून: दसवीं अनुसूची, आधार और प्रश्न — GK24 title card

दल-बदल विरोधी कानून संविधान की दसवीं अनुसूची में दिए उन नियमों का समूह है, जिनके अंतर्गत संसद या किसी राज्य विधानमंडल का सदस्य उस दल को छोड़ने पर अपनी सदस्यता खो देता है जिसके टिकट पर वह चुना गया था। इसे संविधान (बावनवां संशोधन) अधिनियम, 1985 द्वारा जोड़ा गया, जो 1 मार्च 1985 से प्रभावी हुआ, और संविधान (इक्यानवेवां संशोधन) अधिनियम, 2003 ने इसे और कठोर बना दिया। परीक्षक इस अध्याय को हर वर्ष पूछते हैं, क्योंकि इसका प्रत्येक नियम एक ही अनुसूची के क्रमांकित पैराग्राफ में बैठा है और इसका प्रमुख निर्णय किहोतो होलोहन राजव्यवस्था के मानक पाठ्यक्रम का हिस्सा है।

यह कानून क्यों बनाया गया

1967 के आम चुनाव के बाद बड़ी संख्या में विधायकों ने दल बदले, कई बार कुछ ही सप्ताह में, और इन्हीं दल-बदलों पर अनेक राज्यों की सरकारें बनीं और गिरीं। आया राम, गया राम मुहावरा हरियाणा के विधायक गया लाल से आया, जिन्होंने पंद्रह दिन में तीन बार दल बदला था। 1967 में वाई. बी. चव्हाण की अध्यक्षता में दल-बदल पर समिति बनी, जिसने 1969 में रिपोर्ट दी, पर वर्षों तक कोई कानून नहीं बना। अंत में राजीव गांधी सरकार जनवरी 1985 में बावनवां संशोधन लाई। इसने सदस्यता की समाप्ति और अयोग्यता से जुड़े अनुच्छेद 101, 102, 190 और 191 में संशोधन किया और संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी।

दसवीं अनुसूची: पैराग्राफ के अनुसार

पैराग्राफविषयआज की स्थिति
1परिभाषाएं: सदन, विधानमंडल दल, मूल राजनीतिक दलप्रभावी
2दल-बदल के आधार पर अयोग्यता के आधारप्रभावी
3विधानमंडल दल के एक-तिहाई सदस्यों के विभाजन को छूट91वें संशोधन, 2003 द्वारा हटाया गया
4दो-तिहाई सदस्यों की सहमति से हुए विलय को छूटप्रभावी
5अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सभापति और उपसभापति को छूटप्रभावी
6अयोग्यता का प्रश्न सभापति या अध्यक्ष तय करता हैप्रभावी
7न्यायालयों की अधिकारिता पर रोककिहोतो होलोहन, 1992 में अवैध घोषित
8सभापति या अध्यक्ष की नियम बनाने की शक्तिप्रभावी

अयोग्यता के आधार

पैराग्राफ 2 तीन स्थितियां बताता है, और इनमें से किसी में आने वाला सदस्य सदन का सदस्य नहीं रह जाता।

  • किसी राजनीतिक दल का सदस्य यदि स्वेच्छा से उस दल की सदस्यता छोड़ देता है तो वह अयोग्य हो जाता है। उच्चतम न्यायालय ने रवि एस. नायक बनाम भारत संघ, 1994 में कहा कि ये शब्द औपचारिक त्यागपत्र से अधिक व्यापक हैं और आचरण से भी सदस्यता छोड़ना निकाला जा सकता है, जैसे विरोधी दल के लिए खुलेआम प्रचार करना।
  • दल के निर्देश, जिसे सामान्यतः व्हिप कहते हैं, के विरुद्ध सदन में मत देने या मतदान से अनुपस्थित रहने पर सदस्य अयोग्य होता है। इसमें एक बचाव है: यदि पूर्व अनुमति ले ली गई हो, या दल मतदान के पंद्रह दिन के भीतर उस कृत्य को क्षमा कर दे, तो सदस्य बच जाता है।
  • निर्दलीय सदस्य यदि चुनाव के बाद किसी दल में शामिल होता है तो वह अयोग्य हो जाता है। मनोनीत सदस्य स्थान ग्रहण करने के छह माह के भीतर किसी दल में शामिल हो सकता है, पर छह माह बाद शामिल होने पर अयोग्यता आती है।

दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अयोग्यता दोबारा चुनाव लड़ने पर रोक नहीं है। सदस्य उसी उपचुनाव में खड़ा हो सकता है, और इसी कारण इस कानून को कमजोर रोक कहकर आलोचना की जाती है।

विलय और 91वें संशोधन का परिवर्तन

पैराग्राफ 4 वास्तविक विलय को संरक्षण देता है। यदि किसी विधानमंडल दल के दो-तिहाई से कम नहीं सदस्य अपने मूल दल के किसी अन्य दल में विलय पर सहमत हों, तो न जाने वाले सदस्य अयोग्य होते हैं और न पीछे रह जाने वाले। 2003 तक पैराग्राफ 3 विधानमंडल दल के एक-तिहाई सदस्यों के विभाजन को वही संरक्षण देता था, और इसका लाभ लेने के लिए सामूहिक दल-बदल को विभाजन का रूप दे दिया जाता था। इक्यानवेवां संशोधन उस पैराग्राफ को पूरी तरह हटा दिया, इसलिए अब विभाजन कोई संरक्षण नहीं देता। उसी संशोधन ने अनुच्छेद 75(1क) और 164(1क) जोड़े, जो मंत्रिपरिषद को लोक सभा या विधान सभा की कुल सदस्य संख्या के पंद्रह प्रतिशत तक सीमित करते हैं, और राज्य में न्यूनतम बारह मंत्री रखते हैं। अनुच्छेद 75(1ख) और 164(1ख) दल-बदल के कारण अयोग्य सदस्य को पुनः निर्वाचित होने तक या कार्यकाल पूरा होने तक मंत्री बनने से रोकते हैं, और नया अनुच्छेद 361ख उसी अवधि के लिए उसे किसी लाभप्रद राजनीतिक पद से बाहर रखता है।

निर्णय कौन करता है और न्यायालय की भूमिका

पैराग्राफ 6 के अनुसार यह प्रश्न कि कोई सदस्य अयोग्य हुआ है या नहीं, संबंधित सदन का सभापति या अध्यक्ष तय करता है और उसका निर्णय अंतिम होता है। यहां निर्वाचन आयोग की कोई भूमिका नहीं है, जबकि अनुच्छेद 102 और 191 के अंतर्गत लाभ के पद वाली अयोग्यता में राष्ट्रपति या राज्यपाल आयोग की राय पर कार्य करते हैं। पैराग्राफ 7 मूल रूप से हर न्यायालय को इस विषय से दूर रखता था, पर किहोतो होलोहन बनाम जाचिल्हू, 1992 में उच्चतम न्यायालय ने अनुसूची को वैध ठहराते हुए पैराग्राफ 7 को अवैध घोषित कर दिया, क्योंकि उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता छीनने के लिए अनुच्छेद 368(2) के अंतर्गत राज्यों का अनुसमर्थन आवश्यक था। न्यायालय ने कहा कि अध्यक्ष अधिकरण के रूप में कार्य करता है और उसका निर्णय दुर्भावना, विकृतता या नैसर्गिक न्याय के उल्लंघन के आधार पर न्यायिक पुनरीक्षण के लिए खुला है, किंतु निर्णय से पहले नहीं। कीशम मेघचंद्र सिंह बनाम मणिपुर विधान सभा अध्यक्ष, 2020 में न्यायालय ने कहा कि अध्यक्ष को दल-बदल की याचिका सामान्यतः तीन माह में तय करनी चाहिए, और सुझाव दिया कि संसद यह कार्य किसी स्वतंत्र अधिकरण को देने पर विचार करे। 1990 की दिनेश गोस्वामी समिति और विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट ने पहले ही कहा था कि अयोग्यता केवल विश्वास प्रस्ताव, अविश्वास प्रस्ताव या धन विधेयक पर मतदान तक सीमित रहे।

परीक्षा की दृष्टि से

प्रश्न चार रूपों में आते हैं। पहला, सीधा स्मरण: दसवीं अनुसूची और बावनवां संशोधन, 1985, जिसमें इक्यानवेवां संशोधन, 2003 विकल्प के रूप में रखा जाता है। दूसरा, संख्याएं: विलय के लिए दो-तिहाई, हटाई गई एक-तिहाई विभाजन छूट, क्षमा के पंद्रह दिन, मनोनीत सदस्य के छह माह, और मंत्रिपरिषद के पंद्रह प्रतिशत। तीसरा, प्राधिकार: निर्णय अध्यक्ष या सभापति करता है, न निर्वाचन आयोग और न राष्ट्रपति, तथा किहोतो होलोहन में केवल पैराग्राफ 7 अवैध हुआ, शेष अनुसूची बनी रही। चौथा, कथन आधारित प्रश्न, जिनमें सामान्य जाल विभाजन को संरक्षित बताना या यह कहना है कि अध्यक्ष का निर्णय किसी भी दशा में पुनरीक्षणीय नहीं है।

महत्वपूर्ण तथ्य

अनुसूचीसंविधान की दसवीं अनुसूची
किसने जोड़ासंविधान (बावनवां संशोधन) अधिनियम, 1985; 1 मार्च 1985 से प्रभावी
1985 में संशोधित अनुच्छेदअनुच्छेद 101, 102, 190 और 191
विलय की छूटपैराग्राफ 4; विधानमंडल दल के दो-तिहाई सदस्यों की सहमति आवश्यक
विभाजन की छूटपैराग्राफ 3, एक-तिहाई; 91वें संशोधन, 2003 द्वारा हटाई गई
व्हिप उल्लंघन में बचावपूर्व अनुमति, या दल द्वारा पंद्रह दिन में क्षमा
निर्णय करने वाला प्राधिकारीपैराग्राफ 6 के अंतर्गत सदन का सभापति या अध्यक्ष
प्रमुख निर्णयकिहोतो होलोहन बनाम जाचिल्हू, 1992; पैराग्राफ 7 अवैध घोषित
तीन माह का मार्गदर्शनकीशम मेघचंद्र सिंह बनाम मणिपुर विधान सभा अध्यक्ष, 2020
मंत्रियों की सीमाअनुच्छेद 75(1क) और 164(1क): सदन के पंद्रह प्रतिशत, राज्य में न्यूनतम बारह
पद पर रोक91वें संशोधन द्वारा जोड़े गए अनुच्छेद 75(1ख), 164(1ख) और 361ख
मनोनीत सदस्यस्थान ग्रहण करने के छह माह के भीतर दल में शामिल हो सकता है

इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ

Q1.भारतीय राजव्यवस्थाआसान

भारत के संविधान की किस अनुसूची में दल-बदल विरोधी कानून दिया गया है?

  1. A.नौवीं अनुसूची
  2. B.दसवीं अनुसूची
  3. C.ग्यारहवीं अनुसूची
  4. D.बारहवीं अनुसूची
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. दसवीं अनुसूची

व्याख्या

सही उत्तर B, दसवीं अनुसूची है। दसवीं अनुसूची संविधान (बावनवां संशोधन) अधिनियम, 1985 द्वारा जोड़ी गई थी और वही बताती है कि संसद या राज्य विधानमंडल का सदस्य दल-बदल पर किन आधारों पर अयोग्य होता है, विलय को कब छूट मिलती है, पीठासीन अधिकारियों को क्या संरक्षण है और प्रश्न का निर्णय कौन करता है।

विकल्प A, नौवीं अनुसूची पहले संशोधन, 1951 से जुड़ी और उसमें अधिकतर भूमि सुधार कानून रखे गए, जिन्हें मूल अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर चुनौती से संरक्षण मिला, किंतु आई. आर. कोएल्हो मामले के बाद वह आधारभूत ढांचे की कसौटी के अधीन है। विकल्प C, ग्यारहवीं अनुसूची 73वें संशोधन, 1992 से आई और पंचायतों के उनतीस विषय देती है। विकल्प D, बारहवीं अनुसूची 74वें संशोधन, 1992 से आई और नगरपालिकाओं के अठारह विषय देती है। दल-बदल केवल दसवीं अनुसूची का विषय है।

Q2.भारतीय राजव्यवस्थाआसान

दल-बदल विरोधी कानून वाली दसवीं अनुसूची संविधान में किस संशोधन द्वारा जोड़ी गई?

  1. A.चवालीसवां संशोधन, 1978
  2. B.बावनवां संशोधन, 1985
  3. C.इकसठवां संशोधन, 1989
  4. D.इक्यानवेवां संशोधन, 2003
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. बावनवां संशोधन, 1985

व्याख्या

सही उत्तर B, बावनवां संशोधन, 1985 है। उस संशोधन ने दसवीं अनुसूची जोड़ी और अनुच्छेद 101, 102, 190 तथा 191 में संशोधन किया, जो सदस्यता की समाप्ति और सदस्यों की अयोग्यता से संबंधित हैं। यह 1 मार्च 1985 से प्रभावी हुआ।

विकल्प A, चवालीसवां संशोधन, 1978 ने बयालीसवें संशोधन के बहुत से प्रावधान पलटे: उसने लोक सभा का कार्यकाल पांच वर्ष किया, संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकारों से हटाया और आपात उद्घोषणा की शर्तें कठोर कीं। विकल्प C, इकसठवां संशोधन, 1989 ने मताधिकार की आयु इक्कीस से अठारह वर्ष की। विकल्प D, इक्यानवेवां संशोधन, 2003 ने अनुसूची जोड़ी नहीं, बल्कि उसमें संशोधन किया, विभाजन की छूट हटाई और मंत्रिपरिषद का आकार सदन के पंद्रह प्रतिशत तक सीमित किया, इसलिए वह इस प्रश्न का सबसे सामान्य जाल है। याद रखने का सरल सूत्र यह है कि दसवीं अनुसूची 1985 में आई और 2003 में कठोर हुई।

Q3.भारतीय राजव्यवस्थामध्यम

दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 4 के अंतर्गत विधानमंडल दल का विलय अयोग्यता से तभी बचता है, जब उसके कितने सदस्य सहमत हों?

  1. A.एक-तिहाई
  2. B.आधे
  3. C.दो-तिहाई
  4. D.तीन-चौथाई
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. दो-तिहाई

व्याख्या

सही उत्तर C, दो-तिहाई है। पैराग्राफ 4 कहता है कि जब किसी सदस्य का मूल राजनीतिक दल किसी अन्य दल में विलीन होता है, तो सदस्य अयोग्य नहीं होगा यदि संबंधित विधानमंडल दल के दो-तिहाई से कम नहीं सदस्य उस विलय पर सहमत हो गए हों। जाने वाले सदस्य और पुराने दल के साथ रह जाने वाले सदस्य, दोनों संरक्षित रहते हैं।

विकल्प A, एक-तिहाई पैराग्राफ 3 में विभाजन के लिए दी गई संख्या थी, और उस पैराग्राफ को इक्यानवेवें संशोधन ने 2003 में हटा दिया, इसलिए अब एक-तिहाई किसी को संरक्षण नहीं देता। विकल्प B, आधे और विकल्प D, तीन-चौथाई दसवीं अनुसूची में कहीं नहीं आते। परीक्षक एक-तिहाई और दो-तिहाई को जानबूझकर साथ रखते हैं, इसलिए दोनों संख्याएं अपने पैराग्राफ के साथ याद रखनी चाहिए।

Q4.भारतीय राजव्यवस्थामध्यम

विधानमंडल दल में विभाजन की दशा में अयोग्यता से मिलने वाली छूट दसवीं अनुसूची से किस संशोधन ने हटाई?

  1. A.इकसठवां संशोधन
  2. B.तिहत्तरवां संशोधन
  3. C.छियासीवां संशोधन
  4. D.इक्यानवेवां संशोधन
उत्तर देखें
सही उत्तर: D. इक्यानवेवां संशोधन

व्याख्या

सही उत्तर D, इक्यानवेवां संशोधन है, जो 2003 में पारित हुआ। उसने दसवीं अनुसूची का पैराग्राफ 3 हटा दिया, जो विधानमंडल दल के एक-तिहाई सदस्यों के समर्थन वाले विभाजन को बचाता था। सामूहिक दल-बदल को विभाजन बताकर वही संरक्षण लिया जा रहा था, इसलिए आज केवल दो-तिहाई सहमति वाला विलय बचा है।

विकल्प A, इकसठवां संशोधन, 1989 ने मताधिकार की आयु अठारह वर्ष की। विकल्प B, तिहत्तरवां संशोधन, 1992 ने पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा दिया तथा भाग नौ और ग्यारहवीं अनुसूची जोड़ी। विकल्प C, छियासीवां संशोधन, 2002 ने अनुच्छेद 21क जोड़कर छह से चौदह वर्ष के बच्चों की नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा को मूल अधिकार बनाया। इक्यानवेवां संशोधन मंत्रिपरिषद को सदन के पंद्रह प्रतिशत तक सीमित करने और अनुच्छेद 361ख जोड़ने के लिए भी याद रखा जाता है।

Q5.भारतीय राजव्यवस्थाआसान

दसवीं अनुसूची के अंतर्गत किसी सदस्य के अयोग्य होने का प्रश्न कौन तय करता है?

  1. A.भारत के राष्ट्रपति
  2. B.भारत निर्वाचन आयोग
  3. C.संबंधित सदन का सभापति या अध्यक्ष
  4. D.भारत का उच्चतम न्यायालय
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. संबंधित सदन का सभापति या अध्यक्ष

व्याख्या

सही उत्तर C, संबंधित सदन का सभापति या अध्यक्ष है। दसवीं अनुसूची का पैराग्राफ 6 यह शक्ति पीठासीन अधिकारी को देता है, और जब प्रश्न स्वयं पीठासीन अधिकारी के बारे में हो, तो सदन द्वारा इस कार्य के लिए चुना गया सदस्य निर्णय करता है।

विकल्प A, राष्ट्रपति अनुच्छेद 102 और 103 के अंतर्गत लाभ के पद जैसे आधारों पर अयोग्यता तय करते हैं, और वहां उन्हें निर्वाचन आयोग की राय के अनुसार कार्य करना होता है। विकल्प B, निर्वाचन आयोग की दसवीं अनुसूची के मामले में कोई भूमिका नहीं है, और यही इस प्रश्न का सबसे बड़ा जाल है। विकल्प D, उच्चतम न्यायालय प्रथम दृष्टया यह प्रश्न तय नहीं करता, किंतु किहोतो होलोहन बनाम जाचिल्हू, 1992 में पैराग्राफ 7 हटने के बाद न्यायालय दुर्भावना, विकृतता या नैसर्गिक न्याय के उल्लंघन के आधार पर आदेश की पुनरीक्षा कर सकते हैं।

Q6.भारतीय राजव्यवस्थाकठिन

किहोतो होलोहन बनाम जाचिल्हू (1992) में उच्चतम न्यायालय ने दसवीं अनुसूची के किस पैराग्राफ को असंवैधानिक घोषित किया?

  1. A.पैराग्राफ 2
  2. B.पैराग्राफ 4
  3. C.पैराग्राफ 6
  4. D.पैराग्राफ 7
उत्तर देखें
सही उत्तर: D. पैराग्राफ 7

व्याख्या

सही उत्तर D, पैराग्राफ 7 है। वह पैराग्राफ अनुसूची के अंतर्गत सदस्य की अयोग्यता से जुड़े किसी भी विषय में सभी न्यायालयों की अधिकारिता पर रोक लगाता था। न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालयों और अनुच्छेद 136 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता छीनने से उनकी स्थिति बदलती है, इसलिए अनुच्छेद 368(2) के अंतर्गत आधे राज्यों के विधानमंडलों का अनुसमर्थन आवश्यक था, जो लिया नहीं गया था। इसलिए पैराग्राफ 7 गिर गया और शेष अनुसूची बनी रही।

विकल्प A, पैराग्राफ 2 दल-बदल के आधार बताता है और प्रभावी है। विकल्प B, पैराग्राफ 4 विलय की छूट देता है और वह भी बना हुआ है। विकल्प C, पैराग्राफ 6, जो पीठासीन अधिकारी को निर्णय का अधिकार देता है, वैध ठहराया गया, और न्यायालय ने कहा कि वह अधिकरण के रूप में कार्य करता है, जिसका आदेश बनने के बाद न्यायिक पुनरीक्षण के लिए खुला है।

Q7.भारतीय राजव्यवस्थामध्यम

सदन में दल के निर्देश के विरुद्ध मत देने वाला सदस्य अयोग्यता से तभी बचता है, जब दल कितने दिन में उस कृत्य को क्षमा कर दे?

  1. A.सात दिन
  2. B.पंद्रह दिन
  3. C.तीस दिन
  4. D.तीन माह
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. पंद्रह दिन

व्याख्या

सही उत्तर B, पंद्रह दिन है। दसवीं अनुसूची का पैराग्राफ 2(1)(ख) उस सदस्य को अयोग्य करता है जो दल द्वारा जारी किसी निर्देश के विरुद्ध मत देता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है, किंतु परंतुक दो दशाओं में उसे बचाता है: जब पूर्व अनुमति ले ली गई हो, और जब दल मतदान या अनुपस्थिति की तारीख से पंद्रह दिन के भीतर उस कृत्य को क्षमा कर दे।

विकल्प A, सात दिन, विकल्प C, तीस दिन और विकल्प D, तीन माह अनुसूची में नहीं हैं। तीन माह वह अवधि है जो उच्चतम न्यायालय ने कीशम मेघचंद्र सिंह बनाम मणिपुर विधान सभा अध्यक्ष, 2020 में अध्यक्ष द्वारा दल-बदल याचिका तय करने के लिए सुझाई थी, जो बिल्कुल अलग विषय है और इसी कारण यहां जाल के रूप में रखा गया है। पंद्रह दिन की खिड़की ही व्हिप उल्लंघन को क्षम्य बनाती है।

Q8.भारतीय राजव्यवस्थामध्यम

दसवीं अनुसूची के अनुसार मनोनीत सदस्य स्थान ग्रहण करने के कितने समय के भीतर किसी राजनीतिक दल में शामिल हो सकता है?

  1. A.तीन माह
  2. B.छह माह
  3. C.एक वर्ष
  4. D.मनोनीत सदस्य कभी दल में शामिल नहीं हो सकता
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. छह माह

व्याख्या

सही उत्तर B, छह माह है। पैराग्राफ 2(3) कहता है कि मनोनीत सदस्य यदि स्थान ग्रहण करने की तारीख से छह माह बीतने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है, तो वह अयोग्य हो जाएगा। उन छह माह के भीतर शामिल होना अनुमत है, इसलिए राज्य सभा के मनोनीत सदस्य के पास दल का नाम अपनाने के लिए आधे वर्ष की खिड़की होती है।

विकल्प A, तीन माह और विकल्प C, एक वर्ष अनुसूची में प्रयुक्त अवधियां नहीं हैं। विकल्प D गलत है, क्योंकि अनुसूची स्पष्ट रूप से छह माह की खिड़की में दल में शामिल होने की अनुमति देती है। सदन के लिए निर्वाचित निर्दलीय सदस्य का नियम अधिक कठोर है: पैराग्राफ 2(2) के अनुसार चुनाव के बाद किसी भी दल में शामिल होते ही वह अयोग्य हो जाता है, कोई खिड़की नहीं मिलती। परीक्षक दोनों नियम साथ रखकर भ्रम जांचते हैं।

Q9.भारतीय राजव्यवस्थाकठिन

इक्यानवेवें संशोधन, 2003 द्वारा जोड़ा गया कौन सा अनुच्छेद दल-बदल से अयोग्य सदस्य को किसी लाभप्रद राजनीतिक पद से रोकता है?

  1. A.अनुच्छेद 361क
  2. B.अनुच्छेद 361ख
  3. C.अनुच्छेद 371ज
  4. D.अनुच्छेद 350ख
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. अनुच्छेद 361ख

व्याख्या

सही उत्तर B, अनुच्छेद 361ख है। यह उपबंध करता है कि संसद या राज्य विधानमंडल के किसी सदन का सदस्य, जो दल-बदल के आधार पर अयोग्य हुआ है, अयोग्यता की तारीख से उस तारीख तक किसी लाभप्रद राजनीतिक पद से भी वंचित रहेगा जब उसका कार्यकाल समाप्त होता या वह पुनः निर्वाचित होता है, इनमें जो पहले हो।

विकल्प A, अनुच्छेद 361क चवालीसवें संशोधन, 1978 से जुड़ा और संसद तथा राज्य विधानमंडलों की कार्यवाही की सारतः सही रिपोर्ट के प्रकाशन को संरक्षण देता है। विकल्प C, अनुच्छेद 371ज 2012 में जोड़ा गया और कर्नाटक के हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र को विशेष उपबंध देता है। विकल्प D, अनुच्छेद 350ख भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी का पद बनाता है। इक्यानवेवें संशोधन ने अनुच्छेद 75(1ख) और 164(1ख) भी जोड़े, जो उसी अवधि तक दल-बदलू को मंत्री पद से रोकते हैं।

Q10.भारतीय राजव्यवस्थामध्यम

इक्यानवेवें संशोधन अधिनियम, 2003 ने मंत्रिपरिषद में मंत्रियों की कुल संख्या सदन की कुल सदस्य संख्या के कितने भाग तक सीमित की?

  1. A.दस प्रतिशत
  2. B.बारह प्रतिशत
  3. C.पंद्रह प्रतिशत
  4. D.बीस प्रतिशत
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. पंद्रह प्रतिशत

व्याख्या

सही उत्तर C, पंद्रह प्रतिशत है। अनुच्छेद 75(1क) कहता है कि प्रधानमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या लोक सभा के सदस्यों की कुल संख्या के पंद्रह प्रतिशत से अधिक नहीं होगी, और अनुच्छेद 164(1क) राज्य के लिए विधान सभा के संदर्भ में वही सीमा रखता है, जिसमें मुख्यमंत्री सहित न्यूनतम बारह मंत्री हो सकते हैं।

विकल्प A, दस प्रतिशत और विकल्प D, बीस प्रतिशत इस प्रयोजन के लिए संविधान में नहीं हैं। विकल्प B, बारह प्रतिशत प्रतिशत को संख्या बारह से मिला देता है, जो उसी खंड में राज्य की मंत्रिपरिषद का न्यूनतम आकार है, इसलिए वही सबसे आकर्षक गलत उत्तर है। यह सीमा दल-बदल संबंधी परिवर्तनों के साथ लाई गई, क्योंकि मांगने पर पद देने वाली बड़ी मंत्रिपरिषदें स्वयं दल-बदल को बढ़ावा देने का साधन बन गई थीं।

Q11.भारतीय राजव्यवस्थाकठिन

संविधान (बावनवां संशोधन) अधिनियम, 1985 ने दसवीं अनुसूची जोड़ने के साथ किन अनुच्छेदों में संशोधन किया?

  1. A.अनुच्छेद 101, 102, 190 और 191
  2. B.अनुच्छेद 102, 103, 191 और 192
  3. C.अनुच्छेद 100, 101, 189 और 190
  4. D.अनुच्छेद 105, 106, 194 और 195
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. अनुच्छेद 101, 102, 190 और 191

व्याख्या

सही उत्तर A, अनुच्छेद 101, 102, 190 और 191 है। अनुच्छेद 101 और 102 संसद की सदस्यता की समाप्ति और सदस्यता के लिए अयोग्यताओं से संबंधित हैं, और अनुच्छेद 190 तथा 191 राज्य विधानमंडलों के लिए वही कार्य करते हैं। बावनवें संशोधन ने इनमें से प्रत्येक में एक खंड जोड़ा, जिससे दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अयोग्य सदस्य का स्थान रिक्त हो जाता है।

विकल्प B में अनुच्छेद 103 और 192 गलत ढंग से आ गए हैं, जो पुराने आधारों पर अयोग्यता का प्रश्न तय करने वाले प्राधिकारी, अर्थात निर्वाचन आयोग की राय पर राष्ट्रपति और राज्यपाल, से संबंधित हैं। विकल्प C में अनुच्छेद 100 और 189 हैं, जो सदनों में मतदान और गणपूर्ति से जुड़े हैं। विकल्प D में अनुच्छेद 105, 106, 194 और 195 हैं, जो सदस्यों की शक्तियों, विशेषाधिकारों और वेतन से संबंधित हैं। केवल पहला समूह अयोग्यता और स्थान रिक्त होने का विषय है।

Q12.भारतीय राजव्यवस्थामध्यम

निम्नलिखित में से कौन संविधान की दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अयोग्यता का आधार नहीं है?

  1. A.सदस्य द्वारा स्वेच्छा से उस दल की सदस्यता छोड़ना जिसके टिकट पर वह निर्वाचित हुआ
  2. B.सदस्य द्वारा पूर्व अनुमति के बिना सदन में दल के निर्देश के विरुद्ध मत देना
  3. C.निर्दलीय सदस्य का सदन में निर्वाचित होने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होना
  4. D.सदन का अध्यक्ष चुने जाने पर सदस्य द्वारा अपने दल की सदस्यता छोड़ना
उत्तर देखें
सही उत्तर: D. सदन का अध्यक्ष चुने जाने पर सदस्य द्वारा अपने दल की सदस्यता छोड़ना

व्याख्या

सही उत्तर D है। दसवीं अनुसूची का पैराग्राफ 5 उस व्यक्ति को स्पष्ट छूट देता है, जो लोक सभा या विधान सभा का अध्यक्ष या उपाध्यक्ष, अथवा राज्य सभा या विधान परिषद का सभापति या उपसभापति चुने जाने पर अपने दल की सदस्यता छोड़ देता है, और यदि वह पद छोड़ने के बाद उसी दल में फिर शामिल हो जाए तो भी छूट बनी रहती है। यह नियम पीठ की निष्पक्षता की रक्षा करता है।

विकल्प A पैराग्राफ 2(1)(क) का पहला आधार है, और उच्चतम न्यायालय ने रवि एस. नायक बनाम भारत संघ, 1994 में कहा कि सदस्यता छोड़ना आचरण से भी निकाला जा सकता है। विकल्प B पैराग्राफ 2(1)(ख) का व्हिप आधार है, जो पूर्व अनुमति या पंद्रह दिन में क्षमा के अधीन है। विकल्प C पैराग्राफ 2(2) का निर्दलीय सदस्य वाला नियम है। तीनों आधार हैं, केवल अध्यक्ष का मामला छूट है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

संविधान की कौन सी अनुसूची में दल-बदल विरोधी कानून है?

दसवीं अनुसूची में। इसे संविधान (बावनवां संशोधन) अधिनियम, 1985 ने जोड़ा था और यह बताती है कि संसद या राज्य विधानमंडल का सदस्य दल-बदल के आधार पर कब अयोग्य होता है, प्रश्न का निर्णय कौन करता है और किन मामलों को छूट मिलती है।

91वें संविधान संशोधन ने दल-बदल विरोधी कानून में क्या बदला?

उसने पैराग्राफ 3, अर्थात विधानमंडल दल के एक-तिहाई सदस्यों के विभाजन की छूट हटा दी, इसलिए अब केवल दो-तिहाई सहमति वाला विलय संरक्षित है। उसने मंत्रिपरिषद को सदन के पंद्रह प्रतिशत तक सीमित किया और दल-बदल से अयोग्य सदस्य को मंत्री पद तथा किसी लाभप्रद राजनीतिक पद से रोक दिया।

दल-बदल पर सदस्य की अयोग्यता का निर्णय कौन करता है?

दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 6 के अंतर्गत संबंधित सदन का सभापति या अध्यक्ष। निर्वाचन आयोग की कोई भूमिका नहीं होती, जबकि अनुच्छेद 102 और 191 के लाभ के पद वाले मामले में होती है। निर्णय होने के बाद न्यायालय उसकी पुनरीक्षा कर सकते हैं, क्योंकि पैराग्राफ 7 को 1992 में अवैध घोषित किया गया।

क्या दल-बदल कानून से अयोग्य सदस्य फिर चुनाव लड़ सकता है?

हां। दसवीं अनुसूची सदस्यता छीनती है, पर दोबारा चुनाव लड़ने से नहीं रोकती, उस उपचुनाव में भी नहीं जो उसी अयोग्यता से हुआ है। किंतु 2003 के बाद ऐसा सदस्य पुनः निर्वाचित होने तक या सदन का कार्यकाल पूरा होने तक मंत्री नहीं बन सकता और कोई लाभप्रद राजनीतिक पद नहीं ले सकता।

क्या दल-बदल विरोधी कानून राज्य सभा के मतदान पर भी लागू होता है?

हां। दसवीं अनुसूची संसद के दोनों सदनों तथा राज्यों की विधान सभाओं और विधान परिषदों पर लागू होती है, और प्रत्येक दशा में उस सदन का पीठासीन अधिकारी निर्णय करता है। राज्य सभा के सदस्य का प्रश्न राज्य सभा का सभापति तय करता है।

स्रोत

  • भारत का संविधान, दसवीं अनुसूची तथा अनुच्छेद 101, 102, 190 और 191 — विधायी विभाग, विधि और न्याय मंत्रालय
  • संविधान (बावनवां संशोधन) अधिनियम, 1985 — विधायी विभाग, विधि और न्याय मंत्रालय
  • संविधान (इक्यानवेवां संशोधन) अधिनियम, 2003 — विधायी विभाग, विधि और न्याय मंत्रालय
  • भारत का संविधान: सिद्धांत और व्यवहार (कक्षा 11), विधायिका अध्याय — एनसीईआरटी
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