अधीनस्थ न्यायालय, न्यायाधिकरण और लोक अदालत: अनुच्छेद 233-237
अधीनस्थ न्यायपालिका के पूर्ण नोट्स: अनुच्छेद 233 से 237, न्यायालयों का क्रम, अनुच्छेद 323क एवं 323ख के न्यायाधिकरण, लोक अदालत, नालसा और पिछले वर्षों के प्रश्न।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 6 मिनट

उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के नीचे भारत की एकीकृत न्यायपालिका का तीसरा स्तर आता है, जिसे अधीनस्थ न्यायपालिका या जिला न्यायपालिका कहा जाता है। देश में दायर होने वाले अधिकांश मुकदमों का निर्णय यही स्तर करता है। संविधान के भाग VI, अध्याय VI में अनुच्छेद 233 से 237 तक अधीनस्थ न्यायालयों का उपबंध है। इन न्यायालयों के बोझ को घटाने के लिए दो वैधानिक संस्थाएँ साथ काम करती हैं: संविधान के भाग XIVक के अंतर्गत बने न्यायाधिकरण और विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अंतर्गत बनी लोक अदालतें। परीक्षाओं में तीनों एक साथ पूछे जाते हैं, क्योंकि इनके अनुच्छेद, नियुक्ति प्राधिकारी, नियंत्रण प्राधिकारी और प्रमुख निर्णय निश्चित और याद रखने योग्य हैं।
अनुच्छेद 233 से 237 एक दृष्टि में
| अनुच्छेद | उपबंध |
|---|---|
| 233 | जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदस्थापना और पदोन्नति राज्य का राज्यपाल उस राज्य के उच्च न्यायालय से परामर्श करके करता है। कम से कम सात वर्ष की वकालत करने वाला अधिवक्ता, जो संघ या राज्य की सेवा में न हो, उच्च न्यायालय की संस्तुति पर सीधे जिला न्यायाधीश नियुक्त किया जा सकता है। |
| 233क | जिला न्यायाधीशों की नियुक्तियों और उनके द्वारा दिए गए निर्णयों का विधिमान्यकरण; संविधान (बीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1966 द्वारा जोड़ा गया। |
| 234 | जिला न्यायाधीश से भिन्न व्यक्तियों की न्यायिक सेवा में भर्ती; राज्यपाल राज्य लोक सेवा आयोग तथा उच्च न्यायालय से परामर्श के बाद बने नियमों के अनुसार करता है। |
| 235 | अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण, जिसमें न्यायिक अधिकारियों की पदस्थापना, पदोन्नति और छुट्टी शामिल है, उच्च न्यायालय में निहित है। |
| 236 | परिभाषाएँ: जिला न्यायाधीश में नगर सिविल न्यायालय का न्यायाधीश, अपर जिला न्यायाधीश, संयुक्त जिला न्यायाधीश, सहायक जिला न्यायाधीश, लघुवाद न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश, सत्र न्यायाधीश, अपर सत्र न्यायाधीश और सहायक सत्र न्यायाधीश सम्मिलित हैं। |
| 237 | राज्यपाल को यह शक्ति कि वह लोक अधिसूचना द्वारा इन उपबंधों को मजिस्ट्रेटों के किसी वर्ग पर लागू कर सके। |
जिला न्यायपालिका का क्रम
दीवानी पक्ष में क्रम इस प्रकार है: जिला न्यायाधीश, अपर जिला न्यायाधीश, सिविल न्यायाधीश (वरिष्ठ खंड) और सिविल न्यायाधीश (कनिष्ठ खंड); बड़े नगरों में लघुवाद न्यायालय भी होते हैं। फौजदारी पक्ष में वही अधिकारी सत्र न्यायाधीश के रूप में बैठता है, जिसके नीचे अपर सत्र न्यायाधीश, सहायक सत्र न्यायाधीश, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट और द्वितीय श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट आते हैं। महानगर क्षेत्रों में इन्हें मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट और महानगर मजिस्ट्रेट कहा जाता है। जिला मजिस्ट्रेट और उपखंड मजिस्ट्रेट जैसे कार्यपालक मजिस्ट्रेट राज्य सरकार के अधीन होते हैं और निवारक तथा प्रशासनिक शक्तियाँ रखते हैं, अपराधों का विचारण नहीं करते।
- सत्र न्यायाधीश विधि द्वारा अनुमत कोई भी दंड दे सकता है, परंतु मृत्युदंड की पुष्टि उच्च न्यायालय से आवश्यक है।
- मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट सात वर्ष तक का कारावास दे सकता है।
- प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट तीन वर्ष तक और द्वितीय श्रेणी मजिस्ट्रेट एक वर्ष तक का कारावास दे सकता है।
- ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 (2 अक्टूबर 2009 से प्रवृत्त) ने मध्यवर्ती पंचायत स्तर पर चल न्यायालय बनाए, जिनकी अध्यक्षता प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के समकक्ष न्यायाधिकारी करता है और जिन्हें दीवानी तथा फौजदारी दोनों क्षेत्राधिकार प्राप्त हैं।
- विशेष न्यायालय अन्य अधिनियमों से बनते हैं: कुटुंब न्यायालय अधिनियम 1984, वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम 2015, त्वरित न्यायालय और पॉक्सो विशेष न्यायालय।
न्यायाधिकरण: अनुच्छेद 323क और 323ख
भाग XIVक, जिसका शीर्षक न्यायाधिकरण है, स्वर्ण सिंह समिति की संस्तुति पर संविधान (बयालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया। इसमें केवल दो अनुच्छेद हैं और इनका अंतर परीक्षा का प्रिय प्रश्न है।
| बिंदु | अनुच्छेद 323क | अनुच्छेद 323ख |
|---|---|---|
| कानून बनाने की शक्ति | केवल संसद | संसद तथा राज्य विधानमंडल दोनों |
| विषय | केवल लोक सेवा संबंधी विवाद | कराधान, विदेशी मुद्रा, औद्योगिक और श्रम विवाद, भूमि सुधार, नगरीय संपत्ति की उच्चतम सीमा, संसद और विधानमंडलों के निर्वाचन, खाद्य सामग्री, किराया और अभिधृति अधिकार |
| पदानुक्रम | संघ के लिए एक तथा प्रत्येक राज्य या राज्य समूह के लिए एक न्यायाधिकरण; पदानुक्रम नहीं | न्यायाधिकरणों का पदानुक्रम अनुमत है |
अनुच्छेद 323क के अधीन संसद ने प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 पारित किया और केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण 1 नवंबर 1985 को अस्तित्व में आया, जिसकी प्रधान पीठ नई दिल्ली में है। रक्षा बलों के सदस्य, उच्चतम न्यायालय के अधिकारी तथा कर्मचारी और संसद के सचिवीय कर्मचारी इसके क्षेत्राधिकार से बाहर हैं। एल. चंद्र कुमार बनाम भारत संघ (1997) में सात न्यायाधीशों की पीठ ने अनुच्छेद 323क(2)(घ) और 323ख(3)(घ) को, जो उच्च न्यायालयों की रिट अधिकारिता को हटाते थे, असंवैधानिक घोषित किया और कहा कि न्यायाधिकरण उच्च न्यायालयों के पूरक हैं, विकल्प नहीं; न्यायाधिकरण के विरुद्ध अपील उच्च न्यायालय की खंडपीठ में होगी। इससे पहले एस. पी. संपत कुमार वाद (1987) ने अधिनियम को वैध ठहराया था। अधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 ने कई अपीलीय अधिकरण समाप्त किए और पद की अवधि चार वर्ष, नियुक्ति के लिए न्यूनतम आयु पचास वर्ष तथा अध्यक्ष के लिए सत्तर और सदस्य के लिए सरसठ वर्ष की सेवानिवृत्ति आयु निर्धारित की।
प्रमुख न्यायाधिकरण
| न्यायाधिकरण | वर्ष | विशेष |
|---|---|---|
| आयकर अपीलीय अधिकरण | 1941 | भारत का सबसे पुराना अधिकरण |
| केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण | 1985 | प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 |
| ऋण वसूली अधिकरण | 1993 | बैंकों और वित्तीय संस्थाओं की ऋण वसूली अधिनियम |
| राष्ट्रीय हरित अधिकरण | 2010 | प्रधान पीठ नई दिल्ली; अध्यक्ष उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश या उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश रहा हो |
| सशस्त्र सेना अधिकरण | 2007 | तीनों सेनाओं के सेवा विवाद |
| एनसीएलटी और एनसीएलएटी | 2016 | कंपनी अधिनियम, 2013 के अधीन गठित |
लोक अदालत और विधिक सेवा प्राधिकरण
बयालीसवें संशोधन द्वारा जोड़ा गया अनुच्छेद 39क राज्य को समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता सुनिश्चित करने का निर्देश देता है। पहली लोक अदालत 1982 में गुजरात के जूनागढ़ जिले के ऊना में लगी थी। वैधानिक दर्जा विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 से मिला, जो 9 नवंबर 1995 से प्रवृत्त हुआ; यही दिन अब राष्ट्रीय विधिक सेवा दिवस है। अधिनियम से बनी राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) के मुख्य संरक्षक भारत के मुख्य न्यायाधीश होते हैं और कार्यकारी अध्यक्ष उच्चतम न्यायालय का वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश होता है। राज्य में उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण का मुख्य संरक्षक होता है और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण का प्रमुख जिला न्यायाधीश होता है।
- लोक अदालत समझौता कराती है, मुकदमे का विचारण नहीं करती। उस पर सिविल प्रक्रिया संहिता और साक्ष्य अधिनियम की कठोर प्रक्रिया लागू नहीं होती।
- कोई न्यायालय शुल्क नहीं लगता और लंबित वाद में पहले दिया गया शुल्क समझौता होने पर वापस कर दिया जाता है।
- लोक अदालत का अवार्ड सिविल न्यायालय की डिक्री माना जाता है, पक्षकारों पर अंतिम और बंधनकारी होता है और उसके विरुद्ध कोई अपील नहीं होती।
- केवल शमनीय अपराध ही निपटाए जा सकते हैं; अशमनीय अपराध लोक अदालत में नहीं रखा जा सकता। समझौता न होने पर मामला नियमित न्यायालय में लौट जाता है।
- 2002 के संशोधन से जोड़ी गई धारा 22ख के अंतर्गत स्थायी लोक अदालत परिवहन, डाक और तार, दूरभाष, विद्युत, जल, बीमा तथा अस्पताल जैसी जन उपयोगी सेवाओं के विवादों में वाद पूर्व सुलह करती है और सुलह विफल होने पर गुण-दोष के आधार पर निर्णय भी दे सकती है।
- धारा 12 के अंतर्गत निःशुल्क विधिक सहायता अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों, महिलाओं और बालकों, मानव तस्करी के शिकार व्यक्तियों, दिव्यांगजनों, औद्योगिक कामगारों, अभिरक्षा में रखे व्यक्तियों, सामूहिक आपदा के पीड़ितों तथा निर्धारित सीमा से कम वार्षिक आय वाले व्यक्तियों को मिलती है।
सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 89 न्यायालय को विवाद माध्यस्थम्, सुलह, लोक अदालत के माध्यम से न्यायिक निपटारा या मध्यस्थता के लिए भेजने की शक्ति देती है, और मध्यस्थता अधिनियम, 2023 ने मध्यस्थता को अलग ढाँचा दे दिया है। जिला न्यायालय, न्यायाधिकरण और लोक अदालत मिलकर भारतीय मुकदमेबाजी का भार उठाते हैं।
परीक्षा की दृष्टि से
प्रश्न निश्चित साँचों में आते हैं। पहला, अनुच्छेद मिलान: जिला न्यायाधीश की नियुक्ति 233, अन्य न्यायिक अधिकारी 234, उच्च न्यायालय का नियंत्रण 235 और मजिस्ट्रेटों पर लागू करने की शक्ति 237। दूसरा, नियुक्ति प्राधिकारी, जहाँ जाल यह है कि उत्तर राष्ट्रपति या उच्च न्यायालय चुन लिया जाए, जबकि सही उत्तर उच्च न्यायालय से परामर्श के बाद राज्यपाल है। तीसरा, 42वाँ संशोधन तथा अनुच्छेद 323क (केवल संसद, लोक सेवा विषय) और 323ख (राज्य भी, ग्यारह अन्य विषय) का अंतर, एल. चंद्र कुमार निर्णय के साथ। चौथा, वर्ष और प्रथम: आईटीएटी 1941, कैट 1 नवंबर 1985, एनजीटी 2010, पहली लोक अदालत 1982 गुजरात, 1987 का अधिनियम 9 नवंबर 1995 से प्रवृत्त। पाँचवाँ, लोक अदालत के तीन सर्वाधिक दोहराए गए तथ्य: अवार्ड सिविल डिक्री के समान, अपील नहीं, और शुल्क की वापसी। एक सामान्य जाल अशमनीय अपराध के निपटारे का प्रश्न है, जो लोक अदालत नहीं कर सकती।
महत्वपूर्ण तथ्य
| संवैधानिक उपबंध | अनुच्छेद 233 से 237, भाग VI अध्याय VI (अधीनस्थ न्यायालय) |
|---|---|
| जिला न्यायाधीश की नियुक्ति | राज्यपाल द्वारा उच्च न्यायालय से परामर्श करके, अनुच्छेद 233 |
| अधिवक्ता का अनुभव | सात वर्ष, उच्च न्यायालय की संस्तुति के साथ |
| अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण | उच्च न्यायालय, अनुच्छेद 235 |
| भाग XIVक जोड़ा गया | 42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 (स्वर्ण सिंह समिति) |
| केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण | 1 नवंबर 1985; प्रधान पीठ नई दिल्ली |
| प्रमुख वाद | एल. चंद्र कुमार बनाम भारत संघ, 1997 |
| सबसे पुराना अधिकरण | आयकर अपीलीय अधिकरण, 1941 |
| पहली लोक अदालत | 1982, ऊना, जूनागढ़ जिला, गुजरात |
| विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम | 1987 में पारित, 9 नवंबर 1995 से प्रवृत्त (राष्ट्रीय विधिक सेवा दिवस) |
| नालसा के मुख्य संरक्षक | भारत के मुख्य न्यायाधीश |
| लोक अदालत का अवार्ड | सिविल न्यायालय की डिक्री के समान; अंतिम और बंधनकारी; अपील नहीं |
| ग्राम न्यायालय अधिनियम | 2008, 2 अक्टूबर 2009 से प्रवृत्त; पीठासीन अधिकारी न्यायाधिकारी |
| निःशुल्क विधिक सहायता का निर्देश | अनुच्छेद 39क, 42वें संशोधन से जोड़ा गया नीति निदेशक तत्व |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
भारत में न्यायालयों के कितने स्तर हैं?
- A.3
- B.2
- C.5
- D.4
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर A, तीन है। भारत में एकीकृत न्यायपालिका तीन स्तरों में बँटी है: शिखर पर उच्चतम न्यायालय, राज्य स्तर पर उच्च न्यायालय और उनके नीचे अधीनस्थ या जिला न्यायालय। जिला न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध मामला उच्च न्यायालय और वहाँ से उच्चतम न्यायालय तक जा सकता है, इसी कारण इस व्यवस्था को एकीकृत कहा जाता है। B गलत है क्योंकि दो स्तर मानने पर उच्च न्यायालय या जिला न्यायपालिका में से एक छूट जाएगा, जबकि संविधान दोनों का उपबंध करता है और जिला न्यायपालिका के लिए अनुच्छेद 233 से 237 हैं। C गलत है क्योंकि जिला न्यायपालिका के भीतर सिविल न्यायाधीश कनिष्ठ और वरिष्ठ खंड जैसे श्रेणियाँ एक ही स्तर के भाग हैं, अलग स्तर नहीं। D भी इसी कारण गलत है; न्यायाधिकरण और लोक अदालत वैधानिक पूरक मंच हैं, न्यायालयों का चौथा संवैधानिक स्तर नहीं।
संविधान के किस अनुच्छेद के अधीन राज्य में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति राज्यपाल उच्च न्यायालय से परामर्श करके करता है?
- A.अनुच्छेद 124
- B.अनुच्छेद 217
- C.अनुच्छेद 233
- D.अनुच्छेद 243
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर C, अनुच्छेद 233 है। इसमें कहा गया है कि किसी राज्य में जिला न्यायाधीश नियुक्त होने वाले व्यक्तियों की नियुक्ति तथा जिला न्यायाधीशों की पदस्थापना और पदोन्नति राज्यपाल उस राज्य पर अधिकारिता रखने वाले उच्च न्यायालय से परामर्श करके करेगा। यही अनुच्छेद सात वर्ष की वकालत वाले अधिवक्ता को उच्च न्यायालय की संस्तुति पर सीधे जिला न्यायाधीश नियुक्त होने देता है। A गलत है क्योंकि अनुच्छेद 124 उच्चतम न्यायालय के गठन और उसके न्यायाधीशों की राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति से संबंधित है। B गलत है क्योंकि अनुच्छेद 217 उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति का उपबंध करता है, जो भी राष्ट्रपति करता है। D गलत है क्योंकि अनुच्छेद 243 भाग IX का परिभाषा खंड है, जो पंचायतों से संबंधित है। इस प्रश्न का जाल प्राधिकारी को लेकर है: जिला न्यायाधीश के लिए राज्यपाल, राष्ट्रपति नहीं।
राज्य के अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण, जिसमें न्यायिक अधिकारियों की पदस्थापना, पदोन्नति और छुट्टी शामिल है, किसमें निहित है?
- A.राज्य के राज्यपाल में
- B.राज्य के उच्च न्यायालय में
- C.राज्य लोक सेवा आयोग में
- D.राज्य सरकार के विधि विभाग में
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर B, राज्य का उच्च न्यायालय है। अनुच्छेद 235 कहता है कि जिला न्यायालयों और उनके अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण, जिसमें राज्य की न्यायिक सेवा के व्यक्तियों की पदस्थापना, पदोन्नति और छुट्टी देना सम्मिलित है, उच्च न्यायालय में निहित होगा। यही उपबंध जिला न्यायपालिका की कार्यपालिका से स्वतंत्रता का आधार है। A गलत है क्योंकि राज्यपाल की भूमिका अनुच्छेद 233 और 234 के अधीन नियुक्ति तथा नियम बनाने तक सीमित है, दैनिक नियंत्रण उसके पास नहीं है। C गलत है क्योंकि राज्य लोक सेवा आयोग से केवल अनुच्छेद 234 के अधीन जिला न्यायाधीश से भिन्न अधिकारियों की भर्ती के नियम बनाते समय परामर्श लिया जाता है। D गलत है क्योंकि किसी सरकारी विभाग को नियंत्रण देने से न्यायिक अधिकारी कार्यपालिका के प्रति उत्तरदायी हो जाते, जिसे अनुच्छेद 235 रोकता है।
न्यायाधिकरणों से संबंधित अनुच्छेद 323क और 323ख वाला भाग XIVक संविधान में किस संशोधन द्वारा जोड़ा गया?
- A.42वाँ संशोधन अधिनियम, 1976
- B.44वाँ संशोधन अधिनियम, 1978
- C.52वाँ संशोधन अधिनियम, 1985
- D.73वाँ संशोधन अधिनियम, 1992
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर A, 42वाँ संशोधन अधिनियम 1976 है। स्वर्ण सिंह समिति की संस्तुति पर इस संशोधन ने न्यायाधिकरण नामक नया भाग XIVक जोड़ा, जिसमें प्रशासनिक अधिकरणों के लिए अनुच्छेद 323क और अन्य विषयों के अधिकरणों के लिए अनुच्छेद 323ख हैं। इसी संशोधन ने समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता का अनुच्छेद 39क भी जोड़ा, इसलिए यह लोक अदालत से भी जुड़ा है। B गलत है क्योंकि 44वें संशोधन 1978 ने 42वें के कई परिवर्तन पलटे, लोक सभा का कार्यकाल पाँच वर्ष किया और संपत्ति के अधिकार को साधारण विधिक अधिकार बनाया। C गलत है क्योंकि 52वें संशोधन 1985 ने दल-बदल पर दसवीं अनुसूची जोड़ी। D गलत है क्योंकि 73वें संशोधन 1992 ने पंचायती राज का भाग IX और ग्यारहवीं अनुसूची जोड़ी। भाग XIVक में केवल दो अनुच्छेद हैं और स्वर्ण सिंह समिति का उद्देश्य न्यायालयों का बोझ घटाकर सेवा विवादों का शीघ्र निपटारा कराना था। याद रखने का सूत्र यह है कि अधिकरण और अनुच्छेद 39क दोनों 42वें संशोधन से आए।
अनुच्छेद 323क के विषय में कौन-सा कथन सही है?
- A.इसके अधीन संसद और राज्य विधानमंडल दोनों अधिकरण बना सकते हैं
- B.इसके अधीन केवल संसद अधिकरण बना सकती है और वह भी केवल लोक सेवा विवादों के लिए
- C.यह कराधान और भूमि सुधार के लिए अधिकरणों का पदानुक्रम अनुमत करता है
- D.यह उच्चतम न्यायालय को अधिकरणों से अपील सुनने से रोकता है
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर B है। अनुच्छेद 323क केवल संसद को यह शक्ति देता है कि लोक सेवाओं में नियुक्त व्यक्तियों की भर्ती और सेवा शर्तों से जुड़े विवादों के निर्णय के लिए अधिकरण बनाए; ये अधिकरण केवल सेवा विषयों तक सीमित हैं और संघ के लिए एक तथा प्रत्येक राज्य या दो या अधिक राज्यों के लिए एक अधिकरण होता है, उनके नीचे पदानुक्रम नहीं। A गलत है क्योंकि अनुच्छेद 323क के अधीन विधि बनाने की शक्ति केवल संसद की है; राज्य विधानमंडल को यह शक्ति अनुच्छेद 323ख देता है। C गलत है क्योंकि कराधान, भूमि सुधार, निर्वाचन, किराया और अभिधृति जैसे विषय अनुच्छेद 323ख के अंतर्गत आते हैं, जो पदानुक्रम की अनुमति देता है। D गलत है क्योंकि अनुच्छेद 136 के अधीन उच्चतम न्यायालय की विशेष अनुमति अधिकारिता कभी हटाई नहीं गई, और एल. चंद्र कुमार के बाद उच्च न्यायालयों की रिट अधिकारिता भी उपलब्ध है।
केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण की स्थापना किस वर्ष हुई?
- A.1976
- B.1985
- C.1991
- D.1997
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर B, 1985 है। संसद ने अनुच्छेद 323क की शक्ति से 1985 में प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम बनाया और केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण 1 नवंबर 1985 को अस्तित्व में आया, जिसकी प्रधान पीठ नई दिल्ली में है। यह केंद्र सरकार के कर्मचारियों के सेवा विवाद देखता है, परंतु रक्षा बलों के सदस्य, उच्चतम न्यायालय के अधिकारी तथा कर्मचारी और संसद के सचिवीय कर्मचारी इसके क्षेत्राधिकार से बाहर हैं। A गलत है क्योंकि 1976 में 42वाँ संशोधन हुआ था, जिसने केवल सक्षमकारी अनुच्छेद दिया; अधिकरण के लिए अलग विधि आवश्यक थी। C गलत है क्योंकि 1991 का संबंध अधिकरण से नहीं, आर्थिक उदारीकरण से है। D गलत है क्योंकि 1997 में एल. चंद्र कुमार का निर्णय आया, जो अधिकरण के आरंभ के बारह वर्ष बाद उसके निर्णयों की पुनर्विलोकन सीमा तय करता है।
किस वाद में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अधिकरणों के निर्णय उच्च न्यायालयों की रिट अधिकारिता के अधीन हैं?
- A.एस. पी. संपत कुमार बनाम भारत संघ
- B.एल. चंद्र कुमार बनाम भारत संघ
- C.केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य
- D.एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर B, एल. चंद्र कुमार बनाम भारत संघ (1997) है। सात न्यायाधीशों की पीठ ने अनुच्छेद 323क(2)(घ) और 323ख(3)(घ) को इस सीमा तक अपास्त किया जहाँ तक वे अनुच्छेद 226 और 227 के अधीन उच्च न्यायालयों की अधिकारिता हटाते थे, कहा कि उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय का न्यायिक पुनर्विलोकन आधारभूत ढाँचे का भाग है, और अधिकरण उच्च न्यायालयों के पूरक हैं, विकल्प नहीं। A गलत है क्योंकि एस. पी. संपत कुमार (1987) ने प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम को वैध ठहराते हुए उच्च न्यायालय की अधिकारिता हटाना स्वीकार किया था, जिसे बाद में सुधारा गया। C गलत है क्योंकि केशवानंद भारती (1973) ने संविधान संशोधन के संदर्भ में आधारभूत ढाँचे का सिद्धांत दिया। D गलत है क्योंकि एस. आर. बोम्मई (1994) अनुच्छेद 356 के अधीन राष्ट्रपति शासन से संबंधित है।
भारत की पहली लोक अदालत किस राज्य में लगाई गई थी?
- A.महाराष्ट्र
- B.केरल
- C.गुजरात
- D.पश्चिम बंगाल
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर C, गुजरात है। पहली लोक अदालत 1982 में गुजरात के जूनागढ़ जिले के ऊना में लगी थी, जो किसी अधिनियम के बनने से बहुत पहले सुलह द्वारा विवाद निपटाने का शिविर था। यह प्रयोग फैला और संसद ने विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 से लोक अदालतों को वैधानिक दर्जा दिया, जो 9 नवंबर 1995 से प्रवृत्त हुआ। A गलत है क्योंकि महाराष्ट्र में विधिक सहायता शिविर आरंभ में लगे, परंतु पहली लोक अदालत वहाँ नहीं हुई। B गलत है क्योंकि केरल का योगदान दूसरे क्षेत्रों में याद किया जाता है, जैसे पूर्ण साक्षर पहला राज्य और जन योजना अभियान। D गलत है क्योंकि पश्चिम बंगाल इस प्रथम से जुड़ा नहीं है; प्रश्न एक निश्चित जोड़ी पूछता है, पहली लोक अदालत और गुजरात, 1982।
राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण के मुख्य संरक्षक कौन होते हैं?
- A.भारत के राष्ट्रपति
- B.भारत के मुख्य न्यायाधीश
- C.केंद्रीय विधि और न्याय मंत्री
- D.भारत के महान्यायवादी
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर B, भारत के मुख्य न्यायाधीश है। विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अधीन राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण के मुख्य संरक्षक भारत के मुख्य न्यायाधीश होते हैं, और उच्चतम न्यायालय का वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश, जिसे राष्ट्रपति मुख्य न्यायाधीश से परामर्श कर नामित करता है, कार्यकारी अध्यक्ष होता है। यही ढाँचा राज्यों में दोहराया जाता है, जहाँ उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश राज्य प्राधिकरण का मुख्य संरक्षक होता है। A गलत है क्योंकि राष्ट्रपति केवल कार्यकारी अध्यक्ष नामित करते हैं, संरक्षक नहीं होते। C गलत है क्योंकि अधिनियम विधिक सेवा तंत्र को न्यायिक नेतृत्व में रखता है, मंत्री के अधीन नहीं, यद्यपि बजट विधि और न्याय मंत्रालय देता है। D गलत है क्योंकि महान्यायवादी अनुच्छेद 76 के अधीन सरकार का प्रमुख विधि अधिकारी है और नालसा में उसकी कोई भूमिका नहीं।
लोक अदालत के अवार्ड के विषय में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?
- A.यह केवल सिफारिश है और पक्षकारों पर बंधनकारी नहीं है
- B.यह सिविल न्यायालय की डिक्री माना जाता है और उसके विरुद्ध अपील नहीं होती
- C.इसके विरुद्ध तीस दिन में उच्च न्यायालय में अपील हो सकती है
- D.प्रभावी होने के लिए जिला न्यायाधीश की पुष्टि आवश्यक है
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर B है। विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अधीन लोक अदालत का प्रत्येक अवार्ड सिविल न्यायालय की डिक्री माना जाता है, विवाद के सभी पक्षकारों पर अंतिम और बंधनकारी होता है और उसके विरुद्ध किसी न्यायालय में अपील नहीं होती, क्योंकि अवार्ड पक्षकारों की सहमति पर ही आधारित होता है। A गलत है क्योंकि अवार्ड केवल सिफारिश नहीं है; वह सिविल डिक्री की तरह निष्पादनीय है और यही निष्पादनीयता इस मंच का मुख्य आकर्षण है। C गलत है क्योंकि अपील पर रोक पूर्ण है; असंतुष्ट पक्षकार अपील नहीं कर सकता, हाँ समझौता न होने पर मामला नियमित न्यायालय में लौट जाता है। D गलत है क्योंकि किसी न्यायाधीश की पुष्टि आवश्यक नहीं। यह भी याद रखें कि लंबित वाद के समझौते पर दिया गया न्यायालय शुल्क वापस कर दिया जाता है।
ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 के अधीन ग्राम न्यायालय का पीठासीन अधिकारी किस नाम से जाना जाता है?
- A.न्याय पंच
- B.न्यायाधिकारी
- C.सरपंच मजिस्ट्रेट
- D.लोक अदालत अध्यक्ष
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर B, न्यायाधिकारी है। ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008, जो 2 अक्टूबर 2009 से प्रवृत्त है, मध्यवर्ती पंचायत स्तर पर चल ग्राम न्यायालयों का उपबंध करता है, जिनकी अध्यक्षता राज्य सरकार द्वारा उच्च न्यायालय से परामर्श कर नियुक्त न्यायाधिकारी करता है, जिसे प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट का पद और वेतन मिलता है। यह न्यायालय दीवानी और फौजदारी दोनों अधिकारिता रखता है, संक्षिप्त प्रक्रिया अपनाता है और गाँवों में बैठक करता है। A गलत है क्योंकि न्याय पंच राज्य पंचायत विधियों के अधीन बनी पुरानी न्याय पंचायतों का सदस्य था। C गलत है क्योंकि ऐसा कोई पद नहीं है; सरपंच निर्वाचित पंचायत प्रमुख होता है और उसे इस प्रकार की न्यायिक शक्तियाँ नहीं होतीं। D गलत है क्योंकि लोक अदालत 1987 के अधिनियम के अधीन सुलह मंच है, जो ग्राम न्यायालय से पूर्णतः भिन्न है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
राज्य में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति कौन करता है?
अनुच्छेद 233 के अनुसार राज्य का राज्यपाल उस राज्य पर अधिकारिता रखने वाले उच्च न्यायालय से परामर्श करके जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदस्थापना और पदोन्नति करता है। इसमें राष्ट्रपति की कोई भूमिका नहीं होती और उच्च न्यायालय स्वयं नियुक्ति नहीं कर सकता, उससे केवल परामर्श लिया जाता है।
अनुच्छेद 323क और 323ख में क्या अंतर है?
अनुच्छेद 323क केवल संसद को प्रशासनिक अधिकरण बनाने की शक्ति देता है और वह भी केवल लोक सेवा विवादों के लिए, जिसमें अधिकरणों का पदानुक्रम नहीं हो सकता। अनुच्छेद 323ख संसद तथा राज्य विधानमंडल दोनों को कराधान, भूमि सुधार, निर्वाचन, किराया और अभिधृति जैसे ग्यारह अन्य विषयों पर अधिकरण बनाने देता है और उसमें पदानुक्रम अनुमत है।
लोक अदालत के अवार्ड के विरुद्ध अपील हो सकती है?
नहीं। अवार्ड सिविल न्यायालय की डिक्री माना जाता है और सभी पक्षकारों पर अंतिम तथा बंधनकारी होता है, इसलिए उसके विरुद्ध कोई अपील नहीं होती। असंतुष्ट पक्षकार केवल तब उचित न्यायालय में नया वाद दायर कर सकता है जब कोई समझौता ही न हुआ हो।
अधिकरणों पर उच्च न्यायालयों की शक्ति किस वाद ने बहाल की?
एल. चंद्र कुमार बनाम भारत संघ (1997) ने, जिसमें उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 323क और 323ख के उन खंडों को अपास्त कर दिया जो अनुच्छेद 226 और 227 के अधीन उच्च न्यायालयों की रिट अधिकारिता को हटाते थे।
भारत की पहली लोक अदालत कहाँ लगी थी?
गुजरात के जूनागढ़ जिले के ऊना में 1982 में। पाँच वर्ष बाद विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 ने लोक अदालतों को वैधानिक आधार दिया, जो 9 नवंबर 1995 से प्रवृत्त हुआ।
ग्राम न्यायालय क्या है?
ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 के अधीन मध्यवर्ती पंचायत स्तर पर बना चल न्यायालय। इसकी अध्यक्षता प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के समकक्ष न्यायाधिकारी करता है, जो संक्षिप्त प्रक्रिया से दीवानी और फौजदारी दोनों मामले देखता है और गाँवों में जाकर बैठक करता है।
स्रोत
- भारत का संविधान, भाग VI अध्याय VI तथा भाग XIVक — विधायी विभाग, विधि और न्याय मंत्रालय
- विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 — राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण
- भारत का संविधान सिद्धांत और व्यवहार (कक्षा 11), अध्याय 6: न्यायपालिका — एनसीईआरटी





