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GK नोट्सभारतीय राजव्यवस्थारिट और न्यायिक पुनर्विलोकन

रिट और न्यायिक पुनर्विलोकन: अनुच्छेद 32, 226 और प्रश्न

प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए रिट और न्यायिक पुनर्विलोकन के पूरे नोट्स: पांचों रिट, उनकी सीमाएं, अनुच्छेद 32 और 226 का अंतर तथा प्रमुख निर्णय और प्रश्न।

लेखक · प्रकाशित · 6 मिनट

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रिट और न्यायिक पुनर्विलोकन: अनुच्छेद 32, 226 और प्रश्न — GK24 title card
रिट और न्यायिक पुनर्विलोकन: अनुच्छेद 32, 226 और प्रश्न — GK24 title card

मूल अधिकार केवल घोषणा बनकर न रह जाएं, इसके लिए संविधान ने न्यायालयों को दो औज़ार दिए हैं: न्यायिक पुनर्विलोकन और रिट क्षेत्राधिकार। संसद का बनाया कानून हो या किसी अधिकारी का आदेश, यदि वह संविधान का उल्लंघन करता है तो उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय उसे शून्य घोषित कर सकते हैं। इस अध्याय में न्यायिक पुनर्विलोकन का अर्थ, अनुच्छेद 32 और 226 का अंतर, पांचों रिट उनके शाब्दिक अर्थ और सीमाओं के साथ, तथा वे निर्णय दिए गए हैं जिन पर परीक्षाओं में प्रश्न बनते हैं।

न्यायिक पुनर्विलोकन का अर्थ

न्यायिक पुनर्विलोकन उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की वह शक्ति है जिससे वे विधायी अधिनियमों तथा कार्यपालिका के आदेशों की संवैधानिकता की जांच करते हैं और संविधान के विरुद्ध पाए जाने पर उन्हें शून्य घोषित कर देते हैं। यह शब्द संविधान में कहीं नहीं आया है; यह विचार संयुक्त राज्य अमेरिका की व्यवस्था से लिया गया है, जहां 1803 के मारबरी बनाम मैडिसन वाद में इसे प्रतिपादित किया गया था। भारत में यह शक्ति किसी एक अनुच्छेद पर नहीं, अनुच्छेदों के समूह पर आधारित है: अनुच्छेद 13 मूल अधिकारों से असंगत कानून को शून्य बनाता है, अनुच्छेद 32 और 226 उपचार देते हैं, अनुच्छेद 131 से 136 तथा 143 क्षेत्राधिकार देते हैं, अनुच्छेद 245, 246, 251 और 254 विधायी सक्षमता की सीमा तय करते हैं, और अनुच्छेद 372 संविधान-पूर्व कानूनों को केवल उसी सीमा तक बनाए रखता है जहां तक वे संविधान के अनुरूप हैं।

इस प्रकार किसी कानून को तीन आधारों पर रद्द किया जा सकता है: वह किसी मूल अधिकार का हरण करता हो, उसे बनाने वाली विधायिका को सातवीं अनुसूची के अंतर्गत उस विषय पर सक्षमता न हो, अथवा वह संविधान के किसी अन्य उपबंध का उल्लंघन करता हो। ऐसा करते समय न्यायालय स्थापित सिद्धांतों का प्रयोग करते हैं, जैसे पृथक्करणीयता का सिद्धांत, जिसके अनुसार कानून का केवल दोषपूर्ण भाग गिरता है, संविधान-पूर्व कानूनों के लिए ग्रहण का सिद्धांत, तथा भावी विखंडन का सिद्धांत, जिसे न्यायालय ने 1967 के गोलकनाथ वाद में पहली बार लागू किया।

अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226 का अंतर

अनुच्छेद 32 संवैधानिक उपचारों का अधिकार देता है और स्वयं भाग तीन में रखा गया एक मूल अधिकार है। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इसे संविधान की आत्मा और हृदय कहा था। अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय निर्देश, आदेश या रिट जारी कर सकता है, जिनमें बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार-पृच्छा और उत्प्रेषण सम्मिलित हैं, परंतु केवल मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए। अनुच्छेद 32(3) संसद को किसी अन्य न्यायालय को यह शक्ति देने की अनुमति देता है, जिसका प्रयोग आज तक नहीं हुआ। अनुच्छेद 32 का अधिकार केवल वैसे ही निलंबित हो सकता है जैसा संविधान स्वयं उपबंधित करता है, अर्थात राष्ट्रीय आपात के दौरान अनुच्छेद 359 के अधीन राष्ट्रपति के आदेश से।

अनुच्छेद 226 वही रिट प्रत्येक उच्च न्यायालय को देता है और उन्हें अधिक विस्तृत आधार पर देता है: मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए तथा किसी अन्य प्रयोजन के लिए भी, जिसमें साधारण विधिक अधिकार भी आ जाते हैं। मूल अधिकार का उल्लंघन सिद्ध हो जाने पर उच्चतम न्यायालय अनुच्छेद 32 के अधीन उपचार देने से इनकार नहीं कर सकता, जबकि अनुच्छेद 226 के अधीन उच्च न्यायालय की शक्ति विवेकाधीन है। पहुंच का क्रम उलटा है: उच्चतम न्यायालय की रिट पूरे भारत में चलती है, जबकि उच्च न्यायालय केवल अपने क्षेत्राधिकार के भीतर स्थित प्राधिकारी या व्यक्ति को रिट भेज सकता है। 1976 के 42वें संविधान संशोधन ने अनुच्छेद 226 की शक्ति को सीमित किया था और 1977 के 43वें संशोधन ने उसे पुनः बहाल किया।

बिंदुअनुच्छेद 32अनुच्छेद 226
न्यायालयउच्चतम न्यायालयउच्च न्यायालय
विस्तारकेवल मूल अधिकारमूल अधिकार और अन्य कोई भी प्रयोजन
प्रकृतिस्वयं एक मूल अधिकारसंवैधानिक शक्ति, विवेकाधीन
क्षेत्रसंपूर्ण भारतसंबंधित उच्च न्यायालय का क्षेत्र

पांच रिट

ये रिट इंग्लैंड की विशेषाधिकार रिट से ली गई हैं, जहां इन्हें किंग्स बेंच जारी करता था।

रिटशाब्दिक अर्थकिस उद्देश्य से
बंदी प्रत्यक्षीकरणशरीर को प्रस्तुत करनाबंदी व्यक्ति को प्रस्तुत करके निरोध को उचित सिद्ध करना
परमादेशहम आदेश देते हैंलोक प्राधिकारी को उसका लोक कर्तव्य करने के लिए बाध्य करना
प्रतिषेधमना करनाअधीनस्थ न्यायालय या अधिकरण को क्षेत्राधिकार से बाहर जाने से रोकना
उत्प्रेषणप्रमाणित करना, सूचित करनालंबित वाद को हस्तांतरित करना या पारित आदेश को रद्द करना
अधिकार-पृच्छाकिस अधिकार सेकिसी लोक पद पर व्यक्ति के दावे की वैधता जांचना

वे सीमाएं जिन पर प्रश्न बनते हैं

  • बंदी प्रत्यक्षीकरण एकमात्र रिट है जो राज्य के साथ-साथ निजी व्यक्ति के विरुद्ध भी जारी होती है, परंतु यह वैध निरोध, न्यायालय या विधानमंडल की अवमानना के लिए किए गए निरोध, सक्षम न्यायालय द्वारा दिए गए निरोध तथा न्यायालय के क्षेत्राधिकार से बाहर के निरोध में जारी नहीं होती।
  • परमादेश किसी निजी व्यक्ति या संस्था के विरुद्ध, विधिक बल रहित विभागीय अनुदेश के प्रवर्तन के लिए, विवेकाधीन कर्तव्य के लिए, संविदात्मक दायित्व के लिए, राष्ट्रपति या राज्यपाल के विरुद्ध तथा न्यायिक रूप में कार्य कर रहे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध जारी नहीं होती।
  • प्रतिषेध केवल न्यायिक और अर्ध-न्यायिक प्राधिकारियों के विरुद्ध जारी होती है, प्रशासनिक या विधायी निकायों के विरुद्ध नहीं, और यह निवारक है, अर्थात कार्यवाही लंबित रहते जारी होती है।
  • उत्प्रेषण लंबे समय तक न्यायिक और अर्ध-न्यायिक निकायों तक सीमित रही, परंतु 1991 से उच्चतम न्यायालय ने यह माना है कि यह उन प्रशासनिक प्राधिकारियों के विरुद्ध भी जारी हो सकती है जिनके निर्णय व्यक्तियों के अधिकारों को प्रभावित करते हैं। यह उपचारात्मक है और आदेश पारित होने के बाद जारी होती है।
  • अधिकार-पृच्छा केवल वहां जारी होती है जहां पद संविधान या किसी कानून से बना स्थायी प्रकृति का सारवान लोक पद हो, निजी या मंत्रिस्तरीय पद न हो; और इसे कोई भी इच्छुक व्यक्ति मांग सकता है, केवल व्यथित पक्षकार नहीं।

स्थिति तय करने वाले निर्णय

1973 के केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य वाद में न्यायालय ने कहा कि संसद संविधान के आधारभूत ढांचे को संशोधन द्वारा समाप्त नहीं कर सकती। 1975 के इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण वाद में उसने 39वें संशोधन के उस उपबंध को रद्द किया जिसने प्रधानमंत्री के निर्वाचन को न्यायिक जांच से बाहर कर दिया था। 1980 के मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ वाद में उसने 42वें संशोधन के उन भागों को रद्द किया जिन्होंने न्यायालयों को संविधान संशोधनों पर प्रश्न उठाने से रोका था, और न्यायिक पुनर्विलोकन को आधारभूत ढांचे का अंग माना। 1997 के एल. चंद्र कुमार बनाम भारत संघ वाद में उसने अनुच्छेद 323क और 323ख के उन खंडों को असंवैधानिक ठहराया जो अधिकरणों पर उच्च न्यायालयों के रिट क्षेत्राधिकार को हटाते थे, इसलिए अधिकरण का आदेश आज भी अनुच्छेद 226 के अधीन है। इसी क्रम में न्यायालयों ने वाद-योग्यता के नियम को शिथिल किया, जिससे कोई भी लोकहितैषी व्यक्ति असमर्थ लोगों के लिए न्यायालय आ सके, और यही जनहित याचिका का आधार है।

परीक्षा की दृष्टि से

इस अध्याय से चार प्रकार के प्रश्न बनते हैं। पहला, अनुच्छेदों की जोड़ियां: उच्चतम न्यायालय और मूल अधिकारों के लिए 32, उच्च न्यायालय और अन्य प्रयोजन के लिए 226, संसद की अप्रयुक्त शक्ति के लिए 32(3), आपात में निलंबन के लिए 359। दूसरा, शाब्दिक अर्थ, जो सबसे सामान्य एक-पंक्ति प्रश्न है: शरीर प्रस्तुत करना, हम आदेश देते हैं, मना करना, प्रमाणित करना, किस अधिकार से। तीसरा, सीमाएं, जहां जाल छिपे हैं: परमादेश राष्ट्रपति या राज्यपाल के विरुद्ध नहीं, प्रतिषेध केवल न्यायिक निकायों के विरुद्ध, अधिकार-पृच्छा केवल सारवान लोक पद के लिए पर कोई भी इच्छुक व्यक्ति मांग सकता है। चौथा, वाद: गोलकनाथ, केशवानंद भारती, मिनर्वा मिल्स और एल. चंद्र कुमार। सबसे प्रिय जाल है प्रतिषेध और उत्प्रेषण को आपस में बदल देना, या अनुच्छेद 226 को मूल अधिकार बता देना।

महत्वपूर्ण तथ्य

संवैधानिक उपचारों का अधिकारअनुच्छेद 32
उच्च न्यायालयों की रिट शक्तिअनुच्छेद 226
न्यायालयों और अधिकरणों पर अधीक्षणअनुच्छेद 227
आपात में न्यायालय जाने के अधिकार का निलंबनअनुच्छेद 359
मूल अधिकारों से असंगत कानून शून्यअनुच्छेद 13
न्यायिक पुनर्विलोकन का स्रोतसंयुक्त राज्य अमेरिका की संवैधानिक व्यवस्था
अनुच्छेद 226 सीमित और बहाल42वां संशोधन, 1976 तथा 43वां संशोधन, 1977
न्यायिक पुनर्विलोकन आधारभूत ढांचे का अंगमिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ, 1980
अधिकरण उच्च न्यायालय की रिट के अधीनएल. चंद्र कुमार बनाम भारत संघ, 1997
भावी विखंडन का पहला प्रयोगगोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य, 1967

इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ

Q1.भारतीय राजव्यवस्थापूछा गया: उत्तर प्रदेश · 27 August 2023आसान

भारतीय संविधान में कौन-सी रिट का अर्थ 'सूचित किया जाए' या 'प्रमाणित किया जाए' है?

  1. A.प्रतिषेध
  2. B.अधिकार-पृच्छा
  3. C.उत्प्रेषण
  4. D.बंदी प्रत्यक्षीकरण
उत्तर देखें

सही उत्तर: C. उत्प्रेषण

व्याख्या

सही उत्तर C, उत्प्रेषण है। उत्प्रेषण का लैटिन अर्थ है प्रमाणित किया जाए अथवा सूचित किया जाए, और यह रिट ठीक यही काम करती है: उच्च न्यायालय किसी अधीनस्थ न्यायालय या अधिकरण से वाद का अभिलेख अपने पास बुला लेता है, जिससे वह मामला स्वयं अपने पास हस्तांतरित कर ले अथवा क्षेत्राधिकार के अभाव, क्षेत्राधिकार के अतिक्रमण या विधि की भूल के कारण पहले पारित आदेश को रद्द कर दे। यह उपचारात्मक रिट है, जो आदेश पारित हो जाने के बाद जारी होती है। विकल्प A गलत है क्योंकि प्रतिषेध का अर्थ मना करना है; वह निवारक है और कार्यवाही लंबित रहते अधीनस्थ न्यायालय को रोकती है। विकल्प B गलत है क्योंकि अधिकार-पृच्छा का अर्थ किस अधिकार से है और वह किसी व्यक्ति के लोक पद पर दावे की जांच करती है। विकल्प D गलत है क्योंकि बंदी प्रत्यक्षीकरण का अर्थ शरीर को प्रस्तुत करना है और उसका प्रयोग बंदी को न्यायालय के समक्ष लाकर निरोध की वैधता परखने के लिए होता है।

Q2.भारतीय राजव्यवस्थापूछा गया: दिल्ली · 28 Oct 2017आसान

बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट जारी करने की शक्ति किसके पास है?

  1. A.उच्चतम न्यायालय
  2. B.उच्च न्यायालय
  3. C.जिला एवं सत्र न्यायालय
  4. D.(A) और (B) दोनों
उत्तर देखें

सही उत्तर: D. (A) और (B) दोनों

व्याख्या

सही उत्तर D, (A) और (B) दोनों है। बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट उच्चतम न्यायालय अनुच्छेद 32 के अधीन जारी कर सकता है, जहां वह प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के मूल अधिकार के उल्लंघन का उपचार है, तथा प्रत्येक उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के अधीन जारी कर सकता है, जो मूल अधिकारों के अतिरिक्त किसी अन्य प्रयोजन को भी समेटता है। विकल्प A और विकल्प B इसी कारण अपूर्ण हैं: दोनों में से केवल एक न्यायालय का नाम लेने पर संविधान द्वारा स्पष्ट रूप से दी गई दूसरी शक्ति छूट जाती है। विकल्प C गलत है क्योंकि जिला एवं सत्र न्यायालय को रिट क्षेत्राधिकार प्राप्त ही नहीं है; रिट केवल उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों को दी गई संवैधानिक शक्ति है, और अनुच्छेद 32(3) संसद को यह शक्ति किसी अन्य न्यायालय को देने की अनुमति देता है, जिसका प्रयोग अब तक नहीं हुआ। यह भी स्मरण रखें कि बंदी प्रत्यक्षीकरण एकमात्र रिट है जो निजी व्यक्ति के विरुद्ध भी जारी हो सकती है।

Q3.भारतीय राजव्यवस्थाआसान

भारतीय संविधान का कौन-सा अनुच्छेद 'संवैधानिक उपचारों का अधिकार' कहा जाता है?

  1. A.अनुच्छेद 19
  2. B.अनुच्छेद 32
  3. C.अनुच्छेद 226
  4. D.अनुच्छेद 14
उत्तर देखें

सही उत्तर: B. अनुच्छेद 32

व्याख्या

सही उत्तर B, अनुच्छेद 32 है। अनुच्छेद 32 मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उच्चतम न्यायालय जाने का अधिकार देता है और न्यायालय को उस प्रयोजन के लिए निर्देश, आदेश तथा रिट जारी करने की शक्ति देता है; इसी कारण इसका शीर्षक संवैधानिक उपचारों का अधिकार है और इसी कारण डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इसे संविधान की आत्मा कहा था। विकल्प A गलत है क्योंकि अनुच्छेद 19 वाक् और अभिव्यक्ति तथा संचरण जैसी छह स्वतंत्रताएं गिनाता है और वह उपचार नहीं, सारवान अधिकार है। विकल्प C गलत है क्योंकि अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों का रिट क्षेत्राधिकार है; वह उन न्यायालयों की संवैधानिक शक्ति है, स्वयं मूल अधिकार नहीं, और भाग तीन से बाहर है। विकल्प D गलत है क्योंकि अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समता तथा विधियों का समान संरक्षण देता है, जो पुनः एक सारवान अधिकार है।

Q4.भारतीय राजव्यवस्थामध्यम

निम्नलिखित में से कौन-सी रिट केवल न्यायिक या अर्ध-न्यायिक प्राधिकारियों के विरुद्ध जारी होती है और प्रशासनिक या विधायी निकाय के विरुद्ध कभी नहीं?

  1. A.परमादेश
  2. B.प्रतिषेध
  3. C.बंदी प्रत्यक्षीकरण
  4. D.अधिकार-पृच्छा
उत्तर देखें

सही उत्तर: B. प्रतिषेध

व्याख्या

सही उत्तर B, प्रतिषेध है। प्रतिषेध का अर्थ है मना करना। यह रिट उच्च न्यायालय द्वारा किसी अधीनस्थ न्यायालय या अधिकरण को इसलिए जारी की जाती है कि वह अपने क्षेत्राधिकार से बाहर की कार्यवाही आगे न बढ़ाए, इसलिए अपनी प्रकृति से यह केवल न्यायिक या अर्ध-न्यायिक कृत्य करने वाले निकायों को ही भेजी जा सकती है, प्रशासनिक या विधायी निकाय को नहीं। विकल्प A गलत है क्योंकि परमादेश तो प्रशासनिक प्राधिकारियों और लोक सेवकों को ही लोक कर्तव्य पूरा करवाने के लिए जारी होती है, हालांकि निजी व्यक्ति को नहीं। विकल्प C गलत है क्योंकि बंदी प्रत्यक्षीकरण उस किसी को भी भेजी जाती है जिसने व्यक्ति को निरुद्ध रखा है, चाहे वह लोक प्राधिकारी हो या निजी व्यक्ति। विकल्प D गलत है क्योंकि अधिकार-पृच्छा लोक पद पर बैठे व्यक्ति के विरुद्ध जारी होती है। यह जोड़ी याद रखें: प्रतिषेध निवारक है और उत्प्रेषण उपचारात्मक।

Q5.भारतीय राजव्यवस्थामध्यम

निम्नलिखित में से किसके विरुद्ध परमादेश रिट जारी नहीं की जा सकती?

  1. A.नगर निगम
  2. B.अधीनस्थ न्यायालय
  3. C.भारत के राष्ट्रपति
  4. D.कानून द्वारा स्थापित अधिकरण
उत्तर देखें

सही उत्तर: C. भारत के राष्ट्रपति

व्याख्या

सही उत्तर C, भारत के राष्ट्रपति है। परमादेश का अर्थ है हम आदेश देते हैं, और यह किसी लोक निकाय या लोक सेवक को वह लोक कर्तव्य पूरा करने के लिए जारी होती है जिसे करने से उसने इनकार किया है। परंतु न्यायालयों ने भारत के राष्ट्रपति और राज्यों के राज्यपालों को इसकी पहुंच से बाहर रखा है, और इसी श्रेणी में न्यायिक रूप में कार्य कर रहे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, निजी व्यक्ति और संस्थाएं, पूर्णतः विवेकाधीन कर्तव्य तथा साधारण संविदा से उत्पन्न दायित्व भी आते हैं। विकल्प A गलत है क्योंकि नगर निगम कानूनी कर्तव्यों वाला लोक प्राधिकारी है और परमादेश का प्रतिष्ठित प्रत्यर्थी है। विकल्प B गलत है क्योंकि अधीनस्थ न्यायालय को वह क्षेत्राधिकार प्रयोग करने का आदेश दिया जा सकता है जिसे उसने गलत ढंग से ठुकराया है। विकल्प D गलत है क्योंकि कानून द्वारा स्थापित अधिकरण लोक प्राधिकारी है और 1997 के एल. चंद्र कुमार वाद के बाद अनुच्छेद 226 के रिट क्षेत्राधिकार के पूरी तरह अधीन है।

Q6.भारतीय राजव्यवस्थामध्यम

अधिकार-पृच्छा रिट की मांग कौन कर सकता है?

  1. A.केवल वह व्यक्ति जो नियुक्ति से व्यथित है
  2. B.कोई भी इच्छुक व्यक्ति
  3. C.केवल भारत का महान्यायवादी
  4. D.केवल उसी पद का दूसरा उम्मीदवार
उत्तर देखें

सही उत्तर: B. कोई भी इच्छुक व्यक्ति

व्याख्या

सही उत्तर B, कोई भी इच्छुक व्यक्ति है। अधिकार-पृच्छा, जिसका अर्थ है किस अधिकार से, किसी लोक पद पर बैठे व्यक्ति से उस दावे का विधिक आधार पूछती है, और चूंकि लोक पद पर अवैध कब्ज़ा एक लोक अपकार है, न्यायालय किसी भी इच्छुक व्यक्ति को याचिका देने की अनुमति देते हैं, केवल उसे नहीं जिसे व्यक्तिगत क्षति हुई हो। रिट कार्यवाही के साधारण नियम में याचिकाकर्ता को व्यथित पक्षकार होना पड़ता है, और यह उसका अपवाद है। इसी कारण विकल्प A गलत है। विकल्प C गलत है क्योंकि ऐसी याचिका पर महान्यायवादी का एकाधिकार नहीं है; वह पद सरकार का विधि अधिकारी है, रिट का द्वारपाल नहीं। विकल्प D गलत है क्योंकि प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार इच्छुक व्यक्ति का केवल एक उदाहरण है। सीमा भी याद रखें: पद संविधान या किसी कानून से बना सारवान लोक पद होना चाहिए, निजी या मंत्रिस्तरीय पद नहीं।

Q7.भारतीय राजव्यवस्थाआसान

भारतीय संविधान का कौन-सा अनुच्छेद उच्च न्यायालयों को केवल मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए ही नहीं, बल्कि किसी अन्य प्रयोजन के लिए भी रिट जारी करने की शक्ति देता है?

  1. A.अनुच्छेद 32
  2. B.अनुच्छेद 136
  3. C.अनुच्छेद 226
  4. D.अनुच्छेद 227
उत्तर देखें

सही उत्तर: C. अनुच्छेद 226

व्याख्या

सही उत्तर C, अनुच्छेद 226 है। अनुच्छेद 226 प्रत्येक उच्च न्यायालय को मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए तथा किसी अन्य प्रयोजन के लिए भी निर्देश, आदेश या रिट जारी करने की शक्ति देता है, और यही अंतिम वाक्यांश उच्च न्यायालय के रिट क्षेत्राधिकार को उच्चतम न्यायालय से अधिक विस्तृत बनाता है। विकल्प A गलत है क्योंकि अनुच्छेद 32 केवल मूल अधिकारों के प्रवर्तन तक सीमित है; साधारण विधिक अधिकार के लिए उसके अधीन उच्चतम न्यायालय नहीं जाया जा सकता। विकल्प B गलत है क्योंकि अनुच्छेद 136 विशेष अनुमति याचिका का उपबंध करता है, जो उच्चतम न्यायालय की विवेकाधीन अपीलीय शक्ति है, रिट क्षेत्राधिकार नहीं। विकल्प D गलत है क्योंकि अनुच्छेद 227 उच्च न्यायालय को अपने क्षेत्र के सभी न्यायालयों और अधिकरणों पर अधीक्षण की शक्ति देता है, जो रिट जारी करने से भिन्न प्रशासनिक और पर्यवेक्षीय शक्ति है। 1976 के 42वें संशोधन ने अनुच्छेद 226 को सीमित किया और 1977 के 43वें संशोधन ने उसे बहाल किया।

Q8.भारतीय राजव्यवस्थाकठिन

42वें संविधान संशोधन के कुछ भागों को रद्द करते हुए उच्चतम न्यायालय ने किस वाद में कहा कि न्यायिक पुनर्विलोकन संविधान के आधारभूत ढांचे का अंग है?

  1. A.गोलकनाथ वाद, 1967
  2. B.मिनर्वा मिल्स वाद, 1980
  3. C.शंकरी प्रसाद वाद, 1951
  4. D.मेनका गांधी वाद, 1978
उत्तर देखें

सही उत्तर: B. मिनर्वा मिल्स वाद, 1980

व्याख्या

सही उत्तर B, मिनर्वा मिल्स वाद, 1980 है। मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ वाद में उच्चतम न्यायालय ने 1976 के 42वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़े गए उन उपबंधों को रद्द किया जिन्होंने कहा था कि किसी संविधान संशोधन को किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती और संसद की संशोधन शक्ति असीमित है; न्यायालय ने माना कि न्यायिक पुनर्विलोकन तथा संशोधन शक्ति की सीमितता दोनों आधारभूत ढांचे के अंग हैं। विकल्प A गलत है क्योंकि 1967 का गोलकनाथ वाद यह कहता है कि संशोधन द्वारा मूल अधिकार सीमित नहीं किए जा सकते और वह भावी विखंडन के सिद्धांत के लिए याद किया जाता है, परंतु वह 42वें संशोधन और आधारभूत ढांचे के सिद्धांत से पहले का है। विकल्प C गलत है क्योंकि 1951 के शंकरी प्रसाद वाद ने पहले संशोधन को वैध ठहराया था और संशोधन शक्ति पर उलटा दृष्टिकोण रखा था। विकल्प D गलत है क्योंकि 1978 का मेनका गांधी वाद अनुच्छेद 21 की दैहिक स्वतंत्रता का अर्थ विस्तृत करता है।

Q9.भारतीय राजव्यवस्थाआसान

भारतीय संविधान में न्यायिक पुनर्विलोकन की अवधारणा किस देश की संवैधानिक व्यवस्था से ली गई है?

  1. A.ब्रिटेन
  2. B.संयुक्त राज्य अमेरिका
  3. C.आयरलैंड
  4. D.कनाडा
उत्तर देखें

सही उत्तर: B. संयुक्त राज्य अमेरिका

व्याख्या

सही उत्तर B, संयुक्त राज्य अमेरिका है। न्यायिक पुनर्विलोकन, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, न्यायाधीशों को महाभियोग से हटाना, लिखित प्रस्तावना और मूल अधिकार—ये सभी विशेषताएं संविधान निर्माताओं ने अमेरिकी व्यवस्था से ली थीं, जहां 1803 के मारबरी बनाम मैडिसन वाद में न्यायालय ने यह शक्ति प्रतिपादित की थी। विकल्प A गलत है क्योंकि ब्रिटेन में संसदीय संप्रभुता है और कोई लिखित संविधान नहीं जिसकी कसौटी पर संसद के अधिनियम को तोला जा सके; ब्रिटेन से भारत ने संसदीय शासन, विधि का शासन, एकल नागरिकता तथा उपचार के रूप में रिट लीं। विकल्प C गलत है क्योंकि आयरलैंड से नीति निदेशक तत्व, राज्यसभा में सदस्यों का नाम-निर्देशन तथा राष्ट्रपति के निर्वाचन की पद्धति ली गई है। विकल्प D गलत है क्योंकि कनाडा से सशक्त केंद्र वाला संघ, अवशिष्ट शक्तियों का संघ के पास होना तथा राज्यपालों की नियुक्ति ली गई है।

Q10.भारतीय राजव्यवस्थामध्यम

अनुच्छेद 32 के अधीन रिट क्षेत्राधिकार के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?

  1. A.उच्चतम न्यायालय अनुच्छेद 32 के अधीन किसी भी विधिक अधिकार के प्रवर्तन के लिए रिट जारी कर सकता है
  2. B.अनुच्छेद 32 के अधिकार को कभी निलंबित नहीं किया जा सकता
  3. C.अनुच्छेद 32 स्वयं भाग तीन में रखा गया एक मूल अधिकार है
  4. D.केवल संसद उच्चतम न्यायालय को पांच रिट जारी करने के लिए प्राधिकृत कर सकती है
उत्तर देखें

सही उत्तर: C. अनुच्छेद 32 स्वयं भाग तीन में रखा गया एक मूल अधिकार है

व्याख्या

सही उत्तर C है। अनुच्छेद 32 भाग तीन में आता है और स्वयं एक मूल अधिकार है; इसी कारण किसी अन्य मूल अधिकार का उल्लंघन सिद्ध हो जाने पर उसके अधीन दी गई याचिका ठुकराई नहीं जा सकती। विकल्प A गलत है क्योंकि अनुच्छेद 32 का क्षेत्राधिकार केवल मूल अधिकारों के प्रवर्तन तक सीमित है; साधारण विधिक अधिकार के लिए अनुच्छेद 226 के अधीन उच्च न्यायालय या दीवानी न्यायालय जाना पड़ता है। विकल्प B गलत है क्योंकि अनुच्छेद 359 राष्ट्रपति को राष्ट्रीय आपात के प्रवर्तन के दौरान यह शक्ति देता है कि वे आदेश में उल्लिखित अधिकारों के प्रवर्तन के लिए किसी न्यायालय जाने के अधिकार को निलंबित कर दें। विकल्प D गलत है क्योंकि रिट जारी करने की शक्ति सीधे अनुच्छेद 32(2) देता है; अनुच्छेद 32(3) केवल यह जोड़ता है कि संसद किसी अन्य न्यायालय को यह शक्ति दे सकती है, जिसका प्रयोग अभी तक नहीं हुआ।

Q11.भारतीय राजव्यवस्थाकठिन

निम्नलिखित में से किस स्थिति में बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट जारी नहीं की जाएगी?

  1. A.किसी निजी व्यक्ति द्वारा किया गया निरोध
  2. B.विधानमंडल की अवमानना के लिए किया गया निरोध
  3. C.गिरफ्तारी के आधार बताए बिना किया गया निरोध
  4. D.वह निरोध जो न्यायालय के आदेश के बाद अवैध हो गया हो
उत्तर देखें

सही उत्तर: B. विधानमंडल की अवमानना के लिए किया गया निरोध

व्याख्या

सही उत्तर B है। बंदी प्रत्यक्षीकरण उन स्थितियों में अस्वीकार कर दी जाती है जहां निरोध वैध हो, जहां कार्यवाही किसी विधानमंडल या न्यायालय की अवमानना के लिए हो, जहां निरोध सक्षम न्यायालय के आदेश से हुआ हो, तथा जहां निरोध उस न्यायालय के क्षेत्राधिकार से बाहर हो जिसके समक्ष याचिका दी गई है। विकल्प A गलत है क्योंकि बंदी प्रत्यक्षीकरण एकमात्र रिट है जो निजी व्यक्ति के विरुद्ध भी चलती है, इसलिए किसी निजी व्यक्ति द्वारा अवैध रूप से बंद किए गए व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष लाया जा सकता है। विकल्प C गलत है क्योंकि गिरफ्तारी के आधार न बताना अनुच्छेद 22 का उल्लंघन है, जिससे निरोध अवैध हो जाता है और रिट उपलब्ध हो जाती है। विकल्प D गलत है क्योंकि ऐसा निरोध, जो आरंभ में वैध रहा हो पर बाद में अवैध हो गया हो, इस रिट का ठीक विषय है; न्यायालय निरोध की वैधता उस तिथि को देखता है जिस दिन वह याचिका सुनता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रतिषेध और उत्प्रेषण में क्या अंतर है?

दोनों न्यायिक और अर्ध-न्यायिक प्राधिकारियों को जारी होती हैं, परंतु प्रतिषेध निवारक है और कार्यवाही लंबित रहते जारी होती है, जिससे न्यायालय या अधिकरण अपने क्षेत्राधिकार से बाहर न जाए। उत्प्रेषण उपचारात्मक है और आदेश पारित होने के बाद जारी होती है, जिससे वाद उच्च न्यायालय को हस्तांतरित हो या आदेश रद्द हो। 1991 से उत्प्रेषण उन प्रशासनिक प्राधिकारियों को भी जारी हो सकती है जिनके निर्णय व्यक्तियों के अधिकार प्रभावित करते हैं, प्रतिषेध को नहीं।

अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226 में कौन अधिक विस्तृत है?

विषय की दृष्टि से अनुच्छेद 226 अधिक विस्तृत है, क्योंकि उच्च न्यायालय मूल अधिकारों तथा किसी अन्य प्रयोजन, यानी साधारण विधिक अधिकारों के लिए भी रिट जारी कर सकता है। अनुच्छेद 32 केवल मूल अधिकारों तक सीमित है। क्षेत्र और बल की दृष्टि से अनुच्छेद 32 अधिक व्यापक है: उच्चतम न्यायालय की रिट पूरे भारत में चलती है और मूल अधिकार का उल्लंघन सिद्ध होने पर उपचार से इनकार नहीं हो सकता, जबकि उच्च न्यायालय की शक्ति विवेकाधीन और अपने क्षेत्र तक सीमित है।

क्या किसी निजी व्यक्ति के विरुद्ध रिट जारी हो सकती है?

केवल बंदी प्रत्यक्षीकरण। यह उस किसी को भी जारी होती है जिसने किसी व्यक्ति को निरुद्ध रखा है, इसलिए निजी व्यक्ति द्वारा अवैध रूप से बंद किए गए व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कराया जा सकता है। परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार-पृच्छा लोक प्राधिकारियों, न्यायालयों, अधिकरणों अथवा लोक पद धारकों के विरुद्ध ही चलती हैं।

क्या न्यायिक पुनर्विलोकन शब्द संविधान में आया है?

यह शब्द संविधान के पाठ में कहीं नहीं है। यह शक्ति कई अनुच्छेदों को मिलाकर पढ़ने से निकलती है, मुख्यतः अनुच्छेद 13, अनुच्छेद 32 और 226, अनुच्छेद 131 से 136 तथा 143, अनुच्छेद 245, 246, 251 और 254, तथा अनुच्छेद 372। मिनर्वा मिल्स तथा बाद के वादों में उच्चतम न्यायालय ने माना है कि न्यायिक पुनर्विलोकन आधारभूत ढांचे का अंग है, इसलिए संविधान संशोधन से इसे समाप्त नहीं किया जा सकता।

अधिकार-पृच्छा कौन जारी कर सकता है और किन पदों के विरुद्ध?

अनुच्छेद 32 के अधीन उच्चतम न्यायालय और अनुच्छेद 226 के अधीन उच्च न्यायालय। यह केवल वहां जारी होती है जहां पद संविधान या किसी कानून से बना स्थायी प्रकृति का सारवान लोक पद हो; निजी अथवा पूर्णतः मंत्रिस्तरीय पद के विरुद्ध नहीं। अन्य रिट से भिन्न, इसे कोई भी इच्छुक व्यक्ति मांग सकता है, केवल व्यथित पक्षकार नहीं।

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