भारतीय संविधान की प्रस्तावना: नोट्स, मुख्य शब्द और PYQ
भारत के संविधान की प्रस्तावना शब्द-दर-शब्द: इसका पाठ, स्रोत, 42वां संशोधन, इसकी स्थिति पर न्यायालय के फैसले और परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्न।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 5 मिनट

प्रस्तावना सिर्फ एक वाक्य की है, फिर भी एसएससी, रेलवे और राज्य स्तरीय परीक्षाओं में संविधान के सबसे अधिक पूछे जाने वाले हिस्सों में से एक है। परीक्षक इसके सटीक शब्द और उनका क्रम पूछते हैं, बाद में कौन-से शब्द जोड़े गए, इसके विचार कहां से आए, और क्या यह संविधान का हिस्सा है भी या नहीं। नीचे दिया पाठ एक बार धीरे-धीरे पढ़ें; इस विषय के लगभग हर प्रश्न का उत्तर इसी में है।
प्रस्तावना का पाठ
संविधान के आधिकारिक हिंदी पाठ में प्रस्तावना को उद्देशिका कहा गया है। 42वें संशोधन के बाद इसका वर्तमान पाठ इस प्रकार है:
हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को:
सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय,
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता,
प्रतिष्ठा और अवसर की समता
प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सब में
व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए
दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई० (मिति मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी, संवत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।
प्रस्तावना हमें चार बातें बताती है
- अधिकार का स्रोत: संविधान अपना अधिकार भारत के लोगों से प्राप्त करता है ("हम, भारत के लोग")।
- भारतीय राज्य की प्रकृति: संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और गणराज्य।
- उद्देश्य: न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता।
- अपनाने की तिथि: 26 नवंबर 1949।
हर शब्द का अर्थ
संप्रभु (प्रभुत्व-संपन्न)
भारत न किसी दूसरे देश पर निर्भर है और न किसी का डोमिनियन। वह अपने आंतरिक और बाहरी मामले खुद तय करने के लिए स्वतंत्र है। राष्ट्रमंडल की सदस्यता से इस संप्रभुता पर कोई असर नहीं पड़ता।
समाजवादी
यह शब्द 1976 में 42वें संशोधन से जोड़ा गया। भारतीय समाजवाद लोकतांत्रिक समाजवाद है, जो लोकतांत्रिक तरीकों से गरीबी, अज्ञानता, बीमारी और अवसर की असमानता को खत्म करना चाहता है, और ऐसी मिश्रित अर्थव्यवस्था में काम करता है जहां सार्वजनिक और निजी क्षेत्र साथ-साथ चलते हैं।
पंथनिरपेक्ष
यह शब्द भी 1976 में जोड़ा गया। भारतीय पंथनिरपेक्षता सकारात्मक है: राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है और वह सभी धर्मों को समान दर्जा और समान सम्मान देता है।
लोकतांत्रिक
सत्ता जनता के पास है, जो अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन करती है। प्रस्तावना केवल राजनीतिक लोकतंत्र तक सीमित नहीं है, वह सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की भी बात करती है।
गणराज्य
राज्य का प्रमुख, यानी राष्ट्रपति, जन्म से नहीं बल्कि एक निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है। हर सार्वजनिक पद हर नागरिक के लिए खुला है।
चार उद्देश्य
| उद्देश्य | प्रस्तावना में जैसा लिखा है | विचार कहां से लिया गया |
|---|---|---|
| न्याय | सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक | रूसी क्रांति (पूर्व सोवियत संघ) |
| स्वतंत्रता | विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की | फ्रांसीसी क्रांति |
| समता | प्रतिष्ठा और अवसर की | फ्रांसीसी क्रांति |
| बंधुता | व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली | फ्रांसीसी क्रांति |
परीक्षा का जाल: प्रश्नों में एक शब्द बदलकर परखा जाता है। न्याय "सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक" है, "प्रशासनिक" कभी नहीं। स्वतंत्रता "विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना" की है। समता "प्रतिष्ठा और अवसर" की है। और विशेषणों का क्रम तय है: संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, गणराज्य।
प्रस्तावना कहां से आई
प्रस्तावना उस उद्देश्य प्रस्ताव पर आधारित है, जिसे जवाहरलाल नेहरू ने 13 दिसंबर 1946 को संविधान सभा में पेश किया था और जिसे सभा ने 22 जनवरी 1947 को स्वीकार किया। संविधान की शुरुआत प्रस्तावना से करने का विचार अमेरिका के संविधान से लिया गया। स्वतंत्रता, समता और बंधुता के आदर्श फ्रांसीसी क्रांति से और सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक न्याय का आदर्श रूसी क्रांति से आया।
संविधान सभा ने प्रस्तावना को सबसे आखिर में लिया, जब बाकी संविधान तय हो चुका था, ताकि यह उस पाठ के अनुरूप रहे जिसकी यह भूमिका है।
42वां संशोधन: अब तक का एकमात्र बदलाव
प्रस्तावना में अब तक केवल एक बार संशोधन हुआ है, 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 से। इसने तीन शब्द जोड़े:
- समाजवादी और पंथनिरपेक्ष, भारत के वर्णन में
- अखंडता, "राष्ट्र की एकता और अखंडता" वाक्यांश में
क्या प्रस्तावना संविधान का हिस्सा है?
सर्वोच्च न्यायालय ने अलग-अलग समय पर इस प्रश्न का अलग उत्तर दिया है, और ये मामले भी परीक्षाओं में पूछे जाते हैं।
| मामला | न्यायालय का निर्णय |
|---|---|
| बेरुबारी यूनियन मामला (1960) | प्रस्तावना संविधान का हिस्सा नहीं है, हालांकि यह संविधान निर्माताओं के मन को समझने की कुंजी है। |
| केशवानंद भारती मामला (1973) | पहले का मत पलट दिया: प्रस्तावना संविधान का हिस्सा है और इसमें संशोधन हो सकता है, लेकिन इसकी मूल विशेषताएं नहीं बदली जा सकतीं। |
| एलआईसी ऑफ इंडिया मामला (1995) | फिर से कहा कि प्रस्तावना संविधान का अभिन्न हिस्सा है। |
प्रस्तावना को न्यायालय में लागू नहीं कराया जा सकता: यह न विधायिका की शक्तियों का स्रोत है और न उन पर रोक। इसका मुख्य उपयोग तब होता है जब किसी प्रावधान का अर्थ स्पष्ट न हो, तब संविधान की व्याख्या में सहायता के रूप में।
प्रमुख व्यक्तियों ने इसे क्या कहा
- एन.ए. पालकीवाला: "संविधान का पहचान पत्र"
- के.एम. मुंशी: संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य की "राजनीतिक कुंडली"
- सर अर्नेस्ट बार्कर: संविधान का "मूल स्वर" (की-नोट)
- ठाकुर दास भार्गव: "संविधान की आत्मा"
एक मिनट में दोहराएं
- अधिकार का स्रोत: भारत के लोग। प्रस्तावना में तिथि: 26 नवंबर 1949।
- क्रम: संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, गणराज्य।
- एक बार संशोधन: 42वां संशोधन, 1976, जिसने समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंडता जोड़े।
- नेहरू के उद्देश्य प्रस्ताव पर आधारित; प्रस्तावना का विचार अमेरिका से।
- स्वतंत्रता, समता, बंधुता फ्रांस से; न्याय सोवियत संघ से।
- बेरुबारी (1960): हिस्सा नहीं; केशवानंद भारती (1973): हिस्सा है और संशोधन योग्य; एलआईसी (1995): अभिन्न हिस्सा।
- न्यायालय में लागू नहीं; व्याख्या में सहायक। "पहचान पत्र": एन.ए. पालकीवाला।
परीक्षा की दृष्टि से
प्रस्तावना के सटीक शब्द और उनका क्रम, 42वें संशोधन से जोड़े गए तीन शब्द, इसके आदर्शों के स्रोत (प्रस्तावना का विचार अमेरिका से, स्वतंत्रता, समता और बंधुता फ्रांस से, न्याय सोवियत संघ से), इसकी स्थिति पर बेरुबारी, केशवानंद भारती और एलआईसी मामले, और किसने इसे क्या कहा, इन पर प्रश्नों की अपेक्षा करें। एसएससी की परीक्षाओं में विशेषणों का क्रम, स्वतंत्रता के प्रकार और इसके विचारों के स्रोत पूछे गए हैं; आरआरबी एनटीपीसी में इसके आरंभिक शब्द और व्याख्या में इसकी भूमिका पूछी गई है।
महत्वपूर्ण तथ्य
| आरंभिक शब्द | हम, भारत के लोग |
|---|---|
| संविधान के हिंदी पाठ में नाम | उद्देशिका |
| राज्य की प्रकृति | संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, गणराज्य |
| उद्देश्य | न्याय, स्वतंत्रता, समता, बंधुता |
| उल्लिखित तिथि | 26 नवंबर 1949 |
| आधार | जवाहरलाल नेहरू का उद्देश्य प्रस्ताव (13 दिसंबर 1946) |
| प्रस्तावना का विचार | अमेरिका के संविधान से |
| स्वतंत्रता, समता, बंधुता | फ्रांसीसी क्रांति से |
| सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय | रूसी क्रांति (पूर्व सोवियत संघ) से |
| संशोधन | एक बार, 42वां संशोधन अधिनियम, 1976 |
| 1976 में जोड़े गए शब्द | समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, अखंडता |
| क्या संविधान का हिस्सा है? | हां: केशवानंद भारती (1973) और एलआईसी ऑफ इंडिया (1995); बेरुबारी (1960) में कहा गया था नहीं |
| न्यायालय में लागू? | नहीं; व्याख्या में सहायक |
| संविधान का पहचान पत्र कहा | एन.ए. पालकीवाला ने |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
भारत के संविधान की प्रस्तावना के शब्दों से रिक्त स्थान भरें: हम, ______, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को....
- A.सर्वोच्च न्यायालय
- B.भारतीय संसद
- C.केंद्र सरकार
- D.भारत के लोग
उत्तर देखें
सही उत्तर: D. भारत के लोग
व्याख्या
सही उत्तर भारत के लोग है। प्रस्तावना "हम, भारत के लोग" शब्दों से शुरू होती है, जो बताते हैं कि संविधान अपना अधिकार जनता से प्राप्त करता है। संविधान किसी सरकार, न्यायालय या विधायिका ने नहीं दिया; जनता ने अपनी संविधान सभा के माध्यम से 26 नवंबर 1949 को इसे अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित किया।
सर्वोच्च न्यायालय, भारतीय संसद और केंद्र सरकार, तीनों संविधान द्वारा बनाए गए हैं, इसलिए इनमें से कोई भी उसके अधिकार का स्रोत नहीं हो सकता। ये केवल वही शक्तियां इस्तेमाल करते हैं जो संविधान इन्हें देता है। प्रस्तावना हमें जो चार बातें बताती है, उनमें यह पहली है; बाकी तीन हैं भारतीय राज्य की प्रकृति (संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, गणराज्य), उसके उद्देश्य (न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता) और अपनाने की तिथि। ऐसा रिक्त स्थान वाला प्रश्न सटीक आरंभिक शब्दों को परखता है, इसलिए पाठ को जैसा लिखा है वैसा याद करें।
प्रस्तावना के अनुसार निम्नलिखित में से कौन-सा शब्द-क्रम सही है?
- A.संप्रभु, पंथनिरपेक्ष, समाजवादी, लोकतांत्रिक, गणराज्य
- B.संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, गणराज्य
- C.पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, पंथनिरपेक्ष, समाजवादी, संप्रभु
- D.समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, गणराज्य, संप्रभु
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, गणराज्य
व्याख्या
सही उत्तर संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, गणराज्य है। प्रस्तावना भारत का वर्णन इसी क्रम में करती है: "संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य"। समाजवादी और पंथनिरपेक्ष शब्द 1976 में 42वें संशोधन से संप्रभु और लोकतांत्रिक के बीच जोड़े गए; उससे पहले यह वाक्यांश "संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य" था।
पहला विकल्प समाजवादी और पंथनिरपेक्ष की जगह आपस में बदल देता है, जो सबसे आम गलती है, क्योंकि दोनों शब्द एक साथ जोड़े गए थे। तीसरा विकल्प "पंथनिरपेक्ष" को दोहराता है और गलत शब्द से शुरू होता है, और चौथा "संप्रभु" को आगे से हटाकर अंत में रख देता है। क्रम याद रखने का आसान तरीका: 1976 में जोड़े गए दोनों शब्द बीच में साथ-साथ हैं, पहले समाजवादी फिर पंथनिरपेक्ष, मूल पहले शब्द (संप्रभु) और मूल अंतिम दो शब्दों (लोकतांत्रिक गणराज्य) के बीच।
भारतीय संविधान के 42वें संशोधन द्वारा प्रस्तावना में निम्नलिखित में से कौन-सा शब्द जोड़ा गया?
- A.समाजवादी
- B.लोकतांत्रिक
- C.गणराज्य
- D.संप्रभु
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. समाजवादी
व्याख्या
सही उत्तर समाजवादी है। 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 ने प्रस्तावना में तीन शब्द जोड़े: भारत के वर्णन में "समाजवादी" और "पंथनिरपेक्ष", तथा "राष्ट्र की एकता और अखंडता" वाक्यांश में "अखंडता"। प्रस्तावना में अब तक किया गया यह एकमात्र संशोधन है।
लोकतांत्रिक, गणराज्य और संप्रभु शब्द शुरुआत से ही प्रस्तावना में थे: 26 नवंबर 1949 को अपनाई गई प्रस्तावना में भारत को "संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य" कहा गया था। इसीलिए ये यहां गलत हैं। इस संशोधन पर प्रश्न कई रूपों में आते हैं: कौन-सा शब्द जोड़ा गया, कौन-सा नहीं जोड़ा गया, या कितने शब्द जोड़े गए। तीनों को साथ याद रखें: समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंडता, 1976 में जोड़े गए। इससे जुड़ा एक और तथ्य केशवानंद भारती मामला (1973) है, जिसने तीन साल पहले कहा था कि प्रस्तावना संविधान का हिस्सा है और मूल विशेषताएं बदले बिना इसमें संशोधन हो सकता है।
भारत के संविधान की प्रस्तावना में निम्नलिखित में से किसका उल्लेख है?
- A.विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता
- B.मानवीय गरिमा सुनिश्चित करने वाली बंधुता
- C.प्रतिष्ठा और रोज़गार की समता
- D.सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक न्याय
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता
व्याख्या
सही उत्तर विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता है। प्रस्तावना स्वतंत्रता के लिए ठीक यही शब्द इस्तेमाल करती है।
बाकी हर विकल्प मूल पाठ का एक शब्द बदल देता है, और यह प्रश्न इसी तरह लोगों को फंसाता है। प्रस्तावना "व्यक्ति की गरिमा" और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता की बात करती है, "मानवीय गरिमा" की नहीं। वह "प्रतिष्ठा और अवसर की समता" का वादा करती है, प्रतिष्ठा और रोज़गार की नहीं। और प्रस्तावना में न्याय "सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक" है; "प्रशासनिक" शब्द उसमें है ही नहीं। जब कोई विकल्प लगभग सही लगे, तो उसे पाठ से शब्द-दर-शब्द मिलाएं: न्याय (सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक), स्वतंत्रता (विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म, उपासना), समता (प्रतिष्ठा, अवसर) और बंधुता (व्यक्ति की गरिमा, राष्ट्र की एकता और अखंडता)।
भारतीय संविधान की प्रस्तावना का विचार ______ के संविधान से लिया गया है।
- A.सोवियत संघ (वर्तमान रूस)
- B.कनाडा
- C.ब्रिटेन
- D.संयुक्त राज्य अमेरिका
उत्तर देखें
सही उत्तर: D. संयुक्त राज्य अमेरिका
व्याख्या
सही उत्तर संयुक्त राज्य अमेरिका है। संविधान की शुरुआत प्रस्तावना से करने का विचार अमेरिका के संविधान से लिया गया, जिसका पाठ खुद "We the People" शब्दों से शुरू होता है। लेकिन भारत की प्रस्तावना की विषय-वस्तु जवाहरलाल नेहरू के उद्देश्य प्रस्ताव से आई, जो 13 दिसंबर 1946 को संविधान सभा में पेश हुआ और 22 जनवरी 1947 को स्वीकार हुआ।
बाकी देश प्रस्तावना या संविधान के दूसरे हिस्सों के स्रोत हैं। सोवियत संघ सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय के आदर्श का स्रोत है। ब्रिटेन से संसदीय शासन, विधि का शासन और एकल नागरिकता ली गई। कनाडा से सशक्त केंद्र वाले संघ का मॉडल लिया गया। दो मिलते-जुलते प्रश्नों को अलग रखें: प्रस्तावना रखने का विचार अमेरिका से आया, जबकि इसके भीतर लिखे स्वतंत्रता, समता और बंधुता के आदर्श फ्रांसीसी क्रांति से आए।
स्वतंत्रता, समता और बंधुता के सिद्धांत किस देश के संविधान से लिए गए हैं?
- A.यूनाइटेड किंगडम
- B.फ्रांस
- C.कनाडा
- D.आयरलैंड
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. फ्रांस
व्याख्या
सही उत्तर फ्रांस है। प्रस्तावना में स्वतंत्रता, समता और बंधुता के आदर्श फ्रांस से लिए गए, जहां ये फ्रांसीसी क्रांति के मूल नारे थे। गणराज्य का विचार भी फ्रांस से ही आया है।
बाकी विकल्पों से भारत ने दूसरे प्रावधान लिए। यूनाइटेड किंगडम संसदीय शासन, विधि के शासन, मंत्रिमंडल प्रणाली और एकल नागरिकता का स्रोत है। कनाडा से सशक्त केंद्र वाले संघ और केंद्र के पास अवशिष्ट शक्तियों का विचार लिया गया। आयरलैंड से राज्य के नीति निदेशक तत्व और राष्ट्रपति के चुनाव की पद्धति ली गई। प्रस्तावना के चौथे उद्देश्य, न्याय, का स्रोत अलग है: रूसी क्रांति। इस तरह चार उद्देश्यों में से तीन (स्वतंत्रता, समता और बंधुता) फ्रांस से और एक (न्याय) पूर्व सोवियत संघ से जुड़ता है, और परीक्षक यह बंटवारा परखना पसंद करते हैं।
प्रस्तावना में सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय का आदर्श किस स्रोत से आया?
- A.फ्रांसीसी क्रांति
- B.अमेरिकी स्वतंत्रता घोषणा
- C.रूसी क्रांति
- D.ब्रिटिश मैग्ना कार्टा
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. रूसी क्रांति
व्याख्या
सही उत्तर रूसी क्रांति है। प्रस्तावना में सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय का आदर्श 1917 की रूसी क्रांति से प्रेरित है, इसीलिए पुस्तकों में इसका स्रोत अक्सर पूर्व सोवियत संघ बताया जाता है। यह फ्रांस से लिए गए तीन उद्देश्यों के साथ प्रस्तावना में है।
फ्रांसीसी क्रांति बाकी तीन उद्देश्यों, स्वतंत्रता, समता और बंधुता, का स्रोत है, इसलिए यह सबसे आकर्षक गलत उत्तर है। अमेरिका से जुड़ाव प्रस्तावना रखने के विचार का है, जो अमेरिका के संविधान से लिया गया, न्याय के आदर्श का नहीं। मैग्ना कार्टा अंग्रेज़ी संवैधानिक इतिहास का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है, लेकिन प्रस्तावना की किसी बात का स्रोत नहीं है। बंटवारा याद रखने का आसान तरीका: चार उद्देश्यों में से न्याय पूरब की ओर, यानी रूस की ओर, इशारा करता है, जबकि स्वतंत्रता, समता और बंधुता पश्चिम की ओर, यानी फ्रांस की ओर।
किस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अपना पुराना मत पलटते हुए कहा कि प्रस्तावना संविधान का हिस्सा है?
- A.बेरुबारी यूनियन मामला (1960)
- B.गोलकनाथ मामला (1967)
- C.एलआईसी ऑफ इंडिया मामला (1995)
- D.केशवानंद भारती मामला (1973)
उत्तर देखें
सही उत्तर: D. केशवानंद भारती मामला (1973)
व्याख्या
सही उत्तर केशवानंद भारती मामला (1973) है। 1960 के बेरुबारी यूनियन मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि प्रस्तावना संविधान का हिस्सा नहीं है, हालांकि यह संविधान निर्माताओं के मन को समझने की कुंजी है। केशवानंद भारती मामले में न्यायालय ने यह मत अस्वीकार किया और कहा कि प्रस्तावना संविधान का हिस्सा है और इसमें संशोधन हो सकता है, बशर्ते इसकी मूल विशेषताएं न बदलें।
बेरुबारी यूनियन मामला वही पुराना निर्णय है जिसे पलटा गया, इसलिए यह उत्तर नहीं हो सकता। एलआईसी ऑफ इंडिया मामला 1995 में बाद में आया और उसने केवल दोहराया कि प्रस्तावना संविधान का अभिन्न हिस्सा है; उसने कुछ पलटा नहीं। 1967 का गोलकनाथ मामला मौलिक अधिकारों में संशोधन की संसद की शक्ति से जुड़ा था, प्रस्तावना की स्थिति से नहीं। प्रश्न में "पलटते हुए" शब्द ही संकेत है: यह उस मामले की ओर इशारा करता है जिसने बेरुबारी का निर्णय पलटा, यानी केशवानंद भारती।
प्रस्तावना मुख्य रूप से निम्नलिखित में से किस रूप में काम करती है?
- A.संविधान की एक अनुसूची
- B.व्याख्या के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत
- C.एक वित्तीय दिशानिर्देश
- D.कानून का एक प्रवर्तनीय हिस्सा
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. व्याख्या के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत
व्याख्या
सही उत्तर व्याख्या के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत है। प्रस्तावना को न्यायालय में लागू नहीं कराया जा सकता: यह न विधायिका की शक्तियों का स्रोत है और न उन पर रोक। इसका मुख्य कानूनी उपयोग व्याख्या में सहायता के रूप में है। जब संविधान के किसी प्रावधान का अर्थ स्पष्ट न हो, तो न्यायालय संविधान निर्माताओं के उद्देश्यों को समझने के लिए प्रस्तावना की ओर देखते हैं।
बाकी विकल्प वे चीज़ें बताते हैं जो प्रस्तावना नहीं है। यह कोई अनुसूची नहीं है: संविधान की अनुसूचियां पाठ के अंत में दी गई अलग सूचियां हैं, जैसे भाषाओं की सूची। यह कोई वित्तीय दिशानिर्देश नहीं है। और यह कानून का प्रवर्तनीय हिस्सा भी नहीं है, जो सबसे आकर्षक गलत उत्तर है: केशवानंद भारती मामले (1973) में प्रस्तावना को संविधान का हिस्सा माने जाने के बाद भी यह न्यायालय में अप्रवर्तनीय ही रही। संविधान का हिस्सा होना और न्यायालय में लागू कराया जा सकना, दो अलग बातें हैं, और यह प्रश्न ठीक यही अंतर परखता है।
प्रस्तावना को ‘संविधान का पहचान पत्र’ किसने कहा?
- A.एन.ए. पालकीवाला
- B.के.एम. मुंशी
- C.सर अर्नेस्ट बार्कर
- D.डॉ. बी.आर. आंबेडकर
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. एन.ए. पालकीवाला
व्याख्या
सही उत्तर एन.ए. पालकीवाला है। भारत के सबसे प्रतिष्ठित विधिवेत्ताओं और संवैधानिक वकीलों में से एक नानी अर्देशिर पालकीवाला ने प्रस्तावना को "संविधान का पहचान पत्र" कहा, क्योंकि यह एक ही वाक्य में बता देती है कि संविधान क्या है, उसका अधिकार कहां से आता है और वह क्या हासिल करना चाहता है।
बाकी नाम दूसरे वर्णनों से जुड़े हैं, और परीक्षक इन्हें इसीलिए रखते हैं क्योंकि ये सही लगते हैं। प्रारूप समिति के सदस्य के.एम. मुंशी ने प्रस्तावना को संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य की "राजनीतिक कुंडली" कहा। ब्रिटिश राजनीतिशास्त्री सर अर्नेस्ट बार्कर ने इसे संविधान का "मूल स्वर" (की-नोट) बताया। डॉ. बी.आर. आंबेडकर प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे, और उनका सबसे प्रसिद्ध वर्णन अनुच्छेद 32 का है, जिसे उन्होंने संविधान का हृदय और आत्मा कहा। इन्हें जोड़ियों में याद करें, क्योंकि प्रश्न अक्सर वाक्यांश देकर व्यक्ति पूछते हैं, या इसका उल्टा।
भारत के संविधान की प्रस्तावना में अब तक कितनी बार संशोधन हुआ है?
- A.कभी नहीं
- B.एक बार
- C.दो बार
- D.तीन बार
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. एक बार
व्याख्या
सही उत्तर एक बार है। प्रस्तावना में केवल एक बार, 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 से, संशोधन हुआ है। उस संशोधन ने तीन शब्द जोड़े: भारत के वर्णन में "समाजवादी" और "पंथनिरपेक्ष", तथा "राष्ट्र की एकता और अखंडता" वाक्यांश में "अखंडता"।
"कभी नहीं" गलत है, क्योंकि 1976 का बदलाव दर्ज है; इसी कारण आज उद्धृत की जाने वाली प्रस्तावना 26 नवंबर 1949 को अपनाए गए पाठ से अलग है, जिसमें भारत को केवल "संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य" कहा गया था। "दो बार" और "तीन बार" संशोधनों की संख्या को जोड़े गए शब्दों की संख्या, यानी तीन, से मिला देते हैं। दोनों संख्याओं को अलग रखें: एक संशोधन, तीन शब्द। प्रस्तावना में संशोधन हो सकता है, यह बात सर्वोच्च न्यायालय ने केशवानंद भारती मामले (1973) में तय की, जिसमें कहा गया कि यह संविधान का हिस्सा है और इसकी मूल विशेषताएं नष्ट किए बिना इसमें संशोधन हो सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
42वें संशोधन से प्रस्तावना में कौन-से शब्द जोड़े गए?
तीन शब्द: भारत के वर्णन में समाजवादी और पंथनिरपेक्ष, तथा राष्ट्र की एकता और अखंडता वाक्यांश में अखंडता। 1976 का 42वां संशोधन अधिनियम अब तक प्रस्तावना में किया गया एकमात्र संशोधन है।
क्या प्रस्तावना भारतीय संविधान का हिस्सा है?
हां। बेरुबारी यूनियन मामले (1960) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि यह हिस्सा नहीं है, लेकिन केशवानंद भारती मामले (1973) में उसने माना कि प्रस्तावना संविधान का हिस्सा है और इसकी मूल विशेषताएं बदले बिना इसमें संशोधन हो सकता है। एलआईसी ऑफ इंडिया मामले (1995) में इसकी पुष्टि हुई।
प्रस्तावना में शब्दों का सही क्रम क्या है?
संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, गणराज्य। इसके बाद उद्देश्य इस क्रम में आते हैं: न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता।
प्रस्तावना को संविधान का पहचान पत्र किसने कहा?
प्रसिद्ध विधिवेत्ता और संविधान विशेषज्ञ एन.ए. पालकीवाला ने। के.एम. मुंशी ने इसे गणराज्य की राजनीतिक कुंडली कहा और सर अर्नेस्ट बार्कर ने इसे संविधान का मूल स्वर कहा।
क्या प्रस्तावना को न्यायालय में लागू कराया जा सकता है?
नहीं। प्रस्तावना न्यायालय में प्रवर्तनीय नहीं है: यह न विधायिका को शक्तियां देती है और न उन्हें सीमित करती है। जहां कोई प्रावधान अस्पष्ट हो, वहां न्यायालय संविधान की व्याख्या के लिए इसका सहारा लेते हैं।
स्रोत
- भारत का संविधान — विधायी विभाग, विधि और न्याय मंत्रालय
- Indian Constitution at Work (कक्षा 11), अध्याय 10: संविधान का राजनीतिक दर्शन — एनसीईआरटी
