समान नागरिक संहिता (अनुच्छेद 44): वाद, बहस और प्रश्न
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए समान नागरिक संहिता के पूर्ण नोट्स: अनुच्छेद 44 और भाग 4, व्यक्तिगत कानून, शाह बानो तथा अन्य वाद, गोवा और उत्तराखंड।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 5 मिनट

समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का अर्थ है — विवाह, तलाक, भरण-पोषण, दत्तक ग्रहण, संरक्षकता, उत्तराधिकार और संपत्ति के बंटवारे पर देश के सभी नागरिकों के लिए एक ही कानून, चाहे उनका धर्म कोई भी हो। संविधान में यह विचार अनुच्छेद 44 में रखा गया है, जो कहता है कि राज्य भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा। परीक्षाओं में यह विषय हर साल आता है, क्योंकि एक ही अनुच्छेद संविधान के भाग 4, धार्मिक स्वतंत्रता के अनुच्छेदों और सर्वोच्च न्यायालय के कई प्रसिद्ध निर्णयों को आपस में जोड़ देता है।
अनुच्छेद 44 संविधान में कहां है
अनुच्छेद 44 संविधान के भाग 4 में है, जिसमें अनुच्छेद 36 से 51 तक राज्य के नीति निदेशक तत्व रखे गए हैं। अनुच्छेद 37 स्पष्ट करता है कि ये तत्व किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं, फिर भी देश के शासन में मूलभूत हैं। इसलिए कोई नागरिक यह मांग करते हुए रिट याचिका नहीं दायर कर सकता कि समान नागरिक संहिता बनाई जाए; यह दायित्व राज्य का है और इसे केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति पूरा कर सकती है। वर्गीकरण की दृष्टि से अनुच्छेद 44 उदार-बौद्धिक निदेशक तत्व माना जाता है, समाजवादी या गांधीवादी नहीं। व्यक्तिगत कानून केवल संघ का विषय भी नहीं है — विवाह और तलाक, शिशु और अवयस्क, दत्तक ग्रहण, वसीयत, निर्वसीयत उत्तराधिकार तथा संयुक्त परिवार और विभाजन सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची की प्रविष्टि 5 में आते हैं, इसलिए संसद और राज्य विधानमंडल दोनों कानून बना सकते हैं। यही कारण है कि कोई एक राज्य अपनी संहिता पारित कर सकता है।
| अनुच्छेद | निदेशक तत्व |
|---|---|
| 38 | लोक कल्याणकारी राज्य; आय, प्रतिष्ठा और अवसर की असमानता घटाना |
| 39(ख) और 39(ग) | भौतिक संसाधनों का सामूहिक हित में बंटवारा; धन का संकेंद्रण रोकना |
| 39क | समान न्याय और नि:शुल्क विधिक सहायता |
| 40 | ग्राम पंचायतों का गठन |
| 43 | निर्वाह मजदूरी और कुटीर उद्योग |
| 44 | नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता |
| 45 | छह वर्ष से कम आयु के बच्चों की देखभाल और शिक्षा |
| 47 | पोषण, जीवन स्तर और लोक स्वास्थ्य में सुधार |
| 48क | पर्यावरण, वन और वन्यजीव का संरक्षण |
| 51 | अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि |
आज लागू व्यक्तिगत कानून
भारत में एक पारिवारिक कानून नहीं, कई हैं, और अनुच्छेद 44 इसी स्थिति को संबोधित करता है। हिंदू विवाह अधिनियम 1955, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956, हिंदू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम 1956 तथा हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम 1956 मिलकर हिंदू कोड बनाते हैं और ये हिंदू, बौद्ध, जैन तथा सिख पर लागू होते हैं। मुसलमानों पर मुख्यतः मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट 1937 लागू होता है। ईसाइयों के लिए भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम 1872 और भारतीय तलाक अधिनियम 1869 हैं, तथा पारसियों के लिए पारसी विवाह और विच्छेद अधिनियम 1936। इन सबके साथ विशेष विवाह अधिनियम 1954 खड़ा है, जो एक पंथनिरपेक्ष कानून है और कोई भी दो भारतीय नागरिक इसे चुनकर सिविल विवाह कर सकते हैं; ऐसे विवाह में उत्तराधिकार भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 से तय होता है। इसी कारण विशेष विवाह अधिनियम को पहले से उपलब्ध स्वैच्छिक समान नागरिक संहिता कहा जाता है।
संविधान सभा की बहस
मसौदा अनुच्छेद 35, जो आगे अनुच्छेद 44 बना, का समर्थन के. एम. मुंशी और अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर ने किया, और प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने कहा कि समान संहिता समय की बात है और संसद चाहे तो आरंभ में इसे स्वैच्छिक रख सकती है। मोहम्मद इस्माइल खान, नजीरुद्दीन अहमद, महबूब अली बेग और बी. पोकर साहब जैसे सदस्यों ने व्यक्तिगत कानून की रक्षा के लिए संशोधन रखे। सभा ने उपबंध रखा, परंतु उसे अधिकारों में नहीं, निदेशक तत्वों में स्थान दिया — यही समझौता परीक्षार्थी को याद रखना चाहिए। हिंदू कोड बिल अटक जाने पर डॉ. आंबेडकर ने 1951 में विधि मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया; बाद में वह विधेयक चार अधिनियमों में बांटकर पारित हुआ। इसकी पृष्ठभूमि बी. एन. राव की अध्यक्षता वाली हिंदू विधि समिति ने तैयार की थी, और उससे बहुत पहले 1840 की लेक्स लोकी रिपोर्ट ने भारतीय कानून के संहिताकरण की सिफारिश करते हुए हिंदू और मुस्लिम व्यक्तिगत कानून को अछूता छोड़ा था।
परीक्षा में पूछे जाने वाले निर्णय
| वाद | वर्ष | न्यायालय का निर्णय या टिप्पणी |
|---|---|---|
| मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम | 1985 | दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अंतर्गत भरण-पोषण स्वीकार; न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 44 मृत अक्षर बना रहा |
| सरला मुद्गल बनाम भारत संघ | 1995 | दूसरा विवाह करने के लिए धर्म परिवर्तन से पहला हिंदू विवाह समाप्त नहीं होता; दूसरा विवाह द्विविवाह है |
| जॉन वल्लामट्टम बनाम भारत संघ | 2003 | भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 118, जो ईसाइयों के धार्मिक या पूर्त उद्देश्य के दान पर रोक लगाती थी, असंवैधानिक घोषित |
| शायरा बानो बनाम भारत संघ | 2017 | तलाक-ए-बिद्दत यानी तत्काल तीन तलाक को पांच न्यायाधीशों की पीठ ने बहुमत से अपास्त किया |
| जोस पॉलो कॉटिन्हो बनाम मारिया लुइजा वैलेंटिना परेरा | 2019 | न्यायालय ने गोवा को समान नागरिक संहिता वाले राज्य का उज्ज्वल उदाहरण कहा |
गोवा, उत्तराखंड और विधि आयोग
नक्शे पर गोवा अपवाद है। 1961 में गोवा की मुक्ति के बाद भी 1867 की पुर्तगाली सिविल संहिता लागू रही, इसलिए वहां सभी धर्मों के लोगों पर एक ही पारिवारिक कानून है, हालांकि कुछ समुदायगत प्रथाएं बनी हुई हैं। उत्तराखंड स्वतंत्र भारत का पहला राज्य बना जिसने समान नागरिक संहिता अधिनियमित की — विधानसभा ने विधेयक फरवरी 2024 में पारित किया, राष्ट्रपति की अनुमति मिली, और कानून जनवरी 2025 में लागू किया गया। पूर्वोत्तर में प्रथागत कानून को संवैधानिक संरक्षण मिला हुआ है: नगालैंड के लिए अनुच्छेद 371क और मिजोरम के लिए अनुच्छेद 371ग, तथा अन्यत्र जनजातीय प्रथा की रक्षा छठी अनुसूची करती है। इसीलिए कहा जाता है कि राष्ट्रव्यापी संहिता में अपवाद रखने पड़ेंगे। इक्कीसवें विधि आयोग ने 2018 के पारिवारिक विधि सुधार संबंधी परामर्श पत्र में कहा था कि उस समय समान नागरिक संहिता न आवश्यक है न वांछनीय, और सुझाव दिया कि प्रत्येक व्यक्तिगत कानून के भेदभावपूर्ण प्रावधानों में संशोधन किया जाए।
पक्ष और विपक्ष के तर्क
- पक्ष में: अनुच्छेद 14 के अनुसार विधि के समक्ष समता, तलाक, भरण-पोषण और उत्तराधिकार में महिलाओं को न्याय, मुकदमों का सरल होना, और वह राष्ट्रीय एकीकरण जिसके लिए अनुच्छेद 44 लिखा गया।
- विपक्ष में: अनुच्छेद 25 और 26 की धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यक तथा जनजातीय प्रथा की रक्षा, एक ही धर्म के भीतर भी प्रथाओं की विविधता, और यह मत कि सुधार समुदाय के भीतर से आना चाहिए।
- उत्तर पुस्तिका में लिखा जाने वाला मध्य मार्ग: पहले प्रत्येक व्यक्तिगत कानून को संहिताबद्ध और सुधारें, विशेष विवाह अधिनियम को स्वैच्छिक साझा विकल्प के रूप में बनाए रखें, और समान संहिता सहमति के बाद आए, उससे पहले नहीं।
परीक्षा की दृष्टि से
प्रश्न सामान्यतः सीधे और एक तथ्य वाले होते हैं: अनुच्छेद संख्या (44), उसका भाग (4), उसका उदार-बौद्धिक निदेशक तत्व के रूप में वर्गीकरण, और साझा नागरिक संहिता वाला राज्य (गोवा)। वाद आधारित प्रश्नों में शाह बानो (मृत अक्षर टिप्पणी), सरला मुद्गल (धर्म परिवर्तन और द्विविवाह), जॉन वल्लामट्टम (भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 118) तथा शायरा बानो (तीन तलाक) पूछे जाते हैं। जाल इस प्रकार बनते हैं: अनुच्छेद 44 को भाग 3 में रखना, उसे मूल अधिकार कहना, या अनुच्छेद 43, 45 और 47 से बदल देना; एक अन्य जाल में गोवा और उत्तराखंड साथ दिए जाते हैं, जहां उत्तर इस पर टिकता है कि संहिता विरासत में मिली या स्वतंत्रता के बाद अधिनियमित हुई। वर्णनात्मक प्रश्नों के लिए समवर्ती सूची की प्रविष्टि 5, विशेष विवाह अधिनियम 1954, अनुच्छेद 371क तथा 371ग और 2018 के विधि आयोग का मत याद रखें।
महत्वपूर्ण तथ्य
| अनुच्छेद | अनुच्छेद 44, भाग 4 (राज्य के नीति निदेशक तत्व) |
|---|---|
| भाग 4 का विस्तार | अनुच्छेद 36 से 51; अनुच्छेद 37 से निदेशक तत्व न्यायालय में प्रवर्तनीय नहीं |
| वर्गीकरण | उदार-बौद्धिक निदेशक तत्व |
| विधायी सूची | सातवीं अनुसूची, समवर्ती सूची की प्रविष्टि 5 |
| साझा संहिता वाला राज्य | गोवा, 1867 की पुर्तगाली सिविल संहिता के अंतर्गत |
| यूसीसी बनाने वाला पहला राज्य | उत्तराखंड, 2024 में पारित और 2025 से लागू |
| मृत अक्षर टिप्पणी | मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम, 1985 |
| पंथनिरपेक्ष विवाह कानून | विशेष विवाह अधिनियम, 1954 |
| हिंदू कोड के अधिनियम | हिंदू विवाह अधिनियम 1955; उत्तराधिकार, अप्राप्तवयता और संरक्षकता, दत्तक ग्रहण तथा भरण-पोषण अधिनियम 1956 |
| विधि आयोग का मत | इक्कीसवां विधि आयोग, 2018 परामर्श पत्र: उस समय न आवश्यक न वांछनीय |
| प्रथागत कानून का संरक्षण | नगालैंड के लिए अनुच्छेद 371क, मिजोरम के लिए 371ग, जनजातीय क्षेत्रों के लिए छठी अनुसूची |
| मसौदा अनुच्छेद | संविधान सभा का मसौदा अनुच्छेद 35, समर्थन के. एम. मुंशी और अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
समान नागरिक संहिता का उल्लेख भारत के संविधान के किस अनुच्छेद में है?
- A.अनुच्छेद 40
- B.अनुच्छेद 42
- C.अनुच्छेद 44
- D.अनुच्छेद 46
उत्तर देखें
संविधान का अनुच्छेद 44 भाग 4 में राज्य के नीति निदेशक तत्वों के बीच रखा गया है और कहता है कि राज्य भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा।
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारतीय संविधान में 'लोक कल्याणकारी राज्य' का आदर्श किसमें निहित है?
- A.प्रस्तावना
- B.राज्य के नीति निदेशक तत्व
- C.मूल अधिकार
- D.सातवीं अनुसूची
उत्तर देखें
संविधान का भाग 4, अनुच्छेद 36 से 51, लोक कल्याणकारी राज्य के लक्ष्य निर्धारित करता है: अनुच्छेद 38 राज्य से जन कल्याण की अभिवृद्धि तथा आय, प्रतिष्ठा और अवसर की असमानता घटाने को कहता है, अनुच्छेद 39 भौतिक संसाधनों के सामूहिक हित में बंटवारे का निर्देश देता है, अनुच्छेद 41…
पूरी व्याख्या पढ़ें →निम्नलिखित में से कौन राज्य का नीति निदेशक तत्व है?
- A.प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण
- B.ग्राम पंचायतों का गठन
- C.अल्पसंख्यकों के हितों का संरक्षण
- D.अस्पृश्यता का अंत
उत्तर देखें
भाग 4 का अनुच्छेद 40 राज्य से कहता है कि वह ग्राम पंचायतों का संगठन करे और उन्हें स्वायत्त शासन की इकाई के रूप में कार्य करने योग्य शक्तियां तथा प्राधिकार दे; यही अनुच्छेद 73वें संविधान संशोधन का जनक है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारतीय संविधान के अंतर्गत धन का संकेंद्रण किसका उल्लंघन है?
- A.समता का अधिकार
- B.राज्य के नीति निदेशक तत्व
- C.स्वतंत्रता का अधिकार
- D.कल्याण की अवधारणा
उत्तर देखें
भाग 4 के अनुच्छेद 39(ग) के अनुसार राज्य अपनी नीति इस प्रकार संचालित करेगा कि आर्थिक व्यवस्था के परिणामस्वरूप धन और उत्पादन के साधनों का संकेंद्रण सर्वसाधारण के अहित में न हो, और अनुच्छेद 39(ख) कहता है कि भौतिक संसाधनों का स्वामित्व तथा नियंत्रण सामूहिक हित के लिए बांटा जाए।
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारतीय संविधान में राज्य के नीति निदेशक तत्वों के अंतर्गत लोक स्वास्थ्य में सुधार से निम्नलिखित में से कौन-सा अनुच्छेद संबंधित है?
- A.अनुच्छेद 40
- B.अनुच्छेद 43
- C.अनुच्छेद 47
- D.अनुच्छेद 49
उत्तर देखें
अनुच्छेद 47 राज्य को निर्देश देता है कि वह अपने लोगों के पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊंचा करने तथा लोक स्वास्थ्य में सुधार को अपने प्राथमिक कर्तव्यों में माने, और यह भी जोड़ता है कि राज्य मादक पेयों तथा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक औषधियों के, औषधीय प्रयोजन को…
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारत के संविधान का अनुच्छेद 44 किस भाग के अंतर्गत आता है?
- A.भाग 3
- B.भाग 4
- C.भाग 4क
- D.भाग 5
उत्तर देखें
संविधान के भाग 4 में अनुच्छेद 36 से 51 तक राज्य के नीति निदेशक तत्व हैं और समान नागरिक संहिता वाला अनुच्छेद 44 उनमें से एक है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →पुर्तगाली काल से ही अपने सभी निवासियों पर एक साझा नागरिक संहिता लागू रखने वाला भारतीय राज्य कौन है?
- A.केरल
- B.गोवा
- C.पुदुच्चेरी
- D.सिक्किम
उत्तर देखें
1867 की पुर्तगाली सिविल संहिता गोवा पर लागू की गई थी और 1961 में मुक्ति के बाद भी बनी रही, इसलिए गोवा के सभी धर्मों के लोगों पर विवाह, तलाक और उत्तराधिकार के लगभग एक जैसे नियम लागू होते हैं, केवल कुछ समुदायगत प्रथाएं शेष हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →किस वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि संविधान का अनुच्छेद 44 मृत अक्षर बना रहा है?
- A.मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम
- B.केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य
- C.मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ
- D.इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ
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1985 के इस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने तलाकशुदा मुस्लिम महिला को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अंतर्गत भरण-पोषण दिलाया, जो हर धर्म की महिला के लिए उपलब्ध पंथनिरपेक्ष उपबंध है, और न्यायालय ने टिप्पणी की कि अनुच्छेद 44 मृत अक्षर बना रहा।
पूरी व्याख्या पढ़ें →कौन-सा पंथनिरपेक्ष कानून किसी भी दो भारतीय नागरिकों को धर्म बदले बिना विवाह की सुविधा देता है और इसीलिए स्वैच्छिक समान नागरिक संहिता कहलाता है?
- A.हिंदू विवाह अधिनियम, 1955
- B.विशेष विवाह अधिनियम, 1954
- C.भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925
- D.मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937
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यह अधिनियम धर्म पर ध्यान न देते हुए सभी भारतीय नागरिकों के लिए विवाह का सिविल रूप उपलब्ध कराता है, जिसमें सूचना अवधि के बाद विवाह अधिकारी के समक्ष पंजीकरण होता है, और ऐसे विवाहों में उत्तराधिकार किसी धार्मिक कानून से नहीं बल्कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम से तय होता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →स्वतंत्र भारत में अपने निवासियों के लिए समान नागरिक संहिता अधिनियमित करने वाला पहला राज्य कौन बना?
- A.गुजरात
- B.उत्तराखंड
- C.असम
- D.मध्य प्रदेश
उत्तर देखें
उत्तराखंड विधानसभा ने फरवरी 2024 में समान नागरिक संहिता विधेयक पारित किया, उसे राष्ट्रपति की अनुमति मिली, और कानून जनवरी 2025 में लागू हुआ।
पूरी व्याख्या पढ़ें →विवाह, तलाक, दत्तक ग्रहण, वसीयत और उत्तराधिकार सातवीं अनुसूची की किस सूची में आते हैं?
- A.संघ सूची
- B.राज्य सूची
- C.समवर्ती सूची
- D.संसद की अवशिष्ट शक्तियां
उत्तर देखें
सातवीं अनुसूची की सूची 3 की प्रविष्टि 5 में विवाह और तलाक, शिशु तथा अवयस्क, दत्तक ग्रहण, वसीयत, निर्वसीयत उत्तराधिकार, संयुक्त परिवार और विभाजन तथा वे सभी विषय आते हैं जिनमें न्यायिक कार्यवाहियों के पक्षकार संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले अपने व्यक्तिगत कानून से शासित थे।
पूरी व्याख्या पढ़ें →अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
समान नागरिक संहिता का सरल अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है भारत के सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, भरण-पोषण, दत्तक ग्रहण, संरक्षकता और उत्तराधिकार पर एक ही साझा कानून, जो अलग-अलग समुदायों के वर्तमान व्यक्तिगत कानूनों का स्थान ले।
संविधान का कौन-सा अनुच्छेद समान नागरिक संहिता से संबंधित है?
अनुच्छेद 44, जो भाग 4 में नीति निदेशक तत्वों के बीच है। इसमें कहा गया है कि राज्य भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा।
क्या अनुच्छेद 44 न्यायालय में प्रवर्तनीय है?
नहीं। अनुच्छेद 37 के अनुसार नीति निदेशक तत्व किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं, यद्यपि वे शासन में मूलभूत हैं; इसलिए कोई रिट संसद को समान नागरिक संहिता बनाने के लिए बाध्य नहीं कर सकती।
किस भारतीय राज्य में पहले से समान नागरिक संहिता लागू है?
गोवा में, जहां 1961 की मुक्ति के बाद भी 1867 की पुर्तगाली सिविल संहिता बनी रही। उत्तराखंड स्वतंत्र भारत का पहला राज्य बना जिसने अपनी समान नागरिक संहिता बनाई, जो जनवरी 2025 से लागू है।
इस बहस में विशेष विवाह अधिनियम 1954 क्यों महत्वपूर्ण है?
यह किसी भी दो भारतीय नागरिकों को धर्म बदले बिना सिविल विवाह की सुविधा देता है और उत्तराधिकार भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम से तय होता है, इसलिए यह पहले से एक वैकल्पिक साझा संहिता की तरह काम करता है।
शाह बानो वाद ने अनुच्छेद 44 के बारे में क्या कहा था?
1985 में सर्वोच्च न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अंतर्गत भरण-पोषण दिलाया और कहा कि अनुच्छेद 44 मृत अक्षर बना रहा। इसके बाद संसद ने 1986 में मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम पारित किया।
स्रोत
- भारत का संविधान, भाग 4: राज्य के नीति निदेशक तत्व — विधायी विभाग, विधि और न्याय मंत्रालय
- पारिवारिक विधि सुधार पर परामर्श पत्र, 2018 — भारत का विधि आयोग
- भारत का संविधान सिद्धांत और व्यवहार (कक्षा 11), अधिकार और निदेशक तत्व — एनसीईआरटी





