निम्नलिखित कथनों पर विचार करें: 1. भारत का संविधान अपनी मूल संरचना को संघवाद, पंथनिरपेक्षता, मूल अधिकार और लोकतंत्र के रूप में परिभाषित करता है। 2. भारत के संविधान में न्यायिक पुनरावलोकन का उपबंध नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा और उन आदर्शों को बनाए रखने के लिए है जिन पर संविधान आधारित है। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन सा या कौन से सही हैं?
- A.केवल 1
- B.केवल 2
- C.1 और 2 दोनों
- D.न 1 न 2
सही उत्तर
D. न 1 न 2
व्याख्या
सही उत्तर है D, न 1 न 2। कथन 1 गलत है क्योंकि संविधान में मूल संरचना पद कहीं प्रयुक्त ही नहीं हुआ और उसकी कोई परिभाषा नहीं दी गई है। यह सिद्धांत 1973 के केशवानंद भारती वाद में सर्वोच्च न्यायालय की देन है और न्यायालयों ने हर वाद में उसमें विशेषताएँ जोड़ी हैं, इसलिए कोई बंद सूची नहीं है। कथन 2 इस रूप में गलत है क्योंकि संविधान में ऐसा कोई उपबंध नहीं है जो न्यायिक पुनरावलोकन को इस प्रयोजन के साथ घोषित करता हो; यह शक्ति अनुच्छेद 13, 32, 131 से 136, 226 और 246 जैसे उपबंधों से निकलती है, और स्वतंत्रता की रक्षा तथा आदर्शों को बनाए रखने की भाषा निर्णयों और टीकाओं की है, संविधान के पाठ की नहीं।
इसलिए विकल्प A और विकल्प B गलत हैं, क्योंकि दोनों में से प्रत्येक एक त्रुटिपूर्ण कथन को स्वीकार करता है, और विकल्प C गलत है क्योंकि वह दोनों को स्वीकार करता है। कथन आधारित प्रश्नों में परिभाषित करता है और उपबंध जैसे शब्दों पर कठोर रहें।
पूरा लेख पढ़ें: संविधान संशोधन और मूल संरचना: अनुच्छेद 368 और प्रमुख वाद
अभ्यास प्रश्न
सभी देखेंभारत के संविधान में संशोधन की प्रक्रिया किस अनुच्छेद में दी गई है?
- A.अनुच्छेद 356
- B.अनुच्छेद 360
- C.अनुच्छेद 368
- D.अनुच्छेद 370
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. अनुच्छेद 368
व्याख्या
सही उत्तर है C, अनुच्छेद 368। इसका शीर्षक है संसद की संविधान संशोधन की शक्ति और उसकी प्रक्रिया, और यही अनुच्छेद बताता है कि प्रत्येक सदन में कौन सा विशेष बहुमत चाहिए तथा किन विषयों में राज्यों के विधानमंडलों का अनुसमर्थन भी आवश्यक है।
विकल्प A गलत है क्योंकि अनुच्छेद 356 राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता पर राष्ट्रपति शासन का उपबंध करता है। विकल्प B गलत है क्योंकि अनुच्छेद 360 वित्तीय आपात से संबंधित है। विकल्प D गलत है क्योंकि अनुच्छेद 370 में जम्मू और कश्मीर राज्य के संबंध में अस्थायी उपबंध थे। ये चारों संख्याएँ इतनी निकट हैं कि जल्दबाज़ी में गलत विकल्प भर दिया जाता है, इसलिए परीक्षा से पहले 368 को संशोधन, 352 को राष्ट्रीय आपात, 356 को राष्ट्रपति शासन और 360 को वित्तीय आपात से जोड़ लें।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 368 किस भाग में आता है?
- A.भाग 18
- B.भाग 19
- C.भाग 20
- D.भाग 21
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. भाग 20
व्याख्या
सही उत्तर है C, भाग 20। संविधान का भाग 20 बहुत छोटा है, उसका शीर्षक संविधान का संशोधन है और उसमें केवल अनुच्छेद 368 है। आपात तथा प्रकीर्ण उपबंधों के बाद, संविधान के अंत के निकट इसकी यह स्थिति ही परीक्षा में परखी जाती है।
विकल्प A गलत है क्योंकि भाग 18 में अनुच्छेद 352 से 360 तक के आपात उपबंध हैं। विकल्प B गलत है क्योंकि भाग 19 प्रकीर्ण भाग है, जिसमें अनुच्छेद 361 से 367 आते हैं। विकल्प D गलत है क्योंकि भाग 21 में अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष उपबंध हैं, जिनमें अनुच्छेद 369 से 392 सम्मिलित हैं। ध्यान दें कि यहाँ भाग और अनुच्छेद संख्या साथ-साथ चलते हैं, इसलिए यदि याद रहे कि अनुच्छेद 368 अकेला अपने भाग 20 में बैठा है तो आसपास के भाग स्वयं स्थान पा लेते हैं।
संविधान की मूल संरचना का सिद्धांत सर्वोच्च न्यायालय ने किस वाद में प्रतिपादित किया?
- A.शंकरी प्रसाद वाद, 1951
- B.गोलकनाथ वाद, 1967
- C.केशवानंद भारती वाद, 1973
- D.मिनर्वा मिल्स वाद, 1980
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. केशवानंद भारती वाद, 1973
व्याख्या
सही उत्तर है C, केशवानंद भारती वाद, 1973। तेरह न्यायाधीशों की पीठ, जो उस समय तक की सबसे बड़ी पीठ थी, ने सात के मुकाबले छह के बहुमत से कहा कि संसद मूल अधिकारों सहित संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, परंतु उसकी मूल संरचना को क्षति या नष्ट नहीं कर सकती।
विकल्प A गलत है क्योंकि 1951 के शंकरी प्रसाद वाद ने पहले संशोधन को वैध ठहराया और कहा कि संशोधन साधारण विधि नहीं है। विकल्प B गलत है क्योंकि 1967 के गोलकनाथ वाद ने दूसरा छोर पकड़कर कहा कि मूल अधिकार घटाए ही नहीं जा सकते; केशवानंद ने इसी निर्णय को उलटा। विकल्प D गलत है क्योंकि 1980 के मिनर्वा मिल्स वाद ने इस सिद्धांत को लागू किया, प्रतिपादित नहीं किया। शंकरी प्रसाद, गोलकनाथ, केशवानंद और मिनर्वा मिल्स की यह श्रृंखला क्रम से याद रखें।
केशवानंद भारती वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने किस पूर्व निर्णय को उलट दिया?
- A.गोलकनाथ वाद
- B.बेरुबाड़ी संघ वाद
- C.एस आर बोम्मई वाद
- D.मिनर्वा मिल्स वाद
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. गोलकनाथ वाद
व्याख्या
सही उत्तर है A, गोलकनाथ वाद। 1967 के गोलकनाथ वाद में ग्यारह न्यायाधीशों की पीठ ने छह के मुकाबले पाँच से कहा था कि संसद के पास मूल अधिकारों में संशोधन की शक्ति नहीं है। संसद ने 1971 के चौबीसवें संशोधन से उत्तर दिया और 1973 के केशवानंद भारती वाद में न्यायालय ने गोलकनाथ को उलटते हुए संशोधन शक्ति बहाल की, पर उस पर मूल संरचना की सीमा लगा दी।
विकल्प B गलत है क्योंकि 1960 की बेरुबाड़ी संघ सलाह भारतीय भूभाग के अंतरण और प्रस्तावना की स्थिति से जुड़ी थी। विकल्प C गलत है क्योंकि एस आर बोम्मई वाद बहुत बाद में, 1994 में आया और अनुच्छेद 356 से संबंधित था। विकल्प D तिथि से ही गलत है, क्योंकि मिनर्वा मिल्स 1980 में तय हुआ, केशवानंद के सात वर्ष बाद। ऐसे प्रश्नों में उलटने की दिशा पर ध्यान दें।
संविधान संशोधन विधेयक पर राष्ट्रपति की अनुमति किस संशोधन द्वारा अनिवार्य बनाई गई?
- A.चौबीसवाँ संशोधन, 1971
- B.पच्चीसवाँ संशोधन, 1971
- C.बयालीसवाँ संशोधन, 1976
- D.चवालीसवाँ संशोधन, 1978
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. चौबीसवाँ संशोधन, 1971
व्याख्या
सही उत्तर है A, चौबीसवाँ संशोधन, 1971। यह गोलकनाथ निर्णय के उत्तर में लाया गया था। इसने अनुच्छेद 13 और अनुच्छेद 368 में संशोधन कर स्पष्ट किया कि संसद संशोधन द्वारा किसी मूल अधिकार को छीन या कम कर सकती है, और ऐसे विधेयक पर राष्ट्रपति की अनुमति अनिवार्य कर दी, इसलिए वह विधेयक न रोका जा सकता है और न पुनर्विचार के लिए लौटाया जा सकता है।
विकल्प B गलत है क्योंकि 1971 के पच्चीसवें संशोधन ने संपत्ति के अधिकार को सीमित किया और अनुच्छेद 31ग जोड़ा। विकल्प C गलत है क्योंकि 1976 के बयालीसवें संशोधन ने मूल कर्तव्य जोड़े और अनुच्छेद 368 के खंड 4 तथा 5 से न्यायिक पुनरावलोकन रोकने का प्रयास किया। विकल्प D गलत है क्योंकि 1978 के चवालीसवें संशोधन ने उन परिवर्तनों को पलटा। जोड़ी याद रखें: गोलकनाथ के साथ चौबीसवाँ संशोधन।