दोलन: सरल आवर्त गति और सरल लोलक के नोट्स
भौतिकी के परीक्षोपयोगी नोट्स: आवर्त तथा दोलन गति, सरल आवर्त गति के सूत्र, वेग और ऊर्जा, सरल लोलक के नियम, सेकंड लोलक, अवमंदन तथा अनुनाद के तथ्य।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 4 मिनट

जो गति समान समय अंतराल में स्वयं को दोहराती है, उसे आवर्त गति कहते हैं; और जब पिंड किसी निश्चित बिंदु के आगे-पीछे आता-जाता है, तो वह दोलन गति भी होती है। झूला, लोलक, घड़ी का संतुलन चक्र, स्प्रिंग से लटका भार तथा ठोस के परमाणु अपने स्थान के चारों ओर—सभी दोलन करते हैं। इसका सरलतम और सर्वाधिक महत्वपूर्ण रूप सरल आवर्त गति है, जिसमें पिंड पर लगने वाला प्रत्यानयन बल माध्य स्थिति से विस्थापन के अनुक्रमानुपाती होता है और उसी स्थिति की ओर लगता है। इस अध्याय के प्रश्न प्राय: तीन स्थानों से आते हैं—आवर्तकाल के दो सूत्र, लोलक में कोई परिवर्तन करने पर उसका व्यवहार, तथा वे स्थितियां जहां गतिज ऊर्जा, स्थितिज ऊर्जा, वेग और त्वरण अधिकतम या न्यूनतम होते हैं।
सरल आवर्त गति और उसकी राशियां
सरल आवर्त गति में प्रत्यानयन बल F = -kx होता है, जहां x विस्थापन और k बल नियतांक है; अत: त्वरण = -ω²x, जो सदैव माध्य स्थिति की ओर होता है और वहीं सर्वाधिक होता है जहां विस्थापन सर्वाधिक है। विस्थापन समय के साथ x = A sin(ωt + φ) के रूप में बदलता है। आयाम A दोनों ओर का अधिकतम विस्थापन है; आवर्तकाल T एक पूर्ण दोलन का समय है; आवृत्ति f एक सेकंड में दोलनों की संख्या है, जिसका मात्रक हर्ट्ज है; और कोणीय आवृत्ति ω = 2πf = 2π/T होती है। वेग ω√(A² - x²) होता है, अत: वह माध्य स्थिति पर अधिकतम (Aω) और अंतिम स्थितियों पर शून्य होता है। त्वरण इसके विपरीत है—माध्य स्थिति पर शून्य और अंतिम स्थितियों पर अधिकतम (Aω²)। स्प्रिंग से लटके द्रव्यमान m के लिए आवर्तकाल T = 2π√(m/k) होता है, और यही एकमात्र स्थिति है जिसमें द्रव्यमान आवर्तकाल को प्रभावित करता है।
सरल लोलक
सरल लोलक भारी बिंदु द्रव्यमान होता है, जो दृढ़ आधार से हल्के और अवितान्य धागे से लटका रहता है। लघु दोलनों के लिए इसका आवर्तकाल T = 2π√(l/g) होता है। इससे चार नियम निकलते हैं, जिन्हें परीक्षक एक-एक करके पूछते हैं।
| किया गया परिवर्तन | आवर्तकाल पर प्रभाव |
|---|---|
| गोलक का द्रव्यमान बढ़ाना | कोई परिवर्तन नहीं; आवर्तकाल द्रव्यमान पर निर्भर नहीं |
| आयाम थोड़ा बढ़ाना | लघु दोलनों में कोई परिवर्तन नहीं; यही समकालिता का नियम है |
| लंबाई चार गुनी करना | आवर्तकाल दोगुना, क्योंकि T लंबाई के वर्गमूल के अनुक्रमानुपाती है |
| चंद्रमा पर ले जाना | आवर्तकाल लगभग 2.45 गुना बढ़ता है, क्योंकि g लगभग छठा भाग है |
| भूमध्य रेखा से ध्रुवों पर ले जाना | आवर्तकाल घटता है, क्योंकि ध्रुवों पर g अधिक है |
| पृथ्वी के केंद्र या उपग्रह में | दोलन ही नहीं होगा, क्योंकि वहां g शून्य है |
| ऊपर की ओर त्वरित लिफ्ट | आवर्तकाल घटता है, प्रभावी g = g + a |
| नीचे की ओर त्वरित लिफ्ट या मुक्त पतन | आवर्तकाल बढ़ता है; मुक्त पतन में दोलन रुक जाता है |
जिस लोलक का आवर्तकाल ठीक दो सेकंड हो, उसे सेकंड लोलक कहते हैं; जहां g = 9.8 मीटर प्रति वर्ग सेकंड है, वहां उसकी लंबाई लगभग 99.4 सेंटीमीटर, अर्थात लगभग एक मीटर होती है। ताप बढ़ने पर लंबाई बढ़ती है, इसलिए लोलक घड़ी ग्रीष्म में सुस्त और शीत में तेज चलती है; इस त्रुटि को घटाने के लिए घड़ी बनाने वाले इनवार मिश्रातु का उपयोग करते हैं, जिसका प्रसार गुणांक बहुत कम होता है। गैलीलियो ने पहली बार देखा कि झूलते दीपक का आवर्तकाल उसके झूलने की दूरी पर निर्भर नहीं करता, और क्रिस्टियान हाइगेंस ने इसी सिद्धांत से 1656 में पहली लोलक घड़ी बनाई।
सरल आवर्त गति में ऊर्जा
दोलक की ऊर्जा का रूप बदलता रहता है, परंतु घर्षण के अभाव में कुल ऊर्जा स्थिर रहती है। गतिज ऊर्जा माध्य स्थिति पर अधिकतम और अंतिम स्थितियों पर शून्य होती है; स्थितिज ऊर्जा अंतिम स्थितियों पर अधिकतम और माध्य स्थिति पर शून्य होती है; तथा दोनों का योग, अर्थात कुल ऊर्जा, ½kA² अथवा ½mω²A² होती है। इससे दो तथ्य निकलते हैं, जो परीक्षाओं में प्रिय हैं—कुल ऊर्जा आयाम के वर्ग के अनुक्रमानुपाती होती है, अत: आयाम दोगुना करने पर ऊर्जा चार गुनी हो जाती है; और विस्थापन के एक चक्र में गतिज तथा स्थितिज ऊर्जा दो चक्र पूरे करती हैं, अर्थात उनकी आवृत्ति दोलन की आवृत्ति से दोगुनी होती है।
अवमंदित एवं प्रणोदित दोलन तथा अनुनाद
वास्तविक दोलन घर्षण और वायु के प्रतिरोध से ऊर्जा खोकर धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं; इसे अवमंदित दोलन कहते हैं, जिसमें आयाम लगातार घटता है, पर आवर्तकाल लगभग अपरिवर्तित रहता है। यदि बाहर से कोई आवर्ती बल लगाया जाए, तो पिंड अंत में उसी बल की आवृत्ति से दोलन करने लगता है, जो प्रणोदित दोलन है। जब लगाए गए बल की आवृत्ति पिंड की स्वाभाविक आवृत्ति के बराबर हो जाती है, तो आयाम बहुत बढ़ जाता है; इसे अनुनाद कहते हैं। इसी से स्पष्ट होता है कि पुल पार करते समय सैनिकों को कदमताल तोड़ने का आदेश क्यों दिया जाता है, रेडियो किसी एक केंद्र को क्यों पकड़ता है जब उसका परिपथ उस आवृत्ति पर समस्वरित हो, गायक के स्वर से कांच क्यों टूट सकता है और सितार या वायलिन का खोखला भाग ध्वनि को क्यों बढ़ाता है।
परीक्षा की दृष्टि से
प्रश्न तीन प्रकार के आते हैं। पहला, सूत्र—लोलक तथा स्प्रिंग का आवर्तकाल, सेकंड लोलक की लंबाई और लंबाई चार गुनी करने पर प्रभाव। दूसरा, परिवर्तन और प्रभाव वाले प्रश्न—लिफ्ट में, चंद्रमा पर, ध्रुवों पर, मुक्त पतन में या भारी गोलक के साथ लोलक, जिनमें जाल यह मानना है कि द्रव्यमान से अंतर पड़ता है। तीसरा, वेग, त्वरण, गतिज तथा स्थितिज ऊर्जा के अधिकतम-न्यूनतम स्थान, जो प्राय: सुमेलन प्रश्न के रूप में पूछे जाते हैं। अनुनाद उसके उदाहरणों से पूछा जाता है—मुख्यत: पुल पर सैनिकों का कदमताल तोड़ना और रेडियो का समस्वरण।
महत्वपूर्ण तथ्य
| सरल आवर्त गति | F = -kx; त्वरण = -ω²x |
|---|---|
| सरल लोलक का आवर्तकाल | T = 2π√(l/g) |
| स्प्रिंग दोलक का आवर्तकाल | T = 2π√(m/k); g पर निर्भर नहीं |
| सेकंड लोलक | आवर्तकाल 2 सेकंड; g = 9.8 पर लंबाई लगभग 99.4 सेंटीमीटर |
| सरल आवर्त गति में वेग | ω√(A² - x²); माध्य स्थिति पर अधिकतम Aω |
| सरल आवर्त गति में त्वरण | सिरों पर अधिकतम Aω², माध्य स्थिति पर शून्य |
| कुल ऊर्जा | ½kA²; आयाम के वर्ग के अनुक्रमानुपाती |
| ऊर्जा परिवर्तन की आवृत्ति | गतिज तथा स्थितिज ऊर्जा दोलन की आवृत्ति से दोगुनी आवृत्ति पर बदलती हैं |
| चंद्रमा पर लोलक | आवर्तकाल लगभग 2.45 गुना, क्योंकि g लगभग छठा भाग है |
| लिफ्ट में लोलक | ऊपर जाते समय आवर्तकाल घटता, नीचे जाते समय बढ़ता, मुक्त पतन में दोलन नहीं |
| लोलक घड़ी और ऋतु | ग्रीष्म में छड़ लंबी होने से सुस्त, शीत में तेज; इनवार से त्रुटि घटती है |
| समकालिता का नियम | गैलीलियो द्वारा खोजा; लघु दोलनों में आवर्तकाल आयाम पर निर्भर नहीं |
| पहली लोलक घड़ी | क्रिस्टियान हाइगेंस ने 1656 में बनाई |
| आवृत्ति का मात्रक | हर्ट्ज; एक हर्ट्ज = एक दोलन प्रति सेकंड |
| अनुनाद | प्रणोदक आवृत्ति = स्वाभाविक आवृत्ति; आयाम अत्यधिक बढ़ जाता है |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
यदि कोई कण सरल आवर्त गति कर रहा है, तो माध्य स्थिति पर उसका वेग _________ होता है।
- A.अधिकतम
- B.शून्य
- C.न्यूनतम
- D.इनमें से कोई नहीं
उत्तर देखें
सरल आवर्त गति में वेग ω√(A² - x²) होता है। माध्य स्थिति पर विस्थापन x शून्य होता है, अत: वेग अपने अधिकतम मान Aω पर पहुंच जाता है; इसी कारण गतिज ऊर्जा भी वहीं सर्वाधिक होती है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →एक बच्चा झूले पर बैठा है। भूमि से उसकी न्यूनतम और अधिकतम ऊंचाई क्रमश: 0.75 मीटर तथा 2 मीटर है। उसकी अधिकतम चाल होगी
- A.10 मी/से
- B.5 मी/से
- C.8 मी/से
- D.15 मी/से
उत्तर देखें
झूला एक लोलक की तरह है और उसकी चाल निम्नतम बिंदु पर सर्वाधिक होती है, जहां ऊपर प्राप्त सारी स्थितिज ऊर्जा गतिज ऊर्जा में बदल जाती है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →सरल लोलक का आवर्तकाल निम्नलिखित में से किस पर निर्भर नहीं करता?
- A.लोलक की लंबाई
- B.गोलक का द्रव्यमान
- C.गुरुत्वीय त्वरण
- D.इन सभी पर
उत्तर देखें
सरल लोलक का आवर्तकाल T = 2π√(l/g) होता है, जिसमें गोलक का द्रव्यमान कहीं नहीं आता; समान लंबाई के भारी और हल्के गोलक एक ही समय देते हैं, और यही द्रव्यमान का नियम है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →जहां गुरुत्वीय त्वरण 9.8 मीटर प्रति वर्ग सेकंड है, वहां सेकंड लोलक की लंबाई लगभग कितनी होती है?
- A.1 मीटर
- B.2 मीटर
- C.0.5 मीटर
- D.9.8 मीटर
उत्तर देखें
सेकंड लोलक वह है, जिसका आवर्तकाल ठीक दो सेकंड हो, अर्थात एक ओर से दूसरी ओर का प्रत्येक झूला एक सेकंड लेता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →यदि सरल लोलक की लंबाई चार गुनी कर दी जाए, तो उसका आवर्तकाल हो जाएगा
- A.चार गुना
- B.दो गुना
- C.आधा
- D.एक चौथाई
उत्तर देखें
आवर्तकाल लंबाई के वर्गमूल के अनुक्रमानुपाती होता है, अत: लंबाई चार गुनी करने पर आवर्तकाल √4 = 2 गुना हो जाता है; किसी लोलक का आवर्तकाल दोगुना करने के लिए उसकी लंबाई चार गुनी करनी पड़ती है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →यदि लोलक घड़ी को पृथ्वी से चंद्रमा पर ले जाया जाए, जहां गुरुत्वीय त्वरण लगभग छठा भाग है, तो उसका आवर्तकाल
- A.घटेगा
- B.बढ़ेगा
- C.अपरिवर्तित रहेगा
- D.शून्य हो जाएगा
उत्तर देखें
आवर्तकाल g के वर्गमूल के व्युत्क्रमानुपाती होता है, अत: g घटकर छठा भाग रह जाने पर आवर्तकाल √6, लगभग 2.45 गुना हो जाता है; लोलक धीमे दोलन करता है और चंद्रमा पर ले जाई गई लोलक घड़ी बहुत सुस्त चलेगी।
पूरी व्याख्या पढ़ें →सरल आवर्त गति में दोलायमान पिंड की स्थितिज ऊर्जा कहां अधिकतम होती है?
- A.माध्य स्थिति पर
- B.अंतिम स्थितियों पर
- C.माध्य और अंतिम स्थिति के मध्य बिंदु पर
- D.पथ के प्रत्येक बिंदु पर
उत्तर देखें
स्थितिज ऊर्जा विस्थापन के वर्ग के अनुक्रमानुपाती होती है, अत: वह वहीं सर्वाधिक होती है जहां विस्थापन सर्वाधिक है, अर्थात पथ के दोनों सिरों पर, जहां पिंड क्षण भर के लिए विरामावस्था में होता है और उसकी गतिज ऊर्जा शून्य होती है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →सरल आवर्त गति करते पिंड का त्वरण कहां अधिकतम होता है?
- A.माध्य स्थिति पर
- B.अंतिम स्थितियों पर
- C.आयाम के एक चौथाई पर
- D.यह सर्वत्र नियत रहता है
उत्तर देखें
सरल आवर्त गति में त्वरण = -ω²x होता है, अत: वह विस्थापन के साथ बढ़ता है और पथ के सिरों पर सर्वाधिक (Aω²) होता है, जहां उसकी दिशा केंद्र की ओर होती है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →गैलीलियो द्वारा खोजे गए सिद्धांत का उपयोग करते हुए पहली लोलक घड़ी किसने बनाई थी?
- A.आइजैक न्यूटन
- B.क्रिस्टियान हाइगेंस
- C.रॉबर्ट हुक
- D.योहानेस केपलर
उत्तर देखें
डच वैज्ञानिक हाइगेंस ने 1656 में पहली कार्यशील लोलक घड़ी बनाई, इससे पहले गैलीलियो ने देखा था कि झूलता दीपक चाहे अधिक झूले या कम, प्रत्येक झूले में समान समय लेता है; इस गुण को समकालिता कहते हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →पुल पार करते समय सैनिकों को कदमताल तोड़ने के लिए कहा जाता है, जिससे बचा जा सके
- A.अवमंदन से
- B.अनुनाद से
- C.व्यतिकरण से
- D.अपवर्तन से
उत्तर देखें
यदि सैनिकों के लयबद्ध कदमों की आवृत्ति संयोग से पुल की स्वाभाविक आवृत्ति के बराबर हो जाए, तो पुल अपनी ही आवृत्ति पर प्रणोदित होकर इतने बड़े आयाम से कंपन कर सकता है कि वह टूट जाए; कदमताल तोड़ने से यह लय समाप्त हो जाती है और संकट टल जाता…
पूरी व्याख्या पढ़ें →अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सरल आवर्त गति क्या है?
वह दोलन, जिसमें पिंड पर लगने वाला प्रत्यानयन बल माध्य स्थिति से उसके विस्थापन के सीधे अनुक्रमानुपाती होता है और सदैव उसी स्थिति की ओर दिष्ट रहता है। स्प्रिंग से लटका भार तथा छोटे कोण पर झूलता लोलक इसके मानक उदाहरण हैं और विस्थापन समय के साथ ज्या फलन के रूप में बदलता है।
लोलक का आवर्तकाल गोलक के द्रव्यमान पर क्यों निर्भर नहीं करता?
क्योंकि गोलक पर लगने वाला प्रत्यानयन बल स्वयं उसके भार के अनुक्रमानुपाती होता है, अत: त्वरण निकालते समय द्रव्यमान कट जाता है। आवर्तकाल केवल लोलक की लंबाई और गुरुत्वीय त्वरण पर निर्भर करता है, और यही द्रव्यमान का नियम है।
सेकंड लोलक क्या है और उसकी लंबाई कितनी होती है?
वह लोलक, जिसका आवर्तकाल ठीक दो सेकंड हो, अर्थात एक ओर से दूसरी ओर का प्रत्येक झूला एक सेकंड लेता है। जहां गुरुत्वीय त्वरण 9.8 मीटर प्रति वर्ग सेकंड है, वहां उसकी लंबाई लगभग 99.4 सेंटीमीटर, अर्थात लगभग एक मीटर होती है।
लोलक घड़ी ग्रीष्म ऋतु में सुस्त क्यों हो जाती है?
ताप से लोलक की छड़ फैलती है, जिससे उसकी लंबाई बढ़ जाती है और आवर्तकाल लंबाई के वर्गमूल के अनुसार बढ़ जाता है। प्रत्येक दोलन कुछ अधिक समय लेता है, अत: घड़ी धीमी चलती है; शीत में छड़ सिकुड़ने पर घड़ी तेज हो जाती है। इस त्रुटि को घटाने के लिए इनवार का उपयोग होता है, जो बहुत कम फैलता है।
अनुनाद क्या है और वह कहां दिखाई देता है?
जब किसी पिंड पर ऐसा आवर्ती बल लगे, जिसकी आवृत्ति पिंड की स्वाभाविक आवृत्ति के बराबर हो, तो आयाम में होने वाली अत्यधिक वृद्धि को अनुनाद कहते हैं। इसी कारण सैनिक पुल पर कदमताल तोड़ते हैं, समस्वरित रेडियो परिपथ एक केंद्र पकड़ता है, किसी विशेष स्वर पर कांच टूट सकता है और वाद्ययंत्रों में ध्वनि पेटिका लगाई जाती है।
स्रोत
- भौतिकी भाग 1 (कक्षा 11), अध्याय 14: दोलन — एनसीईआरटी
- विज्ञान (कक्षा 9), गति तथा बल संबंधी अध्याय — एनसीईआरटी





