मानव पाचन और श्वसन तंत्र: अंग, ग्रंथियां और एंजाइम
मानव पाचन तथा श्वसन तंत्र के परीक्षा नोट्स: आहारनाल, पाचक ग्रंथियां और एंजाइम, फेफड़े एवं कूपिकाएं, श्वासक्रिया तथा रक्त में गैसों का विनिमय।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 5 मिनट

भोजन और वायु, ये दो चीजें शरीर के लिए अनिवार्य हैं और इनके लिए शरीर में अलग-अलग अंग तंत्र हैं। पाचन तंत्र भोजन को इतने छोटे अणुओं में तोड़ता है कि वे रक्त में जा सकें, और श्वसन तंत्र वह ऑक्सीजन लाता है जिससे ये अणु जलते हैं तथा बनी कार्बन डाइऑक्साइड को बाहर निकालता है। एसएससी, रेलवे, रक्षा और राज्य परीक्षाओं के जीव विज्ञान खंड में यह अध्याय हर वर्ष आता है, क्योंकि इसका लगभग हर तथ्य एक नाम, एक संख्या या एक जोड़ी है, कौन सी ग्रंथि कौन सा एंजाइम बनाती है, कौन सा भाग क्या अवशोषित करता है और किस फेफड़े में कितने खंड हैं।
आहारनाल की रचना
आहारनाल मुख से गुदा तक फैली एक सतत नली है जिसकी लंबाई लगभग नौ मीटर होती है। क्रम से इसके भाग हैं, मुखगुहा, ग्रसनी, ग्रासनली, आमाशय, छोटी आंत और बड़ी आंत। छोटी आंत सबसे लंबा भाग है, लगभग छह से सात मीटर, और यह स्वयं ग्रहणी, मध्यांत्र तथा शेषांत्र में बंटी होती है। बड़ी आंत छोटी परंतु अधिक चौड़ी होती है और इसमें उंडुक, बृहदांत्र तथा मलाशय आते हैं। तीन प्रकार की ग्रंथियां इस नली का भाग न होकर भी अपना स्राव इसमें डालती हैं, लार ग्रंथियां, यकृत और अग्न्याशय। यकृत मानव शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है, और अग्न्याशय एकमात्र ऐसी ग्रंथि है जो बहिःस्रावी और अंतःस्रावी दोनों है, क्योंकि यह पाचक रस के साथ इंसुलिन भी बनाती है।
पाचन की क्रमवार प्रक्रिया
पाचन मुख से आरंभ होता है। लार ग्रंथियों के तीन जोड़े, कर्णपूर्व, अधोजंभ और अधोजिह्वा, मुखगुहा में लार डालते हैं; इनमें कर्णपूर्व ग्रंथि सबसे बड़ी है। लार में लार एमाइलेज नामक एंजाइम होता है, जिसे टायलिन भी कहते हैं, और यह मंड को माल्टोज में तोड़ता है। इसलिए मंड ही एकमात्र ऐसा पोषक तत्व है जिसका पाचन मुख में शुरू हो जाता है। जीभ चबाए हुए भोजन का ग्रास बनाती है और ग्रासनली की पेशीय तरंगें, जिन्हें पेरिस्टाल्सिस या क्रमसंकुचन कहते हैं, उसे नीचे धकेलती हैं।
आमाशय में जठर ग्रंथियां हाइड्रोक्लोरिक अम्ल, पेप्सिन एंजाइम और श्लेष्मा की एक परत स्रावित करती हैं। अम्ल निगले गए जीवाणुओं को मारता है और पेप्सिन को वह प्रबल अम्लीय माध्यम देता है जिसकी उसे आवश्यकता होती है; इसके बाद पेप्सिन प्रोटीन को पेप्टाइड में तोड़ता है। श्लेष्मा की परत ही आमाशय की भित्ति को उसके अपने अम्ल से पचने से बचाती है, और इस परत में टूट-फूट से ही पेप्टिक अल्सर बनता है। शिशुओं में रेनिन नामक एक अतिरिक्त एंजाइम दूध के प्रोटीन को जमाता है।
ग्रहणी में दो रस आते हैं। पित्त यकृत में बनता है, पित्ताशय में संचित तथा सांद्र होता है, और इसमें कोई एंजाइम नहीं होता; यह केवल वसा का इमल्सीकरण करके उसे सूक्ष्म बूंदों में बदलता है और अम्लीय भोजन को क्षारीय बना देता है। अग्न्याशयी रस प्रोटीन के लिए ट्रिप्सिन, मंड के लिए अग्न्याशयी एमाइलेज और वसा के लिए लाइपेज लाता है। आंत्र रस माल्टेज, सुक्रेज, लैक्टेज तथा पेप्टिडेज से काम पूरा करता है, जिससे अंतिम उत्पाद ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, वसा अम्ल और ग्लिसरॉल बनते हैं। इनका अवशोषण रसांकुरों से होता है, जो अंगुली जैसी वे वलन हैं जो छोटी आंत की भीतरी भित्ति का पृष्ठीय क्षेत्रफल बहुत बढ़ा देते हैं। बड़ी आंत बचे हुए पदार्थ से जल और लवण सोख लेती है और शेष मल के रूप में बाहर निकल जाता है।
| एंजाइम | कहां बनता है | किस पर क्रिया | क्या बनता है |
|---|---|---|---|
| लार एमाइलेज (टायलिन) | लार ग्रंथियां | मंड | माल्टोज |
| पेप्सिन | आमाशय की जठर ग्रंथियां | प्रोटीन | पेप्टाइड |
| ट्रिप्सिन | अग्न्याशय | प्रोटीन और पेप्टाइड | अमीनो अम्ल |
| लाइपेज | अग्न्याशय | इमल्सीकृत वसा | वसा अम्ल और ग्लिसरॉल |
| लैक्टेज | आंत्र ग्रंथियां | लैक्टोज | ग्लूकोज और गैलेक्टोज |
| पित्त (एंजाइम नहीं) | यकृत | वसा | इमल्सीकृत वसा बूंदें |
श्वसन तंत्र की रचना
वायु नासाछिद्रों से भीतर आती है, जहां रोम और श्लेष्मा धूल छान लेते हैं, और नासागुहा, ग्रसनी तथा कंठ से होकर श्वासनली में पहुंचती है। कंठ ही ध्वनि यंत्र है, क्योंकि स्वर रज्जु उसी में स्थित होते हैं, और उपजिह्वा वह उपास्थि का ढक्कन है जो भोजन निगलते समय श्वासनली का द्वार बंद कर देता है। श्वासनली उपास्थि के अंग्रेजी अक्षर सी जैसे छल्लों से खुली रहती है, इसलिए वह कभी पिचकती नहीं। यह दो श्वसनियों में बंटती है, प्रत्येक फेफड़े के लिए एक, और ये बार-बार शाखित होकर श्वसनिकाएं बनाती हैं जो कूपिकाओं में समाप्त होती हैं। कूपिकाएं ही पतली भित्ति वाली वे वायुकोष्ठिकाएं हैं जहां गैसें वास्तव में रक्त में आती-जाती हैं। दाएं फेफड़े में तीन खंड होते हैं और बाएं में केवल दो, क्योंकि बाईं ओर हृदय स्थान ले लेता है। प्रत्येक फेफड़ा प्लूरा नामक दोहरी झिल्ली से ढका रहता है और उसकी दो परतों के बीच का द्रव फेफड़े के चलने पर घर्षण रोकता है।
श्वासक्रिया और गैसों का विनिमय
श्वास लेना एक यांत्रिक कार्य है जो फेफड़ों के नीचे स्थित गुंबदाकार पेशी पट, अर्थात डायाफ्राम, पसलियों के बीच की अंतरापर्शुक पेशियों की सहायता से करता है। अंतःश्वसन में डायाफ्राम चपटा होता है और पसलियां ऊपर तथा बाहर उठती हैं, वक्ष गुहा चौड़ी होती है, भीतर का दाब घटता है और वायु भीतर दौड़ आती है; इसलिए अंतःश्वसन एक सक्रिय क्रिया है, जबकि सामान्य निःश्वसन निष्क्रिय है, जिसमें पेशियां केवल शिथिल होती हैं। विश्राम की स्थिति में वयस्क व्यक्ति मिनट में लगभग बारह से सोलह बार सांस लेता है और प्रत्येक सामान्य सांस में लगभग 500 मिलीलीटर वायु अंदर-बाहर करता है, जिसे ज्वारीय आयतन कहते हैं। इस लय को नियंत्रित करने वाला श्वसन केंद्र मस्तिष्क के मेडुला ऑब्लांगेटा में होता है।
कूपिकाओं में ऑक्सीजन रक्त में विसरित होती है और लगभग पूरी तरह हीमोग्लोबिन द्वारा ऑक्सीहीमोग्लोबिन के रूप में ढोई जाती है, करीब 97 प्रतिशत, और केवल थोड़ा भाग प्लाज्मा में घुला रहता है। कार्बन डाइऑक्साइड उलटी दिशा में चलती है, अधिकांशतः प्लाज्मा में बाइकार्बोनेट आयन के रूप में, कुछ कम भाग हीमोग्लोबिन से जुड़कर कार्बेमिनोहीमोग्लोबिन के रूप में और थोड़ा घुली अवस्था में। लाल रक्त कणिका के भीतर उपस्थित कार्बोनिक एनहाइड्रेज एंजाइम ही कार्बन डाइऑक्साइड और बाइकार्बोनेट के बीच इस तेज बदलाव को संभव बनाता है। सांस लेना केवल ऑक्सीजन पहुंचाता है; ऊर्जा का वास्तविक मोचन प्रत्येक कोशिका के माइटोकॉन्ड्रिया में होता है, जहां ग्लूकोज का ऑक्सीकरण होकर कार्बन डाइऑक्साइड और जल बनते हैं तथा ऊर्जा एटीपी में संचित होती है। जब पेशियों को ऑक्सीजन कम मिलती है तो वे अवायवीय श्वसन करती हैं और लैक्टिक अम्ल जमा हो जाता है, इसी कारण कठोर व्यायाम से ऐंठन होती है।
परीक्षा की दृष्टि से
प्रश्न पांच प्रकार से आते हैं। पहला, एंजाइम और ग्रंथि की जोड़ी: पेप्सिन, ट्रिप्सिन या लाइपेज कौन बनाता है और कौन किस पर क्रिया करता है; सदा बना रहने वाला जाल पित्त को एंजाइम कह देना है, जबकि उसमें एक भी एंजाइम नहीं। दूसरा, सर्वोच्चताएं: सबसे बड़ी ग्रंथि, आहारनाल का सबसे लंबा भाग, सबसे बड़ी लार ग्रंथि। तीसरा, श्वसन मार्ग के अंगों का क्रम, प्रत्येक फेफड़े के खंडों की संख्या तथा उपजिह्वा, कंठ और प्लूरा के कार्य। चौथा, श्वासक्रिया की यांत्रिकी: कौन सी पेशी, कौन सी अवस्था सक्रिय, ज्वारीय आयतन कितना और श्वसन केंद्र कहां। पांचवां, गैसों का परिवहन, जहां कार्बन डाइऑक्साइड के उत्तर में ऑक्सीहीमोग्लोबिन दे दिया जाता है। यह भी ध्यान रहे कि ऊर्जा मोचन का स्थल माइटोकॉन्ड्रिया है, फेफड़ा नहीं।
महत्वपूर्ण तथ्य
| आहारनाल की लंबाई | लगभग 9 मीटर |
|---|---|
| आहारनाल का सबसे लंबा भाग | छोटी आंत, लगभग 6 से 7 मीटर |
| शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि | यकृत |
| सबसे बड़ी लार ग्रंथि | कर्णपूर्व ग्रंथि |
| लार का एंजाइम | लार एमाइलेज, जिसे टायलिन भी कहते हैं |
| आमाशय का अम्ल | हाइड्रोक्लोरिक अम्ल |
| आमाशय का एंजाइम | पेप्सिन, जो प्रोटीन का पाचन करता है |
| पित्त | यकृत में बनता है, पित्ताशय में संचित, एंजाइम रहित |
| भोजन का अवशोषण | छोटी आंत के रसांकुरों से |
| ध्वनि यंत्र | कंठ |
| फेफड़ों के खंड | दायां फेफड़ा 3, बायां फेफड़ा 2 |
| श्वासक्रिया की पेशी | डायाफ्राम, अंतरापर्शुक पेशियों के साथ |
| ज्वारीय आयतन | लगभग 500 मिलीलीटर |
| ऑक्सीजन का परिवहन | ऑक्सीहीमोग्लोबिन के रूप में, लगभग 97 प्रतिशत |
| कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन | मुख्यतः प्लाज्मा में बाइकार्बोनेट आयन के रूप में |
| श्वसन केंद्र | मेडुला ऑब्लांगेटा |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
शरीर में ऑक्सीजन युक्त वायु को भीतर लेने की प्रक्रिया को ______ कहते हैं।
- A.अंतःश्वसन
- B.निःश्वसन
- C.प्लवन
- D.अन्वेषण
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. अंतःश्वसन
व्याख्या
सही उत्तर A, अंतःश्वसन है। अंतःश्वसन श्वासक्रिया की वह अवस्था है जिसमें डायाफ्राम चपटा होता है और अंतरापर्शुक पेशियां पसलियों को ऊपर तथा बाहर खींचती हैं, जिससे वक्ष गुहा बड़ी हो जाती है, फेफड़ों के भीतर का दाब वायुमंडलीय दाब से घट जाता है और ऑक्सीजन युक्त वायु नासाछिद्रों तथा श्वासनली से भीतर दौड़ आती है। विकल्प B गलत है क्योंकि निःश्वसन इसकी उलटी अवस्था है, जिसमें पेशियां शिथिल होती हैं, वक्ष गुहा सिकुड़ती है और कार्बन डाइऑक्साइड युक्त वायु बाहर धकेली जाती है; सामान्यतः यह निष्क्रिय क्रिया है। विकल्प C गलत है क्योंकि प्लवन तरल में रखी वस्तुओं का भौतिक गुण है, जिसे आर्किमिडीज का नियम बताता है, और इसका श्वसन से कोई संबंध नहीं। विकल्प D गलत है क्योंकि अन्वेषण का अर्थ खोज या जांच करना है और यह जीव विज्ञान का पद ही नहीं है। इस जोड़ी को याद रखें, वायु भीतर लेना अंतःश्वसन और बाहर निकालना निःश्वसन।
निम्नलिखित में से मानव शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि कौन सी है?
- A.अग्न्याशय
- B.थायरॉइड ग्रंथि
- C.यकृत
- D.कर्णपूर्व ग्रंथि
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. यकृत
व्याख्या
सही उत्तर C, यकृत है। यह मानव शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि तथा सबसे भारी आंतरिक अंग है, यह उदर के ऊपरी दाहिने भाग में स्थित है, और पाचन में इसका मुख्य योगदान पित्त है, जो पित्ताशय में संचित होकर वसा का इमल्सीकरण करता है। विकल्प A गलत है क्योंकि अग्न्याशय महत्वपूर्ण होते हुए भी, कि वह एकमात्र बहिःस्रावी और अंतःस्रावी दोनों ग्रंथि है, आकार में बहुत छोटा है और उसका भार सौ ग्राम से भी कम होता है। विकल्प B गलत है क्योंकि थायरॉइड शरीर की सबसे बड़ी अंतःस्रावी ग्रंथि होकर भी यकृत से बहुत छोटी है, और प्रश्न किसी भी प्रकार की सबसे बड़ी ग्रंथि पूछ रहा है। विकल्प D गलत है क्योंकि कर्णपूर्व ग्रंथि केवल लार ग्रंथियों के तीन जोड़ों में सबसे बड़ी है, जो बहुत सीमित उपाधि है। प्रश्नपत्रों का एक सामान्य जाल थायरॉइड देना है, इसलिए पढ़ें कि प्रश्न ग्रंथि कह रहा है या अंतःस्रावी ग्रंथि।
लार में उपस्थित कौन सा एंजाइम मुख में मंड का पाचन आरंभ करता है?
- A.पेप्सिन
- B.ट्रिप्सिन
- C.लार एमाइलेज
- D.लाइपेज
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. लार एमाइलेज
व्याख्या
सही उत्तर C, लार एमाइलेज है, जिसे टायलिन भी कहा जाता है। यह लार ग्रंथियों के तीन जोड़ों से स्रावित होता है और मंड को माल्टोज नामक छोटी शर्करा में तोड़ता है, इसी कारण मंड ही भोजन का एकमात्र वर्ग है जिसका पाचन वास्तव में मुखगुहा में आरंभ हो जाता है। विकल्प A गलत है क्योंकि पेप्सिन आमाशय की जठर ग्रंथियों से स्रावित होता है और केवल प्रोटीन पर, वह भी प्रबल अम्लीय माध्यम में ही क्रिया करता है। विकल्प B गलत है क्योंकि ट्रिप्सिन अग्न्याशय से आता है, ग्रहणी में क्रिया करता है और वह भी प्रोटीन का पाचन करता है, मंड का नहीं। विकल्प D गलत है क्योंकि लाइपेज, जो भी अग्न्याशय से आता है, पित्त द्वारा पहले से इमल्सीकृत वसा पर क्रिया करके उसे वसा अम्ल और ग्लिसरॉल में तोड़ता है। ध्यान दें कि रोटी को देर तक चबाने पर मीठी लगने लगती है, यही रोजमर्रा का प्रमाण है कि लार एमाइलेज मंड को शर्करा में बदल रहा है।
पित्त में कोई एंजाइम न होने पर भी वह वसा के पाचन में सहायक होता है। उसका मुख्य कार्य क्या है?
- A.वह वसा को वसा अम्ल और ग्लिसरॉल में तोड़ता है
- B.वह वसा का इमल्सीकरण करता है और माध्यम को क्षारीय बनाता है
- C.वह रसांकुरों से वसा का अवशोषण करता है
- D.वह वसा को मंड में बदल देता है
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. वह वसा का इमल्सीकरण करता है और माध्यम को क्षारीय बनाता है
व्याख्या
सही उत्तर B है। पित्त यकृत में बनता है, पित्ताशय में संचित तथा सांद्र होता है और ग्रहणी में डाला जाता है, और इसमें पित्त लवण तथा पित्त वर्णक होते हैं, कोई पाचक एंजाइम नहीं। इसके पित्त लवण वसा के बड़े गोलकों को अत्यंत सूक्ष्म बूंदों में तोड़ते हैं, जिसे इमल्सीकरण कहते हैं, और इससे वह पृष्ठीय क्षेत्रफल कई गुना बढ़ जाता है जिस पर अग्न्याशयी लाइपेज क्रिया कर सकता है; साथ ही यह आमाशय से आए अम्ल को उदासीन करता है जिससे क्षारीय अग्न्याशयी और आंत्र एंजाइम काम कर सकें। विकल्प A गलत है क्योंकि वह रासायनिक विघटन लाइपेज का कार्य है, पित्त का नहीं। विकल्प C गलत है क्योंकि रसांकुरों से अवशोषण पाचन के बाद की अलग अवस्था है और पित्त उसे नहीं करता। विकल्प D गलत है क्योंकि शरीर का कोई स्राव वसा को मंड में नहीं बदलता, दोनों भिन्न वर्ग के पोषक तत्व हैं।
आहारनाल का सबसे लंबा भाग कौन सा है और भोजन का अधिकांश अवशोषण कहां होता है?
- A.आमाशय
- B.ग्रासनली
- C.छोटी आंत
- D.बड़ी आंत
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. छोटी आंत
व्याख्या
सही उत्तर C, छोटी आंत है। लगभग छह से सात मीटर लंबी होने के कारण यह नौ मीटर की आहारनाल का सबसे लंबा भाग है, यहीं अग्न्याशयी और आंत्र रसों से पाचन पूरा होता है, और इसकी भीतरी भित्ति पर लाखों अंगुली जैसे रसांकुर होते हैं जो ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, वसा अम्ल तथा ग्लिसरॉल को रक्त में सोखने के लिए विशाल पृष्ठ देते हैं। विकल्प A गलत है क्योंकि आमाशय लगभग पच्चीस सेंटीमीटर लंबा एक पेशीय थैला ही है और जल, एल्कोहॉल तथा कुछ औषधियों के अतिरिक्त वह कुछ भी अवशोषित नहीं करता। विकल्प B गलत है क्योंकि ग्रासनली लगभग पच्चीस सेंटीमीटर की एक साधारण संवाहक नली है जो क्रमसंकुचन से भोजन को नीचे धकेलती है। विकल्प D गलत है क्योंकि बड़ी आंत अधिक चौड़ी होकर भी बहुत छोटी है और मुख्यतः अपचे अवशेष से जल और लवण सोखती है।
आमाशय में स्रावित हाइड्रोक्लोरिक अम्ल निम्नलिखित में से कौन सा कार्य करता है?
- A.वह सीधे वसा का पाचन करता है
- B.वह पेप्सिन की क्रिया के लिए अम्लीय माध्यम देता है और जीवाणुओं को मारता है
- C.वह भोजन से विटामिन अवशोषित करता है
- D.वह पित्त की तरह वसा का इमल्सीकरण करता है
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. वह पेप्सिन की क्रिया के लिए अम्लीय माध्यम देता है और जीवाणुओं को मारता है
व्याख्या
सही उत्तर B है। जठर ग्रंथियां हाइड्रोक्लोरिक अम्ल स्रावित करती हैं, जो आमाशय की अंतर्वस्तु को प्रबल अम्लीय बना देता है; पेप्सिन केवल ऐसे ही माध्यम में क्रिया कर सकता है, और यह अम्ल भोजन के साथ निगले गए अधिकांश जीवाणुओं को भी मार देता है। वही ग्रंथियां श्लेष्मा की एक परत भी स्रावित करती हैं जो आमाशय की भित्ति को इस अम्ल से पचने से बचाती है, और उस परत को हानि होने पर पेप्टिक अल्सर बन जाता है। विकल्प A गलत है क्योंकि कोई अम्ल वसा का पाचन नहीं करता; वसा का इमल्सीकरण पित्त करता है और फिर लाइपेज उसे तोड़ता है। विकल्प C गलत है क्योंकि विटामिनों का अवशोषण मुख्यतः छोटी आंत में होता है, आमाशय के अम्ल की क्रिया से नहीं। विकल्प D गलत है क्योंकि इमल्सीकरण यकृत में बने पित्त लवणों का कार्य है, और भोजन के ग्रहणी में पहुंचने पर पित्त वास्तव में इस अम्ल को उदासीन कर देता है।
मनुष्य के दाएं फेफड़े में कितने खंड होते हैं?
- A.दो
- B.तीन
- C.चार
- D.एक
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. तीन
व्याख्या
सही उत्तर B, तीन है। दायां फेफड़ा तीन खंडों में बंटा होता है, ऊपरी, मध्य और निचला, जबकि बाएं में केवल दो होते हैं, क्योंकि हृदय वक्ष के बाईं ओर झुका होता है और वहां स्थान ले लेता है; बाएं फेफड़े में हृदय के लिए एक कटाव भी होता है जिसे हृदय खांच कहते हैं। विकल्प A गलत है क्योंकि दो बाएं फेफड़े के खंडों की संख्या है, और यह यहां ठीक उसी विद्यार्थी के लिए जाल है जिसे जोड़ी याद है पर यह याद नहीं कि कौन सी संख्या किस ओर की है। विकल्प C गलत है क्योंकि मनुष्य के किसी फेफड़े में चार खंड नहीं होते। विकल्प D गलत है क्योंकि एक अविभाजित फेफड़ा मानव की रचना ही नहीं है। यह नियम याद रखें कि दायां फेफड़ा दोनों में बड़ा है, तीन खंडों वाला, और बायां छोटा, दो खंडों वाला।
मनुष्य में श्वासक्रिया के लिए मुख्य रूप से कौन सी पेशी उत्तरदायी है?
- A.हृद पेशी
- B.डायाफ्राम
- C.बाइसेप्स
- D.आमाशय की चिकनी पेशी
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. डायाफ्राम
व्याख्या
सही उत्तर B, डायाफ्राम है। यह एक गुंबदाकार पेशी पट है जो वक्ष गुहा को उदर से अलग करता है, और संकुचित होने पर चपटा हो जाता है, जिससे वक्ष का आयतन बढ़ता है, फेफड़ों के भीतर का दाब घटता है और वायु भीतर खिंच आती है; पसलियों के बीच की अंतरापर्शुक पेशियां पसली पिंजर को ऊपर तथा बाहर उठाकर सहायता करती हैं। विकल्प A गलत है क्योंकि हृद पेशी केवल हृदय की भित्ति में मिलती है और उसका कार्य रक्त पंप करना है, वायु नहीं। विकल्प C गलत है क्योंकि बाइसेप्स बांह की कंकाल पेशी है और श्वसन में उसकी कोई भूमिका नहीं। विकल्प D गलत है क्योंकि आमाशय की चिकनी पेशी भोजन का मंथन करती है और श्वासक्रिया से उसका कोई संबंध नहीं। डायाफ्राम के अचानक अनैच्छिक ऐंठन को ही हम हिचकी के रूप में अनुभव करते हैं।
मानव रक्त में कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन मुख्य रूप से किस रूप में होता है?
- A.ऑक्सीहीमोग्लोबिन के रूप में
- B.प्लाज्मा में बाइकार्बोनेट आयन के रूप में
- C.मुक्त गैस के बुलबुलों के रूप में
- D.कार्बन मोनोऑक्साइड के रूप में
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. प्लाज्मा में बाइकार्बोनेट आयन के रूप में
व्याख्या
सही उत्तर B, बाइकार्बोनेट आयन के रूप में है। ऊतकों में बनी अधिकांश कार्बन डाइऑक्साइड लाल रक्त कणिकाओं में जाती है, जहां कार्बोनिक एनहाइड्रेज एंजाइम उसे जल से मिलाकर कार्बोनिक अम्ल बनाता है, जो तुरंत हाइड्रोजन और बाइकार्बोनेट आयनों में टूट जाता है; फिर बाइकार्बोनेट प्लाज्मा में फेफड़ों तक जाता है, जहां यही अभिक्रिया उलटी होती है और गैस बाहर निकाल दी जाती है। कुछ कम भाग हीमोग्लोबिन से जुड़कर कार्बेमिनोहीमोग्लोबिन के रूप में और थोड़ा घुली अवस्था में ढोया जाता है। विकल्प A गलत है क्योंकि ऑक्सीहीमोग्लोबिन वह रूप है जिसमें ऑक्सीजन का परिवहन होता है, कार्बन डाइऑक्साइड का नहीं। विकल्प C गलत है क्योंकि रक्त में गैस के मुक्त बुलबुले वाहिका अवरोध पैदा करते हैं और घातक होते हैं, वे सामान्य परिवहन का रूप नहीं हैं। विकल्प D गलत है क्योंकि कार्बन मोनोऑक्साइड अपूर्ण दहन से बनी विषैली गैस है जो हीमोग्लोबिन को अवरुद्ध करती है, शरीर उसे परिवहन के लिए नहीं बनाता।
निगलते समय भोजन को श्वासनली में जाने से रोकने वाले उपास्थि के ढक्कन को क्या कहते हैं?
- A.उपजिह्वा
- B.कंठ
- C.ग्रसनी
- D.प्लूरा
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. उपजिह्वा
व्याख्या
सही उत्तर A, उपजिह्वा है। यह जीभ के मूल में स्थित पत्ती जैसा उपास्थि का ढक्कन है, जो भोजन निगले जाने पर हर बार नीचे झुककर श्वासनली का द्वार ढक देता है, जिससे ग्रास श्वासनली के स्थान पर ग्रासनली में जाता है; जब यह चूक जाता है तो हमें खांसी आती है और दम घुटने लगता है। विकल्प B गलत है क्योंकि कंठ वह ध्वनि यंत्र है जिसमें स्वर रज्जु रहते हैं, और उपजिह्वा के ठीक नीचे स्थित होने पर भी वह यह बंद करने का कार्य नहीं करता। विकल्प C गलत है क्योंकि ग्रसनी मुख तथा नासिका के पीछे की वह साझा गुहा है जिससे वायु और भोजन दोनों गुजरते हैं, वह कोई कपाट नहीं है। विकल्प D गलत है क्योंकि प्लूरा प्रत्येक फेफड़े को लपेटने वाली दोहरी झिल्ली है और उसका द्रव केवल फेफड़े के फैलने-सिकुड़ने में घर्षण घटाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पित्त में एंजाइम न होने पर भी वह क्यों महत्वपूर्ण है?
क्योंकि वसा के पाचन को रसायन से पहले पृष्ठ चाहिए। पित्त लवण वसा के बड़े गोलकों को अत्यंत सूक्ष्म बूंदों में तोड़ते हैं, जिसे इमल्सीकरण कहते हैं, और तब अग्न्याशयी एंजाइम लाइपेज कई गुना बड़े पृष्ठ पर क्रिया कर सकता है। पित्त आमाशय से आए अम्ल को उदासीन भी करता है, जिससे क्षारीय अग्न्याशयी और आंत्र एंजाइम ग्रहणी में काम कर सकें।
पाचन तंत्र का कौन सा भाग भोजन का अधिकांश अवशोषण करता है?
छोटी आंत। उसकी भीतरी भित्ति लाखों अंगुली जैसे वलनों में उठी होती है जिन्हें रसांकुर कहते हैं, और प्रत्येक में रक्त कोशिकाओं का जाल होता है, इसलिए ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, वसा अम्ल और ग्लिसरॉल सीधे रक्त में चले जाते हैं। उसके बाद आने वाली बड़ी आंत अवशेष से केवल जल और लवण सोखती है।
बाएं फेफड़े में दाएं से कम खंड क्यों होते हैं?
क्योंकि हृदय वक्ष गुहा में बाईं ओर झुका होता है और वहां स्थान ले लेता है। इसीलिए बायां फेफड़ा छोटा है, उसमें केवल दो खंड होते हैं और उसमें हृदय खांच नामक एक कटाव भी रहता है, जबकि दाएं फेफड़े में तीन खंडों की जगह बन जाती है।
अंतःश्वसन निःश्वसन से किस प्रकार भिन्न है?
अंतःश्वसन सक्रिय कार्य है: डायाफ्राम संकुचित होकर चपटा होता है, अंतरापर्शुक पेशियां पसलियों को ऊपर तथा बाहर उठाती हैं, वक्ष गुहा बड़ी होती है, भीतर का दाब वायुमंडलीय दाब से घट जाता है और वायु भीतर दौड़ आती है। सामान्य निःश्वसन में प्रयास नहीं लगता; पेशियां केवल शिथिल होती हैं, वक्ष गुहा अपने छोटे आकार में लौटती है और वायु बाहर धकेल दी जाती है।
क्या सांस लेना ही भोजन से ऊर्जा मुक्त करता है?
नहीं। सांस लेना केवल ऑक्सीजन भीतर और कार्बन डाइऑक्साइड बाहर पहुंचाता है। ऊर्जा प्रत्येक कोशिका के माइटोकॉन्ड्रिया में मुक्त होती है, जहां ग्लूकोज का ऑक्सीकरण होकर कार्बन डाइऑक्साइड और जल बनते हैं तथा ऊर्जा एटीपी में संचित होती है। ऑक्सीजन कम पड़ने पर पेशियां अवायवीय श्वसन करती हैं और लैक्टिक अम्ल बनाती हैं, जिससे ऐंठन होती है।
स्रोत
- विज्ञान, कक्षा 10, अध्याय 6: जैव प्रक्रम — एनसीईआरटी
- जीव विज्ञान, कक्षा 11, पाचन एवं अवशोषण अध्याय — एनसीईआरटी
- जीव विज्ञान, कक्षा 11, श्वसन एवं गैसों का विनिमय अध्याय — एनसीईआरटी





