कोशिका विभाजन: समसूत्री और अर्धसूत्री विभाजन के नोट्स
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए कोशिका विभाजन के संपूर्ण नोट्स: कोशिका चक्र, समसूत्री विभाजन की अवस्थाएँ, पूर्वावस्था प्रथम, जीन विनिमय और महत्व।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 5 मिनट

आपके शरीर की प्रत्येक कोशिका किसी दूसरी कोशिका के विभाजन से बनी है। कोशिका विभाजन वह प्रक्रिया है जिसमें जनक कोशिका से संतति कोशिकाएँ बनती हैं, और इसी से जीव एक निषेचित अंड से बढ़ता है, घिसी हुई त्वचा तथा रुधिर कोशिकाओं की भरपाई करता है, घाव भरता है और अगली पीढ़ी के लिए युग्मक बनाता है। परीक्षा की दृष्टि से दो प्रकार महत्वपूर्ण हैं। समसूत्री विभाजन गुणसूत्र संख्या को अपरिवर्तित रखता है और वृद्धि तथा मरम्मत का सामान्य कार्य चलाता है। अर्धसूत्री विभाजन गुणसूत्र संख्या को आधा कर देता है और लिंग कोशिकाएँ बनाता है। इस अध्याय के प्रश्न लगभग सदैव अवस्थाओं के क्रम, प्रत्येक अवस्था की पहचान कराने वाली एक घटना और संख्याओं पर होते हैं, इसलिए दोनों को हर बार एक ही क्रम में याद कीजिए।
कोशिका चक्र
विभाजित होती कोशिका एक दोहराव वाले क्रम से गुजरती है जिसे कोशिका चक्र कहते हैं और जिसके दो बड़े भाग हैं। अंतरावस्था, जिसे भ्रामक रूप से विश्रामावस्था भी कहा जाता है, कुल समय के पंचानबे प्रतिशत से अधिक भाग में रहती है और इसी में कोशिका बढ़ती है तथा अपने डीएनए की प्रतिलिपि बनाती है। इसके तीन उपभाग हैं: जी1 प्रावस्था, जिसमें कोशिका बढ़ती है और प्रोटीन तथा आरएनए बनाती है पर डीएनए की प्रतिलिपि नहीं बनती; एस प्रावस्था या संश्लेषण प्रावस्था, जिसमें डीएनए का द्विगुणन होता है, अर्थात डीएनए की मात्रा दुगुनी हो जाती है जबकि गुणसूत्र संख्या वही रहती है; और जी2 प्रावस्था, जिसमें विभाजन के लिए आवश्यक प्रोटीन तथा कोशिकांग तैयार होते हैं। जो कोशिकाएँ विभाजित होना बंद कर देती हैं, जैसे परिपक्व तंत्रिका कोशिकाएँ, वे चक्र छोड़कर जी0 नामक निष्क्रिय अवस्था में चली जाती हैं। दूसरा भाग एम प्रावस्था अर्थात विभाजन स्वयं है, जिसमें पहले केंद्रक विभाजन (कैरियोकाइनेसिस) और फिर कोशिकाद्रव्य विभाजन (साइटोकाइनेसिस) होता है। संवर्धन में पल रही मानव कोशिका में पूरा चक्र लगभग चौबीस घंटे लेता है, जिसमें एम प्रावस्था केवल लगभग एक घंटे की होती है।
समसूत्री विभाजन, समकारी विभाजन
समसूत्री विभाजन कायिक अर्थात शरीर की कोशिकाओं में होता है। एक जनक कोशिका से दो संतति कोशिकाएँ बनती हैं और प्रत्येक में गुणसूत्रों की संख्या जनक के ठीक बराबर होती है, इसीलिए इसे समकारी विभाजन कहते हैं। यह शब्द वाल्थर फ्लेमिंग ने 1882 में दिया था। इसकी चार अवस्थाएँ हैं।
| अवस्था | क्या होता है |
|---|---|
| पूर्वावस्था | क्रोमैटिन संघनित होकर दृश्य गुणसूत्र बनाता है, प्रत्येक में सेंट्रोमियर पर जुड़ी दो सहोदर क्रोमैटिड होती हैं; तर्कु बनना आरंभ होता है और तारककाय विपरीत ध्रुवों पर जाते हैं; अंत तक केंद्रक कला और केंद्रिका लुप्त हो जाती हैं। यह समसूत्री विभाजन की सबसे लंबी अवस्था है। |
| मध्यावस्था | गुणसूत्र कोशिका की मध्यरेखा पर मध्यावस्था पट्टिका पर पंक्तिबद्ध होते हैं और तर्कु तंतु सेंट्रोमियर के काइनेटोकोर से जुड़ते हैं। गुणसूत्रों के आकार और माप के अध्ययन के लिए यही सर्वोत्तम अवस्था है। |
| पश्चावस्था | प्रत्येक सेंट्रोमियर विभाजित होता है, सहोदर क्रोमैटिड अलग होकर संतति गुणसूत्रों के रूप में विपरीत ध्रुवों की ओर खिंचती हैं। यह सबसे छोटी अवस्था है। |
| अंत्यावस्था | प्रत्येक ध्रुव पर गुणसूत्र खुलकर पुनः क्रोमैटिन बनते हैं, केंद्रक कला पुनः बनती है और केंद्रिका फिर प्रकट होती है, इस प्रकार एक ही कोशिका में दो केंद्रक बन जाते हैं। |
इसके बाद साइटोकाइनेसिस कोशिकाद्रव्य को बाँटता है। जंतु कोशिका में झिल्ली भीतर की ओर दबकर विदलन खाँच बनाती है; पादप कोशिका में, जिसकी दृढ़ भित्ति दबाई नहीं जा सकती, बीच में कोशिका पट्टिका बनती है जो बाहर की ओर बढ़कर पुरानी भित्ति से मिल जाती है। पादप कोशिकाओं में तारककाय भी नहीं होते, इसलिए उनके तर्कु को अतारकी कहा जाता है।
अर्धसूत्री विभाजन, न्यूनकारी विभाजन
अर्धसूत्री विभाजन केवल लैंगिक जनन करने वाले जीवों की जनन कोशिकाओं में होता है। यह नाम फार्मर और मूर ने 1905 में दिया। डीएनए के एक ही द्विगुणन के बाद दो क्रमिक विभाजन होते हैं, इसलिए एक द्विगुणित कोशिका से चार अगुणित कोशिकाएँ बनती हैं, जिनमें गुणसूत्र संख्या जनक की आधी होती है। मनुष्य में छियालीस गुणसूत्रों वाली कोशिका से तेईस गुणसूत्रों वाले युग्मक बनते हैं।
अर्धसूत्री विभाजन प्रथम न्यूनकारी विभाजन है और इसकी पूर्वावस्था पूरे कोशिका विज्ञान की सबसे लंबी तथा जटिल प्रावस्था है। इसकी पाँच उप-अवस्थाएँ क्रम से याद रखिए: तनुपट्ट, जिसमें गुणसूत्र पतले धागों के रूप में दिखने लगते हैं; युग्मपट्ट, जिसमें समजात गुणसूत्र अगल-बगल जोड़ा बनाते हैं, इसे सूत्रयुग्मन कहते हैं और इसे सिनेप्टोनीमल सम्मिश्र जोड़े रखता है; स्थूलपट्ट, जिसमें युग्मित गुणसूत्र, जिन्हें अब द्विसंयोजी या चतुष्क कहते हैं, खंडों का विनिमय करते हैं, यही जीन विनिमय है; द्विपट्ट, जिसमें समजात अलग होने लगते हैं और विनिमय के अंग्रेजी अक्षर X जैसे बिंदु, जिन्हें काइऐज्मेटा कहते हैं, दिखाई देते हैं; और पारगतिक्रम, जिसमें काइऐज्मेटा सिरों की ओर खिसकते हैं और केंद्रक कला टूट जाती है। मध्यावस्था प्रथम में द्विसंयोजी मध्यरेखा पर आते हैं; पश्चावस्था प्रथम में पूरे समजात गुणसूत्र विपरीत ध्रुवों पर जाते हैं और महत्वपूर्ण बात यह है कि सेंट्रोमियर विभाजित नहीं होते; फिर अंत्यावस्था प्रथम आती है।
अर्धसूत्री विभाजन द्वितीय समसूत्री विभाजन जैसा समकारी विभाजन है और इसमें डीएनए का और द्विगुणन नहीं होता। यहाँ सेंट्रोमियर विभाजित होते हैं और सहोदर क्रोमैटिड अलग होती हैं, जिससे पहले विभाजन में बनी दो कोशिकाएँ चार हो जाती हैं।
दोनों विभाजनों का महत्व
- समसूत्री विभाजन गुणसूत्र संख्या स्थिर रखता है, जिससे हर कायिक कोशिका में समान आनुवंशिक सूचना रहती है, और यह वृद्धि, ऊतकों की मरम्मत, मृत कोशिकाओं के प्रतिस्थापन तथा अलैंगिक जनन का आधार है।
- अर्धसूत्री विभाजन गुणसूत्र संख्या आधी करता है, जिससे निषेचन उसे दुगुना करने के बजाय पुनः स्थापित कर देता है।
- अर्धसूत्री विभाजन आनुवंशिक विविधता का मुख्य स्रोत है, स्थूलपट्ट में जीन विनिमय से और मध्यावस्था प्रथम में मातृ तथा पितृ गुणसूत्रों के स्वतंत्र अपव्यूहन से।
- इन प्रक्रियाओं की त्रुटियाँ महत्वपूर्ण हैं: अनियंत्रित समसूत्री विभाजन अर्बुद की वृद्धि का आधार है, और गुणसूत्रों के अलग न हो पाने, जिसे अनियोजन कहते हैं, से डाउन संलक्षण जैसी दशाएँ होती हैं।
परीक्षा की दृष्टि से
इस अध्याय से तीन प्रकार के प्रश्न बनते हैं। पहला यह पूछता है कि कोई घटना किस अवस्था में होती है, इसलिए प्रत्येक अवस्था की पहचान कराने वाली एक घटना याद रखिए: पूर्वावस्था में संघनन, मध्यावस्था में मध्यरेखा पर पंक्तिबद्धता, पश्चावस्था में सेंट्रोमियर का विभाजन और अंत्यावस्था में केंद्रक कला का पुनर्निर्माण। दूसरा संख्याएँ पूछता है: समसूत्री विभाजन से दो द्विगुणित कोशिकाएँ, अर्धसूत्री से चार अगुणित, मानव कायिक कोशिका में 46 और युग्मक में 23 गुणसूत्र, तथा चक्र का 95 प्रतिशत से अधिक भाग अंतरावस्था में। तीसरा पूर्वावस्था प्रथम की उप-अवस्थाएँ क्रम से पूछता है, जिनमें युग्मपट्ट का सूत्रयुग्मन और स्थूलपट्ट का जीन विनिमय सर्वाधिक पूछे जाते हैं। भूलें ये होती हैं कि अंतरावस्था को विश्रामावस्था कह दिया जाता है, यह भुला दिया जाता है कि पश्चावस्था प्रथम में सेंट्रोमियर विभाजित नहीं होता, और विदलन खाँच पादप कोशिका से जोड़ दी जाती है।
महत्वपूर्ण तथ्य
| डीएनए द्विगुणन | अंतरावस्था की एस प्रावस्था |
|---|---|
| कोशिका चक्र का सबसे लंबा भाग | अंतरावस्था, कुल अवधि का 95 प्रतिशत से अधिक |
| निष्क्रिय अवस्था | जी0, जिसमें विभाजन बंद करने वाली कोशिकाएँ जाती हैं |
| समसूत्री विभाजन कहाँ | कायिक कोशिकाओं में; दो द्विगुणित कोशिकाएँ |
| समसूत्री विभाजन की सबसे लंबी अवस्था | पूर्वावस्था; सबसे छोटी पश्चावस्था |
| गुणसूत्र अध्ययन की सर्वोत्तम अवस्था | मध्यावस्था |
| जंतु और पादप में साइटोकाइनेसिस | क्रमशः विदलन खाँच और कोशिका पट्टिका |
| अर्धसूत्री विभाजन कहाँ | जनन कोशिकाओं में; चार अगुणित कोशिकाएँ |
| पूर्वावस्था प्रथम की उप-अवस्थाएँ | तनुपट्ट, युग्मपट्ट, स्थूलपट्ट, द्विपट्ट, पारगतिक्रम |
| सूत्रयुग्मन | युग्मपट्ट में, सिनेप्टोनीमल सम्मिश्र द्वारा |
| जीन विनिमय | स्थूलपट्ट में, पुनर्योजन गुटिकाओं पर |
| मिटोसिस शब्द | वाल्थर फ्लेमिंग द्वारा 1882 में |
| मियोसिस शब्द | फार्मर और मूर द्वारा 1905 में |
| मानव गुणसूत्र संख्या | कायिक कोशिका में 46, युग्मक में 23 |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
कोशिका चक्र की किस प्रावस्था में डीएनए का द्विगुणन होता है?
- A.जी1 प्रावस्था
- B.एस प्रावस्था
- C.जी2 प्रावस्था
- D.एम प्रावस्था
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इस प्रावस्था में कोशिका के डीएनए की प्रतिलिपि बनती है, जिससे केंद्रक में डीएनए की मात्रा दुगुनी हो जाती है, जबकि गुणसूत्रों की संख्या अपरिवर्तित रहती है क्योंकि अब प्रत्येक गुणसूत्र सेंट्रोमियर पर जुड़ी दो समान सहोदर क्रोमैटिड से बना होता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →समसूत्री विभाजन को समकारी विभाजन क्यों कहा जाता है?
- A.इससे चार संतति कोशिकाएँ बनती हैं
- B.संतति कोशिकाओं में गुणसूत्र संख्या जनक कोशिका के बराबर रहती है
- C.यह गुणसूत्र संख्या आधी कर देता है
- D.यह केवल जनन कोशिकाओं में होता है
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समसूत्री विभाजन में पश्चावस्था के दौरान प्रत्येक सेंट्रोमियर विभाजित होता है और हर गुणसूत्र की एक क्रोमैटिड प्रत्येक ध्रुव पर जाती है, इसलिए दोनों संतति कोशिकाओं को जनक कोशिका के ठीक बराबर गुणसूत्र और ठीक वही आनुवंशिक सूचना मिलती है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →समसूत्री विभाजन की किस अवस्था में गुणसूत्र कोशिका की मध्यरेखा पर पंक्तिबद्ध होते हैं?
- A.पूर्वावस्था
- B.मध्यावस्था
- C.पश्चावस्था
- D.अंत्यावस्था
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इस अवस्था में संघनित गुणसूत्र, जिनमें से प्रत्येक दो सहोदर क्रोमैटिड से बना होता है, तर्कु तंतुओं द्वारा तब तक खिसकाए जाते हैं जब तक उनके सेंट्रोमियर कोशिका के बीच एक ही तल में न आ जाएँ, जिसे मध्यावस्था पट्टिका या विषुवतीय पट्टिका कहते हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →सेंट्रोमियर का विभाजन और सहोदर क्रोमैटिड का विपरीत ध्रुवों की ओर जाना किस अवस्था में होता है?
- A.पूर्वावस्था
- B.मध्यावस्था
- C.पश्चावस्था
- D.अंत्यावस्था
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जब गुणसूत्र मध्यावस्था पट्टिका पर पंक्तिबद्ध हो जाते हैं और प्रत्येक काइनेटोकोर किसी तर्कु तंतु से जुड़ जाता है, तब दोनों सहोदर क्रोमैटिड को जोड़े रखने वाला सेंट्रोमियर विभाजित हो जाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →पादप कोशिका में साइटोकाइनेसिस जंतु कोशिका से किस प्रकार भिन्न है?
- A.पादप कोशिका में विदलन खाँच बनती है
- B.पादप कोशिका में कोशिका पट्टिका बनती है
- C.पादप कोशिका अपना कोशिकाद्रव्य विभाजित नहीं करती
- D.पादप कोशिका का केंद्रक दो बार विभाजित होता है
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जंतु कोशिका अपने कोशिकाद्रव्य को विदलन खाँच से बाँटती है, जिसमें प्लाज्मा झिल्ली बीच में चारों ओर से भीतर खिंचती है और कोशिका दब कर दो भागों में बँट जाती है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →अर्धसूत्री विभाजन के अंत में एक जनक कोशिका से कितनी और किस प्रकार की संतति कोशिकाएँ बनती हैं?
- A.दो द्विगुणित कोशिकाएँ
- B.दो अगुणित कोशिकाएँ
- C.चार अगुणित कोशिकाएँ
- D.चार द्विगुणित कोशिकाएँ
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अर्धसूत्री विभाजन डीएनए के एक ही द्विगुणन से आरंभ होता है और उसके बाद दो क्रमिक केंद्रक विभाजन होते हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →समजात गुणसूत्रों के बीच जीन विनिमय पूर्वावस्था प्रथम की किस उप-अवस्था में होता है?
- A.तनुपट्ट
- B.युग्मपट्ट
- C.स्थूलपट्ट
- D.पारगतिक्रम
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इस उप-अवस्था तक समजात गुणसूत्र युग्मपट्ट में जोड़ा बना चुके होते हैं और द्विसंयोजी या चतुष्क के रूप में जुड़े रहते हैं, जिनमें से प्रत्येक चार क्रोमैटिड से बना होता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →पूर्वावस्था प्रथम में समजात गुणसूत्रों के जोड़ा बनाने को क्या कहते हैं?
- A.सूत्रयुग्मन
- B.पारगति
- C.वियोजन
- D.साइटोकाइनेसिस
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पूर्वावस्था प्रथम की युग्मपट्ट उप-अवस्था में समजात गुणसूत्रों के प्रत्येक जोड़े के दोनों सदस्य अपनी पूरी लंबाई में बिंदु-दर-बिंदु मिलते हुए अगल-बगल आ जाते हैं, और उनके बीच बनकर उन्हें जोड़े रखने वाली रचना सिनेप्टोनीमल सम्मिश्र कहलाती है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →अर्धसूत्री विभाजन की पश्चावस्था प्रथम में, समसूत्री विभाजन की पश्चावस्था के विपरीत,
- A.सेंट्रोमियर विभाजित होते हैं और सहोदर क्रोमैटिड अलग होती हैं
- B.सेंट्रोमियर विभाजित नहीं होते और पूरे समजात गुणसूत्र विपरीत ध्रुवों पर जाते हैं
- C.गुणसूत्र मध्यरेखा पर पंक्तिबद्ध होते हैं
- D.केंद्रक कला का निर्माण होता है
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यही एक अंतर वह कारण है जिससे अर्धसूत्री विभाजन प्रथम को न्यूनकारी विभाजन कहा जाता है। पश्चावस्था प्रथम में प्रत्येक द्विसंयोजी के दोनों समजात गुणसूत्र विपरीत ध्रुवों की ओर खिंचते हैं, पर उनमें से हर एक अब भी अविभाजित सेंट्रोमियर पर जुड़ी दो सहोदर क्रोमैटिड से बना रहता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →निम्नलिखित में से कोशिका चक्र की सबसे लंबी प्रावस्था कौन सी है?
- A.पूर्वावस्था
- B.अंतरावस्था
- C.मध्यावस्था
- D.अंत्यावस्था
उत्तर देखें
अंतरावस्था कोशिका चक्र की कुल अवधि के पंचानबे प्रतिशत से अधिक भाग में रहती है, क्योंकि इसी में कोशिका को पर्याप्त आकार तक बढ़ना, प्रोटीन तथा आरएनए का संश्लेषण करना, अपने पूरे डीएनए का द्विगुणन करना और विभाजन के लिए आवश्यक रचनाएँ तैयार करनी होती हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →समसूत्री विभाजन (मिटोसिस) शब्द किसने दिया था?
- A.रॉबर्ट हुक
- B.वाल्थर फ्लेमिंग
- C.फार्मर और मूर
- D.रुडोल्फ विर्चो
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उनके बनाए अवस्थाओं के विस्तृत चित्र ही आज भी पाठ्यपुस्तकों में दिए जाने वाले विवरण का आधार हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →लैंगिक जनन करने वाले जीवों के लिए अर्धसूत्री विभाजन का मुख्य महत्व क्या है?
- A.यह क्षतिग्रस्त ऊतकों की मरम्मत करता है
- B.यह पीढ़ियों में गुणसूत्र संख्या स्थिर रखता है और आनुवंशिक विविधता उत्पन्न करता है
- C.यह कोशिकाओं को बड़ा होने देता है
- D.यह जनक कोशिका की समरूप प्रतिलिपियाँ बनाता है
उत्तर देखें
यदि युग्मकों में पूरी गुणसूत्र संख्या होती तो निषेचन हर पीढ़ी में उसे दुगुना कर देता।
पूरी व्याख्या पढ़ें →अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
समसूत्री और अर्धसूत्री विभाजन में मुख्य अंतर क्या है?
समसूत्री विभाजन कायिक कोशिकाओं में होता है, इसमें एक विभाजन होता है और जनक के बराबर गुणसूत्र संख्या वाली दो संतति कोशिकाएँ बनती हैं। अर्धसूत्री विभाजन जनन कोशिकाओं में होता है, एक ही डीएनए द्विगुणन के बाद दो क्रमिक विभाजन होते हैं और जनक की आधी गुणसूत्र संख्या वाली चार कोशिकाएँ बनती हैं।
अंतरावस्था को विश्रामावस्था क्यों नहीं कहना चाहिए?
क्योंकि इस दौरान कोशिका अत्यंत सक्रिय रहती है। जी1 में वह बढ़ती है तथा आरएनए और प्रोटीन बनाती है, एस में अपने पूरे डीएनए की प्रतिलिपि बनाती है, और जी2 में विभाजन के लिए आवश्यक प्रोटीन तथा कोशिकांग तैयार करती है। यह केवल इसलिए निष्क्रिय दिखती है क्योंकि गुणसूत्रों की कोई दृश्य गति नहीं होती।
जीन विनिमय किस अवस्था में होता है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?
जीन विनिमय पूर्वावस्था प्रथम की तीसरी उप-अवस्था स्थूलपट्ट में होता है, जब युग्मित समजात गुणसूत्रों की असहोदर क्रोमैटिड खंडों का विनिमय करती हैं। इससे जीनों के नए संयोजन बनते हैं और यह लैंगिक जनन करने वाले जीवों की संतानों में आनुवंशिक विविधता का प्रमुख स्रोत है।
पादप कोशिका में विदलन खाँच के बजाय कोशिका पट्टिका क्यों बनती है?
क्योंकि पादप कोशिका दृढ़ सेलुलोस भित्ति से घिरी होती है जिसे भीतर की ओर दबाया नहीं जा सकता। इसलिए पुटिकाएँ कोशिका के केंद्र में एकत्र होकर कोशिका पट्टिका बनाती हैं, जो बाहर की ओर बढ़कर पुरानी भित्ति से जुड़ जाती है और दोनों संतति कोशिकाओं को अलग कर देती है।
यदि विभाजन के समय गुणसूत्र अलग न हों तो क्या होता है?
इस विफलता को अनियोजन कहते हैं। तब किसी संतति कोशिका में एक गुणसूत्र अधिक या कम चला जाता है, और ऐसा युग्मक निषेचन में भाग ले तो बनने वाले जीव में गुणसूत्र संख्या असामान्य हो जाती है, जैसे डाउन संलक्षण में।
अर्धसूत्री विभाजन गुणसूत्र संख्या आधी क्यों करता है?
ताकि निषेचन उसे पुनः स्थापित कर सके। यदि प्रत्येक युग्मक में पूरी द्विगुणित संख्या होती तो हर पीढ़ी में संख्या दुगुनी होती जाती। अर्धसूत्री विभाजन में आधा करना और निषेचन में दुगुना होना किसी जाति की गुणसूत्र संख्या को स्थिर रखता है।





