रेडियोधर्मिता और नाभिकीय ऊर्जा: क्षय, विखंडन, रिएक्टर
परीक्षा के लिए रेडियोधर्मिता और नाभिकीय ऊर्जा के पूर्ण नोट्स: अल्फा, बीटा तथा गामा किरणें, अर्धायु, इकाइयाँ, विखंडन और संलयन, रिएक्टर के अंग तथा भारत का कार्यक्रम।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 4 मिनट

रेडियोधर्मिता परमाणु के अस्थिर नाभिक से कणों अथवा विकिरण के स्वतः उत्सर्जन को कहते हैं। यह नाभिकीय गुण है, रासायनिक नहीं, इसीलिए ताप, दाब या कोई रासायनिक अभिक्रिया किसी नमूने के क्षय की दर नहीं बदल सकती। हेनरी बेकरल ने 1896 में यह प्रभाव तब देखा जब यूरेनियम लवण के साथ काम करते हुए अंधेरे में रखी फोटोग्राफिक प्लेट धुँधली पड़ गई। इसके बाद मेरी और पियरे क्यूरी ने 1898 में पोलोनियम तथा रेडियम अलग किए, और मेरी क्यूरी ने इस परिघटना को रेडियोधर्मिता नाम दिया। अर्नेस्ट रदरफोर्ड ने चुंबकीय क्षेत्र में मुड़ने के ढंग से उत्सर्जन को तीन प्रकारों में बाँटा।
तीन विकिरण
| विकिरण | यह क्या है | आवेश | किससे रुकता है |
|---|---|---|---|
| अल्फा | हीलियम नाभिक, दो प्रोटॉन और दो न्यूट्रॉन | धन दो | कागज की एक शीट या कुछ सेंटीमीटर वायु |
| बीटा | तेज इलेक्ट्रॉन, अथवा बीटा धन क्षय में पॉजिट्रॉन | ऋण एक, या धन एक | कुछ मिलीमीटर एल्युमिनियम |
| गामा | अत्यंत लघु तरंगदैर्घ्य का विद्युत चुंबकीय विकिरण | शून्य | मोटा सीसा या कंक्रीट |
भेदन क्षमता का क्रम गामा, फिर बीटा, फिर अल्फा है; आयनन क्षमता का क्रम इसके उलट है, और अल्फा सर्वाधिक आयनकारी है क्योंकि वह भारी तथा द्विआवेशित है। नाभिक में होने वाले परिवर्तन निश्चित हैं और सीधे पूछे जाते हैं। अल्फा क्षय में द्रव्यमान संख्या चार और परमाणु संख्या दो घटती है। बीटा ऋण क्षय में न्यूट्रॉन प्रोटॉन बन जाता है, इसलिए परमाणु संख्या एक बढ़ती है और द्रव्यमान संख्या नहीं बदलती। गामा उत्सर्जन दोनों संख्याएँ नहीं बदलता, वह केवल अतिरिक्त ऊर्जा बाहर ले जाता है।
अर्धायु, सक्रियता और इकाइयाँ
अर्धायु वह समय है जिसमें नमूने के आधे नाभिक क्षय हो जाते हैं। यह किसी दिए गए न्यूक्लाइड के लिए नियत होती है: दो अर्धायु बाद चौथाई बचता है, तीन अर्धायु बाद आठवाँ भाग। कार्बन-14, जिसकी अर्धायु लगभग 5,700 वर्ष है, काष्ठ, अस्थि और चर्मपत्र जैसे जैविक अवशेषों की आयु बताता है, जबकि यूरेनियम-238, जिसकी अर्धायु लगभग 4.5 अरब वर्ष है, चट्टानों की आयु बताता है। सक्रियता की एसआई इकाई बेकरल है, अर्थात प्रति सेकंड एक विघटन; पुरानी इकाई क्यूरी 3.7 गुणा दस की घात दस बेकरल के बराबर है। अवशोषित मात्रा ग्रे में और जैविक समतुल्य मात्रा सीवर्ट में नापी जाती है, जिन्होंने रैड तथा रेम का स्थान लिया।
रेडियो समस्थानिकों का उपयोग आयु निर्धारण से बहुत आगे है। कोबाल्ट-60 कैंसर उपचार तथा भोजन और चिकित्सा उपकरणों के विकिरण उपचार के लिए गामा किरणें देता है, आयोडीन-131 थायरॉइड के लिए प्रयुक्त होता है, सोडियम-24 रक्त संचार के अध्ययन में, फॉस्फोरस-32 कृषि में यह देखने के लिए कि पौधा उर्वरक कैसे लेता है, और टेक्नीशियम-99एम चिकित्सा प्रतिबिंबन में।
विखंडन और संलयन
नाभिकीय विखंडन में भारी नाभिक हल्के नाभिकों में टूटता है और ऊर्जा के साथ दो या तीन न्यूट्रॉन निकलते हैं। ओटो हान तथा फ्रिट्ज स्ट्रासमान ने इसे 1938 में खोजा और लीजे माइटनर ने ओटो फ्रिश के साथ इसकी व्याख्या की। चूँकि प्रत्येक विखंडन से निकले न्यूट्रॉन आगे के नाभिक तोड़ सकते हैं, नमूना क्रांतिक द्रव्यमान से अधिक होने पर शृंखला अभिक्रिया संभव हो जाती है। यूरेनियम-235 और प्लूटोनियम-239 सामान्य विखंडनीय पदार्थ हैं। नाभिकीय संलयन इसका उलटा है: हल्के नाभिक जुड़कर भारी नाभिक बनाते हैं, जैसा सूर्य में हाइड्रोजन नाभिक करते हैं, और इसके लिए लाखों डिग्री ताप चाहिए। हाइड्रोजन बम विखंडन विस्फोट से संलयन आरंभ कराता है, इसीलिए उसकी ऊर्जा दोनों प्रक्रियाओं से आती है। दोनों दशाओं में निकलने वाली ऊर्जा उस द्रव्यमान से आती है जो लुप्त हो जाता है, आइंस्टाइन के उस संबंध के अनुसार कि ऊर्जा द्रव्यमान और प्रकाश के वेग के वर्ग के गुणनफल के बराबर है; यही लुप्त द्रव्यमान द्रव्यमान क्षति है और नाभिक को बाँधने वाली ऊर्जा उसकी बंधन ऊर्जा है, जो प्रति न्यूक्लिऑन लोहे के आसपास सर्वाधिक होती है।
रिएक्टर के भीतर
- ईंधन: संवर्धित अथवा प्राकृतिक यूरेनियम, या ब्रीडर में प्लूटोनियम।
- मंदक: भारी जल अथवा ग्रेफाइट, जो तेज न्यूट्रॉनों को धीमा करता है जिससे वे विखंडन करने में अधिक सक्षम हों।
- नियंत्रक छड़ें: कैडमियम अथवा बोरॉन, जो न्यूट्रॉन सोखकर अभिक्रिया की दर नियंत्रित करती हैं।
- शीतलक: जल, भारी जल, द्रव सोडियम अथवा कार्बन डाइऑक्साइड, जो ऊष्मा ले जाकर भाप बनाता है।
- परिरक्षण: मोटा कंक्रीट और सीसा, जो विकिरण को बाहर जाने से रोकता है।
भारत का नाभिकीय कार्यक्रम
होमी जहाँगीर भाभा को भारत के नाभिकीय कार्यक्रम का जनक कहा जाता है। परमाणु ऊर्जा आयोग 1948 में और परमाणु ऊर्जा विभाग 1954 में बना, तथा 1956 में ट्रॉम्बे में चालू हुआ अप्सरा एशिया का पहला अनुसंधान रिएक्टर था। महाराष्ट्र का तारापुर देश का पहला नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र बना। भाभा की त्रिस्तरीय योजना भारत के सीमित यूरेनियम और बहुत बड़े थोरियम भंडार को देखकर बनी, जो केरल तट की मोनाजाइट बालू में है। पहला चरण दाबित भारी जल रिएक्टरों का है, जिनमें प्राकृतिक यूरेनियम जलता है और भारी जल मंदक तथा शीतलक होता है। दूसरा चरण तीव्र प्रजनक रिएक्टरों का है, जिनका ईंधन पहले चरण से प्राप्त प्लूटोनियम है, और इसका प्रोटोटाइप तीव्र प्रजनक रिएक्टर कलपक्कम में है। तीसरा चरण थोरियम का उपयोग करना है, उसे यूरेनियम-233 में बदलकर उसी ईंधन के लिए बने रिएक्टरों में। नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड बनाता और चलाता है, सुरक्षा का नियमन परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड करता है, और झारखंड का जादूगोड़ा, जिसे यूरेनियम कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड चलाता है, देश की पहली यूरेनियम खान थी।
परीक्षा की दृष्टि से
पाँच समूह लगभग हर प्रश्न को ढक लेते हैं। खोजें: रेडियोधर्मिता के लिए बेकरल, पोलोनियम तथा रेडियम के लिए क्यूरी दंपति, विखंडन के लिए हान और स्ट्रासमान। तीन किरणों के गुण, जिनमें जाल भेदन क्षमता तथा आयनन क्षमता को आपस में बदल देना है। क्षय का गणित, जो द्रव्यमान संख्या और परमाणु संख्या के परिवर्तन के रूप में पूछा जाता है, तथा अर्धायु के वे सवाल जिनका उत्तर आधा, चौथाई या आठवाँ भाग होता है। रिएक्टर के अंग, जहाँ मंदक, नियंत्रक छड़ और शीतलक आपस में विकल्प बनते हैं और भारी जल का उत्तर मंदक है। और भारतीय कार्यक्रम: भाभा, पहला रिएक्टर अप्सरा, पहला ऊर्जा संयंत्र तारापुर, तीव्र प्रजनक के लिए कलपक्कम, तीसरे चरण के लिए थोरियम, और यूरेनियम के लिए जादूगोड़ा। इकाइयाँ भी सीधे पूछी जाती हैं: सक्रियता के लिए बेकरल, अवशोषित मात्रा के लिए ग्रे, समतुल्य मात्रा के लिए सीवर्ट।
महत्वपूर्ण तथ्य
| रेडियोधर्मिता की खोज | हेनरी बेकरल, 1896, यूरेनियम लवण से |
|---|---|
| पोलोनियम और रेडियम | मेरी तथा पियरे क्यूरी, 1898 |
| अल्फा कण | हीलियम नाभिक, आवेश धन दो |
| बीटा कण | तेज इलेक्ट्रॉन, आवेश ऋण एक |
| गामा किरणें | विद्युत चुंबकीय विकिरण, आवेश शून्य, सर्वाधिक भेदक |
| अल्फा क्षय में परिवर्तन | द्रव्यमान संख्या 4 कम, परमाणु संख्या 2 कम |
| सक्रियता की एसआई इकाई | बेकरल, प्रति सेकंड एक विघटन |
| एक क्यूरी | 3.7 गुणा दस की घात दस बेकरल |
| मात्रा की इकाइयाँ | अवशोषित मात्रा ग्रे, समतुल्य मात्रा सीवर्ट |
| कार्बन-14 अर्धायु | लगभग 5,700 वर्ष, जैविक पदार्थ की आयु के लिए |
| विखंडन की खोज | ओटो हान और फ्रिट्ज स्ट्रासमान, 1938 |
| मंदक | भारी जल अथवा ग्रेफाइट |
| नियंत्रक छड़ें | कैडमियम अथवा बोरॉन |
| भारत के नाभिकीय कार्यक्रम के जनक | होमी जहाँगीर भाभा |
| भारत का पहला रिएक्टर | अप्सरा, ट्रॉम्बे, 1956 |
| पहला नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र | तारापुर, महाराष्ट्र |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
किस रेडियोधर्मी समस्थानिक की अर्धायु 5770 वर्ष है, जिसका प्रयोग सामान्यतः कागज और चर्मपत्र जैसे जैविक पदार्थों की आयु आँकने में किया जाता है?
- A.कार्बन-9
- B.कार्बन-12
- C.कार्बन-14
- D.कार्बन-17
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर C, कार्बन-14 है। कार्बन-14 कार्बन का वह रेडियोधर्मी समस्थानिक है जो रेडियोकार्बन डेटिंग में प्रयुक्त होता है, और उसकी अर्धायु लगभग 5,700 वर्ष है, जो प्रश्न में दी गई संख्या के अनुरूप है। जीवित पौधा या प्राणी साधारण कार्बन के साथ कार्बन-14 भी लेता है; मृत्यु के बाद यह ग्रहण रुक जाता है और कार्बन-14 बीटा उत्सर्जन से क्षय होता है, इसलिए काष्ठ, अस्थि, वस्त्र अथवा चर्मपत्र में शेष अनुपात से नमूने की आयु निकलती है। विकल्प A गलत है क्योंकि कार्बन-9 अत्यंत अल्पजीवी समस्थानिक है, जो आयु निर्धारण में किसी काम का नहीं। विकल्प B गलत है क्योंकि कार्बन-12 कार्बन का साधारण स्थायी समस्थानिक है और परमाणु द्रव्यमान का मानक है, इसलिए वह क्षय ही नहीं होता। विकल्प D गलत है क्योंकि कार्बन-17 अत्यंत अस्थिर है और सेकंड के अंश तक ही टिकता है।
हाइड्रोजन बम में अत्यंत विनाशकारी विस्फोट किस कारण होता है?
- A.नाभिकीय विखंडन और नाभिकीय संलयन
- B.नाभिकीय विखंडन
- C.क्रायोजेनिक हाइड्रोजन का उपयोग
- D.अति संपीडित हाइड्रोजन का उपयोग
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर A, नाभिकीय विखंडन और नाभिकीय संलयन है। हाइड्रोजन बम, जिसे तापनाभिकीय बम भी कहा जाता है, दो चरणों में काम करता है। यूरेनियम अथवा प्लूटोनियम का विखंडन विस्फोट लाखों डिग्री का वह ताप पैदा करता है जो हल्के नाभिकों को जोड़ने के लिए आवश्यक है, और फिर उन नाभिकों का संलयन विखंडन चरण से कहीं अधिक ऊर्जा देता है। इस प्रकार विस्फोट में दोनों प्रक्रियाओं का योग होता है। विकल्प B गलत है क्योंकि केवल विखंडन पहले प्रकार के परमाणु बम का वर्णन करता है, जो कम शक्तिशाली होता है। विकल्प C गलत है क्योंकि क्रायोजेनिक हाइड्रोजन, अर्थात अत्यंत निम्न ताप पर द्रवित हाइड्रोजन, रॉकेट ईंधन है और बम की ऊर्जा से उसका कोई संबंध नहीं। विकल्प D गलत है क्योंकि हाइड्रोजन को केवल संपीडित करने से नाभिकीय ऊर्जा नहीं निकलती, नाभिकों का संलयन कराना पड़ता है।
रेडियोधर्मिता की खोज किस वैज्ञानिक ने की थी?
- A.हेनरी बेकरल
- B.मेरी क्यूरी
- C.अर्नेस्ट रदरफोर्ड
- D.विल्हेम रॉन्टजन
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर A, हेनरी बेकरल है। 1896 में बेकरल ने पाया कि अंधेरे में रखा यूरेनियम लवण लपेटी हुई फोटोग्राफिक प्लेट को धुँधला कर देता है, जिससे सिद्ध हुआ कि वह लवण प्रकाश के संपर्क में आए बिना अपना भेदक विकिरण उत्सर्जित करता है। विकल्प B गलत है, यद्यपि मेरी क्यूरी ने अपने पति पियरे के साथ 1898 में पोलोनियम तथा रेडियम खोजे, रेडियोधर्मिता शब्द दिया और बेकरल के साथ नोबेल पुरस्कार साझा किया; परंतु इस प्रभाव की खोज बेकरल की है। विकल्प C गलत है क्योंकि रदरफोर्ड बाद में आए और उन्होंने उत्सर्जन को अल्फा, बीटा तथा गामा में बाँटा, परमाणु का नाभिकीय मॉडल दिया तथा पहला कृत्रिम रूपांतरण किया। विकल्प D गलत है क्योंकि रॉन्टजन ने 1895 में एक्स किरणें खोजीं, जो नाभिक के बाहर बनती हैं और रेडियोधर्मिता नहीं हैं।
अल्फा कण किस परमाणु के नाभिक के समान होता है?
- A.हाइड्रोजन
- B.हीलियम
- C.लिथियम
- D.ड्यूटीरियम
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर B, हीलियम है। अल्फा कण में दो प्रोटॉन और दो न्यूट्रॉन बँधे रहते हैं, और यही हीलियम-4 परमाणु का नाभिक है, इसलिए उसका आवेश धन दो तथा द्रव्यमान संख्या चार होती है। भारी तथा द्विआवेशित होने के कारण वह वायु को प्रबलता से आयनित करता है पर ऊर्जा शीघ्र खो देता है, और कागज की एक शीट या कुछ सेंटीमीटर वायु उसे रोक देती है। विकल्प A गलत है क्योंकि हाइड्रोजन का नाभिक एक प्रोटॉन है, जो कुछ नाभिकीय अभिक्रियाओं में निकलता है पर अल्फा कण नहीं है। विकल्प C गलत है क्योंकि लिथियम के नाभिक में तीन प्रोटॉन होते हैं। विकल्प D गलत है क्योंकि ड्यूटीरियम का नाभिक, ड्यूटरॉन, एक प्रोटॉन और एक न्यूट्रॉन का होता है और भारी जल में प्रयुक्त होता है, अल्फा क्षय में नहीं।
जब कोई नाभिक अल्फा कण उत्सर्जित करता है तो उसकी द्रव्यमान संख्या और परमाणु संख्या में क्या परिवर्तन होता है?
- A.द्रव्यमान संख्या 2 और परमाणु संख्या 1 घटती है
- B.द्रव्यमान संख्या 4 और परमाणु संख्या 2 घटती है
- C.द्रव्यमान संख्या अपरिवर्तित रहती है और परमाणु संख्या 1 बढ़ती है
- D.दोनों अपरिवर्तित रहती हैं
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर B, द्रव्यमान संख्या 4 और परमाणु संख्या 2 घटती है। अल्फा कण दो प्रोटॉन और दो न्यूट्रॉन ले जाता है, इसलिए जनक नाभिक की द्रव्यमान संख्या चार तथा परमाणु संख्या दो घट जाती है और वह आवर्त सारणी में दो स्थान पीछे का तत्व बन जाता है; उदाहरण के लिए यूरेनियम-238 थोरियम-234 बन जाता है। विकल्प A गलत है क्योंकि कोई भी क्षय दो इकाई द्रव्यमान के साथ एक इकाई आवेश नहीं घटाता। विकल्प C गलत है क्योंकि यह बीटा ऋण क्षय का वर्णन है, जिसमें न्यूट्रॉन प्रोटॉन बन जाता है और इलेक्ट्रॉन निकलता है, इसलिए आवेश एक बढ़ता है और द्रव्यमान संख्या वही रहती है। विकल्प D गलत है क्योंकि यह गामा उत्सर्जन है, जिसमें नाभिक केवल अतिरिक्त ऊर्जा छोड़ता है और कोई संख्या नहीं बदलती।
निम्नलिखित विकिरणों में सर्वाधिक भेदन क्षमता किसकी होती है?
- A.अल्फा किरणें
- B.बीटा किरणें
- C.गामा किरणें
- D.तीनों की समान
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर C, गामा किरणें है। गामा विकिरण विद्युत चुंबकीय है, उसमें न आवेश होता है न विराम द्रव्यमान, इसलिए वह आवेशित कणों की तुलना में पदार्थ से बहुत सरलता से पार निकलता है और उसे घटाने के लिए मोटा सीसा या कंक्रीट चाहिए। विकल्प A गलत है क्योंकि अल्फा कण तीनों में सर्वाधिक आयनकारी होते हुए भी कागज की एक शीट अथवा कुछ सेंटीमीटर वायु से रुक जाता है, और इसका कारण यही प्रबल अन्योन्यक्रिया है। विकल्प B गलत है क्योंकि बीटा कण हल्के इलेक्ट्रॉन होने से अल्फा से अधिक भेदते हैं पर कुछ मिलीमीटर एल्युमिनियम से रुक जाते हैं। विकल्प D गलत है क्योंकि तीनों में बहुत अंतर है। उपयोगी नियम यह है कि भेदन क्षमता अल्फा से बीटा और गामा की ओर बढ़ती है जबकि आयनन क्षमता उसी क्रम में घटती है।
नाभिकीय रिएक्टर में भारी जल का मुख्य उपयोग किस रूप में होता है?
- A.मंदक के रूप में
- B.ईंधन के रूप में
- C.नियंत्रक छड़ के रूप में
- D.परिरक्षण के रूप में
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर A, मंदक के रूप में है। भारी जल, जिसमें साधारण जल का हाइड्रोजन ड्यूटीरियम से बदला होता है, विखंडन में निकले तेज न्यूट्रॉनों को उस निम्न गति तक धीमा करता है जिस पर वे आगे यूरेनियम नाभिक तोड़ने में अधिक सक्षम होते हैं, और ऐसा करते हुए वह बहुत कम न्यूट्रॉन सोखता है, इसीलिए भारतीय दाबित भारी जल रिएक्टर प्राकृतिक यूरेनियम का उपयोग कर सकते हैं। ऐसे रिएक्टरों में भारी जल शीतलक का कार्य भी करता है। विकल्प B गलत है क्योंकि ईंधन यूरेनियम अथवा प्लूटोनियम होता है। विकल्प C गलत है क्योंकि नियंत्रक छड़ें कैडमियम या बोरॉन जैसे न्यूट्रॉन अवशोषकों की बनती हैं, जिनका उद्देश्य उलटा है। विकल्प D गलत है क्योंकि परिरक्षण क्रोड के चारों ओर मोटे कंक्रीट और सीसे से होता है।
नाभिकीय शृंखला अभिक्रिया की दर नियंत्रित करने वाली नियंत्रक छड़ें सामान्यतः किस पदार्थ की बनी होती हैं?
- A.ग्रेफाइट और भारी जल
- B.कैडमियम और बोरॉन
- C.सीसा और कंक्रीट
- D.यूरेनियम और प्लूटोनियम
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर B, कैडमियम और बोरॉन है। दोनों न्यूट्रॉन प्रबलता से सोखते हैं, इसलिए छड़ों को क्रोड में भीतर धकेलने से न्यूट्रॉन हट जाते हैं और शृंखला अभिक्रिया धीमी होती है, जबकि बाहर खींचने से अभिक्रिया बढ़ती है; इसी से रिएक्टर की शक्ति नियंत्रित होती है और उसे बंद भी किया जाता है। विकल्प A गलत है क्योंकि ग्रेफाइट और भारी जल मंदक हैं, जो न्यूट्रॉन सोखे बिना उन्हें धीमा करते हैं, अर्थात आवश्यकता उलटी है। विकल्प C गलत है क्योंकि सीसा और कंक्रीट वह जैविक परिरक्षण बनाते हैं जो विकिरण को रिएक्टर भवन से बाहर जाने से रोकता है। विकल्प D गलत है क्योंकि यूरेनियम और प्लूटोनियम वे विखंडनीय ईंधन हैं जो आरंभ में न्यूट्रॉन देते हैं। मंदक, नियंत्रक छड़, शीतलक और परिरक्षण को अपने-अपने पदार्थ से जोड़कर याद रखना चाहिए।
सूर्य से विकिरित ऊर्जा मुख्यतः किस प्रक्रिया से उत्पन्न होती है?
- A.यूरेनियम का नाभिकीय विखंडन
- B.हाइड्रोजन नाभिकों का नाभिकीय संलयन
- C.हाइड्रोजन का रासायनिक दहन
- D.भारी तत्वों का रेडियोधर्मी क्षय
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर B, हाइड्रोजन नाभिकों का नाभिकीय संलयन है। सूर्य के क्रोड में लाखों डिग्री ताप पर हाइड्रोजन नाभिक क्रमशः जुड़कर हीलियम बनाते हैं, और इस प्रक्रिया में जो थोड़ा द्रव्यमान घटता है वही आइंस्टाइन के द्रव्यमान-ऊर्जा संबंध के अनुसार ऊर्जा बनकर निकलता है। विकल्प A गलत है क्योंकि विखंडन के लिए यूरेनियम जैसे भारी नाभिक चाहिए, जो तारे का ईंधन नहीं हैं। विकल्प C गलत है क्योंकि रासायनिक दहन प्रति अभिक्रिया कुछ इलेक्ट्रॉन वोल्ट ही देता है, जो सूर्य को अरबों वर्ष जलाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं, और क्रोड में जलने के लिए ऑक्सीजन भी नहीं है। विकल्प D गलत है क्योंकि भारी तत्वों का रेडियोधर्मी क्षय पृथ्वी के आंतरिक भाग को कुछ ऊष्मा देता है, परंतु वह सौर ऊर्जा का स्रोत नहीं है।
रेडियोधर्मिता की एसआई इकाई कौन सी है?
- A.बेकरल
- B.क्यूरी
- C.ग्रे
- D.सीवर्ट
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर A, बेकरल है। एक बेकरल का अर्थ प्रति सेकंड एक विघटन है, और यह रेडियोधर्मी स्रोत की सक्रियता की एसआई इकाई है, जिसका नाम रेडियोधर्मिता के आविष्कारक के नाम पर रखा गया। विकल्प B गलत है क्योंकि क्यूरी सक्रियता की पुरानी इकाई है, जो एक ग्राम रेडियम की सक्रियता पर आधारित थी, और एक क्यूरी 3.7 गुणा दस की घात दस बेकरल के बराबर होता है; यह आज भी उद्धृत होता है पर एसआई इकाई नहीं है। विकल्प C गलत है क्योंकि ग्रे अवशोषित मात्रा नापता है, अर्थात एक किलोग्राम पदार्थ में जमा ऊर्जा, और उसने रैड का स्थान लिया। विकल्प D गलत है क्योंकि सीवर्ट समतुल्य मात्रा नापता है, जो विकिरण के प्रकार से ऊतक को होने वाली हानि के अनुसार भारित होती है, और उसने रेम का स्थान लिया।
भारत में स्थापित पहला नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र कौन था?
- A.तारापुर, महाराष्ट्र
- B.कलपक्कम, तमिलनाडु
- C.रावतभाटा, राजस्थान
- D.नरोरा, उत्तर प्रदेश
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर A, तारापुर, महाराष्ट्र है। तारापुर परमाणु ऊर्जा केंद्र भारत का पहला नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र था और एशिया का भी पहला, जो अमेरिकी सहयोग से बना और जिसमें क्वथन जल रिएक्टर लगे, जबकि बाद के भारतीय संयंत्रों में दाबित भारी जल रिएक्टर हैं। विकल्प B गलत है क्योंकि कलपक्कम का मद्रास परमाणु ऊर्जा केंद्र बाद में आया और उसे दूसरे चरण के प्रोटोटाइप तीव्र प्रजनक रिएक्टर के स्थल के रूप में जाना जाता है। विकल्प C गलत है क्योंकि राजस्थान का रावतभाटा दूसरा संयंत्र था, जो कनाडा के सहयोग से बना। विकल्प D गलत है क्योंकि उत्तर प्रदेश का नरोरा उससे भी बाद का है। अभ्यर्थी को 1956 में ट्रॉम्बे के पहले अनुसंधान रिएक्टर अप्सरा को पहले ऊर्जा संयंत्र तारापुर से अलग रखना चाहिए।
भारत के त्रिस्तरीय नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम का तीसरा चरण किस तत्व पर आधारित है?
- A.प्राकृतिक यूरेनियम
- B.प्लूटोनियम
- C.थोरियम
- D.बेरिलियम
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर C, थोरियम है। होमी भाभा ने यह कार्यक्रम इस तथ्य को देखकर बनाया कि भारत में यूरेनियम सीमित है पर केरल तट की मोनाजाइट बालू में थोरियम के बहुत बड़े भंडार हैं। तीसरे चरण में थोरियम को यूरेनियम-233 में बदलकर उसी ईंधन के लिए बने रिएक्टरों में जलाना है, जिससे देश को शताब्दियों के लिए अपना ईंधन मिल सके। विकल्प A गलत है क्योंकि प्राकृतिक यूरेनियम पहले चरण का ईंधन है, जो दाबित भारी जल रिएक्टरों में जलता है। विकल्प B गलत है क्योंकि पहले चरण के प्रयुक्त ईंधन के पुनर्संसाधन से मिला प्लूटोनियम दूसरे चरण के तीव्र प्रजनक रिएक्टरों का ईंधन है, जिसका प्रोटोटाइप कलपक्कम में है। विकल्प D गलत है क्योंकि बेरिलियम न्यूट्रॉन परावर्तक और मंदक के रूप में प्रयुक्त होता है, ईंधन के रूप में नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नाभिकीय विखंडन और नाभिकीय संलयन में क्या अंतर है?
विखंडन में यूरेनियम-235 जैसा भारी नाभिक हल्के नाभिकों में टूटता है और ऊर्जा तथा न्यूट्रॉन निकलते हैं; यही अभिक्रिया नाभिकीय ऊर्जा संयंत्रों और परमाणु बम में प्रयुक्त होती है। संलयन में हाइड्रोजन जैसे हल्के नाभिक जुड़कर भारी नाभिक बनाते हैं, जो सूर्य की ऊर्जा का स्रोत है और जिसके लिए लाखों डिग्री ताप आवश्यक है।
कौन सा विकिरण सर्वाधिक भेदक और कौन सर्वाधिक आयनकारी है?
गामा विकिरण सर्वाधिक भेदक है और उसे रोकने के लिए मोटा सीसा या कंक्रीट चाहिए, जबकि अल्फा कण सर्वाधिक आयनकारी है क्योंकि वह भारी है और दोहरा धन आवेश रखता है, फिर भी उसे कागज की एक शीट रोक देती है। बीटा कण दोनों के बीच हैं और कुछ मिलीमीटर एल्युमिनियम से रुक जाते हैं।
अर्धायु क्या है?
वह समय जिसमें नमूने के आधे रेडियोधर्मी नाभिक क्षय हो जाते हैं। यह नमूने की मात्रा, ताप अथवा दाब पर निर्भर नहीं करती। एक अर्धायु बाद आधा पदार्थ बचता है, दो अर्धायु बाद चौथाई और तीन अर्धायु बाद आठवाँ भाग, और इसी आधार पर संख्यात्मक प्रश्न बनाए जाते हैं।
रिएक्टर में मंदक और नियंत्रक छड़ का क्या कार्य है?
मंदक, जो प्रायः भारी जल या ग्रेफाइट होता है, विखंडन से निकले तेज न्यूट्रॉनों को धीमा करता है जिससे वे आगे विखंडन कर सकें। कैडमियम या बोरॉन की नियंत्रक छड़ें न्यूट्रॉन सोखती हैं, इसलिए उन्हें भीतर धकेलने से शृंखला अभिक्रिया धीमी होती है और बाहर खींचने से तेज। शीतलक अलग होता है और ऊष्मा बाहर ले जाता है।
भारत के नाभिकीय कार्यक्रम के तीन चरण कौन से हैं?
पहला चरण प्राकृतिक यूरेनियम वाले दाबित भारी जल रिएक्टरों का है। दूसरा चरण तीव्र प्रजनक रिएक्टरों का है, जिनका ईंधन पहले चरण से प्राप्त प्लूटोनियम है और जिसका प्रोटोटाइप कलपक्कम में है। तीसरा चरण भारत के बड़े थोरियम भंडार का उपयोग है, जिसमें थोरियम को यूरेनियम-233 में बदला जाता है। इस योजना का श्रेय होमी भाभा को है।
कार्बन डेटिंग में कौन सा समस्थानिक प्रयुक्त होता है और क्यों?
कार्बन-14, जिसकी अर्धायु लगभग 5,700 वर्ष है। जीवित प्राणी साधारण कार्बन के साथ कार्बन-14 भी लेते हैं; मृत्यु पर यह ग्रहण रुक जाता है और अवशेषों में बचा कार्बन-14 नियमित दर से क्षय होता रहता है, इसलिए शेष अनुपात से आयु ज्ञात होती है। यह विधि कुछ सौ से कुछ दसियों हजार वर्ष पुराने जैविक पदार्थ के लिए उपयुक्त है।
स्रोत
- भौतिकी पाठ्यपुस्तक कक्षा 12, भाग 2, अध्याय: नाभिक — एनसीईआरटी
- त्रिस्तरीय नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम तथा अनुसंधान रिएक्टर — परमाणु ऊर्जा विभाग
- भारत के नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र और उनके रिएक्टर प्रकार — भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड





