पादप रोग और उनके कारक: परीक्षा नोट्स
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए पादप रोगों के नोट्स: फसलों के कवक, जीवाणु, विषाणु तथा सूत्रकृमि जनित रोग, कमी जनित रोग, कीट वाहक और नियंत्रण के उपाय।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 5 मिनट

पादप रोग का अर्थ है पौधे की सामान्य क्रियाओं में वह स्थायी गड़बड़ी जो किसी जीवित कारक अथवा किसी पोषक तत्व की कमी से उत्पन्न होती है। यह विषय प्रत्येक सामान्य विज्ञान प्रश्नपत्र में अंक दिलाता है, क्योंकि प्रश्न जोड़ियों के रूप में आते हैं — एक रोग, एक फसल और एक कारक जीव। इनमें से लगभग सभी पाँच प्रकार के कारणों से आते हैं। कवक सबसे बड़ा वर्ग है और फसल की अधिकांश हानि इनसे होती है। जीवाणु सड़न, अंगमारी और कैंकर उत्पन्न करते हैं। विषाणु मोजैक तथा पत्ती मरोड़ उत्पन्न करते हैं और कीटों द्वारा ढोए जाते हैं। फाइटोप्लाज्मा, जिन्हें पहले माइकोप्लाज्मा सदृश जीव कहा जाता था, पीलापन तथा छोटी पत्ती वर्ग के रोग करते हैं। सूत्रकृमि जड़ों पर आक्रमण करते हैं। इन जीवित कारकों के साथ शारीरिक अथवा कमी जनित रोग भी हैं, जिनमें पौधे पर कोई संक्रमण नहीं होता और किसी खनिज की कमी ही लक्षण उत्पन्न कर देती है।
कवक जनित रोग
कवक रोगजनक ऐसे बीजाणु बनाते हैं जो वायु, जल, बीज और मिट्टी से फैलते हैं, और ये आर्द्र मौसम में पनपते हैं; इसी कारण भारत में कवक जनित महामारियाँ अधिकतर मानसून के बाद आती हैं। विज्ञान के इतिहास का सर्वाधिक प्रसिद्ध उदाहरण आलू का पछेती अंगमारी रोग है, जिसका कारक फाइटोफ्थोरा इन्फेस्टैंस है; 1840 के दशक की महामारी ने आयरलैंड की आलू फसल नष्ट कर दी और उसके बाद अकाल तथा पलायन हुआ। उस प्रकोप के अध्ययन ने एंटन डी बैरी को पादप रोग विज्ञान का जनक बनाया, क्योंकि उन्होंने सिद्ध किया कि कवक रोग का कारण है, उसका परिणाम नहीं।
| रोग | फसल | कारक कवक |
|---|---|---|
| पछेती अंगमारी | आलू | फाइटोफ्थोरा इन्फेस्टैंस |
| अगेती अंगमारी | आलू और टमाटर | अल्टरनेरिया सोलैनी |
| रतुआ (गेरुआ) | गेहूँ | पक्सीनिया प्रजातियाँ |
| खुला कंडुआ | गेहूँ | अस्टिलैगो प्रजातियाँ |
| झोंका (ब्लास्ट) | धान | पाइरिकुलेरिया ओराइजी |
| लाल सड़न | गन्ना | कोलेटोट्राइकम फालकेटम |
| टिक्का या पर्ण चित्ती | मूँगफली | सरकोस्पोरा प्रजातियाँ |
| मृदुरोमिल आसिता | अंगूर | प्लाज्मोपारा विटिकोला |
| उगरा (विल्ट) | अरहर और कपास | फ्यूजेरियम प्रजातियाँ |
| अरगट | बाजरा और राई | क्लैविसेप्स परप्यूरिया |
जीवाणु जनित रोग
जीवाणु पौधे में घावों, कीटों के छेदों तथा रंध्र जैसे प्राकृतिक छिद्रों से प्रवेश करते हैं और छींटे पड़ती वर्षा तथा औजारों से फैलते हैं। नीबू वर्गीय फसलों का कैंकर, जो पत्तियों और फलों पर कॉर्क जैसे भूरे धब्बे उठाता है, जैंथोमोनास की एक प्रजाति से होता है, और धान का जीवाणु अंगमारी भी, जो भारत में इस फसल के सर्वाधिक हानिकारक रोगों में है। आलू का जीवाणु उगरा अथवा भूरी सड़न रैल्स्टोनिया सोलैनेसिएरम से होती है, और क्राउन गॉल, जिसमें पौधे के तने के आधार पर गाँठ बन जाती है, एग्रोबैक्टीरियम ट्यूमिफैसिएंस से होता है — वही जीवाणु जिसका उपयोग आज जैव प्रौद्योगिकी पादप कोशिकाओं में जीन पहुँचाने के लिए करती है। गेहूँ का टुंडू रोग विशेष है, क्योंकि उसमें एक जीवाणु और एक सूत्रकृमि मिलकर कार्य करते हैं।
विषाणु और फाइटोप्लाज्मा जनित रोग
पादप विषाणु स्वयं नहीं चल सकते: उन्हें कोई कीट, सूत्रकृमि अथवा संक्रमित रोपण सामग्री ढोकर ले जाती है। तंबाकू का मोजैक रोग दो कारणों से महत्वपूर्ण है, क्योंकि तंबाकू मोजैक विषाणु किसी भी प्रकार का खोजा गया पहला विषाणु था और बाद में क्रिस्टल रूप में प्राप्त किया गया पहला विषाणु भी, अर्थात समस्त विषाणु विज्ञान एक पादप रोग से आरंभ होता है। कपास, मिर्च तथा टमाटर की पत्ती मरोड़ और भिंडी का पीला शिरा मोजैक सफेद मक्खी द्वारा फैलते हैं; दालों तथा कद्दूवर्गीय फसलों के अनेक मोजैक माहू द्वारा फैलते हैं; केले का बंची टॉप, जिसमें पौधा छोटा रह जाता है और पत्तियाँ शीर्ष पर गुच्छे में आ जाती हैं, भी विषाणु जनित है। फाइटोप्लाज्मा, जो कोशिका भित्ति रहित जीवाणु हैं, फुदकों द्वारा फैलते हैं और बैंगन की छोटी पत्ती, गन्ने का घास-प्ररोह तथा चंदन का स्पाइक रोग उत्पन्न करते हैं।
सूत्रकृमि जनित रोग
सूत्रकृमि मिट्टी के सूक्ष्मदर्शीय गोल कृमि हैं। मेलॉइडोगाइनी वंश के मूल ग्रंथि सूत्रकृमि सब्जियों की जड़ों पर गाँठें बना देते हैं, जिससे नम मिट्टी में भी पौधा दोपहर में मुरझा जाता है, और शुष्क उत्तर-पश्चिम में महत्वपूर्ण गेहूँ तथा जौ का मोल्या रोग एक सिस्ट सूत्रकृमि से होता है। चूँकि हानि भूमि के नीचे होती है, सूत्रकृमि रोग की पहचान सामान्यतः पौधा उखाड़कर जड़ें देखने से होती है।
कमी जनित या शारीरिक रोग
इनमें कोई जीव सम्मिलित नहीं होता। किसी खनिज की कमी वाला पौधा ऐसा लक्षण दिखाता है जो रोग जैसा लगता है, और उपचार वह अनुपस्थित पोषक तत्व है, किसी रोगजनक के विरुद्ध छिड़काव नहीं। ये परीक्षा के प्रिय प्रश्न हैं, क्योंकि प्रत्येक लक्षण से एक ही खनिज जुड़ा होता है।
| रोग | फसल | कमी वाला पोषक |
|---|---|---|
| खैरा रोग | धान | जिंक |
| व्हिपटेल | फूलगोभी | मॉलिब्डेनम |
| भूरा हृदय या खोखला तना | फूलगोभी और शलजम | बोरॉन |
| हार्ट रॉट | चुकंदर | बोरॉन |
| आंतरिक कॉर्क | सेब | बोरॉन |
| डाइबैक | नीबू वर्गीय फसल | कॉपर |
| नई पत्तियों का हरिमाहीनता | अधिकांश फसलें | लोहा |
पादप रोगों का नियंत्रण
चार उपाय लगभग प्रत्येक उत्तर को ढक लेते हैं। स्वस्थ, उपचारित बीज तथा प्रमाणित रोपण सामग्री रोगजनक को खेत में आने ही नहीं देती। फसल चक्र मिट्टी जनित कवक अथवा सूत्रकृमि को उसका पोषी नहीं मिलने देता। इसी उद्देश्य से विकसित प्रतिरोधी किस्में दीर्घकाल में सबसे सस्ता उत्तर हैं, और हरित क्रांति की बौनी गेहूँ किस्में उपज के साथ रतुआ प्रतिरोध के लिए भी चुनी गई थीं। रासायनिक नियंत्रण में कवकनाशी तथा जीवाणुनाशी आते हैं, जिनमें सबसे पुराना बोर्डो मिश्रण है — कॉपर सल्फेट और चूने का निलंबन, जो फ्रांस में अंगूर के मृदुरोमिल आसिता रोग के विरुद्ध बनाया गया और आज भी बागों में छिड़का जाता है। विषाणु रोगों में संक्रमण के बाद कोई उपचार नहीं है, इसलिए नियंत्रण वाहक पर किया जाता है: सफेद मक्खी तथा माहू नष्ट करें, संक्रमित पौधे हटाएँ और विषाणु मुक्त सामग्री लगाएँ।
परीक्षा की दृष्टि से
एक पंक्ति की जोड़ी वाला प्रश्न अपेक्षित है: किसी नामित रोग का कारक जीव बताइए, अथवा किसी नामित जीव से होने वाला रोग बताइए। कवक वर्ग सर्वाधिक पूछा जाता है, और उसमें आलू की पछेती अंगमारी, गन्ने की लाल सड़न, गेहूँ का रतुआ तथा कंडुआ और धान का झोंका लगभग निश्चित हैं। दूसरा प्रिय वर्ग कमी जनित रोग हैं, जहाँ जिंक के लिए धान का खैरा और मॉलिब्डेनम के लिए फूलगोभी का व्हिपटेल बार-बार आते हैं, और भ्रमक के रूप में बोरॉन के रोग रखे जाते हैं। तीसरा प्रकार वाहक पूछता है, जिसका उत्तर पत्ती मरोड़ तथा पीला शिरा मोजैक के लिए सफेद मक्खी, अन्य अधिकांश मोजैक के लिए माहू और छोटी पत्ती के लिए फुदका है। सामान्य जाल हैं — किसी विषाणु रोग को कवक जनित कह देना, क्योंकि दोनों में धब्बे और मुरझान दिखते हैं, तथा नीबू कैंकर या क्राउन गॉल के लिए कवक चुन लेना, जबकि वे जीवाणु जनित हैं। कृषि पदों के प्रश्नपत्र वैज्ञानिक नाम भी पूछते हैं, इसलिए प्रत्येक जोड़ी में कम से कम वंश याद रखें।
महत्वपूर्ण तथ्य
| आलू की पछेती अंगमारी | फाइटोफ्थोरा इन्फेस्टैंस, एक कवक; आयरलैंड के अकाल का कारण |
|---|---|
| पादप रोग विज्ञान के जनक | एंटन डी बैरी |
| गेहूँ का रतुआ | पक्सीनिया प्रजातियाँ |
| गेहूँ का खुला कंडुआ | अस्टिलैगो प्रजातियाँ |
| धान का झोंका रोग | पाइरिकुलेरिया ओराइजी |
| गन्ने की लाल सड़न | कोलेटोट्राइकम फालकेटम |
| टिक्का रोग | मूँगफली, सरकोस्पोरा प्रजातियों से |
| अरगट | बाजरा और राई पर क्लैविसेप्स परप्यूरिया; इसके एल्केलॉइड विषैले होते हैं |
| नीबू वर्गीय कैंकर | जैंथोमोनास वंश का जीवाणु |
| क्राउन गॉल | एग्रोबैक्टीरियम ट्यूमिफैसिएंस; जीन वाहक के रूप में प्रयुक्त |
| खोजा गया पहला विषाणु | तंबाकू मोजैक विषाणु |
| सफेद मक्खी जनित रोग | कपास और मिर्च की पत्ती मरोड़, भिंडी का पीला शिरा मोजैक |
| बैंगन की छोटी पत्ती | फाइटोप्लाज्मा, फुदकों द्वारा फैलता है |
| धान का खैरा रोग | जिंक की कमी |
| फूलगोभी का व्हिपटेल | मॉलिब्डेनम की कमी |
| बोर्डो मिश्रण | कॉपर सल्फेट और चूना; एक कवकनाशी |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
आलू का पछेती अंगमारी रोग किस जीव से होता है?
- A.एक विषाणु
- B.फाइटोफ्थोरा इन्फेस्टैंस
- C.जैंथोमोनास सिट्राई
- D.मेलॉइडोगाइनी इनकॉग्निटा
उत्तर देखें
1840 के दशक की महामारी ने आयरलैंड की आलू फसल नष्ट कर दी और अकाल लाया, और उस प्रकोप के अध्ययन से एंटन डी बैरी ने पादप रोग विज्ञान को विज्ञान के रूप में स्थापित किया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →गेहूँ का रतुआ रोग किस वंश के कवक से होता है?
- A.पक्सीनिया
- B.अस्टिलैगो
- C.फ्यूजेरियम
- D.क्लैविसेप्स
उत्तर देखें
गेहूँ के रतुआ रोग, जिन्हें तने और पत्तियों पर उठने वाली फुंसियों के रंग के अनुसार काला, भूरा और पीला रतुआ कहा जाता है, पक्सीनिया की प्रजातियों से होते हैं, और इनके प्रति प्रतिरोध हरित क्रांति की बौनी गेहूँ किस्मों में चुने गए गुणों में से एक था।
पूरी व्याख्या पढ़ें →गन्ने के सर्वाधिक गंभीर रोगों में से एक लाल सड़न किससे होता है?
- A.कोलेटोट्राइकम फालकेटम
- B.रैल्स्टोनिया सोलैनेसिएरम
- C.एक फाइटोप्लाज्मा
- D.एक सूत्रकृमि
उत्तर देखें
सही उत्तर है A, कोलेटोट्राइकम फालकेटम, एक कवक जो गन्ने के भीतरी ऊतक को सड़ाकर उसे सफेद चकत्तों सहित लाल कर देता है और उसमें खट्टी गंध उत्पन्न करता है, तथा मुख्यतः रोपण के लिए प्रयुक्त संक्रमित टुकड़ों से फैलता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →पौधों में नीबू वर्गीय कैंकर रोग किससे होता है?
- A.एक कवक
- B.एक जीवाणु
- C.एक विषाणु
- D.बोरॉन की कमी
उत्तर देखें
नीबू वर्गीय कैंकर जैंथोमोनास की एक प्रजाति से होता है, जो घावों, कीटों के छेदों तथा रंध्रों से प्रवेश करती है और पत्तियों, टहनियों तथा फलों पर प्रायः पीले घेरे सहित उभरे हुए कॉर्क जैसे भूरे घाव बनाती है; यह छींटे पड़ती वर्षा, औजारों तथा संक्रमित नर्सरी पौधों से फैलता…
पूरी व्याख्या पढ़ें →धान का खैरा रोग किस पोषक तत्व की कमी से होता है?
- A.जिंक
- B.बोरॉन
- C.मॉलिब्डेनम
- D.कॉपर
उत्तर देखें
खैरा रोग में धान के नए पौधों की पत्तियों पर जंग जैसे भूरे धब्बे बनते हैं, जो फैलकर फसल को झुलसा हुआ दिखाते हैं, कल्ले कम बनते हैं और वृद्धि रुक जाती है; मिट्टी में अथवा पत्तियों पर जिंक सल्फेट देने से यह ठीक हो जाता है, जिससे पुष्ट होता…
पूरी व्याख्या पढ़ें →फूलगोभी का व्हिपटेल रोग किस तत्व की कमी से होता है?
- A.जिंक
- B.लोहा
- C.मॉलिब्डेनम
- D.मैंगनीज
उत्तर देखें
जहाँ इस सूक्ष्म पोषक तत्व की कमी होती है, वहाँ फूलगोभी का पर्ण फलक फैलता नहीं और पत्ती मध्य शिरा के साथ एक पतली, चाबुक जैसी पट्टी भर रह जाती है, जिससे रोग को यह नाम मिला; फूल छोटा बनता है अथवा बनता ही नहीं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →निम्नलिखित में से कौन पौधों का विषाणु जनित रोग है?
- A.गन्ने की लाल सड़न
- B.केले का बंची टॉप
- C.नीबू वर्गीय कैंकर
- D.गेहूँ का खुला कंडुआ
उत्तर देखें
सही उत्तर है B, केले का बंची टॉप, एक विषाणु रोग जिसमें पौधा अत्यधिक बौना रह जाता है और उसकी पत्तियाँ छोटी, सँकरी तथा शीर्ष पर गुच्छे में भीड़ जाती हैं; यह माहू द्वारा तथा रोपण के लिए प्रयुक्त संक्रमित प्रकंदों से फैलता है, इसलिए नियंत्रण स्वच्छ रोपण सामग्री और…
पूरी व्याख्या पढ़ें →कृषि में प्रयुक्त बोर्डो मिश्रण किससे बनाया जाता है?
- A.कॉपर सल्फेट और चूना
- B.जिंक सल्फेट और यूरिया
- C.गंधक और साधारण नमक
- D.फेरस सल्फेट और जिप्सम
उत्तर देखें
बोर्डो मिश्रण कॉपर सल्फेट के घोल को चूने के घोल में मिलाकर बनाया गया निलंबन है और नियमित प्रयोग में आने वाला सबसे पुराना कवकनाशी है; इसे फ्रांस के बोर्डो क्षेत्र में अंगूर के मृदुरोमिल आसिता रोग के विरुद्ध बनाया गया था और आज भी फलदार वृक्षों, आलू तथा सब्जियों…
पूरी व्याख्या पढ़ें →बैंगन की छोटी पत्ती रोग का फाइटोप्लाज्मा किस कीट द्वारा फैलता है?
- A.सफेद मक्खी
- B.फुदका (जैसिड)
- C.मधुमक्खी
- D.केंचुआ
उत्तर देखें
फाइटोप्लाज्मा कोशिका भित्ति रहित जीवाणु हैं, जो पौधे के खाद्य संवहन ऊतक में रहते हैं और रस चूसने वाले फुदकों, जिन्हें जैसिड भी कहा जाता है, द्वारा एक पौधे से दूसरे पौधे तक पहुँचते हैं; बैंगन की छोटी पत्ती में पत्तियाँ बहुत छोटी और अधिक संख्या में हो जाती हैं…
पूरी व्याख्या पढ़ें →सब्जी फसलों की जड़ों पर गाँठें बनाने वाला मूल ग्रंथि रोग किससे होता है?
- A.एक सूत्रकृमि
- B.एक कवक
- C.एक विषाणु
- D.नाइट्रोजन की अधिकता
उत्तर देखें
मूल ग्रंथि रोग मेलॉइडोगाइनी वंश के सूक्ष्मदर्शीय मृदा गोल कृमियों से होता है, जो नई जड़ में प्रवेश कर वहीं बस जाते हैं और आसपास के ऊतक को फुलाकर गाँठ बना देते हैं; इसके बाद पौधा ठीक से जल नहीं खींच पाता और मिट्टी नम रहने पर भी दोपहर की…
पूरी व्याख्या पढ़ें →अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
आयरलैंड के अकाल का कारण कौन सा पादप रोग था?
आलू का पछेती अंगमारी रोग, जिसका कारक कवक फाइटोफ्थोरा इन्फेस्टैंस है। 1840 के दशक की महामारी ने लगातार कई मौसमों तक आयरलैंड की आलू फसल नष्ट कर दी, और चूँकि जनसंख्या उसी एक फसल पर निर्भर थी, परिणाम व्यापक भुखमरी और पलायन हुआ।
कवक जनित और विषाणु जनित पादप रोग में क्या अंतर है?
कवक रोगजनक बहुकोशिकीय अथवा तंतुमय जीव है, जो पौधे पर और उसके भीतर बढ़ता है, दृश्य बीजाणु या फफूँद बनाता है और सामान्यतः कवकनाशी से नियंत्रित हो जाता है। विषाणु केवल प्रोटीन आवरण में बंद आनुवंशिक पदार्थ है; वह पादप कोशिकाओं के भीतर गुणन करता है, मोजैक, पत्ती मरोड़ तथा बौनापन जैसे लक्षण दिखाता है, किसी छिड़काव से ठीक नहीं होता और लगभग सदैव किसी कीट वाहक द्वारा ढोया जाता है।
धान का खैरा रोग किस खनिज की कमी से होता है?
जिंक की कमी से। पत्तियों पर जंग जैसे भूरे धब्बे बनते हैं, जो फैलकर फसल को झुलसा हुआ दिखाते हैं, और वृद्धि रुक जाती है। उपचार मिट्टी में अथवा पत्तियों पर जिंक सल्फेट देना है, जिससे यह भी सिद्ध होता है कि समस्या कमी थी, कोई संक्रमण नहीं।
बोर्डो मिश्रण क्या है और उसका उपयोग किसमें होता है?
यह सबसे पुराने कवकनाशियों में से एक है, जो कॉपर सल्फेट के घोल को चूने के घोल में मिलाकर बनाया जाता है। इसे फ्रांस के बोर्डो क्षेत्र में अंगूर के मृदुरोमिल आसिता रोग के विरुद्ध बनाया गया था और आज भी फलदार वृक्षों, आलू तथा सब्जियों पर कवक जनित पर्ण चित्ती और अंगमारी के विरुद्ध छिड़का जाता है।
पत्ती मरोड़ और पीला शिरा मोजैक रोग कौन सा कीट फैलाता है?
सफेद मक्खी। यह कपास, मिर्च, टमाटर और भिंडी का रस चूसती है और पत्ती मरोड़ तथा पीला शिरा मोजैक के विषाणु एक पौधे से दूसरे पौधे तक ले जाती है; इसी कारण इन रोगों का नियंत्रण सफेद मक्खी की संख्या के नियंत्रण पर निर्भर करता है।
जीव विज्ञान के इतिहास में तंबाकू मोजैक विषाणु क्यों महत्वपूर्ण है?
क्योंकि एक रोगग्रस्त तंबाकू फसल पर हुए कार्य में यह किसी भी प्रकार का पहचाना गया पहला विषाणु था और बाद में क्रिस्टल रूप में प्राप्त किया गया पहला विषाणु भी। दोनों खोजों ने यह स्थापित किया कि जीवाणुओं से भी छोटे संक्रामक कारक होते हैं, और विषाणु विज्ञान इसी पादप रोग के अध्ययन से विकसित हुआ।
स्रोत
- जीव विज्ञान (कक्षा 11), अध्याय: खनिज पोषण, पोषक तत्वों की कमी के लक्षण — एनसीईआरटी
- हैंडबुक ऑफ एग्रीकल्चर, फसल सुरक्षा तथा पादप रोग विज्ञान संबंधी अध्याय — भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद
- पादप संरक्षण, संगरोध एवं भंडारण: फसल रोग परामर्श — कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार





