गुरुत्व केंद्र, बल आघूर्ण और संतुलन: परीक्षा नोट्स
परीक्षा के लिए भौतिकी नोट्स: गुरुत्व केंद्र, बल आघूर्ण और उसका मात्रक, युग्म, आघूर्णों का सिद्धांत, उत्तोलक, संतुलन की शर्तें तथा स्थायित्व के प्रकार।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 6 मिनट

कोई बल किसी दृढ़ पिंड पर दो काम कर सकता है: उसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना, या किसी अक्ष के चारों ओर घुमाना। घुमाने का प्रभाव बल आघूर्ण है, वह बिंदु जहां पिंड का संपूर्ण भार कार्यरत माना जाता है उसका गुरुत्व केंद्र है, और जिस पिंड पर दोनों प्रभाव शून्य हो जाएं वह संतुलन में है। ये तीन विचार झूले, पाने, उत्तोलक, भरी बस और झुकी मीनार से जुड़े प्रत्येक प्रश्न में आते हैं, और परीक्षा के तथ्य थोड़े तथा निश्चित हैं: बल आघूर्ण का सूत्र, उसका मात्रक, मानक पिंडों के गुरुत्व केंद्र की स्थिति और संतुलन की दो शर्तें।
द्रव्यमान केंद्र और गुरुत्व केंद्र
किसी पिंड का द्रव्यमान केंद्र वह बिंदु है जहां गति के प्रयोजन से उसका संपूर्ण द्रव्यमान केंद्रित माना जा सकता है। गुरुत्व केंद्र वह बिंदु है जिससे होकर पिंड का परिणामी भार कार्य करता है। एकसमान गुरुत्व क्षेत्र में, जो पृथ्वी पर सभी सामान्य पिंडों के लिए सत्य है, ये दोनों बिंदु एक ही होते हैं और प्रश्नपत्र इन्हें एक ही मानते हैं; ये केवल उन पिंडों के लिए अलग होते हैं जो इतने बड़े हों कि उनके निचले सिरे पर गुरुत्व मापने योग्य रूप से अधिक हो। गुरुत्व केंद्र के दो तथ्य बार-बार पूछे जाते हैं। पहला, यह पिंड के पदार्थ के भीतर होना आवश्यक नहीं है: यह छल्ले के छिद्र के केंद्र पर, खोखले गोले की गुहा के केंद्र पर तथा अंग्रेजी के एल अक्षर जैसी पट्टिका या घोड़े की नाल के पदार्थ से बाहर होता है। दूसरा, लटकाया गया पिंड इस प्रकार ठहरता है कि उसका गुरुत्व केंद्र निलंबन बिंदु के ठीक नीचे ऊर्ध्वाधर में आ जाए, और यही अनियमित पट्टिका का गुरुत्व केंद्र साहुल सूत्र से ज्ञात करने का आधार है।
सामान्य एकसमान पिंडों का गुरुत्व केंद्र
| पिंड | गुरुत्व केंद्र की स्थिति |
|---|---|
| एकसमान सीधी छड़ | उसका मध्य बिंदु |
| आयताकार या वर्गाकार पट्टिका | विकर्णों का कटान बिंदु |
| वृत्तीय छल्ला या चक्रिका | वृत्त का केंद्र |
| त्रिभुजाकार पट्टिका | केंद्रक, जहां माध्यिकाएं मिलती हैं, आधार से ऊंचाई के एक तिहाई पर |
| ठोस या खोखला गोला | गोले का केंद्र |
| ऊंचाई h वाला ठोस लंब वृत्तीय शंकु | अक्ष पर, आधार से h बटा 4 ऊपर |
| त्रिज्या R वाला ठोस अर्धगोला | सममिति त्रिज्या पर, सपाट फलक के केंद्र से 3R बटा 8 दूर |
| त्रिज्या R वाला खोखला अर्धगोला | सपाट फलक के केंद्र से R बटा 2 दूर |
| एकसमान बेलन | उसके अक्ष का मध्य बिंदु |
बल आघूर्ण
बल आघूर्ण किसी अक्ष के परितः बल के घुमाने के प्रभाव को मापता है। यदि बल F उस बिंदु पर लगे जिसका अक्ष से स्थिति सदिश r है और दोनों के बीच कोण थीटा हो, तो बल आघूर्ण का परिमाण r गुणा F गुणा साइन थीटा होता है, जिसे बल गुणा उसकी क्रिया रेखा की अक्ष से लंबवत दूरी के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। बल आघूर्ण सदिश राशि है, जिसकी दिशा घूर्णन अक्ष के अनुदिश होती है और दक्षिण हस्त नियम से ज्ञात की जाती है। इसका एसआई मात्रक न्यूटन मीटर है और विमीय सूत्र M L वर्ग T की घात ऋण दो है, जो कार्य तथा ऊर्जा का भी है, फिर भी बल आघूर्ण भिन्न भौतिक राशि है। तीन परिणाम याद रखने योग्य हैं। जिस बल की क्रिया रेखा अक्ष से होकर जाती है वह कोई आघूर्ण नहीं देता, क्योंकि कोण शून्य है। बल आघूर्ण अधिकतम तब होता है जब बल भुजा के समकोण पर लगाया जाए। और समान बल के लिए लंबी भुजा अधिक आघूर्ण देती है, इसीलिए लंबा पाना कसे नट को खोल देता है, दरवाजे का हत्था कब्जों से दूर लगाया जाता है और भारी वाहन का स्टीयरिंग बड़ा होता है। स्थिर आघूर्ण द्वारा किया कार्य आघूर्ण गुणा कोणीय विस्थापन और शक्ति आघूर्ण गुणा कोणीय वेग होती है।
युग्म और आघूर्णों का सिद्धांत
दो समान, विपरीत तथा समांतर बल, जिनकी क्रिया रेखाएं एक न हों, युग्म बनाते हैं। युग्म से स्थानांतरण नहीं, केवल घूर्णन होता है, और युग्म का आघूर्ण एक बल गुणा दोनों क्रिया रेखाओं के बीच की लंबवत दूरी होता है, जैसे नल, पेचकस अथवा स्टीयरिंग घुमाने में। आघूर्णों का सिद्धांत कहता है कि किसी स्थिर अक्ष पर घूमने के लिए स्वतंत्र पिंड घूर्णी संतुलन में तब होता है जब उस अक्ष के परितः दक्षिणावर्त आघूर्णों का योग वामावर्त आघूर्णों के योग के बराबर हो। यही तुला, झूले और प्रत्येक उत्तोलक का कार्य नियम है। उत्तोलक में यांत्रिक लाभ भार तथा आयास का अनुपात होता है, जो आयास भुजा और भार भुजा के अनुपात के बराबर है, इसलिए लंबी आयास भुजा बल को कई गुना कर देती है।
| उत्तोलक वर्ग | व्यवस्था | उदाहरण |
|---|---|---|
| प्रथम वर्ग | आलंब आयास और भार के बीच | झूला, तुला, सब्बल, कैंची, प्लास |
| द्वितीय वर्ग | भार आलंब और आयास के बीच | ठेला, सरौता, बोतल खोलने वाला, नींबू निचोड़ने वाला |
| तृतीय वर्ग | आयास आलंब और भार के बीच | चिमटी, चीनी पकड़ने वाला चिमटा, मछली पकड़ने की छड़, मानव अग्रबाहु |
संतुलन की शर्तें
दृढ़ पिंड पूर्ण यांत्रिक संतुलन में तब होता है जब दो शर्तें साथ पूरी हों: उस पर लगने वाले सभी बलों का सदिश योग शून्य हो, जो रैखिक संतुलन देता है, और किसी भी अक्ष के परितः सभी आघूर्णों का सदिश योग शून्य हो, जो घूर्णी संतुलन देता है। अकेली कोई शर्त पर्याप्त नहीं है, और इसका मानक उदाहरण युग्म है: बल एक दूसरे को काट देते हैं, इसलिए पिंड हटता नहीं, फिर भी वह घूमता है, क्योंकि आघूर्ण नहीं कटते।
स्थायी, अस्थायी और उदासीन संतुलन
- स्थायी संतुलन: थोड़ा विस्थापित करने पर गुरुत्व केंद्र ऊपर उठता है और पिंड पुरानी स्थिति में लौट आता है। उदाहरण: आधार पर रखा शंकु, मेज पर सीधा पड़ा पुस्तक और नीचे गिट्टी वाला जलयान।
- अस्थायी संतुलन: थोड़ा विस्थापित करने पर गुरुत्व केंद्र नीचे गिरता है और पिंड और दूर चला जाता है। उदाहरण: शीर्ष पर संतुलित शंकु, नोक पर खड़ी पेंसिल और पतले सिरे पर रखा अंडा।
- उदासीन संतुलन: गुरुत्व केंद्र की ऊंचाई वही रहती है और पिंड नई स्थिति में ठहर जाता है। उदाहरण: क्षैतिज तल पर रखा गोला या बेलन और पार्श्व पर पड़ा शंकु।
दैनिक जीवन में स्थायित्व
पिंड तब अधिक स्थायी होता है जब उसका गुरुत्व केंद्र नीचा हो और आधार चौड़ा हो, और वह तब गिरता है जब गुरुत्व केंद्र से खींची ऊर्ध्वाधर रेखा आधार से बाहर पड़ जाए। यही एक नियम परीक्षा के अनेक उदाहरण समझा देता है: दौड़ कारें नीची और चौड़ी बनाई जाती हैं; दोमंजिली बस में अधिक यात्री निचले तल पर बैठाए जाते हैं; चलती बस में खड़ा यात्री पैर फैलाकर आधार चौड़ा करता है; पीठ पर भार उठाने वाला व्यक्ति आगे झुककर संयुक्त गुरुत्व केंद्र पैरों के ऊपर रखता है; और पीसा की झुकी मीनार इसलिए खड़ी है कि उसके गुरुत्व केंद्र से खींची ऊर्ध्वाधर रेखा अभी भी उसके आधार के भीतर गिरती है। घूर्णन में द्रव्यमान का समतुल्य जड़त्व आघूर्ण है, जो द्रव्यमान गुणा अक्ष से दूरी के वर्ग का योग है, इसलिए बल आघूर्ण बराबर जड़त्व आघूर्ण गुणा कोणीय त्वरण और कोणीय संवेग बराबर जड़त्व आघूर्ण गुणा कोणीय वेग होता है। जब कोई बाह्य आघूर्ण न लगे तो कोणीय संवेग संरक्षित रहता है, इसीलिए हाथ भीतर समेटने वाला स्केटर जड़त्व आघूर्ण घटाकर तेज घूमता है और गोताखोर शरीर समेटकर हवा में शीघ्र पलटता है।
परीक्षा की दृष्टि से
सामान्य विज्ञान के प्रत्येक प्रश्नपत्र में इस विषय से एक या दो प्रश्न रहते हैं। सर्वाधिक पूछे जाने वाले हैं बल आघूर्ण का एसआई मात्रक, कोण की साइन वाला सूत्र, छल्ले, शंकु अथवा त्रिभुजाकार पट्टिका के गुरुत्व केंद्र की स्थिति, और किसी औजार को प्रथम, द्वितीय या तृतीय वर्ग का उत्तोलक बताना, जिसमें ठेला और चिमटी सामान्य विकल्प हैं। वैचारिक प्रश्न संतुलन की दोनों शर्तें एक साथ पूछते हैं, या युग्म के माध्यम से यह परखते हैं कि बल कटने पर भी घूर्णन बना रह सकता है। स्थायित्व का नियम दैनिक उदाहरणों से पूछा जाता है, जैसे दौड़ कारें नीची और चौड़ी क्यों होती हैं तथा खड़ा यात्री पैर क्यों फैलाता है। संख्यात्मक प्रश्न सरल रहते हैं: बल को लंबवत भुजा से गुणा कीजिए, अथवा आलंब के दोनों ओर के आघूर्ण बराबर कीजिए।
महत्वपूर्ण तथ्य
| बल आघूर्ण | r F साइन थीटा, अर्थात बल गुणा अक्ष से लंबवत दूरी |
|---|---|
| एसआई मात्रक | न्यूटन मीटर |
| विमीय सूत्र | M L वर्ग T की घात ऋण दो |
| बल आघूर्ण की प्रकृति | सदिश राशि, दिशा अक्ष के अनुदिश, दक्षिण हस्त नियम से |
| शून्य आघूर्ण | जब बल की क्रिया रेखा अक्ष से होकर जाए |
| युग्म का आघूर्ण | एक बल गुणा दोनों क्रिया रेखाओं के बीच लंबवत दूरी |
| आघूर्णों का सिद्धांत | दक्षिणावर्त आघूर्णों का योग बराबर वामावर्त आघूर्णों का योग |
| उत्तोलक का यांत्रिक लाभ | भार बटा आयास, अर्थात आयास भुजा बटा भार भुजा |
| प्रथम वर्ग उत्तोलक | आलंब मध्य में: झूला, तुला, कैंची |
| द्वितीय वर्ग उत्तोलक | भार मध्य में: ठेला, सरौता, बोतल खोलने वाला |
| तृतीय वर्ग उत्तोलक | आयास मध्य में: चिमटी, चिमटा, मानव अग्रबाहु |
| छल्ले का गुरुत्व केंद्र | छल्ले के केंद्र पर, पदार्थ से बाहर |
| ठोस शंकु का गुरुत्व केंद्र | अक्ष पर आधार से h बटा 4 ऊपर |
| त्रिभुजाकार पट्टिका का गुरुत्व केंद्र | केंद्रक पर, आधार से ऊंचाई का एक तिहाई |
| संतुलन की शर्तें | परिणामी बल शून्य और परिणामी आघूर्ण शून्य |
| स्थायित्व की शर्त | नीचा गुरुत्व केंद्र, चौड़ा आधार; ऊर्ध्वाधर रेखा आधार के भीतर |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
बल आघूर्ण का एसआई मात्रक क्या है?
- A.न्यूटन
- B.न्यूटन मीटर
- C.न्यूटन प्रति मीटर
- D.जूल प्रति सेकंड
उत्तर देखें
बल आघूर्ण बल और उसकी क्रिया रेखा की घूर्णन अक्ष से लंबवत दूरी का गुणनफल है, इसलिए इसका मात्रक बल के मात्रक गुणा लंबाई के मात्रक अर्थात न्यूटन मीटर होता है और विमीय सूत्र M L वर्ग T की घात ऋण दो है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →किसी दृढ़ पिंड पर लगने वाले तीन बल परिमाण, दिशा और क्रिया रेखा में एक त्रिभुज की तीन भुजाओं से क्रम में निरूपित हैं। ये बल एक युग्म के तुल्य हैं, जिसका आघूर्ण किसके बराबर होगा?
- A.त्रिभुज के क्षेत्रफल का तीन गुना
- B.त्रिभुज के क्षेत्रफल का दो गुना
- C.त्रिभुज का क्षेत्रफल
- D.त्रिभुज के क्षेत्रफल का आधा
उत्तर देखें
जब तीन बल त्रिभुज की भुजाओं से क्रम में निरूपित होते हैं, तो उनका सदिश योग शून्य होता है, क्योंकि तीन भुजाएं त्रिभुज को बंद कर देती हैं, इसलिए पिंड हटाया नहीं जा सकता; परंतु क्रिया रेखाएं भिन्न हैं, इसलिए निकाय एक युग्म में बदल जाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →एकसमान वृत्तीय छल्ले का गुरुत्व केंद्र कहां होता है?
- A.छल्ले पर ही, किसी भी बिंदु पर
- B.छल्ले के केंद्र पर, उसके पदार्थ से बाहर
- C.केंद्र से त्रिज्या के एक तिहाई पर
- D.कहीं नहीं, क्योंकि छल्ले का गुरुत्व केंद्र नहीं होता
उत्तर देखें
गुरुत्व केंद्र वह ज्यामितीय बिंदु है जिससे पिंड का परिणामी भार कार्य करता है, और सममिति के कारण एकसमान छल्ले के लिए वह बिंदु उसका ज्यामितीय केंद्र है, जो छल्ले के भीतर की खाली जगह में पड़ता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →किसी अक्ष के परितः बल द्वारा उत्पन्न आघूर्ण अधिकतम तब होता है जब बल और भुजा के बीच का कोण हो
- A.0 अंश
- B.45 अंश
- C.90 अंश
- D.180 अंश
उत्तर देखें
बल आघूर्ण का परिमाण r गुणा F गुणा भुजा और बल के बीच के कोण की साइन होता है, और साइन का मान 90 अंश पर सबसे अधिक अर्थात एक होता है, इसलिए तब संपूर्ण बल पिंड को घुमाने में लगता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →लंबा पाना कसे नट को छोटे पाने से आसानी से खोल देता है, क्योंकि वह
- A.आघूर्ण भुजा बढ़ाकर आवश्यक बल घटा देता है
- B.नट पर घर्षण घटा देता है
- C.नट पर लगने वाला द्रव्यमान बढ़ा देता है
- D.नट के भार की दिशा बदल देता है
उत्तर देखें
बल आघूर्ण बल और उसकी क्रिया रेखा की अक्ष से लंबवत दूरी का गुणनफल है, इसलिए यदि यह दूरी बढ़ा दी जाए तो उतना ही घुमाव प्रभाव कम बल से पाया जा सकता है; लंबा हत्था वही काम कम जोर में कर देता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →कोई दृढ़ पिंड पूर्ण यांत्रिक संतुलन में कब कहा जाता है?
- A.जब उस पर परिणामी बल शून्य हो
- B.जब उस पर परिणामी आघूर्ण शून्य हो
- C.जब उस पर परिणामी बल और परिणामी आघूर्ण दोनों शून्य हों
- D.जब उसका गुरुत्व केंद्र उसके ज्यामितीय केंद्र पर हो
उत्तर देखें
परिणामी बल शून्य होने से रैखिक संतुलन मिलता है, अर्थात पिंड समग्र रूप से त्वरित नहीं होता, और परिणामी आघूर्ण शून्य होने से घूर्णी संतुलन मिलता है, अर्थात वह घूमना आरंभ नहीं करता; पूर्ण संतुलन के लिए दोनों साथ चाहिए।
पूरी व्याख्या पढ़ें →स्थायी संतुलन में रखे पिंड को थोड़ा विस्थापित करने पर उसका गुरुत्व केंद्र
- A.ऊपर उठता है और पिंड अपनी पुरानी स्थिति में लौट आता है
- B.नीचे गिरता है और पिंड और दूर चला जाता है
- C.उसी ऊंचाई पर रहता है
- D.पिंड से बाहर चला जाता है
उत्तर देखें
स्थायी संतुलन में मूल स्थिति न्यूनतम स्थितिज ऊर्जा की स्थिति होती है, इसलिए थोड़े विस्थापन से गुरुत्व केंद्र ऊपर उठता है और पिंड का भार उसे वापस ले आता है, जैसे आधार पर रखा शंकु अथवा मेज पर सीधा पड़ा पुस्तक।
पूरी व्याख्या पढ़ें →ठेला किस वर्ग के उत्तोलक का उदाहरण है?
- A.प्रथम वर्ग
- B.द्वितीय वर्ग
- C.तृतीय वर्ग
- D.यह उत्तोलक नहीं है
उत्तर देखें
ठेले में पहिया आलंब है, सामान का भार पहिये और हाथों के बीच रहता है तथा आयास हत्थों पर लगाया जाता है, अर्थात भार मध्य में है, जो द्वितीय वर्ग के उत्तोलक की परिभाषा है; सरौता, बोतल खोलने वाला और नींबू निचोड़ने वाला भी इसी प्रकार काम करते हैं और…
पूरी व्याख्या पढ़ें →ऊंचाई h वाले एकसमान ठोस लंब वृत्तीय शंकु का गुरुत्व केंद्र उसके अक्ष पर कहां होता है?
- A.आधार से h बटा 2 पर
- B.आधार से h बटा 3 पर
- C.आधार से h बटा 4 पर
- D.आधार से 3h बटा 4 पर
उत्तर देखें
ठोस शंकु में चौड़े आधार के पास पदार्थ अधिक और शीर्ष के पास कम होता है, इसलिए उसका गुरुत्व केंद्र सममिति अक्ष पर मध्य से काफी नीचे, आधार से नापी गई ऊंचाई के एक चौथाई पर होता है, जो शीर्ष से नापने पर ऊंचाई का तीन चौथाई बनता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →घूमता हुआ स्केटर अपनी दोनों भुजाएं शरीर से सटा लेता है और तेज घूमने लगता है। इसका कारण है
- A.स्केटर का कोणीय संवेग बढ़ जाता है
- B.जड़त्व आघूर्ण घटता है, इसलिए कोणीय वेग बढ़ जाता है
- C.स्केटर द्वारा लगाया बल आघूर्ण बढ़ जाता है
- D.स्केटर का द्रव्यमान घट जाता है
उत्तर देखें
जड़त्व आघूर्ण प्रत्येक द्रव्यमान अंश गुणा अक्ष से उसकी दूरी के वर्ग का योग है, इसलिए भुजाएं भीतर समेटने से वह घट जाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →वैरिग्नन प्रमेय के रूप में कहे जाने वाले आघूर्णों के सिद्धांत से संबंधित दो कथन दिए हैं। कथन एक: प्रमेय कहता है कि किसी बल के आघूर्ण का वर्ग उसके घटकों के आघूर्णों के वर्गों के योग के बराबर होता है। कथन दो: वैरिग्नन प्रमेय लगाने के लिए बल निकाय समतलीय अथवा त्रिविम हो सकता है, परंतु वह संगामी होना चाहिए। इन कथनों को सत्य या असत्य बताकर सही उत्तर चुनिए।
- A.कथन एक और कथन दो दोनों असत्य हैं
- B.कथन एक और कथन दो दोनों सत्य हैं
- C.कथन एक सत्य और कथन दो असत्य है
- D.कथन एक असत्य और कथन दो सत्य है
उत्तर देखें
वैरिग्नन प्रमेय कहता है कि किसी बिंदु के परितः किसी बल का आघूर्ण उसी बिंदु के परितः उसके घटकों के आघूर्णों के बीजगणितीय योग के बराबर होता है; यह आघूर्णों की बात करता है, उनके वर्गों की नहीं, इसलिए कथन एक जैसा लिखा है वैसा असत्य है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →किसी छड़ पर घूर्णन अक्ष से 0.5 मीटर दूर बिंदु पर 20 न्यूटन का बल समकोण पर लगाया जाता है। अक्ष के परितः बल आघूर्ण कितना होगा?
- A.4 न्यूटन मीटर
- B.10 न्यूटन मीटर
- C.40 न्यूटन मीटर
- D.20.5 न्यूटन मीटर
उत्तर देखें
बल आघूर्ण r गुणा F गुणा दोनों के बीच के कोण की साइन होता है, और यहां बल छड़ के लंबवत है, इसलिए साइन का मान एक है और आघूर्ण सीधे 0.5 गुणा 20 अर्थात 10 न्यूटन मीटर आता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
द्रव्यमान केंद्र और गुरुत्व केंद्र में क्या अंतर है?
द्रव्यमान केंद्र वह बिंदु है जहां पिंड का संपूर्ण द्रव्यमान केंद्रित माना जाता है, जबकि गुरुत्व केंद्र वह बिंदु है जिससे परिणामी भार कार्य करता है। एकसमान गुरुत्व क्षेत्र में, जैसा पृथ्वी पर सामान्य पिंडों के लिए होता है, दोनों एक ही होते हैं; ये केवल उन पिंडों में अलग होते हैं जिनकी ऊंचाई पर गुरुत्व बदल जाए।
लंबे पाने से नट खोलना आसान क्यों होता है?
बल आघूर्ण बल गुणा अक्ष से लंबवत दूरी होता है, इसलिए हाथ के उसी जोर से लंबा पाना अधिक लंबी भुजा देकर अधिक घुमाव पैदा करता है। इसी कारण दरवाजे का हत्था कब्जों से दूर लगाया जाता है और भारी वाहनों का स्टीयरिंग बड़ा रखा जाता है।
क्या किसी पिंड का गुरुत्व केंद्र उसके बाहर हो सकता है?
हां। गुरुत्व केंद्र एक ज्यामितीय बिंदु है, पदार्थ का कण नहीं, इसलिए यह खाली स्थान में भी हो सकता है: छल्ले या चूड़ी के छिद्र के केंद्र पर, खोखले गोले की गुहा के केंद्र पर, तथा एल आकार की पट्टिका, घोड़े की नाल या बूमरैंग में पदार्थ से बाहर।
युग्म में बल लगने पर भी पिंड हटता क्यों नहीं?
युग्म में दोनों बल समान, विपरीत और समांतर होते हैं, इसलिए उनका सदिश योग शून्य रहता है और रैखिक गति नहीं होती। परंतु उनकी क्रिया रेखाएं भिन्न होती हैं, इसलिए उनके आघूर्ण कटने के बदले जुड़ जाते हैं और पिंड घूम जाता है। इसीलिए पूर्ण संतुलन के लिए दोनों शर्तें आवश्यक हैं।
दौड़ कारें नीची और चौड़ी क्यों बनाई जाती हैं?
गुरुत्व केंद्र नीचा और आधार चौड़ा होने पर स्थायित्व बढ़ता है, क्योंकि मोड़ पर झुकने के बाद भी गुरुत्व केंद्र से खींची ऊर्ध्वाधर रेखा आधार के भीतर बनी रहती है। इसलिए नीची और चौड़ी दौड़ कार उसी गति पर ऊंची तथा संकरी कार से बहुत कम पलटती है।
स्रोत
- भौतिकी भाग एक, कक्षा ग्यारह, कणों के निकाय तथा घूर्णी गति — एनसीईआरटी
- विज्ञान, कक्षा नौ, गुरुत्वाकर्षण अध्याय — एनसीईआरटी





