परिसंचरण और उत्सर्जन तंत्र: हृदय, रक्त और वृक्क
मानव परिसंचरण और उत्सर्जन तंत्र पर परीक्षा नोट्स: रक्त, हृदय और उसके कपाट, धमनियां तथा शिराएं, रक्त समूह, नेफ्रॉन और मूत्र निर्माण की पूरी प्रक्रिया।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 6 मिनट

शरीर कोशिकाओं की एक भीड़ है, जो न अपना भोजन स्वयं ला सकती हैं और न अपना कचरा स्वयं बाहर फेंक सकती हैं। यह काम दो तंत्र करते हैं। परिसंचरण तंत्र एक पंप, नलियों और एक तरल का बंद जाल है, जो ऑक्सीजन, पचा हुआ भोजन, हार्मोन और ऊष्मा हर कोशिका तक पहुंचाता है; उत्सर्जन तंत्र रक्त को छानकर उस नाइट्रोजनी कचरे को बाहर करता है जो कोशिकीय रसायन पीछे छोड़ता है। परीक्षक हर वर्ष इस अध्याय पर लौटते हैं, क्योंकि इसका लगभग हर तथ्य एक नाम, एक संख्या या एक जोड़ी है, जिसे एक पंक्ति में पूछा जा सकता है: कौन सा कोष्ठ, कौन सा कपाट, कौन सा हार्मोन, नेफ्रॉन का कौन सा भाग।
रक्त, वह तरल जो सब कुछ ढोता है
रक्त एक संयोजी ऊतक है और शरीर के भार का लगभग सात प्रतिशत होता है, स्वस्थ वयस्क में मोटे तौर पर पांच से छह लीटर। इसका आधे से कुछ अधिक भाग प्लाज्मा है, एक हल्का पीला तरल जो लगभग नब्बे प्रतिशत जल है और प्रोटीन, लवण, ग्लूकोज तथा अपशिष्ट ढोता है; शेष रचित अंश हैं। लाल रक्त कणिकाएं उभयावतल डिस्क जैसी होती हैं और स्तनधारियों में परिपक्व होते समय अपना केंद्रक खो देती हैं, इसीलिए वे अधिक हीमोग्लोबिन भर सकती हैं। हीमोग्लोबिन लोहायुक्त वर्णक है और लोहा ही ऑक्सीजन से जुड़ता है। एक लाल कणिका लगभग एक सौ बीस दिन जीती है, लाल अस्थि मज्जा में बनती है और प्लीहा में नष्ट होती है, इसीलिए प्लीहा को लाल रक्त कणिकाओं का कब्रिस्तान कहा जाता है। श्वेत रक्त कणिकाएं कम होती हैं, अपना केंद्रक रखती हैं और शरीर की रक्षा करती हैं; इनमें न्यूट्रोफिल सबसे अधिक और बेसोफिल सबसे कम होते हैं। प्लेटलेट्स कोशिका के टुकड़े हैं, जो रक्त का थक्का बनाना आरंभ करते हैं, जिसमें घुलनशील प्लाज्मा प्रोटीन फाइब्रिनोजन अघुलनशील फाइब्रिन के धागों में बदलता है। थक्का जमने के लिए विटामिन K आवश्यक है और हेपैरिन शरीर का अपना थक्कारोधी है।
हृदय और दोहरा परिसंचरण
मानव हृदय एक पेशीय अंग है, आकार में बंद मुट्ठी के बराबर, वक्ष गुहा में कुछ बाईं ओर स्थित और पेरिकार्डियम नामक दोहरी झिल्ली में लिपटा। इसमें चार कोष्ठ हैं: ऊपर दो पतली भित्ति वाले अलिंद और नीचे दो मोटी भित्ति वाले निलय। सबसे मोटी भित्ति बाएं निलय की होती है, क्योंकि उसे रक्त पूरे शरीर तक धकेलना पड़ता है। कपाट प्रवाह को एकमार्गी बनाते हैं। त्रिवलनी कपाट दाएं अलिंद और दाएं निलय के बीच के छिद्र की रक्षा करता है, द्विवलनी या मिट्रल कपाट बाईं ओर के छिद्र की, और अर्धचंद्राकार कपाट फुफ्फुस धमनी तथा महाधमनी के मुख पर खड़े रहते हैं।
धड़कन किसी तंत्रिका से नहीं आती। दाएं अलिंद की भित्ति में स्थित शिरा-अलिंद गांठ स्वयं लय तय करती है और इसे हृदय का गति प्रेरक कहा जाता है; आवेग अलिंद-निलय गांठ तक, फिर हिस के बंडल और पुरकिंजे तंतुओं से निलयों में पहुंचता है। विश्राम की अवस्था में वयस्क हृदय एक मिनट में लगभग बहत्तर बार धड़कता है और उस मिनट में मोटे तौर पर पांच लीटर रक्त पंप करता है। रक्तचाप प्रकुंचन बटा अनुशिथिलन के रूप में लिखा जाता है और स्फिग्मोमैनोमीटर से मापा जाता है; हृदय की विद्युत सक्रियता विद्युतहृदयलेख के रूप में अंकित होती है।
शरीर के एक पूरे चक्कर में रक्त हृदय से दो बार गुजरता है, इसे दोहरा परिसंचरण कहते हैं। फुफ्फुस परिपथ में विऑक्सीजनित रक्त दाएं निलय से फुफ्फुस धमनी द्वारा फेफड़ों को जाता है और फुफ्फुस शिराओं से ऑक्सीजनित होकर लौटता है। इससे दो प्रसिद्ध अपवाद बनते हैं: फुफ्फुस धमनी एकमात्र धमनी है जो विऑक्सीजनित रक्त ढोती है और फुफ्फुस शिराएं एकमात्र शिराएं हैं जो ऑक्सीजनित रक्त ढोती हैं। दैहिक परिपथ में बायां निलय रक्त को महाधमनी में भेजता है, जो सबसे बड़ी धमनी है, और वह महाशिराओं से वापस आता है। विलियम हार्वे ने इस परिसंचरण का वर्णन 1628 में किया।
| वाहिका | दिशा | ढोया गया रक्त |
|---|---|---|
| धमनी | हृदय से दूर | ऑक्सीजनित, फुफ्फुस धमनी को छोड़कर |
| शिरा | हृदय की ओर | विऑक्सीजनित, फुफ्फुस शिराओं को छोड़कर |
| केशिका | ऊतक के भीतर | विनिमय का स्थल, एक कोशिका मोटी |
| यकृत निवाहिका शिरा | आंत से यकृत तक | अवशोषित भोजन ढोती है, पहले हृदय तक नहीं |
| हृद धमनी | स्वयं हृदय की पेशी तक | इसका अवरोध हृदयाघात करता है |
रक्त समूह और रक्ताधान
कार्ल लैंडस्टीनर ने ABO पद्धति निकाली, अर्थात लाल कणिका की सतह पर बैठे प्रतिजन और प्लाज्मा में मौजूद प्रतिरक्षी। समूह AB में दोनों प्रतिजन हैं और कोई प्रतिरक्षी नहीं, इसलिए वह सभी से रक्त ले सकता है और उसे सर्वग्राही कहा जाता है; समूह O में कोई प्रतिजन नहीं, इसलिए वह सभी को दिया जा सकता है और उसे सर्वदाता कहा जाता है। Rh कारक का नाम उस रीसस बंदर पर पड़ा जिसमें यह पहली बार मिला; जब Rh ऋणात्मक माता दूसरी बार Rh धनात्मक शिशु धारण करती है, तो शिशु को एरिथ्रोब्लास्टोसिस फीटैलिस रोग हो सकता है। लसीका दूसरा परिचालित तरल है, रंगहीन क्योंकि उसमें लाल कणिकाएं नहीं होतीं, और वह ऊतक द्रव तथा अवशोषित वसा को रक्त में लौटाती है।
उत्सर्जन तंत्र और नेफ्रॉन
सेम के बीज जैसे दो वृक्क उदर की पिछली भित्ति से सटे रहते हैं, दायां बाएं से कुछ नीचे, क्योंकि उसके ऊपर यकृत जगह ले लेता है। प्रत्येक वृक्क में बाहरी वल्कुट, भीतरी मध्यांश और कीप जैसी श्रोणि होती है, जो मूत्रवाहिनी में खुलती है। कार्यात्मक इकाई नेफ्रॉन है और प्रत्येक वृक्क में लगभग दस लाख नेफ्रॉन होते हैं। रक्त केशिकागुच्छ नामक केशिकाओं की गांठ से प्यालेनुमा बोमन संपुट में पहुंचता है और दाब के कारण छनता है, इस चरण को अतिसूक्ष्म निस्यंदन कहते हैं: रक्त कणिकाओं और बड़े प्रोटीन को छोड़कर सब कुछ बाहर आ जाता है। निस्यंद फिर समीपस्थ कुंडलित नलिका, हेनले का लूप, दूरस्थ कुंडलित नलिका और संग्रह नलिका से गुजरता है। वरणात्मक पुनरवशोषण का सबसे बड़ा भाग समीपस्थ नलिका करती है, जो सारा ग्लूकोज और अमीनो अम्ल तथा अधिकांश जल वापस ले लेती है, और हेनले का लूप वह लवण प्रवणता बनाता है जिससे वृक्क सांद्र मूत्र बाहर भेज पाता है। निस्यंद का लगभग निन्यानबे प्रतिशत पुनरवशोषित हो जाता है, इसीलिए दिन भर में छने मोटे तौर पर एक सौ अस्सी लीटर से केवल लगभग डेढ़ लीटर मूत्र बचता है।
सूक्ष्म नियंत्रण हार्मोन करते हैं। प्रतिमूत्रल हार्मोन, जिसे वैसोप्रेसिन भी कहते हैं, पश्च पीयूष ग्रंथि से आता है और नलिका को अधिक जल पुनरवशोषित कराता है; इसकी कमी में शरीर लीटरों तनु मूत्र निकालता है, इस अवस्था को मधुमेह अनीश्वरी कहते हैं। अधिवृक्क वल्कुट का एल्डोस्टेरोन सोडियम संभालता है, और वृक्क की जक्सटाग्लोमेरुलर कोशिकाओं से निकला रेनिन वह श्रृंखला आरंभ करता है जो गिरते रक्तचाप को उठाती है। मूत्र लगभग पंचानबे प्रतिशत जल है और उसका मुख्य नाइट्रोजनी अपशिष्ट यूरिया है, जो वृक्क में नहीं बल्कि यकृत में बनता है; उसका हल्का पीला रंग यूरोक्रोम वर्णक से आता है। जो प्राणी मुख्यतः यूरिया निकालते हैं, जैसे मनुष्य और अन्य स्तनधारी, उन्हें यूरियोत्सर्जी कहते हैं; अस्थिल मछलियां अमोनियोत्सर्जी हैं और पक्षी, सरीसृप तथा कीट यूरिकोत्सर्जी, जो जल बचाने के लिए अर्धठोस यूरिक अम्ल निकालते हैं। वृक्क उत्सर्जन का एकमात्र अंग नहीं है: त्वचा पसीने के रूप में जल, लवण और थोड़ा यूरिया निकालती है, फेफड़े कार्बन डाइऑक्साइड और जलवाष्प, और यकृत पित्त वर्णक आंत में भेजता है। जब दोनों वृक्क विफल हो जाते हैं, तो रक्त शरीर के बाहर अपोहन द्वारा साफ किया जाता है, जिसमें अर्धपारगम्य झिल्ली और थक्का रोकने के लिए हेपैरिन काम आते हैं।
परीक्षा की दृष्टि से
प्रश्न पांच समूहों में आते हैं। पहला, रक्त के अंश: किस कणिका में केंद्रक नहीं, लाल कणिका कितने दिन जीती है, कौन अंग उसे नष्ट करता है, कौन प्लाज्मा प्रोटीन थक्का बनाता है। दूसरा, हृदय: कोष्ठों की संख्या, कौन भित्ति सबसे मोटी, कौन कपाट कहां, और गति प्रेरक, जहां अलिंद-निलय गांठ भटकाने के लिए रखी जाती है। तीसरा, फुफ्फुस धमनी तथा फुफ्फुस शिराओं के दो स्थायी अपवाद, और आंत से यकृत जाने वाली यकृत निवाहिका शिरा। चौथा, रक्त समूह: सर्वदाता और सर्वग्राही दोनों दिशाओं में पूछे जाते हैं, इसलिए प्रश्न ध्यान से पढ़ें। पांचवां, नेफ्रॉन का क्रम, निस्यंदन के स्थल बनाम पुनरवशोषण के स्थल, और प्रतिमूत्रल हार्मोन के साथ मधुमेह अनीश्वरी की जोड़ी, जिसे इंसुलिन तथा मधुमेह मेलिटस के सामने रखा जाता है। एक प्रिय जाल यह पूछना है कि यूरिया कहां बनता है, क्योंकि वृक्क उसे केवल निकालता है।
महत्वपूर्ण तथ्य
| वयस्क में रक्त की मात्रा | लगभग 5 से 6 लीटर, शरीर के भार का करीब 7 प्रतिशत |
|---|---|
| लाल रक्त कणिका की आयु | लगभग 120 दिन |
| लाल रक्त कणिकाओं का कब्रिस्तान | प्लीहा, जो सबसे बड़ा लसीका अंग भी है |
| लाल रक्त कणिकाओं का वर्णक | हीमोग्लोबिन, जिसमें लोहा होता है |
| सबसे अधिक श्वेत रक्त कणिकाएं | न्यूट्रोफिल; बेसोफिल सबसे कम |
| थक्का बनाने वाला प्रोटीन | फाइब्रिनोजन, जो फाइब्रिन में बदलता है; विटामिन K आवश्यक |
| हृदय के कोष्ठ | चार: दो अलिंद और दो निलय |
| सबसे मोटी भित्ति | बायां निलय |
| हृदय का गति प्रेरक | शिरा-अलिंद गांठ, दाएं अलिंद में |
| बाईं ओर का कपाट | द्विवलनी या मिट्रल कपाट |
| विऑक्सीजनित रक्त वाली एकमात्र धमनी | फुफ्फुस धमनी |
| सबसे बड़ी धमनी और सबसे बड़ी शिरा | महाधमनी और अधर महाशिरा |
| सर्वदाता और सर्वग्राही | समूह O सबको देता है, समूह AB सबसे लेता है |
| रक्त परिसंचरण की खोज | विलियम हार्वे, 1628 |
| वृक्क की इकाई | नेफ्रॉन, प्रत्येक वृक्क में लगभग दस लाख |
| अतिसूक्ष्म निस्यंदन का स्थल | बोमन संपुट के भीतर केशिकागुच्छ |
| पुनरवशोषण का मुख्य स्थल | समीपस्थ कुंडलित नलिका |
| जल बचाने वाला हार्मोन | प्रतिमूत्रल हार्मोन या वैसोप्रेसिन, पश्च पीयूष ग्रंथि से |
| मुख्य नाइट्रोजनी अपशिष्ट | यूरिया, जो यकृत में बनता है |
| मूत्र का रंग | हल्का पीला, यूरोक्रोम वर्णक से |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
मानव में उत्सर्जन तंत्र की निस्यंदन इकाइयों का नाम बताइए।
- A.मूत्रवाहिनी
- B.नेफ्रॉन
- C.तंत्रिका कोशिका
- D.मूत्रमार्ग
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. नेफ्रॉन
व्याख्या
सही उत्तर B, नेफ्रॉन है। नेफ्रॉन वृक्क की संरचनात्मक और कार्यात्मक इकाई है, और मानव के प्रत्येक वृक्क में लगभग दस लाख नेफ्रॉन होते हैं। रक्त केशिकागुच्छ नामक केशिकाओं की गांठ से प्यालेनुमा बोमन संपुट में धकेला जाता है और वहीं वास्तविक निस्यंदन होता है: जल, लवण, ग्लूकोज, अमीनो अम्ल और यूरिया बाहर आ जाते हैं, जबकि रक्त कणिकाएं तथा बड़े प्लाज्मा प्रोटीन रोक लिए जाते हैं। विकल्प A गलत है क्योंकि मूत्रवाहिनी केवल वह नली है जो बने हुए मूत्र को वृक्क से मूत्राशय तक ले जाती है; वह कुछ नहीं छानती। विकल्प C गलत है क्योंकि तंत्रिका कोशिकाएं आवेग संचालित करती हैं और तंत्रिका तंत्र का अंग हैं, उत्सर्जन तंत्र का नहीं; नेफ्रॉन और न्यूरॉन की मिलती ध्वनि ही इस प्रश्न का जाल है। विकल्प D गलत है क्योंकि मूत्रमार्ग वह अंतिम मार्ग है जिससे मूत्र शरीर से बाहर निकलता है। क्रम याद रखें: नेफ्रॉन छानता है, मूत्रवाहिनी ढोती है, मूत्राशय संचित करता है, मूत्रमार्ग निकालता है।
मानव शरीर में निम्नलिखित में से कौन एकमात्र धमनी है जो विऑक्सीजनित रक्त ढोती है?
- A.महाधमनी
- B.हृद धमनी
- C.फुफ्फुस धमनी
- D.ग्रीवा धमनी
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. फुफ्फुस धमनी
व्याख्या
सही उत्तर C, फुफ्फुस धमनी है। धमनी की पहचान दिशा से होती है, उसमें भरे रक्त के प्रकार से नहीं: वह रक्त को हृदय से दूर ले जाती है। फुफ्फुस धमनी दाएं निलय से निकलकर वह विऑक्सीजनित रक्त ढोती है जो शरीर से लौटा है, और उसे ऑक्सीजन भरने के लिए फेफड़ों तक पहुंचाती है, इसलिए यह इस नियम का एकमात्र अपवाद है कि धमनियां ऑक्सीजनित रक्त ढोती हैं। इसकी जोड़ीदार अपवाद फुफ्फुस शिराएं हैं, जो एकमात्र शिराएं हैं जो ऑक्सीजनित रक्त ढोती हैं। विकल्प A गलत है क्योंकि महाधमनी बाएं निलय से पूर्ण ऑक्सीजनित रक्त लेकर निकलती है और शरीर की सबसे बड़ी धमनी है। विकल्प B गलत है क्योंकि हृद धमनियां महाधमनी से निकलकर स्वयं हृदय की पेशी को पोषण देती हैं और इसलिए ऑक्सीजनित रक्त ढोती हैं; इनका अवरोध हृदयाघात करता है। विकल्प D गलत है क्योंकि ग्रीवा धमनियां ऑक्सीजनित रक्त सिर और मस्तिष्क तक ले जाती हैं।
किस रक्त समूह को सर्वदाता कहा जाता है?
- A.A
- B.B
- C.AB
- D.O
उत्तर देखें
सही उत्तर: D. O
व्याख्या
सही उत्तर D, समूह O है। ABO पद्धति में प्रतिजन लाल रक्त कणिका की सतह पर बैठते हैं और प्रतिरक्षी प्लाज्मा में तैरते हैं। समूह O की कणिकाओं पर न A प्रतिजन होता है और न B प्रतिजन, इसलिए ग्राही के प्रतिरक्षियों के लिए उन पर आक्रमण करने योग्य कुछ नहीं रहता, और इस समूह का रक्त किसी भी ABO समूह के व्यक्ति को दिया जा सकता है। इसी कारण समूह O को सर्वदाता कहा जाता है। विकल्प A गलत है क्योंकि समूह A की कणिकाओं पर A प्रतिजन होता है, जिसे समूह B और O के प्लाज्मा में मौजूद प्रति-A प्रतिरक्षी नष्ट कर देगा। विकल्प B इसी कारण से गलत है, केवल प्रतिजन B के साथ। विकल्प C गलत है क्योंकि समूह AB उलटा मामला है: उसके प्लाज्मा में न प्रति-A और न प्रति-B प्रतिरक्षी होता है, इसलिए वह सभी से रक्त ले सकता है और उसे सर्वग्राही कहते हैं, सर्वदाता नहीं। जोड़ी साफ रखें: O सभी को देता है, AB सभी से लेता है।
मानव हृदय का गति प्रेरक ______ है।
- A.अलिंद-निलय गांठ
- B.शिरा-अलिंद गांठ
- C.हिस का बंडल
- D.पुरकिंजे तंतु
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. शिरा-अलिंद गांठ
व्याख्या
सही उत्तर B, शिरा-अलिंद गांठ है। हृदय की धड़कन मस्तिष्क से आई किसी तंत्रिका से आरंभ नहीं होती; हृदय अपनी लय स्वयं उत्पन्न करता है, और विशिष्ट ऊतक का जो टुकड़ा यह काम सबसे तेज करता है, वही शेष के लिए गति तय कर देता है। वह टुकड़ा शिरा-अलिंद गांठ है, जो ऊर्ध्व महाशिरा के मुख के पास दाएं अलिंद की भित्ति में स्थित है, और इसीलिए उसे हृदय का गति प्रेरक कहा जाता है। विकल्प A गलत है क्योंकि अलिंद-निलय गांठ केवल शिरा-अलिंद गांठ से आवेग पाती है और उसे थोड़ा विलंबित करती है, जिससे अलिंद खाली हो सकें; वह धीमे बदली गति प्रेरक का काम कर सकती है, पर सामान्य गति प्रेरक नहीं है। विकल्प C गलत है क्योंकि हिस का बंडल वह संवाहक मार्ग है जो आवेग को अलिंद-निलय गांठ से निलयों के बीच के पट में ले जाता है। विकल्प D गलत है क्योंकि पुरकिंजे तंतु अंतिम शाखाएं हैं, जो आवेग को निलय की पेशी में फैलाती हैं। याद रखने का क्रम है शिरा-अलिंद गांठ, अलिंद-निलय गांठ, हिस का बंडल, पुरकिंजे तंतु।
मानव शरीर के किस अंग को लाल रक्त कणिकाओं का कब्रिस्तान कहा जाता है?
- A.यकृत
- B.प्लीहा
- C.लाल अस्थि मज्जा
- D.अग्न्याशय
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. प्लीहा
व्याख्या
सही उत्तर B, प्लीहा है। एक लाल रक्त कणिका लगभग एक सौ बीस दिन जीती है। बूढ़ी होते हुए उसकी झिल्ली कठोर पड़ जाती है, और प्लीहा के सकरे टेढ़े मार्ग ऐसी कणिकाओं को फंसा लेते हैं, जिससे उनमें बैठे भक्षकाणु उन्हें तोड़कर हीमोग्लोबिन का लोहा बचा सकें। चूंकि वहां इतनी जीर्ण लाल कणिकाएं नष्ट होती हैं, प्लीहा को लाल रक्त कणिकाओं का कब्रिस्तान कहा जाता है; वह शरीर का सबसे बड़ा लसीका अंग भी है और रक्त के भंडार का काम करती है। विकल्प A गलत है क्योंकि यकृत, चाहे वह टूटे हीमोग्लोबिन से बचे बिलिरुबिन को संभालकर पित्त वर्णक में बदलता है, वह स्थान नहीं है जहां कणिकाएं फंसाकर नष्ट की जाती हैं। विकल्प C गलत है क्योंकि लाल अस्थि मज्जा इसका उलटा है: वह लाल रक्त कणिकाओं का जन्मस्थान है, कब्रिस्तान नहीं। विकल्प D गलत है क्योंकि अग्न्याशय पाचक रस तथा इंसुलिन और ग्लूकैगॉन हार्मोन बनाता है और लाल कणिकाओं से उसका कोई संबंध नहीं।
मानव मूत्र का मुख्य नाइट्रोजनी अपशिष्ट यूरिया ______ में बनता है।
- A.वृक्क
- B.यकृत
- C.मूत्राशय
- D.प्लीहा
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. यकृत
व्याख्या
सही उत्तर B, यकृत है। जब शरीर आवश्यकता से अधिक प्रोटीन तोड़ता है, तो अमीनो अम्लों से उनका अमीनो समूह हटाया जाता है और इससे निकली अमोनिया अत्यंत विषैली होती है। यकृत इस अमोनिया को अभिक्रियाओं की एक श्रृंखला द्वारा, जिसे यूरिया चक्र या ऑर्निथीन चक्र कहते हैं, कहीं कम विषैले यौगिक यूरिया में बदल देता है। यूरिया फिर रक्त के साथ वृक्क तक जाता है, जो उसे केवल छानकर मूत्र में सांद्र करता है। विकल्प A ठीक इसी कारण गलत है: वृक्क यूरिया निकालता है, बनाता नहीं, और बनने के स्थान तथा निकलने के स्थान का यही अंतर प्रश्न परखता है। विकल्प C गलत है क्योंकि मूत्राशय केवल एक पेशीय थैली है, जो मूत्र को बाहर निकलने तक संचित रखती है। विकल्प D गलत है क्योंकि प्लीहा जीर्ण लाल रक्त कणिकाएं नष्ट करती है और रक्त संचित करती है। चूंकि मनुष्य मुख्यतः यूरिया निकालते हैं, उन्हें यूरियोत्सर्जी प्राणी कहा जाता है, अस्थिल मछलियों के अमोनियोत्सर्जी और पक्षियों तथा सरीसृपों के यूरिकोत्सर्जी होने के विपरीत।
नेफ्रॉन के किस भाग में ग्लूकोज और अमीनो अम्ल का अधिकतम वरणात्मक पुनरवशोषण होता है?
- A.बोमन संपुट
- B.समीपस्थ कुंडलित नलिका
- C.हेनले का लूप
- D.संग्रह नलिका
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. समीपस्थ कुंडलित नलिका
व्याख्या
सही उत्तर B, समीपस्थ कुंडलित नलिका है। केशिकागुच्छ पर होने वाला निस्यंदन अंधा होता है: वह अपशिष्ट के साथ उपयोगी ग्लूकोज और अमीनो अम्ल भी बाहर धकेल देता है। बोमन संपुट के तुरंत बाद आने वाली समीपस्थ कुंडलित नलिका में सूक्ष्मांकुरों की ब्रश जैसी कोर होती है, जो उसे विशाल सतह देती है, और वह व्यवहार में सारा ग्लूकोज तथा अमीनो अम्ल और लगभग सत्तर से अस्सी प्रतिशत जल तथा लवण वापस ले लेती है। विकल्प A गलत है क्योंकि बोमन संपुट अतिसूक्ष्म निस्यंदन का स्थल है, जहां निस्यंद बनता है, पुनरवशोषित नहीं होता। विकल्प C गलत है क्योंकि हेनले का लूप दूसरा काम करता है: अपनी प्रतिधारा व्यवस्था से वह मध्यांश में लवण की प्रवणता बनाता है, जिससे सांद्र मूत्र बन सके, और वह जल तथा सोडियम पुनरवशोषित करता है, ग्लूकोज नहीं। विकल्प D गलत है क्योंकि संग्रह नलिका प्रतिमूत्रल हार्मोन के प्रभाव में जल का अंतिम समायोजन करती है। एक नैदानिक सूत्र ध्यान रखें: मूत्र में ग्लूकोज तभी आता है जब रक्त शर्करा उस मात्रा से बढ़ जाए जितनी समीपस्थ नलिका वापस ढो सकती है।
किस हार्मोन की कमी से मधुमेह अनीश्वरी रोग होता है, जिसमें बहुत अधिक मात्रा में तनु मूत्र निकलता है?
- A.इंसुलिन
- B.प्रतिमूत्रल हार्मोन
- C.एल्डोस्टेरोन
- D.थायरॉक्सिन
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. प्रतिमूत्रल हार्मोन
व्याख्या
सही उत्तर B, प्रतिमूत्रल हार्मोन है। प्रतिमूत्रल हार्मोन, जिसे वैसोप्रेसिन भी कहते हैं, पीयूष ग्रंथि के पश्च भाग से निकलता है और नेफ्रॉन की दूरस्थ नलिका तथा संग्रह नलिका को जल वापस रक्त में खींचने पर लगाता है। यदि यह कम पड़ जाए, तो वह जल वापस नहीं आता और रोगी लीटरों अत्यंत तनु मूत्र निकालता है तथा उसे लगातार प्यास लगती है, यही मधुमेह अनीश्वरी रोग है। विकल्प A गलत है क्योंकि इंसुलिन की कमी से मधुमेह मेलिटस होता है, जो सर्वथा भिन्न विकार है, जिसमें रक्त ग्लूकोज बढ़ता है और शर्करा मूत्र में आ जाती है; मधुमेह शब्द का साझा होना ही यहां जाल है। विकल्प C गलत है क्योंकि अधिवृक्क वल्कुट का एल्डोस्टेरोन सोडियम के पुनरवशोषण तथा पोटैशियम के उत्सर्जन को नियंत्रित करता है, और उसकी कमी लवण संतुलन बिगाड़ती है, तनु मूत्र की बाढ़ नहीं लाती। विकल्प D गलत है क्योंकि थायरॉइड ग्रंथि का थायरॉक्सिन उपापचय की दर नियंत्रित करता है, और उसकी कमी से बच्चों में जड़मानवता तथा वयस्कों में मिक्सीडीमा होता है। याद रखें कि इंसिपिडस का अर्थ स्वादहीन और मेलिटस का अर्थ शहद जैसा मीठा है।
मानव हृदय के बाएं अलिंद और बाएं निलय के बीच स्थित कपाट को ______ कहा जाता है।
- A.त्रिवलनी कपाट
- B.द्विवलनी कपाट
- C.फुफ्फुस अर्धचंद्राकार कपाट
- D.महाधमनी अर्धचंद्राकार कपाट
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. द्विवलनी कपाट
व्याख्या
सही उत्तर B, द्विवलनी कपाट है। बाएं अलिंद और बाएं निलय के बीच के छिद्र की रक्षा दो पल्लों या वलनों वाला कपाट करता है, इसीलिए उसे द्विवलनी कपाट कहा जाता है; उसे मिट्रल कपाट भी कहते हैं, क्योंकि उसका आकार बिशप की मिट्रा जैसा लगता है। उसका काम यह है कि शक्तिशाली बायां निलय सिकुड़े तो रक्त वापस अलिंद में न धकेला जाए। विकल्प A गलत है क्योंकि तीन वलनों वाला त्रिवलनी कपाट हृदय की दूसरी ओर, दाएं अलिंद और दाएं निलय के बीच बैठता है; दोनों पक्षों को बदल देना इस प्रश्न की सबसे आम भूल है। विकल्प C गलत है क्योंकि फुफ्फुस अर्धचंद्राकार कपाट फुफ्फुस धमनी के मुख पर खड़ा है, जहां से रक्त दाएं निलय से फेफड़ों को जाता है। विकल्प D गलत है क्योंकि महाधमनी अर्धचंद्राकार कपाट महाधमनी के मुख पर खड़ा है, जहां से रक्त बाएं निलय से निकलता है, अर्थात द्विवलनी कपाट के बाद, कोष्ठों के बीच नहीं। एक उपयोगी स्मृति सूत्र यह है कि बाईं ओर दो वलन हैं और बाएं फेफड़े में दो खंड।
मानव शरीर में रक्त परिसंचरण की खोज का श्रेय किसे दिया जाता है?
- A.विलियम हार्वे
- B.कार्ल लैंडस्टीनर
- C.एडवर्ड जेनर
- D.रॉबर्ट कोच
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. विलियम हार्वे
व्याख्या
सही उत्तर A, विलियम हार्वे है। अंग्रेज चिकित्सक विलियम हार्वे ने प्रयोग और मापन से दिखाया कि रक्त, जैसा तब माना जाता था, नया बनकर ऊतकों में चुक नहीं जाता, बल्कि एक बंद परिपथ में घूमता है, जिसे पंप की तरह काम करता हृदय चलाता है, और यह उन्होंने 1628 में हृदय तथा रक्त की गति पर लिखी अपनी पुस्तक में प्रकाशित किया। विकल्प B गलत है क्योंकि कार्ल लैंडस्टीनर ने बीसवीं सदी के आरंभ में ABO रक्त समूह निकाले और बाद में Rh कारक पहचानने में सहयोग किया; उन्होंने रक्त के प्रकार बताए, उसकी गति नहीं। विकल्प C गलत है क्योंकि एडवर्ड जेनर ने गोशीतला की सामग्री से चेचक के विरुद्ध टीकाकरण आरंभ किया और उन्हें प्रतिरक्षा विज्ञान का जनक कहा जाता है। विकल्प D गलत है क्योंकि रॉबर्ट कोच ने क्षय रोग तथा हैजा के जीवाणु पहचाने और रोगाणु को रोग से जोड़ने वाले सिद्धांत दिए। एक और नाम याद रखने योग्य है, क्रिश्चियन बर्नार्ड, जिन्होंने पहला मानव हृदय प्रत्यारोपण किया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
बाएं निलय की भित्ति दाएं निलय से मोटी क्यों होती है?
क्योंकि दोनों निलय बहुत भिन्न प्रतिरोध के विरुद्ध पंप करते हैं। दाएं निलय को रक्त केवल थोड़ी दूर फेफड़ों तक धकेलना है, जो उसके पास ही हैं और कम प्रतिरोध देते हैं। बाएं निलय को रक्त महाधमनी से मस्तिष्क, हाथ पैर और हर दूसरे अंग तक पहुंचाना है, इसलिए उसे कहीं अधिक दाब बनाना पड़ता है, और वह दाब मोटी पेशीय भित्ति से ही बनता है।
समूह O का रक्त सबको कैसे दिया जा सकता है?
क्योंकि अस्वीकृति भड़काने वाला प्रतिजन ही अनुपस्थित है। प्रतिजन A और B लाल कणिका की सतह पर बैठते हैं, और ग्राही के प्लाज्मा प्रतिरक्षी उस प्रतिजन पर आक्रमण करते हैं जो उनके लिए पराया है। समूह O की कणिकाओं पर कोई भी प्रतिजन नहीं होता, इसलिए प्रति-A या प्रति-B प्रतिरक्षी को पकड़ने योग्य कुछ नहीं मिलता और कणिकाएं किसी भी ABO समूह के ग्राही में बची रहती हैं। व्यवहार में अस्पताल Rh कारक भी मिलाते हैं और आपात रक्ताधान में O ऋणात्मक पसंद करते हैं।
यदि वृक्क दिन में लगभग 180 लीटर छानता है, तो मूत्र केवल करीब डेढ़ लीटर क्यों निकलता है?
क्योंकि निस्यंदन जानबूझकर अपव्ययी है और उसके बाद सावधान वसूली होती है। केशिकागुच्छ लगभग वह सब बाहर धकेल देता है जो निकलने भर छोटा है, उपयोगी पदार्थ भी। नलिकाएं फिर उस निस्यंद का लगभग निन्यानबे प्रतिशत पुनरवशोषित कर लेती हैं, सारा ग्लूकोज और अमीनो अम्ल, अधिकांश लवण और लगभग सारा जल। जो बचता है वह सांद्र अपशिष्ट की थोड़ी मात्रा है, और उसका परिमाण इस पर बदलता है कि शरीर कितना जल छोड़ सकता है।
मधुमेह मेलिटस और मधुमेह अनीश्वरी में क्या अंतर है?
इनमें साझा केवल मधुमेह शब्द है, जिसका अर्थ अधिक मात्रा में मूत्र निकलना है। मधुमेह मेलिटस अग्न्याशय से इंसुलिन की कमी से होता है; रक्त ग्लूकोज बढ़ जाता है और शर्करा मूत्र में आ जाती है, इसीलिए नाम का अर्थ शहद जैसा मीठा है। मधुमेह अनीश्वरी पश्च पीयूष ग्रंथि से प्रतिमूत्रल हार्मोन की कमी से होता है; वृक्क जल बचा नहीं पाता और स्वादहीन, अत्यंत तनु मूत्र की बाढ़ निकालता है।
अपोहन यंत्र वास्तव में क्या करता है?
वह विफल वृक्कों का छानने का काम शरीर के बाहर करता है। रोगी का रक्त अर्धपारगम्य झिल्ली की एक ओर बहाया जाता है, जबकि दूसरी ओर अपोहन तरल बहता है, जो प्लाज्मा जैसा है पर अपशिष्ट से मुक्त। यूरिया, क्रिएटिनिन और अतिरिक्त लवण उस तरल में विसरित हो जाते हैं, जबकि रक्त कणिकाएं और प्रोटीन बड़े होने के कारण पीछे रह जाते हैं। रास्ते में रक्त जमे नहीं, इसलिए हेपैरिन मिलाया जाता है, और साफ रक्त रोगी को लौटा दिया जाता है।
स्रोत
- विज्ञान, कक्षा 10, अध्याय 6: जैव प्रक्रम — एनसीईआरटी
- जीव विज्ञान, कक्षा 11, शरीर द्रव तथा परिसंचरण अध्याय — एनसीईआरटी
- जीव विज्ञान, कक्षा 11, उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन अध्याय — एनसीईआरटी





