सिंधु घाटी सभ्यता: स्थल, नगर नियोजन और पतन
सिंधु घाटी सभ्यता के सम्पूर्ण नोट्स: खोज, विस्तार, प्रमुख स्थल एवं प्राप्त वस्तुएं, नगर नियोजन, व्यापार, मुहरें, लिपि, धर्म तथा पतन के कारण।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 5 मिनट

सिंधु घाटी सभ्यता, जिसे हड़प्पा सभ्यता भी कहा जाता है, भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे प्राचीन नगरीय सभ्यता है। यह मेसोपोटामिया और मिस्र के साथ प्राचीन विश्व की तीन कांस्ययुगीन सभ्यताओं में गिनी जाती है। परीक्षाओं में यह अध्याय हर वर्ष आता है, क्योंकि इसके तथ्य स्थिर हैं और सीधे पूछे जा सकते हैं: कौन सा स्थल किस नदी पर था, वहां से क्या मिला, उसकी खुदाई किसने और कब की। नीचे वही तथ्य उसी क्रम में दिए गए हैं जिस क्रम में परीक्षक पूछता है।
खोज, काल और विस्तार
सभ्यता का नाम हड़प्पा के नाम पर पड़ा, क्योंकि यही पहला स्थल था जिसकी खुदाई हुई। दयाराम साहनी ने 1921 में रावी नदी के किनारे हड़प्पा की खुदाई की और राखालदास बनर्जी ने 1922 में सिंधु नदी के किनारे मोहनजोदड़ो को खोजा। दोनों उस समय भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक सर जॉन मार्शल के निर्देशन में कार्य कर रहे थे, और मार्शल ने ही 1924 में इस खोज की घोषणा विश्व के सामने की। सभ्यता का परिपक्व नगरीय काल लगभग 2600 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व तक माना जाता है।
क्षेत्रफल की दृष्टि से यह कांस्ययुगीन सभ्यताओं में सबसे बड़ी थी। इसकी सीमाएं इस प्रकार हैं: पश्चिम में सुत्कागेंडोर, जो बलूचिस्तान के मकरान तट पर है; पूर्व में आलमगीरपुर, जो उत्तर प्रदेश में हिंडन नदी पर है; उत्तर में मांडा, जो जम्मू में चिनाब नदी पर है; और दक्षिण में दैमाबाद, जो महाराष्ट्र में प्रवरा नदी पर है। इन चारों को जोड़ने पर लगभग त्रिभुजाकार क्षेत्र बनता है जो दस लाख वर्ग किलोमीटर से भी अधिक है। यह कांस्य युग की सभ्यता थी, अर्थात इसके लोग तांबा, कांसा, सोना और चांदी जानते थे, परंतु लोहे से परिचित नहीं थे।
प्रमुख स्थल और वहां से प्राप्त वस्तुएं
| स्थल | नदी या स्थिति | प्रमुख प्राप्तियां |
|---|---|---|
| हड़प्पा | रावी, पंजाब (पाकिस्तान) | अन्नागार की पंक्तियां, समाधि स्थल आर-37, ताबूत में शवाधान |
| मोहनजोदड़ो | सिंधु, सिंध (पाकिस्तान) | विशाल स्नानागार, विशाल अन्नागार, कांसे की नर्तकी, पशुपति मुहर, पुरोहित प्रतिमा |
| लोथल | भोगावा, गुजरात | गोदीबाड़ा, चावल की भूसी, अग्निकुंड, मनके बनाने का कारखाना |
| कालीबंगा | घग्गर, राजस्थान | जुते हुए खेत, अग्निकुंड, ऊंट की हड्डियां |
| धौलावीरा | खदिर बेट, कच्छ, गुजरात | तीन भागों में बंटा नगर, पत्थर के जलाशय, दस बड़े चिह्नों का साइनबोर्ड |
| राखीगढ़ी | घग्गर क्षेत्र, हरियाणा | भारत में स्थित सबसे बड़ा हड़प्पाकालीन स्थल |
| चन्हूदड़ो | सिंध (पाकिस्तान) | मनके और चूड़ी उद्योग; दुर्ग रहित एकमात्र बड़ा नगर |
| बनावली | हरियाणा | मिट्टी का खिलौना हल, जौ के दाने |
| सुरकोटदा | कच्छ, गुजरात | घोड़े की हड्डियां, पत्थर से घिरे शवाधान |
| दैमाबाद | प्रवरा, महाराष्ट्र | कांसे का रथ और पशु मूर्तियां; सबसे दक्षिणी स्थल |
नगर नियोजन और जल निकासी
नगर नियोजन इस सभ्यता की सबसे अधिक पूछी जाने वाली विशेषता है, क्योंकि यह एक ही ढांचे पर हर नगर में दोहराया गया।
- नगर जाल पद्धति पर बसे थे, जिसमें सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं और बस्ती आयताकार खंडों में बंट जाती थी।
- सामान्य नगर के दो भाग होते थे: पश्चिम में ऊंचा दुर्ग, जहां सार्वजनिक भवन थे, और पूर्व में विस्तृत निचला नगर, जहां जनसाधारण रहते थे।
- मकान पकी ईंटों से बनते थे और ईंट की लंबाई, चौड़ाई तथा मोटाई का अनुपात सदैव 4:2:1 रहता था, जो मानकीकरण का प्रारंभिक उदाहरण है।
- हर गली में ईंटों की ढकी हुई नालियां थीं, जिनमें सफाई के लिए बीच-बीच में मैनहोल बने थे; घरों की नालियां इन्हीं में गिरती थीं। इतनी उन्नत जल निकासी किसी अन्य प्राचीन सभ्यता में नहीं मिलती।
- मोहनजोदड़ो का विशाल स्नानागार लगभग बारह मीटर लंबा और सात मीटर चौड़ा है; इसके नीचे प्राकृतिक तारकोल की परत लगाकर उसे जलरोधी बनाया गया था और संभवतः यह धार्मिक स्नान के लिए था।
- मोहनजोदड़ो का सबसे बड़ा भवन विशाल अन्नागार है, जबकि हड़प्पा में दुर्ग के पास अन्नागार की पंक्तियां मिली हैं।
कृषि, शिल्प और व्यापार
हड़प्पावासी गेहूं, जौ, मटर, तिल और सरसों उगाते थे; चावल की भूसी गुजरात के लोथल और रंगपुर से मिली है। कपास उगाने वाले वे विश्व के पहले लोग थे, और आगे चलकर यूनानियों ने कपास को सिंधु के नाम पर सिंडोन कहा। वे कूबड़ वाले बैल, भैंस, भेड़, बकरी, सूअर और कुत्ता पालते थे तथा हाथी और ऊंट से परिचित थे; घोड़े का प्रयोग प्रमाणित नहीं है। व्यापार वस्तु विनिमय से होता था, क्योंकि कोई सिक्का नहीं मिला है, और तौल की इकाइयां सोलह के गुणकों में चलती थीं। मेसोपोटामिया के अभिलेखों में सिंधु क्षेत्र को मेलुहा कहा गया है; दिलमुन को बहरीन और मगन को ओमान से जोड़ा जाता है, जो समुद्री मार्ग के पड़ाव थे। लाजवर्द अफगानिस्तान से, तांबा राजस्थान की खेतड़ी खानों से और सोना दक्षिण के कोलार क्षेत्र से आता था।
मुहरें, लिपि और धर्म
मुहरें इस सभ्यता की पहचान हैं। ये प्रायः वर्गाकार और सेलखड़ी की बनी होती थीं, और इन पर सबसे अधिक एक सींग वाला पशु उत्कीर्ण मिलता है। सबसे प्रसिद्ध मोहनजोदड़ो की पशुपति मुहर है, जिसमें योगमुद्रा में बैठी एक आकृति पशुओं से घिरी है और जिसे अनेक विद्वान आद्य शिव मानते हैं। लिपि चित्रात्मक है, इसमें लगभग चार सौ चिह्न हैं, यह पहली पंक्ति में दाएं से बाएं और अगली में बाएं से दाएं लिखी जाती थी, तथा आज तक पढ़ी नहीं जा सकी है। इसी कारण यह सभ्यता आद्य-ऐतिहासिक कहलाती है। कोई मंदिर नहीं मिला है। लोग मातृदेवी, पीपल वृक्ष और कूबड़ वाले बैल की उपासना करते थे और शवों को प्रायः उत्तर-दक्षिण दिशा में लिटाकर दफनाते थे।
सभ्यता का पतन
लगभग 1900 ईसा पूर्व तक नगर उजड़ गए, और पतन का कोई एक कारण सर्वमान्य नहीं है। मार्टिमर व्हीलर ने आर्य आक्रमण का सिद्धांत दिया और मोहनजोदड़ो के कंकालों को नरसंहार का प्रमाण बताया, किंतु यह मत अब अस्वीकृत है। जॉन मार्शल और मैके ने बार-बार आई बाढ़ को कारण माना, और एस. आर. राव ने लोथल के संदर्भ में यही तर्क दिया। अन्य विद्वान भूगर्भीय हलचल से नदियों के अवरुद्ध होने, घग्गर-हाकड़ा के सूखने, जलवायु के शुष्क होते जाने, ईंटें पकाने के लिए वनों के अंधाधुंध कटने तथा मेसोपोटामिया से व्यापार टूटने को कारण मानते हैं। अधिकांश इतिहासकार आज इसे क्रमिक पतन मानते हैं जिसमें जलवायु परिवर्तन और नदियों का मार्ग बदलना सबसे बड़े कारण रहे।
परीक्षा की दृष्टि से
प्रश्न प्रायः जोड़ों पर आधारित होते हैं: स्थल और नदी, स्थल और प्राप्त वस्तु, स्थल और उत्खननकर्ता। विशाल स्नानागार तथा पशुपति मुहर को मोहनजोदड़ो से, गोदीबाड़ा और चावल को लोथल से, जुते खेत और अग्निकुंड को कालीबंगा से, जलाशयों को धौलावीरा से, खिलौना हल को बनावली से, घोड़े की हड्डियों को सुरकोटदा से और कांसे के रथ को दैमाबाद से जोड़कर याद करें। सामान्य भ्रम हैं: ईंट के अनुपात 4:2:1 को उलटकर 1:2:4 पढ़ लेना, भारत के सबसे बड़े स्थल राखीगढ़ी को सम्पूर्ण सभ्यता के सबसे बड़े स्थल से मिला देना, लोहे को हड़प्पाकालीन धातु मान लेना, तथा चारों दिशाओं के सीमावर्ती स्थलों को आपस में बदल देना। दूसरा वर्ग उन प्रश्नों का है जो पूछते हैं कि हड़प्पावासियों के पास क्या नहीं था: लोहा, सिक्के, मंदिर, पढ़ी जा सकने वाली लिपि और घोड़े का प्रमाणित प्रयोग।
महत्वपूर्ण तथ्य
| दूसरा नाम | हड़प्पा सभ्यता, प्रथम उत्खनित स्थल हड़प्पा के नाम पर |
|---|---|
| हड़प्पा की खुदाई | 1921, दयाराम साहनी द्वारा |
| मोहनजोदड़ो की खुदाई | 1922, राखालदास बनर्जी द्वारा |
| परिपक्व काल | लगभग 2600 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व |
| सबसे पश्चिमी स्थल | सुत्कागेंडोर, बलूचिस्तान, मकरान तट |
| सबसे पूर्वी स्थल | आलमगीरपुर, उत्तर प्रदेश, हिंडन नदी |
| सबसे उत्तरी स्थल | मांडा, जम्मू, चिनाब नदी |
| सबसे दक्षिणी स्थल | दैमाबाद, महाराष्ट्र, प्रवरा नदी |
| ईंट का अनुपात | 4:2:1 (लंबाई, चौड़ाई, मोटाई) |
| विशाल स्नानागार | मोहनजोदड़ो, लगभग 12 मीटर गुणा 7 मीटर, तारकोल से जलरोधी |
| गोदीबाड़ा | लोथल, गुजरात, भोगावा नदी पर |
| भारत का सबसे बड़ा हड़प्पा स्थल | राखीगढ़ी, हरियाणा |
| मेसोपोटामिया में सिंधु क्षेत्र का नाम | मेलुहा |
| अज्ञात धातु | लोहा |
| लिपि | चित्रात्मक, अपठित, बुस्ट्रोफेडन शैली में लिखित |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
सिंधु घाटी सभ्यता का विशाल स्नानागार किस स्थल से प्राप्त हुआ है?
- A.हड़प्पा
- B.मोहनजोदड़ो
- C.लोथल
- D.कालीबंगा
उत्तर देखें
विशाल स्नानागार सिंध स्थित मोहनजोदड़ो के दुर्ग क्षेत्र में बना है। यह ईंटों का जलकुंड है, लगभग बारह मीटर लंबा और सात मीटर चौड़ा, जिसके दोनों सिरों पर सीढ़ियां हैं और चारों ओर छोटे कक्ष बने हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →हड़प्पा सभ्यता का एकमात्र कृत्रिम गोदीबाड़ा किस स्थल पर पहचाना गया है?
- A.लोथल
- B.सुरकोटदा
- C.चन्हूदड़ो
- D.बनावली
उत्तर देखें
लोथल गुजरात में साबरमती की सहायक नदी भोगावा के किनारे स्थित है और इसके पूर्वी भाग में ईंटों का बड़ा हौज मिला है जो एक नहर द्वारा नदी से जुड़ा था।
पूरी व्याख्या पढ़ें →वर्ष 1921 में हड़प्पा की खुदाई किस पुरातत्वविद ने की थी?
- A.राखालदास बनर्जी
- B.सर जॉन मार्शल
- C.दयाराम साहनी
- D.मार्टिमर व्हीलर
उत्तर देखें
उन्होंने 1921 में रावी नदी के किनारे हड़प्पा में खुदाई की और उसी सत्र की प्राप्तियों ने एक पूर्णतः अज्ञात नगरीय संस्कृति की पहचान कराई, जिसका नाम इसी स्थल पर पड़ा।
पूरी व्याख्या पढ़ें →उपमहाद्वीप में जुते हुए खेत का सबसे प्राचीन प्रमाण किस हड़प्पाकालीन स्थल से मिला है?
- A.धौलावीरा
- B.कालीबंगा
- C.राखीगढ़ी
- D.आलमगीरपुर
उत्तर देखें
कालीबंगा राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में घग्गर नदी के सूखे प्रवाह पर स्थित है। यहां पूर्व हड़प्पा स्तर का एक खेत मिला है जिसमें हल की रेखाएं दो दिशाओं में समकोण पर कटती हैं, जिससे पता चलता है कि एक ही खेत में एक साथ दो फसलें बोई जाती थीं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →हड़प्पाकालीन मकानों में प्रयुक्त ईंटों की लंबाई, चौड़ाई और मोटाई का निश्चित अनुपात क्या था?
- A.1:2:4
- B.2:2:1
- C.4:2:1
- D.3:2:1
उत्तर देखें
हड़प्पाकालीन पकी ईंट की लंबाई चार इकाई, चौड़ाई दो इकाई और मोटाई एक इकाई होती थी, और सैकड़ों किलोमीटर दूर बसे स्थलों पर भी यही अनुपात मिलता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →मेसोपोटामिया के अभिलेखों में सिंधु क्षेत्र को किस नाम से पुकारा गया है?
- A.दिलमुन
- B.मगन
- C.मेलुहा
- D.सिंडोन
उत्तर देखें
मेसोपोटामिया के लेखों में मेलुहा को उन देशों में गिना गया है जहां से जहाज कार्नेलियन मनके, हाथी दांत, लकड़ी और तांबा लेकर आते थे, और ये वस्तुएं ठीक वही हैं जो हड़प्पा स्थलों पर बनती थीं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →निम्नलिखित में से कौन सी धातु सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों को ज्ञात नहीं थी?
- A.तांबा
- B.लोहा
- C.सोना
- D.चांदी
उत्तर देखें
हड़प्पा सभ्यता कांस्य युग की संस्कृति है और इसके किसी भी स्तर से लोहे की कोई वस्तु नहीं मिली है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →हड़प्पा सभ्यता का सबसे दक्षिणी स्थल दैमाबाद वर्तमान में किस राज्य में स्थित है?
- A.गुजरात
- B.राजस्थान
- C.महाराष्ट्र
- D.हरियाणा
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दैमाबाद महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में गोदावरी की सहायक नदी प्रवरा के किनारे स्थित है और यही हड़प्पा सभ्यता की दक्षिणी सीमा है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →पशुओं से घिरी योगमुद्रा में बैठी आकृति वाली प्रसिद्ध पशुपति मुहर किस स्थल से मिली है?
- A.मोहनजोदड़ो
- B.चन्हूदड़ो
- C.रोपड़
- D.बनावली
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इस मुहर पर सिर पर सींग धारण किए एक आकृति योगमुद्रा में बैठी है और उसके चारों ओर हाथी, बाघ, गैंडा तथा भैंसा उत्कीर्ण हैं, और आसन के नीचे हरिण दिखाए गए हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →गुजरात का कौन सा हड़प्पाकालीन स्थल तीन भागों में विभाजित है और पत्थर के विशाल जलाशयों के लिए प्रसिद्ध है?
- A.लोथल
- B.धौलावीरा
- C.रंगपुर
- D.सुरकोटदा
उत्तर देखें
धौलावीरा कच्छ के रण में खदिर बेट नामक द्वीप पर स्थित है। सामान्य हड़प्पा नगरों की दो भागों वाली रचना के विपरीत यह तीन भागों में बंटा है: दुर्ग, मध्य नगर और निचला नगर, और तीनों पत्थर की दीवारों से घिरे हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि के विषय में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
- A.यह वर्णमाला आधारित थी और पूरी तरह पढ़ी जा चुकी है
- B.यह चित्रात्मक थी, बुस्ट्रोफेडन शैली में लिखी जाती थी और आज तक अपठित है
- C.यह केवल बाएं से दाएं ब्राह्मी अक्षरों में लिखी जाती थी
- D.यह मेसोपोटामिया की कीलाक्षर लिपि से ज्यों की त्यों ली गई थी
उत्तर देखें
हड़प्पा लिपि में लगभग चार सौ चित्रनुमा चिह्न हैं और यह बुस्ट्रोफेडन शैली में लिखी जाती थी, अर्थात पहली पंक्ति दाएं से बाएं और अगली पंक्ति बाएं से दाएं, ठीक वैसे ही जैसे हल चलाते समय बैल मुड़ता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सिंधु घाटी सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता क्यों कहा जाता है?
पुरातत्व में किसी संस्कृति का नाम उस पहले स्थल पर रखा जाता है जहां वह पहचानी गई। रावी नदी के किनारे स्थित हड़प्पा की खुदाई 1921 में मोहनजोदड़ो से पहले हुई थी, इसलिए पूरी संस्कृति उसी के नाम से जानी जाती है। यह नाम अधिक सटीक भी है, क्योंकि लोथल, धौलावीरा और राखीगढ़ी जैसे अनेक स्थल सिंधु नदी से बहुत दूर हैं।
भारत में स्थित सबसे बड़ा हड़प्पाकालीन स्थल कौन सा है?
हरियाणा के हिसार जिले में स्थित राखीगढ़ी। कच्छ का धौलावीरा भारत का दूसरा बहुत बड़ा स्थल है, जो तीन भागों में बंटे नगर और पत्थर के जलाशयों के लिए प्रसिद्ध है। सर्वाधिक चर्चित नगर मोहनजोदड़ो और हड़प्पा वर्तमान पाकिस्तान में स्थित हैं।
क्या हड़प्पावासी लोहे का प्रयोग जानते थे?
नहीं। यह कांस्य युग की सभ्यता थी। इसके लोग तांबा, कांसा, सोना, चांदी और सीसा जानते थे तथा इनसे औजार, बर्तन, आभूषण और मूर्तियां बनाते थे, किंतु लोहा उनके लिए अज्ञात था। भारतीय उपमहाद्वीप में लोहे का प्रयोग उत्तर वैदिक काल में आरंभ हुआ, अर्थात हड़प्पा नगरों के उजड़ने के कई शताब्दियों बाद।
विशाल स्नानागार क्या है और कहां मिला है?
विशाल स्नानागार मोहनजोदड़ो के दुर्ग क्षेत्र में बना ईंटों का बड़ा जलकुंड है, जो लगभग बारह मीटर लंबा, सात मीटर चौड़ा और ढाई मीटर गहरा है। इसके दोनों सिरों पर सीढ़ियां हैं, चारों ओर छोटे कक्ष बने हैं और नीचे प्राकृतिक तारकोल की परत लगी है ताकि पानी रिसे नहीं। विद्वान इसे साधारण स्नान के बजाय धार्मिक स्नान का स्थान मानते हैं।
हड़प्पा लिपि अब तक क्यों नहीं पढ़ी जा सकी?
यह लिपि चित्रात्मक है, इसमें लगभग चार सौ चिह्न हैं और अभिलेख बहुत छोटे हैं, प्रायः मुहर पर केवल कुछ चिह्न। मिस्री चित्रलिपि की तरह कोई द्विभाषी अभिलेख नहीं मिला है जिससे तुलना की जा सके, और चिह्नों के पीछे की भाषा भी अज्ञात है। लिपि न पढ़े जाने के कारण ही इस सभ्यता को ऐतिहासिक नहीं, आद्य-ऐतिहासिक कहा जाता है।
स्रोत
- भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग-1 (कक्षा 12), अध्याय 1: ईंटें, मनके तथा अस्थियां — एनसीईआरटी
- हमारे अतीत भाग-1 (कक्षा 6), आरंभिक नगरों पर आधारित अध्याय — एनसीईआरटी





