हर्षवर्धन और दक्षिण भारतीय राज्य: शासक और प्रश्न
हर्षवर्धन और दक्षिण भारतीय राज्यों के परीक्षोपयोगी नोट्स: पुष्यभूति शासन, ह्वेनसांग, पुलकेशिन द्वितीय, पल्लव, पांड्य तथा पिछले वर्षों के प्रश्न।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 5 मिनट

हर्षवर्धन ने 606 ईस्वी से लगभग 647 ईस्वी तक उत्तर भारत पर शासन किया और वह राजपूत युग से पहले प्राचीन उत्तर भारत का अंतिम महान शासक माना जाता है। परीक्षाओं में उसे प्रायः बादामी के चालुक्य, कांची के पल्लव और मदुरै के पांड्य शासकों के साथ पूछा जाता है, क्योंकि ये चारों शक्तियाँ एक ही शताब्दी की हैं और हर्ष जो एकमात्र युद्ध हारा वह एक दक्षिण भारतीय राजा से हारा था। इस लेख में पहले हर्ष और फिर प्रत्येक दक्षिणी राजवंश को लिया गया है, उन शासकों, राजधानियों, अभिलेखों और स्मारकों के साथ जो प्रश्नपत्रों में बार-बार आते हैं।
पुष्यभूति वंश और हर्ष का राज्यारोहण
हर्ष पुष्यभूति या वर्धन वंश का था, जिसकी आरंभिक राजधानी वर्तमान हरियाणा का थानेश्वर थी। उसके पिता प्रभाकरवर्धन इस वंश के पहले शासक थे जिन्होंने साम्राज्यिक उपाधि ली। हर्ष के बड़े भाई राज्यवर्धन की हत्या बंगाल के गौड़ शासक शशांक ने की, और उसकी बहन राज्यश्री का विवाह कन्नौज के मौखरि शासक ग्रहवर्मन से हुआ था, जिसे मालवा के देवगुप्त ने मार डाला। हर्ष लगभग सोलह वर्ष की आयु में 606 ईस्वी में सिंहासन पर बैठा और हर्ष संवत् इसी वर्ष से गिना जाता है। उसने राज्यश्री को बचाया, थानेश्वर और कन्नौज को मिलाया तथा अपनी राजधानी कन्नौज कर ली, जो अगली दो शताब्दियों तक उत्तर भारत की सबसे बड़ी प्रतिष्ठा का केंद्र बनी रही।
विजय और नर्मदा पर रुकावट
हर्ष ने वर्षों अभियान चलाकर पंजाब, कन्नौज, बिहार, बंगाल और ओडिशा को अपने अधीन किया, इसीलिए उसके दरबारी लेखकों ने उसे उत्तरापथ का स्वामी कहा। दक्षिण की ओर उसका बढ़ना बादामी के चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय ने लगभग 618 ईस्वी में नर्मदा नदी के तट पर रोक दिया। यह पराजय हर्ष के अपने दरबार ने नहीं, बल्कि पुलकेशिन द्वितीय के ऐहोल अभिलेख ने दर्ज की है, जिसकी रचना जैन कवि रविकीर्ति ने की थी। अभिलेख की यही एक पंक्ति पूरे विषय का सर्वाधिक पूछा जाने वाला तथ्य है, और सामान्य भूल यह होती है कि इस विजय का श्रेय किसी पल्लव या राष्ट्रकूट राजा को दे दिया जाए।
प्रशासन और ह्वेनसांग का विवरण
चीनी यात्री ह्वेनसांग, जिसका नाम शुआनजांग भी लिखा जाता है, 629 से 645 ईस्वी के बीच भारत में रहा और कई वर्ष हर्ष के दरबार में बिताए। उसकी पुस्तक सी-यू-की, अर्थात पश्चिमी जगत का विवरण, बाणभट्ट के हर्षचरित के साथ इस काल का मुख्य स्रोत है। वह बताता है कि भूमिकर उपज का लगभग छठा भाग था, अधिकारियों को नकद वेतन के स्थान पर भूमि अनुदान दिए जाते थे, और मार्ग गुप्तकाल की तुलना में कम सुरक्षित थे, क्योंकि गंगा के मार्ग पर स्वयं उसे लूट लिया गया था। हर्ष लगातार अपने साम्राज्य में भ्रमण करता रहता था, उसने महायान बौद्ध धर्म के सम्मान में कन्नौज में एक विशाल सभा की और प्रयाग में प्रत्येक पाँचवें वर्ष होने वाली सभा में अपना कोष दान कर दिया।
हर्षकालीन साहित्य और शिक्षा
हर्ष स्वयं लेखक था। संस्कृत के तीन नाटक उसके नाम से जुड़े हैं: रत्नावली, प्रियदर्शिका और नागानंद। उसके दरबारी कवि बाणभट्ट ने हर्षचरित लिखा, जो संस्कृत का पहला ऐतिहासिक जीवनचरित माना जाता है, और गद्य कथा कादंबरी भी लिखी। हर्ष ने नालंदा महाविहार को अनुदान दिया, जहाँ ह्वेनसांग ने आचार्य शीलभद्र के अधीन अध्ययन किया। मधुबन और बाँसखेड़ा से प्राप्त दो ताम्रपत्र उसके आदेश सुरक्षित रखते हैं, और बाँसखेड़ा ताम्रपत्र पर स्वयं हर्ष के हस्ताक्षर हैं।
बादामी के चालुक्य
चालुक्यों ने वातापि, अर्थात कर्नाटक के आधुनिक बादामी से शासन किया। इस वंश की नींव पुलकेशिन प्रथम ने रखी। लगभग 609 से 642 ईस्वी तक शासन करने वाला पुलकेशिन द्वितीय इसका सबसे बड़ा राजा था: उसने हर्ष को हराया, फारस के शासक खुसरो द्वितीय का दूतमंडल प्राप्त किया, और अंत में पल्लव नरसिंहवर्मन प्रथम ने वातापि पर अधिकार करते हुए उसे पराजित कर मार डाला। चालुक्यों ने बादामी की गुफाएँ, ऐहोल के प्रयोगात्मक मंदिर और पट्टदकल का मंदिर समूह छोड़ा, जो यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है। पुलकेशिन द्वितीय के भाई कुब्ज विष्णुवर्धन ने वेंगी में पूर्वी चालुक्य शाखा की स्थापना की। बादामी वंश का अंत राष्ट्रकूट दंतिदुर्ग ने किया, जिसने लगभग 753 ईस्वी में कीर्तिवर्मन द्वितीय को अपदस्थ किया।
कांची के पल्लव
पल्लवों ने कांचीपुरम से तमिल प्रदेश पर शासन किया। महेंद्रवर्मन प्रथम ने पल्लव स्थापत्य के शैलकृत चरण की शुरुआत की और व्यंग्य नाटक मत्तविलास प्रहसन लिखा; संत अप्पर के प्रभाव से उसने जैन धर्म छोड़कर शैव मत अपनाया। उसके पुत्र नरसिंहवर्मन प्रथम, जिसे मामल्ल कहा जाता है, ने 642 ईस्वी में वातापि पर अधिकार करके पिता का बदला लिया और वातापिकोंड अर्थात वातापि का विजेता उपाधि धारण की; महाबलीपुरम के एकाश्म रथ उसी के काल के हैं। नरसिंहवर्मन द्वितीय राजसिंह ने महाबलीपुरम का तटीय मंदिर और कांचीपुरम का कैलाशनाथ मंदिर बनवाया। अंतिम पल्लव अपराजित को चोल राजा आदित्य प्रथम ने पराजित किया।
पांड्य और तमिल भक्ति संत
पांड्य मदुरै से शासन करते थे, कोरकई बंदरगाह का उपयोग करते थे और अपने मोतियों के लिए प्रसिद्ध थे; कलभ्र अंतराल के बाद छठी शताब्दी में कडुंगोन ने इस वंश को पुनर्जीवित किया। इन्हीं शताब्दियों में तमिल भक्ति आंदोलन उभरा। तिरसठ नयनार शिव के भक्त थे और बारह आलवार विष्णु के। नयनारों के भजनों का संग्रह तेवारम कहलाता है और आलवारों के भजनों का संग्रह नालायिर दिव्य प्रबंधम्।
चारों शक्तियाँ एक दृष्टि में
| राजवंश | राजधानी | महानतम शासक | किसके लिए प्रसिद्ध |
|---|---|---|---|
| पुष्यभूति | थानेश्वर, बाद में कन्नौज | हर्षवर्धन | हर्षचरित, ह्वेनसांग, प्रयाग सभा |
| बादामी के चालुक्य | वातापि (बादामी) | पुलकेशिन द्वितीय | ऐहोल अभिलेख, पट्टदकल मंदिर |
| पल्लव | कांचीपुरम | नरसिंहवर्मन प्रथम | महाबलीपुरम के रथ, वातापिकोंड उपाधि |
| पांड्य | मदुरै | कडुंगोन (पुनरुद्धारक) | मोती, कोरकई बंदरगाह, तमिल भक्ति |
हर्ष के बाद
हर्ष की मृत्यु लगभग 647 ईस्वी में हुई और उसका कोई उत्तराधिकारी नहीं था, इसलिए साम्राज्य तुरंत बिखर गया। अरुणाश्व नामक एक मंत्री ने सत्ता हथिया ली और चीनी दूत वांग-ह्वेन-त्से पर आक्रमण किया, जो तिब्बती और नेपाली सैनिकों के साथ लौटा और उसे बंदी बनाकर चीन ले गया। इसके बाद उत्तर भारत उन क्षेत्रीय राज्यों में बँट गया जिनका कन्नौज के लिए संघर्ष पाठ्यक्रम के अगले अध्याय का विषय है।
परीक्षा की दृष्टि से
इस विषय से चार प्रकार के प्रश्न बनते हैं। पहला, हर्ष का व्यक्तिगत विवरण: 606 ईस्वी, थानेश्वर से कन्नौज, बाणभट्ट, ह्वेनसांग और तीन नाटक। दूसरा, नर्मदा की पराजय, जिसमें पुलकेशिन द्वितीय और रविकीर्ति का ऐहोल अभिलेख उत्तर बनते हैं। तीसरा, राजवंश और राजधानी के जोड़े: चालुक्य के साथ वातापि, पल्लव के साथ कांचीपुरम, पांड्य के साथ मदुरै। चौथा, स्मारक और निर्माता के जोड़े: महाबलीपुरम के रथ नरसिंहवर्मन प्रथम, तटीय मंदिर और कैलाशनाथ नरसिंहवर्मन द्वितीय, तथा पट्टदकल चालुक्यों से जुड़े हैं। सामान्य भूलें ये हैं कि समुद्रगुप्त के कवि हरिषेण को हर्ष का कवि मान लिया जाए, हर्षचरित को स्वयं हर्ष की रचना समझ लिया जाए, या चंद्रगुप्त द्वितीय के समय आए फाह्यान को ह्वेनसांग से मिला दिया जाए।
महत्वपूर्ण तथ्य
| राजवंश | थानेश्वर का पुष्यभूति या वर्धन वंश |
|---|---|
| हर्ष का शासनकाल | 606 ईस्वी से लगभग 647 ईस्वी; हर्ष संवत् 606 ईस्वी से |
| राजधानी | पहले थानेश्वर, बाद में कन्नौज |
| दरबारी कवि | बाणभट्ट, हर्षचरित और कादंबरी के लेखक |
| हर्ष के नाटक | रत्नावली, प्रियदर्शिका और नागानंद |
| चीनी यात्री | ह्वेनसांग (शुआनजांग), भारत में 629-645 ईस्वी, सी-यू-की का लेखक |
| किससे पराजित | बादामी के पुलकेशिन द्वितीय से, नर्मदा तट पर, लगभग 618 ईस्वी |
| ऐहोल अभिलेख | पुलकेशिन द्वितीय के दरबारी कवि रविकीर्ति की रचना |
| पल्लव राजधानी | कांचीपुरम; बंदरगाह महाबलीपुरम |
| वातापिकोंड | 642 ईस्वी में वातापि जीतने पर नरसिंहवर्मन प्रथम की उपाधि |
| पांड्य राजधानी और बंदरगाह | मदुरै, तथा मोतियों का बंदरगाह कोरकई |
| तमिल भक्ति संत | शिव के 63 नयनार और विष्णु के 12 आलवार |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
हर्षवर्धन के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही नहीं है?
- A.हर्षवर्धन ने लगभग 1400 वर्ष पूर्व शासन किया था
- B.ह्वेनसांग ने हर्ष के दरबार में बहुत समय बिताया
- C.हर्षवर्धन का दरबारी कवि हरिषेण था
- D.हर्षचरित हर्षवर्धन पर लिखी गई जीवनी है
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. हर्षवर्धन का दरबारी कवि हरिषेण था
व्याख्या
सही उत्तर C है, क्योंकि हर्षवर्धन का दरबारी कवि बाणभट्ट था, हरिषेण नहीं। हरिषेण तो कहीं पहले की शताब्दी का है: वह समुद्रगुप्त का दरबारी कवि था और उसने प्रयाग प्रशस्ति अर्थात इलाहाबाद स्तंभ अभिलेख की रचना की थी। इसलिए यही कथन गलत है, और प्रश्न गलत कथन ही पूछ रहा है।
विकल्प A सही कथन है, क्योंकि हर्ष ने 606 ईस्वी से लगभग 647 ईस्वी तक शासन किया, जो आज से लगभग चौदह सौ वर्ष पूर्व का काल है। विकल्प B भी सही है, क्योंकि चीनी यात्री ह्वेनसांग 629 से 645 ईस्वी के बीच भारत में रहा और कई वर्ष हर्ष के दरबार में बिताए, जिसका विवरण उसकी पुस्तक सी-यू-की में है। विकल्प D भी सही है, क्योंकि हर्षचरित बाणभट्ट द्वारा लिखी गई हर्ष की जीवनी है और इसे संस्कृत का पहला ऐतिहासिक जीवनचरित माना जाता है।
राजा शशांक, जिसके विरुद्ध हर्षवर्धन ने युद्ध की घोषणा की, किस राज्य का शासक था?
- A.कान्यकुब्ज
- B.जूनागढ़
- C.मगध
- D.गौड़
उत्तर देखें
सही उत्तर: D. गौड़
व्याख्या
सही उत्तर D, गौड़ है। शशांक गौड़ का राजा था, अर्थात बंगाल का वह क्षेत्र जिसका केंद्र कर्णसुवर्ण था। उसने हर्ष के बड़े भाई राज्यवर्धन की हत्या की थी, और इसी हत्या का बदला लेने तथा अपनी बहन राज्यश्री को वापस पाने के लिए हर्ष ने युद्ध की घोषणा की और कामरूप के भास्करवर्मन से संधि की।
विकल्प A, कान्यकुब्ज, कन्नौज का प्राचीन नाम है, जो मौखरि राजधानी थी और जिसे हर्ष ने स्वयं अपनी राजधानी बनाया, अतः वह हर्ष का शत्रु राज्य नहीं था। विकल्प B, जूनागढ़, गुजरात के सौराष्ट्र का स्थान है, जो अशोक के शिलालेख तथा रुद्रदामन और स्कंदगुप्त के अभिलेखों के लिए जाना जाता है और शशांक से इसका कोई संबंध नहीं। विकल्प C, मगध, दक्षिण बिहार का राज्य है जहाँ हर्यंक, नंद, मौर्य और गुप्त शासक हुए; हर्ष के समय यह उसके ही साम्राज्य का भाग था।
निम्नलिखित में से कौन सी पुस्तक हर्षवर्धन द्वारा लिखी गई थी?
- A.हर्षचरित
- B.कादंबरी
- C.रत्नावली
- D.गीतगोविंद
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. रत्नावली
व्याख्या
सही उत्तर C, रत्नावली है। हर्षवर्धन राजा के साथ-साथ नाटककार भी था और संस्कृत के तीन नाटक उसके नाम से जुड़े हैं: रत्नावली, प्रियदर्शिका और नागानंद। रत्नावली राजा उदयन और रत्नावली की प्रेमकथा पर आधारित दरबारी नाटिका है और प्रश्नपत्रों में यही रचना सबसे अधिक पूछी जाती है।
विकल्प A, हर्षचरित, हर्ष के बारे में अवश्य है किंतु उसकी लिखी हुई नहीं; यह उसके दरबारी कवि बाणभट्ट की रचना है। विकल्प B, कादंबरी, भी बाणभट्ट की ही रचना है, जो उसकी मृत्यु के कारण अधूरी रह गई और उसके पुत्र ने पूरी की। विकल्प D, गीतगोविंद, बहुत बाद की रचना है: इसे बारहवीं शताब्दी में बंगाल के सेन राजा लक्ष्मणसेन के दरबार में जयदेव ने लिखा और इसमें राधा-कृष्ण का वर्णन है। अतः केवल रत्नावली ही राजा की अपनी कृति है।
अपनी साहित्यिक कृतियों के लिए प्रसिद्ध 'बाणभट्ट' किसके शासनकाल में हुआ?
- A.अशोक
- B.बिंदुसार
- C.चंद्रगुप्त द्वितीय
- D.हर्षवर्धन
उत्तर देखें
सही उत्तर: D. हर्षवर्धन
व्याख्या
सही उत्तर D, हर्षवर्धन है। बाणभट्ट सातवीं शताब्दी ईस्वी में हर्ष का दरबारी कवि था। उसने अपने आश्रयदाता की जीवनी हर्षचरित लिखी, जो संस्कृत का पहला ऐतिहासिक जीवनचरित है, तथा गद्य कथा कादंबरी लिखी, जिसे उसके पुत्र भूषणभट्ट ने पूरा किया।
विकल्प A, अशोक, तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व का शासक था, अर्थात नौ सौ वर्ष पहले का, और उसके अभिलेख प्राकृत में हैं, संस्कृत दरबारी काव्य में नहीं। विकल्प B, बिंदुसार, अशोक का पिता और उससे भी पहले का मौर्य शासक था। विकल्प C, गुप्त शासक चंद्रगुप्त द्वितीय, लगभग 375 से 415 ईस्वी तक रहा; परंपरा में उसके दरबार से कालिदास सहित नवरत्न जोड़े जाते हैं, जबकि उसके पिता समुद्रगुप्त के अभिलेख का कवि हरिषेण था। बाणभट्ट इनमें से किसी दरबार का नहीं, केवल हर्ष के दरबार का है।
हर्षवर्धन की पराजय का उल्लेख करने वाला ऐहोल अभिलेख किस शासक के दरबारी कवि ने रचा था?
- A.नरसिंहवर्मन प्रथम
- B.पुलकेशिन द्वितीय
- C.दंतिदुर्ग
- D.महेंद्रवर्मन प्रथम
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. पुलकेशिन द्वितीय
व्याख्या
सही उत्तर B, पुलकेशिन द्वितीय है। ऐहोल अभिलेख की रचना संस्कृत में बादामी के चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय के जैन दरबारी कवि रविकीर्ति ने की थी। इसमें उसकी विजयों की प्रशंसा है और कहा गया है कि उत्तरापथ के स्वामी हर्ष का हर्ष तब जाता रहा जब युद्ध में उसके हाथी मारे गए; लगभग 618 ईस्वी में नर्मदा पर हुई हर्ष की पराजय का यही एकमात्र अभिलेखीय साक्ष्य है।
विकल्प A, नरसिंहवर्मन प्रथम, वह पल्लव राजा था जिसने बाद में वातापि जीतकर पुलकेशिन द्वितीय को मारा, किंतु यह अभिलेख उसका नहीं है। विकल्प C, दंतिदुर्ग, राष्ट्रकूट शासक था जिसने लगभग 753 ईस्वी में चालुक्य सत्ता समाप्त की, अर्थात अभिलेख के एक शताब्दी से भी अधिक बाद। विकल्प D, महेंद्रवर्मन प्रथम, नरसिंहवर्मन प्रथम का पिता और मत्तविलास प्रहसन का लेखक था; पुलकेशिन द्वितीय ने उसे हराया था, इसलिए वह अपने प्रतिद्वंद्वी की प्रशस्ति क्यों लिखवाता।
हर्षवर्धन ने अपनी राजधानी थानेश्वर से हटाकर किस नगर में स्थापित की?
- A.पाटलिपुत्र
- B.कन्नौज
- C.उज्जैन
- D.प्रयाग
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. कन्नौज
व्याख्या
सही उत्तर B, कन्नौज है। हर्ष को पुष्यभूति वंश से आधुनिक हरियाणा का थानेश्वर विरासत में मिला था। जब उसकी बहन राज्यश्री के पति ग्रहवर्मन, जो कन्नौज का मौखरि शासक था, मारे गए, तब हर्ष ने दोनों राज्यों को मिलाकर गंगा तट पर स्थित कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया, और अगली दो शताब्दियों तक कन्नौज उत्तर भारत की सर्वोच्चता का प्रतीक बना रहा।
विकल्प A, पाटलिपुत्र, मौर्यों और गुप्तों की राजधानी अवश्य रहा, किंतु हर्ष के समय तक उसका महत्व घट चुका था। विकल्प C, उज्जैन, अवंति का प्रसिद्ध नगर और गुप्तों का प्रांतीय केंद्र था, पर हर्ष की राजधानी कभी नहीं रहा। विकल्प D, प्रयाग, गंगा और यमुना के संगम पर वह स्थान है जहाँ हर्ष प्रत्येक पाँचवें वर्ष सभा करके अपना कोष दान करता था, अर्थात वह उसका धार्मिक केंद्र था, शासन का केंद्र नहीं।
महाबलीपुरम के एकाश्म रथों का निर्माण किस पल्लव शासक के काल में हुआ?
- A.सिंहविष्णु
- B.महेंद्रवर्मन प्रथम
- C.नरसिंहवर्मन प्रथम
- D.अपराजित
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. नरसिंहवर्मन प्रथम
व्याख्या
सही उत्तर C, नरसिंहवर्मन प्रथम है। उसे मामल्ल अर्थात महान मल्ल भी कहा जाता है, और इसी उपाधि पर बंदरगाह नगर मामल्लपुरम या महाबलीपुरम का नाम पड़ा। वहाँ के पाँच एकाश्म रथ, जिनमें से प्रत्येक एक ही चट्टान से तराशा गया है और जिनके नाम पांडवों तथा द्रौपदी पर हैं, सातवीं शताब्दी के मध्य में उसी के शासनकाल के हैं।
विकल्प A, सिंहविष्णु, आरंभिक पल्लव शासक था जिसने तमिल प्रदेश पर कलभ्रों की पकड़ समाप्त की, किंतु इस प्रकार का कोई स्मारक नहीं छोड़ा। विकल्प B, महेंद्रवर्मन प्रथम, ने पल्लव स्थापत्य के शैलकृत गुफा चरण की शुरुआत की, जैसे मंडगपट्टु के मंडप, पर स्वतंत्र रथ नहीं बनवाए। विकल्प D, अपराजित, अंतिम पल्लव राजा था जिसे नौवीं शताब्दी में चोल आदित्य प्रथम ने हराया। बाद का संरचनात्मक तटीय मंदिर नरसिंहवर्मन द्वितीय राजसिंह ने बनवाया।
महाबलीपुरम का तटीय मंदिर और कांचीपुरम का कैलाशनाथ मंदिर किस शासक ने बनवाया?
- A.नरसिंहवर्मन द्वितीय राजसिंह
- B.पुलकेशिन द्वितीय
- C.कृष्ण प्रथम
- D.राजराज प्रथम
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. नरसिंहवर्मन द्वितीय राजसिंह
व्याख्या
सही उत्तर A, नरसिंहवर्मन द्वितीय राजसिंह है। उसका शासन आठवीं शताब्दी के आरंभ में था और उसी से पल्लव स्थापत्य का संरचनात्मक चरण आरंभ होता है, जब मंदिर चट्टान काटकर नहीं, बल्कि तराशे हुए पत्थरों को जोड़कर बनाए जाने लगे। महाबलीपुरम का समुद्र तट पर स्थित तटीय मंदिर और कांचीपुरम का कैलाशनाथ मंदिर दोनों उसी के बनवाए हुए हैं।
विकल्प B, पुलकेशिन द्वितीय, बादामी का चालुक्य राजा था जो हर्ष को हराने के लिए प्रसिद्ध है, और उसके वंश ने ऐहोल, बादामी तथा पट्टदकल में निर्माण कराया। विकल्प C, कृष्ण प्रथम, वह राष्ट्रकूट शासक था जिसने आठवीं शताब्दी में एलोरा का कैलाश मंदिर एक ही पहाड़ी से तराशवाया, और समान नाम के कारण इसे प्रायः कांचीपुरम वाले मंदिर से मिला दिया जाता है। विकल्प D, राजराज प्रथम, वह चोल शासक था जिसने लगभग 1010 ईस्वी में तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर बनवाया, अर्थात तीन शताब्दी बाद।
किस चीनी यात्री ने नालंदा में आचार्य शीलभद्र के अधीन अध्ययन किया था?
- A.फाह्यान
- B.ह्वेनसांग
- C.इत्सिंग
- D.वांग-ह्वेन-त्से
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. ह्वेनसांग
व्याख्या
सही उत्तर B, ह्वेनसांग है। वह 630 ईस्वी में भारत पहुँचा, लगभग पंद्रह वर्ष यहाँ रहा और नालंदा महाविहार में उसके वयोवृद्ध प्रमुख आचार्य शीलभद्र के अधीन योगाचार दर्शन का अध्ययन किया। उसका यात्रा विवरण सी-यू-की हर्ष के साम्राज्य का सबसे विस्तृत उपलब्ध वर्णन है।
विकल्प A, फाह्यान, दो शताब्दी पहले गुप्त शासक चंद्रगुप्त द्वितीय के समय आया था, और तब नालंदा वह विश्वविद्यालय बना ही नहीं था जिसका श्रेय उसे कभी-कभी दे दिया जाता है। विकल्प C, इत्सिंग, सातवीं शताब्दी में बाद में आया, अर्थात हर्ष की मृत्यु के पश्चात, और उसने मठीय अनुशासन तथा सुमात्रा होकर जाने वाले समुद्री मार्ग पर लिखा। विकल्प D, वांग-ह्वेन-त्से, यात्री नहीं बल्कि चीनी राजदूत था; वह हर्ष की मृत्यु के बाद आया, अरुणाश्व ने उस पर आक्रमण किया और वह तिब्बती तथा नेपाली सैनिकों के साथ लौटकर उसे पराजित कर गया।
आरंभिक मध्यकाल में पांड्य राज्य की राजधानी कौन सा नगर थी?
- A.कांचीपुरम
- B.मदुरै
- C.वातापि
- D.तंजावुर
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. मदुरै
व्याख्या
सही उत्तर B, मदुरै है। पांड्य प्रायद्वीप के अत्यंत दक्षिणी भाग पर वैगई नदी के तट पर बसे मदुरै से शासन करते थे, और तट पर उनका मोती निकालने वाला बंदरगाह कोरकई था। छठी शताब्दी में कडुंगोन ने इस वंश को पुनर्जीवित किया और कलभ्र अंतराल समाप्त करने में भूमिका निभाई; पल्लव और चोल शताब्दियों में भी मदुरै उनकी राजधानी बना रहा।
विकल्प A, कांचीपुरम, उत्तरी तमिल प्रदेश में पल्लवों की राजधानी थी, जो कैलाशनाथ मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। विकल्प C, वातापि, अर्थात कर्नाटक का आधुनिक बादामी, चालुक्यों की राजधानी थी, जिन्होंने पल्लवों और हर्ष दोनों से युद्ध किया। विकल्प D, तंजावुर, बाद में महत्वपूर्ण हुआ, जब नौवीं शताब्दी में विजयालय से आरंभ होकर वह साम्राज्यवादी चोलों की राजधानी बना और राजराज प्रथम के बृहदेश्वर मंदिर के लिए जाना गया।
शिव की स्तुति में भजन रचने वाले तिरसठ तमिल संत किस नाम से जाने जाते हैं?
- A.आलवार
- B.नयनार
- C.सिद्धार
- D.आचार्य
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. नयनार
व्याख्या
सही उत्तर B, नयनार है। नयनार तमिल भक्ति आंदोलन के शैव संत थे, जिनकी परंपरागत संख्या तिरसठ मानी जाती है, और इनमें अप्पर, संबंदर, सुंदरर तथा माणिक्कवाचकर सम्मिलित हैं। उनके भजनों का संग्रह तेवारम कहलाता है, और उनकी भक्ति ने साधारण जन को जैन तथा बौद्ध मत से हटाकर मंदिर पूजा की ओर मोड़ा।
विकल्प A, आलवार, इनके वैष्णव समकक्ष थे, जिनकी संख्या बारह है और जिनके विष्णु विषयक भजन नालायिर दिव्य प्रबंधम् बनाते हैं; आंडाल उनमें एकमात्र स्त्री संत हैं। विकल्प C, सिद्धार, तमिल की एक अलग रहस्यवादी और चिकित्सा परंपरा के साधक थे, इस प्रकार के मंदिर भजनकार नहीं। विकल्प D, आचार्य, जैसे नाथमुनि और रामानुज, बाद में हुए और वे वैष्णव दर्शन को व्यवस्थित करने वाले शिक्षक थे, न कि गाने वाले संत। नयनार और आलवार का शिव-विष्णु जोड़ा ही परीक्षा में पूछा जाता है।
बादामी के चालुक्य वंश का अंत किस शासक ने किया?
- A.दंतिदुर्ग
- B.आदित्य प्रथम
- C.भास्करवर्मन
- D.कुब्ज विष्णुवर्धन
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. दंतिदुर्ग
व्याख्या
सही उत्तर A, दंतिदुर्ग है। वह राष्ट्रकूट शक्ति का संस्थापक था और उसने लगभग 753 ईस्वी में बादामी के अंतिम प्रमुख चालुक्य शासक कीर्तिवर्मन द्वितीय को अपदस्थ कर दिया। इसके बाद राष्ट्रकूटों ने मान्यखेट से दक्कन पर शासन किया और एलोरा का शैलकृत कैलाश मंदिर छोड़ा, जिसका निर्माण दंतिदुर्ग के उत्तराधिकारी कृष्ण प्रथम के समय आरंभ हुआ।
विकल्प B, आदित्य प्रथम, नौवीं शताब्दी का चोल राजा था जिसने अंतिम पल्लव अपराजित को हराया, किसी चालुक्य को नहीं। विकल्प C, भास्करवर्मन, असम के कामरूप का राजा और शशांक के विरुद्ध हर्ष का मित्र था, और उसने दक्कन में कभी अभियान नहीं किया। विकल्प D, कुब्ज विष्णुवर्धन, पुलकेशिन द्वितीय का भाई था जिसने तटीय आंध्र के वेंगी में पूर्वी चालुक्य शाखा की स्थापना की; उसने वंश की शक्ति बढ़ाई, समाप्त नहीं की।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
हर्षवर्धन को किसने और कहाँ पराजित किया?
बादामी के चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय ने लगभग 618 ईस्वी में नर्मदा नदी के तट पर हर्ष को पराजित किया। इस विजय का उल्लेख पुलकेशिन के दरबारी कवि रविकीर्ति द्वारा रचित ऐहोल अभिलेख में मिलता है, हर्ष के अपने किसी अभिलेख में नहीं।
हर्षचरित की रचना किसने की?
हर्षवर्धन के दरबारी कवि बाणभट्ट ने। इसे संस्कृत का पहला ऐतिहासिक जीवनचरित माना जाता है। बाण ने गद्य कथा कादंबरी भी लिखी। स्वयं हर्ष ने रत्नावली, प्रियदर्शिका और नागानंद नाटक लिखे थे।
हर्ष के शासनकाल में कौन सा चीनी यात्री भारत आया?
ह्वेनसांग, जिसे शुआनजांग भी लिखा जाता है, जो 629 से 645 ईस्वी के बीच भारत में रहा। उसने नालंदा में आचार्य शीलभद्र के अधीन अध्ययन किया और अपनी पुस्तक सी-यू-की में साम्राज्य का विस्तृत विवरण दिया।
नरसिंहवर्मन प्रथम को वातापिकोंड क्यों कहा जाता है?
क्योंकि उसने 642 ईस्वी में चालुक्य राजधानी वातापि, अर्थात आधुनिक बादामी, पर अधिकार कर लिया और पुलकेशिन द्वितीय को मार डाला, जिससे कांची पर हुए पहले के चालुक्य आक्रमण का बदला लिया गया। वातापिकोंड का अर्थ है वातापि का विजेता। उसे मामल्ल भी कहते हैं, जिसके नाम पर महाबलीपुरम बसा।
कलभ्र अंतराल क्या था?
यह तमिल प्रदेश में लगभग तीसरी से छठी शताब्दी ईस्वी तक का अल्पज्ञात काल है, जो संगम युग तथा पल्लव और परवर्ती पांड्य शासन के बीच पड़ता है, जब कलभ्र नामक समूह सत्ता में था। पांड्य कडुंगोन और पल्लव सिंहविष्णु ने इस काल का अंत किया।
स्रोत
- हमारे अतीत भाग एक (कक्षा छह), नए साम्राज्य और राज्य अध्याय — एनसीईआरटी
- भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग एक (कक्षा बारह), आरंभिक राज्य और शासक — एनसीईआरटी
- विश्व धरोहर सूची: पट्टदकल और महाबलीपुरम के स्मारक समूह — यूनेस्को
- बादामी, ऐहोल, कांचीपुरम और महाबलीपुरम के संरक्षित स्मारक — भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण





