प्राचीन और मध्यकालीन भारतीय शासकों की उपाधियां
अशोक, समुद्रगुप्त, कनिष्क, दिल्ली सुल्तान, मुगल, चोल और विजयनगर शासकों की प्रमुख उपाधियां, उनके अर्थ और परीक्षा में बार-बार पूछे जाने वाले शासक उपाधि युग्म।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 5 मिनट

भारतीय इतिहास में उपाधि केवल अलंकार नहीं, लिखित दावा है। जो शासक स्वयं को समस्त राजाओं का उच्छेदक कहता है, वह विजय की नीति की घोषणा कर रहा है; जो स्वयं को ईश्वर की छाया कहता है, वह उन सरदारों को उत्तर दे रहा है जो सुल्तान को बराबरी वालों में पहला मानते थे। परीक्षक के लिए उपाधियां सबसे सस्ता एक अंक का प्रश्न हैं, क्योंकि प्रत्येक उपाधि ठीक एक नाम से जुड़ी है। इस नोट में वही उपाधियां वंश के क्रम से दी गई हैं जो प्रश्नपत्रों में वास्तव में पूछी जाती हैं, साथ में वह अर्थ भी जो उन्हें याद रखने में सहायता करता है।
शासक उपाधियां क्यों लेते थे
उपाधियां तीन स्रोतों से आती थीं। शासक स्वयं कोई उपाधि ले सकता था, सामान्यतः राज्याभिषेक पर या किसी विजय के बाद, जैसे पुलकेशिन द्वितीय ने हर्ष को पराजित करने के बाद परमेश्वर जोड़ा। कोई श्रेष्ठ सत्ता उपाधि प्रदान कर सकती थी: बगदाद के अब्बासी खलीफा ने इल्तुतमिश को मंसूर भेजा, और जहांगीर ने मेहरुन्निसा को नूरजहां तथा बैरम खां को खान-ए-खानां की उपाधि दी। तीसरे, बाद के लेखकों और इतिहासकारों ने अपनी ओर से नाम जोड़े, इसीलिए समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहा जाता है, जबकि उसके किसी अभिलेख में यह शब्द नहीं है। इन तीनों प्रकारों को अलग रखें, क्योंकि प्रश्न अक्सर यह पूछता है कि उपाधि किसने दी, न कि किसने धारण की।
प्राचीन भारतीय शासकों की उपाधियां
| शासक | वंश | उपाधि | अर्थ |
|---|---|---|---|
| बिंदुसार | मौर्य | अमित्रघात | शत्रुओं का नाश करने वाला, यूनानी रूप अमित्रोचेट्स से |
| अशोक | मौर्य | देवानांप्रिय, प्रियदस्सी | देवताओं का प्रिय, सुदर्शन; उसके अभिलेखों में यही नाम हैं |
| खारवेल | कलिंग का चेदि वंश | भिखुराज | भिक्षु राजा, हाथीगुंफा अभिलेख से |
| गौतमीपुत्र सातकर्णि | सातवाहन | एकब्राह्मण, त्रिसमुद्रतोयपीतवाहन | अद्वितीय ब्राह्मण; जिसके घोड़ों ने तीन समुद्रों का जल पिया |
| कनिष्क | कुषाण | देवपुत्र, शाओनानोशाओ | ईश्वर का पुत्र; राजाओं का राजा, उसके सिक्कों पर |
| चंद्रगुप्त प्रथम | गुप्त | महाराजाधिराज | राजाओं का महान राजा, गुप्त वंश में इसे लेने वाला प्रथम |
| समुद्रगुप्त | गुप्त | कविराज, सर्वराजोच्छेत्ता | कवियों का राजा; समस्त राजाओं का उच्छेदक, प्रयाग प्रशस्ति से |
| चंद्रगुप्त द्वितीय | गुप्त | विक्रमादित्य, सिंहविक्रम | पराक्रम का सूर्य; सिंह के समान पराक्रमी |
| कुमारगुप्त प्रथम | गुप्त | महेंद्रादित्य | महेंद्रों में सूर्य |
| हर्षवर्धन | पुष्यभूति | शिलादित्य, सकलोत्तरपथनाथ | आचरण का सूर्य; समस्त उत्तरापथ का स्वामी |
| पुलकेशिन द्वितीय | बादामी का चालुक्य | सत्याश्रय, परमेश्वर | सत्य का आश्रय; परम स्वामी, हर्ष को हराने के बाद |
दिल्ली सल्तनत की उपाधियां
सल्तनत की उपाधियां वैधता का प्रश्न हैं। कुतुबुद्दीन ऐबक को उसके दान के कारण लाख बख्श कहा गया। इल्तुतमिश दिल्ली का पहला सुल्तान था जिसे बगदाद के अब्बासी खलीफा से मंसूर यानी स्वीकृति पत्र मिला, और इसीलिए उसने खलीफा के नायब की शैली अपनाई। रजिया दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाली प्रथम और एकमात्र महिला शासक थीं। कमजोर सल्तनत को संभालते हुए बलबन ने सबसे बड़े दावे किए: जिल्ले इलाही यानी ईश्वर की छाया, और नियाबते खुदाई यानी ईश्वर का प्रतिनिधि, जिनके साथ उसने सिजदा और पायबोस की ईरानी दरबारी प्रथाएं भी चलाईं। अलाउद्दीन खिलजी ने अपने सिक्कों पर सिकंदर-ए-सानी यानी दूसरा सिकंदर अंकित कराया और स्वयं को यामिन-उल-खिलाफत कहा, फिर भी खलीफा से स्वीकृति कभी नहीं मांगी। गद्दी से पहले उसका नाम अली गुरशास्प था, जैसे मुहम्मद बिन तुगलक जूना खां और बलबन स्वयं उलुग खां कहलाता था।
मुगलों के नाम और उपाधियां
| वास्तविक नाम | उपाधि या शासकीय नाम | याद रखने की बात |
|---|---|---|
| जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर | पादशाह | तैमूरी मिर्जा शैली छोड़कर पादशाह की उपाधि ली |
| सलीम, अकबर का पुत्र | नूरुद्दीन मुहम्मद जहांगीर | जगत को जीतने वाला, 1605 में गद्दी पर लिया गया नाम |
| मेहरुन्निसा | नूरमहल, फिर नूरजहां | महल का प्रकाश, फिर जगत का प्रकाश; जहांगीर द्वारा प्रदत्त |
| अर्जुमंद बानो बेगम | मुमताज महल | महल की चुनी हुई, शाहजहां की बेगम |
| खुर्रम | शाहजहां | जगत का राजा, दक्कन अभियान के बाद जहांगीर द्वारा प्रदत्त |
| औरंगजेब | आलमगीर | जगत का विजेता; सादा जीवन के कारण जिंदा पीर भी कहा गया |
| फरीद खां | शेर खां, बाद में शेरशाह | शेर मारने पर शेर खां की उपाधि मिली, सूर वंश की स्थापना से पहले |
| हेमचंद्र | हेमू विक्रमादित्य | 1556 में दिल्ली में प्राचीन भारतीय उपाधि विक्रमादित्य धारण की |
क्षेत्रीय राज्यों की उपाधियां
- चोल शासक राजराज प्रथम ने चेर, चोल और पांड्य प्रदेशों की विजय के बाद मुम्मुडि चोल यानी तीन मुकुटों वाला चोल की उपाधि ली।
- राजेंद्र प्रथम ने उत्तरी अभियान के बाद गंगैकोंड चोल और श्रीविजय अभियान के बाद कडारम कोंडन की उपाधि धारण की।
- पल्लव शासक महेंद्रवर्मन प्रथम ने विचित्रचित्त और मत्तविलास उपाधियां लीं; उसके पुत्र नरसिंहवर्मन प्रथम को मामल्ल यानी महान पहलवान और वातापीकोंड कहा गया।
- राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष प्रथम ने नृपतुंग और अतिशयधवल उपाधियां लीं और कन्नड़ ग्रंथ कविराजमार्ग लिखा।
- गुर्जर-प्रतिहार शासक मिहिर भोज के सिक्कों पर आदिवराह अंकित मिलता है।
- मेवाड़ के राणा कुंभा ने हिंदू सुरत्राण यानी हिंदू सुल्तान तथा अभिनव भरताचार्य उपाधियां धारण कीं।
- विजयनगर के कृष्णदेवराय को साहित्य संरक्षण के कारण आंध्र भोज और अभिनव भोज कहा जाता है, तथा देवराय द्वितीय को गजबेटेकार यानी हाथियों का शिकारी।
- कश्मीर के जैनुल आबिदीन को बुडशाह कहा जाता है और प्रायः कश्मीर का अकबर भी कहा जाता है।
- शिवाजी ने 1674 में रायगढ़ के राज्याभिषेक में छत्रपति की उपाधि ली और उनकी अष्टप्रधान परिषद के प्रमुख की उपाधि पेशवा थी।
परीक्षा की दृष्टि
यहां लगभग हर प्रश्न युग्म मिलाने का है: शासक से उपाधि या उपाधि से अर्थ। जाल निकट के नामों से बनाए जाते हैं। विक्रमादित्य पर चंद्रगुप्त द्वितीय, स्कंदगुप्त और हेमू तीनों का दावा है, इसलिए प्रश्न में दिया वंश ही उत्तर तय करता है। गंगैकोंड चोल राजेंद्र प्रथम की उपाधि है, राजराज प्रथम की नहीं। जिल्ले इलाही बलबन की और सिकंदर-ए-सानी अलाउद्दीन खिलजी की उपाधि है, और प्रश्नपत्र इन दोनों को आपस में बदल देते हैं। नूरजहां प्रदत्त उपाधि थी, व्यक्तिगत नाम नहीं, और शेरशाह ने अपनी उपाधि राज्य मिलने से बहुत पहले अर्जित की थी।
परीक्षा की दृष्टि से
प्रश्न सीधे युग्म के रूप में आते हैं: समस्त राजाओं का उच्छेदक किसे कहा गया, विक्रमादित्य उपाधि किसने ली, किसके सिक्कों पर सिकंदर-ए-सानी मिलता है, लाख बख्श कौन कहलाता था, नूरजहां या शेरशाह का मूल नाम क्या था। दूसरा प्रकार उपाधि का अर्थ पूछता है, जैसे त्रिसमुद्रतोयपीतवाहन या जिल्ले इलाही। तीसरा प्रकार यह पूछता है कि उपाधि किसने दी, जिसका उत्तर कोई खलीफा, बादशाह या आधुनिक इतिहासकार होता है, धारक नहीं। जाल साझा उपाधियों से बनते हैं: विक्रमादित्य पर चंद्रगुप्त द्वितीय, स्कंदगुप्त और हेमू का दावा, चोल युग्म मुम्मुडि चोल और गंगैकोंड चोल, तथा सल्तनत युग्म जिल्ले इलाही और सिकंदर-ए-सानी, जिन्हें प्रश्नपत्र आपस में बदल देते हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य
| अभिलेखों में अशोक | देवानांप्रिय प्रियदस्सी, देवताओं का प्रिय और सुदर्शन |
|---|---|
| समुद्रगुप्त | कविराज और सर्वराजोच्छेत्ता; वी. ए. स्मिथ ने भारत का नेपोलियन कहा |
| चंद्रगुप्त द्वितीय | विक्रमादित्य, सिंहविक्रम, देवश्री |
| कनिष्क | सिक्कों पर देवपुत्र और शाओनानोशाओ |
| गौतमीपुत्र सातकर्णि | एकब्राह्मण, त्रिसमुद्रतोयपीतवाहन |
| हर्षवर्धन | शिलादित्य और सकलोत्तरपथनाथ |
| कुतुबुद्दीन ऐबक | लाख बख्श, लाखों का दान करने वाला |
| बलबन | जिल्ले इलाही और नियाबते खुदाई |
| अलाउद्दीन खिलजी | सिकंदर-ए-सानी, दूसरा सिकंदर |
| नूरजहां | मूल नाम मेहरुन्निसा; जहांगीर ने नूरमहल और फिर नूरजहां उपाधि दी |
| शेरशाह सूरी | मूल नाम फरीद खां; शेर मारने पर शेर खां उपाधि मिली |
| औरंगजेब | आलमगीर; सादा जीवन के कारण जिंदा पीर भी |
| राजेंद्र प्रथम | गंगैकोंड चोल और कडारम कोंडन |
| शिवाजी | छत्रपति, 1674 के रायगढ़ राज्याभिषेक में धारण की |
| कृष्णदेवराय | आंध्र भोज और अभिनव भोज |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
मौर्य सम्राट अशोक को उसके अपने अभिलेखों में किन उपाधियों से संबोधित किया गया है?
- A.महाराजाधिराज और परमेश्वर
- B.देवानांप्रिय और प्रियदस्सी
- C.अमित्रघात और एकब्राह्मण
- D.शिलादित्य और सत्याश्रय
उत्तर देखें
अशोक के अभिलेख उसके व्यक्तिगत नाम का प्रयोग प्रायः नहीं करते; उनमें देवानांप्रिय प्रियदस्सी कहा गया है, जिसका अर्थ देवताओं का प्रिय और सुदर्शन है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →किस गुप्त शासक को सर्वराजोच्छेत्ता, यानी समस्त राजाओं का उच्छेदक कहा गया है?
- A.चंद्रगुप्त प्रथम
- B.समुद्रगुप्त
- C.चंद्रगुप्त द्वितीय
- D.स्कंदगुप्त
उत्तर देखें
उसके दरबारी कवि हरिषेण द्वारा रचित प्रयाग प्रशस्ति में गंगा घाटी, दक्षिणापथ और सीमावर्ती राज्यों के उसके अभियानों की सूची है और उसे सर्वराजोच्छेत्ता कहा गया है; उसी अभिलेख में विद्वत्ता के कारण उसे कविराज कहा गया और उसके सिक्कों पर वह वीणा बजाता दिखाया गया है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →त्रिसमुद्रतोयपीतवाहन, यानी जिसके घोड़ों ने तीन समुद्रों का जल पिया, यह उपाधि किस शासक की है?
- A.खारवेल
- B.गौतमीपुत्र सातकर्णि
- C.रुद्रदामन प्रथम
- D.कनिष्क
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उसकी माता गौतमी बलश्री के नासिक गुहा अभिलेख में इस सातवाहन शासक को त्रिसमुद्रतोयपीतवाहन और एकब्राह्मण कहा गया है, तथा शक, यवन और पह्लवों के नाश का श्रेय दिया गया है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →शक क्षत्रपों को पराजित करने के बाद किस गुप्त शासक ने विक्रमादित्य उपाधि धारण की?
- A.समुद्रगुप्त
- B.कुमारगुप्त प्रथम
- C.चंद्रगुप्त द्वितीय
- D.चंद्रगुप्त प्रथम
उत्तर देखें
उसने गुजरात और मालवा में शक क्षत्रपों के प्रदेश जीते, जिससे गुप्तों को पश्चिमी बंदरगाह मिले, और उसने विक्रमादित्य, सिंहविक्रम तथा देवश्री उपाधियां धारण कीं; उसी के शासनकाल में चीनी यात्री फाह्यान भारत आया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →दिल्ली का कौन सा सुल्तान लाख बख्श, यानी लाखों का दान करने वाला, कहलाता था?
- A.कुतुबुद्दीन ऐबक
- B.इल्तुतमिश
- C.बलबन
- D.फिरोजशाह तुगलक
उत्तर देखें
गुलाम या ममलूक वंश के इस संस्थापक को उसके उदार दान के कारण लाख बख्श कहा गया, और उसने दिल्ली में कुतुबमीनार तथा अजमेर में अढ़ाई दिन का झोंपड़ा बनवाना आरंभ किया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →दिल्ली सल्तनत के किस शासक ने जिल्ले इलाही, यानी ईश्वर की छाया, उपाधि धारण की?
- A.अलाउद्दीन खिलजी
- B.बलबन
- C.मुहम्मद बिन तुगलक
- D.रजिया
उत्तर देखें
1266 से 1287 तक गुटबंदी से कमजोर सल्तनत पर शासन करते हुए उसने जिल्ले इलाही और नियाबते खुदाई यानी ईश्वर का प्रतिनिधि जैसे दावे किए, और दरबारियों से सिजदा यानी भूमि पर झुककर प्रणाम तथा पायबोस यानी चरण चूमने की प्रथा कराई, जिससे गद्दी सरदारों से ऊपर दिखे।
पूरी व्याख्या पढ़ें →सिकंदर-ए-सानी, यानी दूसरा सिकंदर, उपाधि किस शासक ने धारण की?
- A.इल्तुतमिश
- B.अलाउद्दीन खिलजी
- C.सिकंदर लोदी
- D.शेरशाह सूरी
उत्तर देखें
इस उपाधि में घोषित महत्वाकांक्षा उसके कार्यों से मेल खाती है: गुजरात, रणथंभौर, चित्तौड़ और मालवा की विजय, मलिक काफूर के दक्कन अभियान, बाजार नियंत्रण व्यवस्था तथा राजस्व के लिए भूमि की पहली व्यवस्थित पैमाइश।
पूरी व्याख्या पढ़ें →जहांगीर की बेगम नूरजहां का मूल नाम क्या था?
- A.अर्जुमंद बानो बेगम
- B.मेहरुन्निसा
- C.जहांआरा बेगम
- D.हमीदा बानो बेगम
उत्तर देखें
वे मिर्जा गयास बेग की पुत्री थीं, जिन्हें जहांगीर ने इतमादुद्दौला की उपाधि दी, और 1611 में बादशाह से विवाह के बाद उन्हें पहले नूरमहल यानी महल का प्रकाश और फिर नूरजहां यानी जगत का प्रकाश कहा गया; बादशाह के साथ उनके नाम से भी सिक्के ढले।
पूरी व्याख्या पढ़ें →किस मुगल बादशाह ने आलमगीर की शासकीय उपाधि धारण की?
- A.जहांगीर
- B.शाहजहां
- C.औरंगजेब
- D.बहादुर शाह जफर
उत्तर देखें
1658 में गद्दी संभालने पर उसने आलमगीर यानी जगत का विजेता उपाधि ली, और सादा जीवन तथा कुरान की प्रतिलिपि करने के कारण उसे जिंदा पीर यानी जीवित संत भी कहा गया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →किस चोल शासक ने गंगैकोंड चोल उपाधि धारण की?
- A.राजराज प्रथम
- B.राजेंद्र प्रथम
- C.कुलोत्तुंग प्रथम
- D.विजयालय
उत्तर देखें
उसने उत्तर की ओर सेना भेजी जो गंगा तक पहुंची, और इस अभियान की स्मृति में उसने गंगैकोंड चोल उपाधि ली तथा गंगैकोंडचोलपुरम नामक नई राजधानी बसाई; श्रीविजय राज्य के विरुद्ध नौसैनिक अभियान से उसे कडारम कोंडन उपाधि मिली।
पूरी व्याख्या पढ़ें →विजयनगर शासक कृष्णदेवराय किस उपाधि से प्रसिद्ध है?
- A.गजबेटेकार
- B.आंध्र भोज
- C.हिंदू सुरत्राण
- D.नृपतुंग
उत्तर देखें
तुलुव वंश के कृष्णदेवराय ने स्वयं तेलुगु ग्रंथ आमुक्तमाल्यद की रचना की और अपने दरबार के आठ महान कवियों, अष्टदिग्गजों, को संरक्षण दिया, जिससे धार के प्रसिद्ध राजा भोज की स्मृति में उसे आंध्र भोज और अभिनव भोज कहा गया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →छत्रपति उपाधि किस शासक से संबंधित है और यह किस वर्ष धारण की गई?
- A.शिवाजी, 1674 में
- B.बाजीराव प्रथम, 1720 में
- C.राणा सांगा, 1509 में
- D.हेमू, 1556 में
उत्तर देखें
1674 में रायगढ़ किले में उनका राज्याभिषेक हुआ और उन्होंने छत्रपति उपाधि धारण की; यह संस्कार विद्वान गागा भट्ट ने कराया, और उन्होंने आठ मंत्रियों की अष्टप्रधान परिषद के साथ शासन किया, जिसके प्रमुख की उपाधि पेशवा थी।
पूरी व्याख्या पढ़ें →अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
समस्त राजाओं का उच्छेदक किस भारतीय शासक को कहा गया है?
गुप्त शासक समुद्रगुप्त को। उसके दरबारी कवि हरिषेण की रचित प्रयाग प्रशस्ति में उसे सर्वराजोच्छेत्ता कहा गया है, और उसी अभिलेख में उसे कविराज यानी कवियों का राजा भी कहा गया है।
नूरजहां को यह उपाधि किसने दी?
जहांगीर ने। उनका व्यक्तिगत नाम मेहरुन्निसा था; 1611 के विवाह के बाद बादशाह ने उन्हें पहले नूरमहल यानी महल का प्रकाश और फिर नूरजहां यानी जगत का प्रकाश कहा, और उनके नाम से सिक्के भी ढले।
समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन क्यों कहा जाता है?
क्योंकि इतिहासकार वी. ए. स्मिथ ने प्रयाग प्रशस्ति में वर्णित उसके लंबे अभियानों की तुलना नेपोलियन की विजयों से की। यह आधुनिक नाम है, गुप्तकालीन किसी अभिलेख में दी गई उपाधि नहीं।
किस दिल्ली सुल्तान ने स्वयं को ईश्वर की छाया कहा?
बलबन ने, जिसने 1266 से 1287 तक शासन किया। उसने जिल्ले इलाही और नियाबते खुदाई उपाधियां लीं तथा सिजदा और पायबोस की ईरानी प्रथाएं चलाईं, जिससे तुर्क सरदारों के सामने गद्दी की प्रतिष्ठा बढ़े।
शेरशाह सूरी का मूल नाम क्या था?
फरीद खां। बिहार के शासक ने शेर मारने पर उसे शेर खां की उपाधि दी, और चौसा तथा कन्नौज में हुमायूं को पराजित करने के बाद उसने शेरशाह की शासकीय शैली अपनाकर सूर वंश की स्थापना की।
गंगैकोंड चोल की उपाधि किस शासक ने ली?
राजराज प्रथम के पुत्र राजेंद्र प्रथम ने। उत्तर में उसकी सेना गंगा तक पहुंची, इसके बाद उसने यह उपाधि ली, और दक्षिण पूर्व एशिया के श्रीविजय राज्य के विरुद्ध नौसैनिक अभियान के बाद उसने कडारम कोंडन उपाधि धारण की।
स्रोत
- भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग एक (कक्षा 12) — एनसीईआरटी
- हमारे अतीत दो (कक्षा 7), दिल्ली के सुल्तान तथा मुगल अध्याय — एनसीईआरटी
- समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति, कॉर्पस इंस्क्रिप्शनम इंडिकेरम खंड तीन — भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण





