भारत पर अरब और तुर्क आक्रमण: तिथियां और युद्ध
712 ईस्वी में अरबों द्वारा सिंध विजय, महमूद गजनवी के आक्रमण, तराइन तथा चंदावर के युद्ध और राजपूत राज्यों की पराजय के कारणों पर तिथियों सहित परीक्षा केंद्रित नोट्स।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 4 मिनट

आठवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच भारत में उत्तर-पश्चिम से आक्रमण की दो लहरें आईं। पहली लहर अरब थी, जो 712 ईस्वी में सिंध की विजय तक सीमित रही और निचली सिंधु से आगे नहीं बढ़ी। दूसरी लहर तुर्क थी, जो दो शताब्दियों तक चली, पहले महमूद गजनवी के आक्रमण और फिर मुहम्मद गोरी के अभियान, और इसका अंत दिल्ली में एक तुर्क राज्य की स्थापना से हुआ। परीक्षक दोनों लहरों को एक ही अध्याय मानते हैं, क्योंकि इनका अंतर ही सीख है: अरब विजय ने राजनीतिक रूप से लगभग कुछ नहीं बदला, जबकि तुर्क विजय ने उत्तर भारत की शासन व्यवस्था बदल दी।
अरबों द्वारा सिंध की विजय, 712 ईस्वी
भारत में अरबों की रुचि कोंकण तट पर समुद्री आक्रमणों से शुरू हुई, जिनमें सातवीं शताब्दी के मध्य में थाणे की ओर भेजा गया अभियान भी था, परंतु विजय बाद में हुई। तत्कालिक कारण यह बना कि देवल के समुद्री लुटेरों ने श्रीलंका से उपहार लेकर आ रहे अरब जहाजों को लूट लिया। जब सिंध के ब्राह्मण शासक दाहिर ने हानि की भरपाई से इनकार किया, तो उमय्यद खलीफा वलीद के अधीन इराक के गवर्नर हज्जाज बिन यूसुफ ने अपने युवा सेनापति मुहम्मद बिन कासिम को भेजा। 712 ईस्वी में कासिम ने देवल जीता, सिंधु नदी पार की और रावर के युद्ध में दाहिर को हराकर मार डाला। इसके बाद ब्राह्मणाबाद, अलोर और फिर मुल्तान एक-एक कर गिरे; मुल्तान के मंदिर की संपत्ति के कारण अरबों ने उसे स्वर्ण नगर कहा। कासिम ने प्रांत को उमय्यद ढंग से संगठित किया, हिंदुओं को जिजया देने वाली संरक्षित प्रजा का दर्जा दिया और गांव के प्रशासन को ज्यों का त्यों छोड़ दिया। उनका कार्यकाल छोटा रहा: नए खलीफा सुलेमान ने उन्हें वापस बुला लिया और शीघ्र ही उनकी मृत्यु हो गई। अरब शासन सिंध और मुल्तान से आगे कभी नहीं बढ़ा, इसीलिए इतिहासकार इस विजय को बिना परिणाम की विजय कहते हैं। इसका वास्तविक महत्व सांस्कृतिक था। भारतीय अंक, ब्रह्मगुप्त के खगोल ग्रंथ, भारतीय चिकित्सा और पंचतंत्र अरबी में पहुंचे, और चचनामा, जो एक अरबी विवरण का फारसी रूप है, इस विजय का प्रमुख स्रोत बना हुआ है।
महमूद गजनवी, 997 से 1030 ईस्वी
गजनी के यामिनी वंश के सुबुक्तगीन का पुत्र महमूद परंपरा के अनुसार भारत पर सत्रह अभियान लेकर आया। उसका उद्देश्य भारत में साम्राज्य बनाना नहीं, बल्कि मध्य एशिया के युद्धों के लिए धन लूटना था, इसलिए उसके निशाने पर मंदिर नगर रहे। 1001 ईस्वी में उसने वैहिंद के युद्ध में पंजाब के हिंदूशाही शासक जयपाल को हराया और 1008 में उसी स्थान पर आनंदपाल को, जिसके बाद हिंदूशाही राज्य समाप्त हो गया और पंजाब गजनी के अधीन चला गया। नगरकोट, थानेश्वर, मथुरा और कन्नौज क्रमशः लूटे गए, और सबसे धनी लूट 1025 ईस्वी में गुजरात के सोमनाथ मंदिर की रही। महमूद ने खलीफा से यामिन-उद-दौला की उपाधि ली और भारत में सुल्तान की उपाधि धारण करने वाला पहला शासक माना जाता है। वह अपने साथ विद्वान लाया: अलबरूनी, जिसने भारतीय समाज और विज्ञान पर तहकीक-ए-हिंद लिखा, जो किताब-उल-हिंद के नाम से अधिक प्रसिद्ध है, तथा उसके दरबार में शाहनामा के कवि फिरदौसी और किताब-उल-यामिनी के लेखक उत्बी रहे। 1030 ईस्वी में महमूद की मृत्यु हुई, और पंजाब तथा सिंध गजनी के अधीन रहे, परंतु भारत के भीतरी भाग में कोई तुर्क राज्य नहीं बना।
मुहम्मद गोरी और तराइन के युद्ध
अफगानिस्तान के गोर के गोरी वंश ने गजनी के वंश को हटाया, और भारतीय इतिहास में मुहम्मद गोरी के नाम से प्रसिद्ध मुइजुद्दीन मुहम्मद बिन साम ने आक्रमणों को विजय में बदल दिया। उसने 1175 में मुल्तान और उच्छ लिए, 1178 में आबू पर्वत के निकट कायदरा में गुजरात की चालुक्य सेना से पराजित हुआ, और 1186 में लाहौर जीतकर पंजाब में गजनवी शासन समाप्त किया। 1191 के तराइन के प्रथम युद्ध में अजमेर और दिल्ली के पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने उसे हराया और घायल किया। गोरी 1192 में अश्वारोही धनुर्धरों और छल से पीछे हटने की रणनीति के साथ लौटा, और तराइन के द्वितीय युद्ध में राजपूत सेना को नष्ट कर पृथ्वीराज को बंदी बना लिया। 1194 में उसने यमुना के किनारे चंदावर में कन्नौज के गहड़वाल शासक जयचंद को हराया, जिससे गंगा घाटी का मार्ग खुल गया। गोरी गजनी लौट गया और भारत अपने दास अधिकारियों के भरोसे छोड़ दिया: कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली संभाली और बख्तियार खिलजी ने बिहार तथा बंगाल पर अधिकार किया, नालंदा के विहार नष्ट किए और लक्ष्मणसेन को हराया। 1206 ईस्वी में दमयक में गोरी की हत्या हुई, और इसके बाद ऐबक ने वह वंश स्थापित किया जो दिल्ली सल्तनत बना।
राजपूत क्यों हारे
- कोई एक केंद्रीय सत्ता नहीं थी: राजपूत राज्य आपस में लड़ते रहे और बार-बार आने वाले आक्रमणकारी के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा नहीं बना।
- सामंतों द्वारा अभियान के समय जुटाई गई सेना के सामने एक ही नेतृत्व में वेतनभोगी अश्वारोही धनुर्धरों की स्थायी सेना थी।
- धीमे युद्ध हाथी और भारी घुड़सवार तेज घुड़सवार धनुर्धरों के सामने टिक नहीं सके, जो पीछे हटकर फिर प्रहार कर सकते थे।
- सीमा नीति का अभाव: उत्तर-पश्चिम के दर्रों पर न किलेबंदी हुई न निगरानी, इसलिए आक्रमणकारी ने समय और मार्ग स्वयं चुना।
- सामाजिक व्यवस्था ने युद्ध को एक ही वर्ग तक सीमित रखा, इसलिए एक युद्ध की पराजय पूरे राज्य का अंत कर देती थी।
परीक्षा की दृष्टि से
इस अध्याय से प्रश्न लगभग पूरी तरह नाम, वर्ष और जोड़ों पर आते हैं। सबसे आम प्रश्न हैं सिंध पर अरब विजय का नेतृत्व और उसका वर्ष, रावर में मारा गया सिंध का शासक, स्रोत चचनामा, महमूद गजनवी के आक्रमणों की संख्या, सोमनाथ आक्रमण का वर्ष, किताब-उल-हिंद का लेखक, तराइन के दोनों युद्धों के वर्ष और परिणाम, चंदावर का युद्ध और उसका प्रतिपक्षी, तथा गोरी के बाद भारत का प्रभार किसे मिला। राजपूतों की पराजय के कारण कथन आधारित प्रश्न के रूप में आते हैं। सामान्य जाल हैं तराइन के दोनों युद्धों के परिणाम उलट देना, जयपाल और जयचंद को तथा दाहिर को इनमें से किसी से मिला देना, लक्ष्मणसेन को बख्तियार खिलजी के बजाय गोरी के सामने रख देना, महमूद गजनवी को भारत में राज्य का संस्थापक मान लेना, और गजनी के यामिनी वंश को गोर के गोरी वंश से मिला देना।
महत्वपूर्ण तथ्य
| सिंध पर अरब विजय | 712 ईस्वी, मुहम्मद बिन कासिम द्वारा |
|---|---|
| पराजित सिंध शासक | दाहिर, रावर के युद्ध में |
| भेजने वाला | हज्जाज बिन यूसुफ, इराक का गवर्नर, खलीफा वलीद के अधीन |
| प्रमुख स्रोत | चचनामा, एक अरबी विवरण का फारसी रूप |
| स्वर्ण नगर | मुल्तान, जैसा अरबों ने कहा |
| महमूद गजनवी | शासन 997 से 1030; लगभग सत्रह भारतीय अभियान |
| वैहिंद का युद्ध | 1001 ईस्वी, हिंदूशाही जयपाल के विरुद्ध |
| सोमनाथ आक्रमण | 1025 ईस्वी, गुजरात में |
| महमूद के साथ विद्वान | अलबरूनी, तहकीक-ए-हिंद का लेखक |
| तराइन का प्रथम युद्ध | 1191 ईस्वी, पृथ्वीराज चौहान तृतीय विजयी |
| तराइन का द्वितीय युद्ध | 1192 ईस्वी, मुहम्मद गोरी विजयी |
| चंदावर का युद्ध | 1194 ईस्वी, कन्नौज के जयचंद के विरुद्ध |
| गुजरात में गोरी की पराजय | 1178 ईस्वी, आबू पर्वत के निकट कायदरा में |
| मुहम्मद गोरी की मृत्यु | 1206 ईस्वी, दमयक में |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
712 ईस्वी में सिंध पर अरब विजय का नेतृत्व किसने किया?
- A.हज्जाज बिन यूसुफ
- B.मुहम्मद बिन कासिम
- C.महमूद गजनवी
- D.मुहम्मद गोरी
उत्तर देखें
वह वही युवा अरब सेनापति था जिसे 712 ईस्वी में सिंध भेजा गया, जिसने देवल जीता, सिंधु नदी पार की और रावर के युद्ध में दाहिर को हराकर मार डाला, और उसके बाद ब्राह्मणाबाद, अलोर तथा मुल्तान पर अधिकार किया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →रावर के युद्ध में अरबों ने सिंध के किस शासक को हराकर मार डाला?
- A.दाहिर
- B.जयपाल
- C.आनंदपाल
- D.जयचंद
उत्तर देखें
वह सिंध का ब्राह्मण शासक था, जिसने देवल के लुटेरों द्वारा लूटे गए जहाजों की भरपाई से इनकार किया, और 712 ईस्वी में रावर में मुहम्मद बिन कासिम से लड़ते हुए मारा गया, जिसके बाद सिंध उमय्यद शासन के अधीन चला गया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →चचनामा भारतीय इतिहास की किस घटना का प्रमुख स्रोत है?
- A.महमूद गजनवी के आक्रमण
- B.अरबों द्वारा सिंध की विजय
- C.तराइन का द्वितीय युद्ध
- D.दास वंश की स्थापना
उत्तर देखें
चचनामा, जो एक पुराने अरबी विवरण का फारसी अनुवाद है, सिंध के चच परिवार के शासन, देवल में अरब जहाजों पर आक्रमण और मुहम्मद बिन कासिम के अभियान का वर्णन करता है, और 712 ईस्वी के लिए प्रमुख स्रोत बना हुआ है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →महमूद गजनवी ने गुजरात के सोमनाथ मंदिर को किस वर्ष लूटा?
- A.1001 ईस्वी
- B.1008 ईस्वी
- C.1018 ईस्वी
- D.1025 ईस्वी
उत्तर देखें
सौराष्ट्र के तट पर स्थित सोमनाथ मंदिर पर किया गया आक्रमण महमूद गजनवी के सभी अभियानों में सबसे धनी लूट था और भारतीय इतिहास में उसे इसी के लिए सबसे अधिक याद किया जाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →महमूद गजनवी के साथ भारत आकर किताब-उल-हिंद किसने लिखी?
- A.अलबरूनी
- B.फिरदौसी
- C.अमीर खुसरो
- D.इब्न बतूता
उत्तर देखें
मध्य एशिया के विद्वान अबू रैहान अलबरूनी महमूद गजनवी के साथ भारत आया, संस्कृत सीखी और तहकीक-ए-हिंद लिखी, जो किताब-उल-हिंद के नाम से प्रसिद्ध है और भारतीय धर्म, समाज, खगोल तथा गणित का वर्णन करती है; ग्यारहवीं शताब्दी के भारत का यह सबसे मूल्यवान विवरण है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →1191 में हुए तराइन के प्रथम युद्ध का परिणाम क्या रहा?
- A.मुहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को हराया
- B.पृथ्वीराज चौहान ने मुहम्मद गोरी को हराया
- C.युद्ध बिना परिणाम समाप्त हुआ
- D.जयचंद ने मुहम्मद गोरी को हराया
उत्तर देखें
1191 के तराइन के प्रथम युद्ध में अजमेर और दिल्ली के पृथ्वीराज चौहान तृतीय की राजपूत सेना ने गोरी सेना का मध्य भाग तोड़ दिया, गोरी स्वयं घायल हुआ और एक अनुचर उसे युद्धक्षेत्र से निकालकर ले गया, जिसके बाद वह गजनी लौट गया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →तराइन का द्वितीय युद्ध किस वर्ष लड़ा गया?
- A.1178 ईस्वी
- B.1186 ईस्वी
- C.1192 ईस्वी
- D.1194 ईस्वी
उत्तर देखें
अपनी पराजय के एक वर्ष बाद मुहम्मद गोरी तराइन लौटा, छल से पीछे हटकर राजपूत घुड़सवार सेना को खींचा, अश्वारोही धनुर्धरों से उसे घेरकर नष्ट कर दिया; पृथ्वीराज चौहान बंदी बना लिए गए और दिल्ली का मार्ग खुल गया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →1194 का चंदावर का युद्ध मुहम्मद गोरी और किस शासक के बीच लड़ा गया?
- A.गुजरात के भीम द्वितीय
- B.कन्नौज के जयचंद
- C.बंगाल के लक्ष्मणसेन
- D.पंजाब के आनंदपाल
उत्तर देखें
तराइन के द्वितीय युद्ध के बाद मुहम्मद गोरी पूर्व की ओर बढ़ा और 1194 ईस्वी में यमुना के किनारे चंदावर में कन्नौज तथा बनारस के गहड़वाल शासक जयचंद को हराया; इस विजय से तुर्कों को ऊपरी गंगा घाटी मिल गई।
पूरी व्याख्या पढ़ें →1001 ईस्वी में वैहिंद में महमूद गजनवी ने पंजाब के किस हिंदूशाही शासक को हराया?
- A.जयपाल
- B.त्रिलोचनपाल
- C.भीमपाल
- D.दाहिर
उत्तर देखें
हिंदूशाही शासक जयपाल ने 1001 ईस्वी में पेशावर के निकट वैहिंद में महमूद गजनवी का सामना किया, पराजित हुआ और बंदी बनाया गया, और कहा जाता है कि इस अपमान के कारण उसने अपना जीवन समाप्त कर लिया, जिसके बाद उसके पुत्र आनंदपाल ने संघर्ष जारी रखा।
पूरी व्याख्या पढ़ें →मुहम्मद गोरी की भारतीय विजयों का प्रभार किसे सौंपा गया, जिसने बाद में दास वंश की स्थापना की?
- A.बख्तियार खिलजी
- B.इल्तुतमिश
- C.कुतुबुद्दीन ऐबक
- D.यल्दूज
उत्तर देखें
तराइन और चंदावर के बाद गोरी गजनी लौट गया और भारतीय प्रदेशों का प्रभार अपने विश्वस्त दास अधिकारी कुतुबुद्दीन ऐबक को सौंप दिया; 1206 में गोरी की मृत्यु पर ऐबक ने लाहौर में स्वयं को शासक घोषित किया और उस वंश की स्थापना की जो दिल्ली सल्तनत बना।
पूरी व्याख्या पढ़ें →मुहम्मद गोरी किस वंश का था?
- A.यामिनी वंश
- B.गोरी वंश
- C.उमय्यद वंश
- D.खिलजी वंश
उत्तर देखें
मुइजुद्दीन मुहम्मद बिन साम, जिसे मुहम्मद गोरी कहा जाता है, मध्य अफगानिस्तान के गोर से आया था, और गोरी वंश ने उत्तर भारत की ओर बढ़ने से पहले गजनी के वंश को हटाया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भारत के किसी भाग को जीतने वाला पहला अरब सेनापति कौन था?
मुहम्मद बिन कासिम, जिसने 712 ईस्वी में रावर के युद्ध में दाहिर को हराकर मारने के बाद सिंध जीता। उसे उमय्यद खलीफा वलीद के अधीन इराक के गवर्नर हज्जाज बिन यूसुफ ने भेजा था, और अरब शासन सिंध तथा मुल्तान तक सीमित रहा।
महमूद गजनवी ने भारत पर कितनी बार आक्रमण किया?
परंपरा के अनुसार उसने 1000 से 1027 ईस्वी के बीच लगभग सत्रह अभियान किए। उसका उद्देश्य मध्य एशिया के युद्धों के लिए धन लूटना था, और उसके मुख्य निशाने नगरकोट, थानेश्वर, मथुरा, कन्नौज तथा सोमनाथ के मंदिर नगर रहे।
तराइन का प्रथम और द्वितीय युद्ध कौन जीता?
अजमेर और दिल्ली के पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने 1191 का तराइन का प्रथम युद्ध जीता और मुहम्मद गोरी को घायल किया। गोरी 1192 में लौटा और अश्वारोही धनुर्धरों तथा छल से पीछे हटने की रणनीति से द्वितीय युद्ध जीतकर पृथ्वीराज को बंदी बना लिया।
अरबों की सिंध विजय को बिना परिणाम की विजय क्यों कहा जाता है?
क्योंकि अरब शासन सिंध और मुल्तान से आगे नहीं फैला और भारत में कोई स्थायी राजनीतिक व्यवस्था नहीं छोड़ सका। इसका महत्व सांस्कृतिक रहा: भारतीय अंक, खगोल, चिकित्सा और पंचतंत्र अरबों के माध्यम से शेष विश्व तक पहुंचे।
मुहम्मद गोरी के बाद दिल्ली सल्तनत की स्थापना किसने की?
कुतुबुद्दीन ऐबक ने, वही दास अधिकारी जिसे गोरी ने अपनी भारतीय विजयों का प्रभार सौंपा था। 1206 ईस्वी में दमयक में गोरी की मृत्यु के बाद ऐबक स्वतंत्र शासक बना और उसने दास अथवा मामलूक वंश की स्थापना की, जो दिल्ली सल्तनत का प्रथम वंश था।





