भारतीय इतिहास में सिक्के और मुद्राएं: परीक्षा नोट्स
भारतीय इतिहास के सिक्कों पर परीक्षा नोट्स: आहत सिक्के, गुप्त दीनार, टंका और जीतल, सांकेतिक मुद्रा, शेरशाह का रुपया तथा दशमलव रुपया और उससे जुड़े तथ्य।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 5 मिनट

प्राचीन भारत के इतिहासकार के पास सिक्के सबसे ठोस प्रमाण होते हैं। किसी वंश का कोई अभिलेख या भवन न बचे, फिर भी उसके सिक्के निधियों में मिल जाते हैं और उन पर राजा का नाम, उपाधि, देवता तथा उसके कोष की क्षमता दिखाने वाली धातु अंकित रहती है। इसी कारण परीक्षक इस अध्याय को पसंद करते हैं: इसका हर तथ्य एक जोड़ा है और जोड़ों से अच्छे प्रश्न बनते हैं। कभी शासक का नाम देकर सिक्का पूछा जाता है, कभी सिक्के का नाम देकर शासक। यह अध्याय उन जोड़ों को क्रम से रखता है, ईसा पूर्व छठी शताब्दी के आहत सिक्कों से लेकर दशमलव रुपये तक। सिक्कों के अध्ययन को मुद्राशास्त्र और अभिलेखों के अध्ययन को पुरालेखशास्त्र कहा जाता है; ये दोनों शब्द भी पूछे जाते हैं।
सिक्कों से पहले मूल्य की इकाइयाँ
वैदिक ग्रंथों में निष्क, शतमान और कृष्णल का उल्लेख है, जो ढले हुए सिक्के नहीं बल्कि सोने के तौल या मूल्य की इकाइयाँ थीं, और उस काल का अधिकांश विनिमय पशु तथा अनाज की वस्तु-विनिमय प्रणाली से होता था। वास्तविक सिक्का-प्रणाली सोलह महाजनपदों के उदय और गंगा घाटी के व्यापार के साथ शुरू होती है, जब निश्चित तौल की धातु-टुकड़ियाँ आवश्यक हो गईं।
आहत सिक्के
भारत के सबसे प्राचीन सिक्के आहत सिक्के हैं, जिन्हें साहित्य में कार्षापण या पण कहा गया है। ये अधिकतर चाँदी के, कुछ ताँबे के, अनियमित चौकोर या आयताकार टुकड़े हैं जिन पर अलग-अलग ठप्पों से चिह्न अंकित किए गए हैं: सूर्य, छह भुजाओं वाला चक्र, पहाड़, वृक्ष, पशु और ज्यामितीय आकृतियाँ। इन पर कोई लेख नहीं है, इसलिए ये किसी राजा का नाम नहीं बताते। इन्हें लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व से महाजनपदों, नंद तथा मौर्य राज्य और व्यापारिक श्रेणियों ने भी जारी किया, इसी कारण एक ही निधि में चिह्नों के अनेक संयोजन मिलते हैं। बड़ी निधियाँ तक्षशिला तथा पटना के निकट गोलकपुर से मिली हैं। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इस व्यवस्था के अधिकारी बताए गए हैं: लक्षणाध्यक्ष टकसाल का अध्यक्ष था और रूपदर्शक वह परीक्षक था जो सिक्कों की जाँच करता था।
हिंद-यवन, कुषाण, सातवाहन और गुप्त सिक्के
उत्तर-पश्चिम के हिंद-यवन शासक पहले थे जिन्होंने भारत में सिक्कों पर राजा का चित्र और पढ़ा जा सकने वाला नाम अंकित किया, और पहले सोने के सिक्के भी उन्होंने ही चलाए। उनके सिक्के द्विभाषी हैं, एक ओर यूनानी और दूसरी ओर खरोष्ठी या ब्राह्मी, और इसी से विद्वानों ने खरोष्ठी लिपि पढ़ी। कुषाणों ने बड़ी मात्रा में सोने के सिक्के ढाले; विम कडफिसेस पहला कुषाण शासक था जिसने स्वर्ण मुद्रा जारी की, और कनिष्क के सिक्कों पर बुद्ध के साथ यूनानी, ईरानी तथा भारतीय देवता भी अंकित हैं, जो साम्राज्य के विस्तार को दर्शाता है। दक्कन के सातवाहन सीसे और पोटिन के सिक्कों के लिए जाने जाते हैं, जिनमें कुछ पर दो मस्तूल वाला जहाज अंकित है और उसे उनके समुद्री व्यापार का प्रमाण माना जाता है। पश्चिमी क्षत्रपों ने चाँदी के सिक्के चलाए, और अरिकामेडु जैसे स्थलों से मिले रोमन स्वर्ण सिक्के ईसा की आरंभिक शताब्दियों के रोमन व्यापार को दर्शाते हैं। प्राचीन भारत में सर्वाधिक संख्या में स्वर्ण सिक्के गुप्त शासकों ने जारी किए, जिन्हें वे दीनार कहते थे। उनके प्रकार एक छोटी प्रदर्शनी जैसे हैं: चंद्रगुप्त प्रथम और कुमारदेवी वाला राजा-रानी प्रकार, समुद्रगुप्त के अश्वमेध तथा वीणावादक प्रकार, और चंद्रगुप्त द्वितीय के धनुर्धर तथा चक्रविक्रम प्रकार। परवर्ती गुप्त शासकों के स्वर्ण सिक्कों में सोने की शुद्धता घटती गई, और पश्चिमी भारत में क्षत्रप प्रदेश जीतने के बाद गुप्तों ने चाँदी के सिक्के भी ढाले।
दिल्ली सल्तनत
इल्तुतमिश ने सल्तनत को उसकी मानक मुद्रा दी: चाँदी का टंका और ताँबे का जीतल, जिन पर पूर्णतः अरबी लेख और टकसाल का नाम रहता था। अलाउद्दीन खिलजी ने अपने सिक्कों से खलीफा का नाम हटा दिया और भारी उपाधियाँ अंकित कराईं। मुहम्मद बिन तुगलक, जिसे अपनी मुद्राओं की विविधता और सुंदरता के कारण सिक्कों का राजकुमार कहा जाता है, ने स्वर्ण दीनार चलाया और 1329 या 1330 में पीतल तथा ताँबे की सांकेतिक मुद्रा जारी की, जिसे चाँदी के मूल्य पर वैध घोषित किया गया; घर-घर में जाली सिक्के ढलने से यह प्रयोग विफल हुआ और सुल्तान को चाँदी देकर टोकन वापस लेने पड़े। फिरोज शाह तुगलक ने छोटे ताँबे के सिक्के चलाए जिससे गरीब छोटी खरीद कर सकें।
शेरशाह का रुपया और मुगल मुद्रा
शेरशाह सूरी ने मुद्रा व्यवस्था सुधारी और लगभग 178 ग्रेन की चाँदी की मुद्रा जारी की जिसे रुपया कहा गया, साथ ही ताँबे का दाम और सोने का मोहर भी चलाया। आधुनिक रुपया सीधे इसी रुपये का वंशज है, और यही नाम इस अध्याय का सर्वाधिक पूछा जाने वाला तथ्य है। मुगलों ने यही व्यवस्था बनाए रखी: सोने का मोहर या अशरफी, चाँदी का रुपया और ताँबे का दाम, तथा हर बड़े नगर में एक टकसाल। अकबर ने इलाही संवत की तिथि वाले तथा चौकोर सिक्के भी ढलवाए। जहाँगीर दो असामान्य श्रेणियों के लिए याद किया जाता है: बारह राशियों वाले सिक्के और अपने चित्र वाले सिक्के, तथा नूरजहाँ के नाम से जारी मुद्राएँ। औरंगजेब ने अपने सिक्कों से कलमा हटा दिया।
कंपनी के रुपये से दशमलव रुपये तक
ईस्ट इंडिया कंपनी की टकसालें अनेक स्थानीय रुपये ढालती रहीं, फिर 1835 के सिक्का अधिनियम ने ब्रिटिश भारत को एक समान चाँदी का रुपया दिया। 1861 के कागजी मुद्रा अधिनियम ने कागजी मुद्रा जारी करने का एकमात्र अधिकार भारत सरकार को दिया। भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना 1 अप्रैल 1935 को हुई और उसने नोट जारी करने का कार्य संभाला। रुपये का दशमलवीकरण 1 अप्रैल 1957 को हुआ, जब उसे सौ भागों में बाँटा गया, जिन्हें पहले नये पैसे और 1964 से केवल पैसे कहा गया। आज एक रुपये के नोट को छोड़कर सभी बैंक नोट रिजर्व बैंक जारी करता है, एक रुपये का नोट भारत सरकार जारी करती है, और सभी सिक्के भारत सरकार ढालती है जबकि रिजर्व बैंक केवल उन्हें प्रचलन में लाता है।
याद रखने योग्य शब्द
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| कार्षापण या पण | प्रारंभिक भारत का आहत चाँदी सिक्का |
| दीनार | गुप्त स्वर्ण मुद्रा |
| टंका और जीतल | इल्तुतमिश द्वारा चलाए चाँदी और ताँबे के सिक्के |
| रुपया और दाम | शेरशाह सूरी के चाँदी और ताँबे के सिक्के |
| मोहर या अशरफी | मुगल स्वर्ण मुद्रा |
| लक्षणाध्यक्ष | अर्थशास्त्र में टकसाल का अध्यक्ष |
| रूपदर्शक | अर्थशास्त्र में सिक्कों का परीक्षक |
परीक्षा की दृष्टि से
इस अध्याय का हर प्रश्न एक जोड़ा है, इसलिए इसे जोड़ों की सूची के रूप में दोहराएँ। सर्वाधिक पूछे जाने वाले जोड़े हैं - शेरशाह और रुपया, मुहम्मद बिन तुगलक और सांकेतिक मुद्रा, इल्तुतमिश और टंका-जीतल, जहाँगीर और राशि सिक्के, गुप्त और सर्वाधिक स्वर्ण मुद्रा, सातवाहन और सीसा-पोटिन। तीन जाल बार-बार आते हैं। पहला पहले स्वर्ण सिक्के और सर्वाधिक स्वर्ण सिक्के का अंतर है, जिनके उत्तर क्रमशः हिंद-यवन और गुप्त हैं। दूसरा अर्थशास्त्र के दो अधिकारी हैं, टकसाल के लिए लक्षणाध्यक्ष और परीक्षण के लिए रूपदर्शक, जो नियमित रूप से बदल दिए जाते हैं। तीसरा 1835, 1861, 1935 और 1957 की तिथियाँ हैं, जो एक समान रुपया, कागजी मुद्रा अधिनियम, रिजर्व बैंक और दशमलवीकरण के लिए साथ रखी जाती हैं। कठिन प्रश्नपत्रों में अलग-अलग गुप्त शासकों के सिक्का प्रकार भी पूछे जाते हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य
| भारत के सबसे प्राचीन सिक्के | आहत सिक्के, लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व से |
|---|---|
| इनके अन्य नाम | कार्षापण, पण |
| भारत में पहले स्वर्ण सिक्के | हिंद-यवनों द्वारा जारी |
| सर्वाधिक स्वर्ण सिक्के | गुप्त, जिन्होंने इन्हें दीनार कहा |
| सातवाहन धातुएँ | सीसा और पोटिन |
| टंका और जीतल | इल्तुतमिश द्वारा प्रारंभ |
| सांकेतिक मुद्रा | मुहम्मद बिन तुगलक, 1329 या 1330, पीतल और ताँबा |
| रुपया | शेरशाह सूरी, चाँदी, लगभग 178 ग्रेन |
| राशि वाले सिक्के | जहाँगीर |
| अर्थशास्त्र में टकसाल अधिकारी | लक्षणाध्यक्ष; सिक्कों का परीक्षक रूपदर्शक था |
| ब्रिटिश भारत में एक समान चाँदी रुपया | 1835 का सिक्का अधिनियम |
| रुपये का दशमलवीकरण | 1 अप्रैल 1957 |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
भारत के सबसे प्राचीन सिक्के, जिन पर अलग-अलग ठप्पों से चिह्न अंकित हैं और कोई लेख नहीं है, किस नाम से जाने जाते हैं?
- A.आहत सिक्के
- B.दीनार सिक्के
- C.जीतल सिक्के
- D.पोटिन सिक्के
उत्तर देखें
ये भारत के सबसे पुराने सिक्के हैं, अधिकतर चाँदी के अनियमित आकार के टुकड़े, जिन पर एक-एक करके ठप्पे मारकर सूर्य, छह भुजाओं वाला चक्र, पहाड़, वृक्ष और पशु जैसे चिह्न अंकित किए गए।
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारत में चाँदी का टंका और ताँबे का जीतल किस शासक ने चलाया?
- A.कुतुबुद्दीन ऐबक
- B.इल्तुतमिश
- C.अलाउद्दीन खिलजी
- D.फिरोज शाह तुगलक
उत्तर देखें
इल्तुतमिश ने दिल्ली सल्तनत को उसकी मानक मुद्रा दी और चाँदी का टंका तथा ताँबे का जीतल जारी किया, जिन पर पूर्णतः अरबी लेख और टकसाल का नाम अंकित रहता था; यही जोड़ी आगे सल्तनत की मुद्रा का आधार बनी रही।
पूरी व्याख्या पढ़ें →पीतल और ताँबे की सांकेतिक मुद्रा, जिसे चाँदी के मूल्य पर वैध घोषित किया गया, किसने जारी की?
- A.बलबन
- B.मुहम्मद बिन तुगलक
- C.सिकंदर लोदी
- D.अकबर
उत्तर देखें
उसने 1329 या 1330 में पीतल तथा ताँबे के टोकन जारी किए और उन्हें एक चाँदी के टंके के बराबर घोषित किया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →आधुनिक भारतीय रुपये का पूर्वज, रुपया नामक चाँदी का सिक्का सर्वप्रथम किसने जारी किया?
- A.शेरशाह सूरी
- B.हुमायूँ
- C.अकबर
- D.जहाँगीर
उत्तर देखें
अपने मुद्रा सुधार के अंतर्गत उसने लगभग एक सौ अठहत्तर ग्रेन की चाँदी की मुद्रा जारी की जिसे रुपया कहा गया, साथ ही ताँबे का दाम और सोने का मोहर चलाया तथा इनकी विनिमय दरें निश्चित कीं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →बारह राशियों के चिह्न वाले सिक्के किस मुगल बादशाह ने जारी किए?
- A.अकबर
- B.जहाँगीर
- C.शाहजहाँ
- D.औरंगजेब
उत्तर देखें
जहाँगीर ने सोने और चाँदी के सिक्कों की एक प्रसिद्ध श्रेणी ढलवाई जिन पर बारह राशियों के चिह्न अंकित थे, तथा एक अन्य श्रेणी पर अपना चित्र भी अंकित कराया, जो इस्लामी मुद्रा परंपरा में असामान्य है; उसने नूरजहाँ के नाम से भी सिक्के जारी किए।
पूरी व्याख्या पढ़ें →प्राचीन भारत में सर्वाधिक संख्या में स्वर्ण सिक्के किस वंश ने जारी किए?
- A.मौर्य
- B.सातवाहन
- C.गुप्त
- D.चोल
उत्तर देखें
गुप्तों के स्वर्ण सिक्के, जिन्हें दीनार कहा जाता था, किसी भी अन्य प्राचीन भारतीय वंश से अधिक संख्या में मिले हैं, और उनके प्रकार राजचित्रों की एक प्रदर्शनी जैसे हैं - राजा-रानी प्रकार, समुद्रगुप्त के अश्वमेध तथा वीणावादक प्रकार, और चंद्रगुप्त द्वितीय के धनुर्धर तथा चक्रविक्रम प्रकार।
पूरी व्याख्या पढ़ें →कुमारदेवी के साथ शासक को दर्शाने वाले राजा-रानी प्रकार के स्वर्ण सिक्के किससे संबंधित हैं?
- A.चंद्रगुप्त प्रथम
- B.समुद्रगुप्त
- C.चंद्रगुप्त द्वितीय
- D.स्कंदगुप्त
उत्तर देखें
इन सिक्कों के एक ओर राजा के साथ लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी और दूसरी ओर आसीन देवी के साथ लिच्छवयः लेख अंकित है, और परंपरा से ये चंद्रगुप्त प्रथम को दिए जाते हैं, जिनके इस विवाह ने आरंभिक गुप्त राज्य को मजबूती दी; कुछ विद्वान मानते हैं कि इन्हें उनके पुत्र…
पूरी व्याख्या पढ़ें →अर्थशास्त्र में टकसाल का प्रभारी अधिकारी किस नाम से जाना जाता था?
- A.रूपदर्शक
- B.लक्षणाध्यक्ष
- C.संस्थाध्यक्ष
- D.पण्याध्यक्ष
उत्तर देखें
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में अनेक अध्यक्षों का वर्णन है, और लक्षणाध्यक्ष टकसाल का अध्यक्ष था, जो निर्धारित तौल तथा मिश्रण के सिक्के ढालने के लिए उत्तरदायी था।
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारतीय रुपये का दशमलवीकरण, अर्थात उसका सौ छोटी इकाइयों में विभाजन, किस वर्ष हुआ?
- A.1935
- B.1947
- C.1957
- D.1964
उत्तर देखें
1 अप्रैल 1957 से रुपया सोलह आने और चौंसठ पाई में विभाजित होना बंद हो गया और उसे सौ इकाइयों में बाँटा गया, जिन्हें पहले नये पैसे और 1964 से केवल पैसे कहा गया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →सीसे और पोटिन के सिक्के, जिनमें कुछ पर दो मस्तूल वाले जहाज की आकृति है, किस वंश की विशेषता थे?
- A.कुषाण
- B.सातवाहन
- C.हिंद-यवन
- D.पश्चिमी क्षत्रप
उत्तर देखें
दक्कन के सातवाहनों ने अपने सिक्के मुख्यतः सीसे और पोटिन में ढाले, जो ताँबे के साथ राँगा, सीसा तथा जस्ता की मिश्र धातु है, और उनके कुछ सिक्कों पर दो मस्तूल वाला जहाज अंकित है, जिसे इतिहासकार पूर्वी तट पर उनके समुद्री व्यापार का प्रमाण मानते हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भारत के सबसे प्राचीन सिक्के कौन से थे?
आहत सिक्के, जिन्हें कार्षापण या पण कहा जाता है। ये अधिकतर अनियमित आकार के चाँदी के टुकड़े हैं जिन पर सूर्य और छह भुजाओं वाले चक्र जैसे चिह्न अलग-अलग ठप्पों से अंकित हैं, और इन पर कोई लेख न होने से जारीकर्ता का नाम नहीं मिलता।
भारत में पहला रुपया किसने जारी किया?
शेरशाह सूरी ने। उसने लगभग एक सौ अठहत्तर ग्रेन का चाँदी का सिक्का जारी किया जिसे रुपया कहा गया, साथ ही ताँबे का दाम और सोने का मोहर भी चलाया। मुगलों और अंग्रेजों ने चाँदी का रुपया बनाए रखा, इसलिए आधुनिक रुपया उसी से उतरा है।
प्राचीन भारत में सर्वाधिक स्वर्ण सिक्के किस वंश ने जारी किए?
गुप्त वंश ने। उनके स्वर्ण सिक्के दीनार कहे जाते थे और उनके प्रकारों में राजा-रानी प्रकार, समुद्रगुप्त के अश्वमेध तथा वीणावादक प्रकार और चंद्रगुप्त द्वितीय का धनुर्धर प्रकार शामिल हैं। परंतु भारत में पहले स्वर्ण सिक्के हिंद-यवनों ने चलाए थे।
मुहम्मद बिन तुगलक की सांकेतिक मुद्रा क्यों विफल हुई?
क्योंकि पीतल और ताँबे के टोकन की नकल आसान थी। साधारण घरों में जाली सिक्के ढलने लगे, अच्छी चाँदी प्रचलन से गायब हो गई और सुल्तान को चाँदी देकर टोकन वापस लेने पड़े, जिससे कोष को भारी हानि हुई।
भारतीय रुपये का दशमलवीकरण कब हुआ?
1 अप्रैल 1957 को। रुपया सोलह आने में विभाजित होना बंद हुआ और उसे सौ इकाइयों में बाँटा गया, जिन्हें पहले नये पैसे और 1964 से केवल पैसे कहा गया।
स्रोत
- भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग एक (कक्षा 12), प्रारंभिक राज्य और अर्थव्यवस्था के अध्याय — एनसीईआरटी
- हमारे अतीत दो (कक्षा 7), दिल्ली के सुल्तान और मुगल अध्याय — एनसीईआरटी
- भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग दो (कक्षा 12), मुगल साम्राज्य अध्याय — एनसीईआरटी





