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GK नोट्सभारतीय इतिहासकिसान और जनजातीय आंदोलन

किसान और जनजातीय आंदोलन: नेता, वर्ष और परिणाम

परीक्षा के लिए किसान और जनजातीय आंदोलनों के नोट्स: नील विद्रोह, पबना, दक्कन दंगे, चंपारण, बारडोली, तेभागा, संथाल हूल और बिरसा मुंडा का उलगुलान।

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किसान और जनजातीय आंदोलन: नेता, वर्ष और परिणाम — GK24 title card
किसान और जनजातीय आंदोलन: नेता, वर्ष और परिणाम — GK24 title card

ब्रिटिश भूमि-राजस्व नीति ने भारतीय किसान को कर्जदार बना दिया और वनवासी को उसकी ही भूमि पर अतिक्रमणकारी। स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी बंदोबस्त, नील की जबरन खेती, साहूकार का बंधपत्र और वन कानून, इन सबने प्रतिरोध पैदा किया, और 1763 से 1947 तक गांव बार-बार उठ खड़ा हुआ। परीक्षा में इन्हें दो धाराओं में पढ़ा जाता है: किसान आंदोलन, जो बसे हुए मैदानों में लगान, राजस्व और कर्ज के विरुद्ध लड़े गए, और जनजातीय आंदोलन, जो पहाड़ों और पठारों में भूमि, वन और बाहरी हस्तक्षेप के विरुद्ध लड़े गए। परीक्षक इन्हें नाम, स्थान, वर्ष और नेता की जोड़ियों के रूप में पूछते हैं, और चूंकि ये तथ्य स्थिर हैं, आधुनिक भारतीय इतिहास में ये सबसे सुरक्षित अंक हैं।

उन्नीसवीं सदी के किसान आंदोलन

आरंभिक विद्रोह स्थानीय और स्वतःस्फूर्त थे और किसी विशेष शिकायत पर केंद्रित थे, ब्रिटिश शासन पर नहीं। नील विद्रोह 1859 से 1860 तक बंगाल के नदिया जिले में भड़का, जहां बागान मालिक रैयतों से सबसे अच्छी भूमि पर घाटे में नील उगवाते थे। दिगंबर विश्वास और बिष्णु विश्वास के नेतृत्व में किसानों ने बोने से इनकार कर दिया और हड़ताल पूरे बंगाल में फैल गई; सरकार ने 1860 में नील आयोग नियुक्त किया और बागान मालिक पीछे हटे। दीनबंधु मित्र का 1860 में प्रकाशित नाटक नील दर्पण बागान मालिकों की क्रूरता को पढ़े-लिखे समाज तक ले गया। पबना की कृषक सभाएं 1873 में पूर्वी बंगाल के पबना जिले के यूसुफशाही परगना में बनीं, जहां काश्तकारों ने संघ बनाया, चंदा जुटाया और जमींदारों की अवैध लगान वृद्धि को अदालतों में चुनौती दी; इसी आंदोलन से 1885 का बंगाल काश्तकारी अधिनियम निकला। 1875 के दक्कन दंगे पूना जिले के सुपा से आरंभ होकर पूना और अहमदनगर में फैले, जहां रैयतवाड़ी क्षेत्र के किसानों ने मारवाड़ी और गुजराती साहूकारों के बंधपत्र और बहीखाते जला दिए; सरकार ने उत्तर में 1879 का दक्कन कृषक राहत अधिनियम दिया।

राष्ट्रीय आंदोलन के दौर के किसान आंदोलन

आंदोलनवर्षस्थाननेता और परिणाम
पगड़ी संभाल जट्टा1907पंजाब की नहरी बस्तियांअजीत सिंह और किशन सिंह, पंजाब भूमि उपनिवेशन अधिनियम के विरुद्ध
चंपारण सत्याग्रह1917चंपारण, बिहारभारत में गांधी का पहला सत्याग्रह; तीनकठिया प्रथा 1918 के चंपारण कृषि अधिनियम से समाप्त
खेड़ा सत्याग्रह1918खेड़ा, गुजरातगांधी, वल्लभभाई पटेल और इंदुलाल याज्ञिक; फसल खराब होने पर राजस्व में छूट
अवध किसान सभा और एका आंदोलन1920 से 1922अवध, संयुक्त प्रांतबाबा रामचंद्र; हरदोई, बहराइच और सीतापुर में मदारी पासी के नेतृत्व में एका आंदोलन
मोपला विद्रोह1921मलाबारजन्मी भूस्वामियों के विरुद्ध काश्तकार, खिलाफत आंदोलन से जुड़ा
बारडोली सत्याग्रह1928बारडोली, सूरत जिलावल्लभभाई पटेल; तीस प्रतिशत की राजस्व वृद्धि जांच के बाद लगभग छह प्रतिशत रह गई, और बारडोली की महिलाओं ने उन्हें सरदार की उपाधि दी
अखिल भारतीय किसान सभा1936लखनऊ में स्थापनास्वामी सहजानंद सरस्वती अध्यक्ष, एन. जी. रंगा महासचिव
तेभागा आंदोलन1946बंगालबटाईदारों ने फ्लाउड आयोग के आधार पर उपज का दो-तिहाई भाग मांगा
तेलंगाना किसान संघर्ष1946 से 1951हैदराबाद रियासतनिजाम के जागीरदारों और वेट्टी यानी बेगार प्रथा के विरुद्ध

जनजातीय आंदोलन

जनजातीय विद्रोह किसान विद्रोहों से तीन बातों में अलग थे। वे बाहरी व्यक्ति को एक वर्ग मानकर उसके विरुद्ध थे, जिसे जनजातियां दिकू कहती थीं, अर्थात साहूकार, व्यापारी, ठेकेदार और राजस्व अधिकारी, जो नए कानूनों के पीछे-पीछे पहाड़ों में घुसे। उनका रूप प्रायः धार्मिक या मसीही होता था, जिसमें नेता किसी स्वर्ण युग की वापसी का वचन देता था। और उनका तात्कालिक कारण भूमि तथा वन का छिन जाना था, क्योंकि स्थायी बंदोबस्त, वन विनियमों और स्थानांतरित खेती पर रोक ने मुंडाओं की खूंटकट्टी जैसी परंपरागत व्यवस्थाओं को नष्ट कर दिया।

विद्रोहवर्षक्षेत्रनेता
चुआर विद्रोह1766 से 1772 और 1798जंगल महाल, मिदनापुर और बांकुड़ादुर्जन सिंह
अहोम विद्रोह1828असमगोमधर कुंवर
खासी विद्रोह1829 से 1833खासी पहाड़ियां, मेघालयतिरोत सिंह
कोल विद्रोह1831 से 1832छोटानागपुरबुद्धू भगत
खोंड विद्रोह1837 से 1856ओडिशा की पहाड़ियांचक्र बिसोई
संथाल हूल1855 से 1856राजमहल पहाड़ियां, दामिन-ए-कोहसिदो और कान्हू मुर्मू, चांद और भैरव के साथ
मुंडा उलगुलान1899 से 1900छोटानागपुरबिरसा मुंडा
टाना भगत आंदोलन1914छोटानागपुर, उरांव जनजाति मेंजतरा भगत
रम्पा विद्रोह1922 से 1924आंध्र के एजेंसी क्षेत्रअल्लूरी सीताराम राजू
जेलियांग्रोंग या हेराका आंदोलन1930 का दशकमणिपुर और नागा पहाड़ियांहाइपोउ जादोनांग और रानी गाइदिन्ल्यू

दो विद्रोह जिन पर परीक्षक लौटते हैं

1855 का संथाल हूल 1857 से पहले का सबसे बड़ा जनजातीय विद्रोह था। संथालों को सरकार ने ही राजमहल पहाड़ियों के दामिन-ए-कोह क्षेत्र में बसाया था, और वहीं साहूकारों तथा नए रेलवे ठेकेदारों ने उन्हें बरबाद कर दिया। सिदो और कान्हू मुर्मू ने कंपनी के शासन को समाप्त घोषित कर दिया, और हजारों संथाल एक वर्ष तक लड़े, जिसके बाद विद्रोह कुचल दिया गया; इसका एक स्थायी परिणाम 1855 में संथाल परगना को अलग प्रशासनिक जिला बनाना था, जो बाहरी लोगों के लिए बंद रखा गया। मुंडा उलगुलान, जिसका अर्थ महान विप्लव है, 1899 से बिरसा मुंडा के नेतृत्व में चला, जिन्हें उनके अनुयायी धरती आबा यानी धरती का पिता कहते थे। बिरसा ने नया पंथ चलाया, मिशनरियों और जमींदारों दोनों की सत्ता अस्वीकार की, और उस खूंटकट्टी अधिकार की बहाली की मांग की जिसके अनुसार जो भूमि मुंडा परिवार ने साफ की है वह उसी की है। वे पकड़े गए और 1900 में रांची जेल में उनका निधन हुआ, किंतु विद्रोह ने 1908 का छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम करवा दिया, जिसने खूंटकट्टी व्यवस्था को मान्यता दी और बेठ बेगारी यानी बेगार प्रथा पर रोक लगाई।

इन आंदोलनों का महत्व

आरंभिक विद्रोह सैन्य दृष्टि से विफल रहे, पर उन्होंने कानून बदल दिए: नील आयोग, बंगाल काश्तकारी अधिनियम, दक्कन कृषक राहत अधिनियम, चंपारण कृषि अधिनियम, संथाल परगना विनियम और छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, ये सब सुधार की भावना से नहीं, विद्रोह से छीने गए थे। 1920 के बाद किसान संगठित शक्ति के रूप में राष्ट्रीय आंदोलन में आया, किसान सभाओं के माध्यम से और चंपारण, खेड़ा तथा बारडोली के सत्याग्रहों के माध्यम से, जिन्होंने कांग्रेस को गांव को जोड़ना सिखाया। जनजातीय नेता, जो बहुत समय तक केवल स्थानीय गीतों में बचे रहे, अब राष्ट्रीय स्मृति का हिस्सा हैं; बिरसा मुंडा की जयंती 15 नवंबर 2021 से जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाई जाती है।

परीक्षा की दृष्टि से

परीक्षक चार बातें पूछते हैं: आंदोलन और उसका वर्ष, स्थान, नेता और उसके बाद आया अधिनियम। सबसे आम प्रश्न हैं नील विद्रोह का जिला (नदिया), नील दर्पण के लेखक (दीनबंधु मित्र), दक्कन दंगों के बाद का अधिनियम (1879), संथाल हूल के नेता, उलगुलान तथा हूल का अर्थ, बिरसा मुंडा के विद्रोह के बाद का अधिनियम (1908) और अखिल भारतीय किसान सभा के पहले अध्यक्ष। तीन जाल बार-बार आते हैं: नील दर्पण के लेखक के रूप में माइकल मधुसूदन दत्त, जो केवल अनुवादक थे; किसान सभा के पहले अध्यक्ष के रूप में एन. जी. रंगा, जो पहले महासचिव थे; और दक्कन दंगों के परिणाम के रूप में 1885 का बंगाल काश्तकारी अधिनियम। एसएससी तथा राज्य परीक्षाओं के सुमेलन प्रश्न नेताओं को विद्रोहों से जोड़ते हैं, इसलिए जनजातीय आंदोलनों की तालिका जोड़ियों के रूप में याद करें।

महत्वपूर्ण तथ्य

नील विद्रोह1859 से 1860, नदिया जिला, बंगाल; दिगंबर विश्वास और बिष्णु विश्वास
नील दर्पणदीनबंधु मित्र का नाटक, 1860
पबना कृषक सभाएं1873, यूसुफशाही परगना; परिणाम 1885 का बंगाल काश्तकारी अधिनियम
दक्कन दंगे1875, पूना जिले के सुपा से आरंभ; 1879 का दक्कन कृषक राहत अधिनियम
पगड़ी संभाल जट्टा1907, पंजाब; अजीत सिंह और किशन सिंह
चंपारण सत्याग्रह1917; तीनकठिया प्रथा; 1918 का चंपारण कृषि अधिनियम
बारडोली सत्याग्रह1928, सूरत जिला; वल्लभभाई पटेल को सरदार की उपाधि
अखिल भारतीय किसान सभा1936 में लखनऊ में स्थापना; अध्यक्ष स्वामी सहजानंद सरस्वती, महासचिव एन. जी. रंगा
तेभागा आंदोलन1946, बंगाल; बरगादारों के लिए दो-तिहाई हिस्सा
तेलंगाना किसान संघर्ष1946 से 1951; वेट्टी यानी बेगार प्रथा के विरुद्ध
संथाल हूल1855 से 1856; सिदो और कान्हू मुर्मू; 1855 में संथाल परगना का गठन
मुंडा उलगुलान1899 से 1900; बिरसा मुंडा, धरती आबा; 1908 का छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम
कोल विद्रोह1831 से 1832, छोटानागपुर; बुद्धू भगत
खासी विद्रोह1829 से 1833; तिरोत सिंह
रम्पा विद्रोह1922 से 1924; अल्लूरी सीताराम राजू
जनजातीय गौरव दिवस15 नवंबर, बिरसा मुंडा की जयंती, 2021 से मनाया जाता है

इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ

Q1.भारतीय इतिहासमध्यम

1859 से 1860 का नील विद्रोह बंगाल के किस जिले में भड़का था?

  1. A.नदिया
  2. B.पबना
  3. C.मिदनापुर
  4. D.बीरभूम
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. नदिया

व्याख्या

सही उत्तर A, नदिया है। नील विद्रोह, जिसे नील बिद्रोह कहा जाता है, 1859 में बंगाल के नदिया जिले में आरंभ हुआ, जहां रैयतों ने बागान मालिकों की थोपी हुई शर्तों पर नील बोने से इनकार कर दिया। दिगंबर विश्वास और बिष्णु विश्वास ने इस हड़ताल का नेतृत्व किया, जो पूरे बंगाल में फैल गई; सरकार ने 1860 में नील आयोग नियुक्त किया और बागान मालिकों ने कारखाने बंद कर दिए। B, पबना, गलत है क्योंकि वहां 1873 में जमींदारों की अवैध लगान मांगों के विरुद्ध कृषक सभाएं बनी थीं, नील की हड़ताल नहीं हुई। C, मिदनापुर, गलत है क्योंकि वह जंगल महाल के बहुत पहले के चुआर विद्रोह से जुड़ा है। D, बीरभूम, गलत है; वहां इस नाम का कोई विद्रोह नहीं हुआ और यह विकल्प केवल पड़ोसी जिला होने के कारण रखा गया है।

Q2.भारतीय इतिहासमध्यम

नील बागान मालिकों की क्रूरता उजागर करने वाला नाटक नील दर्पण किसने लिखा था?

  1. A.बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय
  2. B.दीनबंधु मित्र
  3. C.माइकल मधुसूदन दत्त
  4. D.ईश्वर चंद्र विद्यासागर
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. दीनबंधु मित्र

व्याख्या

सही उत्तर B, दीनबंधु मित्र है। दीनबंधु मित्र ने बांग्ला नाटक नील दर्पण लिखा, जो 1860 में प्रकाशित हुआ और जिसमें दिखाया गया कि नील के बागान मालिक बंगाल के किसानों पर कैसे दबाव डालते थे; यह शीघ्र ही अंग्रेजी पढ़ने वाले वर्ग और प्रशासन तक पहुंच गया। A गलत है क्योंकि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने आनंदमठ तथा अन्य उपन्यास और वंदे मातरम गीत लिखा, यह नाटक नहीं। C, माइकल मधुसूदन दत्त, तगड़ा जाल है: उन्होंने नील दर्पण का अंग्रेजी अनुवाद किया, जिसे रेवरेंड जेम्स लॉन्ग ने प्रकाशित किया और इसके लिए उन पर मुकदमा चला, पर मूल नाटक उन्होंने नहीं लिखा। D गलत है क्योंकि ईश्वर चंद्र विद्यासागर का कार्यक्षेत्र शिक्षा और विधवा पुनर्विवाह का अभियान था, यह आंदोलन नहीं। परीक्षा में लेखक और अनुवादक की यही जोड़ी सबसे आम जाल है, इसलिए पहले लेखक और बाद में अनुवादक याद रखें, और प्रकाशक का नाम अलग से।

Q3.भारतीय इतिहासमध्यम

1875 के दक्कन दंगे मुख्यतः किस वर्ग के विरुद्ध थे?

  1. A.नील बागान मालिक
  2. B.साहूकार
  3. C.वन ठेकेदार
  4. D.ईसाई मिशनरी
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. साहूकार

व्याख्या

सही उत्तर B, साहूकार है। दक्कन दंगे 1875 में पूना जिले के सुपा से आरंभ हुए और पूना तथा अहमदनगर में फैले। रैयतवाड़ी बंदोबस्त में किसान राजस्व सीधे राज्य को देता था, और कपास के गिरते दामों वाले वर्ष में उसे चुकाने के लिए वह मारवाड़ी तथा गुजराती साहूकारों से उधार लेता था; विद्रोहियों ने उन पर हमला किया और कर्ज के बंधपत्र तथा बहीखाते जला दिए। सरकार का उत्तर 1879 का दक्कन कृषक राहत अधिनियम था। A गलत है क्योंकि नील बागान मालिक 1859 के बंगाल विद्रोह के निशाने पर थे। C गलत है क्योंकि वन ठेकेदारों के विरुद्ध रोष जनजातीय क्षेत्रों में था, जैसे संथाल और रम्पा विद्रोहों में, 1875 के दक्कन में नहीं। D गलत है; दक्कन दंगों की कोई धार्मिक दिशा नहीं थी। इसीलिए दक्कन दंगों को ऋणग्रस्तता के विद्रोह के रूप में याद रखें, और नील विद्रोह को बागान मालिकों के विरुद्ध।

Q4.भारतीय इतिहासकठिन

दक्कन दंगों के सीधे परिणामस्वरूप कौन सा अधिनियम पारित हुआ?

  1. A.बंगाल काश्तकारी अधिनियम, 1885
  2. B.दक्कन कृषक राहत अधिनियम, 1879
  3. C.चंपारण कृषि अधिनियम, 1918
  4. D.छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. दक्कन कृषक राहत अधिनियम, 1879

व्याख्या

सही उत्तर B, दक्कन कृषक राहत अधिनियम, 1879 है। 1875 के दंगों के बाद सरकार ने दक्कन में किसानों के कर्ज की जांच कराई और यह अधिनियम पारित किया, जिसने डिक्री के निष्पादन में कर्जदार की भूमि बिकवाने की साहूकार की शक्ति सीमित की और अदालतों को बंधपत्र के पीछे झांकने का अधिकार दिया। A गलत है क्योंकि 1885 का बंगाल काश्तकारी अधिनियम 1873 के पबना आंदोलन के बाद आया और बंगाल के काश्तकारों को अधिभोग अधिकार दिए। C गलत है क्योंकि 1918 का चंपारण कृषि अधिनियम 1917 के गांधी के सत्याग्रह के बाद आया और बिहार में नील की तीनकठिया प्रथा समाप्त की। D गलत है क्योंकि 1908 का छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम बिरसा मुंडा के उलगुलान के बाद आया और जनजातीय क्षेत्रों की खूंटकट्टी भूमि की रक्षा की। प्रत्येक विद्रोह को उसके बाद आए अधिनियम के साथ याद करना इस अध्याय को चार-पांच सुरक्षित अंकों में बदल देता है।

Q5.भारतीय इतिहासआसान

1855 से 1856 के संथाल हूल का नेतृत्व किसने किया था?

  1. A.बिरसा मुंडा और जतरा भगत
  2. B.सिदो और कान्हू मुर्मू
  3. C.चक्र बिसोई और टोम्मा सोरा
  4. D.तिरोत सिंह और गोमधर कुंवर
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. सिदो और कान्हू मुर्मू

व्याख्या

सही उत्तर B, सिदो और कान्हू मुर्मू है। संथाल हूल, 1857 से पहले का सबसे बड़ा जनजातीय विद्रोह, राजमहल पहाड़ियों के दामिन-ए-कोह क्षेत्र में भाइयों सिदो और कान्हू मुर्मू के नेतृत्व में हुआ, जिनके साथ चांद और भैरव भी थे। संथाल साहूकारों, जमींदारों और रेलवे ठेकेदारों के विरुद्ध उठे, कंपनी का शासन समाप्त घोषित किया, और एक वर्ष बाद दबा दिए गए; इसके बाद 1855 में संथाल परगना को अलग जिला बनाया गया। A गलत है क्योंकि बिरसा मुंडा ने 1899 के उलगुलान और जतरा भगत ने 1914 के टाना भगत आंदोलन का नेतृत्व किया। C गलत है क्योंकि चक्र बिसोई ने ओडिशा की पहाड़ियों में खोंड विद्रोह और टोम्मा सोरा ने 1879 के कोया विद्रोह का नेतृत्व किया। D गलत है क्योंकि तिरोत सिंह ने खासी विद्रोह और गोमधर कुंवर ने 1828 के अहोम विद्रोह का नेतृत्व किया।

Q6.भारतीय इतिहासमध्यम

छोटानागपुर में 1899 से 1900 के विद्रोह से जुड़े शब्द उलगुलान का अर्थ क्या है?

  1. A.महान विप्लव
  2. B.धर्मयुद्ध
  3. C.तीन भागों का हिस्सा
  4. D.भूमि की वापसी
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. महान विप्लव

व्याख्या

सही उत्तर A, महान विप्लव है। उलगुलान मुंडारी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ महान उलटफेर या विप्लव है, और यही नाम मुंडाओं ने उस विद्रोह को दिया जो बिरसा मुंडा ने 1899 से 1900 तक छोटानागपुर में जमींदारों, साहूकारों, ठेकेदारों और मिशनरियों के विरुद्ध चलाया। बिरसा को धरती आबा यानी धरती का पिता कहा जाता था, और विद्रोह ने 1908 का छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम करवाया। B गलत है क्योंकि बिरसा के नए पंथ के कारण विद्रोह का धार्मिक पक्ष होते हुए भी उसे धर्मयुद्ध कभी नहीं कहा गया। C गलत है क्योंकि तीन भागों का हिस्सा, अर्थात उपज का दो-तिहाई, 1946 के बंगाल के तेभागा आंदोलन की मांग है। D गलत है क्योंकि मुंडाओं की भूमि संबंधी मांग खूंटकट्टी शब्द में व्यक्त होती थी, अर्थात उस परिवार का अधिकार जिसने भूमि पहले साफ की।

Q7.भारतीय इतिहासकठिन

1908 का छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम किस आंदोलन के बाद पारित हुआ?

  1. A.संथाल हूल
  2. B.कोल विद्रोह
  3. C.मुंडा उलगुलान
  4. D.टाना भगत आंदोलन
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. मुंडा उलगुलान

व्याख्या

सही उत्तर C, मुंडा उलगुलान है। बिरसा मुंडा के नेतृत्व में 1899 से 1900 तक चले विद्रोह ने सरकार को 1908 में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम पारित करने के लिए विवश किया, जिसने उस खूंटकट्टी अधिकार को मान्यता दी जिसके अनुसार जो भूमि मुंडा परिवार के पूर्वजों ने साफ की थी वह उसी की थी, और बेठ बेगारी यानी बिना मजदूरी के जबरन श्रम पर रोक लगाई। A गलत है क्योंकि 1855 के संथाल हूल का परिणाम भिन्न था, अर्थात संथाल परगना को बाहरी लोगों के लिए बंद अलग जिला बनाना। B गलत है क्योंकि बुद्धू भगत के नेतृत्व वाले 1831 से 1832 के कोल विद्रोह से केवल दक्षिण-पश्चिम सीमांत एजेंसी में प्रशासनिक परिवर्तन हुए। D गलत है क्योंकि उरांवों में जतरा भगत का 1914 का टाना भगत आंदोलन अहिंसक सुधार आंदोलन था, जो बाद में कांग्रेस से जुड़ गया और उससे ऐसा कोई अधिनियम नहीं आया।

Q8.भारतीय इतिहासआसान

वल्लभभाई पटेल को सरदार की उपाधि किस आंदोलन के नेतृत्व के लिए मिली?

  1. A.खेड़ा सत्याग्रह
  2. B.चंपारण सत्याग्रह
  3. C.बारडोली सत्याग्रह
  4. D.मोपला विद्रोह
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. बारडोली सत्याग्रह

व्याख्या

सही उत्तर C, बारडोली सत्याग्रह है। 1928 में सूरत जिले के बारडोली के किसानों ने लगभग तीस प्रतिशत की भूमि-राजस्व वृद्धि देने से इनकार कर दिया। वल्लभभाई पटेल ने इस इनकार को संगठित किया, ब्रूमफील्ड और मैक्सवेल की जांच हुई, और वृद्धि घटाकर लगभग छह प्रतिशत कर दी गई; बारडोली की महिलाओं ने पटेल को सरदार की उपाधि दी। A गलत है क्योंकि 1918 का खेड़ा सत्याग्रह, जिसमें पटेल भी शामिल थे, गांधी के नेतृत्व में फसल खराब होने पर राजस्व में छूट के लिए था। B गलत है क्योंकि 1917 का चंपारण सत्याग्रह भारत में गांधी का पहला सत्याग्रह था और बिहार की तीनकठिया नील प्रथा से संबंधित था। D गलत है क्योंकि 1921 का मलाबार का मोपला विद्रोह जन्मी भूस्वामियों के विरुद्ध काश्तकारों का विद्रोह था, जो खिलाफत आंदोलन से जुड़ा था।

Q9.भारतीय इतिहासकठिन

1936 में स्थापित अखिल भारतीय किसान सभा के पहले अध्यक्ष कौन थे?

  1. A.एन. जी. रंगा
  2. B.स्वामी सहजानंद सरस्वती
  3. C.बाबा रामचंद्र
  4. D.इंदुलाल याज्ञिक
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. स्वामी सहजानंद सरस्वती

व्याख्या

सही उत्तर B, स्वामी सहजानंद सरस्वती है। अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना अप्रैल 1936 में लखनऊ में हुई, और बिहार किसान सभा खड़ी करने वाले स्वामी सहजानंद सरस्वती उसके पहले अध्यक्ष चुने गए। A, एन. जी. रंगा, इस प्रश्न का जाल है: आंध्र के इस किसान नेता को संगठन का पहला महासचिव बनाया गया था, अध्यक्ष नहीं। C गलत है क्योंकि बाबा रामचंद्र ने संयुक्त प्रांत में 1920 की अवध किसान सभा का नेतृत्व किया और वे राष्ट्रीय संगठन के अध्यक्ष नहीं थे। D गलत है क्योंकि इंदुलाल याज्ञिक ने 1918 के खेड़ा सत्याग्रह और गुजरात की किसान राजनीति में गांधी तथा पटेल के साथ काम किया, पर स्थापना के समय वे अखिल भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष नहीं बने। यह भी याद रखें कि इस संगठन का नाम अखिल भारतीय किसान सभा हुआ और उसी वर्ष फैजपुर कांग्रेस अधिवेशन के साथ उसकी बैठक हुई थी।

Q10.भारतीय इतिहासमध्यम

1946 के बंगाल के तेभागा आंदोलन में बटाईदारों की मांग क्या थी?

  1. A.जोती जाने वाली भूमि का स्वामित्व
  2. B.आधे के स्थान पर उपज का दो-तिहाई भाग
  3. C.बेगार प्रथा की समाप्ति
  4. D.भूमि-राजस्व घटाकर एक तिहाई करना
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. आधे के स्थान पर उपज का दो-तिहाई भाग

व्याख्या

सही उत्तर B, आधे के स्थान पर उपज का दो-तिहाई भाग है। तेभागा का अर्थ तीन हिस्से है। बंगाल के बटाईदारों, जिन्हें बरगादार कहा जाता था, ने 1946 में बंगाल प्रांतीय किसान सभा के संगठन में यह मांग रखी कि फसल का बंटवारा इस प्रकार हो कि श्रम और बीज देने वाला कृषक तीन में से दो हिस्से रखे और एक हिस्सा जोतदार को मिले; फ्लाउड आयोग ने भी यही सिफारिश की थी। A गलत है क्योंकि मांग उपज के बंटवारे पर थी, भूमि के स्वामित्व पर नहीं। C गलत है क्योंकि बेगार, जिसे वेट्टी कहा जाता था, उसकी समाप्ति की मांग निजाम के जागीरदारों के विरुद्ध 1946 से 1951 के तेलंगाना संघर्ष की थी। D गलत है क्योंकि भूमि-राजस्व भूस्वामी राज्य को देता था और वह बटाईदारों का विवाद नहीं था।

Q11.भारतीय इतिहासमध्यम

आंध्र के एजेंसी क्षेत्रों में 1922 से 1924 के रम्पा विद्रोह का नेतृत्व किसने किया?

  1. A.अल्लूरी सीताराम राजू
  2. B.टोम्मा सोरा
  3. C.हाइपोउ जादोनांग
  4. D.मदारी पासी
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. अल्लूरी सीताराम राजू

व्याख्या

सही उत्तर A, अल्लूरी सीताराम राजू है। 1922 से 1924 का रम्पा या मान्यम विद्रोह अल्लूरी सीताराम राजू ने चलाया, जिन्होंने गोदावरी एजेंसी के कोया तथा अन्य पहाड़ी लोगों को उन वन कानूनों के विरुद्ध संगठित किया जो उनकी स्थानांतरित खेती रोकते थे, और सड़क निर्माण के लिए ली जाने वाली बेगार के विरुद्ध भी। उन्होंने छापामार लड़ाई लड़ी और 1924 में मारे गए। B, टोम्मा सोरा, गलत है क्योंकि उन्होंने इन्हीं क्षेत्रों में 1879 से 1880 का पहले का कोया विद्रोह चलाया था। C गलत है क्योंकि हाइपोउ जादोनांग ने मणिपुर और नागा पहाड़ियों में जेलियांग्रोंग आंदोलन चलाया और 1931 में उन्हें फांसी दी गई; रानी गाइदिन्ल्यू ने उसे आगे बढ़ाया। D गलत है क्योंकि मदारी पासी ने 1921 और 1922 में हरदोई, बहराइच तथा सीतापुर के किसानों का एका आंदोलन चलाया।

Q12.भारतीय इतिहासकठिन

1907 का पंजाब का पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन किसके विरुद्ध था?

  1. A.पंजाब भूमि उपनिवेशन अधिनियम और नहरी जल दरों के विरुद्ध
  2. B.किसानों की सेना में भर्ती के विरुद्ध
  3. C.भूमि-राजस्व के स्थायी बंदोबस्त के विरुद्ध
  4. D.यूरोपीय बागान मालिकों के नील ठेकों के विरुद्ध
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सही उत्तर: A. पंजाब भूमि उपनिवेशन अधिनियम और नहरी जल दरों के विरुद्ध

व्याख्या

सही उत्तर A, पंजाब भूमि उपनिवेशन अधिनियम और नहरी जल दरों के विरुद्ध है। 1907 में पंजाब की नहरी बस्तियों के किसानों ने 1906 के पंजाब भूमि उपनिवेशन अधिनियम की कठोर शर्तों तथा जल दर और भूमि-राजस्व में वृद्धि के विरुद्ध आंदोलन किया। अजीत सिंह और किशन सिंह ने इसका नेतृत्व किया, और इसका नाम पगड़ी संभाल जट्टा गीत से पड़ा; सरकार ने अधिनियम वापस ले लिया। B गलत है क्योंकि सेना में भर्ती से जुड़ी शिकायतें प्रथम विश्वयुद्ध के वर्षों की हैं, इस आंदोलन की नहीं। C गलत है क्योंकि स्थायी बंदोबस्त 1793 में बंगाल, बिहार और ओडिशा में लागू हुआ था, जबकि पंजाब महालवाड़ी व्यवस्था में था। D गलत है क्योंकि नील के ठेके बंगाल और बिहार की शिकायत थे। यह भी याद रखें कि इस आंदोलन का नाम बांके दयाल के लिखे गीत पगड़ी संभाल जट्टा से पड़ा, जो उस दौर में पंजाब के गांव-गांव गाया गया।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

किसान आंदोलनों और जनजातीय आंदोलनों में क्या अंतर था?

बसे हुए मैदानों के किसान आंदोलन लगान, राजस्व और कर्ज को लेकर लड़े गए और उनके निशाने पर जमींदार, बागान मालिक तथा साहूकार थे। पहाड़ों और पठारों के जनजातीय आंदोलन भूमि तथा वन को लेकर लड़े गए और बाहरी व्यक्ति को एक वर्ग मानकर उसके विरुद्ध थे, जिसे दिकू कहा जाता था; उनका रूप प्रायः धार्मिक या मसीही होता था और नेता किसी स्वर्ण युग की वापसी का वचन देता था।

तीनकठिया प्रथा क्या थी?

चंपारण में काश्तकार को अपनी बीस कट्ठा जोत में से तीन कट्ठा पर नील बोना पड़ता था, और शर्तें यूरोपीय बागान मालिक तय करता था। 1917 के गांधी के सत्याग्रह से सरकारी जांच हुई और 1918 के चंपारण कृषि अधिनियम ने यह बाध्यता समाप्त कर दी।

खूंटकट्टी का अर्थ क्या है?

खूंटकट्टी मुंडाओं की वह परंपरागत व्यवस्था थी जिसके अनुसार जिस परिवार या कुल ने वन का कोई भाग पहले साफ किया, वह भूमि उसी की होती थी। स्थायी बंदोबस्त और जमींदारों के प्रवेश ने इसे नष्ट कर दिया, इसकी बहाली बिरसा मुंडा के उलगुलान की मुख्य मांग थी, और 1908 के छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम ने इसे कानूनी मान्यता दी।

वल्लभभाई पटेल को सरदार की उपाधि किस आंदोलन से मिली?

1928 के बारडोली सत्याग्रह से। सूरत जिले के बारडोली के किसानों ने लगभग तीस प्रतिशत की भूमि-राजस्व वृद्धि देने से इनकार किया, पटेल ने इस इनकार को संगठित किया, और बारडोली की महिलाओं ने उन्हें सरदार की उपाधि दी। बाद में जांच से वृद्धि घटाकर लगभग छह प्रतिशत कर दी गई।

15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस क्यों मनाया जाता है?

यह 1899 से 1900 के मुंडा उलगुलान के नेता बिरसा मुंडा की जयंती है, जिनका 1900 में रांची जेल में निधन हुआ था। स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय नेताओं के योगदान को चिह्नित करने के लिए यह दिवस 2021 से मनाया जाता है।

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