1991 के आर्थिक सुधार: संकट और एलपीजी नीति
1991 के आर्थिक सुधारों के पूर्ण नोट्स: भुगतान संतुलन संकट, उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नई आर्थिक नीति, प्रमुख समितियां तथा सुधारों के परिणाम।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 5 मिनट

1991 के मध्य में भारत अपने विदेशी भुगतान में चूक के कगार पर था। विदेशी मुद्रा भंडार घटकर लगभग दो सप्ताह के आयात के बराबर रह गया था, केंद्र का राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद के साढ़े आठ प्रतिशत के आसपास था, महंगाई दोहरे अंक में थी, और विदेश में कोई ऋणदाता अल्पकालिक ऋण आगे बढ़ाने को तैयार नहीं था। पी वी नरसिम्हा राव की सरकार ने, जिसमें मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से ऋण लिया, बैंक ऑफ इंग्लैंड के पास स्वर्ण गिरवी रखा, रुपये का अवमूल्यन किया और फिर उन सुधारों की घोषणा की जिन्होंने 1956 से चली आ रही नीति की दिशा बदल दी। इन सुधारों को मिलाकर नई आर्थिक नीति कहा जाता है, या उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण इन तीन शब्दों से जाना जाता है।
संकट क्यों आया
- वर्ष दर वर्ष घाटा: सरकार ने 1980 के दशक में अपनी आय से बहुत अधिक खर्च किया और उसे पूरा करने के लिए देश तथा विदेश से ऋण लिया, जिससे ब्याज भुगतान ही व्यय का बड़ा हिस्सा बन गया।
- चालू खाते का अंतर: आयात निर्यात से तेज बढ़े, और चालू खाते के घाटे को कमाई से नहीं, ऋण से पूरा करना पड़ा।
- 1990 और 1991 का खाड़ी संकट: तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं, तेल आयात का बिल चढ़ गया, और उसी समय पश्चिम एशिया में काम करने वाले भारतीयों से आने वाला धन घट गया।
- विश्वास का टूटना: अनिवासी भारतीयों ने अपनी जमा निकालनी शुरू कर दी और रेटिंग एजेंसियों ने भारत की श्रेणी घटा दी, जिससे नए व्यापारिक ऋण का द्वार बंद हो गया।
- उद्योग की भीतरी कमजोरी: लाइसेंस व्यवस्था, आयात से संरक्षण और घाटे में चलने वाला बड़ा सार्वजनिक क्षेत्र ऊंची लागत तथा कम गुणवत्ता पैदा कर चुके थे, इसलिए निर्यात इतनी तेजी से नहीं बढ़ सका कि आयात का भुगतान हो सके।
उदारीकरण: राज्य पीछे हटता है
24 जुलाई 1991 के औद्योगिक नीति वक्तव्य ने कुछ गिने चुने उद्योगों को छोड़कर औद्योगिक लाइसेंस व्यवस्था समाप्त कर दी और सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित उद्योगों की सूची घटा दी। उसने एकाधिकार कानून की उस अपेक्षा को हटा दिया कि बड़ी कंपनी विस्तार से पहले सरकार की अनुमति ले, और वह कानून आगे 2002 के प्रतिस्पर्धा अधिनियम से बदल दिया गया। आयात लाइसेंस व्यवस्था चरणों में हटाई गई, परिमाणात्मक प्रतिबंध समाप्त हुए और बहुत ऊंची सीमा शुल्क दरें नीचे लाई गईं। जुलाई 1991 के पहले दिनों में रुपये का दो चरणों में, कुल लगभग उन्नीस प्रतिशत अवमूल्यन हुआ; 1992 में दोहरी विनिमय दर आई और 1994 से रुपया चालू खाते पर परिवर्तनीय हो गया। वित्तीय क्षेत्र में 1991 की नरसिम्हम समिति के बाद बैंकों की निधियों पर सांविधिक दावा घटा, निजी बैंकों को लाइसेंस मिले, आय की पहचान तथा पूंजी के विवेकपूर्ण मानक आए, और 1992 में भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड को सांविधिक शक्तियां मिलीं, जबकि पूंजी निर्गम नियंत्रक का पद समाप्त कर दिया गया जिससे कंपनी अपने शेयर का मूल्य स्वयं तय कर सकी।
निजीकरण और वैश्वीकरण
निजीकरण के दो रूप रहे: विनिवेश, अर्थात किसी सार्वजनिक उपक्रम में सरकार की हिस्सेदारी का एक भाग बेचना, और सामरिक विक्रय, जिसमें प्रबंधन भी निजी क्रेता के पास चला जाता है। जो सार्वजनिक उपक्रम बने रहे उन्हें अधिक स्वतंत्रता दी गई, और महारत्न, नवरत्न तथा मिनीरत्न श्रेणियां बनाई गईं जिससे अच्छा प्रदर्शन करने वाले उपक्रम हर मामले में अनुमति लिए बिना निवेश कर सकें। वैश्वीकरण का अर्थ था अर्थव्यवस्था को विश्व के लिए खोलना: उच्च प्राथमिकता वाले उद्योगों की सूची में इक्यावन प्रतिशत तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश स्वतः अनुमत हुआ और आगे क्षेत्र दर क्षेत्र सीमाएं बढ़ाई गईं; विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम के स्थान पर 1999 में विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम आया, जिससे विदेशी मुद्रा का लेनदेन आपराधिक विषय न रहकर विनियमित विषय बन गया; और 1 जनवरी 1995 को भारत विश्व व्यापार संगठन का संस्थापक सदस्य बना।
पहले और बाद में
| विषय | 1991 से पहले | 1991 के बाद |
|---|---|---|
| उद्योग में प्रवेश | अधिकांश उद्योगों के लिए लाइसेंस आवश्यक | लाइसेंस केवल छोटी सूची के लिए |
| सार्वजनिक क्षेत्र | अपने लिए उद्योगों की लंबी सूची आरक्षित | आरक्षण बहुत घटा दिया गया |
| आयात | परिमाणात्मक प्रतिबंध और बहुत ऊंचे शुल्क | प्रतिबंध हटे, शुल्क चरणों में घटे |
| विनिमय दर | रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित | बाजार आधारित, चालू खाते पर परिवर्तनीय |
| विदेशी निवेश | प्रत्येक मामले में अनुमति, सामान्यतः अल्पांश हिस्सा | स्वतः मार्ग, क्षेत्रीय सीमाएं बढ़ती हुईं |
| पूंजी निर्गम | पूंजी निर्गम नियंत्रक द्वारा मूल्य निर्धारण | कंपनी द्वारा मूल्य निर्धारण, सेबी नियामक |
याद रखने योग्य समितियां
| समिति | विषय |
|---|---|
| नरसिम्हम समिति, 1991 | वित्तीय व्यवस्था तथा बैंकिंग का सुधार |
| चेलैया समिति, 1991 | कर व्यवस्था का सुधार |
| रंगराजन समिति | भुगतान संतुलन तथा सार्वजनिक उपक्रमों का विनिवेश |
| दूसरी नरसिम्हम समिति, 1998 | बैंकिंग सुधार, विवेकपूर्ण मानक और पर्यवेक्षण |
सुधारों ने क्या दिया और क्या छूट गया
सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि पहले के दशकों से ऊपर गई, भुगतान संतुलन का संकट टला और भंडार फिर बने, निर्यात तथा विदेशी निवेश बढ़ा, और सेवा क्षेत्र, विशेषकर सॉफ्टवेयर और व्यावसायिक सेवाएं, अर्थव्यवस्था का सबसे तेज बढ़ता भाग बन गया। उपभोक्ता को विकल्प मिला और निर्मित वस्तुओं में दाम घटे। आलोचना भी परीक्षाओं में उतनी ही मानक है। कृषि को सार्वजनिक निवेश कम मिला और उसकी वृद्धि पिछड़ गई, जिससे खेती और गैर खेती आय का अंतर बढ़ा। रोजगार उत्पादन के साथ नहीं बढ़ा, जिसे रोजगारहीन वृद्धि कहा जाता है, और नया काम बहुत हद तक अनौपचारिक तथा असुरक्षित रहा। लघु उद्योग को ऐसी प्रतिस्पर्धा मिली जिसके लिए वह तैयार नहीं था, और सुधारों के लाभ नगरीय तथा मध्यवर्गीय माने गए। विनिवेश से मिला धन अक्सर संपत्ति बनाने के बजाय घाटा पूरा करने में लगा। उचित निष्कर्ष, और उत्तर में लिखने योग्य बात यही है कि 1991 ने भारतीय अर्थव्यवस्था का ढांचा निर्णायक रूप से बदल दिया, और उससे निकली वृद्धि तेज तो रही पर उतनी समान नहीं जितनी सुधारकों ने कही थी।
परीक्षा की दृष्टि से
इस अध्याय के प्रश्न चार वर्गों में आते हैं। पहला संकट: भंडार का स्तर, खाड़ी युद्ध की भूमिका, स्वर्ण गिरवी रखना और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से ऋण। दूसरा व्यक्ति और तिथियां, जहां प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव तथा वित्त मंत्री मनमोहन सिंह की जोड़ी और औद्योगिक नीति की तिथि 24 जुलाई 1991 बार बार पूछी जाती है। तीसरा परिभाषाएं, और यहां तीनों पदों को अलग रखना आवश्यक है: उदारीकरण व्यापार तथा उद्योग पर सरकारी प्रतिबंधों का हटना है, निजीकरण स्वामित्व या प्रबंधन का निजी हाथों में जाना है, और वैश्वीकरण अर्थव्यवस्था का विश्व से जुड़ना है। चौथा संस्थागत परिवर्तन: 1999 में फेरा से फेमा, 2002 में एमआरटीपी से प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 1992 में सांविधिक सेबी, पूंजी निर्गम नियंत्रक का अंत, और 1 जनवरी 1995 से विश्व व्यापार संगठन की सदस्यता। समितियों के नाम, विशेषकर बैंकिंग के लिए नरसिम्हम और करों के लिए चेलैया, सरल अंक हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य
| संकट का वर्ष | 1991; भंडार घटकर लगभग दो सप्ताह के आयात के बराबर |
|---|---|
| प्रधानमंत्री | पी वी नरसिम्हा राव |
| वित्त मंत्री | मनमोहन सिंह, जिन्होंने जुलाई 1991 में सुधार बजट प्रस्तुत किया |
| नई औद्योगिक नीति | औद्योगिक नीति वक्तव्य, 24 जुलाई 1991 |
| अवमूल्यन | जुलाई 1991 के आरंभ में दो चरणों में, कुल लगभग उन्नीस प्रतिशत |
| स्वर्ण गिरवी | 1991 में विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए बैंक ऑफ इंग्लैंड के पास स्वर्ण गिरवी रखा गया |
| एलपीजी | उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण |
| बैंकिंग सुधार समिति | नरसिम्हम समिति, 1991; दूसरी नरसिम्हम समिति, 1998 |
| कर सुधार समिति | चेलैया समिति, 1991 |
| सेबी | 1992 में सांविधिक शक्तियां; पूंजी निर्गम नियंत्रक का पद समाप्त |
| फेरा से फेमा | 1999 में विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम ने फेरा का स्थान लिया |
| एमआरटीपी से प्रतिस्पर्धा अधिनियम | 2002 के प्रतिस्पर्धा अधिनियम ने एकाधिकार कानून का स्थान लिया |
| चालू खाता परिवर्तनीयता | 1992 की दोहरी विनिमय दर के बाद 1994 से |
| विश्व व्यापार संगठन | 1 जनवरी 1995 से भारत संस्थापक सदस्य |
| विनिवेश | सार्वजनिक उपक्रम में सरकार की हिस्सेदारी का एक भाग बेचना |
| मुख्य आलोचनाएं | कृषि की उपेक्षा, रोजगारहीन वृद्धि, लघु उद्योग पर दबाव, असमान लाभ |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
भारत में 1991 के आर्थिक सुधारों के समय प्रधानमंत्री कौन थे?
- A.पी वी नरसिम्हा राव
- B.अटल बिहारी वाजपेयी
- C.डॉ मनमोहन सिंह
- D.इनमें से कोई नहीं
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. पी वी नरसिम्हा राव
व्याख्या
सही उत्तर A, पी वी नरसिम्हा राव है। वे जून 1991 में भुगतान संतुलन संकट के बीच प्रधानमंत्री बने, और उनकी सरकार ने रुपये का अवमूल्यन किया, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से ऋण लिया तथा उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नई आर्थिक नीति की घोषणा की, जिसमें औद्योगिक नीति वक्तव्य 24 जुलाई 1991 को जारी हुआ। विकल्प C वह जाल है जिसमें अधिकांश उम्मीदवार फंसते हैं: मनमोहन सिंह वे वित्त मंत्री थे जिन्होंने 1991 का सुधार बजट प्रस्तुत किया और सुधारों से उनका नाम ठीक ही जुड़ा है, पर वे प्रधानमंत्री 2004 में बने। विकल्प B गलत है क्योंकि अटल बिहारी वाजपेयी ने बाद में, 1996 में और 1998 से सरकारें चलाईं, जब दूसरी पीढ़ी के सुधार तथा बहुत सा विनिवेश हुआ। विकल्प D गलत है क्योंकि विकल्प A सही व्यक्ति का नाम देता है।
सरकार द्वारा व्यापार पर लगाई गई बाधाओं या प्रतिबंधों को हटाना _______ कहलाता है।
- A.वैश्वीकरण
- B.उदारीकरण
- C.निजीकरण
- D.माध्यस्थम
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. उदारीकरण
व्याख्या
सही उत्तर B, उदारीकरण है। उदारीकरण का अर्थ आर्थिक गतिविधि को सरकारी नियंत्रणों से मुक्त करना है: औद्योगिक लाइसेंस, आयात लाइसेंस और परिमाणात्मक प्रतिबंध, निवेश की सीमाएं तथा प्रशासित ब्याज दरें। भारत में यही 1991 के सुधारों का पहला सूत्र था। विकल्प A गलत है क्योंकि वैश्वीकरण किसी देश की अर्थव्यवस्था का व्यापार, निवेश, प्रौद्योगिकी तथा लोगों की आवाजाही के माध्यम से विश्व से व्यापक एकीकरण है; व्यापार की बाधाएं हटाना वैश्वीकरण में सहायक है पर वह कार्य स्वयं उदारीकरण है। विकल्प C गलत है क्योंकि निजीकरण राज्य से निजी हाथों में स्वामित्व या प्रबंधन का अंतरण है, जो यह प्रश्न है कि कंपनी का स्वामी कौन है, न कि यह कि उस पर कौन से नियम लागू हैं। विकल्प D गलत है क्योंकि माध्यस्थम न्यायालय के बाहर विवाद निपटाने की विधि है और उसका व्यापार नीति से कोई संबंध नहीं।
अधिकांश उद्योगों के लिए औद्योगिक लाइसेंस व्यवस्था समाप्त करने वाली नई औद्योगिक नीति की घोषणा कब हुई?
- A.1 अप्रैल 1991
- B.24 जुलाई 1991
- C.1 जनवरी 1995
- D.24 जुलाई 1994
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. 24 जुलाई 1991
व्याख्या
सही उत्तर B, 24 जुलाई 1991 है। उस तिथि के औद्योगिक नीति वक्तव्य ने एक छोटी आरक्षित सूची को छोड़कर सभी उद्योगों के लिए लाइसेंस समाप्त किया, सार्वजनिक क्षेत्र के लिए रखे उद्योग घटाए, एकाधिकार कानून के अंतर्गत बड़ी कंपनियों के विस्तार पर पूर्व सरकारी अनुमति की अपेक्षा हटाई, और उच्च प्राथमिकता वाले उद्योगों की सूची में इक्यावन प्रतिशत तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश स्वतः अनुमत किया। विकल्प A गलत है क्योंकि 1 अप्रैल वित्तीय वर्ष का आरंभ है और उस दिन ऐसी कोई नीति जारी नहीं हुई। विकल्प C गलत है क्योंकि 1 जनवरी 1995 वह तिथि है जब भारत विश्व व्यापार संगठन का संस्थापक सदस्य बना। विकल्प D गलत है क्योंकि वह सही दिन को गलत वर्ष में रख देता है, जो तिथि वाले प्रश्नों का सामान्य जाल है।
भारत की 1991 की नई आर्थिक नीति के तीन घटक मिलकर किस संक्षिप्त नाम से जाने जाते हैं?
- A.एलपीजी
- B.जीएसटी
- C.एमआरटीपी
- D.फेमा
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. एलपीजी
व्याख्या
सही उत्तर A, एलपीजी है, जो उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के लिए है। उदारीकरण ने उद्योग तथा व्यापार पर लाइसेंस और अन्य नियंत्रण हटाए, निजीकरण ने विनिवेश तथा सामरिक विक्रय के माध्यम से सार्वजनिक क्षेत्र का स्वामित्व और भूमिका घटाई, और वैश्वीकरण ने अर्थव्यवस्था को विदेशी व्यापार, निवेश तथा प्रौद्योगिकी के लिए खोला। विकल्प B गलत है क्योंकि जीएसटी वस्तु और सेवा कर है, जो बहुत बाद के काल का अप्रत्यक्ष कर सुधार है। विकल्प C गलत है क्योंकि एमआरटीपी का अर्थ 1969 का एकाधिकार तथा प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार अधिनियम है, जो सुधार पूर्व काल का कानून था, जिसे सुधारों ने पहले संशोधित किया और जिसे आगे 2002 के प्रतिस्पर्धा अधिनियम ने बदल दिया। विकल्प D गलत है क्योंकि फेमा 1999 का विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम है, जो सुधारों के भीतर एक उपाय है, पूरी नीति का नाम नहीं।
आर्थिक सुधारों की शुरुआत करने वाला जुलाई 1991 का बजट किसने प्रस्तुत किया?
- A.यशवंत सिन्हा
- B.मनमोहन सिंह
- C.प्रणब मुखर्जी
- D.सी रंगराजन
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. मनमोहन सिंह
व्याख्या
सही उत्तर B, मनमोहन सिंह है। पी वी नरसिम्हा राव की सरकार में वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने जुलाई 1991 का बजट प्रस्तुत किया, जिसमें सब्सिडी घटाई गई, राजकोषीय घाटा कम किया गया, सीमा शुल्क नीचे लाए गए और सुधारों का ढांचा रखा गया, और यह सब उसी महीने के आरंभ में रुपये के अवमूल्यन के बाद हुआ। विकल्प A गलत है क्योंकि यशवंत सिन्हा बाद में, 1990 के दशक के उत्तरार्ध की सरकारों में वित्त मंत्री रहे और दूसरी पीढ़ी के सुधारों से जुड़े हैं। विकल्प C गलत है क्योंकि प्रणब मुखर्जी 1980 के दशक में वित्त मंत्री रहे थे और इस पद पर फिर 2009 में आए। विकल्प D गलत है क्योंकि सी रंगराजन केंद्रीय बैंकर तथा अर्थशास्त्री थे जिन्होंने भुगतान संतुलन और विनिवेश पर समितियों की अध्यक्षता की, पर उन्होंने कोई बजट प्रस्तुत नहीं किया।
जुलाई 1991 के पहले दिनों में भारतीय रुपये के साथ क्या हुआ?
- A.प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले उसका मूल्य बढ़ाया गया
- B.दो चरणों में कुल लगभग उन्नीस प्रतिशत अवमूल्यन किया गया
- C.उसे पूंजी खाते पर पूर्णतः परिवर्तनीय बनाया गया
- D.उसे स्थायी रूप से अमेरिकी डॉलर से जोड़ दिया गया
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. दो चरणों में कुल लगभग उन्नीस प्रतिशत अवमूल्यन किया गया
व्याख्या
सही उत्तर B, दो चरणों में कुल लगभग उन्नीस प्रतिशत अवमूल्यन है। रिजर्व बैंक ने 1 जुलाई और फिर 3 जुलाई 1991 को रुपये का मूल्य घटाया, जिससे निर्यात विदेश में सस्ता हो, आयात हतोत्साहित हो और संकट के समय मुद्रा में विश्वास लौटे। विकल्प A गलत है क्योंकि मूल्य बढ़ाने से व्यापार का अंतर और चौड़ा होता, जो उस स्थिति की मांग के विपरीत था। विकल्प C गलत है क्योंकि परिवर्तनीयता बाद में आई और केवल चालू खाते पर, जिसे 1992 की दोहरी विनिमय दर के बाद चरणों में अनुमति मिली और 1994 में पूरा किया गया; रुपया आज भी पूंजी खाते पर पूर्णतः परिवर्तनीय नहीं है। विकल्प D गलत है क्योंकि सुधारों ने भारत को स्थिर दर से हटाकर बाजार आधारित विनिमय दर की ओर बढ़ाया, किसी स्थायी खूंटे की ओर नहीं।
1991 में वित्तीय व्यवस्था और बैंकिंग के सुधार की सिफारिश के लिए बनी समिति के अध्यक्ष कौन थे?
- A.राजा जे चेलैया
- B.एम नरसिम्हम
- C.सी रंगराजन
- D.बिमल जालान
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. एम नरसिम्हम
व्याख्या
सही उत्तर B, एम नरसिम्हम है। उनकी 1991 की समिति ने नकद आरक्षित अनुपात तथा सांविधिक चलनिधि अनुपात के माध्यम से बैंकों की निधियों पर सांविधिक दावा घटाने, नए निजी बैंकों को अनुमति देने, आय की पहचान तथा पूंजी पर्याप्तता के विवेकपूर्ण मानक लागू करने और बैंकों को शाखा विस्तार में स्वतंत्रता देने की सिफारिश की; उनकी दूसरी समिति ने 1998 में पर्यवेक्षण तथा सुदृढ़ीकरण पर प्रतिवेदन दिया। विकल्प A गलत है क्योंकि राजा चेलैया ने उसी काल की कर सुधार समिति की अध्यक्षता की, और उन्हें करों से तथा नरसिम्हम को बैंकिंग से जोड़ना ही इस प्रश्न में परखा जा रहा अंतर है। विकल्प C गलत है क्योंकि सी रंगराजन ने भुगतान संतुलन और विनिवेश पर समितियों की अध्यक्षता की। विकल्प D गलत है क्योंकि बिमल जालान बाद के कार्यों से जुड़े हैं, जिसमें रिजर्व बैंक के आर्थिक पूंजी ढांचे पर बनी समिति भी है।
विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम का स्थान किस कानून ने और किस वर्ष लिया?
- A.प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002
- B.विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999
- C.विदेश व्यापार नीति, 1992
- D.धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999
व्याख्या
सही उत्तर B, 1999 का विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम है। 1973 का पुराना अधिनियम विनिमय नियंत्रण के उल्लंघन को आपराधिक अपराध मानता था और दोष की उपधारणा करता था; नया अधिनियम अधिकांश उल्लंघनों को दीवानी उल्लंघन मानता है जिन पर अर्थदंड लगता है, और उसका उद्देश्य बाहरी व्यापार तथा भुगतान को सुगम बनाना और विदेशी मुद्रा बाजार का व्यवस्थित विकास बताया गया है। विकल्प A गलत है क्योंकि 2002 के प्रतिस्पर्धा अधिनियम ने एकाधिकार तथा प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार अधिनियम का स्थान लिया, जो सुधार पूर्व काल का भिन्न कानून था। विकल्प C गलत है क्योंकि 1992 की आयात निर्यात नीति ने व्यापार लाइसेंस को उदार किया पर विनिमय कानून को नहीं बदला। विकल्प D गलत है क्योंकि 2002 का धन शोधन निवारण अधिनियम अपराध की आय से संबंधित है और पूरी तरह भिन्न उद्देश्य से बना।
भारत किस तिथि से विश्व व्यापार संगठन का संस्थापक सदस्य बना?
- A.24 जुलाई 1991
- B.1 जनवरी 1995
- C.1 अप्रैल 1997
- D.1 जनवरी 2000
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. 1 जनवरी 1995
व्याख्या
सही उत्तर B, 1 जनवरी 1995 है। उरुग्वे दौर की वार्ताओं के अंत में उस तिथि को विश्व व्यापार संगठन अस्तित्व में आया और उसने 1947 के प्रशुल्क तथा व्यापार पर सामान्य समझौते का स्थान लिया, और गैट का पक्षकार रहने के कारण भारत उसका संस्थापक सदस्य बना। सदस्यता के लिए भारत को अपने प्रशुल्क बांधने, आयात पर परिमाणात्मक प्रतिबंध चरणबद्ध रूप से हटाने तथा कृषि, सेवाओं और बौद्धिक संपदा के समझौते स्वीकार करने पड़े। विकल्प A गलत है क्योंकि 24 जुलाई 1991 औद्योगिक नीति वक्तव्य की तिथि है। विकल्प C गलत है क्योंकि इस संदर्भ में 1 अप्रैल 1997 को कोई ऐसी घटना नहीं पड़ती। विकल्प D गलत है क्योंकि 2000 तक भारत पहले से सदस्य था और वस्तुतः विश्व व्यापार संगठन के दायित्वों के अंतर्गत अपने अंतिम परिमाणात्मक प्रतिबंध हटा रहा था।
सरकार द्वारा किसी सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम में अपनी हिस्सेदारी का एक भाग बेचना कहलाता है:
- A.राष्ट्रीयकरण
- B.विनिवेश
- C.अवमूल्यन
- D.घाटे की वित्त व्यवस्था
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. विनिवेश
व्याख्या
सही उत्तर B, विनिवेश है। यह किसी सार्वजनिक उपक्रम में सरकार की अंश पूंजी का एक भाग बेचना है, चाहे शेयर बाजार के माध्यम से जनता को या संस्थागत तथा सामरिक क्रेताओं को; जब बहुमत हिस्सेदारी बेची जाए और प्रबंधन भी क्रेता के पास चला जाए तो उसे सामरिक विक्रय कहते हैं। विकल्प A गलत है क्योंकि राष्ट्रीयकरण इसकी उलटी प्रक्रिया है, अर्थात किसी निजी उपक्रम का राज्य के स्वामित्व में जाना, जैसा 1969 और 1980 में बैंकों के साथ हुआ। विकल्प C गलत है क्योंकि अवमूल्यन मुद्रा के बाहरी मूल्य में कमी है, जो विनिमय दर नीति का विषय है। विकल्प D गलत है क्योंकि घाटे की वित्त व्यवस्था का अर्थ सरकारी व्यय को ऋण या मुद्रा सृजन से पूरा करना है, और 1980 के दशक के घाटे इसी प्रकार पूरे किए गए थे।
एकाधिकार तथा प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार अधिनियम, 1969 का स्थान किसने लिया?
- A.प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002
- B.कंपनी अधिनियम, 2013
- C.औद्योगिक विवाद अधिनियम
- D.उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002
व्याख्या
सही उत्तर A, प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 है। पुराना कानून आकार को ही संदेह की दृष्टि से देखता था और बड़ी कंपनियों से अपेक्षा करता था कि विस्तार, नया उपक्रम लगाने या विलय से पहले सरकार की अनुमति लें; 1991 के सुधारों ने वह अपेक्षा हटाई, और 2002 के अधिनियम ने पूरा कानून बदल दिया तथा ध्यान कंपनी के आकार से उसके आचरण पर, अर्थात प्रतिस्पर्धा विरोधी करारों, प्रभावी स्थिति के दुरुपयोग और संयोजनों पर ले गया, जिसका नियामक भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग है। विकल्प B गलत है क्योंकि कंपनी अधिनियम कंपनियों के गठन तथा प्रबंधन को नियंत्रित करता है। विकल्प C गलत है क्योंकि औद्योगिक विवाद कानून नियोजकों और कर्मकारों से संबंधित है। विकल्प D गलत है क्योंकि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम उपभोक्ताओं की शिकायतों के निवारण से संबंधित है, जो जुड़ा हुआ पर अलग क्षेत्र है।
1991 के संकट के चरम पर भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग कितने समय के आयात का भुगतान करने के लिए पर्याप्त था?
- A.दो सप्ताह
- B.छह महीने
- C.एक वर्ष
- D.तीन वर्ष
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. दो सप्ताह
व्याख्या
सही उत्तर A, लगभग दो सप्ताह है। वर्षों के चालू खाता घाटे, खाड़ी संकट के बाद तेल की कीमतों में वृद्धि तथा प्रेषण में गिरावट, और अनिवासी भारतीयों द्वारा जमा निकाले जाने से भंडार खाली हो चला था, और सबसे बुरी स्थिति में वह केवल पंद्रह दिन के आयात का भुगतान कर सकता था। इसी कारण सरकार ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से ऋण लिया और विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए विदेश में स्वर्ण गिरवी रखा। विकल्प B, C और D उन सुखद स्थितियों का वर्णन करते हैं जो कोई देश अच्छे वर्षों में बनाता है, और छह महीने या अधिक के आयात लायक भंडार संकट का नहीं बल्कि मजबूती का संकेत माना जाता है। जिस देश का भंडार एक वर्ष या तीन वर्ष के आयात के बराबर हो उसे आपात ऋण की आवश्यकता ही नहीं पड़ती, और यही विरोध इस प्रश्न में दिखाया गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1991 का आर्थिक संकट किस कारण आया?
वर्षों के बड़े राजकोषीय तथा चालू खाता घाटे, जिन्हें ऋण से पूरा किया गया, 1990 और 1991 के खाड़ी संकट के बाद तेल आयात के बढ़ते बिल और घटते प्रेषण, अनिवासी भारतीयों द्वारा जमा निकालना और रेटिंग एजेंसियों द्वारा श्रेणी घटाना। इन सबने भंडार को केवल दो सप्ताह के आयात लायक छोड़ दिया और भारत को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से ऋण लेना पड़ा।
भारतीय अर्थव्यवस्था में एलपीजी का अर्थ क्या है?
उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण, जो 1991 की नई आर्थिक नीति के तीन सूत्र हैं। उदारीकरण ने उद्योग तथा व्यापार को लाइसेंस और परिमाणात्मक प्रतिबंधों से मुक्त किया, निजीकरण ने सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका तथा स्वामित्व घटाया, और वैश्वीकरण ने अर्थव्यवस्था को विदेशी व्यापार, निवेश तथा प्रौद्योगिकी के लिए खोला।
उदारीकरण और निजीकरण में क्या अंतर है?
उदारीकरण आर्थिक गतिविधि पर सरकारी नियंत्रणों को हटाना है, जैसे औद्योगिक लाइसेंस, आयात प्रतिबंध और ब्याज दर की सीमाएं, जिससे कंपनियां स्वयं निर्णय ले सकें। निजीकरण स्वामित्व या प्रबंधन का परिवर्तन है, जिसमें राज्य किसी सार्वजनिक उपक्रम में अपनी हिस्सेदारी बेचता है या उसका प्रबंधन निजी क्रेता को देता है। कोई देश निजीकरण के बिना उदारीकरण कर सकता है और इसका उलटा भी।
1991 में प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री कौन थे?
पी वी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री और मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे। सिंह ने जुलाई 1991 का बजट प्रस्तुत किया और उसी महीने 24 जुलाई 1991 का औद्योगिक नीति वक्तव्य जारी हुआ, इसलिए परीक्षाओं में ये दोनों नाम और वह तिथि सामान्यतः साथ पूछे जाते हैं।
विनिवेश क्या है?
सरकार द्वारा किसी सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम में अपनी हिस्सेदारी का एक भाग बेचना, चाहे शेयर बाजार के माध्यम से जनता को या संस्थागत क्रेताओं को। जब बहुमत हिस्सेदारी बेची जाए और प्रबंधन भी क्रेता के पास चला जाए तो उसे सामरिक विक्रय कहते हैं। विनिवेश सरकार की हिस्सेदारी घटाता है, पर स्वयं उपक्रम को बंद नहीं करता।
1991 के सुधारों की मुख्य आलोचनाएं क्या हैं?
कि कृषि में सार्वजनिक निवेश घटा और खेती की वृद्धि शेष अर्थव्यवस्था से पिछड़ गई; कि उत्पादन रोजगार से तेज बढ़ा, जिसे रोजगारहीन वृद्धि कहा जाता है, और नया काम बहुत हद तक अनौपचारिक रहा; कि लघु उद्योग को अचानक प्रतिस्पर्धा झेलनी पड़ी; कि लाभ क्षेत्रों तथा वर्गों के बीच असमान रहे; और कि विनिवेश से मिला धन अक्सर संपत्ति बनाने के बजाय घाटा पूरा करने में गया।
स्रोत
- भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास (कक्षा 11), अध्याय 3: उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण — एनसीईआरटी
- औद्योगिक नीति वक्तव्य, 24 जुलाई 1991 — उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग, वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय
- आर्थिक समीक्षा: सुधार और भारतीय अर्थव्यवस्था — वित्त मंत्रालय, भारत सरकार





