विदेशी मुद्रा और विनिमय दर: अवधारणा और नीति
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए विदेशी मुद्रा के पूर्ण नोट्स: विनिमय दर प्रणालियाँ, मूल्यह्रास और अवमूल्यन, नीर, रीर, परिवर्तनीयता, फेमा और भारत का विदेशी मुद्रा भंडार।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 4 मिनट

विदेशी मुद्रा का अर्थ है दूसरे देशों की मुद्राओं में रखे गए दावे, और विनिमय दर का अर्थ है एक मुद्रा का मूल्य दूसरी मुद्रा में। जब प्रश्नपत्र रुपये के बारे में पूछता है तो वह पाँच बातों में से कोई एक पूछता है: दर कैसे तय होती है, उसे क्या हिलाता है, मूल्यह्रास का व्यापार और कीमतों पर क्या असर पड़ता है, रुपया कहाँ तक परिवर्तनीय है, और देश का भंडार कौन रखता तथा नियंत्रित करता है। ये बातें यहाँ इसी क्रम में दी गई हैं।
विनिमय दर कैसे तय होती है
हर पाठ्यपुस्तक तीन प्रणालियों की तुलना करती है। स्थिर या नियत दर में सरकार एक मूल्य घोषित करती है और विदेशी मुद्रा खरीदकर या बेचकर उसे बनाए रखती है; 1944 की ब्रेटन वुड्स व्यवस्था ऐसी ही थी। अस्थिर या लोचशील दर में बाजार माँग और पूर्ति से मूल्य तय करता है, जहाँ माँग आयातक, यात्री तथा विदेशी ऋण चुकाने वाले पैदा करते हैं और पूर्ति निर्यातक, विदेशी निवेशक तथा प्रवासी धन भेजने वाले। प्रबंधित प्लवन में दर बाजार तय करता है, परंतु केंद्रीय बैंक तीव्र उतार-चढ़ाव कम करने के लिए हस्तक्षेप करता है। भारत 1992 में नियत दर से उदारीकृत विनिमय दर प्रबंध प्रणाली अर्थात दोहरी दर व्यवस्था में गया और मार्च 1993 में एकीकृत बाजार आधारित दर पर पहुँचा, इसलिए वर्तमान व्यवस्था प्रबंधित प्लवन है, जिसमें रिजर्व बैंक किसी स्तर की रक्षा के लिए नहीं, केवल अस्थिरता रोकने के लिए हस्तक्षेप करता है।
मूल्यह्रास, अवमूल्यन और उनके विपरीत
मूल्यह्रास अस्थिर प्रणाली में मुद्रा के बाजार मूल्य का गिरना है और मूल्यवृद्धि उसका बढ़ना। अवमूल्यन स्थिर प्रणाली में सरकार द्वारा आधिकारिक मूल्य में जानबूझकर की गई कटौती है और पुनर्मूल्यन जानबूझकर की गई वृद्धि। भारत ने रुपये का अवमूल्यन 1949 में, फिर 1966 में और भुगतान संतुलन संकट के समय 1 तथा 3 जुलाई 1991 को दो चरणों में किया। गिरता रुपया भारतीय वस्तुओं को विदेशी खरीदारों के लिए सस्ता करता है और निर्यात में सहायक होना चाहिए, परंतु वह आयात महँगा करता है, कच्चे तेल, उर्वरक और इलेक्ट्रॉनिक्स का बिल बढ़ाता है, आयातित महँगाई जोड़ता है और बाह्य वाणिज्यिक उधारी चुकाने की रुपया लागत बढ़ा देता है। बढ़ता रुपया इसके उलट काम करता है और निर्यातकों को नुकसान पहुँचा सकता है।
नीर और रीर
केवल डॉलर के मुकाबले एक दर से यह पता नहीं चलता कि रुपया कुल मिलाकर मजबूत है या नहीं। सांकेतिक प्रभावी विनिमय दर अर्थात नीर व्यापार भार के अनुसार साझेदार देशों की मुद्राओं की टोकरी के मुकाबले रुपये का सूचकांक है। नीर का बढ़ना बताता है कि रुपया सांकेतिक रूप से मजबूत हुआ है। वास्तविक प्रभावी विनिमय दर अर्थात रीर नीर को सापेक्ष महँगाई के लिए समायोजित करती है, इसलिए रीर का बढ़ना बताता है कि रुपया वास्तविक रूप में महँगा हो गया है और निर्यात प्रतिस्पर्धा घटी है। जब घरेलू महँगाई साझेदार देशों से अधिक रहती है तो रीर नीर की तुलना में बढ़ती है और दोनों सूचकांकों में अंतर बढ़ता जाता है।
रुपये की परिवर्तनीयता
| खाता | क्या शामिल | भारत की स्थिति |
|---|---|---|
| चालू खाता | वस्तु और सेवा व्यापार, प्रेषण, यात्रा, ब्याज | अगस्त 1994 में आईएमएफ के अनुच्छेद आठ की शर्तें स्वीकार करने के बाद पूर्ण परिवर्तनीय |
| पूँजी खाता | निवेश, ऋण, उधारी और पूँजी की वापसी | आंशिक परिवर्तनीय, चरणों में खोला गया |
तारापोर समिति ने 1997 में और फिर 2006 में रिपोर्ट देकर पूर्ण पूँजी खाता परिवर्तनीयता का मार्ग तथा उसकी पूर्व शर्तें बताईं, जिनमें राजकोषीय अनुशासन, कम महँगाई और मजबूत बैंकिंग व्यवस्था शामिल हैं।
कानून और नियामक
1973 का विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, जो विदेशी मुद्रा को दुर्लभ संसाधन मानने वाला कड़ा नियंत्रण कानून था, 1999 में पारित और 2000 में लागू हुए विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम अर्थात फेमा से बदल दिया गया। फेमा उल्लंघन को आपराधिक नहीं बल्कि दीवानी मामला मानता है और उदार अर्थव्यवस्था के अनुकूल है। भारतीय रिजर्व बैंक विनिमय नियंत्रण की व्यवस्था चलाता है, अधिकृत व्यापारियों को अनुमति देता है और देश का विदेशी मुद्रा भंडार रखता तथा उसका प्रबंध करता है।
भंडार और बाजार
- भंडार के चार भाग हैं: विदेशी मुद्रा आस्तियाँ, स्वर्ण, विशेष आहरण अधिकार और आईएमएफ में रिजर्व ट्रांच स्थिति
- विशेष आहरण अधिकार आईएमएफ द्वारा बनाई गई आरक्षित आस्ति है, जिसका मूल्य अमेरिकी डॉलर, यूरो, चीनी युआन, जापानी येन और पाउंड स्टर्लिंग वाली टोकरी से निकलता है
- हाजिर दर लगभग तुरंत निपटती है, जबकि वायदा दर आज तय होकर भविष्य की तिथि पर लागू होती है और जोखिम से बचाव में काम आती है
- कठोर मुद्रा वह है जो सर्वत्र स्वीकार्य और सहज विनिमेय हो, जैसे डॉलर; नरम मुद्रा ऐसी नहीं होती
- क्रय शक्ति समता दीर्घकाल में दर को दो देशों के सापेक्ष मूल्य स्तर से समझाती है
विदेशी निवेश विदेशी मुद्रा के मुख्य स्रोतों में है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश किसी उद्यम में स्थायी हित लाता है और अपेक्षाकृत स्थिर होता है, जबकि शेयरों और बॉण्डों में लगा विदेशी पोर्टफोलियो निवेश तेजी से बाहर जा सकता है और उसे गरम धन कहा जाता है। विदेश में मुद्रा की सख्ती, जैसे अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दर बढ़ाना, भारत से पोर्टफोलियो धन खींच सकती है, रुपये को कमजोर कर सकती है और बाह्य उधारी की लागत बढ़ा सकती है; इसीलिए परीक्षाएँ वैश्विक ब्याज दरों को विनिमय दर से जोड़कर पूछती हैं।
परीक्षा की दृष्टि से
सबसे अधिक पूछा जाने वाला प्रश्न अवमूल्यन और मूल्यह्रास का अंतर है, प्रायः कथन युग्म के रूप में। इसके बाद पूरे नाम और दिशा आती है: नीर या रीर के बढ़ने का अर्थ क्या है और अधिक घरेलू महँगाई से दोनों में अंतर क्यों बढ़ता है। तिथियाँ सीधे पूछी जाती हैं, इसलिए याद रखिए: 1973 में फेरा, 1992 में दोहरी दर, मार्च 1993 में एकीकृत दर, अगस्त 1994 में चालू खाता परिवर्तनीयता, 1999 में फेमा तथा 1997 और 2006 की तारापोर रिपोर्ट। बैंकिंग प्रश्नपत्र भंडार के चार घटक और एसडीआर टोकरी की मुद्राएँ भी पूछते हैं। एक सामान्य जाल कमजोर रुपये का प्रभाव है: इससे निर्यातकों और प्रेषण पाने वालों को लाभ होता है, परंतु आयात बिल और बाह्य वाणिज्यिक उधारी का रुपया बोझ बढ़ता है, इसलिए यह कहने वाला विकल्प कि मूल्यह्रास विदेशी ऋण का मुद्रा जोखिम घटाता है, सदैव गलत होता है।
महत्वपूर्ण तथ्य
| भारत की विनिमय दर प्रणाली | प्रबंधित प्लवन, बाजार आधारित दर के साथ रिजर्व बैंक का हस्तक्षेप |
|---|---|
| एकीकृत विनिमय दर | मार्च 1993, 1992 की लर्म्स के बाद |
| चालू खाता परिवर्तनीयता | अगस्त 1994 में आईएमएफ के अनुच्छेद आठ के साथ स्वीकार |
| फेमा | 1999 में पारित, 2000 से लागू, 1973 के फेरा की जगह |
| रुपये के अवमूल्यन | 1949, 1966 और जुलाई 1991 में दो बार |
| नीर | साझेदार मुद्राओं के मुकाबले रुपये का व्यापार भारित सूचकांक |
| रीर | सापेक्ष महँगाई से समायोजित नीर; बढ़ना प्रतिस्पर्धा में कमी |
| भंडार के घटक | विदेशी मुद्रा आस्तियाँ, स्वर्ण, एसडीआर, रिजर्व ट्रांच स्थिति |
| एसडीआर टोकरी | अमेरिकी डॉलर, यूरो, चीनी युआन, जापानी येन और पाउंड स्टर्लिंग |
| पूँजी खाता परिवर्तनीयता | आंशिक; मार्ग 1997 और 2006 की तारापोर समिति ने दिया |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. सांकेतिक प्रभावी विनिमय दर (नीर) में वृद्धि रुपये की मूल्यवृद्धि दर्शाती है। 2. वास्तविक प्रभावी विनिमय दर (रीर) में वृद्धि व्यापार प्रतिस्पर्धा में सुधार दर्शाती है। 3. अन्य देशों की तुलना में घरेलू महँगाई की बढ़ती प्रवृत्ति से नीर और रीर के बीच अंतर बढ़ने की संभावना रहती है। उपर्युक्त में से कौन से कथन सही हैं?
- A.केवल 1 और 2
- B.केवल 2 और 3
- C.केवल 1 और 3
- D.1, 2 और 3
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. केवल 1 और 3
व्याख्या
सही उत्तर C, केवल 1 और 3 है। कथन 1 सही है क्योंकि नीर साझेदार देशों की मुद्राओं की टोकरी के मुकाबले रुपये का व्यापार भारित सूचकांक है, इसलिए सूचकांक बढ़ने का अर्थ है कि रुपया सांकेतिक रूप से मजबूत हुआ। कथन 3 सही है क्योंकि रीर नीर को सापेक्ष कीमतों के लिए समायोजित करती है, इसलिए जब घरेलू महँगाई विदेशी महँगाई से तेज चलती है तो दोनों सूचकांक अलग होने लगते हैं। कथन 2 गलत है और इसी कारण विकल्प A, B और D असफल होते हैं: रीर का बढ़ना बताता है कि रुपया वास्तविक रूप में महँगा हुआ, जिससे भारतीय वस्तुएँ विदेश में महँगी पड़ती हैं और व्यापार प्रतिस्पर्धा सुधरती नहीं, घटती है। विकल्प A गलत है क्योंकि वह कथन 2 को स्वीकार करता है और सही कथन 3 को छोड़ देता है, विकल्प B गलत है क्योंकि वह कथन 2 लेता है और सही कथन 1 छोड़ता है, तथा विकल्प D गलत है क्योंकि वह तीनों को, दोषपूर्ण दूसरे कथन सहित, सही मान लेता है।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. अमेरिकी फेडरल रिजर्व की कठोर मौद्रिक नीति से पूँजी पलायन हो सकता है। 2. पूँजी पलायन से उन कंपनियों की ब्याज लागत बढ़ सकती है जिन पर पहले से बाह्य वाणिज्यिक उधारी (ईसीबी) है। 3. घरेलू मुद्रा का अवमूल्यन ईसीबी से जुड़े मुद्रा जोखिम को घटा देता है। उपर्युक्त में से कौन से कथन सही हैं?
- A.केवल 1 और 2
- B.केवल 2 और 3
- C.केवल 1 और 3
- D.1, 2 और 3
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. केवल 1 और 2
व्याख्या
सही उत्तर A, केवल 1 और 2 है। कथन 1 सही है क्योंकि अमेरिकी फेडरल रिजर्व के सख्त होने पर वहाँ प्रतिफल आकर्षक हो जाता है और पोर्टफोलियो धन उभरते बाजारों से बाहर निकलने लगता है, जिसे पूँजी पलायन कहते हैं। कथन 2 सही है क्योंकि ऐसा बहिर्वाह रुपये को कमजोर करता है और जोखिम प्रीमियम बढ़ाता है, इसलिए बाह्य वाणिज्यिक उधारी चुका रही कंपनी को रुपये में अधिक देना पड़ता है और पुनर्वित्त महँगा मिलता है। कथन 3 गलत है और इसी से शेष विकल्प तय हो जाते हैं: घरेलू मुद्रा का मूल्य गिरने पर डॉलर में चुकाए जाने वाले ऋण का मुद्रा जोखिम घटता नहीं, बढ़ता है, क्योंकि हर डॉलर की अदायगी अब अधिक रुपये माँगती है। विकल्प B गलत है क्योंकि वह दोषपूर्ण तीसरा कथन लेता है और सही पहला छोड़ता है, विकल्प C गलत है क्योंकि वह कथन 3 लेकर कथन 2 छोड़ देता है, और विकल्प D गलत है क्योंकि वह तीनों को सही मानता है।
भारत में विदेशी निवेश को प्रायः किस चुनौती का सामना करना पड़ता है?
- A.अत्यधिक विदेशी प्रतिस्पर्धा
- B.अस्थिर नियामकीय वातावरण
- C.कुशल श्रमिकों का अभाव
- D.उपभोक्ता आधार का अभाव
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. अस्थिर नियामकीय वातावरण
व्याख्या
सही उत्तर B, अस्थिर नियामकीय वातावरण है। विदेशी निवेशक देश में विदेशी मुद्रा लाते हैं और उन्हें पूर्वानुमेय नियम चाहिए; भारत के संदर्भ में सबसे अधिक गिनाई जाने वाली कठिनाई नियामकीय अनिश्चितता ही है, अर्थात बदलते नियम, अनेक विभागों और राज्यों में बँटी मंजूरियाँ तथा लंबे चलने वाले विवाद। विकल्प A गलत है क्योंकि अन्य विदेशी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा किसी भी खुले बाजार की सामान्य विशेषता है और वह निवेश रोकने वाली बाधा नहीं; निवेशक प्रतिस्पर्धा के लिए ही आते हैं। विकल्प C गलत है क्योंकि भारत में इंजीनियरों, प्रबंधकों और कम लागत वाले श्रमिकों का बड़ा भंडार है और श्रम आपूर्ति को प्रायः देश की ताकत बताया जाता है, भले ही कुछ विशेष कौशलों की कमी हो। विकल्प D गलत है क्योंकि बहुत बड़ा घरेलू उपभोक्ता बाजार भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को खींचने वाले मुख्य आकर्षणों में है, चुनौती नहीं। याद रखिए कि स्थिर और सरल नियम निवेश प्रवाह का सबसे बड़ा आकर्षण माने जाते हैं।
विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम अर्थात फेमा ने निम्नलिखित में से किस कानून की जगह ली?
- A.विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973
- B.बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949
- C.एकाधिकार तथा प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार अधिनियम, 1969
- D.भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973
व्याख्या
सही उत्तर A, 1973 का विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम है। फेरा विदेशी मुद्रा को दुर्लभ संसाधन मानता था, अनुमति के बिना अधिकांश लेनदेन वर्जित करता था और उल्लंघन को आपराधिक अपराध बनाता था। यह बंद अर्थव्यवस्था के अनुकूल था और 1991 के बाद अव्यावहारिक हो गया, इसलिए संसद ने 1999 में विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम पारित किया, जो 2000 में लागू हुआ, लेनदेन को तब तक अनुमत मानता है जब तक प्रतिबंधित न हो और उल्लंघन को दीवानी मामला मानता है। विकल्प B गलत है क्योंकि 1949 का बैंककारी विनियमन अधिनियम बैंकों के लाइसेंस और पर्यवेक्षण से संबंधित है। विकल्प C गलत है क्योंकि 1969 का एमआरटीपी अधिनियम एकाधिकार और प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार से जुड़ा था और स्वयं 2002 के प्रतिस्पर्धा अधिनियम से बदला गया। विकल्प D गलत है क्योंकि 1992 के सेबी अधिनियम ने प्रतिभूति बाजार नियामक को वैधानिक शक्तियाँ दीं। फेरा 1973 और फेमा 1999 की जोड़ी तथा यह तथ्य कि फेमा रिजर्व बैंक चलाता है, साथ याद रखिए।
भारत ने आईएमएफ के अनुच्छेद आठ की शर्तें किस वर्ष स्वीकार कीं, जिससे रुपया चालू खाते पर पूर्ण परिवर्तनीय हो गया?
- A.1991
- B.1993
- C.1994
- D.1999
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. 1994
व्याख्या
सही उत्तर C, 1994 है। भारत ने अगस्त 1994 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुच्छेद आठ की शर्तें स्वीकार कीं, जिसका अर्थ है कि वस्तु और सेवा व्यापार, यात्रा, शिक्षा, प्रेषण तथा ब्याज भुगतान के लिए रुपये को स्वतंत्र रूप से बदला जा सकता है। विकल्प A गलत है क्योंकि 1991 भुगतान संतुलन संकट और जुलाई में रुपये के दो चरणों वाले अवमूल्यन का वर्ष है, जो सुधार का आरंभ था, पूर्णता नहीं। विकल्प B गलत है क्योंकि मार्च 1993 में उदारीकृत विनिमय दर प्रबंध प्रणाली की दोहरी दर को एकल बाजार आधारित दर में मिलाया गया, जो परिवर्तनीयता से एक कदम पहले था। विकल्प D गलत है क्योंकि 1999 में फेमा पारित हुआ। पूँजी खाता आज भी केवल आंशिक परिवर्तनीय है, और यही भेद इन तिथियों के साथ परीक्षाओं में पूछा जाता है।
निम्नलिखित में से कौन भारत के विदेशी मुद्रा भंडार का घटक नहीं है?
- A.विदेशी मुद्रा आस्तियाँ
- B.स्वर्ण
- C.विशेष आहरण अधिकार
- D.सरकार द्वारा एकत्र लघु बचत
उत्तर देखें
सही उत्तर: D. सरकार द्वारा एकत्र लघु बचत
व्याख्या
सही उत्तर D, सरकार द्वारा एकत्र लघु बचत है। डाकघर योजनाओं में जमा जैसी लघु बचत सरकार की घरेलू रुपया देनदारी है और देश की बाह्य आस्तियों से उसका कोई संबंध नहीं। रिजर्व बैंक द्वारा रखे और प्रबंधित भारत के विदेशी मुद्रा भंडार के ठीक चार घटक हैं। विकल्प A उत्तर के रूप में गलत है क्योंकि परिवर्तनीय मुद्राओं में रखी प्रतिभूतियाँ और जमाएँ, अर्थात विदेशी मुद्रा आस्तियाँ, इनमें सबसे बड़ा भाग हैं। विकल्प B गलत है क्योंकि रिजर्व बैंक के पास रखा स्वर्ण मान्यता प्राप्त आरक्षित आस्ति है और लंबे समय से ऐसा ही माना जाता रहा है। विकल्प C गलत है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा बनाई गई और प्रमुख मुद्राओं की टोकरी से मूल्यांकित आस्ति, विशेष आहरण अधिकार, एक अन्य घटक है। चौथा भाग, जो रिक्त स्थान के रूप में पूछा जाता है, आईएमएफ में रिजर्व ट्रांच स्थिति है।
भारत में इस समय अपनाई जा रही विनिमय दर प्रणाली को सबसे ठीक क्या कहा जाएगा?
- A.अमेरिकी डॉलर से नियत खूँटा
- B.प्रबंधित प्लवन
- C.करेंसी बोर्ड व्यवस्था
- D.स्वर्ण मानक
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. प्रबंधित प्लवन
व्याख्या
सही उत्तर B, प्रबंधित प्लवन है। मार्च 1993 में विनिमय दर के एकीकरण के बाद रुपये का मूल्य विदेशी मुद्रा बाजार की माँग और पूर्ति से तय होता है, जबकि रिजर्व बैंक डॉलर खरीदकर या बेचकर तीव्र अस्थिरता रोकने के लिए हस्तक्षेप करता है, किसी निश्चित स्तर की रक्षा के लिए नहीं। विकल्प A गलत है क्योंकि भारत ने 1991 के बाद चरणों में नियत दर छोड़ दी और अब डॉलर के साथ कोई समता घोषित नहीं करता। विकल्प C गलत है क्योंकि करेंसी बोर्ड में घरेलू मुद्रा केवल विदेशी भंडार के बदले नियत दर पर जारी होती है, ऐसी व्यवस्था भारत ने कभी नहीं अपनाई। विकल्प D गलत है क्योंकि स्वर्ण मानक, जिसमें मुद्राएँ स्वर्ण की निश्चित मात्रा में बदली जाती थीं, पिछली शताब्दी में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समाप्त हो चुका है। इसी प्रबंधित व्यवस्था के लिए कभी-कभी गंदा प्लवन शब्द भी प्रयुक्त होता है, उसे वैकल्पिक नाम मानिए।
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये के मूल्यह्रास से संभावित रूप से क्या होगा?
- A.भारतीय निर्यात विदेशी खरीदारों के लिए सस्ता और आयात महँगा हो जाएगा
- B.भारतीय निर्यात विदेशी खरीदारों के लिए महँगा और आयात सस्ता हो जाएगा
- C.डॉलर ऋण चुकाने की रुपया लागत घट जाएगी
- D.आयातित कच्चे तेल की कीमत पर कोई असर नहीं पड़ेगा
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. भारतीय निर्यात विदेशी खरीदारों के लिए सस्ता और आयात महँगा हो जाएगा
व्याख्या
सही उत्तर A है। रुपये के मूल्यह्रास पर हर डॉलर से अधिक रुपये मिलते हैं, इसलिए रुपये में तय कीमत वाली भारतीय वस्तु विदेशी खरीदार को कम डॉलर में पड़ती है और निर्यात अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाता है, जबकि हर आयातित वस्तु पहले से अधिक रुपये माँगती है। विकल्प B गलत है क्योंकि वह यह संबंध उलट देता है; निर्यात महँगा और आयात सस्ता होना मूल्यवृद्धि का परिणाम है। विकल्प C गलत है क्योंकि डॉलर में तय ऋण चुकाने में मूल्यह्रास के बाद अधिक रुपये लगते हैं, और इसी कारण बाह्य वाणिज्यिक उधारी वाली कंपनियों को रुपया कमजोर होने पर नुकसान होता है। विकल्प D गलत है क्योंकि कच्चा तेल डॉलर में खरीदा जाता है और भारत के आयात बिल का बड़ा भाग है, इसलिए कमजोर रुपया तेल की लागत बढ़ाता है, परिवहन तथा विनिर्माण की लागत में जुड़ता है और आयातित महँगाई लाता है। विदेश में काम करने वालों के प्रेषण से भी अधिक रुपये मिलते हैं, जो इस प्रश्न का सामान्य अतिरिक्त कथन है।
तारापोर समिति निम्नलिखित में से किससे संबंधित है?
- A.कृषि साख में सुधार
- B.पूँजी खाता परिवर्तनीयता
- C.वस्तु एवं सेवा कर की रूपरेखा
- D.सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का पुनर्गठन
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. पूँजी खाता परिवर्तनीयता
व्याख्या
सही उत्तर B, पूँजी खाता परिवर्तनीयता है। एस. एस. तारापोर की अध्यक्षता वाली समिति ने 1997 में और फिर 2006 में रिपोर्ट दी तथा रुपये को पूँजी खाते पर परिवर्तनीय बनाने का चरणबद्ध मार्ग बताया, साथ ही वे पूर्व शर्तें भी गिनाईं जो पहले पूरी होनी चाहिए, जैसे राजकोषीय अनुशासन, कम तथा स्थिर महँगाई और मजबूत बैंकिंग व्यवस्था। विकल्प A गलत है क्योंकि कृषि साख पर अन्य समितियाँ बनी हैं और यह इस समिति का विषय नहीं। विकल्प C गलत है क्योंकि वस्तु एवं सेवा कर की रूपरेखा राज्यों के वित्त मंत्रियों की अधिकार प्राप्त समिति और बाद में जीएसटी परिषद से आई, जो बिल्कुल अलग प्रक्रिया है। विकल्प D गलत है क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का पुनर्गठन 1991 और 1998 की नरसिम्हम समिति रिपोर्टों से जुड़ा है। हर समिति को उसके एक विषय से जोड़ लेना इस प्रकार के प्रश्नों का सबसे तेज उत्तर है।
विदेशी मुद्रा भंडार का भाग बनने वाले विशेष आहरण अधिकार किसके द्वारा जारी किए जाते हैं?
- A.विश्व बैंक
- B.अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष
- C.विश्व व्यापार संगठन
- D.अंतरराष्ट्रीय निपटान बैंक
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष
व्याख्या
सही उत्तर B, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष है। विशेष आहरण अधिकार आईएमएफ द्वारा बनाई गई अंतरराष्ट्रीय आरक्षित आस्ति है, जो सदस्य देशों को उनके कोटे के अनुपात में आवंटित होती है; कोई सदस्य इन्हें दूसरे सदस्यों से उपयोगी मुद्राओं के बदले बदल सकता है। इनका मूल्य प्रमुख मुद्राओं की उस टोकरी से निकलता है जिसमें अमेरिकी डॉलर, यूरो, चीनी युआन, जापानी येन और पाउंड स्टर्लिंग शामिल हैं। विकल्प A गलत है क्योंकि विश्व बैंक विकास परियोजनाओं के लिए ऋण देता है और आरक्षित आस्ति जारी नहीं करता। विकल्प C गलत है क्योंकि विश्व व्यापार संगठन अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नियम बनाता है और उसकी कोई मौद्रिक भूमिका नहीं है। विकल्प D गलत है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय निपटान बैंक केंद्रीय बैंकों का बैंक और नियमन का मंच है, परंतु वह आरक्षित आस्ति नहीं बनाता। याद रखिए कि भारत के भंडार में एसडीआर और रिजर्व ट्रांच स्थिति ही दो आईएमएफ संबंधी मदें हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
रुपये के अवमूल्यन और मूल्यह्रास में क्या अंतर है?
अवमूल्यन स्थिर दर प्रणाली में अधिकारियों द्वारा आधिकारिक मूल्य में जानबूझकर की गई कटौती है। मूल्यह्रास अस्थिर या प्रबंधित प्लवन में बाजार की माँग और पूर्ति से आई गिरावट है।
रीर का बढ़ना क्या दर्शाता है?
यह कि सापेक्ष महँगाई को जोड़ने के बाद रुपया वास्तविक रूप में महँगा हो गया है, इसलिए भारतीय वस्तुएँ विदेश में कम प्रतिस्पर्धी हैं। केवल नीर का बढ़ना सांकेतिक मूल्यवृद्धि भर बताता है।
क्या भारतीय रुपया पूर्ण परिवर्तनीय है?
वह चालू खाते पर पूर्ण परिवर्तनीय है, जिसे अगस्त 1994 में आईएमएफ के अनुच्छेद आठ के साथ स्वीकार किया गया, और पूँजी खाते पर केवल आंशिक परिवर्तनीय है, जिसे चरणों में खोला गया है।
आज भारत में विदेशी मुद्रा लेनदेन किस कानून से चलते हैं?
1999 के विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम से, जो 2000 से लागू है और जिसे भारतीय रिजर्व बैंक चलाता है। इसने 1973 के विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम की जगह ली और उल्लंघन को दीवानी मामला माना।
कमजोर रुपये का अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ता है?
निर्यात और प्रेषण को लाभ होता है क्योंकि भारतीय वस्तुएँ विदेश में सस्ती पड़ती हैं, परंतु कच्चे तेल, उर्वरक और इलेक्ट्रॉनिक्स का आयात महँगा होता है, आयातित महँगाई बढ़ती है और बाह्य वाणिज्यिक उधारी चुकाने में अधिक रुपये लगते हैं।
स्रोत
- समष्टि अर्थशास्त्र एक परिचय (कक्षा XII), अध्याय 6: खुली अर्थव्यवस्था समष्टि अर्थशास्त्र — एनसीईआरटी
- विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999 — वित्त मंत्रालय, भारत सरकार
- रिजर्व बैंक के कार्य: विदेशी मुद्रा प्रबंधक — भारतीय रिजर्व बैंक





