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GK नोट्सभारतीय अर्थव्यवस्थाएनपीए, दिवाला संहिता और बैंकिंग सुधार

एनपीए, दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता और बैंकिंग सुधार

गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों, परिसंपत्ति वर्गीकरण, सरफेसी अधिनियम और ऋण वसूली अधिकरण, 2016 की दिवाला संहिता तथा 1991 से हुए बैंकिंग सुधारों पर परीक्षा नोट्स।

लेखक · प्रकाशित · 5 मिनट

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एनपीए, दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता और बैंकिंग सुधार — GK24 title card
एनपीए, दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता और बैंकिंग सुधार — GK24 title card

बैंक की कमाई उन ऋणों के ब्याज से होती है जो वह देता है। जब कोई ऋणी भुगतान बंद कर देता है, तो वह ऋण कमाई देना बंद कर देता है और गैर-निष्पादित परिसंपत्ति, अर्थात एनपीए, बन जाता है। डूबे ऋण बैंक की पूंजी खाते हैं, उसे लाभ से प्रावधान करने को मजबूर करते हैं और उसे नया ऋण देने से रोकते हैं, इसलिए उनकी वसूली का कानून और उसके बाद के सुधार बैंकिंग तथा सिविल सेवा प्रश्नपत्रों का स्थायी विषय हैं।

एनपीए क्या है

भारतीय रिजर्व बैंक के आय निर्धारण और परिसंपत्ति वर्गीकरण संबंधी विवेकपूर्ण मानदंडों के अनुसार कोई ऋण तब गैर-निष्पादित माना जाता है जब ब्याज या मूलधन की किस्त नब्बे दिन से अधिक बकाया रह जाए। कृषि ऋणों में यह अवधि फसल मौसम से जुड़ी होती है, अल्पावधि फसलों के लिए दो मौसम और दीर्घावधि फसलों के लिए एक मौसम। दो अनुपात काम में आते हैं: सकल अग्रिमों में सकल एनपीए का हिस्सा, और शुद्ध एनपीए, जो सकल एनपीए में से उसके विरुद्ध किए गए प्रावधान घटाकर निकलता है।

श्रेणीअर्थ
मानक परिसंपत्तिभुगतान नियमित है; यह एनपीए नहीं है
अवमानक परिसंपत्तिबारह महीने तक एनपीए बनी रही है
संदिग्ध परिसंपत्तिबारह महीने से अधिक अवमानक बनी रही है
हानि परिसंपत्तिवसूली की आशा नहीं; बैंक या लेखा परीक्षकों ने हानि मान लिया है

डूबे ऋण क्यों बढ़े

  • लगभग 2006 से 2011 तक बुनियादी ढांचे, बिजली, इस्पात, सड़क और दूरसंचार को भारी ऋण दिया गया, जो आगे चलकर देरी और गिरती कीमतों में फंस गया।
  • जुड़वां बही-खाते की समस्या: एक ओर अत्यधिक कर्ज में डूबी कंपनियां और दूसरी ओर उनके ऋणों के भार से दबे बैंक।
  • सदाबहार ऋण, अर्थात पुराने ऋण को नियमित दिखाने के लिए नया ऋण देना, जिससे समस्या वर्षों छिपी रही।
  • कुछ बड़े खातों में जानबूझकर चूक और धन का अन्यत्र उपयोग, तथा अन्य में कमजोर मूल्यांकन और निगरानी।
  • रिजर्व बैंक की 2015 की परिसंपत्ति गुणवत्ता समीक्षा ने बैंकों को ये ऋण ईमानदारी से मानने पर विवश किया, इसी कारण उसके बाद दर्ज एनपीए तेजी से बढ़े।

संहिता से पहले की वसूली व्यवस्था

  • लोक अदालतें तथा बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को शोध्य ऋण वसूली अधिनियम 1993 के अंतर्गत बने ऋण वसूली अधिकरण, जिनके ऊपर ऋण वसूली अपीलीय अधिकरण हैं।
  • सरफेसी अधिनियम 2002, जो प्रतिभूत लेनदार को न्यायालय जाने के बिना प्रतिभूति पर कब्जा लेकर बेचने देता है और परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनियों का प्रावधान करता है, जो बैंकों से डूबे ऋण खरीदती हैं।
  • पुनर्गठन की लंबी श्रृंखला, जैसे कॉर्पोरेट ऋण पुनर्गठन और सामरिक ऋण पुनर्गठन, जिन्हें रिजर्व बैंक ने फरवरी 2018 में समाप्त कर एक ही ढांचा लागू किया; उस परिपत्र के उच्चतम न्यायालय द्वारा रद्द किए जाने पर जून 2019 का दबावग्रस्त परिसंपत्तियों के समाधान संबंधी विवेकपूर्ण ढांचा लागू हुआ।

दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016

दिवाला विधि सुधार समिति की सिफारिशों पर 2016 में बनी इस संहिता ने बिखरे पुराने कानूनों के स्थान पर एक समयबद्ध प्रक्रिया दी और नियंत्रण चूक करने वाले प्रवर्तक से हटाकर लेनदारों को दे दिया।

  • नियामक: भारतीय दिवाला एवं शोधन अक्षमता बोर्ड, जो दिवाला पेशेवरों और सूचना उपयोगिताओं का पंजीकरण करता है।
  • निर्णायक प्राधिकारी: कंपनियों और सीमित दायित्व भागीदारी के लिए राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण, तथा व्यक्तियों और भागीदारी फर्मों के लिए ऋण वसूली अधिकरण। अपील राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण और उसके बाद उच्चतम न्यायालय में जाती है।
  • वित्तीय लेनदार, परिचालन लेनदार या कॉर्पोरेट देनदार स्वयं आवेदन कर सकता है। कॉर्पोरेट दिवाला आवेदन के लिए न्यूनतम चूक की सीमा 2020 में एक लाख रुपये से बढ़ाकर एक करोड़ रुपये कर दी गई।
  • आवेदन स्वीकार होते ही रोक अवधि आरंभ होती है, निदेशक मंडल निलंबित हो जाता है और अंतरिम समाधान पेशेवर कंपनी चलाता है। वित्तीय लेनदारों की समाधान समिति निर्णय करती है और समाधान योजना के लिए कम से कम छियासठ प्रतिशत मतदान हिस्से वाले लेनदारों की स्वीकृति आवश्यक है।
  • कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया 180 दिन में पूरी होनी चाहिए, जिसे एक बार 90 दिन बढ़ाया जा सकता है, और मुकदमेबाजी के समय सहित बाहरी सीमा 330 दिन है। कोई योजना स्वीकृत न हो तो कंपनी परिसमापन में जाती है और राशि धारा 53 के क्रम में बांटी जाती है।
  • धारा 29क चूक करने वाले प्रवर्तकों और संबंधित व्यक्तियों को अपनी ही कंपनी के लिए बोली लगाने से रोकती है, और 2021 में सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यमों के लिए पूर्व-पैक प्रक्रिया जोड़ी गई।

1991 से बैंकिंग सुधार

  • 1991 की नरसिम्हम समिति और 1998 की उसकी दूसरी रिपोर्ट ने सुधार की रूपरेखा दी: आय निर्धारण और प्रावधान के विवेकपूर्ण मानदंड, पूंजी पर्याप्तता, सांविधिक चलनिधि अनुपात तथा नकद आरक्षित अनुपात में कमी, निजी बैंकों का प्रवेश और बैंक बोर्डों को अधिक स्वायत्तता।
  • बेसल पूंजी मानक, जो अब बेसल तीन हैं, जोखिम-भारित परिसंपत्तियों पर न्यूनतम पूंजी अनुपात तय करते हैं और बेहतर गुणवत्ता की पूंजी के बफर जोड़ते हैं।
  • त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई ढांचा कमजोर बैंक को पूंजी, परिसंपत्ति गुणवत्ता और उत्तोलन के आधार पर प्रतिबंधों के अधीन रखता है जब तक वह सुधर न जाए।
  • चार आर का दृष्टिकोण, अर्थात डूबे ऋणों की पहचान, समाधान, बैंकों का पुनर्पूंजीकरण और सुधार, 2015 के बाद की नीति का सार है, जिसके साथ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए 2015 की इंद्रधनुष योजना भी आई।
  • सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का समेकन, 2017 में भारतीय स्टेट बैंक के सहयोगी बैंकों का और 1 अप्रैल 2020 से दस बैंकों का चार में विलय।
  • 2021 में बड़े दबावग्रस्त खातों को लेने के लिए बनी राष्ट्रीय परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनी, जिसे बैड बैंक भी कहा जाता है, तथा बैंककारी विनियमन (संशोधन) अधिनियम 2020, जिसने सहकारी बैंकों को रिजर्व बैंक की कड़ी निगरानी में लाया।

परीक्षा की दृष्टि से

बैंकिंग और बीमा के प्रश्नपत्र परिभाषाएं और संख्याएं पूछते हैं: एनपीए के लिए नब्बे दिन, अवमानक परिसंपत्ति के लिए बारह महीने, संहिता में 180 और 90 तथा 330 दिन, समाधान योजना के लिए छियासठ प्रतिशत और चूक की सीमा एक करोड़ रुपये। सिविल सेवा और राज्य परीक्षाएं संस्थाएं पूछती हैं: कंपनी के दिवाला मामले कौन सुनता है, दिवाला पेशेवरों का नियामक कौन है, धारा 29क क्या करती है, और 1991 की सुधार रूपरेखा किस समिति ने दी। पसंदीदा जाल हैं एनसीएलटी और डीआरटी को मिला देना, सरफेसी को 1993 तथा ऋण वसूली अधिकरणों को 2002 में रख देना, शुद्ध एनपीए को सकल एनपीए के समान मान लेना, और समाधान समिति में छियासठ के स्थान पर इक्यावन प्रतिशत चुन लेना।

महत्वपूर्ण तथ्य

एनपीए की परिभाषाब्याज या मूलधन 90 दिन से अधिक बकाया
अवमानक परिसंपत्ति12 महीने तक एनपीए रही परिसंपत्ति
संदिग्ध परिसंपत्ति12 महीने से अधिक अवमानक रही परिसंपत्ति
शुद्ध एनपीएसकल एनपीए में से उसके विरुद्ध रखे प्रावधान घटाकर
ऋण वसूली अधिकरणबैंकों और वित्तीय संस्थाओं को शोध्य ऋण वसूली अधिनियम, 1993
सरफेसी अधिनियम2002; न्यायालय की डिक्री के बिना प्रतिभूति की बिक्री और परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनियां
दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता2016 में अधिनियमित
संहिता का नियामकभारतीय दिवाला एवं शोधन अक्षमता बोर्ड
निर्णायक प्राधिकारीकंपनियों और एलएलपी के लिए एनसीएलटी; व्यक्तियों और फर्मों के लिए डीआरटी
समाधान की समय-सीमा180 दिन, और 90 दिन, बाहरी सीमा 330 दिन
समाधान योजना की स्वीकृतिसमाधान समिति के कम से कम 66 प्रतिशत मतदान हिस्से से
कॉर्पोरेट दिवाला की चूक सीमाएक करोड़ रुपये, 2020 में एक लाख से बढ़ाई गई
सुधार समितियां1991 और 1998 की नरसिम्हम समिति रिपोर्टें

इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ

Q1.भारतीय अर्थव्यवस्थाआसान

किसी सावधि ऋण को गैर-निष्पादित परिसंपत्ति कब वर्गीकृत किया जाता है, जब ब्याज या मूलधन कितने दिन से अधिक बकाया हो?

  1. A.30 दिन
  2. B.60 दिन
  3. C.90 दिन
  4. D.180 दिन
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. 90 दिन

व्याख्या

सही उत्तर C, 90 दिन है। रिजर्व बैंक के आय निर्धारण और परिसंपत्ति वर्गीकरण संबंधी विवेकपूर्ण मानदंडों के अनुसार जब ब्याज या मूलधन की किस्त नब्बे दिन से अधिक बकाया रह जाती है, तब परिसंपत्ति निष्पादित नहीं रहती, और बैंक को उस ब्याज को आय मानना बंद करके प्रावधान करना पड़ता है। विकल्प A गलत है; तीस दिन की बकाया स्थिति खाते को केवल विशेष उल्लेख श्रेणी में डालती है, जो पूर्व चेतावनी का चरण है, एनपीए नहीं। विकल्प B इसी कारण गलत है, क्योंकि साठ दिन भी विशेष उल्लेख का एक चरण है। विकल्प D गलत है क्योंकि 180 दिन पुराना मानक था, जो 2004 से पहले चलता था, और प्रश्नपत्र उसे उन परीक्षार्थियों के लिए जाल बनाए रखते हैं जिन्होंने नियम पुरानी पुस्तक से पढ़ा है। फसल ऋणों में दिनों के स्थान पर फसल मौसम देखा जाता है।

Q2.भारतीय अर्थव्यवस्थामध्यम

जो परिसंपत्ति बारह महीने तक गैर-निष्पादित बनी रही हो, उसे किस श्रेणी में रखा जाता है?

  1. A.मानक परिसंपत्ति
  2. B.अवमानक परिसंपत्ति
  3. C.संदिग्ध परिसंपत्ति
  4. D.हानि परिसंपत्ति
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. अवमानक परिसंपत्ति

व्याख्या

सही उत्तर B, अवमानक परिसंपत्ति है। वर्गीकरण एक क्रम में चलता है: जो खाता अभी गैर-निष्पादित हुआ है वह पहले बारह महीने तक अवमानक रहता है, उसके बाद संदिग्ध हो जाता है, और जब वसूली की आशा नहीं रहती तब उसे हानि परिसंपत्ति कहा जाता है। विकल्प A गलत है क्योंकि मानक परिसंपत्ति वह है जिसमें भुगतान नियमित है और जिसमें सामान्य से अधिक जोखिम नहीं है, अर्थात वह एनपीए ही नहीं है। विकल्प C गलत है क्योंकि परिसंपत्ति संदिग्ध तभी बनती है जब वह बारह महीने से अधिक अवमानक रह जाए, और संदिग्ध श्रेणी स्वयं प्रावधान के लिए आयु के अनुसार बांटी जाती है। विकल्प D गलत है क्योंकि हानि परिसंपत्ति वह है जिसे बैंक, उसके आंतरिक लेखा परीक्षक या रिजर्व बैंक निरीक्षण अवसूल्य मान चुके हों, भले कुछ अवशिष्ट मूल्य बचा हो।

Q3.भारतीय अर्थव्यवस्थाआसान

दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता किस वर्ष अधिनियमित हुई?

  1. A.2002
  2. B.2013
  3. C.2016
  4. D.2019
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. 2016

व्याख्या

सही उत्तर C, 2016 है। यह संहिता दिवाला विधि सुधार समिति की सिफारिशों पर 2016 में पारित हुई और इसने बीमार औद्योगिक कंपनी अधिनियम तथा कंपनी अधिनियम के कुछ भागों जैसे बिखरे पुराने कानूनों के स्थान पर एक समयबद्ध प्रक्रिया दी, जिसमें नियंत्रण चूक करने वाले प्रवर्तक से लेनदारों के पास चला जाता है। विकल्प A गलत है क्योंकि 2002 सरफेसी अधिनियम का वर्ष है, जो समग्र दिवाला के स्थान पर प्रतिभूति के प्रवर्तन से संबंधित है। विकल्प B गलत है क्योंकि 2013 कंपनी अधिनियम का वर्ष है, जिसके अंतर्गत राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण का प्रावधान किया गया था। विकल्प D गलत है क्योंकि 2019 में केवल संशोधन हुए, जिनमें समाधान प्रक्रिया की 330 दिन की बाहरी सीमा शामिल है, संहिता का अधिनियमन नहीं। संहिता के लागू होने का वर्ष, 2016 में बने नियामक बोर्ड और 2019 के संशोधन को अलग-अलग याद रखना इस अध्याय के तिथि-आधारित प्रश्नों के लिए आवश्यक है।

Q4.भारतीय अर्थव्यवस्थामध्यम

दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता के अंतर्गत किसी कंपनी के दिवाला का निर्णायक प्राधिकारी कौन है?

  1. A.ऋण वसूली अधिकरण
  2. B.राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण
  3. C.प्रतिभूति अपीलीय अधिकरण
  4. D.संबंधित राज्य का उच्च न्यायालय
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण

व्याख्या

सही उत्तर B, राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण है। कंपनियों और सीमित दायित्व भागीदारी के लिए दिवाला आवेदन इस अधिकरण के समक्ष दायर होता है, जो उसे स्वीकार या अस्वीकार करता है, रोक अवधि घोषित करता है और अंतरिम समाधान पेशेवर नियुक्त करता है; अपील राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण और फिर उच्चतम न्यायालय में जाती है। विकल्प A कंपनियों के लिए गलत है, हालांकि संहिता के अंतर्गत व्यक्तियों और भागीदारी फर्मों के लिए ऋण वसूली अधिकरण ही निर्णायक प्राधिकारी है, और यही अंतर सबसे अधिक पूछा जाता है। विकल्प C गलत है क्योंकि प्रतिभूति अपीलीय अधिकरण बाजार नियामक के आदेशों के विरुद्ध अपील सुनता है। विकल्प D गलत है क्योंकि उच्च न्यायालय द्वारा समापन पुरानी कंपनी विधि व्यवस्था का भाग था, जिसे संहिता और 2013 के कंपनी अधिनियम ने बदल दिया। इसलिए यह जोड़ा याद रखें: कंपनी के लिए एनसीएलटी और व्यक्ति अथवा भागीदारी फर्म के लिए डीआरटी, और दोनों पर अपील का रास्ता अलग-अलग है।

Q5.भारतीय अर्थव्यवस्थामध्यम

भारत में दिवाला पेशेवरों और सूचना उपयोगिताओं का नियमन कौन-सी संस्था करती है?

  1. A.भारतीय रिजर्व बैंक
  2. B.भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड
  3. C.भारतीय दिवाला एवं शोधन अक्षमता बोर्ड
  4. D.वित्त मंत्रालय
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. भारतीय दिवाला एवं शोधन अक्षमता बोर्ड

व्याख्या

सही उत्तर C, भारतीय दिवाला एवं शोधन अक्षमता बोर्ड है। 2016 की संहिता के अंतर्गत बना यह बोर्ड दिवाला पेशेवरों, दिवाला पेशेवर एजेंसियों और सूचना उपयोगिताओं का पंजीकरण तथा पर्यवेक्षण करता है और वे विनियम बनाता है जिनके अंतर्गत समाधान प्रक्रिया चलती है, इसलिए यह नियामक और नियम-निर्माता दोनों है। विकल्प A गलत है क्योंकि रिजर्व बैंक बैंकों का नियमन करता है और उन्हें खाते दिवाला के लिए भेजने का निर्देश दे सकता है, परंतु वह दिवाला पेशेवरों का नियमन नहीं करता। विकल्प B गलत है क्योंकि भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड प्रतिभूति बाजार का नियामक है। विकल्प D गलत है क्योंकि इस संहिता का प्रशासन वित्त मंत्रालय के स्थान पर कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय करता है, और किसी भी स्थिति में मंत्रालय यहां सांविधिक नियामक नहीं है।

Q6.भारतीय अर्थव्यवस्थाकठिन

विस्तार और मुकदमेबाजी के समय सहित कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया कितने दिन में पूरी होनी चाहिए?

  1. A.180 दिन
  2. B.270 दिन
  3. C.330 दिन
  4. D.365 दिन
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. 330 दिन

व्याख्या

सही उत्तर C, 330 दिन है। संहिता की धारा 12 समाधान प्रक्रिया को आवेदन स्वीकार होने की तिथि से 180 दिन देती है, निर्णायक प्राधिकारी को समाधान समिति के प्रस्ताव पर उसे एक बार 90 दिन तक बढ़ाने की अनुमति देती है, और 2019 के संशोधन ने 330 दिन की बाहरी सीमा जोड़ी, जिसमें मुकदमेबाजी तथा विस्तार में लगा समय भी शामिल है। विकल्प A गलत है क्योंकि 180 दिन केवल पहली अवधि है, किसी विस्तार से पहले की। विकल्प B गलत है क्योंकि 270 दिन, अर्थात 180 और 90, 2019 के संशोधन से पहले की सीमा थी, और प्रश्नपत्र उसे पुराने नोट्स पढ़ने वाले परीक्षार्थियों के लिए जाल बनाए रखते हैं। विकल्प D गलत है क्योंकि संहिता बाहरी सीमा 330 दिन गिनती है, एक वर्ष नहीं। सीमा के भीतर कोई योजना स्वीकृत न हो तो कंपनी परिसमापन में जाती है।

Q7.भारतीय अर्थव्यवस्थामध्यम

सरफेसी अधिनियम, जो प्रतिभूत लेनदार को न्यायालय की डिक्री के बिना प्रतिभूति पर कब्जा लेकर बेचने देता है, किस वर्ष पारित हुआ?

  1. A.1993
  2. B.1998
  3. C.2002
  4. D.2016
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. 2002

व्याख्या

सही उत्तर C, 2002 है। वित्तीय परिसंपत्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्निर्माण तथा प्रतिभूति हित का प्रवर्तन अधिनियम 2002 प्रतिभूत लेनदार को यह अधिकार देता है कि वह चूक करने वाले ऋणी को नोटिस देकर प्रतिभूत परिसंपत्ति पर कब्जा ले और उसे न्यायालय जाने के बिना बेच दे, तथा यह परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनियों का भी प्रावधान करता है, जो बैंकों से डूबे ऋण खरीदती हैं। विकल्प A गलत है क्योंकि 1993 उस अधिनियम का वर्ष है जिसने ऋण वसूली अधिकरण बनाए, और इन दोनों वर्षों को बदल देना सबसे सामान्य जाल है। विकल्प B गलत है क्योंकि 1998 में बैंकिंग क्षेत्र सुधार पर दूसरी नरसिम्हम समिति रिपोर्ट आई थी। विकल्प D गलत है क्योंकि 2016 दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता का वर्ष है, जो सरफेसी के स्थान पर नहीं, उसके साथ चलती है।

Q8.भारतीय अर्थव्यवस्थामध्यम

भारत में ऋण वसूली अधिकरण किस वर्ष के अधिनियम के अंतर्गत स्थापित किए गए?

  1. A.1985
  2. B.1993
  3. C.2002
  4. D.2013
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. 1993

व्याख्या

सही उत्तर B, 1993 है। बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को शोध्य ऋण वसूली अधिनियम 1993 ने ऋण वसूली अधिकरण बनाए और उनके ऊपर ऋण वसूली अपीलीय अधिकरण रखे, जिससे बैंकों के वसूली वाद सामान्य दीवानी न्यायालयों से हटाए जा सकें, जहां वे वर्षों लंबित रहते थे। विकल्प A गलत है क्योंकि 1985 बीमार औद्योगिक कंपनी अधिनियम का वर्ष है, जिसके औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड का स्थान बाद में दिवाला संहिता ने लिया। विकल्प C गलत है क्योंकि 2002 सरफेसी अधिनियम का वर्ष है। विकल्प D गलत है क्योंकि 2013 कंपनी अधिनियम का वर्ष है। दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता के अंतर्गत यही ऋण वसूली अधिकरण व्यक्तियों और भागीदारी फर्मों के दिवाला का निर्णायक प्राधिकारी भी है। इसलिए क्रम याद रखें: 1985 बीमार कंपनी अधिनियम, 1993 ऋण वसूली अधिकरण, 2002 सरफेसी और 2016 दिवाला संहिता, क्योंकि प्रश्न इन्हीं चार वर्षों को आपस में बदलते हैं।

Q9.भारतीय अर्थव्यवस्थामध्यम

जिस समिति की 1991 की रिपोर्ट ने भारत में बैंकिंग क्षेत्र सुधारों की रूपरेखा दी, उसके अध्यक्ष कौन थे?

  1. A.एम. नरसिम्हम
  2. B.रघुराम राजन
  3. C.बिमल जालान
  4. D.उर्जित पटेल
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. एम. नरसिम्हम

व्याख्या

सही उत्तर A, एम. नरसिम्हम है। उनकी अध्यक्षता वाली 1991 की वित्तीय प्रणाली समिति और 1998 की बैंकिंग क्षेत्र सुधार समिति ने आय निर्धारण तथा प्रावधान के विवेकपूर्ण मानदंड, जोखिम-भारित परिसंपत्तियों पर न्यूनतम पूंजी अनुपात, सांविधिक चलनिधि अनुपात तथा नकद आरक्षित अनुपात में कमी, नए निजी बैंकों के प्रवेश और बैंक बोर्डों को अधिक स्वायत्तता की सिफारिश की, और यही सुधार का आधार बने। विकल्प B गलत है क्योंकि रघुराम राजन ने 2008 की वित्तीय क्षेत्र सुधार समिति की अध्यक्षता की और बाद में गवर्नर के रूप में 2015 की परिसंपत्ति गुणवत्ता समीक्षा कराई। विकल्प C गलत है क्योंकि बिमल जालान रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे और बाद में उसके आर्थिक पूंजी ढांचे पर समिति के अध्यक्ष बने। विकल्प D गलत है क्योंकि उर्जित पटेल मौद्रिक नीति ढांचे पर समिति के अध्यक्ष थे। ध्यान दें कि 1991 की समिति को वित्तीय प्रणाली समिति और 1998 की समिति को बैंकिंग क्षेत्र सुधार समिति कहा जाता है, और प्रश्न में दोनों में से कोई भी वर्ष दिया जा सकता है।

Q10.भारतीय अर्थव्यवस्थाकठिन

दिवाला संहिता के अंतर्गत समाधान योजना की स्वीकृति के लिए समाधान समिति में कम से कम कितने मतदान हिस्से वाले लेनदारों का समर्थन आवश्यक है?

  1. A.इक्यावन प्रतिशत
  2. B.छियासठ प्रतिशत
  3. C.पचहत्तर प्रतिशत
  4. D.नब्बे प्रतिशत
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. छियासठ प्रतिशत

व्याख्या

सही उत्तर B, छियासठ प्रतिशत है। समाधान समिति कंपनी के वित्तीय लेनदारों से बनती है और प्रत्येक का मतदान हिस्सा उसके ऋण के अनुपात में होता है; समाधान योजना तभी स्वीकृत होती है जब कम से कम छियासठ प्रतिशत मतदान हिस्से वाले लेनदार उसके पक्ष में मत दें, और प्रक्रिया बढ़ाने या परिसमापन में जाने जैसे महत्वपूर्ण निर्णयों के लिए भी यही बहुमत आवश्यक है। विकल्प A गलत है क्योंकि इक्यावन प्रतिशत समिति के साधारण निर्णयों की सीमा है, समाधान योजना की नहीं, और यही सबसे आम भूल है। विकल्प C गलत है क्योंकि 2016 की संहिता में मूल रूप से पचहत्तर प्रतिशत की आवश्यकता थी, जिसे 2018 के संशोधन से घटाया गया क्योंकि कुछ मतों की कमी से योजनाएं विफल हो रही थीं। विकल्प D संहिता में कहीं भी प्रयुक्त सीमा नहीं है।

Q11.भारतीय अर्थव्यवस्थाकठिन

दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता की धारा 29क निम्नलिखित में से किससे संबंधित है?

  1. A.देनदार के विरुद्ध विधिक कार्यवाही पर रोक अवधि
  2. B.परिसमापन पर धन के वितरण का क्रम
  3. C.वे व्यक्ति जो समाधान योजना देने के पात्र नहीं हैं
  4. D.आवेदन के लिए चूक की न्यूनतम राशि
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. वे व्यक्ति जो समाधान योजना देने के पात्र नहीं हैं

व्याख्या

सही उत्तर C, वे व्यक्ति जो समाधान योजना देने के पात्र नहीं हैं। 2018 के संशोधन से जोड़ी गई धारा 29क अपात्रताओं की सूची देती है, मुख्यतः उन प्रवर्तकों और संबंधित व्यक्तियों की जिनके खाते गैर-निष्पादित घोषित हैं, तथा अनुन्मोचित दिवालियों और निदेशक के रूप में निरर्हित व्यक्तियों की, जिससे चूक करने वाला प्रवर्तक उसी प्रक्रिया से अपनी कंपनी सस्ते में वापस न खरीद सके जो उसकी चूक से आरंभ हुई। विकल्प A गलत है क्योंकि रोक अवधि धारा 14 है, जो आवेदन स्वीकार होने पर वाद, वसूली और परिसंपत्तियों के हस्तांतरण को रोक देती है। विकल्प B गलत है क्योंकि परिसमापन पर वितरण का क्रम धारा 53 में है, जिसमें दिवाला लागत और कामगारों की देय राशि पहले आती है। विकल्प D गलत है क्योंकि चूक की सीमा, जो अब एक करोड़ रुपये है, धारा 4 से आती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कोई ऋण गैर-निष्पादित परिसंपत्ति कब बनता है?

जब ब्याज या मूलधन की किस्त नब्बे दिन से अधिक बकाया रह जाए, यह रिजर्व बैंक के आय निर्धारण और परिसंपत्ति वर्गीकरण मानदंडों के अनुसार होता है। कृषि ऋणों में परीक्षा फसल मौसमों में होती है: अल्पावधि फसलों के लिए दो मौसम और दीर्घावधि फसलों के लिए एक मौसम।

सकल एनपीए और शुद्ध एनपीए में क्या अंतर है?

सकल एनपीए गैर-निष्पादित घोषित ऋणों का कुल मूल्य है। शुद्ध एनपीए उसमें से वे प्रावधान घटाकर मिलता है जो बैंक ने इन ऋणों के विरुद्ध पहले ही रख लिए हैं, इसलिए वह डूबे ऋणों का वह भाग दिखाता है जो अभी ढका नहीं है और सदैव छोटा आंकड़ा होता है।

कंपनी के दिवाला मामलों का निर्णय कौन-सा अधिकरण करता है?

दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता के अंतर्गत कंपनियों और सीमित दायित्व भागीदारी के लिए राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण निर्णायक प्राधिकारी है, जिसके विरुद्ध अपील राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण में होती है। व्यक्तियों और भागीदारी फर्मों के लिए ऋण वसूली अधिकरण यह कार्य करता है।

संहिता के अंतर्गत समाधान प्रक्रिया में कितना समय लगता है?

कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया आवेदन स्वीकार होने से 180 दिन में पूरी होनी चाहिए, जिसे एक बार 90 दिन तक बढ़ाया जा सकता है, और विधिक कार्यवाही के समय सहित हर स्थिति में 330 दिन के भीतर। समय पर कोई योजना स्वीकृत न हो तो कंपनी परिसमापन में जाती है।

दिवाला संहिता की धारा 29क क्या करती है?

यह उन व्यक्तियों की सूची देती है जो समाधान योजना प्रस्तुत करने के पात्र नहीं हैं, मुख्यतः वे प्रवर्तक और संबंधित व्यक्ति जिनके खाते गैर-निष्पादित घोषित हैं, जिससे चूक करने वाला प्रवर्तक दिवाला प्रक्रिया के माध्यम से अपनी कंपनी सस्ते में वापस न खरीद सके।

स्रोत

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