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GK नोट्सभारतीय अर्थव्यवस्थाभुगतान संतुलन और विदेश व्यापार

भुगतान संतुलन और विदेश व्यापार: प्रमुख अवधारणाएँ

भुगतान संतुलन और भारत के विदेश व्यापार के संपूर्ण नोट्स: चालू तथा पूँजी खाता, व्यापार घाटा, 1991 का संकट, परिवर्तनीयता, डीजीएफटी और विश्व व्यापार संगठन।

लेखक · प्रकाशित · 5 मिनट

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भुगतान संतुलन और विदेश व्यापार: प्रमुख अवधारणाएँ — GK24 title card
भुगतान संतुलन और विदेश व्यापार: प्रमुख अवधारणाएँ — GK24 title card

भुगतान संतुलन वह लेखा है जिसमें कोई देश एक वर्ष में अपने निवासियों और शेष विश्व के बीच हुए सभी आर्थिक लेन-देन दर्ज करता है। विदेश व्यापार, अर्थात सीमाओं के आर-पार वस्तुओं और सेवाओं का क्रय-विक्रय, इस लेखे की सबसे बड़ी मद है। दोनों मिलकर बताते हैं कि रुपया क्यों चढ़ता-उतरता है, सरकार तेल के बिल को लेकर चिंतित क्यों रहती है और कोई देश तेज वृद्धि करते हुए भी डॉलर की कमी में क्यों पड़ सकता है। परीक्षा की दृष्टि से यह अध्याय कुछ परिभाषाओं का समूह है, जिन्हें आपस में न मिलाना जरूरी है, और कुछ तिथियों का।

भुगतान संतुलन की संरचना

भुगतान संतुलन दोहरे लेखांकन के सिद्धांत पर बनता है, इसलिए बहीखाते की दृष्टि से यह सदा संतुलित रहता है। इसके दो मुख्य भाग हैं। चालू खाता वस्तुओं, सेवाओं और आय के प्रवाह को दर्ज करता है, तथा पूँजी खाता, जिसे आधुनिक प्रस्तुति में पूँजी एवं वित्तीय खाता कहा जाता है, परिसंपत्तियों और देनदारियों के स्वामित्व में परिवर्तन दर्ज करता है। भूल-चूक मद दोनों के बीच के सांख्यिकीय अंतर को समेट लेती है।

खाताक्या दर्ज होता हैउदाहरण
चालू खाता, दृश्य मदवस्तुओं का निर्यात और आयातचावल का निर्यात, कच्चे तेल का आयात
चालू खाता, अदृश्य मदसेवाएँ, निवेश आय, हस्तांतरणसॉफ्टवेयर निर्यात, पर्यटन, प्रेषण
पूँजी खातापरिसंपत्तियाँ और देनदारियाँप्रत्यक्ष विदेशी निवेश, पोर्टफोलियो प्रवाह, बाह्य वाणिज्यिक उधार, एनआरआई जमा
आरक्षित निधिसरकारी विदेशी मुद्रा भंडार में परिवर्तनविदेशी मुद्रा परिसंपत्तियाँ, स्वर्ण, एसडीआर

व्यापार संतुलन और चालू खाता घाटा

व्यापार संतुलन में केवल दृश्य मदें गिनी जाती हैं, अर्थात वस्तुओं का निर्यात घटा आयात। जब वस्तुओं का आयात निर्यात से अधिक हो जाता है तो देश में व्यापार घाटा होता है। चालू खाता संतुलन इससे व्यापक है: इसमें व्यापार संतुलन के साथ अदृश्य मदें भी जुड़ती हैं। कच्चे तेल, सोने और इलेक्ट्रॉनिक सामान के कारण भारत में प्रायः व्यापार घाटा रहता है, पर उसका बड़ा भाग सॉफ्टवेयर निर्यात और विदेश में काम करने वाले भारतीयों के प्रेषण से पूरा हो जाता है, इसलिए चालू खाता घाटा व्यापार घाटे से छोटा रहता है। चालू खाता घाटा स्वयं में रोग नहीं है; वह तब रोग बनता है जब पूँजी खाता उसकी भरपाई न कर सके।

अर्थशास्त्री इन मदों को एक और तरह से बाँटते हैं। स्वायत्त लेन-देन, जिन्हें रेखा के ऊपर कहा जाता है, अपने ही उद्देश्य से किए जाते हैं, लाभ या उपभोग के लिए। समायोजक लेन-देन, जो रेखा के नीचे आते हैं, स्वायत्त मदों से बचे अंतर को पाटने के लिए किए जाते हैं, मुख्यतः भंडार घटाकर या बढ़ाकर। भुगतान संतुलन का घाटा इसी का नाम है कि स्वायत्त प्राप्तियाँ कम पड़ गईं और अंतर का वित्त पोषण करना पड़ा।

1991 का संकट और उसके बाद

1991 के मध्य तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार घटकर लगभग दो सप्ताह के आयात जितना रह गया था। सरकार ने विदेश में स्वर्ण गिरवी रखा, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से ऋण लिया और जुलाई 1991 में दो चरणों में रुपये का अवमूल्यन किया। इस संकट ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण का रास्ता खोला: औद्योगिक लाइसेंस लगभग समाप्त हुए, सीमा शुल्क घटाए गए और विनिमय दर में 1992 की दोहरी दर तथा 1993 के एकीकरण से सुधार हुआ। अगस्त 1994 में भारत ने आईएमएफ के अनुच्छेद आठ के अंतर्गत पूर्ण चालू खाता परिवर्तनीयता स्वीकार की। पूँजी खाता परिवर्तनीयता अब भी आंशिक है और 1997 तथा 2006 की दो तारापोर समितियों ने आगे बढ़ने का खाका रखा।

विनिमय दर और परिवर्तनीयता

स्थिर विनिमय दर सरकार तय करती है, अस्थिर या तैरती दर माँग और पूर्ति से तय होती है, और प्रबंधित तैरती दर, जिसे भारत अपनाता है, बाजार को निर्णय करने देती है जबकि रिजर्व बैंक तीव्र उतार-चढ़ाव को थामने के लिए हस्तक्षेप करता है। तैरती व्यवस्था में रुपये के बाह्य मूल्य के गिरने को मूल्यह्रास और बढ़ने को मूल्यवृद्धि कहते हैं; स्थिर व्यवस्था में सरकार द्वारा किए गए वही परिवर्तन अवमूल्यन और अधिमूल्यन कहलाते हैं। कमजोर रुपया निर्यात को विदेश में सस्ता और आयात को देश में महँगा बनाता है।

विदेश व्यापार: नीति और संस्थाएँ

भारत का विदेश व्यापार 1992 के विदेश व्यापार विकास एवं विनियमन अधिनियम से संचालित होता है और वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अधीन विदेश व्यापार महानिदेशालय इसका प्रशासन करता है, जो विदेश व्यापार नीति और आयातक-निर्यातक कोड जारी करता है। निर्यात को 1982 में स्थापित भारतीय निर्यात-आयात बैंक, निर्यात ऋण गारंटी निगम, निर्यात संवर्धन परिषदें तथा 2005 के विशेष आर्थिक क्षेत्र अधिनियम के अंतर्गत बने विशेष आर्थिक क्षेत्र सहारा देते हैं।

व्यापार अवरोध और विश्व व्यापार संगठन

देश घरेलू उद्योग की रक्षा दो तरीकों से करते हैं। प्रशुल्क अवरोध व्यापार पर लगने वाले कर हैं, मुख्यतः सीमा शुल्क, जो आयातित वस्तु का दाम बढ़ा देते हैं। गैर-प्रशुल्क अवरोध मात्रा या प्रवेश पर रोक लगाते हैं: कोटा तय करता है कि कितना आ सकता है, प्रतिबंध किसी देश से व्यापार पूरी तरह रोक देता है, और लाइसेंस, मानक तथा स्वच्छता नियम भी इसी दिशा में काम करते हैं। आयात प्रतिस्थापन की अंतर्मुखी रणनीति मुख्यतः प्रशुल्क और कोटा पर टिकी होती है।

विश्व व्यापार संगठन 1 जनवरी 1995 को अस्तित्व में आया और उसने 1947 के प्रशुल्क एवं व्यापार सामान्य समझौते का स्थान लिया; इसका मुख्यालय जेनेवा में है। भारत इसका संस्थापक सदस्य है। इसके नियम सर्वाधिक अनुग्रहीत राष्ट्र सिद्धांत पर टिके हैं, जिसके अनुसार एक सदस्य को दी गई रियायत सभी को देनी होती है, तथा राष्ट्रीय व्यवहार पर, जिसके अनुसार प्रवेश के बाद आयातित वस्तु के साथ घरेलू वस्तु से बुरा व्यवहार नहीं किया जा सकता। याद रखने योग्य मुख्य समझौते हैं बौद्धिक संपदा पर ट्रिप्स, निवेश उपायों पर ट्रिम्स, सेवाओं पर गैट्स और कृषि समझौता।

परीक्षकों के प्रिय पद

निर्यात का मूल्यांकन एफओबी अर्थात फ्री ऑन बोर्ड पर होता है और आयात का सीआईएफ अर्थात लागत, बीमा और भाड़ा पर, यही एक कारण है कि आयात के आँकड़े बड़े दिखते हैं। व्यापार शर्तें निर्यात कीमतों और आयात कीमतों का अनुपात हैं; निर्यात कीमतें तेजी से बढ़ें तो ये सुधरती हैं। विशेष आहरण अधिकार आईएमएफ द्वारा बनाई गई आरक्षित परिसंपत्ति है, जिसका मूल्य प्रमुख मुद्राओं की टोकरी पर टिका है। अंत में, व्यापार नीति में आत्मनिर्भरता का अर्थ उन वस्तुओं के आयात से बचना है जिन्हें देश स्वयं बना सकता है, न कि व्यापार को पूरी तरह बंद कर देना।

परीक्षा की दृष्टि से

परीक्षक मिलती-जुलती परिभाषाओं पर प्रश्न बनाते हैं। सबसे आम प्रश्न यह है कि व्यापार संतुलन में क्या आता है और चालू खाता तथा पूरे भुगतान संतुलन से वह कैसे अलग है, तथा कौन-सी मद किस खाते में जाती है। प्रशुल्क और गैर-प्रशुल्क अवरोध तथा आयात प्रतिस्थापन के उपकरण के रूप में प्रशुल्क और कोटा की जोड़ी हर वर्ष दोहराई जाती है। तिथियाँ प्रिय हैं: संकट और अवमूल्यन के लिए 1991, चालू खाता परिवर्तनीयता के लिए 1994, विश्व व्यापार संगठन के लिए 1995 और गैट के लिए 1947। जाल हैं सब्सिडी को अवरोध न मानना, प्रेषण को पूँजी खाते की मद कहना तथा तैरती दर के मूल्यह्रास और स्थिर दर के अवमूल्यन को मिला देना।

महत्वपूर्ण तथ्य

भुगतान संतुलनएक वर्ष में निवासियों और शेष विश्व के बीच सभी लेन-देन का लेखा
दो मुख्य खातेचालू खाता, तथा पूँजी या वित्तीय खाता
व्यापार संतुलनकेवल वस्तुओं का निर्यात घटा आयात, अर्थात दृश्य संतुलन
अदृश्य मदेंसेवाएँ, निवेश आय और प्रेषण जैसे हस्तांतरण
भुगतान संतुलन संकट1991, भंडार लगभग दो सप्ताह के आयात जितना, स्वर्ण गिरवी, आईएमएफ ऋण
चालू खाता परिवर्तनीयताअगस्त 1994, आईएमएफ के अनुच्छेद आठ के अंतर्गत
पूँजी खाता परिवर्तनीयताआंशिक; 1997 और 2006 की तारापोर समितियाँ
विनिमय दर व्यवस्थाप्रबंधित तैरती दर, रिजर्व बैंक के हस्तक्षेप के साथ
व्यापार नीति प्राधिकरणविदेश व्यापार महानिदेशालय, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय
संचालक कानूनविदेश व्यापार (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1992
विश्व व्यापार संगठन1 जनवरी 1995 से, गैट 1947 का स्थान लिया, मुख्यालय जेनेवा
निर्यात वित्त संस्थाएँ1982 में स्थापित एक्ज़िम बैंक तथा निर्यात ऋण गारंटी निगम

इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ

Q1.भारतीय अर्थव्यवस्थापूछा गया: SSC CGL · 06 Dec 2022, Shift 3आसान

किसी अर्थव्यवस्था का भुगतान संतुलन खाता ________ से संबंधित होता है।

  1. A.कृषि क्षेत्र
  2. B.बाह्य क्षेत्र
  3. C.सरकारी क्षेत्र
  4. D.निजी क्षेत्र
उत्तर देखें

सही उत्तर: B. बाह्य क्षेत्र

व्याख्या

सही उत्तर B, बाह्य क्षेत्र है। भुगतान संतुलन वह विवरण है जिसमें किसी अवधि में देश के निवासियों और शेष विश्व के बीच हुए सभी आर्थिक लेन-देन दर्ज होते हैं, और अर्थव्यवस्था के बाह्य क्षेत्र का अर्थ ठीक यही है; इसमें वस्तु व्यापार, सेवाएँ, आय, हस्तांतरण और पूँजी प्रवाह आते हैं। विकल्प A गलत है क्योंकि कृषि घरेलू अर्थव्यवस्था का उत्पादक क्षेत्र है और उसे उत्पादन तथा राष्ट्रीय आय लेखों से मापा जाता है, भुगतान संतुलन से नहीं। विकल्प C गलत है क्योंकि सरकारी क्षेत्र का हिसाब बजट और राजकोषीय घाटे से रखा जाता है, जो आंतरिक लेखे हैं। विकल्प D गलत है क्योंकि निजी क्षेत्र भी घरेलू वर्गीकरण है, जिसमें परिवार और फर्म आते हैं और जो बचत तथा निवेश के आँकड़ों में दिखता है। शेष तीनों आंतरिक अर्थव्यवस्था के भाग हैं, केवल बाह्य क्षेत्र बाहर की ओर देखता है।

Q2.भारतीय अर्थव्यवस्थापूछा गया: SSC GD कांस्टेबल · 12 Feb 2019, Shift 3आसान

निम्नलिखित में से कौन-सा व्यापार अवरोध नहीं है?

  1. A.सब्सिडी
  2. B.प्रतिबंध (एम्बार्गो)
  3. C.निर्यात सुरक्षा
  4. D.प्रशुल्क अवरोध
उत्तर देखें

सही उत्तर: C. निर्यात सुरक्षा

व्याख्या

सही उत्तर C, निर्यात सुरक्षा है। निर्यात सुरक्षा व्यापार अवरोधों की कोई मान्य श्रेणी नहीं है; यह ऐसा कोई उपाय नहीं है जो सीमा पार वस्तुओं की आवाजाही रोकता हो। विकल्प A इसलिए गलत विकल्प है क्योंकि सब्सिडी को अवरोध माना जाता है: घरेलू उत्पादकों की लागत घटाकर वह आयातित वस्तु को प्रतिस्पर्धा से बाहर कर देती है और इसी कारण विश्व व्यापार संगठन उस पर अनुशासन लगाता है। विकल्प B गलत है क्योंकि एम्बार्गो सबसे कठोर अवरोध है, जिसमें किसी देश या किसी वस्तु के साथ व्यापार पर पूर्ण रोक लगा दी जाती है। विकल्प D गलत है क्योंकि प्रशुल्क अवरोध, मुख्यतः सीमा शुल्क, सबसे प्रचलित अवरोध है, जो घरेलू बाजार में आयातित वस्तु का दाम बढ़ा देता है। दोनों परिवारों को अलग रखें: प्रशुल्क अवरोध कीमत पर काम करते हैं और गैर-प्रशुल्क अवरोध मात्रा या प्रवेश पर।

Q3.भारतीय अर्थव्यवस्थापूछा गया: SSC GD कांस्टेबल · 23 Feb, 2024, Shift 1मध्यम

अंतर्मुखी व्यापार रणनीति में घरेलू उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए प्रयुक्त संरक्षण के दो मुख्य रूप कौन-से हैं?

  1. A.प्रशुल्क और सब्सिडी
  2. B.कोटा और सब्सिडी
  3. C.प्रशुल्क और मूल्य नियंत्रण
  4. D.प्रशुल्क और कोटा
उत्तर देखें

सही उत्तर: D. प्रशुल्क और कोटा

व्याख्या

सही उत्तर D, प्रशुल्क और कोटा है। अंतर्मुखी व्यापार रणनीति, जिसे आयात प्रतिस्थापन कहा जाता है, वही नीति थी जिसे भारत ने दूसरी पंचवर्षीय योजना से 1991 तक अपनाया, और वह दो उपकरणों पर टिकी थी। प्रशुल्क आयात पर लगने वाला कर है, जो विदेशी वस्तु को महँगा कर देता है, और कोटा वह सीमा है कि कुल कितनी मात्रा आयात की जा सकती है। विकल्प A गलत है क्योंकि सब्सिडी निर्यातकों या घरेलू उत्पादकों की सहायता करती है, पर पाठ्यपुस्तक की संरक्षण परिभाषा में नामित जोड़ी वह नहीं है। विकल्प B इसी कारण गलत है और इसमें प्रशुल्क छूट गया है, जो प्राथमिक उपकरण है। विकल्प C गलत है क्योंकि मूल्य नियंत्रण उपभोक्ताओं और आवश्यक वस्तुओं के लिए घरेलू उपाय है; वह सीमा पर काम नहीं करता। जोड़ी याद रखें: संरक्षण अर्थात प्रशुल्क और कोटा।

Q4.भारतीय अर्थव्यवस्थापूछा गया: SSC CPO · 10 Nov 2022, Shift 1मध्यम

आत्मनिर्भरता का सूचक क्या है?

  1. A.उन वस्तुओं के आयात में वृद्धि जिनका उत्पादन देश में हो सकता है।
  2. B.उन वस्तुओं के आयात से बचना जिनका उत्पादन देश में हो सकता है।
  3. C.उन वस्तुओं के निर्यात में वृद्धि जिनका उत्पादन देश में नहीं हो सकता।
  4. D.उन वस्तुओं के निर्यात से बचना जिनका उत्पादन देश में हो सकता है।
उत्तर देखें

सही उत्तर: B. उन वस्तुओं के आयात से बचना जिनका उत्पादन देश में हो सकता है।

व्याख्या

सही उत्तर B है। आत्मनिर्भरता, जो भारत की आरंभिक योजनाओं का लक्ष्य थी, का अर्थ है देश के भीतर वह उत्पादन क्षमता खड़ी करना जिसके अभाव में वस्तुएँ विदेश से खरीदनी पड़तीं, इसलिए उसका वास्तविक सूचक यही है कि ऐसी वस्तुओं के आयात से बचा जाए। यह निर्भरता घटाने का कथन है, व्यापार समाप्त करने का नहीं। विकल्प A गलत है क्योंकि जिन वस्तुओं को देश स्वयं बना सकता है उनके आयात का बढ़ना आत्मनिर्भरता के विपरीत है और बढ़ती निर्भरता दिखाता है। विकल्प C गलत है क्योंकि जो वस्तु देश बनाता ही नहीं उसका बड़ी मात्रा में निर्यात संभव नहीं है, और निर्यात वैसे भी प्रतिस्पर्धात्मकता का संकेत है, आत्मनिर्भरता का नहीं। विकल्प D गलत है क्योंकि घरेलू रूप से उत्पादित वस्तुओं के निर्यात से बचना कमाई की क्षमता नष्ट करता है; आत्मनिर्भरता का अर्थ विदेशी बाजार छोड़ना कभी नहीं था। इसी विचार से आयात प्रतिस्थापन की नीति निकली।

Q5.भारतीय अर्थव्यवस्थामध्यम

किसी देश के व्यापार संतुलन में निम्नलिखित में से क्या सम्मिलित होता है?

  1. A.केवल वस्तुओं का निर्यात और आयात
  2. B.वस्तुओं तथा सेवाओं का निर्यात और आयात
  3. C.चालू और पूँजी खाते के सभी लेन-देन
  4. D.केवल विदेशी निवेश का प्रवाह
उत्तर देखें

सही उत्तर: A. केवल वस्तुओं का निर्यात और आयात

व्याख्या

सही उत्तर A, केवल वस्तुओं का निर्यात और आयात है। व्यापार संतुलन, जिसे वस्तु या दृश्य संतुलन भी कहते हैं, निर्यात की गई वस्तुओं और आयात की गई वस्तुओं के मूल्य का अंतर है; इसमें और कुछ नहीं आता। विकल्प B गलत है क्योंकि सेवाएँ जोड़ते ही वह आँकड़ा वस्तु एवं सेवा संतुलन बन जाता है, जो चालू खाते की ओर एक कदम है पर व्यापार संतुलन नहीं। विकल्प C गलत है क्योंकि चालू और पूँजी खाते मिलकर पूरा भुगतान संतुलन बनाते हैं, जिसका व्यापार संतुलन केवल एक अंग है। विकल्प D गलत है क्योंकि विदेशी निवेश, चाहे प्रत्यक्ष हो या पोर्टफोलियो, पूँजी खाते में आता है और व्यापार संतुलन में कभी नहीं। यही इस अध्याय की सबसे आम भ्रांति है, इसलिए सीढ़ी क्रम से याद रखें: व्यापार संतुलन, फिर चालू खाता, फिर भुगतान संतुलन।

Q6.भारतीय अर्थव्यवस्थाकठिन

भारत ने रुपये की चालू खाते पर पूर्ण परिवर्तनीयता किस वर्ष अपनाई थी?

  1. A.1991
  2. B.1994
  3. C.1997
  4. D.2000
उत्तर देखें

सही उत्तर: B. 1994

व्याख्या

सही उत्तर B, 1994 है। अगस्त 1994 में भारत ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुच्छेद आठ के दायित्व स्वीकार किए और रुपये को चालू खाते पर पूर्ण रूप से परिवर्तनीय बना दिया, जिससे व्यापार, यात्रा, शिक्षा और प्रेषण के लिए विदेशी मुद्रा बाजार दर पर स्वतंत्र रूप से मिलने लगी। विकल्प A गलत है क्योंकि 1991 भुगतान संतुलन संकट और दो चरणों वाले अवमूल्यन का वर्ष है, परिवर्तनीयता का नहीं। विकल्प C गलत है क्योंकि 1997 पहली तारापोर समिति का वर्ष है, जिसने पूँजी खाता परिवर्तनीयता का खाका बनाया; वह परिवर्तनीयता आज भी केवल आंशिक है। विकल्प D गलत है क्योंकि 2000 में ऐसा कुछ नहीं हुआ। क्रम याद रखें: 1991 में संकट और अवमूल्यन, 1992 में दोहरी विनिमय दर, 1993 में एकीकरण और 1994 में चालू खाता परिवर्तनीयता।

Q7.भारतीय अर्थव्यवस्थाआसान

1 जनवरी 1995 को स्थापित विश्व व्यापार संगठन ने किस संस्था का स्थान लिया था?

  1. A.अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष
  2. B.प्रशुल्क एवं व्यापार सामान्य समझौता (गैट)
  3. C.संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन
  4. D.विश्व बैंक
उत्तर देखें

सही उत्तर: B. प्रशुल्क एवं व्यापार सामान्य समझौता (गैट)

व्याख्या

सही उत्तर B, प्रशुल्क एवं व्यापार सामान्य समझौता है। गैट पर 1947 में प्रशुल्क कटौती के अस्थायी समझौते के रूप में हस्ताक्षर हुए थे और उरुग्वे दौर के बाद 1 जनवरी 1995 को उसका स्थान विश्व व्यापार संगठन ने ले लिया, जो जेनेवा मुख्यालय वाला स्थायी निकाय है और जिसके पास बाध्यकारी विवाद निपटान व्यवस्था है। भारत इसका संस्थापक सदस्य है। विकल्प A गलत है क्योंकि 1944 में ब्रेटन वुड्स में बना अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष विनिमय दरों और भुगतान संतुलन सहायता से जुड़ा है और आज भी विद्यमान है। विकल्प C गलत है क्योंकि 1964 में स्थापित अंकटाड संयुक्त राष्ट्र का निकाय है जो व्यापार और विकास पर विकासशील देशों का पक्ष रखता है और उसका स्थान किसी ने नहीं लिया। विकल्प D गलत है क्योंकि विश्व बैंक विकास परियोजनाओं के लिए ऋण देता है और अलग संस्था है। याद रखने योग्य समझौते हैं ट्रिप्स, ट्रिम्स, गैट्स और कृषि समझौता।

Q8.भारतीय अर्थव्यवस्थामध्यम

भारत की विदेश व्यापार नीति का प्रशासन कौन करता है और आयातक-निर्यातक कोड कौन जारी करता है?

  1. A.भारतीय रिजर्व बैंक
  2. B.विदेश व्यापार महानिदेशालय
  3. C.भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड
  4. D.नीति आयोग
उत्तर देखें

सही उत्तर: B. विदेश व्यापार महानिदेशालय

व्याख्या

सही उत्तर B, विदेश व्यापार महानिदेशालय है। यह महानिदेशालय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अधीन काम करता है और 1992 के विदेश व्यापार विकास एवं विनियमन अधिनियम के अंतर्गत विदेश व्यापार नीति बनाता तथा लागू करता है, आयातक-निर्यातक कोड जारी करता है जिसके बिना कोई सीमा पार व्यापार नहीं कर सकता, और निर्यात संवर्धन योजनाएँ चलाता है। विकल्प A गलत है क्योंकि रिजर्व बैंक फेमा के अंतर्गत व्यापार का विदेशी मुद्रा पक्ष सँभालता है और भंडार रखता है, पर व्यापार नीति नहीं लिखता। विकल्प C गलत है क्योंकि सेबी प्रतिभूति बाजार का नियामक है और उसका आयात-निर्यात से कोई संबंध नहीं। विकल्प D गलत है क्योंकि नीति आयोग सरकार को परामर्श देने वाला थिंक टैंक है, जिसके पास नियामक शक्ति नहीं है। साथ में 1982 के एक्ज़िम बैंक और निर्यात ऋण गारंटी निगम भी याद रखें।

Q9.भारतीय अर्थव्यवस्थामध्यम

निम्नलिखित में से कौन-सा मद भुगतान संतुलन के पूँजी खाते में दर्ज होता है?

  1. A.सॉफ्टवेयर सेवाओं का निर्यात
  2. B.प्रत्यक्ष विदेशी निवेश
  3. C.विदेश में काम करने वालों द्वारा भेजा गया धन
  4. D.कच्चे तेल का आयात
उत्तर देखें

सही उत्तर: B. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश

व्याख्या

सही उत्तर B, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश है। पूँजी खाता उन लेन-देन को दर्ज करता है जिनसे निवासियों और अनिवासियों के बीच परिसंपत्तियों तथा देनदारियों का स्वामित्व बदलता है, और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, पोर्टफोलियो निवेश, बाह्य वाणिज्यिक उधार तथा अनिवासी भारतीयों की जमाएँ ठीक इसी वर्ग में आती हैं। विकल्प A गलत है क्योंकि सॉफ्टवेयर सेवाओं का निर्यात चालू खाते की अदृश्य मद है और भारत की सबसे बड़ी कमाइयों में से एक है। विकल्प C गलत है क्योंकि प्रेषण एकपक्षीय हस्तांतरण हैं और वे भी चालू खाते की अदृश्य मदों में आते हैं; वे भारत के व्यापार घाटे को पाटने में सहायक होते हैं। विकल्प D गलत है क्योंकि कच्चे तेल का आयात दृश्य वस्तु मद है और व्यापार संतुलन के आयात पक्ष की सबसे बड़ी प्रविष्टि है। नियम सरल है: वस्तु, सेवा, आय और हस्तांतरण चालू खाते में तथा परिसंपत्ति और देनदारी पूँजी खाते में।

Q10.भारतीय अर्थव्यवस्थाआसान

भारत को किस वर्ष उस गंभीर भुगतान संतुलन संकट का सामना करना पड़ा जिसके बाद उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के सुधार हुए?

  1. A.1985
  2. B.1991
  3. C.1997
  4. D.2008
उत्तर देखें

सही उत्तर: B. 1991

व्याख्या

सही उत्तर B, 1991 है। 1991 के मध्य तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार घटकर लगभग दो सप्ताह के आयात जितना रह गया था, धन जुटाने के लिए विदेश में स्वर्ण गिरवी रखा गया, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से ऋण लिया गया और जुलाई में रुपये का दो चरणों में अवमूल्यन हुआ। इसके बाद 1991 की नई औद्योगिक नीति आई, जिसने अधिकांश औद्योगिक लाइसेंस समाप्त कर अर्थव्यवस्था खोल दी। विकल्प A गलत है क्योंकि 1985 में राजीव गांधी के समय सीमित उदारीकरण हुआ था, पर ऐसा कोई संकट नहीं आया। विकल्प C गलत है क्योंकि 1997 पूर्वी एशियाई मुद्रा संकट का वर्ष है, जिससे भारत काफी हद तक बचा रहा, और पहली तारापोर समिति की रिपोर्ट का वर्ष है। विकल्प D गलत है क्योंकि 2008 वैश्विक वित्तीय संकट है, जिसमें भारत की वृद्धि धीमी हुई पर बाह्य स्थिति नहीं बिगड़ी। 1991 को अवमूल्यन, आईएमएफ ऋण और एलपीजी सुधारों के साथ याद रखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

व्यापार संतुलन और भुगतान संतुलन में क्या अंतर है?

व्यापार संतुलन केवल वस्तुओं के निर्यात और आयात का अंतर है, अर्थात दृश्य मदों का। भुगतान संतुलन पूरा लेखा है, जिसमें व्यापार संतुलन के साथ सेवाएँ, आय, हस्तांतरण और सभी पूँजी प्रवाह आते हैं। इस प्रकार व्यापार संतुलन चालू खाते का एक भाग है और चालू खाता भुगतान संतुलन का एक भाग।

भुगतान संतुलन सदा संतुलित क्यों रहता है?

क्योंकि यह दोहरे लेखांकन से बनता है, हर प्राप्ति के सामने एक भुगतान होता है, इसलिए दोनों पक्ष रचना से ही बराबर रहते हैं। जब भुगतान संतुलन के घाटे की बात होती है तो आशय स्वायत्त लेन-देन में कमी से होता है, जिसे समायोजक लेन-देन से, जैसे विदेशी मुद्रा भंडार घटाकर या उधार लेकर, पूरा करना पड़ता है।

चालू खाता परिवर्तनीयता क्या है?

यह चालू लेन-देन के लिए, अर्थात आयात-निर्यात, यात्रा, शिक्षा, चिकित्सा, ब्याज और प्रेषण के लिए, रुपये को बाजार दर पर विदेशी मुद्रा में बदलने की स्वतंत्रता है। भारत ने इसे अगस्त 1994 में आईएमएफ के अनुच्छेद आठ के अंतर्गत पूर्ण रूप से स्वीकार किया। पूँजीगत लेन-देन के लिए, जैसे विदेश में परिसंपत्ति खरीदना, परिवर्तनीयता अब भी आंशिक है।

अवमूल्यन और मूल्यह्रास में क्या अंतर है?

दोनों का अर्थ मुद्रा के बाह्य मूल्य में गिरावट है, पर अवमूल्यन स्थिर विनिमय दर व्यवस्था में सरकार द्वारा जानबूझकर की गई कटौती है, जैसे जुलाई 1991 में हुई, जबकि मूल्यह्रास तैरती या प्रबंधित तैरती व्यवस्था में बाजार शक्तियों से होने वाली गिरावट है, और आज भारत में यही व्यवस्था है।

प्रशुल्क और गैर-प्रशुल्क अवरोध क्या हैं?

प्रशुल्क अवरोध व्यापार पर लगने वाला कर है, मुख्यतः सीमा शुल्क, जो आयातित वस्तु का दाम बढ़ाकर काम करता है। गैर-प्रशुल्क अवरोध मात्रा या प्रवेश पर रोक लगाते हैं और इनमें कोटा, एम्बार्गो, आयात लाइसेंस, स्थानीय सामग्री नियम तथा तकनीकी या स्वच्छता मानक आते हैं। आयात प्रतिस्थापन मुख्यतः प्रशुल्क और कोटा पर टिका होता है।

स्रोत

  • समष्टि अर्थशास्त्र: एक परिचय (कक्षा 12), खुली अर्थव्यवस्था समष्टि अर्थशास्त्र पर अध्याय — एनसीईआरटी
  • भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास (कक्षा 11), 1991 के बाद के आर्थिक सुधारों पर अध्याय — एनसीईआरटी
  • विदेश व्यापार (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1992 — भारत सरकार
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