कमोडिटी बाज़ार और डेरिवेटिव्स: परीक्षा नोट्स
कमोडिटी बाज़ार और डेरिवेटिव्स के परीक्षोपयोगी नोट्स: फॉरवर्ड, फ्यूचर, ऑप्शन और स्वैप, एमसीएक्स तथा एनसीडीईएक्स, एफएमसी का सेबी में विलय और कॉन्टैंगो।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 5 मिनट

कमोडिटी बाज़ार वह बाज़ार है जहाँ कच्चे माल की खरीद-बिक्री होती है: सोना और चाँदी, ताँबा और जस्ता, कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस, तथा गेहूँ, ग्वार, चना, कपास और अरंडी जैसी कृषि उपज। व्यापार या तो हाजिर बाज़ार में होता है, जहाँ तुरंत भुगतान पर माल हाथ बदलता है, या डेरिवेटिव बाज़ार में, जहाँ उसी माल से जुड़े अनुबंध भविष्य की किसी तिथि की सुपुर्दगी के लिए खरीदे-बेचे जाते हैं। बैंकिंग और सिविल सेवा परीक्षाओं के अर्थव्यवस्था पाठ्यक्रम में डेरिवेटिव्स नियमित विषय हैं, और भारतीय कमोडिटी बाज़ार इसलिए भी प्रिय है कि 2015 में उसका नियामक बदल गया। इन नोट्स में बताया गया है कि डेरिवेटिव क्या है, उसके चार प्रकार कौन से हैं, भारतीय कमोडिटी एक्सचेंज कैसे संगठित हैं और उनका नियमन कौन करता है।
डेरिवेटिव क्या है
डेरिवेटिव ऐसा वित्तीय अनुबंध है जिसका अपना कोई मूल्य नहीं होता; उसका मूल्य किसी अंतर्निहित परिसंपत्ति से व्युत्पन्न होता है, जो कोई जिंस, शेयर, शेयर सूचकांक, मुद्रा, ब्याज दर या मौसम तक हो सकती है। अंतर्निहित परिसंपत्ति का भाव हिलता है तो डेरिवेटिव का मूल्य भी उसी के साथ हिलता है। इन अनुबंधों का उपयोग तीन प्रकार के भागीदार करते हैं। हेजर, जैसे कोई किसान या सुनार, भाव पहले से तय करके प्रतिकूल उतार-चढ़ाव का जोखिम हटाने के लिए इनका प्रयोग करता है। सट्टेबाज दूसरी ओर खड़ा होता है, लाभ की आशा में जोखिम स्वीकार करता है और ऐसा करके बाज़ार को तरलता देता है। आर्बिट्राजर एक बाज़ार में खरीदकर दूसरे में बेचता है ताकि भाव के अंतर से लाभ ले सके, और यही गतिविधि विभिन्न बाज़ारों के भावों को एक-दूसरे के पास बनाए रखती है।
डेरिवेटिव के चार प्रकार
फॉरवर्ड दो पक्षों के बीच का ऐसा अनुबंध है जिसमें किसी परिसंपत्ति को भविष्य की तिथि पर तय भाव पर खरीदने या बेचने की बात होती है। यह निजी तौर पर, काउंटर पर तय होता है, इसलिए मात्रा और गुणवत्ता पक्षों की सुविधा से ढाली जा सकती है, किंतु हर पक्ष पर यह जोखिम रहता है कि दूसरा पक्ष वचन न निभाए। फ्यूचर वही फॉरवर्ड है जिसे मानकीकृत करके एक्सचेंज पर ला दिया गया है: मात्रा, गुणवत्ता, सुपुर्दगी तिथि और सुपुर्दगी केंद्र एक्सचेंज तय करता है, दोनों पक्ष मार्जिन जमा करते हैं, स्थिति प्रतिदिन बाज़ार भाव पर आँकी जाती है, और दोनों के बीच क्लियरिंग निगम खड़ा होता है जिससे प्रतिपक्ष जोखिम समाप्त हो जाता है। ऑप्शन अपने क्रेता को यह अधिकार देता है, किंतु बाध्यता नहीं, कि वह अंतर्निहित परिसंपत्ति को निर्धारित भाव पर, जिसे स्ट्राइक मूल्य कहते हैं, किसी निश्चित तिथि को या उससे पहले खरीदे या बेचे; क्रेता इस अधिकार के बदले प्रीमियम देता है और विक्रेता, जिसे राइटर कहते हैं, क्रेता के अधिकार प्रयोग करने पर वचन निभाने को बाध्य है। कॉल ऑप्शन खरीदने का अधिकार है और पुट ऑप्शन बेचने का। यूरोपीय ऑप्शन केवल समाप्ति तिथि पर प्रयोग किया जा सकता है, जबकि अमेरिकी ऑप्शन समाप्ति तक कभी भी। स्वैप नकदी प्रवाह की एक धारा को दूसरी से बदलने का समझौता है, जिसके सामान्य रूप ब्याज दर स्वैप हैं, जिनमें परिवर्तनशील दर को स्थिर दर से बदला जाता है, तथा मुद्रा स्वैप।
फॉरवर्ड और फ्यूचर की तुलना
| विशेषता | फॉरवर्ड | फ्यूचर |
|---|---|---|
| कहाँ कारोबार | काउंटर पर, निजी रूप से | मान्यता प्राप्त एक्सचेंज पर |
| शर्तें | पक्षों के अनुसार ढली हुई | एक्सचेंज द्वारा मानकीकृत |
| प्रतिपक्ष जोखिम | पक्ष स्वयं उठाते हैं | क्लियरिंग निगम उठाता है |
| मार्जिन | प्रायः नहीं | आरंभिक मार्जिन और दैनिक मार्क टू मार्केट |
| निपटान | परिपक्वता तिथि पर | प्रतिदिन, और अंत में समाप्ति पर |
भारत का कमोडिटी बाज़ार
भारत में संगठित वायदा कारोबार पुराना है। 1875 में स्थापित बॉम्बे कॉटन ट्रेड एसोसिएशन को देश का पहला संगठित वायदा बाज़ार माना जाता है, और उसके बाद तिलहन, जूट तथा सर्राफा में कारोबार शुरू हुआ। स्वतंत्रता के बाद अभाव के वर्षों में कई जिंसों में वायदा कारोबार पर रोक लगी और 1990 के दशक से इसे धीरे-धीरे फिर खोला गया। राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक एक्सचेंज 2003 में बने: मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज, जिसमें सर्राफा, आधार धातुओं और ऊर्जा का अधिकांश कारोबार होता है, तथा नेशनल कमोडिटी एंड डेरिवेटिव्स एक्सचेंज, जो मुख्यतः कृषि जिंसों का कारोबार करता है। शेयर एक्सचेंजों को 2018 में कमोडिटी डेरिवेटिव खंड खोलने की अनुमति मिली, इसलिए अब एक ही एक्सचेंज इक्विटी, मुद्रा और कमोडिटी अनुबंध दे सकता है।
2015 तक कमोडिटी वायदा का नियमन अलग होता था। वायदा बाज़ार आयोग, जो 1952 के वायदा संविदा (विनियमन) अधिनियम के अंतर्गत 1953 में मुंबई में स्थापित हुआ था, कमोडिटी डेरिवेटिव्स का नियामक था, जबकि भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड प्रतिभूति बाज़ार का नियमन करता था। 2015 के वित्त अधिनियम ने 1952 का अधिनियम निरस्त किया, कमोडिटी डेरिवेटिव्स को प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 की प्रतिभूति की परिभाषा में लाया, और 28 सितंबर 2015 को वायदा बाज़ार आयोग का सेबी में विलय कर दिया। यह भारत में दो नियामकों का पहला विलय था, और तब से एक ही नियामक शेयर, मुद्रा डेरिवेटिव और कमोडिटी डेरिवेटिव, सभी को देखता है। इसके बाद सेबी ने कमोडिटी वायदा पर ऑप्शन की अनुमति दी, जिनमें पहले 2017 में सोने के ऑप्शन थे, और उसने कृषि अनुबंधों में अनिवार्य सुपुर्दगी पर जोर दिया है ताकि वायदा भाव भौतिक बाज़ार से जुड़े रहें।
सहायक संस्थाएँ और शब्दावली
कमोडिटी बाज़ार ऐसे गोदामों के बिना नहीं चल सकता जिन पर भरोसा हो। भंडारण विकास और विनियामक प्राधिकरण, जो भंडारण (विकास और विनियमन) अधिनियम, 2007 के अंतर्गत बना, गोदामों का पंजीकरण करता है और परक्राम्य भंडारण रसीदों का नियमन करता है, जिनसे किसान उपज जमा करके रसीद पा सकता है, उस पर ऋण ले सकता है और बाद में बेच सकता है। 2016 में आरंभ राष्ट्रीय कृषि बाज़ार इससे बिलकुल अलग है: वह विनियमित मंडियों को जोड़ने वाला ऑनलाइन हाजिर बाज़ार है, डेरिवेटिव मंच नहीं। दो शब्द बार-बार पूछे जाते हैं। बाज़ार कॉन्टैंगो में तब कहा जाता है जब वायदा भाव हाजिर भाव से ऊपर हो, जो सामान्य स्थिति है क्योंकि भंडारण और ब्याज पर खर्च आता है; बैकवर्डेशन तब होता है जब वायदा भाव हाजिर भाव से नीचे हो, जो प्रायः आज की कमी का संकेत देता है। हाजिर भाव और वायदा भाव के अंतर को बेसिस कहते हैं।
परीक्षा की दृष्टि से
सबसे अधिक पूछा जाने वाला बिंदु नियामक है: कमोडिटी डेरिवेटिव्स अब सेबी के पास हैं, क्योंकि वायदा बाज़ार आयोग का 2015 में उसमें विलय हुआ, जो भारत में दो नियामकों का पहला विलय था। अधिनियमों की जोड़ी याद रखें, आयोग के लिए वायदा संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1952 और प्रतिभूतियों के लिए प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956। परिभाषा के प्रश्न फॉरवर्ड और फ्यूचर के अंतर, ऑप्शन की एकतरफा बाध्यता, कॉल बनाम पुट, तथा यूरोपीय बनाम अमेरिकी प्रयोग पर आते हैं। भारतीय बाज़ार में एमसीएक्स के साथ धातु और ऊर्जा, एनसीडीईएक्स के साथ कृषि उपज, दोनों के आरंभ का वर्ष 2003 और बंबई कपास वायदा बाज़ार के लिए 1875 याद रखें। कॉन्टैंगो, बैकवर्डेशन, बेसिस तथा परक्राम्य भंडारण रसीदों में भंडारण प्राधिकरण की भूमिका अन्य नियमित प्रश्न हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य
| डेरिवेटिव | ऐसा अनुबंध जिसका मूल्य अंतर्निहित परिसंपत्ति से व्युत्पन्न होता है |
|---|---|
| चार प्रकार | फॉरवर्ड, फ्यूचर, ऑप्शन और स्वैप |
| कॉल और पुट | कॉल खरीदने का अधिकार; पुट बेचने का अधिकार |
| पहला संगठित वायदा बाज़ार | बॉम्बे कॉटन ट्रेड एसोसिएशन, 1875 |
| राष्ट्रीय कमोडिटी एक्सचेंज | एमसीएक्स और एनसीडीईएक्स, दोनों 2003 में आरंभ |
| पुराना नियामक | वायदा बाज़ार आयोग, 1953 में मुंबई में स्थापित |
| उसका मूल अधिनियम | वायदा संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1952, जो 2015 में निरस्त हुआ |
| सेबी में विलय | 28 सितंबर 2015, भारत में दो नियामकों का पहला विलय |
| भंडारण रसीदें | भंडारण (विकास और विनियमन) अधिनियम, 2007 के अंतर्गत डब्ल्यूडीआरए द्वारा नियमित |
| कॉन्टैंगो | वायदा भाव हाजिर भाव से ऊपर |
| बैकवर्डेशन | वायदा भाव हाजिर भाव से नीचे |
| भारत में इक्विटी डेरिवेटिव | एल. सी. गुप्ता समिति की सलाह पर 2000 में सूचकांक वायदा आरंभ |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
डेरिवेटिव ऐसा वित्तीय साधन है जिसका मूल्य किससे प्राप्त होता है?
- A.सरकार द्वारा तय किया जाता है
- B.किसी अंतर्निहित परिसंपत्ति से व्युत्पन्न होता है
- C.शेयर के अंकित मूल्य के बराबर होता है
- D.भारतीय रिज़र्व बैंक तय करता है
उत्तर देखें
डेरिवेटिव का अपना कोई स्वतंत्र मूल्य नहीं होता; वह ऐसा अनुबंध है जिसका मूल्य किसी और वस्तु के भाव से आता है, जो सोना या कच्चे तेल जैसी जिंस, शेयर, शेयर सूचकांक, मुद्रा या ब्याज दर हो सकती है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →कौन सा डेरिवेटिव अनुबंध क्रेता को अंतर्निहित परिसंपत्ति खरीदने या बेचने का अधिकार देता है, बाध्यता नहीं?
- A.फॉरवर्ड
- B.फ्यूचर
- C.ऑप्शन
- D.स्वैप
उत्तर देखें
ऑप्शन अपने क्रेता को यह अधिकार देता है, बाध्यता नहीं, कि वह अंतर्निहित परिसंपत्ति को स्ट्राइक मूल्य पर निर्धारित तिथि को या उससे पहले खरीदे या बेचे, और इस अधिकार के बदले क्रेता विक्रेता को प्रीमियम देता है, जिसे राइटर कहा जाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →कॉल ऑप्शन अपने धारक को क्या अधिकार देता है?
- A.स्ट्राइक मूल्य पर अंतर्निहित परिसंपत्ति खरीदने का
- B.स्ट्राइक मूल्य पर अंतर्निहित परिसंपत्ति बेचने का
- C.अंतर्निहित परिसंपत्ति ब्याजमुक्त उधार लेने का
- D.बिना प्रीमियम दिए अनुबंध रद्द करने का
उत्तर देखें
कॉल का अर्थ है परिसंपत्ति को विक्रेता से माँग लेना, अर्थात् खरीदना, और क्रेता कॉल तब लेता है जब उसे अंतर्निहित भाव के स्ट्राइक मूल्य से ऊपर जाने की आशा हो।
पूरी व्याख्या पढ़ें →निम्नलिखित में से कौन सी विशेषता फ्यूचर अनुबंध की है, फॉरवर्ड अनुबंध की नहीं?
- A.यह भविष्य की तिथि का अनुबंध है
- B.यह मानक शर्तों के साथ मान्यता प्राप्त एक्सचेंज पर होता है
- C.इससे भाव जोखिम का हेजिंग किया जा सकता है
- D.इसमें कोई अंतर्निहित परिसंपत्ति होती है
उत्तर देखें
फ्यूचर मानकीकृत अनुबंध है जिसमें मात्रा, गुणवत्ता, सुपुर्दगी तिथि और सुपुर्दगी केंद्र एक्सचेंज तय करता है, दोनों पक्ष मार्जिन जमा करते हैं, स्थिति प्रतिदिन बाज़ार भाव पर आँकी जाती है और क्लियरिंग निगम दोनों ओर का प्रतिपक्ष बन जाता है, जिससे चूक का जोखिम समाप्त हो जाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारत में कमोडिटी डेरिवेटिव्स का नियमन कौन सा प्राधिकरण करता है?
- A.भारतीय रिज़र्व बैंक
- B.वायदा बाज़ार आयोग
- C.भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड
- D.उपभोक्ता मामले मंत्रालय
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वायदा बाज़ार आयोग का 28 सितंबर 2015 को सेबी में विलय हो गया, 1952 का वायदा संविदा (विनियमन) अधिनियम 2015 के वित्त अधिनियम से निरस्त हुआ, और कमोडिटी डेरिवेटिव्स को प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 की प्रतिभूति की परिभाषा में लाया गया, इसलिए अब उनका नियमन सेबी करता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारत में कमोडिटी वायदा का पूर्व नियामक वायदा बाज़ार आयोग किस कानून के अंतर्गत स्थापित हुआ था?
- A.प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956
- B.वायदा संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1952
- C.आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955
- D.सेबी अधिनियम, 1992
उत्तर देखें
वायदा बाज़ार आयोग उसी अधिनियम के अंतर्गत 1953 में मुंबई में स्थापित हुआ और 2015 में सेबी में विलय तक कमोडिटी वायदा कारोबार का नियमन करता रहा, जिसके बाद वह अधिनियम भी निरस्त कर दिया गया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →नेशनल कमोडिटी एंड डेरिवेटिव्स एक्सचेंज (एनसीडीईएक्स) मुख्यतः किस वर्ग की जिंसों का कारोबार करता है?
- A.सर्राफा और बहुमूल्य धातुएँ
- B.कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस
- C.कृषि जिंसें
- D.ताँबा और जस्ता जैसी आधार धातुएँ
उत्तर देखें
2003 में कामकाज शुरू करने वाला एनसीडीईएक्स वह एक्सचेंज है जिस पर ग्वार, चना, अरंडी, सोयाबीन, सरसों, कपास और जीरा जैसे कृषि अनुबंधों का कारोबार होता है, और वही भारत में कृषि वायदा भावों का संदर्भ बिंदु है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारत का पहला संगठित वायदा बाज़ार किसे माना जाता है?
- A.बॉम्बे कॉटन ट्रेड एसोसिएशन, 1875
- B.मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज, 2003
- C.कलकत्ता हेसियन एक्सचेंज, 1919
- D.बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज, 1875
उत्तर देखें
भारत में संगठित वायदा कारोबार 1875 में बंबई में कपास से शुरू हुआ और उसी वर्ष बना यह संगठन देश का पहला संगठित वायदा बाज़ार माना जाता है; उसके बाद के दशकों में तिलहन, जूट और सर्राफा आए।
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारत में परक्राम्य भंडारण रसीदों का नियमन कौन करता है?
- A.भारतीय खाद्य निगम
- B.भंडारण विकास और विनियामक प्राधिकरण
- C.केंद्रीय भंडारण निगम
- D.राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक
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यह प्राधिकरण भंडारण (विकास और विनियमन) अधिनियम, 2007 के अंतर्गत बना, जो गोदामों का पंजीकरण करता है और परक्राम्य भंडारण रसीदों का नियमन करता है, जिनसे किसान पंजीकृत गोदाम में उपज रखकर रसीद ले सकता है, उस पर बैंक से ऋण ले सकता है और माल बाद में बेच सकता…
पूरी व्याख्या पढ़ें →बाज़ार को कॉन्टैंगो में कब कहा जाता है?
- A.जब वायदा भाव हाजिर भाव से ऊँचा हो
- B.जब वायदा भाव हाजिर भाव से नीचा हो
- C.जब हाजिर और वायदा भाव बराबर हों
- D.जब वायदा अनुबंध में कारोबार स्थगित हो
उत्तर देखें
कॉन्टैंगो कमोडिटी बाज़ार की सामान्य स्थिति है, क्योंकि जो कोई माल भविष्य की तिथि तक रोके रखता है उसे भंडारण, बीमा और फँसे हुए धन पर ब्याज का खर्च उठाना पड़ता है, और यही वहन लागत हाजिर भाव में जुड़कर वायदा भाव बनाती है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →एल. सी. गुप्ता समिति की सिफारिशों के बाद भारत में इक्विटी डेरिवेटिव्स का कारोबार किस वर्ष आरंभ हुआ?
- A.1992
- B.1996
- C.2000
- D.2003
उत्तर देखें
सेबी द्वारा नियुक्त एल. सी. गुप्ता समिति ने एक्सचेंज पर कारोबार होने वाले डेरिवेटिव्स शुरू करने की सिफारिश की, कानून में संशोधन कर डेरिवेटिव्स को प्रतिभूति की परिभाषा में लाया गया, और जून 2000 में भारतीय शेयर एक्सचेंजों पर सूचकांक वायदा का कारोबार आरंभ हुआ; सूचकांक ऑप्शन, शेयर ऑप्शन और…
पूरी व्याख्या पढ़ें →अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भारत में कमोडिटी डेरिवेटिव्स का नियमन कौन करता है?
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड। 1953 से कमोडिटी वायदा का नियमन करने वाले वायदा बाज़ार आयोग का 28 सितंबर 2015 को सेबी में विलय हो गया, और कमोडिटी डेरिवेटिव्स को प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 की प्रतिभूति की परिभाषा में ले आया गया।
फॉरवर्ड और फ्यूचर अनुबंध में क्या अंतर है?
फॉरवर्ड दो पक्षों के बीच निजी रूप से तय होता है, शर्तें उन्हीं के अनुसार ढली होती हैं और मार्जिन नहीं लगता, इसलिए हर पक्ष दूसरे की चूक का जोखिम उठाता है। फ्यूचर एक्सचेंज द्वारा मानकीकृत होता है, उसमें मार्जिन लगता है, प्रतिदिन मार्क टू मार्केट होता है और क्लियरिंग निगम निष्पादन की गारंटी देता है।
कॉल ऑप्शन और पुट ऑप्शन में क्या अंतर है?
कॉल ऑप्शन क्रेता को स्ट्राइक मूल्य पर अंतर्निहित परिसंपत्ति खरीदने का अधिकार देता है और भाव बढ़ने की आशा में लिया जाता है। पुट ऑप्शन स्ट्राइक मूल्य पर बेचने का अधिकार देता है और भाव गिरने की आशंका में लिया जाता है। दोनों में क्रेता प्रीमियम देता है।
एमसीएक्स और एनसीडीईएक्स पर क्या कारोबार होता है?
मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज पर सोना-चाँदी जैसे सर्राफा, ताँबा-जस्ता जैसी आधार धातुओं तथा कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस जैसी ऊर्जा का अधिकांश कारोबार होता है। एनसीडीईएक्स मुख्यतः ग्वार, चना, अरंडी, सोयाबीन, सरसों और कपास जैसी कृषि जिंसों का कारोबार करता है।
कॉन्टैंगो और बैकवर्डेशन का क्या अर्थ है?
बाज़ार कॉन्टैंगो में तब होता है जब वायदा भाव हाजिर भाव से ऊँचा हो, जो सामान्य स्थिति है क्योंकि भंडारण, बीमा और ब्याज माल रोकने की लागत बढ़ाते हैं। बैकवर्डेशन तब होता है जब वायदा भाव हाजिर से नीचा हो, जो प्रायः वर्तमान कमी का संकेत देता है।
परक्राम्य भंडारण रसीद क्या है?
यह भंडारण विकास और विनियामक प्राधिकरण के पास पंजीकृत गोदाम द्वारा वहाँ जमा माल के लिए दी गई रसीद है। इसे दूसरे व्यक्ति को हस्तांतरित किया जा सकता है या बैंक के पास ऋण के लिए गिरवी रखा जा सकता है, जिससे किसान फसल के तुरंत बाद मजबूरी में बिक्री से बच जाता है।
स्रोत
- भारत में कमोडिटी डेरिवेटिव बाज़ार — भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड
- प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 — विधायी विभाग, विधि और न्याय मंत्रालय





