भारत के कृषि-जलवायु क्षेत्र और भूमि उपयोग: नोट्स
परीक्षा के लिए भारत के कृषि-जलवायु क्षेत्रों और भूमि उपयोग के नोट्स: योजना आयोग के पंद्रह क्षेत्र, कृषि-पारिस्थितिक प्रदेश, नौ गुना वर्गीकरण और फसल ऋतुएं।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 6 मिनट

भारत में कृषि एक काम नहीं, अनेक काम है, क्योंकि पंजाब के मैदान से केरल के तट तक वर्षा, तापमान, मिट्टी और जल में भारी अंतर है। इन अंतरों के अनुसार योजना बनाने के लिए देश को कृषि-जलवायु क्षेत्रों में बांटा गया है, और भूमि का वास्तविक उपयोग नौ गुना वर्गीकरण के अंतर्गत दर्ज किया जाता है। भूगोल और अर्थव्यवस्था के प्रश्नपत्रों में ये दोनों विषय बार-बार आते हैं, क्योंकि इनके तथ्य स्थिर हैं: क्षेत्रों की संख्या, किसी क्षेत्र में आने वाले राज्य, प्रत्येक भूमि उपयोग शीर्ष का अर्थ और फसल सघनता का सूत्र।
कृषि-जलवायु क्षेत्र क्या है
कृषि-जलवायु क्षेत्र वह भूभाग है जो वर्षा, तापमान, मिट्टी, जल संसाधन और प्रचलित फसल प्रतिरूप में इतना समान हो कि उसकी योजना एक इकाई के रूप में बनाई जा सके। उद्देश्य व्यावहारिक है: ऐसी फसल, बीज, सिंचाई और ऋण की व्यवस्था जो पूरे क्षेत्र पर लागू हो। सबसे प्रसिद्ध विभाजन वह है जिसे योजना आयोग ने 1988 में कृषि-जलवायु प्रादेशिक नियोजन के लिए अपनाया और जिसमें देश को पंद्रह क्षेत्रों में बांटा गया। इससे पहले भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने व्यापक जलवायु आधार पर देश को आठ कृषि-जलवायु क्षेत्रों में रखा था, और बाद में राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो ने जलवायु के साथ मिट्टी तथा फसल अवधि जोड़कर बीस कृषि-पारिस्थितिक प्रदेश निर्धारित किए, जिन्हें आगे साठ उप-प्रदेशों में बांटा गया। तीनों संख्याएं अपनी संस्था के साथ याद रखें: योजना आयोग के पंद्रह, आईसीएआर के आठ और कृषि-पारिस्थितिक प्रदेश बीस।
पंद्रह कृषि-जलवायु क्षेत्र
| क्षेत्र | विस्तार | प्रमुख फसलें |
|---|---|---|
| पश्चिमी हिमालयी | जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड | शीतोष्ण फल, केसर, मक्का, आलू |
| पूर्वी हिमालयी | सिक्किम, पूर्वोत्तर की पहाड़ियां, उत्तरी बंगाल की पहाड़ियां | चाय, सीढ़ीदार खेतों में धान, झूम कृषि |
| निचला गंगा मैदान | पश्चिम बंगाल का बड़ा भाग | धान, जूट, आलू |
| मध्य गंगा मैदान | पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार का बड़ा भाग | धान, गेहूं, मक्का, गन्ना |
| ऊपरी गंगा मैदान | मध्य और पश्चिमी उत्तर प्रदेश | गेहूं, गन्ना, धान |
| ट्रांस गंगा मैदान | पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, चंडीगढ़ और राजस्थान का गंगानगर क्षेत्र | गेहूं-धान चक्र, कपास |
| पूर्वी पठार और पहाड़ियां | छत्तीसगढ़, झारखंड, आंतरिक ओडिशा, सटा मध्य प्रदेश | वर्षा आधारित धान, दलहन, तिलहन |
| मध्य पठार और पहाड़ियां | मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश के भाग | सोयाबीन, चना, गेहूं, ज्वार |
| पश्चिमी पठार और पहाड़ियां | महाराष्ट्र का बड़ा भाग, सटा मध्य प्रदेश और राजस्थान | ज्वार, कपास, गन्ना, तिलहन |
| दक्षिणी पठार और पहाड़ियां | आंतरिक कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु | मोटे अनाज, मूंगफली, दलहन |
| पूर्वी तटीय मैदान और पहाड़ियां | तटीय ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु | धान, मूंगफली, तंबाकू |
| पश्चिमी तटीय मैदान और घाट | तटीय महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल | नारियल, रबड़, मसाले, धान |
| गुजरात मैदान और पहाड़ियां | गुजरात | मूंगफली, कपास, बाजरा, तंबाकू |
| पश्चिमी शुष्क | पश्चिमी राजस्थान | बाजरा, मोठ, ग्वार |
| द्वीप समूह | अंडमान-निकोबार, लक्षद्वीप | नारियल, सुपारी, मसाले |
राज्यों के भीतर के क्षेत्र
राज्य अपने कृषि विभागों के लिए फिर से अपना विभाजन करते हैं, और राज्य परीक्षाओं में ये उपक्षेत्र पूछे जाते हैं। राजस्थान दस कृषि-जलवायु क्षेत्रों में बंटा है: शुष्क पश्चिमी मैदान, सिंचित उत्तर पश्चिमी मैदान, अति शुष्क आंशिक सिंचित क्षेत्र, आंतरिक जल प्रवाह का संक्रमणीय मैदान, लूणी बेसिन का संक्रमणीय मैदान, अर्ध शुष्क पूर्वी मैदान, बाढ़ प्रभावित पूर्वी मैदान, उप आर्द्र दक्षिणी मैदान, आर्द्र दक्षिणी मैदान और आर्द्र दक्षिण पूर्वी मैदान; इनमें बाढ़ प्रभावित पूर्वी मैदान, जिसे क्षेत्र तीन बी लिखा जाता है, अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली और सवाई माधोपुर को समेटता है। उत्तर प्रदेश नौ कृषि-जलवायु क्षेत्रों में बंटा है, भाबर-तराई पट्टी से लेकर बुंदेलखंड और विंध्य क्षेत्र तक।
भूमि उपयोग का नौ गुना वर्गीकरण
राज्यों द्वारा एकत्र और भूमि उपयोग आंकड़ों के रूप में प्रकाशित ग्राम अभिलेख प्रतिवेदित क्षेत्र की प्रत्येक भूमि को नौ शीर्षों में रखते हैं।
| शीर्ष | अर्थ |
|---|---|
| वन | राजस्व अभिलेखों में वन के रूप में दर्ज क्षेत्र, जो वास्तविक वन आवरण से भिन्न है |
| गैर कृषि कार्यों में प्रयुक्त भूमि | बस्तियां, सड़कें, रेल, नहरें, कारखाने, खदानें |
| बंजर और कृषि अयोग्य भूमि | चट्टानी, रेतीली या बीहड़ भूमि, जिस पर हल नहीं चल सकता |
| स्थायी चरागाह और चराई भूमि | सामुदायिक चराई भूमि, प्रायः ग्राम सामान्य भूमि |
| विविध वृक्ष फसल और उपवन | बाग और उपवन, जिन्हें शुद्ध बोए क्षेत्र में नहीं गिना जाता |
| कृषि योग्य बेकार भूमि | कृषि योग्य भूमि, जो पांच वर्ष से अधिक समय से बिना जुती पड़ी है |
| चालू परती के अतिरिक्त परती | एक वर्ष से अधिक परंतु पांच कृषि वर्ष तक बिना जुती भूमि |
| चालू परती | उर्वरता लौटाने के लिए एक कृषि वर्ष या उससे कम समय तक खाली भूमि |
| शुद्ध बोया क्षेत्र | कृषि वर्ष में कम से कम एक बार बोया गया क्षेत्र, एक ही बार गिना गया |
शुद्ध बोया क्षेत्र, सकल फसल क्षेत्र और फसल सघनता
भारत का भौगोलिक क्षेत्र लगभग 328.7 मिलियन हेक्टेयर है, परंतु भूमि उपयोग अभिलेख इससे कुछ कम प्रतिवेदित क्षेत्र को ही समेटते हैं, क्योंकि कुछ भाग सर्वेक्षित नहीं हैं। शुद्ध बोया क्षेत्र लगभग 140 मिलियन हेक्टेयर है, जो प्रतिवेदित क्षेत्र के लगभग 46 प्रतिशत के बराबर और नौ शीर्षों में सबसे बड़ा है। सकल फसल क्षेत्र किसी खेत को वर्ष में जितनी बार बोया जाता है उतनी बार गिनता है, इसलिए वह शुद्ध बोए क्षेत्र से बड़ा होता है, और इन दोनों का संबंध मानक सूत्र देता है: फसल सघनता बराबर सकल फसल क्षेत्र बटा शुद्ध बोया क्षेत्र गुणा सौ। भारत के लिए यह लगभग 140 प्रतिशत आता है, अर्थात बोई गई भूमि का बड़ा भाग दूसरी फसल भी देता है। दशकों में बंजर तथा कृषि अयोग्य भूमि, स्थायी चरागाह और कृषि योग्य बेकार भूमि घटी है, जबकि नगरों, सड़कों और उद्योग के कारण गैर कृषि कार्यों की भूमि लगातार बढ़ी है। 1952 की राष्ट्रीय वन नीति ने भौगोलिक क्षेत्र के एक तिहाई अर्थात 33 प्रतिशत भाग को वन के अंतर्गत रखने का लक्ष्य रखा, जिसमें पहाड़ों में 60 और मैदानों में 20 प्रतिशत; अभिलेखों में दर्ज वन क्षेत्र इस लक्ष्य से बहुत कम रहा है।
फसल ऋतुएं
- खरीफ, जो जून-जुलाई में दक्षिण पश्चिम मानसून के आगमन पर बोई जाती है और सितंबर-अक्टूबर में काटी जाती है: धान, ज्वार, बाजरा, मक्का, कपास, मूंगफली, सोयाबीन, अरहर।
- रबी, जो अक्टूबर-नवंबर में शेष नमी और सिंचाई पर बोई जाती है और मार्च-अप्रैल में काटी जाती है: गेहूं, जौ, चना, सरसों, मटर।
- जायद, रबी और खरीफ के बीच की छोटी ग्रीष्म ऋतु, केवल सिंचित भूमि पर: तरबूज, खरबूजा, खीरा, चारा और सब्जियां।
यह विभाजन क्यों महत्वपूर्ण है
कृषि-जलवायु नियोजन ही कारण है कि शुष्क क्षेत्र को मोटे अनाज, जल संग्रहण कार्य और सूखा सहिष्णु बीज दिए जाते हैं, जबकि नहर सिंचित क्षेत्र को धान और गेहूं; यही आधार कम वर्षा वाले क्षेत्र में अधिक जल मांगने वाली फसल, जैसे ट्रांस गंगा मैदान के कुछ भागों में धान, के विरुद्ध चेतावनी का भी है। परीक्षार्थी के लिए परीक्षा योग्य भाग छोटा और निश्चित है: प्रत्येक संस्था द्वारा बनाए क्षेत्रों की संख्या, कौन राज्य किस क्षेत्र में, नौ भूमि उपयोग शीर्ष और कृषि योग्य बेकार भूमि को परती से अलग करने वाला पांच वर्ष का नियम, तथा फसल सघनता का सूत्र।
परीक्षा की दृष्टि से
प्रश्न चार रूपों में आते हैं। पहला, सीधी संख्याएं: योजना आयोग के पंद्रह क्षेत्र, आईसीएआर के आठ, बीस कृषि-पारिस्थितिक प्रदेश, तथा राज्य परीक्षाओं के लिए राजस्थान के दस या उत्तर प्रदेश के नौ क्षेत्र। दूसरा, क्षेत्र और राज्य का मिलान, जिसमें ट्रांस गंगा मैदान, पश्चिमी शुष्क क्षेत्र और द्वीप क्षेत्र सामान्य विकल्प होते हैं। तीसरा, नौ गुना वर्गीकरण की परिभाषाएं, जहां जाल है कृषि योग्य बेकार भूमि और चालू परती के अतिरिक्त परती को अलग करने वाला पांच वर्ष का नियम तथा अभिलेखीय वन क्षेत्र और वास्तविक वन आवरण का अंतर। चौथा, फसल सघनता का सूत्र और शुद्ध बोए क्षेत्र का अनुपात। राज्य परीक्षाओं में क्षेत्र संहिता भी पूछी जाती है, इसलिए राजस्थान के परीक्षार्थी यह याद रखें कि भरतपुर और करौली बाढ़ प्रभावित पूर्वी मैदान में आते हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य
| योजना आयोग के क्षेत्र | 15 कृषि-जलवायु क्षेत्र, 1988 में अपनाए गए |
|---|---|
| आईसीएआर के क्षेत्र | 8 कृषि-जलवायु क्षेत्र |
| कृषि-पारिस्थितिक प्रदेश | 20 प्रदेश और 60 उप-प्रदेश, राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो द्वारा |
| क्षेत्र का आधार | वर्षा, तापमान, मिट्टी, जल संसाधन और फसल प्रतिरूप |
| ट्रांस गंगा मैदान क्षेत्र | पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, चंडीगढ़ और गंगानगर क्षेत्र |
| पश्चिमी शुष्क क्षेत्र | पश्चिमी राजस्थान; बाजरा, मोठ और ग्वार |
| द्वीप क्षेत्र | अंडमान-निकोबार द्वीप समूह और लक्षद्वीप |
| भूमि उपयोग शीर्ष | प्रतिवेदित क्षेत्र का नौ गुना वर्गीकरण |
| शुद्ध बोया क्षेत्र | लगभग 140 मिलियन हेक्टेयर, प्रतिवेदित क्षेत्र का करीब 46 प्रतिशत |
| भारत का भौगोलिक क्षेत्र | लगभग 328.7 मिलियन हेक्टेयर |
| कृषि योग्य बेकार भूमि | कृषि योग्य, परंतु पांच वर्ष से अधिक बिना जुती |
| चालू परती | एक कृषि वर्ष या उससे कम समय तक बिना जुती |
| फसल सघनता | सकल फसल क्षेत्र बटा शुद्ध बोया क्षेत्र गुणा 100, लगभग 140 प्रतिशत |
| वन नीति लक्ष्य | भौगोलिक क्षेत्र का 33 प्रतिशत, 1952 की राष्ट्रीय वन नीति द्वारा |
| राजस्थान के क्षेत्र | 10 कृषि-जलवायु क्षेत्र; क्षेत्र तीन बी बाढ़ प्रभावित पूर्वी मैदान |
| फसल ऋतुएं | खरीफ जून से, रबी अक्टूबर से, जायद ग्रीष्म में |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
भरतपुर और करौली जिले राजस्थान के किस कृषि-जलवायु क्षेत्र में आते हैं?
- A.तीन बी
- B.तीन ए
- C.चार ए
- D.चार बी
उत्तर देखें
राजस्थान दस कृषि-जलवायु क्षेत्रों में बंटा है, और क्षेत्र तीन बी बाढ़ प्रभावित पूर्वी मैदान है, जिसमें अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली और सवाई माधोपुर आते हैं, अर्थात बाणगंगा, गंभीर तथा चंबल से जल निकास वाले वे जिले जहां मानसून के तेज प्रवाह से जल भराव होता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →योजना आयोग ने कृषि-जलवायु प्रादेशिक नियोजन के लिए भारत को कितने कृषि-जलवायु क्षेत्रों में बांटा?
- A.8
- B.15
- C.20
- D.60
उत्तर देखें
वर्ष 1988 में योजना आयोग ने देश को पंद्रह कृषि-जलवायु क्षेत्रों में बांटने की व्यवस्था अपनाई, जिससे वर्षा, तापमान, मिट्टी और फसल प्रतिरूप में समान क्षेत्रों के लिए फसल, सिंचाई, ऋण तथा अनुसंधान की योजना बन सके।
पूरी व्याख्या पढ़ें →ट्रांस गंगा मैदान कृषि-जलवायु क्षेत्र में निम्नलिखित में से क्या आता है?
- A.पश्चिम बंगाल और ओडिशा
- B.पंजाब, हरियाणा और दिल्ली
- C.पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार
- D.गुजरात और पश्चिमी राजस्थान
उत्तर देखें
ट्रांस गंगा मैदान क्षेत्र यमुना के पार अर्थात गंगा तंत्र के पंजाब वाले भाग में है और इसमें पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, चंडीगढ़ तथा राजस्थान का गंगानगर क्षेत्र आते हैं; यहां नहर और नलकूप सिंचाई हरित क्रांति के गेहूं-धान चक्र को संभालती है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारत का पश्चिमी शुष्क कृषि-जलवायु क्षेत्र मुख्यतः किस राज्य में है?
- A.गुजरात
- B.महाराष्ट्र
- C.राजस्थान
- D.मध्य प्रदेश
उत्तर देखें
पश्चिमी शुष्क क्षेत्र पश्चिमी राजस्थान अर्थात अरावली के पश्चिम का थार प्रदेश है, जहां वर्षा कम और अनिश्चित, मिट्टी रेतीली और फसल अवधि छोटी है, इसलिए यहां बाजरा, मोठ, ग्वार जैसे कठोर मोटे अनाज तथा दलहन होते हैं और पशुपालन मुख्य सहारा है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →नौ गुना भूमि उपयोग वर्गीकरण में वह कृषि योग्य भूमि, जो पांच वर्ष से अधिक समय से बिना जुती पड़ी है, क्या कहलाती है?
- A.चालू परती
- B.बंजर और कृषि अयोग्य भूमि
- C.कृषि योग्य बेकार भूमि
- D.स्थायी चरागाह
उत्तर देखें
इस शीर्ष में वह भूमि आती है जिस पर खेती हो सकती है, परंतु जो पांच वर्ष से अधिक समय से बिना उपयोग पड़ी है, सामान्यतः लवणीय, जल भराव वाली, कटी हुई या जल की कमी वाली हो जाने के कारण; इसे फिर उपयोग में लाना भूमि सुधार कार्यक्रमों का…
पूरी व्याख्या पढ़ें →निम्नलिखित में से कौन भारत के भूमि उपयोग वर्गीकरण के नौ शीर्षों में नहीं है?
- A.सकल फसल क्षेत्र
- B.शुद्ध बोया क्षेत्र
- C.चालू परती
- D.गैर कृषि कार्यों में प्रयुक्त भूमि
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सकल फसल क्षेत्र भूमि उपयोग शीर्ष नहीं, व्युत्पन्न माप है: यह किसी खेत को कृषि वर्ष में ली गई प्रत्येक फसल के लिए अलग गिनता है, इसलिए एक ही हेक्टेयर दो या तीन बार आ सकता है, और इसका उपयोग शुद्ध बोए क्षेत्र के साथ फसल सघनता निकालने में होता…
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारत में फसल सघनता की गणना किस प्रकार की जाती है?
- A.शुद्ध बोया क्षेत्र बटा सकल फसल क्षेत्र गुणा 100
- B.सकल फसल क्षेत्र बटा शुद्ध बोया क्षेत्र गुणा 100
- C.शुद्ध बोया क्षेत्र बटा प्रतिवेदित क्षेत्र गुणा 100
- D.सकल सिंचित क्षेत्र बटा सकल फसल क्षेत्र गुणा 100
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यह अनुपात बताता है कि बोई गई भूमि कृषि वर्ष में कितनी फसलें देती है, इसलिए सौ का मान सर्वत्र एक फसल दिखाता और भारत का लगभग 140 प्रतिशत का आंकड़ा बताता है कि भूमि का बड़ा भाग दूसरी फसल भी देता है, मुख्यतः वहां जहां सिंचाई और कम अवधि…
पूरी व्याख्या पढ़ें →1952 की राष्ट्रीय वन नीति ने भारत के भौगोलिक क्षेत्र के कितने भाग को वन के अंतर्गत लाने का लक्ष्य रखा था?
- A.20 प्रतिशत
- B.25 प्रतिशत
- C.33 प्रतिशत
- D.40 प्रतिशत
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1952 की राष्ट्रीय वन नीति ने तय किया कि देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का एक तिहाई भाग वन के अंतर्गत होना चाहिए, और इसी लक्ष्य के भीतर अलग मानक भी रखे: पहाड़ी भागों में लगभग 60 प्रतिशत, जहां वृक्ष आवरण ढाल तथा जल ग्रहण क्षेत्र की रक्षा करता है…
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारत की कौन सी फसल ऋतु दक्षिण पश्चिम मानसून के आगमन पर बोई जाती है और सितंबर-अक्टूबर में काटी जाती है?
- A.रबी
- B.खरीफ
- C.जायद
- D.बागवानी
उत्तर देखें
खरीफ फसलें जून-जुलाई में दक्षिण पश्चिम मानसून के आगमन पर बोई जाती हैं और सितंबर-अक्टूबर में काटी जाती हैं; ये वर्षा पर निर्भर फसलें हैं, जैसे धान, ज्वार, बाजरा, मक्का, कपास, मूंगफली, सोयाबीन और अरहर।
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारत का कौन सा कृषि-जलवायु क्षेत्र अंडमान-निकोबार द्वीप समूह तथा लक्षद्वीप से बनता है?
- A.पश्चिमी तटीय मैदान और घाट क्षेत्र
- B.पूर्वी तटीय मैदान और पहाड़ी क्षेत्र
- C.द्वीप क्षेत्र
- D.पूर्वी हिमालयी क्षेत्र
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योजना आयोग के पंद्रह क्षेत्रों में पंद्रहवां अलग द्वीप क्षेत्र है, जो बंगाल की खाड़ी के अंडमान-निकोबार द्वीप समूह और अरब सागर के लक्षद्वीप से बनता है, जहां विषुवतीय वर्षा, पतली मूंगा अथवा लेटराइट मिट्टी तथा नारियल, सुपारी, मसाले और मत्स्य पालन आधार हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →कृषि-जलवायु क्षेत्र और उसकी प्रमुख फसल का कौन सा जोड़ा सही है?
- A.पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र: रबड़
- B.निचला गंगा मैदान क्षेत्र: जूट
- C.पश्चिमी शुष्क क्षेत्र: गन्ना
- D.दक्षिणी पठार और पहाड़ी क्षेत्र: चाय
उत्तर देखें
निचला गंगा मैदान अर्थात मुख्यतः पश्चिम बंगाल में भारी वर्षा, आर्द्र वायु और डेल्टा की जलोढ़ मिट्टी है, जो जूट की वृद्धि तथा उसे सड़ाने की प्रक्रिया के लिए आवश्यक हैं, और इसके साथ धान एवं आलू भी होते हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →राजस्थान ने अपनी कृषि योजना के लिए राज्य को कितने कृषि-जलवायु क्षेत्रों में बांटा है?
- A.7
- B.9
- C.10
- D.15
उत्तर देखें
राजस्थान दस कृषि-जलवायु क्षेत्रों में बंटा है, जो पश्चिम में शुष्क पश्चिमी मैदान तथा अति शुष्क आंशिक सिंचित क्षेत्र से आरंभ होकर सिंचित उत्तर पश्चिमी मैदान और आंतरिक जल प्रवाह तथा लूणी बेसिन के दो संक्रमणीय मैदानों से होते हुए अर्ध शुष्क एवं बाढ़ प्रभावित पूर्वी मैदानों, उप आर्द्र तथा…
पूरी व्याख्या पढ़ें →अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भारत में कितने कृषि-जलवायु क्षेत्र हैं?
योजना आयोग ने 1988 में प्रादेशिक कृषि नियोजन के लिए भारत को पंद्रह कृषि-जलवायु क्षेत्रों में बांटा। इससे पहले भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद आठ क्षेत्रों का व्यापक विभाजन प्रयोग करती थी, और राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो ने बीस कृषि-पारिस्थितिक प्रदेश तथा साठ उप-प्रदेश निर्धारित किए।
कृषि योग्य बेकार भूमि और परती भूमि में क्या अंतर है?
कृषि योग्य बेकार भूमि वह है जो खेती लायक है, परंतु पांच वर्ष से अधिक समय से बिना जुती पड़ी है। परती भूमि खेती वाली भूमि है जो थोड़े समय विश्राम पर है: चालू परती एक कृषि वर्ष या उससे कम और चालू परती के अतिरिक्त परती एक से पांच वर्ष तक खाली रहती है।
फसल सघनता की गणना कैसे होती है?
फसल सघनता सकल फसल क्षेत्र को शुद्ध बोए क्षेत्र से भाग देकर सौ से गुणा करने पर मिलती है। चूंकि सकल फसल क्षेत्र वर्ष में ली गई प्रत्येक फसल के लिए खेत को अलग गिनता है, सौ प्रतिशत से अधिक सघनता बहुफसली खेती दिखाती है; भारत का आंकड़ा लगभग 140 प्रतिशत है।
वन क्षेत्र और वन आवरण एक ही हैं?
नहीं। वन क्षेत्र वह भूमि है जो राजस्व और भूमि अभिलेखों में वन के रूप में दर्ज है, चाहे उस पर पेड़ हों या न हों, और वह नौ भूमि उपयोग शीर्षों में से एक है। वन आवरण उपग्रह से मापा गया वास्तविक वृक्ष छत्र वाला क्षेत्र है, इसलिए दोनों आंकड़े भिन्न होते हैं।
भारत में भूमि उपयोग का सबसे बड़ा शीर्ष कौन सा है?
शुद्ध बोया क्षेत्र, जो प्रतिवेदित क्षेत्र का लगभग 46 प्रतिशत है, सबसे बड़ा एकल शीर्ष है; इसके बाद अभिलेखों में दर्ज वन क्षेत्र और गैर कृषि कार्यों में प्रयुक्त भूमि आती है, जो नगरों, सड़कों तथा उद्योग के विस्तार से बढ़ रही है।
स्रोत
- भारत: लोग और अर्थव्यवस्था, कक्षा बारह भूगोल, भू संसाधन तथा कृषि — एनसीईआरटी
- भूमि उपयोग सांख्यिकी — कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय





