भारतीय भक्ति संगीत: भजन, कीर्तन और क़व्वाली
परीक्षा के लिए भक्ति संगीत नोट्स: भजन, कीर्तन और मणिपुर का संकीर्तन, क़व्वाली के प्रकार, अभंग, बाउल गीत, शबद कीर्तन तथा दक्षिण भारत की मंदिर स्तोत्र परंपराएं।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 4 मिनट

भक्ति संगीत भक्ति और सूफी उपासना का गाया हुआ रूप है, और यह भारतीय कला एवं संस्कृति का सबसे अंक दिलाने वाला भाग है। प्रश्नपत्र यह नहीं पूछता कि कोई शैली कैसी सुनाई देती है; वह पूछता है कि वह किस क्षेत्र की है, किस संत या कवि ने उसे गढ़ा, उसके साथ कौन सा वाद्य बजता है और किस परंपरा को यूनेस्को की सूची में स्थान मिला है। यह नोट हर प्रमुख शैली को क्रम से लेकर वही तथ्य सीधे शब्दों में रखता है।
भजन: सरल गीत में भक्ति
भजन ऐसा भक्ति गीत है जिसका छंद या ढांचा निश्चित नहीं होता; यह शब्द संस्कृत धातु भज् अर्थात् पूजना या बांटना से बना है। निर्गुण भजन निराकार ईश्वर के लिए गाए जाते हैं और कबीर, गुरु नानक तथा रैदास से आते हैं। सगुण भजन साकार ईश्वर के लिए हैं: मीराबाई ने कृष्ण के लिए गाया, तुलसीदास ने राम के लिए, और सूरदास ने कृष्ण की बाल लीला पर पद रचे। वल्लभाचार्य के पुष्टिमार्ग संप्रदाय ने हवेली संगीत विकसित किया, जो राजस्थान के नाथद्वारा में श्रीनाथजी के समक्ष गाया जाता है, और इस संप्रदाय के आठ कवि गायक अष्टछाप कहे जाते हैं, जिनमें सूरदास सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। भजन के साथ सामान्यतः मंजीरा, ढोलक और हारमोनियम बजते हैं।
कीर्तन: सामूहिक भक्ति गायन
कीर्तन सामूहिक गायन है, जिसमें मुख्य गायक पंक्ति उठाता है और मंडली उसे दोहराती है; यह शब्द धातु कीर्त् अर्थात् बखान करना से बना है। बंगाल के नगर कीर्तन को सोलहवीं शताब्दी में चैतन्य महाप्रभु ने लोकप्रिय किया, जिसमें खोल और करताल बजते हैं। महाराष्ट्र में नारदीय कीर्तन तथा हरिकथा की परंपरा है, जिसमें कथा और गायन साथ चलते हैं। मणिपुर का संकीर्तन, अर्थात् वैष्णवों का अनुष्ठानिक गायन, वादन और नर्तन, जिसमें पुंग नामक ढोल बजता है, 2013 में यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में दर्ज हुआ। सिख परंपरा का रूप शबद कीर्तन है, जिसमें गुरु ग्रंथ साहिब की वाणी निर्धारित रागों में गाई जाती है; भाई मरदाना ने गुरु नानक के साथ रबाब बजाया, और ताऊस, दिलरुबा तथा सारंदा इसी परंपरा के वाद्य हैं।
क़व्वाली: सूफी भक्ति शैली
क़व्वाली दिल्ली सल्तनत के चिश्ती खानकाहों में पनपी। निज़ामुद्दीन औलिया के शिष्य अमीर खुसरो को इसका स्वरूप गढ़ने का श्रेय दिया जाता है, जिन्होंने फारसी और अरबी काव्य को भारतीय धुनों से जोड़ा। यह आज भी दिल्ली की निज़ामुद्दीन दरगाह और राजस्थान की अजमेर शरीफ जैसी दरगाहों पर गाई जाती है। क़व्वाली मंडली, जिसे हमनवा कहते हैं, में मुख्य गायक, पंक्ति दोहराने वाले साथी, तालियां, हारमोनियम, ढोलक और तबला होते हैं। इसके प्रकार निश्चित हैं और अक्सर पूछे जाते हैं: हम्द ईश्वर की स्तुति है, नात पैगंबर मुहम्मद की प्रशंसा, मनकबत अली या किसी सूफी संत की स्तुति, और मर्सिया शोकगीत है। नुसरत फतेह अली खान, साबरी बंधु, अज़ीज़ मियां, वारसी बंधु तथा निज़ामी बंधु प्रमुख गायक हैं।
अभंग और बाउल
अभंग वारकरी संप्रदाय की मराठी भक्ति रचना है, जो पंढरपुर के विठोबा के लिए गाई जाती है; इस शब्द का अर्थ है अखंड। ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, चोखामेला और तुकाराम ने अभंग रचे, और तुकाराम सत्रहवीं शताब्दी के, अर्थात् छत्रपति शिवाजी के समकालीन थे। पंढरपुर की वारी में तीर्थयात्री इन्हें टाल और एकतारी के साथ गाते हैं। बाउल बंगाल के घुमक्कड़ रहस्यवादी गायक हैं, जिनके गीतों में वैष्णव सहजिया और सूफी विचार घुले हैं और जिनका सबसे बड़ा नाम लालन फकीर है। वे एकतारा, दोतारा, खमक और दुग्गी बजाते हैं, और यूनेस्को ने 2005 में बाउल गीतों को मानवता की मौखिक एवं अमूर्त विरासत की उत्कृष्ट कृति घोषित किया।
मंदिर और शास्त्रीय भक्ति परंपराएं
दक्षिण भारत में सबसे पुराने स्तोत्र संग्रह सुरक्षित हैं। शिव के लिए तेवारम की रचना नयनार संतों अप्पर, सुंदरर और संबंदर ने की, जिन्हें तमिल मंदिरों में ओदुवार गाते हैं। विष्णु के लिए चार हजार पदों वाला नालायिर दिव्य प्रबंधम बारह आलवार संतों से आया। केरल में सोपान संगीतम है, जो गर्भगृह की सीढ़ियों पर इडक्का नामक डमरू जैसे ढोल के साथ गाया जाता है। कर्नाटक संगीत में कन्नड़ में देवरनाम रचने वाले पुरंदर दास को पितामह कहा जाता है, और तल्लपाक के अन्नमाचार्य ने तिरुमला के वेंकटेश्वर के लिए संकीर्तन रचे।
एक दृष्टि में प्रमुख शैलियां
| शैली | क्षेत्र या भाषा | प्रमुख नाम और वाद्य |
|---|---|---|
| भजन | उत्तर भारत, हिंदी और ब्रज | मीराबाई, सूरदास, तुलसीदास; मंजीरा, ढोलक |
| हवेली संगीत | नाथद्वारा, राजस्थान | पुष्टिमार्ग संप्रदाय; अष्टछाप कवि |
| नगर कीर्तन | बंगाल | चैतन्य महाप्रभु; खोल, करताल |
| संकीर्तन | मणिपुर | वैष्णव अनुष्ठान संगीत; पुंग ढोल |
| शबद कीर्तन | पंजाब, गुरबाणी | भाई मरदाना; रबाब, ताऊस, दिलरुबा |
| क़व्वाली | दिल्ली और दक्कन, उर्दू तथा फारसी | अमीर खुसरो; हारमोनियम, ढोलक, तबला |
| अभंग | महाराष्ट्र, मराठी | तुकाराम, ज्ञानेश्वर; टाल, एकतारी |
| बाउल | बंगाल | लालन फकीर; एकतारा, दोतारा, खमक |
| तेवारम | तमिलनाडु, तमिल | नयनार संत; ओदुवार गायक |
| सोपान संगीतम | केरल | मंदिर की सीढ़ियां; इडक्का |
परीक्षा की दृष्टि से
प्रश्न लगभग सदैव मिलान के होते हैं: शैली और क्षेत्र, शैली और संत, शैली और वाद्य। क़व्वाली को अमीर खुसरो तथा चिश्ती सिलसिले से, अभंग को वारकरी और तुकाराम से, बाउल को बंगाल और एकतारा से, संकीर्तन को मणिपुर और पुंग से, शबद कीर्तन को रबाब से जोड़कर याद रखें। यूनेस्को की दो प्रविष्टियां, 2005 में बाउल गीत और 2013 में मणिपुर का संकीर्तन, बार बार पूछी जाती हैं। जाल इस प्रकार बनते हैं: नयनार और आलवार, तेवारम और दिव्य प्रबंधम, नात और मनकबत, तथा चैतन्य महाप्रभु और वल्लभाचार्य को आपस में बदल देना।
महत्वपूर्ण तथ्य
| क़व्वाली का स्वरूप | अमीर खुसरो, निज़ामुद्दीन औलिया के शिष्य, चिश्ती सिलसिला |
|---|---|
| क़व्वाली मंडली | हमनवा; हारमोनियम, ढोलक, तबला, तालियां |
| पैगंबर की स्तुति | नात |
| ईश्वर की स्तुति | हम्द |
| अभंग: संप्रदाय और देवता | वारकरी संप्रदाय; पंढरपुर के विठोबा |
| अभंग रचनाकार | ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, चोखामेला, तुकाराम |
| बाउल वाद्य | एकतारा, दोतारा, खमक, दुग्गी |
| बाउल और यूनेस्को | मौखिक एवं अमूर्त विरासत की उत्कृष्ट कृति, 2005 |
| संकीर्तन और यूनेस्को | प्रतिनिधि सूची, 2013; राज्य मणिपुर |
| मणिपुर का ढोल | पुंग |
| नगर कीर्तन | बंगाल; चैतन्य महाप्रभु; खोल और करताल |
| सिख भक्ति संगीत | शबद कीर्तन; भाई मरदाना का रबाब |
| हवेली संगीत | पुष्टिमार्ग संप्रदाय, नाथद्वारा, राजस्थान |
| अष्टछाप | वल्लभ संप्रदाय के आठ कवि, जिनमें सूरदास |
| कर्नाटक संगीत के पितामह | पुरंदर दास, देवरनाम के रचनाकार |
| केरल का मंदिर संगीत | सोपान संगीतम, इडक्का के साथ |
| शैव स्तोत्र | तेवारम, नयनार संतों द्वारा |
| वैष्णव स्तोत्र | नालायिर दिव्य प्रबंधम, बारह आलवारों द्वारा |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
भारत में क़व्वाली के विकास का श्रेय किसे दिया जाता है?
- A.तानसेन
- B.अमीर खुसरो
- C.बैजू बावरा
- D.स्वामी हरिदास
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खुसरो तेरहवीं और चौदहवीं शताब्दी में हुए और दिल्ली के चिश्ती संत निज़ामुद्दीन औलिया के शिष्य थे।
पूरी व्याख्या पढ़ें →पंढरपुर के विठोबा के लिए गाया जाने वाला अभंग किस परंपरा से संबंधित है?
- A.महाराष्ट्र की वारकरी परंपरा
- B.बंगाल की गौड़ीय वैष्णव परंपरा
- C.राजस्थान का पुष्टिमार्ग
- D.कर्नाटक की लिंगायत परंपरा
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अभंग मराठी भक्ति रचना है और इस शब्द का अर्थ अखंड होता है। ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, चोखामेला तथा तुकाराम ने पंढरपुर के विठोबा के लिए अभंग रचे, और तीर्थयात्री आज भी पंढरपुर की वारी में इन्हें टाल और एकतारी के साथ गाते हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →बाउल गायक, जिनके गीतों को यूनेस्को ने मानवता की मौखिक एवं अमूर्त विरासत की उत्कृष्ट कृति घोषित किया, मुख्यतः किस क्षेत्र के हैं?
- A.राजस्थान
- B.असम
- C.बंगाल
- D.ओडिशा
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बाउल बंगाल के, सीमा के दोनों ओर के, घुमक्कड़ रहस्यवादी गायक हैं, जिनके गीतों में वैष्णव सहजिया और सूफी विचार मिलते हैं और जो जाति तथा कर्मकांड को नकारते हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →निम्नलिखित में से कौन संत छत्रपति शिवाजी महाराज के समकालीन थे?
- A.तुकाराम
- B.चैतन्य
- C.नामदेव
- D.शंकराचार्य
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संत तुकाराम सत्रहवीं शताब्दी के वारकरी कवि थे, जिन्होंने पंढरपुर के विठोबा के लिए अभंग रचे और जो पुणे के निकट देहू में रहे, उन्हीं वर्षों में जब शिवाजी मराठा राज्य खड़ा कर रहे थे।
पूरी व्याख्या पढ़ें →2013 में यूनेस्को की प्रतिनिधि सूची में दर्ज संकीर्तन, अर्थात् अनुष्ठानिक गायन, वादन और नर्तन, किस राज्य का है?
- A.मणिपुर
- B.केरल
- C.तमिलनाडु
- D.त्रिपुरा
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मणिपुर का संकीर्तन मैतेई समाज का वैष्णव अनुष्ठान संगीत है, जिसमें गायक और वादक मंदिर के मंडप में प्रस्तुति देते हैं, पुंग नामक ढोल तथा करताल बजते हैं, और ढोल नृत्य को पुंग चोलोम कहा जाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →क़व्वाली में पैगंबर मुहम्मद की प्रशंसा में गाई जाने वाली रचना को क्या कहा जाता है?
- A.हम्द
- B.नात
- C.मनकबत
- D.मर्सिया
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क़व्वाली की प्रस्तुति में रचनाओं का क्रम निश्चित होता है, और नात वह गीत है जो पैगंबर मुहम्मद की प्रशंसा में गाया जाता है, सामान्यतः ईश्वर की स्तुति के बाद आरंभ में ही।
पूरी व्याख्या पढ़ें →कर्नाटक संगीत का पितामह किसे कहा जाता है, जिन्होंने कन्नड़ में देवरनाम नामक भक्ति रचनाएं कीं?
- A.त्यागराज
- B.पुरंदर दास
- C.मुत्तुस्वामी दीक्षितर
- D.अन्नमाचार्य
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पुरंदर दास कर्नाटक के हरिदास आंदोलन से थे और उन्होंने कन्नड़ में देवरनाम रचे; उन्हें वे क्रमिक अभ्यास गढ़ने का श्रेय भी दिया जाता है जिनसे कर्नाटक संगीत आज भी सिखाया जाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →अष्टछाप, अर्थात् वे आठ कवि गायक जिनकी रचनाएं हवेली संगीत के रूप में गाई जाती हैं, किसके संप्रदाय से थे?
- A.रामानुज
- B.वल्लभाचार्य
- C.चैतन्य महाप्रभु
- D.मध्वाचार्य
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वल्लभाचार्य ने पुष्टिमार्ग की स्थापना की, जिसकी श्रीनाथजी के रूप में कृष्ण उपासना का केंद्र राजस्थान का नाथद्वारा है। इस संप्रदाय के आठ कवि गायक, चार वल्लभाचार्य के और चार उनके पुत्र विट्ठलनाथ के शिष्य, अष्टछाप कहे जाते हैं, और इनमें सूरदास सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →तमिल शिव मंदिरों में गाए जाने वाले तेवारम स्तोत्रों की रचना किन संतों ने की?
- A.आलवार
- B.नयनार
- C.सिद्धर
- D.हरिदास
उत्तर देखें
नयनार तमिल क्षेत्र के शैव संत कवि थे, और अप्पर, सुंदरर तथा संबंदर के स्तोत्र मिलकर तेवारम बनाते हैं, जो तिरुमुरै नामक शैव ग्रंथ संग्रह की पहली सात पुस्तकें हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →सोपान संगीतम, जो गर्भगृह की सीढ़ियों पर इडक्का नामक ढोल के साथ गाया जाता है, किस राज्य का भक्ति संगीत है?
- A.कर्नाटक
- B.केरल
- C.आंध्र प्रदेश
- D.ओडिशा
उत्तर देखें
सोपान संगीतम का नाम सोपानम से बना है, अर्थात् केरल के मंदिर के गर्भगृह तक जाने वाली सीढ़ियां, जहां गायक खड़ा होकर धीमी गति में भक्ति पद गाता है और इडक्का नामक डमरू जैसे ढोल पर ताल देता है, जिसे डंडी से बजाया जाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भारत में क़व्वाली के विकास का श्रेय किसे दिया जाता है?
चिश्ती संत निज़ामुद्दीन औलिया के शिष्य अमीर खुसरो को, जिन्होंने दिल्ली सल्तनत की खानकाहों में फारसी और अरबी भक्ति काव्य को भारतीय धुनों में ढालकर क़व्वाली का स्वरूप गढ़ा।
भारत की कौन सी भक्ति संगीत शैलियां यूनेस्को की सूचियों में हैं?
बंगाल के बाउल गीत 2005 में मानवता की मौखिक एवं अमूर्त विरासत की उत्कृष्ट कृति घोषित हुए, और मणिपुर का संकीर्तन, अर्थात् वैष्णवों का अनुष्ठानिक गायन, वादन तथा नर्तन, 2013 में प्रतिनिधि सूची में दर्ज हुआ।
भजन और कीर्तन में क्या अंतर है?
भजन सामान्यतः एक स्वर या छोटी मंडली द्वारा गाया जाने वाला भक्ति गीत है, जिसका ढांचा निश्चित नहीं होता। कीर्तन सामूहिक होता है: मुख्य गायक पंक्ति उठाता है और सभा उसे दोहराती है, साथ में ढोल, मंजीरा और कई बार नृत्य भी होता है।
अभंग की रचना किन संतों ने की?
महाराष्ट्र की वारकरी परंपरा के ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, चोखामेला और तुकाराम ने पंढरपुर के विठोबा के लिए अभंग रचे। तुकाराम सत्रहवीं शताब्दी के संत थे।
बाउल गायक के प्रमुख वाद्य कौन से हैं?
एकतारा, जो एक तार वाला वाद्य है, इसके साथ दोतारा, खमक, छोटा दुग्गी ढोल तथा घुंघरू। बाउल परंपरा का सबसे प्रसिद्ध नाम लालन फकीर है।
स्रोत
- भारतीय कला का परिचय, भाग 2 (कक्षा 12) — एनसीईआरटी
- बाउल गीत, 2005 में मानवता की मौखिक एवं अमूर्त विरासत की उत्कृष्ट कृति घोषित — यूनेस्को
- संकीर्तन, मणिपुर का अनुष्ठानिक गायन, वादन और नर्तन, प्रतिनिधि सूची 2013 — यूनेस्को
- लोक एवं भक्ति संगीत परंपराओं पर संगीत नाटक अकादमी के अभिलेख — संगीत नाटक अकादमी





