विदेशों में भारतीय संस्कृति का प्रसार: मंदिर, ग्रंथ और भिक्षु
विदेशों में भारतीय संस्कृति के प्रसार के नोट्स: अशोक के धर्मदूत, अंगकोरवाट और बोरोबुदुर, दक्षिण-पूर्व एशिया की रामायण, गांधार, तिब्बत तथा कलीला व दिमना।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 4 मिनट

भारतीय संस्कृति हजार वर्ष से अधिक समय तक बिना किसी सेना के बाहर फैली। व्यापारी उसे दक्षिण-पूर्व एशिया के समुद्री मार्ग और मध्य एशिया के भूमि मार्गों से ले गए, बौद्ध भिक्षु धर्म के साथ लिपि, पंचांग और कला भी ले गए, और वहां के शासकों ने संस्कृत, हिंदू तथा बौद्ध देवताओं और महाकाव्यों को अपनाया, क्योंकि इनसे राजसत्ता को एक नई भाषा मिलती थी। परिणाम अफगानिस्तान से जापान तक फैली भारतीय प्रभाव की एक पट्टी है - अंगकोर और प्रम्बानन के मंदिर, बोरोबुदुर का बौद्ध स्मारक, थाईलैंड, लाओस और इंडोनेशिया की अपनी रामायण, तथा खोतानी से बहासा इंडोनेशिया तक संस्कृत के शब्द। परीक्षाओं में प्रश्न स्मारक, उसके निर्माता और उसके देश से बनते हैं, तथा उन भिक्षुओं से भी जो बौद्ध धर्म को एक देश से दूसरे देश ले गए।
संस्कृति किन मार्गों से गई
- व्यापार: भारतीय ग्रंथ जिन्हें सुवर्णभूमि और सुवर्णद्वीप कहते हैं, उन्हीं दक्षिण-पूर्व एशिया और द्वीपों तक समुद्री मार्ग से मसाले, कपास और विचार साथ-साथ गए; गांधार से जाता भूमि मार्ग मध्य एशिया और चीन तक रेशम मार्ग से जुड़ा था।
- धर्मदूत: ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में अशोक ने अपने साम्राज्य के बाहर भिक्षु भेजे, जिनमें सबसे प्रसिद्ध महेंद्र, जिन्हें महिंद कहा गया, का श्रीलंका जाना है, और उनके बाद भिक्षुणी संघमित्रा बोधि वृक्ष की एक शाखा लेकर गईं।
- भारतीय ढंग की राजसत्ता: फुनान, चंपा, खमेर देश, श्रीविजय और मातरम के शासकों ने वर्मन से अंत होने वाली संस्कृत उपाधियां लीं, शिव और विष्णु के मंदिर बनवाए और दरबार में महाकाव्यों का पाठ कराया।
- विद्या: तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला में चीन, कोरिया, तिब्बत तथा दक्षिण-पूर्व एशिया से विद्यार्थी आते थे, और पढ़ने आए यात्रियों के विवरणों से ही भारतीय इतिहास की तिथियां तय होती हैं।
दक्षिण-पूर्व एशिया, देश दर देश
| देश | भारतीय उपस्थिति |
|---|---|
| कंबोडिया | बारहवीं शताब्दी में सूर्यवर्मन द्वितीय द्वारा विष्णु मंदिर के रूप में बना अंगकोरवाट, जो बाद में बौद्ध स्थल भी बना; जयवर्मन सप्तम का अंगकोर थोम और बायोन; पुराने नाम कंबुज और फुनान; अप्सरा नृत्य |
| इंडोनेशिया | जावा में शैलेंद्र वंश का महान बौद्ध स्मारक बोरोबुदुर; मुख्यतः शिव को समर्पित प्रम्बानन के हिंदू मंदिर; बाली, जहां आज भी हिंदू परंपरा है; महाकाव्यों की वायांग कुलित छाया नाट्य; राष्ट्रीय ध्येय वाक्य भिन्नेका तुंगल इका तथा राजचिह्न में गरुड़ |
| थाईलैंड | अयोध्या के नाम पर बसी पुरानी राजधानी अयुत्थया; राम उपाधि वाले राजा; थाई रामायण रामकियेन; बैंकॉक का एमराल्ड बुद्ध मंदिर |
| वियतनाम | चंपा राज्य और मी सोन का शैव मंदिर समूह, जो विश्व धरोहर स्थल है |
| लाओस | लाओ रामायण फ्रा लक फ्रा राम; बौद्ध केंद्र लुआंग प्राबांग |
| म्यांमार | ग्रंथों की सुवर्णभूमि; थेरवाद बौद्ध धर्म और मंदिरों का नगर बागान |
| मलेशिया | केडाह तथा बुजांग घाटी की आरंभिक भारतीय बस्तियां, जहां हिंदू और बौद्ध अवशेष मिले हैं |
| श्रीलंका | अशोक के धर्मदूत से आया थेरवाद बौद्ध धर्म; अनुराधापुर का बोधि वृक्ष; पालि इतिवृत्त दीपवंश और महावंश |
मध्य एशिया, चीन और पूर्वी एशिया
- कुषाण शासक कनिष्क, जिसने कश्मीर में चतुर्थ बौद्ध संगीति बुलाई, के समय महायान बौद्ध धर्म रेशम मार्ग से बैक्ट्रिया, खोतान, कूचा और दुनहुआंग तक पहुंचा।
- यूनानी वस्त्र शैली और भारतीय विषय वाली गांधार कला तथा मथुरा शैली ही बाहर गईं; अफगानिस्तान की बामियान घाटी की चट्टान में तराशी विशाल बुद्ध प्रतिमाएं, जो 2001 में नष्ट कर दी गईं, उनका सबसे दूर का स्मारक थीं।
- बौद्ध धर्म पहली शताब्दी में चीन पहुंचा, और चीनी यात्री दूसरी दिशा में आए - चंद्रगुप्त द्वितीय के समय फाह्यान, हर्ष के समय ह्वेनसांग, जिसने नालंदा में शीलभद्र से अध्ययन किया, और उसके बाद इत्सिंग।
- बोधिधर्म, जिन्हें पल्लव देश के राजकुमार के रूप में स्मरण किया जाता है, ध्यान संप्रदाय चीन ले गए, जहां वह चान बना और जापान में जेन।
- बौद्ध धर्म चीन से कोरिया में चौथी शताब्दी में और कोरिया से जापान में छठी शताब्दी में गया; भारतीय भिक्षु बोधिसेन को नारा बुलाया गया, जहां उन्होंने तोदाईजी मंदिर की महान बुद्ध प्रतिमा की प्रतिष्ठा में भाग लिया।
- तिब्बत में आठवीं शताब्दी में शांतरक्षित और उसके बाद पद्मसंभव, जिन्हें गुरु रिनपोछे कहा जाता है, ने बौद्ध धर्म स्थापित किया, और ग्यारहवीं शताब्दी में विक्रमशिला के अतीश ने उसे पुनर्जीवित किया।
ग्रंथ, अंक और शब्द
- पंचतंत्र पहलवी अनुवाद से होकर अरबी में कलीला व दिमना बना और वहां से फारसी, हिब्रू, लैटिन तथा यूरोप की भाषाओं तक पहुंचा।
- स्थानमान पद्धति और शून्य वाले भारतीय अंक अरब जगत और फिर यूरोप पहुंचे, जहां वे आज भी अरबी अंक कहे जाते हैं; ब्रह्मगुप्त का खगोल ग्रंथ बगदाद में सिंदहिंद के नाम से अनूदित हुआ।
- संस्कृत के ऋण शब्द पूरे एशिया में मिलते हैं - मलय और इंडोनेशियाई में राजा, गुरु, कर्म, धर्म, नाग और भाषा, तथा थाई और खमेर की राजकीय शब्दावली बड़े भाग में संस्कृत और पालि है।
- फिलीपींस का लगुना ताम्रपत्र अभिलेख, जो दसवीं शताब्दी का माना जाता है, संस्कृत शब्दों का प्रयोग करता है, और इंडोनेशिया की राष्ट्रीय विमान सेवा तथा थाईलैंड का राजचिह्न, दोनों में गरुड़ है।
इसका महत्व क्यों है
यह प्रसार विजय नहीं, संवाद था। वहां के समाजों ने जो उपयोगी लगा वही लिया और उसे अपने ढंग से गढ़ा - थाईलैंड की रामायण का अंत वाल्मीकि से भिन्न है, खमेर अप्सरा अपना ही नृत्य है, और जावा की छाया नाट्य महाभारत को जावाई विदूषकों के साथ सुनाती है। इसी कारण इस विषय को संस्कृति का प्रसार कहा जाता है, साम्राज्य नहीं।
परीक्षा की दृष्टि से
सबसे आम प्रश्न स्मारक देकर देश या निर्माता पूछता है - अंगकोरवाट के साथ कंबोडिया और सूर्यवर्मन द्वितीय, बोरोबुदुर तथा प्रम्बानन के साथ इंडोनेशिया का जावा, मी सोन के साथ वियतनाम, बामियान के साथ अफगानिस्तान और बागान के साथ म्यांमार। दूसरा समूह पूछता है कि बौद्ध धर्म कौन कहां ले गया - श्रीलंका महिंद और संघमित्रा, चीन बोधिधर्म, जापान बोधिसेन, तिब्बत पद्मसंभव और शांतरक्षित। तीसरा समूह विदेशों की रामायण पर है, जिसमें थाईलैंड के लिए रामकियेन और लाओस के लिए फ्रा लक फ्रा राम अपेक्षित उत्तर हैं, साथ ही अयोध्या के नाम पर बसा नगर अयुत्थया और जावा की छाया नाट्य वायांग कुलित। छोटे प्रश्न पूछते हैं कि कौन सा भारतीय ग्रंथ कलीला व दिमना बना, चतुर्थ बौद्ध संगीति किसने बुलाई, और कौन सा चीनी यात्री किस भारतीय राजा के समय आया। जाल ये हैं - बोरोबुदुर और प्रम्बानन के धर्म आपस में बदल देना, अंगकोरवाट को विष्णु के स्थान पर शिव मंदिर मान लेना, तथा बामियान को अफगानिस्तान के स्थान पर पाकिस्तान में रख देना।
महत्वपूर्ण तथ्य
| अंगकोरवाट | कंबोडिया; सूर्यवर्मन द्वितीय, बारहवीं शताब्दी; विष्णु को समर्पित |
|---|---|
| अंगकोर थोम और बायोन | कंबोडिया; जयवर्मन सप्तम |
| बोरोबुदुर | जावा, इंडोनेशिया; बौद्ध; शैलेंद्र वंश |
| प्रम्बानन | जावा, इंडोनेशिया; हिंदू, मुख्यतः शिव को समर्पित |
| मी सोन | वियतनाम; चंपा राज्य के शैव मंदिर |
| थाई रामायण | रामकियेन; लाओ रूप फ्रा लक फ्रा राम |
| अयुत्थया | अयोध्या के नाम पर बसी थाईलैंड की पुरानी राजधानी |
| श्रीलंका का धर्मदूत | महेंद्र अर्थात महिंद, और उसके बाद भिक्षुणी संघमित्रा बोधि शाखा के साथ |
| श्रीलंकाई इतिवृत्त | दीपवंश और महावंश, पालि में लिखे |
| चतुर्थ बौद्ध संगीति | कनिष्क ने कश्मीर में बुलाई; महायान रेशम मार्ग से फैला |
| बामियान बुद्ध | अफगानिस्तान; 2001 में नष्ट |
| बोधिधर्म | ध्यान संप्रदाय चीन ले गए, जो चान और जापान में जेन बना |
| तिब्बत में बौद्ध धर्म | आठवीं शताब्दी में शांतरक्षित और पद्मसंभव अर्थात गुरु रिनपोछे; ग्यारहवीं में अतीश |
| पंचतंत्र विदेश में | पहलवी से अरबी में कलीला व दिमना |
| इंडोनेशिया का ध्येय वाक्य | भिन्नेका तुंगल इका, पुरानी जावाई भाषा में, संस्कृत मूल से |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
अंगकोरवाट मंदिर किस शासक ने बनवाया और वह मूल रूप से किस देवता को समर्पित था?
- A.जयवर्मन सप्तम, बुद्ध को समर्पित
- B.सूर्यवर्मन द्वितीय, विष्णु को समर्पित
- C.राजेंद्र चोल प्रथम, शिव को समर्पित
- D.कौंडिन्य, ब्रह्मा को समर्पित
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर B, सूर्यवर्मन द्वितीय, विष्णु को समर्पित है। खमेर राजा सूर्यवर्मन द्वितीय ने बारहवीं शताब्दी में आज के कंबोडिया में अंगकोरवाट को विष्णु मंदिर के रूप में बनवाया, और उसके विस्तार के कारण वह संसार का सबसे बड़ा विष्णु मंदिर कहलाता है; बाद में उसका उपयोग बौद्ध स्थल के रूप में भी हुआ और आज वह कंबोडिया के राष्ट्रीय ध्वज पर अंकित है। विकल्प A गलत है क्योंकि जयवर्मन सप्तम, जो बाद में शासन करता था, ने अंगकोर थोम बनवाया जिसके केंद्र में बायोन है, और वह महायान बौद्ध था, इसी कारण बायोन के मुख बौद्ध हैं। विकल्प C गलत है क्योंकि राजेंद्र चोल प्रथम भारतीय शासक था, जिसकी नौसेना ने श्रीविजय पर आक्रमण किया; उसने तमिल क्षेत्र में गंगैकोंड चोलपुरम मंदिर बनवाया, कंबोडिया में नहीं। विकल्प D गलत है क्योंकि कौंडिन्य पहले के फुनान राज्य की स्थापना कथा से जुड़े हैं और उन्होंने ऐसा कोई निर्माण नहीं कराया।
मध्य जावा का विशाल सीढ़ीदार स्मारक बोरोबुदुर किस वंश में बना और किस धर्म से संबंधित है?
- A.शैलेंद्र वंश; बौद्ध धर्म
- B.माजापहित वंश; इस्लाम
- C.शैलेंद्र वंश; जैन धर्म
- D.पाल वंश; हिंदू धर्म
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व्याख्या
सही उत्तर A, शैलेंद्र वंश और बौद्ध धर्म है। बोरोबुदुर आठवीं और नौवीं शताब्दी में जावा के शैलेंद्र शासकों ने बौद्ध स्मारक के रूप में बनवाया, जिसका रूप सीढ़ीदार पिरामिड का है और जिसकी वीथियों में बुद्ध के जीवन तथा उपदेश के उत्कीर्ण फलक हैं, और ऊपरी चबूतरों के खुले स्तूपों में बैठी बुद्ध प्रतिमाएं हैं। विकल्प B गलत है क्योंकि माजापहित जावा का बाद का हिंदू-बौद्ध साम्राज्य था और इस्लाम द्वीपों में बोरोबुदुर बनने के कई शताब्दी बाद पहुंचा। विकल्प C में वंश सही है, परंतु धर्म गलत है, क्योंकि जैन धर्म इस प्रकार दक्षिण-पूर्व एशिया नहीं गया। विकल्प D गलत है क्योंकि पाल बंगाल और बिहार में शासन करते थे और नालंदा तथा विक्रमशिला के संरक्षक थे; जावा का हिंदू स्मारक प्रम्बानन है, जो मुख्यतः शिव के लिए बना।
रामकियेन, जो अपने देश का राष्ट्रीय महाकाव्य है, रामायण का स्थानीय रूप किस देश में है?
- A.इंडोनेशिया
- B.थाईलैंड
- C.कंबोडिया
- D.म्यांमार
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व्याख्या
सही उत्तर B, थाईलैंड है। रामकियेन रामायण का थाई रूप है, जो बैंकॉक के एमराल्ड बुद्ध मंदिर की वीथियों में चित्रित है और मुखौटा नृत्य में प्रस्तुत होता है; वर्तमान थाई राजवंश के राजा उसी से राम उपाधि लेते हैं और पुरानी राजधानी अयुत्थया का नाम अयोध्या से बना है। विकल्प A गलत है क्योंकि जावा का रूप ककविन रामायण कहलाता है, जो वायांग कुलित छाया नाट्य में प्रस्तुत होता है। विकल्प C गलत है क्योंकि कंबोडिया का रूप रीमकेर कहलाता है, जो खमेर मंदिरों में उत्कीर्ण और चित्रित है। विकल्प D गलत है क्योंकि म्यांमार का रूप यमा जातदौ के नाम से जाना जाता है। इन चारों देशों की अपनी रामायण है, और इसी कारण ऐसे प्रश्न पूछे जाते हैं, इसलिए नामों का मिलान ध्यान से करना चाहिए, अनुमान से नहीं।
सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए श्रीलंका किसे भेजा?
- A.बोधिधर्म और बोधिसेन
- B.महेंद्र अर्थात महिंद, और बाद में संघमित्रा
- C.शांतरक्षित और पद्मसंभव
- D.फाह्यान और ह्वेनसांग
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व्याख्या
सही उत्तर B है। अशोक ने अपने पुत्र महेंद्र को, जिन्हें पालि इतिवृत्तों में महिंद कहा गया है, श्रीलंका भेजा, जहां द्वीप के राजा ने उपदेश स्वीकार किया, और उसके बाद भिक्षुणी संघमित्रा बोधि वृक्ष की शाखा लेकर पहुंचीं, जो अनुराधापुर में रोपी गई। यह कथा पालि इतिवृत्त दीपवंश और महावंश में मिलती है। विकल्प A गलत है क्योंकि बोधिधर्म चीन से जुड़े हैं, जहां उनका संप्रदाय चान और जापान में जेन बना, तथा बोधिसेन जापान के नारा स्थित तोदाईजी मंदिर से। विकल्प C गलत है क्योंकि शांतरक्षित और पद्मसंभव ने आठवीं शताब्दी में तिब्बत में बौद्ध धर्म स्थापित किया, अर्थात अशोक के एक हजार वर्ष बाद। विकल्प D गलत है क्योंकि फाह्यान और ह्वेनसांग चीनी यात्री थे, जो अध्ययन के लिए भारत आए थे, विदेश भेजे गए भारतीय धर्मदूत नहीं।
वर्ष 2001 में नष्ट की गई चट्टान में तराशी विशाल बुद्ध प्रतिमाएं किस देश में थीं?
- A.पाकिस्तान
- B.अफगानिस्तान
- C.उज्बेकिस्तान
- D.ईरान
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व्याख्या
सही उत्तर B, अफगानिस्तान है। ये दो विशाल बुद्ध प्रतिमाएं बामियान घाटी की चट्टान में तराशी गई थीं, जो रेशम मार्ग की उस शाखा पर है जिससे बौद्ध धर्म गांधार से मध्य एशिया पहुंचा, और वे 2001 में नष्ट कर दी गईं; घाटी अपनी शेष गुफाओं तथा चित्रों के कारण आज भी विश्व धरोहर सूची में है। विकल्प A गलत है और यही सामान्य जाल भी है, क्योंकि पाकिस्तान में तक्षशिला तथा तख्त-ए-बाही जैसे गांधार स्थल और उस शैली की संग्रहालय प्रतिमाएं हैं, परंतु बामियान की प्रतिमाएं वहां नहीं थीं। विकल्प C गलत है क्योंकि उज्बेकिस्तान में तेरमेज के बौद्ध अवशेष तथा समरकंद और बुखारा के इस्लामी स्मारक हैं। विकल्प D गलत है क्योंकि ईरान इस मार्ग पर था, परंतु वह पारसी और बाद की इस्लामी परंपरा से जुड़ा है, इस प्रकार की प्रतिमाओं से नहीं।
चंपा राज्य द्वारा बनाया गया मी सोन का शैव मंदिर समूह आज किस देश में है?
- A.वियतनाम
- B.लाओस
- C.मलेशिया
- D.फिलीपींस
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व्याख्या
सही उत्तर A, वियतनाम है। चंपा राज्य ने कई शताब्दियों तक आज के वियतनाम के मध्य तट पर शासन किया, अपने अभिलेखों में संस्कृत का प्रयोग किया और शिव के ईंट निर्मित मंदिर बनाए, जिनमें मी सोन का समूह सबसे बड़ा है और विश्व धरोहर स्थल है। विकल्प B गलत है क्योंकि लाओस थेरवाद बौद्ध धर्म, लुआंग प्राबांग नगर तथा लाओ रामायण फ्रा लक फ्रा राम से जुड़ा है। विकल्प C गलत है क्योंकि मलेशिया के आरंभिक भारतीय अवशेष केडाह और बुजांग घाटी में हैं, जो मंदिर नगर के स्थान पर छोटे देवालय हैं। विकल्प D गलत है क्योंकि फिलीपींस में भारतीय प्रभाव मुख्यतः शब्दों के रूप में दिखता है, जैसे दसवीं शताब्दी के लगुना ताम्रपत्र अभिलेख में, और वहां ऐसा कोई मंदिर समूह नहीं है। वियतनाम के साथ चंपा और चाम लोग, यही नाम याद रखने योग्य हैं।
परंपरा के अनुसार कौन भारतीय भिक्षु बौद्ध धर्म का ध्यान संप्रदाय चीन ले गए, जो वहां चान और जापान में जेन बना?
- A.अतीश
- B.बोधिधर्म
- C.कुमारजीव
- D.शीलभद्र
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व्याख्या
सही उत्तर B, बोधिधर्म है, जिन्हें परंपरा में दक्षिण भारत के पल्लव देश का राजकुमार माना जाता है और जो चीन जाकर ऐसे मार्ग का उपदेश दिया जो ग्रंथ के स्थान पर ध्यान पर टिका था; उनका संप्रदाय चीनी में चान और जापानी में जेन कहलाता है, तथा कथा उन्हें शाओलिन मठ से भी जोड़ती है। विकल्प A गलत है क्योंकि अतीश ग्यारहवीं शताब्दी में विक्रमशिला से तिब्बत गए और वहां मठीय शिक्षा में सुधार किया। विकल्प C गलत है क्योंकि मध्य एशिया के कूचा से आए कुमारजीव बौद्ध ग्रंथों के चीनी में महान अनुवादक थे, परंतु ध्यान संप्रदाय के संस्थापक नहीं। विकल्प D गलत है क्योंकि शीलभद्र नालंदा के वे आचार्य थे जिनसे चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अध्ययन किया, और वे भारत में ही रहे। चीन के साथ बोधिधर्म और जापान के साथ बोधिसेन, यही जोड़ा याद रखना चाहिए।
चतुर्थ बौद्ध संगीति, जिसके बाद महायान बौद्ध धर्म रेशम मार्ग से मध्य एशिया में फैला, किसने बुलाई थी?
- A.अशोक
- B.कालाशोक
- C.कनिष्क
- D.अजातशत्रु
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व्याख्या
सही उत्तर C, कनिष्क है, जिस कुषाण शासक ने कश्मीर में चतुर्थ बौद्ध संगीति बुलाई और जिसका साम्राज्य गंगा के मैदान से मध्य एशिया तक फैला था, जिसके कारण महायान बौद्ध धर्म तथा गांधार और मथुरा की मूर्तिकला शैलियां व्यापार मार्गों से खोतान, कूचा और दुनहुआंग तक पहुंचीं। विकल्प A गलत है क्योंकि अशोक ने पाटलिपुत्र में तृतीय संगीति बुलाई थी और विदेश धर्मदूत भेजे थे। विकल्प B गलत है क्योंकि शिशुनाग वंश के कालाशोक ने वैशाली में द्वितीय संगीति बुलाई थी। विकल्प D गलत है क्योंकि मगध का अजातशत्रु उस समय का शासक था जब बुद्ध के महापरिनिर्वाण के कुछ ही समय बाद राजगृह में प्रथम संगीति हुई। संगीतियों का क्रम, उनके शासक और स्थान, एक तालिका के रूप में याद कर लेना चाहिए, क्योंकि यह बार-बार पूछा जाता है।
वह संस्कृत ग्रंथ, जो पश्चिम की ओर गया और अरबी में कलीला व दिमना के नाम से जाना गया, कौन है?
- A.पंचतंत्र
- B.अर्थशास्त्र
- C.नाट्यशास्त्र
- D.अष्टाध्यायी
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर A, पंचतंत्र है, जो राजकुमारों को राजनीति सिखाने के लिए रची गई पशु कथाओं का संग्रह है। उसका अनुवाद फारसी साम्राज्य में पहलवी में हुआ और उसी से अरबी में कलीला व दिमना बना, जिसके दोनों नाम कथाओं के गीदड़ों के हैं, और अरबी से वह फारसी, सीरियाई, हिब्रू, यूनानी तथा लैटिन में और फिर यूरोप की भाषाओं में पहुंचा। विकल्प B गलत है क्योंकि कौटिल्य को समर्पित राजनीति ग्रंथ अर्थशास्त्र इस प्रकार पश्चिम नहीं गया और भारत में भी उसकी पुनः प्राप्ति बीसवीं शताब्दी में हुई। विकल्प C गलत है क्योंकि भरत का नाट्यशास्त्र नाट्य, नृत्य और संगीत का ग्रंथ है और वह भारतीय परंपरा के भीतर ही रहा। विकल्प D गलत है क्योंकि पाणिनि की अष्टाध्यायी संस्कृत का व्याकरण है, एक तकनीकी ग्रंथ, जिसकी विदेश में ऐसी यात्रा नहीं हुई।
थाईलैंड की कौन सी पुरानी राजधानी का नाम अयोध्या से बना है?
- A.सुखोथाई
- B.अयुत्थया
- C.चियांग माई
- D.नखोन पथोम
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर B, अयुत्थया है, जो लगभग चार शताब्दी तक थाई राज्य की राजधानी रही और आज खंडहर मंदिरों तथा बुद्ध प्रतिमाओं वाला विश्व धरोहर स्थल है। यह नाम रामायण में राम के नगर अयोध्या का थाई रूप है, और वह ऐसे दरबार के अनुरूप भी है जिसका महाकाव्य रामकियेन था और जिसके राजा राम उपाधि धारण करते थे। विकल्प A गलत है क्योंकि सुखोथाई पहले की थाई राजधानी थी, जो चलती हुई बुद्ध प्रतिमा और पहली थाई लिपि के लिए प्रसिद्ध है, परंतु उसका नाम संस्कृत में सुख के उदय का अर्थ देता है, अयोध्या का रूप नहीं है। विकल्प C गलत है क्योंकि चियांग माई उत्तर के लान्ना राज्य की राजधानी थी। विकल्प D गलत है क्योंकि नखोन पथोम प्राचीन बौद्ध केंद्र है जहां विशाल स्तूप है, और उसके नाम का अर्थ प्रथम नगर है, अयोध्या नहीं।
हर्षवर्धन के शासनकाल में नालंदा में आचार्य शीलभद्र से अध्ययन करने वाला चीनी यात्री कौन था?
- A.फाह्यान
- B.ह्वेनसांग
- C.इत्सिंग
- D.सुंग युन
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर B, ह्वेनसांग है, जो सातवीं शताब्दी में मध्य एशिया के भूमि मार्ग से आया, हर्षवर्धन के शासनकाल में वर्षों भारत में रहा, नालंदा महाविहार में शीलभद्र से अध्ययन किया और हस्तलिखित ग्रंथ चीन लौटाकर उनका अनुवाद किया, तथा अपने समय के भारत का सबसे विस्तृत विदेशी विवरण छोड़ा। विकल्प A गलत है क्योंकि फाह्यान दो शताब्दी पहले गुप्त शासक चंद्रगुप्त द्वितीय के समय आया था और उसका विवरण मठों तथा नगरों का है, नालंदा में अध्ययन का नहीं। विकल्प C गलत है क्योंकि इत्सिंग उसके बाद आया और उसने मुख्यतः मठीय अनुशासन तथा समुद्री मार्ग पर लिखा। विकल्प D गलत है क्योंकि सुंग युन हूण काल में दूत के रूप में आया और उसने केवल संक्षिप्त उल्लेख छोड़ा। प्रत्येक यात्री को उसके समय के भारतीय शासक के साथ जोड़कर याद रखना ऐसे प्रश्नों का सबसे तेज उत्तर है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अंगकोरवाट किसने बनवाया और वह किस देवता को समर्पित था?
कंबोडिया का अंगकोरवाट बारहवीं शताब्दी में खमेर राजा सूर्यवर्मन द्वितीय ने बनवाया और वह विष्णु को समर्पित था, इसी कारण वह संसार का सबसे बड़ा विष्णु मंदिर कहलाता है। बाद की शताब्दियों में उसका उपयोग बौद्ध स्थल के रूप में भी होने लगा, और आज वह कंबोडिया के राष्ट्रीय ध्वज पर अंकित है।
बोरोबुदुर और प्रम्बानन में क्या अंतर है?
दोनों इंडोनेशिया के मध्य जावा में हैं। बोरोबुदुर बौद्ध स्मारक है, शैलेंद्र वंश में बना सीढ़ीदार स्तूप, जिसकी वीथियों में उत्कीर्ण फलक और चबूतरों पर बुद्ध प्रतिमाएं हैं। प्रम्बानन ऊंचे शिखरों वाला हिंदू मंदिर समूह है, जो मुख्यतः शिव को समर्पित है, जिसमें ब्रह्मा और विष्णु के मंदिर भी हैं और दीवारों पर रामायण के फलक हैं।
रामकियेन क्या है?
रामकियेन रामायण का थाई रूप और थाईलैंड का राष्ट्रीय महाकाव्य है। उसके प्रसंग बैंकॉक के एमराल्ड बुद्ध मंदिर की वीथियों में चित्रित हैं और मुखौटा नृत्य में प्रस्तुत किए जाते हैं, तथा वर्तमान थाई राजवंश के राजा उसी से राम उपाधि लेते हैं। इसी कथा का लाओ रूप फ्रा लक फ्रा राम कहलाता है।
तिब्बत में बौद्ध धर्म कौन ले गया?
तिब्बत में बौद्ध धर्म आठवीं शताब्दी में शांतरक्षित ने, जिन्हें पहले भिक्षुओं को दीक्षा देने के लिए बुलाया गया था, और पद्मसंभव ने स्थापित किया, जिन्हें वहां गुरु रिनपोछे कहा जाता है और तांत्रिक परंपरा का प्रवर्तक माना जाता है। ग्यारहवीं शताब्दी में विक्रमशिला के आचार्य अतीश तिब्बत गए और उन्होंने मठीय शिक्षा में सुधार किया।
पंचतंत्र यूरोप तक कैसे पहुंचा?
उसका अनुवाद संस्कृत से पहलवी में फारसी साम्राज्य में हुआ और उसी से अरबी में कलीला व दिमना बना। अरबी पाठ आगे फारसी, सीरियाई, हिब्रू, यूनानी और लैटिन में गया और लैटिन से यूरोप की भाषाओं में, इस प्रकार भारतीय पशु कथाएं यूरोपीय कथा परंपरा का अंग बन गईं।
कौन से चीनी यात्री भारत आए और किनके शासनकाल में?
फाह्यान गुप्त वंश के चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में आया और उसने मठों तथा नगरों का विवरण छोड़ा। ह्वेनसांग सातवीं शताब्दी में हर्षवर्धन के समय आया, नालंदा में आचार्य शीलभद्र से अध्ययन किया और देश का सबसे विस्तृत विवरण लिखा। इत्सिंग उसके बाद आया और उसने मठीय आचार पर लिखा।





