भारतीय शास्त्रीय संगीत: हिंदुस्तानी, कर्नाटक, राग और ताल
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए भारतीय शास्त्रीय संगीत के पूर्ण नोट्स: दोनों पद्धतियाँ, ग्रंथ, स्वर, राग, ताल, घराने, गायन शैलियाँ और प्रमुख संगीतकार।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 5 मिनट

भारतीय शास्त्रीय संगीत विश्व की सबसे प्राचीन अटूट संगीत परम्पराओं में से एक है और सामान्य ज्ञान के प्रश्नपत्र में कला एवं संस्कृति खंड से इस पर प्रश्न लगभग हर बार आता है। प्रश्न सुनने की समझ नहीं पूछते। वे पूछते हैं कि कौन-सा ग्रंथ किसने लिखा, किस ताल में कितनी मात्राएँ हैं, कौन गायक किस घराने का था, और कोई शैली किस पद्धति की है। ये नोट्स विषय को ठीक उसी रूप में रखते हैं: उद्गम, हिंदुस्तानी और कर्नाटक पद्धतियों में विभाजन, स्वर-राग-ताल का व्याकरण, गायन शैलियाँ, घराने और वे संगीतकार जिनके नाम विकल्पों में आते हैं।
परम्परा कहाँ से आती है
सामवेद को भारतीय संगीत का मूल स्रोत माना जाता है। इसके अधिकांश मंत्र ऋग्वेद से लिए गए हैं, परन्तु वे पाठ के लिए नहीं, गायन के लिए संकलित हैं, और इस गायन को सामगान कहते हैं। संगीत पर पहला व्यवस्थित विवेचन भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में सुरक्षित है, जो नाट्य का ग्रंथ होते हुए भी सात स्वरों, बाईस श्रुतियों और उस प्राचीन जाति पद्धति का वर्णन करता है जिससे आगे चलकर राग विकसित हुए। मतंग की बृहद्देशी वह पहला ग्रंथ है जिसमें 'राग' शब्द लगभग आज वाले अर्थ में प्रयुक्त हुआ। तेरहवीं शताब्दी में शार्ङ्गदेव ने, जो देवगिरि के यादव दरबार से जुड़े थे, संगीत रत्नाकर लिखा; सात अध्यायों के कारण इसे सप्ताध्यायी भी कहते हैं और यही अंतिम बड़ा ग्रंथ है जिसे उत्तर और दक्षिण दोनों परम्पराएँ अपना मानती हैं।
हिंदुस्तानी और कर्नाटक: दो पद्धतियाँ
लगभग चौदहवीं शताब्दी से उत्तर का संगीत दिल्ली सल्तनत और बाद में मुगल दरबार के माध्यम से फारसी तथा मध्य एशियाई तत्त्वों को आत्मसात करता गया, जबकि दक्षिण प्राचीन भक्ति और ग्रंथ परम्परा के अधिक निकट बना रहा। परिणाम दो पद्धतियाँ हैं जिनका सिद्धांत एक है और व्यवहार अलग।
| तुलना का बिंदु | हिंदुस्तानी | कर्नाटक |
|---|---|---|
| क्षेत्र | उत्तर, पश्चिम और पूर्वी भारत | तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल |
| मूल स्वर-समूह | दस थाट, वर्गीकरण वी. एन. भातखंडे का | बहत्तर मेलकर्ता राग, वेंकटमखी की पद्धति से |
| प्रमुख गायन शैलियाँ | ध्रुपद, धमार, ख्याल, ठुमरी, टप्पा, तराना | गीतम्, वर्णम्, कृति, रागम्-तानम्-पल्लवी, तिल्लाना |
| ताल वाद्य | तबला, ध्रुपद के साथ पखावज | मृदंगम, साथ में घटम, कंजीरा और मोरसिंग |
| स्वर संगति | सारंगी अथवा हारमोनियम | वायलिन |
| बल किस पर | लम्बे आलाप पर आधारित सुधारात्मक विस्तार; घराना परम्परा | रचना और उसका साहित्य; रचनाकार की मुद्रा |
स्वर, राग और ताल
सप्तक में सात स्वर हैं: षड्ज, ऋषभ, गंधार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद, जिन्हें संक्षेप में सा, रे, ग, म, प, ध और नि कहा जाता है। षड्ज और पंचम अचल हैं, शेष पाँच के विकृत रूप होते हैं, जिससे व्यवहार में बारह स्वर बनते हैं, जबकि सिद्धांत में बाईस श्रुतियाँ मानी गई हैं। राग केवल स्वर-समूह नहीं, नियमों वाला स्वर-व्यक्तित्व है: उसमें कम से कम पाँच स्वर होने चाहिए, षड्ज अनिवार्य है, और मध्यम तथा पंचम दोनों एक साथ वर्जित नहीं हो सकते। हर राग का आरोह और अवरोह होता है, सबसे प्रमुख स्वर वादी और दूसरा प्रमुख संवादी कहलाता है, और पाँच, छह या सात स्वरों के अनुसार राग औडव, षाडव या सम्पूर्ण कहा जाता है। हिंदुस्तानी राग समय से भी बँधे हैं, इसलिए भैरव प्रातःकाल का और दरबारी कानड़ा रात्रि का राग है, मल्हार वर्षा में और बसंत वसंत ऋतु में गाया जाता है।
ताल मात्राओं का चक्र है। एक मात्रा सबसे छोटी इकाई है, मात्राओं का समूह विभाग, पूरा चक्र आवर्तन, पहली भारी मात्रा सम, तालीवाला विभाग ताली और रिक्त विभाग खाली कहलाता है।
| ताल | मात्राएँ | विभाजन |
|---|---|---|
| तीनताल | 16 | 4+4+4+4 |
| एकताल | 12 | 2+2+2+2+2+2 |
| चौताल | 12 | ध्रुपद के साथ पखावज पर |
| झपताल | 10 | 2+3+2+3 |
| कहरवा | 8 | 4+4 |
| रूपक | 7 | 3+2+2, आरम्भ खाली से |
| दादरा | 6 | 3+3 |
| धमार | 14 | 5+2+3+4, धमार शैली के लिए |
कर्नाटक संगीत में सात मूल ताल हैं, जिन्हें सुलादि सप्त ताल कहते हैं: ध्रुव, मट्य, रूपक, झम्प, त्रिपुट, अट और एक। मंच पर सबसे अधिक प्रयुक्त आदि ताल आठ मात्राओं का है और वह त्रिपुट ताल का चतुस्र जाति रूप है।
गायन शैलियाँ
ध्रुपद हिंदुस्तानी गायन की सबसे प्राचीन जीवित शैली है। यह गम्भीर है, स्थायी, अंतरा, संचारी और आभोग इन चार भागों में गाई जाती है, इसके साथ पखावज बजता है, और आधुनिक समय में इसे मुख्यतः डागर परिवार ने जीवित रखा; ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर इसके आश्रयदाता के रूप में स्मरण किए जाते हैं। ख्याल शब्द फारसी के 'कल्पना' से आया है; इसमें अलंकरण और विस्तार की छूट कहीं अधिक है और यही दो शताब्दियों से प्रमुख शैली है, जो विलम्बित बड़ा ख्याल और द्रुत छोटा ख्याल के रूप में गाई जाती है। धमार चौदह मात्रा की धमार ताल में होली से जुड़ी शैली है। ठुमरी उपशास्त्रीय और शृंगारिक है, जिसके केंद्र लखनऊ और बनारस रहे तथा अवध के वाजिद अली शाह सबसे प्रसिद्ध आश्रयदाता। टप्पा द्रुत और छोटी तानों से भरी शैली है, जो पंजाब के ऊँट चालकों के गीतों से विकसित हुई। तराना में शब्दों के स्थान पर लयात्मक बोल प्रयुक्त होते हैं। कर्नाटक संगीत की सभा को कच्चेरी कहते हैं, जिसमें वर्णम् से आरम्भ होता है, बीच में कृतियाँ गाई जाती हैं, रागम्-तानम्-पल्लवी सुधार का शिखर होता है और तिल्लाना से समापन होता है।
घराने और वे नाम जो विकल्पों में आते हैं
घराना संगीत की वह शैली-परम्परा है जो किसी परिवार या गुरु-शिष्य श्रृंखला में चलती है। ख्याल में ग्वालियर सबसे पुराना घराना है, और परीक्षा में पूछे जाने वाले अन्य घराने हैं आगरा, किराना, जयपुर-अतरौली, पटियाला, रामपुर-सहसवान, मेवाती और इंदौर। अब्दुल करीम खाँ, भीमसेन जोशी और गंगूबाई हंगल किराना घराने के हैं, अल्लादिया खाँ और केसरबाई केरकर जयपुर-अतरौली के, बड़े गुलाम अली खाँ पटियाला घराने के और पंडित जसराज मेवाती घराने के। तबले के अपने घराने हैं: दिल्ली, अजराड़ा, लखनऊ, फर्रुखाबाद, बनारस और पंजाब। तानसेन, जो अकबर के नवरत्नों में थे और स्वामी हरिदास के शिष्य थे, मियाँ की मल्हार, मियाँ की तोड़ी और दरबारी कानड़ा के लिए स्मरण किए जाते हैं; उनकी समाधि ग्वालियर में है, जहाँ प्रतिवर्ष तानसेन समारोह होता है। दक्षिण में पुरंदर दास को कर्नाटक संगीत का पितामह कहा जाता है क्योंकि उन्होंने शिक्षण के क्रमिक अभ्यास गढ़े, और कर्नाटक त्रयी अर्थात् त्यागराज, मुत्तुस्वामी दीक्षितर तथा श्यामा शास्त्री तीनों का जन्म तमिलनाडु के तिरुवारूर में हुआ था; तिरुवैयारु में होने वाले त्यागराज आराधना महोत्सव में आज भी हजारों गायक जुटते हैं।
परीक्षा की दृष्टि से
इस प्रकरण से प्रश्नपत्र चार बातें पूछता है। पहली, ग्रंथ और लेखक की जोड़ी: नाट्यशास्त्र-भरत मुनि, बृहद्देशी-मतंग, संगीत रत्नाकर-शार्ङ्गदेव, चतुर्दण्डी प्रकाशिका-वेंकटमखी। दूसरी, संख्याएँ: दस थाट, बहत्तर मेलकर्ता, सात स्वर, बाईस श्रुतियाँ तथा तीनताल, झपताल, रूपक और धमार की मात्राएँ। तीसरी, कलाकार और घराना अथवा कलाकार और वाद्य की जोड़ी, जहाँ जाल यह होता है कि एक ही काल के दो गायक विकल्पों में साथ रख दिए जाते हैं। चौथी, कोई पारिभाषिक शब्द किस पद्धति का है: कृति, वर्णम्, तिल्लाना और मृदंगम कर्नाटक के हैं, जबकि ख्याल, ठुमरी, टप्पा और पखावज हिंदुस्तानी के। तीन प्रसिद्ध जाल याद रखें: ध्रुपद के साथ पखावज बजता है, रूपक ताल खाली से आरम्भ होती है, और कर्नाटक त्रयी तीनों का जन्मस्थान एक ही है, तिरुवारूर।
महत्वपूर्ण तथ्य
| स्रोत वेद | सामवेद; इसके गायन को सामगान कहते हैं |
|---|---|
| नाट्यशास्त्र | भरत मुनि; स्वरों और श्रुतियों का प्राचीनतम व्यवस्थित वर्णन |
| 'राग' शब्द का पहला प्रयोग | मतंग की बृहद्देशी |
| संगीत रत्नाकर | शार्ङ्गदेव, तेरहवीं शताब्दी, देवगिरि का यादव दरबार; सात अध्याय |
| हिंदुस्तानी थाट | दस, वर्गीकरण विष्णु नारायण भातखंडे का |
| मेलकर्ता राग | बहत्तर, वेंकटमखी की चतुर्दण्डी प्रकाशिका से |
| स्वर और श्रुतियाँ | सात स्वर, बाईस श्रुतियाँ; षड्ज और पंचम अचल |
| तीनताल | 16 मात्राएँ, विभाजन 4+4+4+4 |
| रूपक ताल | 7 मात्राएँ, विभाजन 3+2+2, आरम्भ खाली से |
| प्राचीनतम गायन शैली | ध्रुपद; स्थायी, अंतरा, संचारी और आभोग में गाई जाती है |
| ध्रुपद का ताल वाद्य | पखावज |
| सबसे पुराना ख्याल घराना | ग्वालियर |
| कर्नाटक त्रयी | त्यागराज, मुत्तुस्वामी दीक्षितर और श्यामा शास्त्री; जन्मस्थान तिरुवारूर |
| कर्नाटक संगीत के पितामह | पुरंदर दास |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
किस वेद को भारतीय शास्त्रीय संगीत का स्रोत माना जाता है?
- A.ऋग्वेद
- B.यजुर्वेद
- C.सामवेद
- D.अथर्ववेद
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. सामवेद
व्याख्या
सही उत्तर C, सामवेद है। सामवेद गान का वेद है। उसके अधिकांश मंत्र ऋग्वेद से लिए गए हैं, परन्तु वे पाठ के लिए नहीं बल्कि गाने के लिए संकलित किए गए हैं, और इस गायन को सामगान कहा जाता है। संगीत पर लिखा हर परवर्ती भारतीय ग्रंथ परम्परा को इसी वेद तक ले जाता है, इसीलिए यह जोड़ी बार-बार पूछी जाती है।
विकल्प A, ऋग्वेद, सबसे प्राचीन वेद है और देवताओं की स्तुति के सूक्तों का संग्रह है; वह सामवेद को शब्द देता है, पर स्वयं संगीत का वेद नहीं है। विकल्प B, यजुर्वेद, यज्ञ की विधियों का वेद है और पुरोहित के लिए गद्य मंत्र देता है। विकल्प D, अथर्ववेद, में दैनिक जीवन के अभिचार, औषधि और कुछ दार्शनिक सूक्त संकलित हैं। चारों में केवल सामवेद ही राग-रचना के आधार पर संगठित है, इसलिए वही भारतीय शास्त्रीय संगीत का स्रोत कहलाता है।
संगीत रत्नाकर, जिसे हिंदुस्तानी और कर्नाटक दोनों परम्पराएँ मान्यता देती हैं, किसने लिखा था?
- A.मतंग
- B.शार्ङ्गदेव
- C.भरत मुनि
- D.वेंकटमखी
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. शार्ङ्गदेव
व्याख्या
सही उत्तर B, शार्ङ्गदेव है। शार्ङ्गदेव ने तेरहवीं शताब्दी में दक्खन के देवगिरि स्थित यादव दरबार से जुड़े रहते हुए संगीत रत्नाकर की रचना की। सात अध्यायों के कारण इसे सप्ताध्यायी भी कहा जाता है, और चूँकि यह उत्तर तथा दक्षिण की परम्पराओं के अलग होने से पहले लिखा गया, दोनों आज भी इसे प्रमाण मानती हैं।
विकल्प A, मतंग, ने बृहद्देशी लिखी, जो 'राग' शब्द के आधुनिक अर्थ में प्रयोग के लिए स्मरण की जाती है, संगीत रत्नाकर के लिए नहीं। विकल्प C, भरत मुनि, नाट्यशास्त्र के रचयिता हैं, जिसमें स्वरों और श्रुतियों का प्राचीनतम व्यवस्थित वर्णन मिलता है। विकल्प D, वेंकटमखी, सत्रहवीं शताब्दी के दक्षिण भारतीय विद्वान थे, जिनकी चतुर्दण्डी प्रकाशिका ने बहत्तर मेलकर्ता रागों की पद्धति दी। चारों ग्रंथकार हैं, इसीलिए इन्हें साथ रखा जाता है।
कर्नाटक संगीत पद्धति में मेलकर्ता रागों की संख्या कितनी है?
- A.10
- B.22
- C.32
- D.72
उत्तर देखें
सही उत्तर: D. 72
व्याख्या
सही उत्तर D, 72 है। मेलकर्ता राग कर्नाटक संगीत के जनक राग हैं और इनमें से प्रत्येक में आरोह तथा अवरोह दोनों में सातों स्वर प्रयुक्त होते हैं। इनकी संख्या बहत्तर निश्चित करने वाली पद्धति वेंकटमखी की चतुर्दण्डी प्रकाशिका से आती है, और शेष सभी कर्नाटक राग इन्हीं में से किसी के जन्य राग माने जाते हैं।
विकल्प A, 10, उन थाटों की संख्या है जिनमें विष्णु नारायण भातखंडे ने हिंदुस्तानी रागों को बाँटा, अर्थात् वह दूसरी पद्धति की संख्या है। विकल्प B, 22, सप्तक की उन श्रुतियों की संख्या है जो प्राचीन सिद्धांत में मानी गई हैं। विकल्प C, 32, इस वर्गीकरण में किसी भी वस्तु से मेल नहीं खाता और केवल भ्रम के लिए रखा गया है। परीक्षक प्रायः थाट और मेलकर्ता की संख्याएँ आपस में बदल देता है, इसलिए दोनों को एक साथ याद रखें: उत्तर में दस थाट, दक्षिण में बहत्तर मेलकर्ता।
हिंदुस्तानी संगीत की सबसे प्रचलित ताल तीनताल में कितनी मात्राएँ होती हैं?
- A.10
- B.12
- C.16
- D.14
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. 16
व्याख्या
सही उत्तर C, 16 है। तीनताल सोलह मात्राओं की ताल है, जो चार-चार मात्राओं के चार बराबर विभागों में बँटी होती है। चक्र की पहली मात्रा सम कहलाती है और उस पर भार पड़ता है, तीसरा विभाग खाली से आरम्भ होता है, और आवर्तन पूरा होकर पुनः सम पर आता है। इसी सम-विभाजन के कारण अधिकांश ख्याल और वाद्य संगीत की गतें इसी ताल में निबद्ध होती हैं।
विकल्प A, 10, झपताल की मात्रा संख्या है, जिसका विभाजन दो, तीन, दो और तीन के असमान क्रम में होता है। विकल्प B, 12, एकताल तथा चौताल की संख्या है, जिनमें चौताल ध्रुपद के साथ पखावज पर बजती है। विकल्प D, 14, धमार ताल की संख्या है, जिसमें होली से जुड़ी धमार शैली गाई जाती है, और दीपचंदी की भी। चारों संख्याएँ वास्तविक तालों की हैं, इसलिए यह प्रश्न पूरी तालिका याद रखने वाले को ही अंक देता है।
हिंदुस्तानी गायन की सबसे प्राचीन जीवित शैली कौन-सी है?
- A.ख्याल
- B.ठुमरी
- C.ध्रुपद
- D.टप्पा
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. ध्रुपद
व्याख्या
सही उत्तर C, ध्रुपद है। ध्रुपद गम्भीर और भक्तिपरक शैली है, जो स्थायी, अंतरा, संचारी और आभोग इन चार भागों में गाई जाती है और जिसका आरम्भ लम्बे अनिबद्ध आलाप से होता है। इसके साथ तबला नहीं, पखावज बजता है। ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर इसके संरक्षण के लिए स्मरण किए जाते हैं और डागर परिवार ने इसे आधुनिक युग तक पहुँचाया।
विकल्प A, ख्याल, फारसी के 'कल्पना' अर्थ वाले शब्द से बना है, इसमें अलंकरण की छूट कहीं अधिक है और यह ध्रुपद से बहुत बाद में प्रमुख हुआ; इसे विलम्बित बड़ा ख्याल और फिर द्रुत छोटा ख्याल के रूप में गाया जाता है। विकल्प B, ठुमरी, उपशास्त्रीय और शृंगारिक शैली है, जिसके केंद्र लखनऊ और बनारस रहे तथा अवध के वाजिद अली शाह उसके प्रसिद्ध आश्रयदाता। विकल्प D, टप्पा, छोटी-छोटी तानों से भरी द्रुत शैली है, जो पंजाब के ऊँट चालकों के गीतों से विकसित हुई। चारों हिंदुस्तानी शैलियाँ हैं, पर सबसे प्राचीन ध्रुपद है।
पखावज परम्परागत रूप से किस शैली की संगत के लिए बजाया जाता है?
- A.ध्रुपद
- B.ठुमरी
- C.कृति
- D.ग़ज़ल
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. ध्रुपद
व्याख्या
सही उत्तर A, ध्रुपद है। पखावज लम्बा पीपानुमा अवनद्ध वाद्य है, जिसे आड़ा रखकर दोनों हाथों से बजाया जाता है; इसका स्वर तबले से अधिक गम्भीर होता है और यही गम्भीरता ध्रुपद की धीमी, ठहरी हुई गति के अनुकूल बैठती है। ध्रुपद के साथ प्रायः बारह मात्रा की चौताल बजाई जाती है और उससे जुड़ी धमार शैली में चौदह मात्रा की धमार ताल।
विकल्प B, ठुमरी, उपशास्त्रीय शैली है और उसके साथ तबला बजता है, जिसके साथ प्रायः सारंगी या हारमोनियम स्वर संगति करते हैं। विकल्प C, कृति, कर्नाटक पद्धति की रचना है, जहाँ मुख्य ताल वाद्य मृदंगम है और उसके साथ घटम, कंजीरा तथा मोरसिंग बजते हैं। विकल्प D, ग़ज़ल, उर्दू काव्य पर आधारित सुगम शास्त्रीय शैली है, जिसमें तबला और हारमोनियम प्रयुक्त होते हैं। विद्यार्थी प्रायः हर हिंदुस्तानी शैली के साथ तबला चुन लेते हैं, यह प्रश्न उसी आदत को पकड़ने के लिए बनता है।
कर्नाटक संगीत का पितामह किसे कहा जाता है?
- A.त्यागराज
- B.पुरंदर दास
- C.श्यामा शास्त्री
- D.मुत्तुस्वामी दीक्षितर
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. पुरंदर दास
व्याख्या
सही उत्तर B, पुरंदर दास है। कन्नड़ भक्ति परम्परा के संत रचनाकार पुरंदर दास को कर्नाटक संगीत का पितामह इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने इस संगीत के सीखने-सिखाने का ढाँचा गढ़ा। आज भी नया विद्यार्थी जिन क्रमिक अभ्यासों से आरम्भ करता है और पहले राग के रूप में मायामालवगौल का चुनाव, दोनों का श्रेय उन्हीं को दिया जाता है; उन्होंने बहुत बड़ी संख्या में भक्ति रचनाएँ भी कीं।
विकल्प A, C और D उन तीन रचनाकारों के नाम हैं जिन्हें एक साथ कर्नाटक त्रयी कहा जाता है और जो पुरंदर दास से लगभग दो शताब्दी बाद हुए; तीनों का जन्म तमिलनाडु के तिरुवारूर में हुआ था। त्यागराज पंचरत्न कृतियों तथा तिरुवैयारु के वार्षिक आराधना महोत्सव के लिए, मुत्तुस्वामी दीक्षितर नवग्रह कृतियों और 'गुरुगुह' मुद्रा के लिए, तथा श्यामा शास्त्री देवी कामाक्षी पर अपनी रचनाओं के लिए जाने जाते हैं। वे इस पद्धति के सबसे बड़े रचनाकार हैं, पर पितामह की उपाधि पुरंदर दास की है।
विष्णु नारायण भातखंडे हिंदुस्तानी संगीत में किस योगदान के लिए स्मरण किए जाते हैं?
- A.पंचरत्न कृतियों की रचना
- B.रागों को दस थाटों में वर्गीकृत करना
- C.पखावज का आविष्कार
- D.ग्वालियर घराने की स्थापना
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. रागों को दस थाटों में वर्गीकृत करना
व्याख्या
सही उत्तर B, रागों को दस थाटों में वर्गीकृत करना है। भातखंडे ने देश भर में घूमकर रचनाएँ एकत्र कीं और फिर हिंदुस्तानी संगीत के रागों को दस जनक थाटों में व्यवस्थित किया, जिनमें बिलावल, कल्याण, खमाज, भैरव, काफी, आसावरी, भैरवी और तोड़ी सम्मिलित हैं। उन्होंने स्वरलिपि की एक पद्धति भी दी और संगीत के व्यवहार पर विस्तार से लिखा, इसीलिए यह वर्गीकरण उन्हीं के नाम से जाना जाता है।
विकल्प A गलत है क्योंकि पंचरत्न कृतियाँ कर्नाटक परम्परा में त्यागराज ने रचीं। विकल्प C गलत है क्योंकि पखावज एक प्राचीन अवनद्ध वाद्य है, जिसका कोई नामित आविष्कारक नहीं, और निश्चय ही वह उन्नीसवीं शताब्दी का कोई विद्वान नहीं हो सकता। विकल्प D गलत है क्योंकि ग्वालियर सबसे पुराना ख्याल घराना है और उनसे बहुत पहले का है। भातखंडे के साथ उनके समकालीन विष्णु दिगम्बर पलुस्कर को भी याद रखें, जिन्होंने संगीत को दरबारी संरक्षण से निकालकर विद्यालयों और सार्वजनिक मंच तक पहुँचाया।
मियाँ की मल्हार और दरबारी कानड़ा रागों का श्रेय जिन्हें दिया जाता है, वे तानसेन किसके दरबार के संगीतकार थे?
- A.अकबर
- B.शाहजहाँ
- C.कृष्णदेवराय
- D.वाजिद अली शाह
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. अकबर
व्याख्या
सही उत्तर A, अकबर है। तानसेन अकबर के दरबार के नवरत्नों में गिने जाते थे और इससे पहले वे रीवा के शासक की सेवा में थे। वे स्वामी हरिदास के शिष्य थे और परम्परा उन्हें मियाँ की मल्हार, मियाँ की तोड़ी तथा दरबारी कानड़ा का श्रेय देती है। उनकी समाधि ग्वालियर में मुहम्मद ग़ौस के मकबरे के पास है, जहाँ प्रतिवर्ष तानसेन समारोह होता है।
विकल्प B, शाहजहाँ, ने दो पीढ़ी बाद शासन किया और पाठ्यक्रम में वे संगीत के नहीं, स्थापत्य के लिए स्मरण किए जाते हैं। विकल्प C, कृष्णदेवराय, सोलहवीं शताब्दी के आरम्भ के विजयनगर शासक थे और तेलुगु साहित्य के संरक्षक थे, तानसेन के नहीं। विकल्प D, वाजिद अली शाह, अवध के अंतिम नवाब थे और संगीत के सच्चे आश्रयदाता भी, पर लखनऊ में ठुमरी और कथक के, वह भी तानसेन के लगभग तीन शताब्दी बाद। चारों विकल्प वास्तविक कला-संरक्षक हैं, इसीलिए यह प्रश्न बनता है।
प्रसिद्ध गायक बड़े गुलाम अली खाँ हिंदुस्तानी संगीत के किस घराने से सम्बंधित थे?
- A.किराना
- B.पटियाला
- C.जयपुर-अतरौली
- D.मेवाती
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. पटियाला
व्याख्या
सही उत्तर B, पटियाला है। बड़े गुलाम अली खाँ पटियाला घराने के सबसे प्रसिद्ध गायक हैं। इस घराने की पहचान तेज और जटिल तानें, ख्याल के साथ ठुमरी का मुक्त प्रयोग तथा खुला और चमकदार स्वर है। भैरवी और पीलू जैसे रागों में गाई गई उनकी ठुमरियाँ आज भी इस शैली का आदर्श मानी जाती हैं।
विकल्प A, किराना, अब्दुल करीम खाँ का घराना है और आगे चलकर भीमसेन जोशी तथा गंगूबाई हंगल का; यह प्रत्येक स्वर के धीमे और विस्तृत निरूपण के लिए जाना जाता है। विकल्प C, जयपुर-अतरौली, को अल्लादिया खाँ ने गढ़ा और केसरबाई केरकर तथा मल्लिकार्जुन मंसूर ने आगे बढ़ाया; यह जटिल जोड़ रागों के लिए प्रसिद्ध है। विकल्प D, मेवाती, पंडित जसराज का घराना है। चारों एक ही युग के वास्तविक ख्याल घराने हैं, इसलिए गायक और घराने की जोड़ी सूची की तरह याद करनी पड़ती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
हिंदुस्तानी और कर्नाटक संगीत में मुख्य अंतर क्या है?
दोनों का आधार राग और ताल का एक ही सिद्धांत है, परन्तु हिंदुस्तानी संगीत अपना अधिकांश समय लम्बे आलाप और सुधारात्मक विस्तार को देता है तथा घरानों में संगठित है, जबकि कर्नाटक संगीत कृति जैसी निश्चित रचनाओं पर केंद्रित रहता है और रचनाकार के साहित्य को प्रमुखता देता है। हिंदुस्तानी में तबला, सारंगी और हारमोनियम संगत करते हैं, कर्नाटक में मृदंगम और वायलिन।
थाट और मेलकर्ता राग कितने होते हैं?
हिंदुस्तानी संगीत में विष्णु नारायण भातखंडे के वर्गीकरण के अनुसार दस थाट माने जाते हैं, जबकि कर्नाटक संगीत में वेंकटमखी की पद्धति के अनुसार बहत्तर मेलकर्ता राग होते हैं। किसी मेलकर्ता से निकले राग जन्य राग कहलाते हैं। परीक्षा में इन दोनों संख्याओं को आपस में बदलकर पूछा जाता है।
हिंदुस्तानी गायन की सबसे प्राचीन शैली कौन-सी है?
ध्रुपद। यह स्थायी, अंतरा, संचारी और आभोग इन चार भागों में गाई जाती है, इसके साथ तबला नहीं बल्कि पखावज बजता है, और ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर ने इसे दरबारी संरक्षण दिया था। आधुनिक समय में डागर परिवार इसकी सबसे प्रसिद्ध परम्परा है।
तानसेन कौन थे और उनसे प्रश्न क्यों पूछे जाते हैं?
तानसेन अकबर के दरबार के गायक और उसके नौ रत्नों अर्थात् नवरत्नों में से एक थे, तथा स्वामी हरिदास के शिष्य थे। परम्परा उन्हें मियाँ की मल्हार, मियाँ की तोड़ी और दरबारी कानड़ा रागों का श्रेय देती है। उनकी समाधि ग्वालियर में है, जहाँ उनकी स्मृति में तानसेन समारोह आयोजित होता है।
राग में वादी और संवादी स्वर का क्या अर्थ है?
वादी राग का सबसे प्रमुख स्वर है, जिस पर गायक बार-बार लौटता और ठहरता है, और संवादी दूसरा प्रमुख स्वर है जो प्रायः वादी से चौथे या पाँचवें स्थान पर होता है। जो स्वर केवल अनुमत हैं वे अनुवादी कहलाते हैं और राग में वर्जित स्वर विवादी कहलाता है।
स्रोत
- भारतीय कला का परिचय, भाग एक (कक्षा ग्यारह, ललित कला) — एनसीईआरटी
- संगीत नाटक अकादमी, संगीत, नृत्य एवं नाट्य की राष्ट्रीय अकादमी — संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार
- भारत की जीवंत शिल्प परम्पराएँ तथा सांस्कृतिक विरासत अध्याय (कक्षा ग्यारह) — एनसीईआरटी


