भारत के हस्तशिल्प और जीआई टैग: शिल्प, अधिनियम और प्रश्न
भारतीय हस्तशिल्प और जीआई टैग पर परीक्षोपयोगी नोट्स: राज्यवार शिल्प, बुनाई, धातुशिल्प, लोक चित्रकला, जीआई अधिनियम 1999 और चेन्नई की जीआई रजिस्ट्री।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 5 मिनट

भारतीय हस्तशिल्प एक जीवित परंपरा है। खुर्जा का कुम्हार, पाटन का बुनकर, बीदर का धातुशिल्पी और मिथिला की चित्रकार आज भी वही हाथ का काम करते हैं जो उनके परिवार सदियों से करते आए हैं। अब कानून इनमें से कई वस्तुओं को उनके मूल स्थान के नाम से संरक्षण देता है। यही संरक्षण भौगोलिक संकेतक या जीआई टैग कहलाता है। परीक्षक दोनों विषयों को एक साथ पूछते हैं, क्योंकि इस क्षेत्र का लगभग हर प्रश्न एक ही रूप में आता है कि कौन सा शिल्प किस राज्य का है और किस वस्तु को कौन सा टैग मिला है।
भौगोलिक संकेतक क्या है
भौगोलिक संकेतक वह चिह्न है जो उन वस्तुओं पर लगाया जाता है जो किसी निश्चित स्थान से आती हैं और अपनी गुणवत्ता या प्रतिष्ठा उस स्थान से पाती हैं। दार्जिलिंग चाय का स्वाद दार्जिलिंग की ऊँचाई और मिट्टी के कारण है और कश्मीरी केसर की तीव्रता पंपोर की करेवा मिट्टी के कारण। जीआई एक सामूहिक अधिकार है। यह उस क्षेत्र के उत्पादकों के समूह का होता है, किसी एक कंपनी का नहीं, और ट्रेडमार्क की तरह इसे बेचा या हस्तांतरित नहीं किया जा सकता। पंजीकरण के बाद क्षेत्र के बाहर का कोई व्यक्ति उस नाम से वैसी वस्तु नहीं बेच सकता।
भारत में जीआई का संरक्षण वस्तुओं का भौगोलिक संकेतक (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम 1999 के अंतर्गत होता है, जो 15 सितंबर 2003 से लागू हुआ। इसका दायित्व विश्व व्यापार संगठन के ट्रिप्स समझौते से आया, जिसे भारत ने 1995 में स्वीकार किया। इस अधिनियम का प्रशासन पेटेंट, डिजाइन और ट्रेड मार्क महानियंत्रक करता है और प्रत्येक आवेदन चेन्नई स्थित भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री में दाखिल होता है, जो वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग के अधीन कार्य करती है।
जीआई अधिनियम एक तालिका में
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| कानून | वस्तुओं का भौगोलिक संकेतक (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम 1999 |
| लागू | 15 सितंबर 2003 |
| रजिस्ट्री | भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री, चेन्नई |
| मंत्रालय | वाणिज्य और उद्योग, डीपीआईआईटी के माध्यम से |
| पंजीकरण की अवधि | दस वर्ष, कितनी भी बार नवीकरणीय |
| भारत का पहला जीआई | दार्जिलिंग चाय |
| कौन धारक हो सकता है | उत्पादकों का प्रतिनिधित्व करने वाला संगठन, संघ या प्राधिकरण; व्यक्तिगत उत्पादक अधिकृत उपयोगकर्ता के रूप में दर्ज होते हैं |
| वस्तुओं की श्रेणियाँ | कृषि, प्राकृतिक, निर्मित, खाद्य और हस्तशिल्प वस्तुएँ |
शिल्प और उनके राज्य
| शिल्प | राज्य या स्थान | क्या है |
|---|---|---|
| बीदरी कला | बीदर, कर्नाटक | जस्ता और ताँबे की मिश्रधातु पर चाँदी के तार की जड़ाई, फिर काली रँगाई |
| पश्मीना और कानी शॉल | कश्मीर | लद्दाख की चांगथांगी बकरी के मुलायम ऊन से बुनी शॉल |
| पेपर माशे और अखरोट की नक्काशी | श्रीनगर, कश्मीर | कागज की लुगदी पर चित्रकारी और अखरोट की लकड़ी पर गहरी नक्काशी |
| चन्नपटना के खिलौने | कर्नाटक | वनस्पति रंगों और लाख से रँगे लकड़ी के खिलौने |
| कोंडापल्ली और एटिकोप्पका खिलौने | आंध्र प्रदेश | खराद पर बनाए मुलायम लकड़ी के लाख चढ़े खिलौने |
| ढोकरा धातु ढलाई | छत्तीसगढ़, झारखंड और पश्चिम बंगाल | मोम खोकर की जाने वाली खोखली ढलाई की आदिवासी मूर्तियाँ |
| अरनमुला कण्णाडी | केरल | धातु मिश्रण का दर्पण जो सतह से ही प्रतिबिंब देता है |
| थेवा कला | प्रतापगढ़, राजस्थान | रंगीन काँच पर सोने के पत्तर का काम |
| ब्लू पॉटरी | जयपुर, राजस्थान | क्वार्ट्ज आधारित नीली चमकदार मिट्टी के बर्तन |
| खुर्जा और निजामाबाद मृद्भांड | उत्तर प्रदेश | चित्रित चमकदार बर्तन और चाँदी से घिसे काली मिट्टी के बर्तन |
| लोंगपी मृद्भांड | मणिपुर | चाक के बिना गढ़े काले पत्थर के बर्तन |
| काँसे के बर्तन | सर्थेबारी, असम | काँसे की पारंपरिक थाली और कटोरे |
| रोगन कला | निरोणा, कच्छ, गुजरात | अरंडी के तेल और रंग के लेप से कपड़े पर सलाई से चित्रण |
| संगमरमर जड़ाई या पच्चीकारी | आगरा, उत्तर प्रदेश | सफेद संगमरमर में अर्ध कीमती पत्थरों की जड़ाई |
| मीनाकारी और कुंदन | जयपुर, राजस्थान | सोने पर मीनाकारी और रत्नों की जड़ाई |
बुनाई और छपाई का कपड़ा
- गुजरात के पाटन की पटोला रेशमी साड़ी दोहरे इकत में बुनी जाती है, जिसमें ताना और बाना दोनों बाँधकर रंगे जाते हैं, इसलिए उसका कोई उल्टा पक्ष नहीं होता।
- तेलंगाना का पोचमपल्ली इकत, ओडिशा का संबलपुरी बंधा और बिहार का भागलपुरी रेशम इकत और तसर के अन्य बड़े केंद्र हैं।
- वाराणसी की बनारसी ब्रोकेड में सोने चाँदी की जरी लगती है; चंदेरी और महेश्वरी साड़ियाँ मध्य प्रदेश से और कोटा डोरिया राजस्थान से आती है।
- तमिलनाडु का कांचीपुरम रेशम, कर्नाटक का मैसूर रेशम, असम का प्राकृतिक सुनहरा मूगा रेशम और पश्चिम बंगाल के बिष्णुपुर की बालूचरी साड़ी, जिसमें पौराणिक दृश्य बुने जाते हैं।
- गुजरात के कच्छ और जामनगर तथा राजस्थान की बंधनी अर्थात बाँध कर रँगाई, और कच्छ की अजरख छपाई जो प्राकृतिक नील और मजीठ से होती है।
- लखनऊ की चिकनकारी और जरदोजी, पंजाब की फुलकारी, कर्नाटक की कसूती, बंगाल की कांथा और गुजरात की कच्छी कढ़ाई सबसे अधिक पूछी जाने वाली कढ़ाई परंपराएँ हैं।
- आंध्र प्रदेश के मसूलीपट्टनम ने यूरोप को छपे सूती कपड़े दिए जिन्हें चिंट्ज कहा गया, और श्रीकालहस्ती के साथ वही नगर आज भी बाँस की कलम से बनने वाली कलमकारी का घर है।
लोक और आदिवासी चित्रकला
- बिहार की मधुबनी या मिथिला चित्रकला, प्राकृतिक रंगों में दोहरी रेखाओं से बनी और कहीं खाली जगह न छोड़ने वाली।
- महाराष्ट्र की वारली चित्रकला, मिट्टी की दीवार पर चावल के घोल से बने वृत्त, त्रिभुज और रेखाओं के आकार।
- ओडिशा और बंगाल की पटचित्र, तैयार किए गए कपड़े पर जगन्नाथ विषय के साथ।
- राजस्थान की फड़, पाबूजी की गाथा का लंबा पट, और बंगाल की कालीघाट चित्रकला।
- मध्य प्रदेश की गोंड चित्रकला, तेलंगाना के चेरियल पट और गुजरात की माता नी पछेड़ी।
शिल्पकार के पीछे कौन
हस्तशिल्प वस्त्र मंत्रालय के अधीन आता है, जिसका विकास आयुक्त हस्तशिल्प कार्यालय योजनाएँ, विपणन आयोजन और एम्पोरियम चलाता है। किसी दक्ष शिल्पी के लिए सर्वोच्च सम्मान शिल्प गुरु पुरस्कार है और प्रत्येक वर्ष व्यक्तिगत शिल्पकारों को राष्ट्रीय पुरस्कार दिए जाते हैं। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस 7 अगस्त को मनाया जाता है, वही तिथि जब 1905 में स्वदेशी आंदोलन आरंभ हुआ था, और 1956 में स्थापित खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग, जिसका मुख्यालय मुंबई में है, ग्रामीण उद्योग को सहारा देता है।
शिल्प से आगे के जीआई
- दार्जिलिंग चाय, भारत का पहला जीआई, उसके बाद हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा चाय और नीलगिरि चाय।
- पंपोर का कश्मीरी केसर, कुर्ग की हरी इलायची और नागालैंड की नागा मिर्चा।
- महाराष्ट्र का अल्फांसो आम, बिहार की शाही लीची, नागपुर का संतरा और ओडिशा की कंधमाल हल्दी।
- पश्चिम बंगाल की बांग्लार रसगोल्ला, जो 2017 में पंजीकृत हुई, और ओडिशा रसगोला, जो 2023 में पंजीकृत हुई, जिससे स्पष्ट होता है कि एक ही नाम की वस्तुओं के लिए दो राज्य अलग अलग टैग रख सकते हैं।
परीक्षा की दृष्टि से
परीक्षाओं में यह विषय चार रूपों में आता है। पहला, शिल्प और राज्य का मिलान, जिसमें बीदरी, पटोला, थेवा, ढोकरा, अरनमुला कण्णाडी, रोगन कला और लोंगपी मृद्भांड सर्वाधिक पूछे जाते हैं और जाल पड़ोसी राज्य का होता है, जैसे बीदर को कर्नाटक के बजाय तेलंगाना समझ लेना। दूसरा, जीआई अधिनियम, जिसमें वर्ष 1999, 2003 से लागू होना, चेन्नई की रजिस्ट्री और दस वर्ष की अवधि पूछी जाती है। तीसरा, भारत का पहला जीआई, जिसका उत्तर दार्जिलिंग चाय है और मैसूर रेशम या पश्मीना सामान्य विकल्प जाल हैं। चौथा, वस्त्र और चित्रकला की जोड़ियाँ, जिनमें पोचमपल्ली, संबलपुरी और पटोला इकत आपस में मिला दिए जाते हैं। प्रश्न में पहला, केवल और नहीं जैसे शब्द ध्यान से पढ़ें।
महत्वपूर्ण तथ्य
| जीआई अधिनियम | वस्तुओं का भौगोलिक संकेतक (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम 1999 |
|---|---|
| अधिनियम लागू | 15 सितंबर 2003 |
| जीआई रजिस्ट्री | चेन्नई |
| प्रशासनिक प्राधिकरण | पेटेंट, डिजाइन और ट्रेड मार्क महानियंत्रक, डीपीआईआईटी के अधीन |
| जीआई की अवधि | दस वर्ष, नवीकरणीय |
| भारत का पहला जीआई | दार्जिलिंग चाय |
| अंतरराष्ट्रीय आधार | विश्व व्यापार संगठन का ट्रिप्स समझौता, भारत के लिए 1995 से |
| बीदरी कला | बीदर, कर्नाटक |
| पटोला दोहरा इकत | पाटन, गुजरात |
| अरनमुला धातु दर्पण | अरनमुला, केरल |
| हस्तशिल्प का नोडल मंत्रालय | वस्त्र मंत्रालय, विकास आयुक्त हस्तशिल्प कार्यालय |
| राष्ट्रीय हथकरघा दिवस | 7 अगस्त |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
भारत में भौगोलिक संकेतक के रूप में पंजीकृत होने वाला पहला उत्पाद कौन था?
- A.मैसूर रेशम
- B.दार्जिलिंग चाय
- C.पश्मीना शॉल
- D.बनारसी ब्रोकेड
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. दार्जिलिंग चाय
व्याख्या
सही उत्तर B, दार्जिलिंग चाय है। वस्तुओं का भौगोलिक संकेतक (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम 1999 के 15 सितंबर 2003 से लागू होने के बाद दार्जिलिंग की पहाड़ियों की चाय रजिस्टर में दर्ज होने वाली पहली भारतीय वस्तु बनी और उसका लोगो आज भी विदेशों में सबसे प्रसिद्ध भारतीय जीआई है। विकल्प A गलत है क्योंकि कर्नाटक का मैसूर रेशम बाद में पंजीकृत हुआ, हालाँकि आरंभिक वस्तुओं में होने के कारण उसे जाल के रूप में रखा जाता है। विकल्प C गलत है क्योंकि चांगथांगी बकरी के ऊन से बनी कश्मीरी पश्मीना को संरक्षण दार्जिलिंग चाय के कई वर्ष बाद मिला। विकल्प D गलत है क्योंकि उत्तर प्रदेश की बनारसी ब्रोकेड और साड़ियाँ दशक के उत्तरार्ध में, मशीनी नकल के विरुद्ध लंबे संघर्ष के बाद पंजीकृत हुईं। जोड़ी याद रखें कि अधिनियम 1999 और पहला जीआई दार्जिलिंग चाय।
वस्तुओं का भौगोलिक संकेतक (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम किस वर्ष बनाया गया था?
- A.1970
- B.1995
- C.1999
- D.2005
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. 1999
व्याख्या
सही उत्तर C, 1999 है। विश्व व्यापार संगठन के ट्रिप्स समझौते के अंतर्गत अपने दायित्व को पूरा करने के लिए संसद ने 1999 में वस्तुओं का भौगोलिक संकेतक (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम पारित किया और इसे 15 सितंबर 2003 से लागू किया गया। विकल्प A गलत है क्योंकि 1970 पेटेंट अधिनियम का वर्ष है, जो बौद्धिक संपदा की एक भिन्न शाखा है। विकल्प B गलत है क्योंकि 1995 में विश्व व्यापार संगठन बना और ट्रिप्स भारत पर बाध्यकारी हुआ, जिससे कानून की आवश्यकता उत्पन्न हुई, परंतु वह अधिनियम का वर्ष नहीं है। विकल्प D गलत है क्योंकि 2005 में कोई जीआई कानून नहीं बना, उस वर्ष पेटेंट अधिनियम में संशोधन हुआ था। अभ्यर्थी तीन वर्ष अलग अलग रखें, ट्रिप्स 1995, अधिनियम 1999 और लागू होना 2003।
भारत की भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री किस नगर में स्थित है?
- A.मुंबई
- B.नई दिल्ली
- C.कोलकाता
- D.चेन्नई
उत्तर देखें
सही उत्तर: D. चेन्नई
व्याख्या
सही उत्तर D, चेन्नई है। भारत में प्रत्येक जीआई आवेदन चेन्नई की भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री में दाखिल होता है, जो उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग के अंतर्गत पेटेंट, डिजाइन और ट्रेड मार्क महानियंत्रक के अधीन कार्य करती है। विकल्प A गलत है क्योंकि मुंबई में पेटेंट कार्यालय की एक शाखा है, जीआई रजिस्ट्री नहीं। विकल्प B गलत है क्योंकि नई दिल्ली में पेटेंट और ट्रेड मार्क की शाखा तथा मंत्रालय स्वयं है, परंतु जीआई रजिस्ट्री जानबूझकर चेन्नई में रखी गई। विकल्प C गलत है क्योंकि कोलकाता में भारतीय पेटेंट कार्यालय का मुख्य कार्यालय है, जिसे अभ्यर्थी प्रायः जीआई रजिस्ट्री समझ लेते हैं। इसे याद रखने का सरल तरीका है कि भारतीय पेटेंट कार्यालय का मुख्यालय कोलकाता में है और भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री चेन्नई में, तथा मुंबई, दिल्ली और चेन्नई में पेटेंट की शाखाएँ हैं। यही अंतर प्रश्न का आधार बनता है।
बीदरी कला, जिसमें काली मिश्रधातु में चाँदी का तार जड़ा जाता है, किस राज्य की है?
- A.तेलंगाना
- B.कर्नाटक
- C.महाराष्ट्र
- D.केरल
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. कर्नाटक
व्याख्या
सही उत्तर B, कर्नाटक है। बीदरी कला का नाम उत्तरी कर्नाटक के नगर बीदर से आया है, जहाँ शिल्पी जस्ता और ताँबे की मिश्रधातु ढालते हैं, उस पर नक्काशी करते हैं, शुद्ध चाँदी का तार जड़ते हैं और फिर विशेष मिट्टी से सतह रगड़ते हैं, जिससे मिश्रधातु गहरी काली हो जाती है और चाँदी चमकती रहती है। विकल्प A गलत है क्योंकि तेलंगाना, जो पड़ोसी है और चेरियल पट, निर्मल चित्रकला तथा पोचमपल्ली इकत का घर है, बीदरी का घर नहीं है। विकल्प C गलत है क्योंकि महाराष्ट्र वारली चित्रकला, पैठणी साड़ी और कोल्हापुरी चप्पल के लिए जाना जाता है। विकल्प D गलत है क्योंकि केरल अरनमुला धातु दर्पण, कॉयर उत्पाद और नेट्टूर पेट्टी के लिए प्रसिद्ध है। इस प्रश्न का जाल सदैव पड़ोसी दक्कनी राज्य होता है, इसलिए बीदर शब्द को कर्नाटक से जोड़कर याद रखें।
पटोला साड़ी, जो दोहरे इकत में बुनी जाती है और जिसका डिजाइन दोनों ओर समान दिखता है, किस स्थान का हस्तशिल्प है?
- A.गुजरात का पाटन
- B.तेलंगाना का पोचमपल्ली
- C.मध्य प्रदेश का चंदेरी
- D.राजस्थान का कोटा
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. गुजरात का पाटन
व्याख्या
सही उत्तर A, गुजरात का पाटन है। पटोला बुनाई में ताना और बाना दोनों के धागे बुनाई से पहले बाँधकर रंगे जाते हैं, इसलिए आकृति धागों से ही बनती है और दोनों ओर से समान दिखती है; उत्तरी गुजरात का पाटन इसका ऐतिहासिक केंद्र है और इस शिल्प को जीआई प्राप्त है। विकल्प B गलत है क्योंकि तेलंगाना का पोचमपल्ली भी इकत बनाता है, परंतु वह भिन्न और सामान्यतः एकल इकत होता है, जिसे पोचमपल्ली इकत या तेलिया रुमाल कहा जाता है। विकल्प C गलत है क्योंकि मध्य प्रदेश का चंदेरी जरी किनारी वाली हल्की सूती रेशमी साड़ी बनाता है, इकत नहीं। विकल्प D गलत है क्योंकि राजस्थान की कोटा डोरिया बारीक चौकोर बुनाई वाली सूती और रेशमी साड़ी है। इकत और उसके केंद्र लगभग हर वर्ष पूछे जाते हैं।
निम्नलिखित में से कौन सा स्थान चिंट्ज कपड़े के लिए जाना जाता है?
- A.बुरहानपुर
- B.मसूलीपट्टनम
- C.कालीकट
- D.ढाका
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. मसूलीपट्टनम
व्याख्या
सही उत्तर B, मसूलीपट्टनम है। तटीय आंध्र प्रदेश का बंदरगाह नगर मसूलीपट्टनम उस चित्रित और ठप्पे से छपे सूती कपड़े का बड़ा केंद्र था जिसे यूरोपीय व्यापारी चिंट्ज कहते थे, और वही नगर श्रीकालहस्ती के साथ आज भी कलमकारी का घर है। विकल्प A गलत है क्योंकि मध्य प्रदेश का बुरहानपुर बारीक मलमल और जरी बुनाई के लिए जाना जाता था, चिंट्ज के लिए नहीं। विकल्प C गलत है क्योंकि मलाबार तट के कालीकट से कैलिको नाम आया, जो सादी बुनाई का सूती कपड़ा है और परीक्षा में चिंट्ज के साथ सर्वाधिक भ्रम पैदा करता है। विकल्प D गलत है क्योंकि ढाका सबसे बारीक मलमल के लिए प्रसिद्ध था, जिसे मलमल और आबरवाँ कहा जाता था। तीन नाम अलग रखें, चिंट्ज मसूलीपट्टनम से, कैलिको कालीकट से और मलमल ढाका से।
वनस्पति रंगों और लाख से रँगे लकड़ी के खिलौनों के लिए प्रसिद्ध चन्नपटना किस राज्य में है?
- A.आंध्र प्रदेश
- B.तमिलनाडु
- C.कर्नाटक
- D.ओडिशा
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. कर्नाटक
व्याख्या
सही उत्तर C, कर्नाटक है। बेंगलुरु और मैसूरु के बीच स्थित चन्नपटना को भारत का खिलौना नगर कहा जाता है; वहाँ के शिल्पी मुलायम हाथी दाँत जैसी लकड़ी को खराद पर गढ़कर लाख और वनस्पति रंगों से सजाते हैं और इन खिलौनों को जीआई प्राप्त है। विकल्प A गलत है क्योंकि आंध्र प्रदेश के अपने दो खिलौना केंद्र हैं, विजयवाड़ा के पास कोंडापल्ली और विशाखापत्तनम जिले का एटिकोप्पका, जो अलग जीआई हैं। विकल्प B गलत है क्योंकि तमिलनाडु तंजावुर की हिलती गुड़िया और काँसे की मूर्तियों के लिए जाना जाता है, खराद के लाख वाले खिलौनों के लिए नहीं। विकल्प D गलत है क्योंकि ओडिशा पटचित्र, संबलपुरी बंधा वस्त्र और कटक की चाँदी की तारकशी के लिए प्रसिद्ध है। खिलौनों के प्रश्न में चन्नपटना और कोंडापल्ली मिला दिए जाते हैं, इसलिए चन्नपटना कर्नाटक और कोंडापल्ली आंध्र प्रदेश याद रखें।
मधुबनी चित्रकला, जिसमें दोहरी रेखाएँ होती हैं और कोई स्थान खाली नहीं छोड़ा जाता, किस राज्य की लोक कला है?
- A.बिहार
- B.झारखंड
- C.पश्चिम बंगाल
- D.ओडिशा
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. बिहार
व्याख्या
सही उत्तर A, बिहार है। मधुबनी, जिसे मिथिला चित्रकला भी कहा जाता है, उत्तरी बिहार के मिथिला क्षेत्र से आती है, जहाँ स्त्रियाँ विवाह कक्ष की दीवारों और फर्श पर प्राकृतिक रंगों से देवी देवता, मछली, बाँस तथा सूर्य और चंद्र बनाती थीं और प्रत्येक रिक्त स्थान को आकृतियों से भर देती थीं। विकल्प B गलत है क्योंकि झारखंड की सर्वाधिक प्रसिद्ध आदिवासी कला सोहराई और खोवर भित्ति चित्रकला है, जो फसल और विवाह के समय बनाई जाती है। विकल्प C गलत है क्योंकि पश्चिम बंगाल कालीघाट चित्रकला, मेदिनीपुर के पटचित्र और कांथा कढ़ाई का घर है। विकल्प D गलत है क्योंकि ओडिशा जगन्नाथ विषय की अपनी पटचित्र और ताड़पत्र उत्कीर्णन के लिए जाना जाता है। लोक चित्रकला मिलान के रूप में पूछी जाती है, इसलिए मधुबनी को बिहार और वारली को महाराष्ट्र से जोड़ें।
अपने प्राकृतिक सुनहरे रंग के लिए प्रसिद्ध मूगा रेशम किस राज्य का भौगोलिक संकेतक है?
- A.पश्चिम बंगाल
- B.असम
- C.मणिपुर
- D.मेघालय
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. असम
व्याख्या
सही उत्तर B, असम है। मूगा कीट ब्रह्मपुत्र घाटी में सोम और सोआलू वृक्षों पर पाला जाता है और उसके धागे में प्राकृतिक सुनहरी चमक होती है जो धोने पर और बढ़ती है; इससे मेखला चादर बनती है और असम के नाम से इसे जीआई प्राप्त है। विकल्प A गलत है क्योंकि पश्चिम बंगाल बालूचरी और मुर्शिदाबाद रेशम से जुड़ा है, जो शहतूती रेशम हैं, मूगा नहीं। विकल्प C गलत है क्योंकि मणिपुर अपनी लोंगपी काली मिट्टी के बर्तन और मोइरांग फी वस्त्र के लिए जाना जाता है। विकल्प D गलत है क्योंकि मेघालय एरी रेशम और बाँस शिल्प के लिए प्रसिद्ध है; एरी, जिसे अहिंसा रेशम कहते हैं, असम में भी बनता है परंतु वह मटमैला सफेद होता है, सुनहरा नहीं। असम की तीन रेशम याद रखें, मूगा सुनहरा, एरी गर्म और पाट सफेद शहतूती।
भारत में पंजीकृत भौगोलिक संकेतक नवीकरण से पहले कितने समय तक वैध रहता है?
- A.पाँच वर्ष
- B.सात वर्ष
- C.दस वर्ष
- D.बीस वर्ष
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. दस वर्ष
व्याख्या
सही उत्तर C, दस वर्ष है। अधिनियम 1999 के अंतर्गत पंजीकृत भौगोलिक संकेतक और अधिकृत उपयोगकर्ता की प्रविष्टि दस वर्ष तक वैध रहती है और उसे बिना किसी सीमा के आगे दस दस वर्ष के लिए नवीकृत किया जा सकता है, इसलिए समय पर आवेदन होने पर जीआई सदा बना रह सकता है। विकल्प A गलत है क्योंकि अधिनियम में जीआई के लिए पाँच वर्ष की कोई अवधि नहीं है। विकल्प B गलत है क्योंकि भारतीय कानून में सात वर्ष किसी बौद्धिक संपदा अधिकार की अवधि नहीं है और यह विशुद्ध जाल है। विकल्प D गलत है क्योंकि बीस वर्ष भारत में पेटेंट अधिनियम 1970 के अंतर्गत पेटेंट की अवधि है, जो आवेदन की तिथि से गिनी जाती है और उसका नवीकरण नहीं होता। परीक्षाएँ पेटेंट और जीआई की अवधि एक ही विकल्प समूह में रखना पसंद करती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
जीआई टैग सरल शब्दों में क्या है?
यह किसी उत्पाद पर लगा कानूनी चिह्न है जो बताता है कि वह वस्तु किसी विशेष स्थान से आती है और अपनी विशेष गुणवत्ता या प्रतिष्ठा उसी स्थान से पाती है। उस नाम का उपयोग केवल उस क्षेत्र के उत्पादक कर सकते हैं, इसलिए नीलगिरि में उगी चाय दार्जिलिंग चाय के नाम से नहीं बेची जा सकती।
भारत में पहला जीआई टैग किसे मिला था?
दार्जिलिंग चाय को। अधिनियम 2003 में लागू होने के बाद वस्तुओं का भौगोलिक संकेतक (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम 1999 के अंतर्गत पंजीकृत होने वाली यह पहली वस्तु थी।
भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री कहाँ स्थित है?
तमिलनाडु के चेन्नई में। यह पेटेंट, डिजाइन और ट्रेड मार्क महानियंत्रक के अधीन कार्य करती है, जो वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग के अंतर्गत आता है।
जीआई पंजीकरण कितने वर्ष तक वैध रहता है?
पंजीकरण की तिथि से दस वर्ष तक। इसे बार बार दस दस वर्ष के लिए नवीकृत किया जा सकता है, इसलिए समय पर नवीकरण होने तक कोई जीआई समाप्त नहीं होता।
बीदरी कला किस राज्य की प्रसिद्ध है?
कर्नाटक की। यह शिल्प उत्तरी कर्नाटक के बीदर नगर के नाम पर है, जहाँ शिल्पी जस्ता और ताँबे की काली मिश्रधातु में चाँदी का तार जड़ते हैं।
जीआई और ट्रेडमार्क में क्या अंतर है?
ट्रेडमार्क किसी एक उद्यम का होता है और उसे बेचा या लाइसेंस पर दिया जा सकता है। जीआई किसी क्षेत्र के सभी उत्पादकों का सामूहिक अधिकार है, उसे हस्तांतरित नहीं किया जा सकता, और वह किसी एक निर्माता के बजाय उत्पत्ति स्थान की पहचान कराता है।
स्रोत
- वस्तुओं का भौगोलिक संकेतक (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम, 1999 — इंडिया कोड, भारत सरकार
- भौगोलिक संकेतक — पेटेंट, डिजाइन और ट्रेड मार्क महानियंत्रक कार्यालय
- विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) कार्यालय — वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार





