संगीत रत्नाकर, जिसे हिंदुस्तानी और कर्नाटक दोनों परम्पराएँ मान्यता देती हैं, किसने लिखा था?
- A.मतंग
- B.शार्ङ्गदेव
- C.भरत मुनि
- D.वेंकटमखी
सही उत्तर
B. शार्ङ्गदेव
व्याख्या
सही उत्तर B, शार्ङ्गदेव है। शार्ङ्गदेव ने तेरहवीं शताब्दी में दक्खन के देवगिरि स्थित यादव दरबार से जुड़े रहते हुए संगीत रत्नाकर की रचना की। सात अध्यायों के कारण इसे सप्ताध्यायी भी कहा जाता है, और चूँकि यह उत्तर तथा दक्षिण की परम्पराओं के अलग होने से पहले लिखा गया, दोनों आज भी इसे प्रमाण मानती हैं।
विकल्प A, मतंग, ने बृहद्देशी लिखी, जो 'राग' शब्द के आधुनिक अर्थ में प्रयोग के लिए स्मरण की जाती है, संगीत रत्नाकर के लिए नहीं। विकल्प C, भरत मुनि, नाट्यशास्त्र के रचयिता हैं, जिसमें स्वरों और श्रुतियों का प्राचीनतम व्यवस्थित वर्णन मिलता है। विकल्प D, वेंकटमखी, सत्रहवीं शताब्दी के दक्षिण भारतीय विद्वान थे, जिनकी चतुर्दण्डी प्रकाशिका ने बहत्तर मेलकर्ता रागों की पद्धति दी। चारों ग्रंथकार हैं, इसीलिए इन्हें साथ रखा जाता है।
पूरा लेख पढ़ें: भारतीय शास्त्रीय संगीत: हिंदुस्तानी, कर्नाटक, राग और ताल
अभ्यास प्रश्न
सभी देखेंकिस वेद को भारतीय शास्त्रीय संगीत का स्रोत माना जाता है?
- A.ऋग्वेद
- B.यजुर्वेद
- C.सामवेद
- D.अथर्ववेद
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. सामवेद
व्याख्या
सही उत्तर C, सामवेद है। सामवेद गान का वेद है। उसके अधिकांश मंत्र ऋग्वेद से लिए गए हैं, परन्तु वे पाठ के लिए नहीं बल्कि गाने के लिए संकलित किए गए हैं, और इस गायन को सामगान कहा जाता है। संगीत पर लिखा हर परवर्ती भारतीय ग्रंथ परम्परा को इसी वेद तक ले जाता है, इसीलिए यह जोड़ी बार-बार पूछी जाती है।
विकल्प A, ऋग्वेद, सबसे प्राचीन वेद है और देवताओं की स्तुति के सूक्तों का संग्रह है; वह सामवेद को शब्द देता है, पर स्वयं संगीत का वेद नहीं है। विकल्प B, यजुर्वेद, यज्ञ की विधियों का वेद है और पुरोहित के लिए गद्य मंत्र देता है। विकल्प D, अथर्ववेद, में दैनिक जीवन के अभिचार, औषधि और कुछ दार्शनिक सूक्त संकलित हैं। चारों में केवल सामवेद ही राग-रचना के आधार पर संगठित है, इसलिए वही भारतीय शास्त्रीय संगीत का स्रोत कहलाता है।
कर्नाटक संगीत पद्धति में मेलकर्ता रागों की संख्या कितनी है?
- A.10
- B.22
- C.32
- D.72
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सही उत्तर: D. 72
व्याख्या
सही उत्तर D, 72 है। मेलकर्ता राग कर्नाटक संगीत के जनक राग हैं और इनमें से प्रत्येक में आरोह तथा अवरोह दोनों में सातों स्वर प्रयुक्त होते हैं। इनकी संख्या बहत्तर निश्चित करने वाली पद्धति वेंकटमखी की चतुर्दण्डी प्रकाशिका से आती है, और शेष सभी कर्नाटक राग इन्हीं में से किसी के जन्य राग माने जाते हैं।
विकल्प A, 10, उन थाटों की संख्या है जिनमें विष्णु नारायण भातखंडे ने हिंदुस्तानी रागों को बाँटा, अर्थात् वह दूसरी पद्धति की संख्या है। विकल्प B, 22, सप्तक की उन श्रुतियों की संख्या है जो प्राचीन सिद्धांत में मानी गई हैं। विकल्प C, 32, इस वर्गीकरण में किसी भी वस्तु से मेल नहीं खाता और केवल भ्रम के लिए रखा गया है। परीक्षक प्रायः थाट और मेलकर्ता की संख्याएँ आपस में बदल देता है, इसलिए दोनों को एक साथ याद रखें: उत्तर में दस थाट, दक्षिण में बहत्तर मेलकर्ता।
हिंदुस्तानी संगीत की सबसे प्रचलित ताल तीनताल में कितनी मात्राएँ होती हैं?
- A.10
- B.12
- C.16
- D.14
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. 16
व्याख्या
सही उत्तर C, 16 है। तीनताल सोलह मात्राओं की ताल है, जो चार-चार मात्राओं के चार बराबर विभागों में बँटी होती है। चक्र की पहली मात्रा सम कहलाती है और उस पर भार पड़ता है, तीसरा विभाग खाली से आरम्भ होता है, और आवर्तन पूरा होकर पुनः सम पर आता है। इसी सम-विभाजन के कारण अधिकांश ख्याल और वाद्य संगीत की गतें इसी ताल में निबद्ध होती हैं।
विकल्प A, 10, झपताल की मात्रा संख्या है, जिसका विभाजन दो, तीन, दो और तीन के असमान क्रम में होता है। विकल्प B, 12, एकताल तथा चौताल की संख्या है, जिनमें चौताल ध्रुपद के साथ पखावज पर बजती है। विकल्प D, 14, धमार ताल की संख्या है, जिसमें होली से जुड़ी धमार शैली गाई जाती है, और दीपचंदी की भी। चारों संख्याएँ वास्तविक तालों की हैं, इसलिए यह प्रश्न पूरी तालिका याद रखने वाले को ही अंक देता है।
हिंदुस्तानी गायन की सबसे प्राचीन जीवित शैली कौन-सी है?
- A.ख्याल
- B.ठुमरी
- C.ध्रुपद
- D.टप्पा
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. ध्रुपद
व्याख्या
सही उत्तर C, ध्रुपद है। ध्रुपद गम्भीर और भक्तिपरक शैली है, जो स्थायी, अंतरा, संचारी और आभोग इन चार भागों में गाई जाती है और जिसका आरम्भ लम्बे अनिबद्ध आलाप से होता है। इसके साथ तबला नहीं, पखावज बजता है। ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर इसके संरक्षण के लिए स्मरण किए जाते हैं और डागर परिवार ने इसे आधुनिक युग तक पहुँचाया।
विकल्प A, ख्याल, फारसी के 'कल्पना' अर्थ वाले शब्द से बना है, इसमें अलंकरण की छूट कहीं अधिक है और यह ध्रुपद से बहुत बाद में प्रमुख हुआ; इसे विलम्बित बड़ा ख्याल और फिर द्रुत छोटा ख्याल के रूप में गाया जाता है। विकल्प B, ठुमरी, उपशास्त्रीय और शृंगारिक शैली है, जिसके केंद्र लखनऊ और बनारस रहे तथा अवध के वाजिद अली शाह उसके प्रसिद्ध आश्रयदाता। विकल्प D, टप्पा, छोटी-छोटी तानों से भरी द्रुत शैली है, जो पंजाब के ऊँट चालकों के गीतों से विकसित हुई। चारों हिंदुस्तानी शैलियाँ हैं, पर सबसे प्राचीन ध्रुपद है।
पखावज परम्परागत रूप से किस शैली की संगत के लिए बजाया जाता है?
- A.ध्रुपद
- B.ठुमरी
- C.कृति
- D.ग़ज़ल
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. ध्रुपद
व्याख्या
सही उत्तर A, ध्रुपद है। पखावज लम्बा पीपानुमा अवनद्ध वाद्य है, जिसे आड़ा रखकर दोनों हाथों से बजाया जाता है; इसका स्वर तबले से अधिक गम्भीर होता है और यही गम्भीरता ध्रुपद की धीमी, ठहरी हुई गति के अनुकूल बैठती है। ध्रुपद के साथ प्रायः बारह मात्रा की चौताल बजाई जाती है और उससे जुड़ी धमार शैली में चौदह मात्रा की धमार ताल।
विकल्प B, ठुमरी, उपशास्त्रीय शैली है और उसके साथ तबला बजता है, जिसके साथ प्रायः सारंगी या हारमोनियम स्वर संगति करते हैं। विकल्प C, कृति, कर्नाटक पद्धति की रचना है, जहाँ मुख्य ताल वाद्य मृदंगम है और उसके साथ घटम, कंजीरा तथा मोरसिंग बजते हैं। विकल्प D, ग़ज़ल, उर्दू काव्य पर आधारित सुगम शास्त्रीय शैली है, जिसमें तबला और हारमोनियम प्रयुक्त होते हैं। विद्यार्थी प्रायः हर हिंदुस्तानी शैली के साथ तबला चुन लेते हैं, यह प्रश्न उसी आदत को पकड़ने के लिए बनता है।