पारिस्थितिकी तंत्र और खाद्य श्रृंखला: घटक एवं पिरामिड
परीक्षा के लिए पारिस्थितिकी के नोट्स: तंत्र के घटक, खाद्य श्रृंखला और खाद्य जाल, पोषी स्तर, दस प्रतिशत नियम, पारिस्थितिक पिरामिड तथा जैव आवर्धन।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 4 मिनट

पारिस्थितिकी तंत्र प्रकृति की वह इकाई है जिसमें जीव आपस में तथा अपने निर्जीव परिवेश से क्रिया करते हुए ऊर्जा और पदार्थ का आदान-प्रदान करते हैं। यह शब्द ब्रिटिश वनस्पति वैज्ञानिक ए. जी. टैंसले ने 1935 में दिया था। तालाब, वन, घास का मैदान, मरुस्थल और यहां तक कि खेत अथवा एक्वेरियम भी पारिस्थितिकी तंत्र हैं; इन सबमें सबसे बड़ा जैवमंडल है, अर्थात पृथ्वी का वह पतला क्षेत्र जहां जीवन पाया जाता है। यह अध्याय लगभग हर सामान्य ज्ञान प्रश्नपत्र में आता है, प्रायः खाद्य श्रृंखला और दस प्रतिशत नियम के माध्यम से।
पारिस्थितिकी तंत्र के घटक
प्रत्येक पारिस्थितिकी तंत्र में दो प्रकार के घटक होते हैं। अजैविक अथवा निर्जीव घटक हैं सूर्य का प्रकाश, ताप, जल, वायु, मृदा तथा उनमें उपस्थित खनिज और कार्बनिक पदार्थ। जैविक अथवा सजीव घटकों को उनके भोजन प्राप्त करने के ढंग के अनुसार बांटा जाता है।
- उत्पादक अथवा स्वपोषी: हरे पौधे, शैवाल तथा कुछ जीवाणु, जो प्रकाश संश्लेषण से अपना भोजन स्वयं बनाते हैं और प्रत्येक खाद्य श्रृंखला का आधार हैं।
- उपभोक्ता अथवा परपोषी: जंतु, जो भोजन के लिए दूसरों पर निर्भर हैं। पौधे खाने वाले शाकाहारी प्राथमिक उपभोक्ता हैं, उन्हें खाने वाले मांसाहारी द्वितीयक उपभोक्ता हैं और इन्हें खाने वाले तृतीयक उपभोक्ता। जो जंतु पौधे और जंतु दोनों खाते हैं वे सर्वाहारी कहलाते हैं।
- अपघटक अथवा मृतोपजीवी: जीवाणु और कवक, जो मृत शरीरों तथा अपशिष्ट को तोड़कर पोषक तत्व पुनः मृदा और जल में लौटा देते हैं और इस प्रकार पदार्थ का चक्र चलाते रहते हैं।
खाद्य श्रृंखला, खाद्य जाल और पोषी स्तर
खाद्य श्रृंखला वह क्रम है जिसमें एक जीव को दूसरा खाता है और जिससे होकर ऊर्जा एक स्तर से अगले स्तर तक पहुंचती है। श्रृंखला का प्रत्येक चरण एक पोषी स्तर है: उत्पादक पहले स्तर पर, शाकाहारी दूसरे पर, और इसी क्रम में आगे। प्रकृति में दो प्रकार की खाद्य श्रृंखलाएं साथ-साथ चलती हैं।
| प्रकार | आरंभ कहां से | उदाहरण |
|---|---|---|
| चारण खाद्य श्रृंखला | जीवित हरे पौधों से | घास, टिड्डा, मेंढक, सांप, बाज |
| अपरद खाद्य श्रृंखला | मृत कार्बनिक पदार्थ अर्थात अपरद से | गिरी हुई पत्तियां, केंचुए और कवक, छोटे पक्षी |
प्रकृति में कोई जंतु केवल एक ही प्रकार का भोजन विरले ही करता है, इसलिए अनेक खाद्य श्रृंखलाएं एक-दूसरे को काटती हुई खाद्य जाल बनाती हैं। खाद्य जाल तंत्र को अधिक स्थिर बनाता है, क्योंकि कोई एक प्रजाति समाप्त हो जाए तो उस पर निर्भर जंतु दूसरी ओर मुड़ सकते हैं।
ऊर्जा प्रवाह और दस प्रतिशत नियम
लगभग हर पारिस्थितिकी तंत्र के लिए ऊर्जा का अंतिम स्रोत सूर्य है, और हरे पौधे उन पर पड़ने वाले सूर्य प्रकाश का बहुत छोटा भाग ही ग्रहण कर पाते हैं। उत्पादकों द्वारा स्थिर की गई कुल ऊर्जा सकल प्राथमिक उत्पादकता कहलाती है; इसमें से पौधों द्वारा श्वसन में प्रयुक्त ऊर्जा घटाने पर शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता बचती है, और यही वह भोजन है जो वास्तव में उपभोक्ताओं को उपलब्ध होता है। तंत्र में ऊर्जा का प्रवाह एकदिशीय होता है: वह सूर्य के प्रकाश के रूप में प्रवेश करती है, उत्पादकों से उपभोक्ताओं और फिर अपघटकों तक जाती है, तथा प्रत्येक चरण पर ऊष्मा के रूप में नष्ट होती जाती है। वह कभी सूर्य को नहीं लौटती, इसीलिए पोषक तत्व चक्र में घूमते हैं किंतु ऊर्जा नहीं।
किसी पोषी स्तर की ऊर्जा का लगभग दस प्रतिशत ही अगले स्तर तक पहुंचता है, शेष श्वसन में खर्च होकर ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाता है। यही दस प्रतिशत नियम है, जिसे रेमंड लिंडेमान ने 1942 में प्रस्तुत किया। इसी से स्पष्ट होता है कि खाद्य श्रृंखलाएं छोटी क्यों होती हैं, प्रायः चार या पांच कड़ियों की, और किसी भी तंत्र में शीर्ष मांसाहारियों की संख्या कम क्यों रहती है।
पारिस्थितिक पिरामिड
पारिस्थितिक पिरामिड प्रत्येक पोषी स्तर की संख्या, जैवभार अथवा ऊर्जा को चित्र रूप में दिखाने की विधि है, जिसमें आधार पर उत्पादक रहते हैं।
- संख्या का पिरामिड: घास के मैदान में सामान्यतः सीधा, किंतु एकल वृक्ष के तंत्र में उल्टा, जहां एक वृक्ष हजारों कीटों को और वे कीट अनेक पक्षियों को पालते हैं।
- जैवभार का पिरामिड: वन में सीधा, किंतु तालाब अथवा समुद्र में उल्टा, क्योंकि सूक्ष्म पादप प्लवक का किसी क्षण का जैवभार कम होता है, फिर भी वे इतनी तेजी से बढ़ते हैं कि कहीं अधिक भार की मछलियों का पोषण कर सकें।
- ऊर्जा का पिरामिड: सदैव सीधा, क्योंकि हर स्थानांतरण पर ऊर्जा ऊष्मा के रूप में नष्ट होती है और कोई स्तर अपने नीचे वाले स्तर से अधिक ऊर्जा कभी नहीं रख सकता।
जैव आवर्धन और अनुक्रमण
कुछ हानिकारक रसायन, जैसे कीटनाशक डीडीटी तथा पारे के यौगिक, शरीर में न तो टूटते हैं और न बाहर निकाले जाते हैं। वे एक पोषी स्तर से अगले स्तर तक पहुंचते हैं और हर चरण पर अधिक सांद्र होते जाते हैं, इसलिए शीर्ष मांसाहारियों को, जिनमें मछली खाने वाले पक्षी तथा मनुष्य सम्मिलित हैं, सबसे भारी मात्रा मिलती है। खाद्य श्रृंखला के साथ होने वाली इस वृद्धि को जैव आवर्धन कहते हैं, और पक्षियों में इसी से अंडों के कवच पतले होकर टूटने लगे थे। दूसरी ओर पारिस्थितिक अनुक्रमण किसी क्षेत्र के जीव समुदाय में समय के साथ होने वाला क्रमबद्ध परिवर्तन है: प्राथमिक अनुक्रमण नंगी चट्टान अथवा नए तालाब पर आरंभ होता है जहां पहले जीवन नहीं था, द्वितीयक अनुक्रमण आग या बाढ़ से उजड़ी उस भूमि पर जहां मृदा शेष रहती है, और दोनों अंत में एक स्थिर समुदाय पर पहुंचते हैं जिसे चरम समुदाय कहा जाता है।
परीक्षा की दृष्टि से
प्रश्न छोटे और तथ्यात्मक होते हैं: पारिस्थितिकी तंत्र शब्द किसने दिया, दस प्रतिशत नियम किसने दिया, कौन से जीव उत्पादक हैं और कौन अपघटक, तथा कौन सा पिरामिड सदैव सीधा रहता है। अंक तय करने वाले दो जाल हैं: पहला पिरामिड, जहां याद रखना है कि केवल ऊर्जा का पिरामिड कभी उल्टा नहीं होता, और दूसरा ऊर्जा तथा पोषक तत्वों का अंतर, क्योंकि ऊर्जा का प्रवाह एकदिशीय है जबकि पोषक तत्व पुनः चक्रित होते हैं। प्रश्न में एक खाद्य श्रृंखला पंक्ति रूप में देकर यह भी पूछा जाता है कि कौन सा जीव किस पोषी स्तर पर है, अथवा पहली कड़ी में दी गई ऊर्जा में से अंतिम कड़ी तक कितनी पहुंचेगी।
महत्वपूर्ण तथ्य
| पारिस्थितिकी तंत्र शब्द के प्रवर्तक | ए. जी. टैंसले, वर्ष 1935 में |
|---|---|
| सबसे बड़ा पारिस्थितिकी तंत्र | जैवमंडल |
| उत्पादक | हरे पौधे, शैवाल तथा कुछ जीवाणु, जो प्रकाश संश्लेषण करते हैं |
| अपघटक | जीवाणु और कवक, जिन्हें मृतोपजीवी भी कहते हैं |
| प्रथम पोषी स्तर | उत्पादक |
| चारण खाद्य श्रृंखला | जीवित हरे पौधों से आरंभ |
| अपरद खाद्य श्रृंखला | मृत कार्बनिक पदार्थ से आरंभ |
| दस प्रतिशत नियम | रेमंड लिंडेमान द्वारा 1942 में |
| शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता | सकल प्राथमिक उत्पादकता घटा पौधों का श्वसन |
| ऊर्जा प्रवाह | एकदिशीय, सूर्य से उत्पादकों होते हुए उपभोक्ताओं तक, ऊष्मा के रूप में क्षय |
| सदैव सीधा रहने वाला पिरामिड | ऊर्जा का पिरामिड |
| उल्टा जैवभार पिरामिड | तालाब अथवा समुद्री तंत्र में |
| जैव आवर्धन | ऊंचे पोषी स्तरों पर डीडीटी या पारे की सांद्रता बढ़ना |
| चरम समुदाय | पारिस्थितिक अनुक्रमण के अंत में बनने वाला स्थिर समुदाय |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
पारिस्थितिकी तंत्र शब्द किस वैज्ञानिक ने दिया था?
- A.ए. जी. टैंसले
- B.चार्ल्स डार्विन
- C.रेमंड लिंडेमान
- D.चार्ल्स एल्टन
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. ए. जी. टैंसले
व्याख्या
सही उत्तर A, ए. जी. टैंसले है। ब्रिटिश वनस्पति वैज्ञानिक आर्थर जॉर्ज टैंसले ने 1935 में पारिस्थितिकी तंत्र शब्द का प्रयोग उस इकाई के लिए किया जिसमें जीव और उनका निर्जीव परिवेश एक ही तंत्र के रूप में ऊर्जा तथा पदार्थ का आदान-प्रदान करते हैं। यही विचार आधुनिक पारिस्थितिकी की नींव है।
विकल्प B, चार्ल्स डार्विन प्राकृतिक चयन द्वारा विकास के सिद्धांत के लिए जाने जाते हैं, जो उन्होंने जीवों की उत्पत्ति संबंधी अपनी कृति में रखा। विकल्प C, रेमंड लिंडेमान ने 1942 में ऊर्जा स्थानांतरण का दस प्रतिशत नियम दिया और ऊर्जा प्रवाह के संदर्भ में यही नाम याद रखना है, शब्द के प्रवर्तक के रूप में नहीं। विकल्प D, चार्ल्स एल्टन ने खाद्य श्रृंखला और पारिस्थितिक पिरामिडों पर कार्य किया तथा संख्या का पिरामिड प्रायः उन्हीं के नाम से जोड़ा जाता है। ये चारों नाम इस प्रश्न में साथ रखे जाते हैं।
खाद्य श्रृंखला में हरे पौधों को क्या कहा जाता है?
- A.उत्पादक
- B.प्राथमिक उपभोक्ता
- C.अपघटक
- D.द्वितीयक उपभोक्ता
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. उत्पादक
व्याख्या
सही उत्तर A, उत्पादक है। हरे पौधे सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा से कार्बन डाइऑक्साइड और जल द्वारा प्रकाश संश्लेषण करके अपना भोजन स्वयं बनाते हैं, इसीलिए उन्हें स्वपोषी भी कहा जाता है। वे प्रथम पोषी स्तर बनाते हैं और तंत्र के शेष सभी जीव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनके बनाए भोजन पर निर्भर रहते हैं।
विकल्प B, प्राथमिक उपभोक्ता वे शाकाहारी हैं जो पौधे खाते हैं, जैसे टिड्डा, हिरण और गाय। विकल्प C, अपघटक जीवाणु और कवक हैं, जो मृत शरीर तथा अपशिष्ट को तोड़कर पोषक तत्व मृदा में लौटाते हैं। विकल्प D, द्वितीयक उपभोक्ता वे मांसाहारी हैं जो शाकाहारियों को खाते हैं, जैसे घास, टिड्डा, मेंढक, सांप, बाज वाली श्रृंखला में मेंढक। इस श्रृंखला का क्रम याद रखें, क्योंकि प्रश्न प्रायः किसी एक जीव का स्तर पूछते हैं।
खाद्य श्रृंखला में ऊर्जा स्थानांतरण का दस प्रतिशत नियम किसने दिया था?
- A.ए. जी. टैंसले
- B.रेमंड लिंडेमान
- C.ओडम
- D.अर्नस्ट हेकल
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. रेमंड लिंडेमान
व्याख्या
सही उत्तर B, रेमंड लिंडेमान है, जिन्होंने यह नियम 1942 में प्रस्तुत किया। इसके अनुसार किसी पोषी स्तर पर उपलब्ध ऊर्जा का लगभग दस प्रतिशत ही अगले स्तर तक पहुंचता है, क्योंकि शेष श्वसन तथा अन्य जैविक क्रियाओं में प्रयुक्त होकर परिवेश में ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाता है। इसी से स्पष्ट होता है कि खाद्य श्रृंखला में प्रायः चार या पांच से अधिक कड़ियां क्यों नहीं होतीं।
विकल्प A, ए. जी. टैंसले ने 1935 में पारिस्थितिकी तंत्र शब्द दिया था। विकल्प C, ओडम ने पारिस्थितिकी की मानक पाठ्यपुस्तकें लिखीं और वे तंत्र की संरचना तथा कार्य के अध्ययन से जुड़े हैं, इस नियम से नहीं। विकल्प D, अर्नस्ट हेकल ने उन्नीसवीं शताब्दी में पारिस्थितिकी शब्द दिया था। तीनों नाम समूह में याद करें: पारिस्थितिकी के लिए हेकल, पारिस्थितिकी तंत्र के लिए टैंसले और दस प्रतिशत नियम के लिए लिंडेमान।
निम्नलिखित में से कौन सा पारिस्थितिक पिरामिड सदैव सीधा रहता है?
- A.संख्या का पिरामिड
- B.जैवभार का पिरामिड
- C.ऊर्जा का पिरामिड
- D.तीनों सदैव सीधे रहते हैं
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. ऊर्जा का पिरामिड
व्याख्या
सही उत्तर C, ऊर्जा का पिरामिड है। एक पोषी स्तर से अगले स्तर तक हर स्थानांतरण पर ऊर्जा ऊष्मा के रूप में नष्ट होती है, इसलिए ऊपर का कोई स्तर अपने नीचे वाले स्तर से अधिक ऊर्जा कभी नहीं रख सकता। इसी कारण ऊर्जा का पिरामिड बिना किसी अपवाद के हर पारिस्थितिकी तंत्र में सीधा रहता है।
विकल्प A, संख्या का पिरामिड एकल वृक्ष के तंत्र में उल्टा हो जाता है, जहां एक बड़ा वृक्ष हजारों कीटों को और वे कीट अनेक पक्षियों को पालते हैं। विकल्प B, जैवभार का पिरामिड तालाब अथवा समुद्र में उल्टा रहता है, क्योंकि किसी क्षण उपस्थित पादप प्लवक का भार उन मछलियों से बहुत कम होता है जिनका वे पोषण करते हैं, यद्यपि वे तेजी से बढ़ते रहते हैं। इसलिए विकल्प D गलत है। अध्याय का सर्वाधिक पूछा जाने वाला बिंदु यही है।
मृत पौधों और जंतुओं का अपघटन करने वाले जीवाणु तथा कवक क्या कहलाते हैं?
- A.उत्पादक
- B.अपघटक
- C.शाकाहारी
- D.सर्वाहारी
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. अपघटक
व्याख्या
सही उत्तर B, अपघटक है, जिन्हें मृतोपजीवी भी कहा जाता है। ये मृत शरीरों, गिरी पत्तियों और अपशिष्ट पदार्थों पर पलते हैं, जटिल कार्बनिक पदार्थों को सरल पदार्थों में तोड़ते हैं तथा पोषक तत्व पुनः मृदा, जल और वायु में मुक्त कर देते हैं, जहां से पौधे उन्हें फिर ग्रहण कर सकें। इनके बिना मृत पदार्थ ढेर के रूप में जमा होता जाता और पोषक तत्वों की आपूर्ति रुक जाती।
विकल्प A, उत्पादक वे हरे पौधे हैं जो प्रकाश संश्लेषण से भोजन बनाते हैं। विकल्प C, शाकाहारी पौधे खाने वाले जंतु हैं जो दूसरा पोषी स्तर बनाते हैं। विकल्प D, सर्वाहारी वे जंतु हैं जो पौधे और जंतु दोनों खाते हैं, जैसे भालू, कौआ और मनुष्य। यह भी याद रखें कि अपघटक ही अपरद खाद्य श्रृंखला आरंभ करते हैं, जो जीवित पौधों से नहीं, मृत कार्बनिक पदार्थ से शुरू होती है।
पारिस्थितिकी तंत्र में ऊर्जा का प्रवाह कैसा होता है?
- A.एकदिशीय
- B.पोषक तत्वों की भांति चक्रीय
- C.उपभोक्ताओं से उत्पादकों की ओर
- D.प्रत्येक पोषी स्तर पर अपरिवर्तित
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. एकदिशीय
व्याख्या
सही उत्तर A, एकदिशीय है। ऊर्जा सूर्य के प्रकाश के रूप में तंत्र में प्रवेश करती है, हरे पौधों द्वारा स्थिर होती है और फिर उत्पादकों से शाकाहारियों, मांसाहारियों तथा अंत में अपघटकों तक जाती है। हर चरण पर उसका बड़ा भाग परिवेश में ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाता है और कुछ भी सूर्य को नहीं लौटता, इसलिए प्रवाह केवल एक ही दिशा में चलता है।
विकल्प B ऊर्जा को पोषक तत्वों से मिला देता है। कार्बन, नाइट्रोजन आदि पोषक तत्व अवश्य चक्रों में घूमते हैं, क्योंकि अपघटक उन्हें मृत पदार्थ से मुक्त करके पौधों के लिए उपलब्ध करा देते हैं। विकल्प C दिशा उलट देता है: उपभोक्ता उत्पादकों पर निर्भर हैं, इसका विपरीत कभी नहीं होता। विकल्प D दस प्रतिशत नियम के विरुद्ध है, क्योंकि एक स्तर की लगभग दसवां भाग ऊर्जा ही अगले स्तर तक पहुंचती है। संक्षेप में: पोषक तत्व चक्र में घूमते हैं, ऊर्जा बहती है।
मृत कार्बनिक पदार्थ से आरंभ होने वाली खाद्य श्रृंखला क्या कहलाती है?
- A.चारण खाद्य श्रृंखला
- B.अपरद खाद्य श्रृंखला
- C.परजीवी खाद्य श्रृंखला
- D.परभक्षी खाद्य श्रृंखला
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. अपरद खाद्य श्रृंखला
व्याख्या
सही उत्तर B, अपरद खाद्य श्रृंखला है। अपरद का अर्थ है मृत कार्बनिक पदार्थ, जैसे गिरी हुई पत्तियां, मृत शरीर तथा जंतुओं का मल। केंचुए, दीमक, जीवाणु और कवक जैसे जीव इस पर पलते हैं, और उन्हें छोटे पक्षी तथा अन्य जंतु खाते हैं। अनेक तंत्रों में, विशेषकर वनों में, चारण श्रृंखला की तुलना में ऊर्जा का बड़ा भाग इसी श्रृंखला से होकर बहता है।
विकल्प A, चारण खाद्य श्रृंखला जीवित हरे पौधों से आरंभ होती है, जैसे घास, टिड्डा, मेंढक, सांप। विकल्प C और D इस वर्गीकरण की कोई मानक श्रेणी नहीं बताते, यद्यपि परजीविता और परभक्षण दोनों तंत्र के वास्तविक संबंध हैं। दोनों श्रृंखलाएं अलग-अलग नहीं चलतीं: वे जुड़ी रहती हैं, क्योंकि चारण श्रृंखला का अपशिष्ट ही अपरद श्रृंखला की आरंभिक सामग्री बनता है।
जो जंतु पौधे और जंतु दोनों को भोजन के रूप में ग्रहण करते हैं, वे क्या कहलाते हैं?
- A.शाकाहारी
- B.मांसाहारी
- C.सर्वाहारी
- D.स्वपोषी
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. सर्वाहारी
व्याख्या
सही उत्तर C, सर्वाहारी है। भालू, कौआ, सूअर और मनुष्य पौधों तथा जंतुओं दोनों का भोजन करते हैं, इसलिए वे एक साथ एक से अधिक पोषी स्तर पर रह सकते हैं। यही इस बात का अच्छा उदाहरण है कि प्रकृति का वर्णन एकल खाद्य श्रृंखला से नहीं, खाद्य जाल से ही ठीक ढंग से होता है।
विकल्प A, शाकाहारी केवल पौधे खाते हैं और खाद्य श्रृंखला के प्राथमिक उपभोक्ता होते हैं; गाय, हिरण और टिड्डा इसी वर्ग में आते हैं। विकल्प B, मांसाहारी दूसरे जंतुओं को खाते हैं और ऊंचे पोषी स्तर बनाते हैं; मेंढक, सांप और बाघ इसके उदाहरण हैं। विकल्प D, स्वपोषी जंतु होते ही नहीं: इस शब्द का अर्थ है उत्पादक, अर्थात हरे पौधे और शैवाल, जो प्रकाश संश्लेषण से अपना भोजन स्वयं बनाते हैं।
तालाब के पारिस्थितिकी तंत्र में जैवभार का पिरामिड कैसा होता है?
- A.सीधा
- B.उल्टा
- C.सदैव आयताकार
- D.ऊर्जा के पिरामिड के समान
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. उल्टा
व्याख्या
सही उत्तर B, उल्टा है। तालाब में उत्पादक पादप प्लवक हैं, अर्थात तैरते हुए सूक्ष्म पौधे, जिनका किसी एक क्षण का कुल भार बहुत कम होता है। किंतु वे अत्यंत तेजी से बढ़ते हैं, इसलिए समय के साथ कहीं अधिक भार के प्राणी प्लवक तथा मछलियों का पोषण कर लेते हैं। किसी एक क्षण का जैवभार मापने पर पिरामिड उल्टा दिखाई देता है।
विकल्प A वन के लिए सही है, जहां आधार पर वृक्षों का विशाल भार अपने से बहुत कम भार के जंतुओं का पोषण करता है। विकल्प C किसी वास्तविक पिरामिड का वर्णन नहीं करता। विकल्प D गलत है, क्योंकि तालाब में भी ऊर्जा का पिरामिड सीधा ही रहता है; हर स्थानांतरण पर ऊष्मा के रूप में होने वाला क्षय उसे कभी उल्टा नहीं होने देता। अपवाद याद रखें: वृक्ष तंत्र में संख्या उल्टी, तालाब में जैवभार उल्टा, ऊर्जा कभी उल्टी नहीं।
किसी पारिस्थितिकी तंत्र की शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता किसके बराबर होती है?
- A.सकल प्राथमिक उत्पादकता जोड़ श्वसन
- B.सकल प्राथमिक उत्पादकता घटा पौधों द्वारा श्वसन में प्रयुक्त ऊर्जा
- C.तंत्र पर पड़ने वाला कुल सूर्य प्रकाश
- D.सभी उपभोक्ताओं का कुल जैवभार
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. सकल प्राथमिक उत्पादकता घटा पौधों द्वारा श्वसन में प्रयुक्त ऊर्जा
व्याख्या
सही उत्तर B है। सकल प्राथमिक उत्पादकता वह कुल ऊर्जा है जिसे उत्पादक प्रकाश संश्लेषण से स्थिर करते हैं। इसका एक भाग पौधे अपने श्वसन में खर्च कर देते हैं, और जो शेष पौधों के शरीर में संचित रह जाता है वही शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता है। यही शेष भाग शाकाहारियों को वास्तव में उपलब्ध भोजन है, इसलिए यही तय करता है कि तंत्र कितने जीवन का पोषण कर सकता है।
विकल्प A श्वसन को घटाने के बजाय जोड़ देता है और ऐसा आंकड़ा देगा जो वास्तव में ग्रहण की गई ऊर्जा से भी अधिक होगा। विकल्प C गलत है, क्योंकि हरे पौधे उन तक पहुंचने वाले सूर्य प्रकाश का बहुत छोटा भाग ही ग्रहण करते हैं, शेष परावर्तित हो जाता है या निकल जाता है। विकल्प D उपभोक्ताओं का संचित जैवभार बताता है, जो किसी क्षण का भंडार है, उत्पादन की दर नहीं। उत्पादकता सदैव प्रति इकाई क्षेत्रफल प्रति इकाई समय में व्यक्त की जाती है।
खाद्य श्रृंखला के प्रत्येक ऊंचे पोषी स्तर पर डीडीटी जैसे कीटनाशकों की सांद्रता बढ़ जाती है। यह परिघटना क्या कहलाती है?
- A.सुपोषण
- B.जैव आवर्धन
- C.पारिस्थितिक अनुक्रमण
- D.जैव निम्नीकरण
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. जैव आवर्धन
व्याख्या
सही उत्तर B, जैव आवर्धन है। डीडीटी तथा पारे के यौगिक शरीर में न तो टूटते हैं और न बाहर निकाले जाते हैं, इसलिए वे हर जीव के ऊतकों में जमा होते जाते हैं और जो उसे खाता है उस तक पहुंच जाते हैं। सांद्रता हर चरण पर बढ़ती है, और मछली खाने वाले पक्षियों तथा मनुष्य जैसे शीर्ष मांसाहारियों को सबसे बड़ी मात्रा मिलती है; पक्षियों में इसी से अंडों के कवच पतले होकर टूटने लगे थे।
विकल्प A, सुपोषण किसी जलाशय में उर्वरकों और मल-जल से पोषक तत्व बढ़ने पर शैवाल की अत्यधिक वृद्धि है, जिससे जल की ऑक्सीजन समाप्त हो जाती है। विकल्प C, पारिस्थितिक अनुक्रमण किसी समुदाय का समय के साथ क्रमशः बदलते हुए स्थिर चरम अवस्था तक पहुंचना है। विकल्प D, जैव निम्नीकरण सूक्ष्मजीवों द्वारा पदार्थों का विघटन है, और डीडीटी की विशेषता यही है कि वह इसका प्रतिरोध करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
खाद्य श्रृंखला और खाद्य जाल में क्या अंतर है?
खाद्य श्रृंखला वह एक सीधी पंक्ति है जिससे होकर भोजन और ऊर्जा गुजरती है, जैसे घास से टिड्डा, टिड्डे से मेंढक और मेंढक से सांप। खाद्य जाल वह नेटवर्क है जो ऐसी अनेक श्रृंखलाओं के एक-दूसरे को काटने से बनता है, क्योंकि अधिकांश जंतु एक से अधिक प्रकार का भोजन करते हैं और एक से अधिक परभक्षी उन्हें खाते हैं। खाद्य जाल तंत्र को अधिक स्थिर बनाता है, क्योंकि एक प्रजाति के लुप्त होने से पूरा तंत्र नहीं टूटता।
खाद्य श्रृंखलाएं प्रायः चार या पांच कड़ियों तक ही सीमित क्यों रहती हैं?
क्योंकि किसी पोषी स्तर की लगभग दस प्रतिशत ऊर्जा ही अगले स्तर तक पहुंचती है, शेष जैविक क्रियाओं में खर्च होकर ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाती है। चार या पांच स्थानांतरणों के बाद इतनी कम ऊर्जा बचती है कि वह उपभोक्ताओं के एक और स्तर को नहीं पाल सकती। इसी कारण किसी भी तंत्र में शीर्ष मांसाहारियों की संख्या सदैव कम रहती है।
कौन सा पारिस्थितिक पिरामिड सदैव सीधा रहता है और क्यों?
ऊर्जा का पिरामिड। हर स्थानांतरण पर ऊर्जा ऊष्मा के रूप में नष्ट होती है, इसलिए कोई ऊंचा पोषी स्तर अपने नीचे वाले स्तर से अधिक ऊर्जा कभी नहीं रख सकता। संख्या का पिरामिड एकल वृक्ष के तंत्र में उल्टा हो सकता है, और जैवभार का पिरामिड तालाब में उल्टा रहता है, जहां पादप प्लवक का अल्प जैवभार कहीं अधिक भार की मछलियों का पोषण करता है।
जैव आवर्धन क्या है?
यह खाद्य श्रृंखला के प्रत्येक ऊंचे स्तर पर किसी हानिकारक पदार्थ की सांद्रता बढ़ने की प्रक्रिया है। डीडीटी तथा पारे के यौगिक जैसे रसायन न तो टूटते हैं और न शरीर से बाहर निकाले जाते हैं, इसलिए वे जीवों के शरीर में जमा होते जाते हैं और जो उन्हें खाता है उस तक पहुंच जाते हैं। इसी कारण शीर्ष मांसाहारियों में, जिनमें मछली खाने वाले पक्षी और मनुष्य सम्मिलित हैं, इनकी सांद्रता सबसे अधिक होती है।
ऊर्जा केवल एक दिशा में क्यों बहती है जबकि पोषक तत्व पुनः चक्रित होते हैं?
ऊर्जा सूर्य के प्रकाश के रूप में तंत्र में प्रवेश करती है, उत्पादकों द्वारा स्थिर होती है और पोषी स्तरों से होकर ऊपर जाती है, किंतु हर चरण पर उसका बड़ा भाग ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाता है और दोबारा प्रयोग में नहीं आ सकता। इसके विपरीत कार्बन, नाइट्रोजन और फॉस्फोरस जैसे पोषक तत्व रासायनिक पदार्थ हैं; अपघटक उन्हें मृत पदार्थ से मुक्त करके मृदा, जल और वायु में लौटा देते हैं, इसलिए वही परमाणु बार-बार काम आते रहते हैं।
स्रोत
- जीव विज्ञान (कक्षा 12), अध्याय: पारितंत्र — एनसीईआरटी
- विज्ञान (कक्षा 10), अध्याय: हमारा पर्यावरण — एनसीईआरटी