पवित्र उपवन और सामुदायिक संरक्षण: परीक्षा नोट्स
परीक्षा के लिए पवित्र उपवन नोट्स: उपवन क्या हैं, राज्यों में उनके नाम, बिश्नोई और खेजड़ली, सामुदायिक रिजर्व, जैव विविधता विरासत स्थल तथा वन अधिकार।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 4 मिनट

वन विभाग बनने से बहुत पहले भारत के गांवों ने जंगल के कुछ टुकड़े ऐसे अलग कर रखे थे, जिन्हें काटने की अनुमति किसी को नहीं थी। वह टुकड़ा किसी देवता, नाग देवता, पूर्वज या ग्राम देवी का था, और देवता का भय वही काम करता था जो आज चौकीदार और जुर्माना करते हैं। ये टुकड़े भारत के पवित्र उपवन हैं और देश में संरक्षण का सबसे पुराना रूप हैं। परीक्षक इस अध्याय को पसंद करते हैं, क्योंकि हर उपवन का एक स्थानीय नाम किसी राज्य से जुड़ा है और आधुनिक कानून ने उसी विचार को सामुदायिक रिजर्व से लेकर जैव विविधता विरासत स्थल तक कानूनी रूप दे दिया है।
पवित्र उपवन क्या है
पवित्र उपवन प्राकृतिक वनस्पति का वह टुकड़ा है, जिसे स्थानीय समुदाय धार्मिक आधार पर बचाता है और जहां पेड़ काटना, शिकार करना तथा अक्सर सूखी लकड़ी उठाना भी वर्जित है। नियम सामाजिक होते हैं, कानूनी नहीं; उन्हें गांव, कुल या पुजारी लागू करता है। सदियों तक अछूते रहने के कारण कई उपवनों में उस क्षेत्र की मूल वनस्पति का अंतिम अवशेष बचा है, इसलिए पारिस्थितिकीविद् उन्हें अवशेष या चरम समुदाय वाले टुकड़े कहते हैं और प्राकृतिक जीन बैंक मानते हैं। उपवन सामान्यतः छोटा होता है, किसी थान के चारों ओर कुछ पेड़ से लेकर कई हेक्टेयर घने वन तक, और बहुत बार वह किसी झरने, तालाब या नाले के उद्गम को घेरे रहता है, इसलिए वह वन जितना ही जल स्रोत भी है।
राज्यों में स्थानीय नाम
इस अध्याय का सबसे अधिक पूछा जाने वाला तथ्य नाम ही है, क्योंकि उससे सुमेलित कीजिए वाला प्रश्न अपने आप बन जाता है।
| स्थानीय नाम | राज्य या क्षेत्र |
|---|---|
| काव, सर्प काव | केरल |
| देवरकाडु, देवकाड | कर्नाटक |
| देवराई, देवराहाटी | महाराष्ट्र |
| ओरण, वाणी, केंकड़ी | राजस्थान |
| लॉ क्यंतांग, लॉ लिंगदोह | मेघालय, खासी पहाड़ियां |
| उमंग लाई | मणिपुर |
| सरना, जाहेर थान | झारखंड और छोटानागपुर क्षेत्र |
| जाहेरा, ठाकुरम्मा | ओडिशा |
| गरामथान, हरिथान | पश्चिम बंगाल |
| देव भूमि, बाणी | हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड |
सबसे प्रसिद्ध उपवन मेघालय की खासी पहाड़ियों का माफलांग पवित्र वन है, जिसे लिंगदोह कुल सहेजता है और जहां आने वालों को बताया जाता है कि यहां से कुछ भी, गिरा हुआ पत्ता भी, बाहर नहीं ले जाया जा सकता। पश्चिमी राजस्थान के ओरण खेजड़ी तथा अन्य मरुस्थलीय वृक्षों के चराई वाले उपवन हैं, जो एक साथ गोचर, जल स्थल और आवास का काम करते हैं, और गोडावण का जीवन बहुत कुछ इसी भूमि पर टिका है।
प्रकृति की रक्षा करने वाले समुदाय
पश्चिमी राजस्थान के बिश्नोई इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। उनके पंथ की स्थापना गुरु जंभेश्वर, अर्थात जंभोजी, ने 1485 में की और उनके उनतीस नियम, जिनसे बिश्नोई नाम बना, हरे वृक्ष काटने तथा जीव मारने से रोकते हैं। 1730 में जब जोधपुर राज्य के लोग खेजड़ली में महल के चूना भट्टे के लिए खेजड़ी काटने आए, तब अमृता देवी तथा सैकड़ों बिश्नोई पेड़ों से चिपक गए और एक के बाद एक काट दिए गए। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने वन्यजीव की रक्षा करने वाले समुदायों के लिए अमृता देवी के नाम पर पुरस्कार रखा है, और जोधपुर के आसपास कृष्ण मृग तथा चिंकारा आज भी बिश्नोई गांवों के कारण बचे हैं। इसी प्रवृत्ति से 1973 में गढ़वाल के चमोली में चिपको आंदोलन उठा, जिसका नेतृत्व चंडी प्रसाद भट्ट और सुंदरलाल बहुगुणा ने किया, और उसकी दक्षिणी प्रतिध्वनि 1983 में कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ में अप्पिको आंदोलन बना, जिसके नेता पांडुरंग हेगड़े थे। कुमाऊं की पहाड़ियों में 1931 में बने नियमों के अंतर्गत गठित वन पंचायतें आज भी बड़े भाग के सिविल वन का प्रबंध करती हैं।
परंपरा से कानून तक
स्वतंत्र भारत ने इस पुरानी परंपरा को धीरे धीरे कानूनी ढांचा दिया। सत्तर के दशक के आरंभ में पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले का अराबाड़ी प्रयोग, जिसमें एक वन अधिकारी ने रक्षा करने वाले ग्रामीणों को साल की कटाई में हिस्सा दिया, संयुक्त वन प्रबंधन का आदर्श बना, और 1988 की राष्ट्रीय वन नीति तथा उसके बाद के परिपत्र ने उसे पूरे देश तक पहुंचाया। वन्य जीव संरक्षण अधिनियम में 2002 के संशोधन ने संरक्षित क्षेत्र की दो नई श्रेणियां बनाईं: संरक्षण रिजर्व, जो सामान्यतः सरकारी भूमि पर बफर या गलियारे के रूप में होता है, और सामुदायिक रिजर्व, जो निजी या सामुदायिक भूमि पर वहां के लोगों की सहमति से घोषित होता है; दोनों का संचालन एक प्रबंध समिति करती है। जैव विविधता अधिनियम 2002 ने हर स्थानीय निकाय में जैव विविधता प्रबंधन समिति बनाई, उससे स्थानीय प्रजातियों और उपयोगों का जन जैव विविधता रजिस्टर रखवाया, और राज्य सरकार को जैव विविधता विरासत स्थल घोषित करने का अधिकार दिया; पहला ऐसा स्थल कर्नाटक में बेंगलूरु के निकट नल्लूर का इमली उपवन था। इसके बाद वन अधिकार अधिनियम 2006 ने अन्य अधिकारों के साथ गांव को अपने सामुदायिक वन संसाधन की रक्षा तथा प्रबंध का अधिकार और वन के भीतर पवित्र तथा परंपरागत स्थानों पर अधिकार भी दिया।
उपवन क्यों घट रहे हैं
उपवन किसी एक आदेश से नहीं, धीमे क्षरण से मिटते हैं: नगरों का फैलाव और सड़क निर्माण, अतिक्रमण तथा चराई का दबाव, पेड़ के नीचे के खुले थान की जगह पक्का मंदिर और पक्का आंगन, लैंटाना तथा विलायती बबूल जैसी आक्रामक प्रजातियां, इतने छोटे टुकड़ों में बंट जाना कि पुनर्जनन रुक जाए, और यह सीधी बात कि गांव की नई पीढ़ी उस देवता से नहीं डरती जो उपवन की रक्षा करता था। राज्य जैव विविधता बोर्डों द्वारा प्रलेखन, सामुदायिक रिजर्व या विरासत स्थल के रूप में अधिसूचना, और ओरण को डीम्ड वन मानने की मांग इसके उपाय हैं।
परीक्षा की दृष्टि से
इस अध्याय से तीन प्रकार के प्रश्न आते हैं। पहला और सबसे आम स्थानीय नाम को राज्य से मिलाना है, जिसमें काव, देवरकाडु, देवराई, ओरण, सरना, जाहेरा, उमंग लाई और लॉ क्यंतांग घुमाए जाते हैं; स्थायी जाल केरल के काव को कर्नाटक के देवरकाडु से बदल देना या ओरण को राजस्थान के स्थान पर गुजरात में रख देना है। दूसरा बिश्नोई हैं: संस्थापक गुरु जंभेश्वर, वर्ष 1485, नाम के पीछे के उनतीस नियम, 1730 का खेजड़ली बलिदान, खेजड़ी वृक्ष और अमृता देवी, जिनके साथ 1973 के चिपको तथा 1983 के अप्पिको को विकल्प के रूप में रखा जाता है। तीसरा कानून है: किस अधिनियम या संशोधन ने सामुदायिक रिजर्व और संरक्षण रिजर्व बनाए, किस अधिनियम से जैव विविधता प्रबंधन समिति तथा जैव विविधता विरासत स्थल आते हैं, पहला विरासत स्थल कौन था, और कौन सा अधिनियम सामुदायिक वन संसाधन अधिकार देता है। एक पंक्ति के प्रश्न यह भी पूछते हैं कि अवशेष वनस्पति या जीन बैंक का अर्थ क्या है, अराबाड़ी प्रयोग किस राज्य का है, और वन पंचायतें किन पहाड़ियों में चलती हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य
| केरल | काव, और नाग देवता का उपवन सर्प काव |
|---|---|
| कर्नाटक | देवरकाडु अथवा देवकाड |
| महाराष्ट्र | देवराई अथवा देवराहाटी |
| राजस्थान | ओरण, वाणी, केंकड़ी |
| मेघालय | लॉ क्यंतांग और लॉ लिंगदोह; माफलांग पवित्र वन |
| मणिपुर | उमंग लाई |
| झारखंड | सरना, तथा संथालों का जाहेर थान |
| बिश्नोई पंथ | गुरु जंभेश्वर द्वारा 1485 में स्थापित; उनतीस नियम |
| खेजड़ली | 1730, अमृता देवी तथा सैकड़ों बिश्नोइयों ने खेजड़ी के लिए प्राण दिए |
| चिपको और अप्पिको | चमोली 1973 तथा उत्तर कन्नड़ 1983 |
| सामुदायिक रिजर्व | वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 में 2002 के संशोधन से जोड़ा गया |
| जैव विविधता विरासत स्थल | जैव विविधता अधिनियम 2002 के अंतर्गत राज्य द्वारा घोषित |
| पहला विरासत स्थल | नल्लूर इमली उपवन, कर्नाटक |
| वन पंचायत | कुमाऊं की पहाड़ियों की ग्राम वन समितियां, 1931 के नियमों के अंतर्गत |
| संयुक्त वन प्रबंधन | पश्चिम बंगाल का अराबाड़ी; 1988 की वन नीति के बाद देशव्यापी |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
भारत के किस राज्य में पवित्र उपवनों को काव कहा जाता है?
- A.केरल
- B.कर्नाटक
- C.ओडिशा
- D.मणिपुर
उत्तर देखें
केरल में पवित्र उपवन को काव कहा जाता है, और नाग देवताओं के लिए रखा गया उपवन, जो राज्य के लगभग हर पुराने घर के परिसर में होता था, सर्प काव कहलाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →ओरण नामक पवित्र उपवन किस राज्य की विशेषता हैं?
- A.गुजरात
- B.राजस्थान
- C.हरियाणा
- D.मध्य प्रदेश
उत्तर देखें
ओरण पश्चिमी राजस्थान में किसी लोक देवता को समर्पित मरुस्थलीय वनस्पति का टुकड़ा है, जिसमें खेजड़ी, कैर, जाल और रोहिड़ा के वृक्ष तथा उनके बीच की घास होती है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →लिंगदोह कुल द्वारा सहेजा गया प्रसिद्ध माफलांग पवित्र वन किस राज्य में है?
- A.नागालैंड
- B.मिजोरम
- C.मेघालय
- D.त्रिपुरा
उत्तर देखें
माफलांग शिलांग के दक्षिण में खासी पहाड़ियों में स्थित है और भारत का सबसे प्रसिद्ध पवित्र उपवन है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →1730 में खेजड़ली में अमृता देवी के नेतृत्व में बिश्नोइयों ने किस वृक्ष की रक्षा के लिए प्राण दिए?
- A.खेजड़ी
- B.बरगद
- C.चंदन
- D.सागवान
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खेजड़ी, थार का प्रोसोपिस सिनेरेरिया, वही वृक्ष है जिसे बिश्नोई पवित्र मानते हैं, और वह राजस्थान का राज्य वृक्ष है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →बिश्नोई पंथ के संस्थापक, जिनके उनतीस नियम हरे वृक्ष काटने से रोकते हैं, कौन थे?
- A.गुरु जंभेश्वर
- B.संत पीपा
- C.धन्ना भगत
- D.जसनाथ जी
उत्तर देखें
जंभेश्वर, जिन्हें स्नेह से जंभोजी कहा जाता है, ने 1485 में बीकानेर के मरुस्थल में बिश्नोई पंथ की स्थापना की।
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारत में संरक्षण रिजर्व तथा सामुदायिक रिजर्व नामक श्रेणियां किस संशोधन से आईं?
- A.वन्य जीव संरक्षण संशोधन अधिनियम, 1991
- B.वन संरक्षण अधिनियम, 1980
- C.वन्य जीव संरक्षण संशोधन अधिनियम, 2002
- D.पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986
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उससे पहले 1972 का अधिनियम केवल राष्ट्रीय उद्यान और अभयारण्य जानता था, जिन दोनों के लिए राज्य का स्वामित्व तथा नियंत्रण आवश्यक है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →जैव विविधता प्रबंधन समितियां तथा जैव विविधता विरासत स्थल किस कानून में दिए गए हैं?
- A.जैव विविधता अधिनियम, 2002
- B.वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972
- C.वन अधिकार अधिनियम, 2006
- D.राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010
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वह तीन स्तर की व्यवस्था बनाता है: केंद्र में राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण, राज्यों में राज्य जैव विविधता बोर्ड, और हर स्थानीय निकाय में जैव विविधता प्रबंधन समिति, जो अपने क्षेत्र के पौधों, जीवों तथा परंपरागत उपयोगों का जन जैव विविधता रजिस्टर रखती है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारत का पहला घोषित जैव विविधता विरासत स्थल कौन था?
- A.माफलांग पवित्र वन, मेघालय
- B.नल्लूर इमली उपवन, कर्नाटक
- C.माजुली, असम
- D.चिल्का, ओडिशा
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बेंगलूरु के बाहर देवनहल्ली के निकट नल्लूर इमली के पुराने वृक्षों का झुंड है, जिनमें कई कई शताब्दी पुराने हैं, और कर्नाटक ने उसे जैव विविधता अधिनियम की धारा 37 के अंतर्गत देश का पहला जैव विविधता विरासत स्थल घोषित किया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारत में संयुक्त वन प्रबंधन का आदर्श बना अराबाड़ी प्रयोग किस राज्य में हुआ था?
- A.ओडिशा
- B.पश्चिम बंगाल
- C.आंध्र प्रदेश
- D.गुजरात
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मिदनापुर जिले के अराबाड़ी में एक वन अधिकारी ने ग्रामीणों को अतिक्रमणकारी मानना छोड़कर उन्हें वन बचाने के बदले साल की कटाई में हिस्सा देने का प्रस्ताव दिया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →1931 के नियमों के अंतर्गत बनी वन पंचायतें किन पहाड़ियों की विशेषता हैं?
- A.नीलगिरि पहाड़ियां
- B.कुमाऊं की पहाड़ियां
- C.खासी पहाड़ियां
- D.अरावली पहाड़ियां
उत्तर देखें
पहाड़ी वनों को आरक्षित करने के विरुद्ध वर्षों के विरोध के बाद औपनिवेशिक सरकार ने कुमाऊं के गांवों को 1931 में बने नियमों के अंतर्गत निर्वाचित वन पंचायतों के माध्यम से सिविल वन के एक भाग का प्रबंध स्वयं करने दिया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पवित्र उपवन वास्तव में क्या होता है?
यह प्राकृतिक वनस्पति का वह टुकड़ा है जिसे गांव या कुल इसलिए बचाता है कि वह किसी देवता का है। वहां पेड़ काटना, शिकार करना और अक्सर सूखी लकड़ी उठाना भी वर्जित है, और यह नियम कानून से नहीं, समाज से लागू होता है। सदियों तक अछूते रहने के कारण कई उपवनों में क्षेत्र की मूल वनस्पति बची है और उनके भीतर कोई झरना या तालाब भी सुरक्षित रहता है।
ओरण क्या हैं और किस राज्य में मिलते हैं?
ओरण पश्चिमी राजस्थान के पवित्र उपवन हैं, जो सामान्यतः किसी लोक देवता को समर्पित होते हैं और जिनमें खेजड़ी, कैर, जाल तथा रोहिड़ा के वृक्ष होते हैं। वे एक साथ उपवन, गांव का गोचर और जल स्थल हैं, और खुली झाड़ भूमि होने के कारण गोडावण के अंतिम आवासों में गिने जाते हैं।
भारत में सामुदायिक रिजर्व किस कानून से बने?
वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के 2002 के संशोधन से। इस संशोधन ने संरक्षण रिजर्व और सामुदायिक रिजर्व नामक दो श्रेणियां जोड़ीं, जिससे राष्ट्रीय उद्यान तथा अभयारण्य के बाहर की भूमि, जिसमें निजी और सामुदायिक भूमि भी शामिल है, उसके स्वामियों या उपयोगकर्ताओं की सहमति से संरक्षित की जा सके।
भारत का पहला जैव विविधता विरासत स्थल कौन था?
कर्नाटक में बेंगलूरु के निकट नल्लूर का इमली उपवन, जिसे जैव विविधता अधिनियम 2002 की धारा 37 के अंतर्गत घोषित किया गया। ऐसी घोषणा राज्य सरकार स्थानीय निकायों के परामर्श से करती है और क्षेत्र की जैव विविधता प्रबंधन समिति उस स्थल की देखभाल करती है।
पर्यावरण के प्रश्नपत्रों में 1730 की खेजड़ली घटना क्यों याद रखी जाती है?
क्योंकि यह भारत में पेड़ बचाने के लिए प्राण देने का सबसे पुराना अभिलिखित उदाहरण है। जब जोधपुर राज्य के लोग चूना भट्टे के लिए खेजड़ी काटने आए, तब अमृता देवी तथा सैकड़ों बिश्नोई पेड़ों से चिपक गए और मारे गए। गुरु जंभेश्वर की बिश्नोई संहिता हरे वृक्ष काटने से रोकती है, और केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने अमृता देवी के नाम पर वन्यजीव सुरक्षा पुरस्कार रखा है।
स्रोत
- भारत के पवित्र उपवन: स्थानीय नाम, वितरण और संरक्षण महत्व — पारिस्थितिक विरासत और पवित्र स्थल संरक्षण एनविस केंद्र, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय
- वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972: धारा 36क से 36घ, संरक्षण तथा सामुदायिक रिजर्व — पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय
- जैव विविधता अधिनियम, 2002: जैव विविधता प्रबंधन समितियां और जैव विविधता विरासत स्थल — राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण
- अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 — जनजातीय कार्य मंत्रालय





