कार्बन क्रेडिट, नेट ज़ीरो और हरित वित्त नोट्स
कार्बन क्रेडिट और कार्बन बाज़ार पर परीक्षा नोट्स: क्योटो की व्यवस्थाएँ, पेरिस समझौते का अनुच्छेद 6, नेट ज़ीरो लक्ष्य, भारत की सीसीटीएस और हरित बॉन्ड।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 6 मिनट

कार्बन क्रेडिट एक व्यापार योग्य अनुमति-पत्र है जो वायुमंडल में जाने से रोकी गई एक टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य गैस को दर्शाता है, जिसे 1 tCO2e लिखा जाता है। यह रोक उत्सर्जन घटाकर, उसे टालकर या वायुमंडल से गैस हटाकर हो सकती है। इसके पीछे का तर्क सीधा है। वायुमंडल को इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि एक टन कार्बन डाइऑक्साइड कहाँ बची; किसी देश में सस्ते में बचाई गई एक टन जलवायु के लिए उतनी ही उपयोगी है जितनी किसी दूसरे देश में महँगे में बचाई गई एक टन। उस एक टन पर कीमत लगा देने से सबसे सस्ती कटौतियाँ पहले होती हैं। परीक्षाओं में यह अध्याय अपनी शब्दावली, उन संधियों जिन्होंने व्यापार की व्यवस्थाएँ बनाईं, और भारत के नए कार्बन बाज़ार के कारण पूछा जाता है। यह समाचारों में भी बना रहता है, क्योंकि भारत के नगर निकायों ने कचरे से ऊर्जा, बायो-सीएनजी और मलजल शोधन परियोजनाओं से क्रेडिट कमाना शुरू कर दिया है।
कार्बन क्रेडिट कैसे बनता है
हर क्रेडिट की शुरुआत एक आधार रेखा से होती है, अर्थात उतनी ग्रीनहाउस गैस जो उस परियोजना के बने बिना वायुमंडल में चली जाती। आधार रेखा और परियोजना के वास्तविक उत्सर्जन का अंतर ही वह बचत है जिस पर क्रेडिट मिल सकता है। यह बचत सच्ची है या नहीं, यह तीन कसौटियाँ तय करती हैं। अतिरिक्तता पूछती है कि क्या परियोजना व्यापारिक कारणों से अपने आप हो ही जाती; यदि हाँ, तो क्रेडिट नहीं बनता। स्थायित्व पूछता है कि कार्बन बँधा रहेगा या नहीं, जो वनीकरण परियोजनाओं के लिए गंभीर प्रश्न है क्योंकि एक आग सारी बचत मिटा देती है। रिसाव पूछता है कि उत्सर्जन कहीं और खिसक तो नहीं गया। इसके बाद बचत को मापा जाता है, उसकी रिपोर्ट दी जाती है और किसी मान्यता प्राप्त तीसरे पक्ष से उसका सत्यापन कराया जाता है; इस चक्र को एमआरवी कहते हैं। तब क्रेडिट किसी रजिस्ट्री में दर्ज होता है। जब कोई खरीदार क्रेडिट का उपयोग अपने उत्सर्जन की भरपाई में करता है, तो उसे निरस्त कर दिया जाता है ताकि वही क्रेडिट दो बार न गिना या बेचा जा सके।
कार्बन कर और कैप-एंड-ट्रेड
सरकारें कार्बन पर कीमत दो तरह से लगाती हैं। कार्बन कर प्रति टन कीमत तय कर देता है और उत्सर्जन की मात्रा बाज़ार पर छोड़ देता है। कैप-एंड-ट्रेड या उत्सर्जन व्यापार प्रणाली सीमित संख्या में भत्ते जारी करके मात्रा तय कर देती है और कीमत बाज़ार पर छोड़ देती है; जो कंपनियाँ अपनी सीमा से नीचे रहती हैं वे अपना अधिशेष उन कंपनियों को बेच देती हैं जो सीमा पार कर जाती हैं। यूरोपीय संघ की उत्सर्जन व्यापार प्रणाली, जो 2005 में शुरू हुई, इस प्रकार की दुनिया की पहली बड़ी अंतरराष्ट्रीय योजना थी। अनुपालन बाज़ार वह है जिसमें भाग लेना कानून से अनिवार्य है; स्वैच्छिक बाज़ार वह है जिसमें कंपनियाँ अपनी इच्छा से क्रेडिट खरीदती हैं, आमतौर पर नेट ज़ीरो का दावा करने के लिए, और ग्रीनवाशिंग का आरोप इसी हिस्से पर लगता है।
क्योटो प्रोटोकॉल और उसकी तीन व्यवस्थाएँ
क्योटो प्रोटोकॉल 1997 में जापान में सीओपी-3 में स्वीकार किया गया और 2005 में प्रभावी हुआ। इसने यूएनएफसीसीसी की अनुसूची एक में सूचीबद्ध विकसित देशों के लिए बाध्यकारी उत्सर्जन कटौती लक्ष्य रखे और उन्हें ये लक्ष्य सस्ते में पूरे करने के लिए तीन लचीली व्यवस्थाएँ दीं।
| व्यवस्था | अनुच्छेद | क्रेडिट इकाई | विचार |
|---|---|---|---|
| स्वच्छ विकास तंत्र | अनुच्छेद 12 | प्रमाणित उत्सर्जन कटौती (सीईआर) | विकसित देश विकासशील देश में परियोजना के लिए धन देता है |
| संयुक्त कार्यान्वयन | अनुच्छेद 6 | उत्सर्जन कटौती इकाई (ईआरयू) | एक विकसित देश दूसरे विकसित देश में परियोजना लगाता है |
| अंतरराष्ट्रीय उत्सर्जन व्यापार | अनुच्छेद 17 | नियत मात्रा इकाई (एएयू) | देश अपने उत्सर्जन भत्ते का हिस्सा आपस में बेचते हैं |
क्योटो के अंतर्गत भारत पर कोई कटौती लक्ष्य नहीं था, फिर भी भारत ने स्वच्छ विकास तंत्र की बहुत बड़ी संख्या में परियोजनाएँ अपने यहाँ लगवाईं और सीईआर के सबसे बड़े विक्रेताओं में रहा, मुख्यतः नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता और औद्योगिक गैस परियोजनाओं से। सीईआर की आय का एक हिस्सा अनुकूलन कोष को जाता था।
पेरिस समझौता और अनुच्छेद 6
पेरिस समझौता 2015 में सीओपी-21 में स्वीकार हुआ और नवंबर 2016 में प्रभावी हुआ। क्योटो से अलग, यह हर देश से, विकसित और विकासशील दोनों से, राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान माँगता है। इसका अनुच्छेद 6 बाज़ार की सारी व्यवस्था रखता है। अनुच्छेद 6.2 दो देशों को द्विपक्षीय सहयोग करके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हस्तांतरित शमन परिणाम बेचने देता है, और विक्रेता के खाते में संगत समायोजन करता है ताकि एक ही टन दो बार न गिनी जाए। अनुच्छेद 6.4 संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में एक केंद्रीकृत क्रेडिट व्यवस्था बनाता है, जो स्वच्छ विकास तंत्र की उत्तराधिकारी है। अनुच्छेद 6.8 गैर-बाज़ार उपायों को समेटता है, जैसे वित्त, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और क्षमता निर्माण।
नेट ज़ीरो और भारत के संकल्प
नेट ज़ीरो का अर्थ है कि कोई देश जितनी ग्रीनहाउस गैस अब भी छोड़ता है, उतनी ही गैस वन, मिट्टी या इंजीनियरी कार्बन-निष्कासन जैसे सिंक सोख लें। यह संतुलन है, उत्सर्जन का अंत नहीं, इसीलिए इसे कार्बन निरपेक्षता भी कहा जाता है। ग्लासगो में 2021 के सीओपी-26 में भारत ने पाँच हिस्सों वाला संकल्प रखा, जिसे पंचामृत कहा गया: 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता, 2030 तक अपनी ऊर्जा आवश्यकता का आधा नवीकरणीय स्रोतों से, 2030 तक अनुमानित उत्सर्जन में एक अरब टन की कटौती, 2005 के स्तर की तुलना में 2030 तक सकल घरेलू उत्पाद की उत्सर्जन तीव्रता में 45 प्रतिशत की कमी, और 2070 तक नेट ज़ीरो। इस सूची के पहले दो लक्ष्य, संशोधित रूप में, भारत के अद्यतन राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान का केंद्र हैं।
भारत का कार्बन बाज़ार और हरित वित्त
कार्बन बाज़ार से पहले ही भारत में प्रमाण-पत्रों के दो बाज़ार चल रहे थे। परफ़ॉर्म, अचीव एंड ट्रेड योजना ऊर्जा-गहन संयंत्रों को विशिष्ट ऊर्जा खपत का लक्ष्य देती है और लक्ष्य से बेहतर करने वालों को ऊर्जा बचत प्रमाण-पत्र, यानी ईएससर्ट, देती है। नवीकरणीय ऊर्जा प्रमाण-पत्र किसी बाध्य खरीदार को संयंत्र लगाए बिना अपना नवीकरणीय खरीद दायित्व पूरा करने देते हैं। दोनों विद्युत एक्सचेंजों पर खरीदे-बेचे जाते हैं। इसके बाद ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2022 ने केंद्र सरकार को कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना अधिसूचित करने का अधिकार दिया, जिसमें ऊर्जा दक्षता ब्यूरो प्रशासक है, ग्रिड कंट्रोलर ऑफ़ इंडिया रजिस्ट्री रखता है और केंद्रीय विद्युत विनियामक आयोग नियामक है; इसमें बाध्य इकाइयों के लिए अनुपालन पक्ष और स्वैच्छिक परियोजनाओं के लिए ऑफ़सेट पक्ष है। वित्त के पक्ष में, भारत ने 2022 में सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड का ढाँचा प्रकाशित किया और रिज़र्व बैंक ने सरकार की ओर से जनवरी 2023 में पहले बॉन्ड जारी किए, जिनका धन नवीकरणीय ऊर्जा, स्वच्छ परिवहन और इसी प्रकार के खर्चों के लिए निर्धारित था। रिज़र्व बैंक ने बैंकों में हरित जमा के नियम भी बनाए हैं, और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड बड़ी सूचीबद्ध कंपनियों से व्यावसायिक उत्तरदायित्व और संधारणीयता रिपोर्ट प्रकाशित कराता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हरित जलवायु कोष, वैश्विक पर्यावरण सुविधा और अनुकूलन कोष विकासशील देशों को धन पहुँचाते हैं, और सीओपी-27 में तय हुआ हानि एवं क्षति कोष सीओपी-28 में क्रियाशील किया गया।
परीक्षा की दृष्टि से
प्रश्न तीन तरह के आते हैं। पहला, सीधी परिभाषाएँ: एक कार्बन क्रेडिट किसके बराबर है, सीईआर, ईआरयू, एएयू, आईटीएमओ और ईएससर्ट का पूरा रूप क्या है, और इन्हें किस संधि या अनुच्छेद ने बनाया। दूसरा, मिलान के प्रश्न: क्योटो की व्यवस्था के साथ उसका अनुच्छेद और क्रेडिट इकाई, या भारतीय योजना के साथ उसे चलाने वाली संस्था; यहाँ जाल यह है कि ऊर्जा दक्षता ब्यूरो को विद्युत मंत्रालय के बजाय पर्यावरण मंत्रालय के अधीन बता दिया जाए, या कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना का श्रेय ऊर्जा संरक्षण अधिनियम के बजाय पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 को दे दिया जाए। तीसरा, पंचामृत के आँकड़े और नेट ज़ीरो के वर्ष: भारत 2070, चीन 2060 और अधिकांश विकसित देश 2050 जानबूझकर आपस में बदल दिए जाते हैं, और वह सीओपी भी जिसमें घोषणा हुई। याद रखें कि क्योटो ने केवल अनुसूची एक के देशों को बाँधा था जबकि पेरिस सबसे योगदान माँगता है, और नेट ज़ीरो उत्सर्जन तथा निष्कासन का संतुलन है, शून्य उत्सर्जन नहीं।
महत्वपूर्ण तथ्य
| एक कार्बन क्रेडिट | एक टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य, 1 tCO2e |
|---|---|
| क्योटो प्रोटोकॉल | 1997 में सीओपी-3, क्योटो में स्वीकार; 2005 में प्रभावी |
| स्वच्छ विकास तंत्र | क्योटो प्रोटोकॉल का अनुच्छेद 12; क्रेडिट सीईआर |
| संयुक्त कार्यान्वयन | क्योटो प्रोटोकॉल का अनुच्छेद 6; क्रेडिट ईआरयू |
| क्योटो में उत्सर्जन व्यापार | अनुच्छेद 17; इकाई नियत मात्रा इकाई (एएयू) |
| पेरिस समझौता | 2015 में सीओपी-21 में स्वीकार; नवंबर 2016 से प्रभावी |
| पेरिस समझौते में बाज़ार व्यवस्था | अनुच्छेद 6; 6.2 आईटीएमओ, 6.4 केंद्रीकृत क्रेडिट, 6.8 गैर-बाज़ार |
| भारत का नेट ज़ीरो वर्ष | 2070, 2021 में ग्लासगो के सीओपी-26 में घोषित |
| पंचामृत का गैर-जीवाश्म लक्ष्य | 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता |
| उत्सर्जन तीव्रता लक्ष्य | 2005 की तुलना में 2030 तक जीडीपी की उत्सर्जन तीव्रता में 45 प्रतिशत कमी |
| कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना | ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2022 से संभव हुई |
| सीसीटीएस का प्रशासक | ऊर्जा दक्षता ब्यूरो, विद्युत मंत्रालय के अधीन |
| ईएससर्ट | परफ़ॉर्म, अचीव एंड ट्रेड योजना के ऊर्जा बचत प्रमाण-पत्र |
| भारत के पहले सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड | जनवरी 2023 में, वित्त वर्ष 2022-23 में जारी |
| दुनिया की पहली बड़ी उत्सर्जन व्यापार प्रणाली | यूरोपीय संघ उत्सर्जन व्यापार प्रणाली, 2005 में शुरू |
| हानि एवं क्षति कोष | सीओपी-27 में तय, सीओपी-28 में क्रियाशील |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
एक कार्बन क्रेडिट कितनी ग्रीनहाउस गैस की कटौती को दर्शाता है?
- A.एक किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य
- B.सौ किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य
- C.एक टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य
- D.एक हज़ार टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. एक टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य
व्याख्या
सही उत्तर है C, एक टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य। टन ही हर कार्बन बाज़ार की, अनुपालन हो या स्वैच्छिक, मानक व्यापार इकाई है और इसे 1 tCO2e लिखा जाता है। समतुल्य शब्द महत्वपूर्ण है: कार्बन डाइऑक्साइड से भिन्न गैसों को उनकी वैश्विक तापन क्षमता से कार्बन डाइऑक्साइड में बदला जाता है, इसलिए मेथेन या नाइट्रस ऑक्साइड की बहुत कम मात्रा भी एक क्रेडिट दिला सकती है। A गलत है क्योंकि किलोग्राम बाज़ार इकाई बनने के लिए बहुत छोटा है; कोई रजिस्ट्री किलोग्राम में क्रेडिट जारी नहीं करती। B इसी कारण गलत है, और सौ किलोग्राम तो वास्तविक इकाई का दसवाँ भाग है, जो आधा-अधूरा याद रखने वाले परीक्षार्थी को फँसाने के लिए रखा जाता है। D गलत है क्योंकि एक हज़ार टन किसी छोटी परियोजना की पूरे वर्ष की बचत का पैमाना है, एक क्रेडिट का नहीं; उतनी बड़ी परियोजना को एक हज़ार अलग-अलग क्रेडिट मिलते हैं, और इसी कारण खरीदार उन्हें छोटी-छोटी मात्रा में खरीद पाते हैं।
स्वच्छ विकास तंत्र किस अंतरराष्ट्रीय समझौते ने बनाया था?
- A.मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल
- B.क्योटो प्रोटोकॉल
- C.कार्टाजेना प्रोटोकॉल
- D.नागोया प्रोटोकॉल
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. क्योटो प्रोटोकॉल
व्याख्या
सही उत्तर है B, क्योटो प्रोटोकॉल। यह 1997 में जापान में सीओपी-3 में स्वीकार हुआ और 2005 से प्रभावी हुआ; इसने विकसित देशों के लिए बाध्यकारी उत्सर्जन लक्ष्य रखे और उन्हें पूरा करने के लिए तीन लचीली व्यवस्थाएँ दीं। इनमें से स्वच्छ विकास तंत्र, अनुच्छेद 12 के अंतर्गत, किसी विकसित देश को विकासशील देश में उत्सर्जन घटाने वाली परियोजना में धन लगाकर उस बचत को प्रमाणित उत्सर्जन कटौती के रूप में लेने देता था। A गलत है क्योंकि 1987 का मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल क्लोरोफ्लोरोकार्बन जैसी ओज़ोन-क्षयकारी गैसों से जुड़ा है और उसमें उत्सर्जन व्यापार की कोई व्यवस्था नहीं है। C गलत है क्योंकि जैव विविधता अभिसमय के अंतर्गत कार्टाजेना प्रोटोकॉल जीवित रूपांतरित जीवों के सीमापार आवागमन का नियमन करता है। D गलत है क्योंकि उसी अभिसमय का नागोया प्रोटोकॉल आनुवंशिक संसाधनों तक पहुँच और लाभ के न्यायसंगत बँटवारे पर है। कार्बन क्रेडिट बनाने वाले जलवायु संधि-परिवार का सदस्य केवल क्योटो प्रोटोकॉल है।
स्वच्छ विकास तंत्र के अंतर्गत बनने वाले क्रेडिट किस नाम से जाने जाते हैं?
- A.उत्सर्जन कटौती इकाई
- B.नियत मात्रा इकाई
- C.प्रमाणित उत्सर्जन कटौती
- D.नवीकरणीय ऊर्जा प्रमाण-पत्र
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. प्रमाणित उत्सर्जन कटौती
व्याख्या
सही उत्तर है C, प्रमाणित उत्सर्जन कटौती, जिसे सीईआर कहा जाता है। प्रत्येक सीईआर एक टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य के बराबर है और किसी मान्यता प्राप्त तीसरे पक्ष के सत्यापन के बाद ही जारी होता है। भारत ने ऐसी बहुत बड़ी संख्या में परियोजनाएँ अपने यहाँ लगवाईं और सीईआर के सबसे बड़े विक्रेताओं में रहा। A गलत है क्योंकि उत्सर्जन कटौती इकाई संयुक्त कार्यान्वयन से बनती है, जिसमें एक विकसित देश दूसरे विकसित देश में परियोजना लगाता है, किसी विकासशील देश में नहीं। B गलत है क्योंकि नियत मात्रा इकाई विकसित देशों को स्वयं दिया गया उत्सर्जन भत्ता है, जो अनुच्छेद 17 के अंतर्गत सरकारों के बीच सीधे बिकता है, किसी परियोजना से कमाया नहीं जाता। D गलत है क्योंकि नवीकरणीय ऊर्जा प्रमाण-पत्र भारत का घरेलू साधन है जो बाध्य खरीदार को संयंत्र लगाए बिना नवीकरणीय खरीद दायित्व पूरा करने देता है; वह नवीकरणीय बिजली मापता है, टाली गई गैस नहीं, और क्योटो प्रोटोकॉल में उसकी कोई मान्यता नहीं है।
पेरिस समझौते का कौन-सा अनुच्छेद सहयोगात्मक उपायों और केंद्रीकृत क्रेडिट तंत्र की व्यवस्था करता है?
- A.अनुच्छेद 2
- B.अनुच्छेद 6
- C.अनुच्छेद 9
- D.अनुच्छेद 14
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. अनुच्छेद 6
व्याख्या
सही उत्तर है B, अनुच्छेद 6। पेरिस समझौते की सारी बाज़ार व्यवस्था इसी में है: अनुच्छेद 6.2 दो देशों को द्विपक्षीय सहयोग करके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हस्तांतरित शमन परिणाम बेचने देता है, और संगत समायोजन से यह सुनिश्चित करता है कि एक ही टन दो बार न गिनी जाए; अनुच्छेद 6.4 संयुक्त राष्ट्र की किसी संस्था की निगरानी में केंद्रीकृत क्रेडिट तंत्र बनाता है, जो स्वच्छ विकास तंत्र की उत्तराधिकारी है; और अनुच्छेद 6.8 वित्त तथा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण जैसे गैर-बाज़ार उपाय समेटता है। A गलत है क्योंकि अनुच्छेद 2 समझौते का उद्देश्य बताता है, जिसमें तापमान वृद्धि को दो डिग्री सेल्सियस से काफ़ी नीचे रोकना शामिल है। C गलत है क्योंकि अनुच्छेद 9 विकसित देशों से विकासशील देशों को जलवायु वित्त पर है। D गलत है क्योंकि अनुच्छेद 14 वैश्विक समीक्षा, यानी सामूहिक प्रगति के समय-समय पर मूल्यांकन, की व्यवस्था करता है। ध्यान रखें कि क्योटो प्रोटोकॉल का अनुच्छेद 6 संयुक्त कार्यान्वयन है, जो अलग विषय है।
भारत ने 2070 तक नेट ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य किस सीओपी में घोषित किया था?
- A.सीओपी-21, पेरिस
- B.सीओपी-24, कातोविचे
- C.सीओपी-26, ग्लासगो
- D.सीओपी-28, दुबई
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. सीओपी-26, ग्लासगो
व्याख्या
सही उत्तर है C, ग्लासगो का सीओपी-26, जो 2021 में हुआ और जिसमें भारत ने सम्मेलन के समक्ष पाँच हिस्सों वाला संकल्प रखा, जिसे पंचामृत कहा जाता है: 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता, 2030 तक ऊर्जा आवश्यकता का आधा नवीकरणीय स्रोतों से, 2030 तक अनुमानित उत्सर्जन में एक अरब टन की कटौती, 2005 के स्तर की तुलना में 2030 तक सकल घरेलू उत्पाद की उत्सर्जन तीव्रता में 45 प्रतिशत कमी, और 2070 तक नेट ज़ीरो। A गलत है क्योंकि 2015 के सीओपी-21 में पेरिस समझौता ही बना, उससे वर्षों बाद भारत ने नेट ज़ीरो का वर्ष बताया। B गलत है क्योंकि 2018 में पोलैंड का सीओपी-24 पारदर्शिता और लेखांकन पर पेरिस नियम-पुस्तिका के लिए याद किया जाता है। D गलत है क्योंकि 2023 का सीओपी-28 पहली वैश्विक समीक्षा, हानि एवं क्षति कोष के क्रियाशील होने और जीवाश्म ईंधन से हटने के आह्वान से जुड़ा है, भारत की नेट ज़ीरो घोषणा से नहीं।
भारत की कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना किस कानून में संशोधन से संभव हुई?
- A.पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986
- B.विद्युत अधिनियम, 2003
- C.ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001
- D.वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001
व्याख्या
सही उत्तर है C, ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001। ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2022 ने इसमें केंद्र सरकार को कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना अधिसूचित करने का अधिकार जोड़ा, और इसी कारण यह बाज़ार पर्यावरण मंत्रालय के बजाय विद्युत मंत्रालय तथा उसके ऊर्जा दक्षता ब्यूरो के पास है। A गलत है, और यही सबसे आम जाल है, क्योंकि पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 मानकों, अधिसूचनाओं और पर्यावरण-संवेदी क्षेत्रों का छत्र कानून है, व्यापार योग्य क्रेडिट का नहीं। B गलत है क्योंकि विद्युत अधिनियम, 2003 उत्पादन, पारेषण, वितरण और शुल्क विनियमन से जुड़ा है; नवीकरणीय खरीद दायित्व वहाँ है, कार्बन क्रेडिट नहीं। D गलत है क्योंकि वायु अधिनियम, 1981 ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड बनाए और वह कणिका पदार्थ तथा सल्फर डाइऑक्साइड जैसे स्थानीय प्रदूषकों से जुड़ा है, जिनका नियमन सहमति और मानकों से होता है, व्यापार से नहीं।
भारत की कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना का प्रशासक कौन-सी संस्था है?
- A.केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
- B.ऊर्जा दक्षता ब्यूरो
- C.भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड
- D.नीति आयोग
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. ऊर्जा दक्षता ब्यूरो
व्याख्या
सही उत्तर है B, ऊर्जा दक्षता ब्यूरो, जो ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 के अंतर्गत बना वैधानिक निकाय है और विद्युत मंत्रालय के अधीन है। वह पहले से परफ़ॉर्म, अचीव एंड ट्रेड योजना चला रहा था, इसलिए कार्बन बाज़ार के लिए आवश्यक मापन और सत्यापन का अनुभव उसके पास था। उसी योजना में ग्रिड कंट्रोलर ऑफ़ इंडिया रजिस्ट्री रखता है और केंद्रीय विद्युत विनियामक आयोग व्यापार का नियमन करता है। A गलत है क्योंकि पर्यावरण मंत्रालय के अधीन केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड प्रदूषण मानक तय और लागू करता है तथा वायु और जल की गुणवत्ता पर निगरानी रखता है; वह सहमति देता है, क्रेडिट नहीं। C गलत है क्योंकि भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड प्रतिभूति बाज़ार और हरित ऋण के प्रकटन नियमों का नियमन करता है, कार्बन क्रेडिट का नहीं। D गलत है क्योंकि नीति आयोग नीति-विषयक संस्था है और किसी व्यापार योजना पर उसका कोई नियामक या प्रशासनिक अधिकार नहीं है।
ऊर्जा बचत प्रमाण-पत्र, यानी ईएससर्ट, किस योजना के अंतर्गत जारी किए जाते हैं?
- A.परफ़ॉर्म, अचीव एंड ट्रेड
- B.उजाला
- C.फ़ेम इंडिया
- D.सौभाग्य
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. परफ़ॉर्म, अचीव एंड ट्रेड
व्याख्या
सही उत्तर है A, परफ़ॉर्म, अचीव एंड ट्रेड, जिसे संक्षेप में पीएटी कहते हैं। यह संवर्धित ऊर्जा दक्षता राष्ट्रीय मिशन के अंतर्गत बाज़ार-आधारित योजना है। सीमेंट, इस्पात, एल्युमिनियम, उर्वरक और तापीय विद्युत जैसे ऊर्जा-गहन उद्योगों की प्रत्येक नामित उपभोक्ता इकाई को विशिष्ट ऊर्जा खपत का लक्ष्य दिया जाता है; लक्ष्य से बेहतर करने वाले संयंत्र को ईएससर्ट मिलते हैं और चूक जाने वाले संयंत्र को वे खरीदने पड़ते हैं, जिसकी सुविधा विद्युत एक्सचेंज देते हैं। B गलत है क्योंकि उजाला वह योजना थी जिसमें घरों को सस्ते दाम पर एलईडी बल्ब बाँटे गए, यह सीधा दक्षता कार्यक्रम था और इसमें कोई प्रमाण-पत्र नहीं था। C गलत है क्योंकि फ़ेम इंडिया विद्युत और संकर वाहनों तथा चार्जिंग ढाँचे को सहायता देती है। D गलत है क्योंकि सौभाग्य घरेलू विद्युतीकरण की योजना थी। केवल पीएटी में प्रमाण-पत्रों का व्यापार होता है, इसीलिए उसे भारत के कार्बन बाज़ार का पूर्वज माना जाता है।
भारत ने अपने पहले सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड किस वित्त वर्ष में जारी किए?
- A.2018-19
- B.2020-21
- C.2022-23
- D.2024-25
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. 2022-23
व्याख्या
सही उत्तर है C, 2022-23। उसी वर्ष के केंद्रीय बजट में यह मंशा घोषित हुई, सरकार ने 2022 में सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड का ढाँचा प्रकाशित किया, और भारतीय रिज़र्व बैंक ने सरकार की ओर से पहली किश्त की नीलामी जनवरी 2023 में की, जिसका धन नवीकरणीय ऊर्जा, स्वच्छ परिवहन, ऊर्जा दक्षता, संधारणीय जल प्रबंधन और वनीकरण के लिए निर्धारित था। A गलत है क्योंकि 2018-19 तक केवल भारतीय कंपनियों और सार्वजनिक उपक्रमों ने हरित बॉन्ड जारी किए थे, सरकार ने नहीं। B गलत है क्योंकि 2020-21 महामारी के उधार से भरा वर्ष था और उसमें कोई हरित निर्गम नहीं हुआ। D गलत है क्योंकि 2024-25 तक सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड उधारी कैलेंडर का स्थापित हिस्सा बन चुके थे, पहला निर्गम नहीं। परीक्षार्थी को बहुत पहले शुरू हुए कॉर्पोरेट हरित बॉन्ड को जनवरी 2023 के सरकारी निर्गम से अलग रखना चाहिए।
सीओपी-26 में घोषित पंचामृत के अंतर्गत भारत ने गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता का कौन-सा लक्ष्य रखा?
- A.2022 तक 175 गीगावाट
- B.2030 तक 450 गीगावाट
- C.2030 तक 500 गीगावाट
- D.2047 तक 1,000 गीगावाट
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. 2030 तक 500 गीगावाट
व्याख्या
सही उत्तर है C, 2030 तक 500 गीगावाट, जो 2021 में ग्लासगो के सीओपी-26 के समक्ष रखे पंचामृत का पहला संकल्प था। शेष चार थे: 2030 तक भारत की ऊर्जा आवश्यकता का आधा नवीकरणीय स्रोतों से, 2030 तक अनुमानित उत्सर्जन में एक अरब टन की कटौती, 2005 की तुलना में 2030 तक सकल घरेलू उत्पाद की उत्सर्जन तीव्रता में 45 प्रतिशत कमी, और 2070 तक नेट ज़ीरो। A गलत है क्योंकि 2022 तक 175 गीगावाट 2015 में घोषित पुराना नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य था, जो अलग और बहुत छोटा संकल्प है। B गलत है क्योंकि 450 गीगावाट वह आँकड़ा था जिसकी बात भारत ग्लासगो से पहले करता था और यही सबसे प्रचलित भ्रम है; पंचामृत ने उसे बढ़ा दिया। D गलत है क्योंकि ग्लासगो में एक हज़ार गीगावाट का ऐसा कोई संकल्प नहीं रखा गया। ध्यान रहे कि 500 गीगावाट का लक्ष्य समस्त गैर-जीवाश्म क्षमता गिनता है, इसलिए सौर और पवन के साथ बड़ी पनबिजली तथा परमाणु भी इसमें शामिल हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
एक कार्बन क्रेडिट उत्सर्जन में कितना मूल्य रखता है?
एक कार्बन क्रेडिट एक टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य गैस को दर्शाता है, जिसे 1 tCO2e लिखते हैं। समतुल्य शब्द महत्वपूर्ण है: कार्बन डाइऑक्साइड से भिन्न गैसों को उनकी वैश्विक तापन क्षमता से कार्बन डाइऑक्साइड में बदला जाता है, इसलिए मेथेन जैसी प्रबल गैस की कम मात्रा भी एक टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर क्रेडिट दिला सकती है।
कार्बन कर और कार्बन बाज़ार में क्या अंतर है?
कार्बन कर एक टन कार्बन की कीमत तय कर देता है और उत्सर्जन की मात्रा जहाँ जाकर रुके वहाँ रुकने देता है। कार्बन बाज़ार, यानी कैप-एंड-ट्रेड प्रणाली, सीमित भत्ते जारी करके मात्रा तय कर देती है और कीमत व्यापार से तय होने देती है। कर कीमत की निश्चितता देता है, बाज़ार कुल उत्सर्जन की निश्चितता देता है।
क्या नेट ज़ीरो का अर्थ शून्य उत्सर्जन है?
नहीं। नेट ज़ीरो का अर्थ है कि देश जितनी ग्रीनहाउस गैस अब भी छोड़ता है, उतनी ही मात्रा वन और मिट्टी जैसे सिंक या इंजीनियरी निष्कासन से वायुमंडल से हटा दी जाए। उत्सर्जन चलता रहता है, उसकी भरपाई होती है। शून्य उत्सर्जन, जिसे पूर्ण शून्य भी कहते हैं, का अर्थ कुछ भी न छोड़ना होता।
किस कानून से भारत में कार्बन क्रेडिट बाज़ार संभव हुआ?
ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2022 ने ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 में संशोधन कर केंद्र सरकार को कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना अधिसूचित करने का अधिकार दिया। ऊर्जा दक्षता ब्यूरो इसका प्रशासन करता है, ग्रिड कंट्रोलर ऑफ़ इंडिया रजिस्ट्री रखता है और केंद्रीय विद्युत विनियामक आयोग व्यापार का नियमन करता है।
सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड क्या होते हैं?
ये सरकार के ऐसे ऋण-पत्र हैं जिनका धन पर्यावरण को लाभ देने वाली परियोजनाओं के लिए निर्धारित होता है, जैसे नवीकरणीय ऊर्जा, स्वच्छ परिवहन, ऊर्जा दक्षता और वनीकरण। भारत ने 2022 में इनका ढाँचा जारी किया और भारतीय रिज़र्व बैंक ने सरकार की ओर से पहली किश्त जनवरी 2023 में जारी की।
कार्बन परियोजना में अतिरिक्तता क्यों आवश्यक है?
क्रेडिट का उद्देश्य उस कटौती का भुगतान करना है जो अन्यथा होती ही नहीं। यदि कोई कारखाना पैसे की बचत के कारण दक्ष बॉयलर अपने आप लगा लेता, तो उस बॉयलर पर क्रेडिट देना कागज़ पर बचत बनाता है और जलवायु को कोई लाभ नहीं देता, जबकि क्रेडिट निरस्त करने वाला खरीदार उत्सर्जन करता रहता है। अतिरिक्तता वही कसौटी है जो क्रेडिट को ईमानदार रखती है।
स्रोत
- पेरिस समझौता और अनुच्छेद 6 के सहयोगात्मक उपाय — संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन संरचना अभिसमय
- क्योटो प्रोटोकॉल: व्यवस्थाएँ और इकाइयाँ — संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन संरचना अभिसमय
- ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2022 — विधि और न्याय मंत्रालय, भारत सरकार
- सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड का ढाँचा — वित्त मंत्रालय, भारत सरकार
- परफ़ॉर्म, अचीव एंड ट्रेड तथा कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना — ऊर्जा दक्षता ब्यूरो, विद्युत मंत्रालय





