मृदा प्रदूषण और मरुस्थलीकरण: कारण, UNCCD और मृदा संरक्षण
मृदा प्रदूषण और मरुस्थलीकरण पर परीक्षोपयोगी नोट्स: स्रोत, भारी धातुओं से रोग, अपरदन के प्रकार, UNCCD और 17 जून तथा भारत के मृदा संरक्षण उपाय।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 4 मिनट

मृदा बनने में सदियां लगती हैं और नष्ट होने में कुछ मौसम। ऊपरी मिट्टी की एक सेंटीमीटर परत बनने में सैकड़ों वर्ष का अपक्षय, जड़ों की क्रिया और जैविक अपघटन लगता है, परंतु नंगी ढाल पर एक ही मानसून उसे बहा ले जाता है। यही असंतुलन मृदा प्रदूषण, भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण को पर्यावरण पाठ्यक्रम का स्थायी अध्याय बनाता है। तीनों जुड़े हैं पर एक नहीं हैं। मृदा प्रदूषण का अर्थ है मिट्टी में हानिकारक पदार्थों का मिलना। भूमि क्षरण का अर्थ है भूमि की उत्पादक क्षमता में स्थायी गिरावट। मरुस्थलीकरण का अर्थ है शुष्क, अर्ध-शुष्क और शुष्क उप-आर्द्र क्षेत्रों में होने वाला भूमि क्षरण। पहले से मौजूद रेगिस्तान मरुस्थलीकरण नहीं हैं; यह शब्द उपजाऊ भूमि के रेगिस्तान जैसा हो जाने के लिए है।
मृदा प्रदूषण और उसके स्रोत
औद्योगिक बहिःस्राव, तापीय बिजलीघरों की फ्लाई ऐश, खनन का मलबा, चर्म शोधन और विद्युत लेपन के अपशिष्ट, नगरीय ठोस कचरा और कचराघरों का रिसाव, प्लास्टिक, इलेक्ट्रॉनिक कचरा तथा रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग इसके मुख्य स्रोत हैं। आवश्यकता से अधिक नाइट्रोजनी उर्वरक नाइट्रेट बनकर नीचे रिसता है और फॉस्फेटी उर्वरकों के साथ अशुद्धि के रूप में कैडमियम आता है। डीडीटी जैसे स्थायी कार्बनिक प्रदूषक खाद्य श्रृंखला में बढ़ते जाते हैं, जिसे जैव आवर्धन कहते हैं। भारी धातुएं सबसे अधिक पूछी जाती हैं क्योंकि हर धातु एक रोग से जुड़ी है। कैडमियम से इटाई-इटाई रोग, पारे से मिनामाता रोग, सीसे से तंत्रिका और रक्त संबंधी विकार तथा गंगा के मैदान के कुछ भागों के भूजल और मिट्टी में आर्सेनिक से त्वचा के घाव और ब्लैक-फुट रोग होते हैं।
भूमि क्षरण के रूप
भारत में जल अपरदन सबसे बड़ा रूप है। यह छींट अपरदन से शुरू होकर परत अपरदन बनता है, जिसमें मिट्टी की पतली तह समान रूप से उतर जाती है, फिर अवनालिका (रिल) अपरदन और अंत में गहरी नालियां बनाता है। तीव्र अवनालिका अपरदन से उत्खात भूमि बनती है, जिसका उदाहरण मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश की चंबल की बीहड़ भूमि है। पश्चिमी राजस्थान में वायु अपरदन प्रमुख है, जो अपवाहन, अपघर्षण और संनिघर्षण से काम करता है और चलायमान बालुका स्तूप बनाता है। नहरी सिंचाई वाले क्षेत्रों में जलस्तर ऊपर आने से लवण सतह पर आ जाते हैं और लवणता तथा क्षारीयता फैलती है; ऐसी भूमि को सिंधु-गंगा के मैदान में रेह, कल्लर या ऊसर कहते हैं। जलभराव जड़ों के लिए आवश्यक वायु स्थान समाप्त कर देता है। पूर्वोत्तर की झूम खेती परती अवधि घटाकर ढालों की मिट्टी उतार देती है। खनन, उत्खनन, ईंट भट्ठे और अनियोजित निर्माण मृदा परिच्छेदिका को पूरी तरह हटा देते हैं।
मरुस्थलीकरण और वैश्विक प्रयास
मरुस्थलीकरण रोकथाम संबंधी संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCCD) 17 जून 1994 को पेरिस में अपनाया गया और दिसंबर 1996 में लागू हुआ। यह तीन रियो अभिसमयों में से एक है, शेष दो जलवायु परिवर्तन पर UNFCCC और जैव विविधता अभिसमय हैं; इसका सचिवालय जर्मनी के बॉन में है। इसे अपनाने की वर्षगांठ हर साल 17 जून को विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस के रूप में मनाई जाती है। भारत ने 1996 में इसका अनुसमर्थन किया और 2019 में नई दिल्ली के पास ग्रेटर नोएडा में इसका चौदहवां पक्षकार सम्मेलन आयोजित किया, जिससे नई दिल्ली घोषणापत्र निकला। इसका मार्गदर्शक लक्ष्य भूमि क्षरण तटस्थता है, जो सतत विकास लक्ष्य 15 (भूमि पर जीवन) के अंतर्गत लक्ष्य 15.3 के रूप में दर्ज है। 2019 के सम्मेलन में भारत ने 2030 तक 2.6 करोड़ हेक्टेयर क्षरित भूमि को पुनर्स्थापित करने की घोषणा की।
भारतीय संस्थान और कार्यक्रम
| संस्था या कार्यक्रम | स्थान या वर्ष | कार्य |
|---|---|---|
| केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) | जोधपुर, 1959 | मरुस्थल और शुष्क भूमि अनुसंधान |
| केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान | करनाल | लवणीय और क्षारीय भूमि सुधार |
| भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान | भोपाल | मृदा स्वास्थ्य और उर्वरता |
| अंतरिक्ष उपयोग केंद्र, इसरो | अहमदाबाद | भारत का मरुस्थलीकरण एवं भूमि क्षरण एटलस |
| मरुस्थल विकास कार्यक्रम | 1977-78 | शुष्क क्षेत्रों का विकास |
| मरुस्थलीकरण रोकथाम राष्ट्रीय कार्य योजना | 2001 | UNCCD के अंतर्गत भारत की योजना |
मृदा संरक्षण के उपाय
- समोच्च जुताई - ढाल के आर-पार जुताई, जिससे हर कूंड बहते पानी को रोके।
- सीढ़ीदार खेती - पहाड़ी ढालों को सीढ़ियों में काटना, जो हिमालय और नीलगिरि में दिखती है।
- पट्टीदार खेती - सघन उगने वाली और कतार वाली फसलों की बारी-बारी पट्टियां।
- रक्षक मेखला या वायुरोधक - हवा के आर-पार वृक्षों की कतारें, जो तटीय और शुष्क क्षेत्रों का सामान्य उत्तर है।
- पलवार (मल्चिंग) - नंगी मिट्टी को पुआल या अवशेष से ढकना।
- अवनालिका भराव और चेक डैम - बीहड़ों में पानी की गति घटाकर गाद बैठाना।
- फसल चक्र और नियंत्रित चराई - पोषक तत्व लौटाना और चरागाह को उबरने देना।
- जैव उपचार और पादप उपचार - सूक्ष्मजीवों या पौधों से प्रदूषित मिट्टी के संदूषक खींचना।
परीक्षक को यह अंतर प्रिय है: रासायनिक उर्वरक डालना क्षरण का कारण है, संरक्षण तकनीक नहीं, जबकि जैविक खाद, हरी खाद और राइजोबियम जैसे जैव उर्वरक डालना संरक्षण है।
परीक्षा की दृष्टि से
इस अध्याय से चार खंड पूछे जाते हैं। पहला, परिभाषा का जाल: मरुस्थलीकरण शुष्क भूमि का क्षरण है, किसी मौजूदा रेगिस्तान का फैलाव नहीं, और भूमि क्षरण इससे व्यापक शब्द है। दूसरा, UNCCD के तथ्य, जहां 1994 पेरिस और 1996 में लागू होना, 17 जून का दोहरा महत्व तथा सचिवालय बॉन विकल्पों में आपस में बदल दिए जाते हैं। तीसरा, भारी धातु और रोग की जोड़ियां, जिनमें कैडमियम-इटाई-इटाई और पारा-मिनामाता कभी उलटनी नहीं चाहिए। चौथा, अपरदन के प्रकार और संरक्षण विधियों का मिलान: तटीय और शुष्क क्षेत्रों में वायु के लिए रक्षक मेखला, ढालों पर जल के लिए समोच्च जुताई और सीढ़ीदार खेती, तथा असंगत विकल्प जो प्रायः रासायनिक उर्वरक ही होता है। जोधपुर, करनाल, भोपाल और अहमदाबाद के संस्थान एक अंक के नियमित प्रश्न हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य
| UNCCD अपनाया गया | 17 जून 1994, पेरिस; दिसंबर 1996 में लागू |
|---|---|
| UNCCD सचिवालय | बॉन, जर्मनी |
| रियो अभिसमय | UNFCCC, जैव विविधता अभिसमय, UNCCD |
| विश्व मरुस्थलीकरण एवं सूखा रोकथाम दिवस | 17 जून |
| UNCCD COP14 | ग्रेटर नोएडा, भारत, 2019; नई दिल्ली घोषणापत्र |
| भूमि क्षरण तटस्थता | सतत विकास लक्ष्य 15 का लक्ष्य 15.3 |
| इटाई-इटाई रोग | कैडमियम |
| मिनामाता रोग | पारा |
| भारत की उत्खात भूमि | चंबल के बीहड़, गली अपरदन से निर्मित |
| काजरी | केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान, जोधपुर, 1959 |
| केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान | करनाल, हरियाणा |
| मरुस्थलीकरण एवं भूमि क्षरण एटलस | अंतरिक्ष उपयोग केंद्र, इसरो, अहमदाबाद |
| मरुस्थल विकास कार्यक्रम | 1977-78 में शुरू |
| उत्तर भारत की लवण प्रभावित भूमि | रेह, कल्लर या ऊसर |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
निम्नलिखित में से कौन-सी मृदा संरक्षण विधि सामान्यतः तटीय और शुष्क क्षेत्रों में अपनाई जाती है?
- A.समोच्च जुताई
- B.सीढ़ीदार खेती
- C.पलवार (मल्चिंग)
- D.रक्षक मेखला (शेल्टर बेल्ट)
उत्तर देखें
सही उत्तर: D. रक्षक मेखला (शेल्टर बेल्ट)
व्याख्या
सही उत्तर D, रक्षक मेखला (शेल्टर बेल्ट) है। रक्षक मेखला प्रचलित हवा की दिशा के आर-पार लगाई गई वृक्षों और झाड़ियों की कतार या पट्टी होती है। यह हवा के खेत तक पहुंचने से पहले ही उसका वेग तोड़ देती है, और चूंकि पश्चिमी राजस्थान जैसे शुष्क क्षेत्रों तथा खुले तटों पर वायु अपरदन ही मिट्टी हानि का प्रमुख रूप है, इसलिए वहां यही उपाय चुना जाता है; यह बालुका स्तूपों के बढ़ने को भी रोकती है। A गलत है क्योंकि समोच्च जुताई में कूंड ढाल की समोच्च रेखा के साथ बनाए जाते हैं ताकि बहता पानी रुके, अर्थात यह ढलवां भूमि के जल अपरदन का उत्तर है, हवा का नहीं। B गलत है क्योंकि सीढ़ीदार खेती पहाड़ी ढाल को समतल सीढ़ियों में काटती है और हिमालय तथा नीलगिरि जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में होती है। C गलत है क्योंकि पलवार नंगी मिट्टी को पुआल या फसल अवशेष से ढककर वाष्पन और छींट अपरदन घटाती है, जो सहायक उपाय है पर तटीय और शुष्क क्षेत्रों की विशिष्ट विधि नहीं।
निम्नलिखित में से कौन मृदा संरक्षण की प्रमुख तकनीक नहीं है?
- A.पशु चराई पर नियंत्रण
- B.फसल चक्र
- C.रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग
- D.पट्टीदार खेती
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग
व्याख्या
सही उत्तर C, रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग है। प्रश्न असंगत विकल्प पूछ रहा है, और रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक प्रयोग मिट्टी का संरक्षण नहीं, क्षरण करता है: इससे मिट्टी अम्लीय होती है, सूक्ष्मजीव मरते हैं, लवण अवशेष जमा होते हैं तथा अतिरिक्त नाइट्रेट और फॉस्फेट जलाशयों में बहकर सुपोषण (यूट्रोफिकेशन) करते हैं। मृदा संरक्षण के लिए जैविक खाद, हरी खाद और जैव उर्वरक प्रयोग किए जाते हैं। A वास्तविक संरक्षण तकनीक है, क्योंकि अनियंत्रित चराई घास का आवरण हटाकर मिट्टी को हवा और वर्षा के सामने खोल देती है। B भी वास्तविक तकनीक है, क्योंकि अनाज के साथ दलहनी फसल का चक्र मूल ग्रंथिका जीवाणुओं से नाइट्रोजन लौटाता है और कीट चक्र तोड़ता है। D भी सही तकनीक है, क्योंकि पट्टीदार खेती में सघन फसल की पट्टियां खुली पट्टियों से बहकर आती मिट्टी को रोक लेती हैं।
मरुस्थलीकरण रोकथाम संबंधी संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCCD) किस वर्ष अपनाया गया था?
- A.1992
- B.1994
- C.1996
- D.2001
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. 1994
व्याख्या
सही उत्तर B, 1994 है। मरुस्थलीकरण रोकथाम संबंधी संयुक्त राष्ट्र अभिसमय 17 जून 1994 को पेरिस में अपनाया गया और दिसंबर 1996 में लागू हुआ। यह एकमात्र कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय समझौता है जो पर्यावरण और विकास को सतत भूमि प्रबंधन से जोड़ता है, और इसे तीन रियो अभिसमयों में तीसरा गिना जाता है। A गलत है क्योंकि 1992 रियो डी जनेरियो के पृथ्वी शिखर सम्मेलन का वर्ष है, जहां UNFCCC और जैव विविधता अभिसमय हस्ताक्षर के लिए खोले गए थे और सरकारों ने केवल मरुस्थलीकरण संधि पर वार्ता करने पर सहमति दी थी। C गलत है क्योंकि 1996 वह वर्ष है जब अभिसमय लागू हुआ और भारत ने इसका अनुसमर्थन किया, अपनाने का वर्ष नहीं; इसी जोड़ी में अभ्यर्थी फंसते हैं। D गलत है क्योंकि 2001 में भारत की मरुस्थलीकरण रोकथाम राष्ट्रीय कार्य योजना बनी थी।
विश्व मरुस्थलीकरण एवं सूखा रोकथाम दिवस किस तिथि को मनाया जाता है?
- A.5 जून
- B.17 जून
- C.22 अप्रैल
- D.16 सितंबर
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. 17 जून
व्याख्या
सही उत्तर B, 17 जून है। यह दिवस 17 जून 1994 को पेरिस में मरुस्थलीकरण रोकथाम संबंधी संयुक्त राष्ट्र अभिसमय अपनाए जाने की वर्षगांठ है, और संयुक्त राष्ट्र महासभा ने उसी वर्ष इसकी घोषणा की थी ताकि सरकारें हर साल भूमि पुनर्स्थापन की प्रगति देखें। A गलत है क्योंकि 5 जून विश्व पर्यावरण दिवस है, जो 1972 के स्टॉकहोम सम्मेलन के बाद शुरू हुआ और पहली बार 1973 में मनाया गया। C गलत है क्योंकि 22 अप्रैल अंतरराष्ट्रीय धरती माता दिवस है, जो 1970 में अमेरिका में मनाए गए पहले अर्थ डे से निकला और किसी संयुक्त राष्ट्र अभिसमय की वर्षगांठ नहीं है। D गलत है क्योंकि 16 सितंबर ओजोन परत संरक्षण का अंतरराष्ट्रीय दिवस है, जो 1987 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर का स्मरण कराता है। इन तिथियों को अलग-अलग याद रखना एसएससी और रेलवे में बार-बार काम आता है।
इटाई-इटाई रोग किस भारी धातु से प्रदूषित मिट्टी और जल के कारण होता है?
- A.सीसा
- B.पारा
- C.कैडमियम
- D.आर्सेनिक
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. कैडमियम
व्याख्या
सही उत्तर C, कैडमियम है। इटाई-इटाई, जिसका जापानी में अर्थ है ओह-ओह या पीड़ा की चीख, सबसे पहले जापान की जिंत्सू नदी घाटी में दर्ज हुआ, जहां खान के अपशिष्ट से कैडमियम सिंचाई के पानी में और फिर प्रदूषित मिट्टी में उगाए गए चावल में पहुंचा। कैडमियम हड्डियों को कमजोर करता है और गुर्दों को क्षति पहुंचाता है, जिससे हड्डियां आसानी से टूटती हैं और वही तीव्र पीड़ा होती है जिससे रोग का नाम पड़ा। फॉस्फेटी उर्वरक में कैडमियम प्राकृतिक अशुद्धि के रूप में रहता है, इसीलिए उर्वरक का अत्यधिक प्रयोग मृदा प्रदूषण की चिंता है। A गलत है क्योंकि सीसा विषाक्तता से रक्ताल्पता और तंत्रिका तंत्र को क्षति होती है, विशेषकर बच्चों में। B गलत है क्योंकि पारे से मिनामाता रोग होता है, जो तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है। D गलत है क्योंकि आर्सेनिक से त्वचा के घाव, अतिकेराटोसिस और ब्लैक-फुट रोग होते हैं।
2019 में भारत में आयोजित UNCCD के चौदहवें पक्षकार सम्मेलन (COP14) में कौन-सा घोषणापत्र अपनाया गया?
- A.रियो घोषणापत्र
- B.नई दिल्ली घोषणापत्र
- C.नागोया प्रोटोकॉल
- D.बॉन चैलेंज
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. नई दिल्ली घोषणापत्र
व्याख्या
सही उत्तर B, नई दिल्ली घोषणापत्र है। भारत ने 2019 में नई दिल्ली के पास ग्रेटर नोएडा में UNCCD का चौदहवां पक्षकार सम्मेलन आयोजित किया और यह सम्मेलन नई दिल्ली घोषणापत्र के साथ समाप्त हुआ, जिसमें पक्षकारों ने क्षरित भूमि की पुनर्स्थापना और भूमि क्षरण तटस्थता की दिशा में काम करने का संकल्प लिया। इसी मंच से भारत ने 2030 तक 2.6 करोड़ हेक्टेयर क्षरित भूमि पुनर्स्थापित करने की घोषणा की। A गलत है क्योंकि पर्यावरण और विकास पर रियो घोषणापत्र 1992 के पृथ्वी शिखर सम्मेलन से निकला था और उसमें सत्ताईस सिद्धांत थे। C गलत है क्योंकि 2010 का नागोया प्रोटोकॉल जैव विविधता अभिसमय से जुड़ा है और आनुवंशिक संसाधनों तक पहुंच तथा लाभ साझेदारी से संबंधित है। D गलत है क्योंकि बॉन चैलेंज 2011 में शुरू हुआ स्वैच्छिक वैश्विक वन भूदृश्य पुनर्स्थापन लक्ष्य है, इस सम्मेलन का घोषणापत्र नहीं।
केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) किस शहर में स्थित है?
- A.जयपुर
- B.जोधपुर
- C.बीकानेर
- D.अहमदाबाद
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. जोधपुर
व्याख्या
सही उत्तर B, जोधपुर है। केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान की स्थापना 1959 में राजस्थान के जोधपुर में हुई थी और यह भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अधीन काम करता है। यह थार मरुस्थल की पारिस्थितिकी, बालुका स्तूपों के स्थिरीकरण, रक्षक मेखला रोपण, शुष्क खेती प्रणालियों और शुष्क क्षेत्रों में जल संचयन पर शोध करता है, इसीलिए भारत में मरुस्थलीकरण रोकथाम के किसी भी प्रश्न में सबसे पहले इसी का नाम आता है। A गलत है क्योंकि जयपुर राजस्थान की राजधानी होने पर भी इस संस्थान का स्थान नहीं है। C गलत है क्योंकि बीकानेर थार में गहरे स्थित है और वहां कृषि विश्वविद्यालय है, काजरी नहीं। D गलत है क्योंकि अहमदाबाद में इसरो का अंतरिक्ष उपयोग केंद्र है, जो भारत का मरुस्थलीकरण एवं भूमि क्षरण एटलस प्रकाशित करता है; मानचित्रण संस्था और अनुसंधान संस्थान को मिलाना ही इस प्रश्न का जाल है।
लवणीय और क्षारीय मृदा के सुधार पर कार्य करने वाला आईसीएआर संस्थान कहां स्थित है?
- A.करनाल
- B.हिसार
- C.लुधियाना
- D.कानपुर
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. करनाल
व्याख्या
सही उत्तर A, करनाल है। केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान हरियाणा के करनाल में है और यह लवण प्रभावित मिट्टी के सुधार, सिंचाई में खराब गुणवत्ता वाले जल के उपयोग, जलभराव वाली भूमि में भूमिगत जल निकासी तथा लवण सहिष्णु फसल किस्मों पर काम करने वाला राष्ट्रीय संस्थान है। लवण प्रभावित भूमि, जिसे सिंधु-गंगा के मैदान में रेह, कल्लर या ऊसर कहते हैं, भारत में भूमि क्षरण के सबसे बड़े रूपों में है, इसीलिए यह संस्थान पर्यावरण और कृषि दोनों के प्रश्नपत्रों में आता है। B गलत है क्योंकि हिसार में चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय और केंद्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान हैं। C गलत है क्योंकि लुधियाना में पंजाब कृषि विश्वविद्यालय है। D गलत है क्योंकि कानपुर में भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान और आईआईटी हैं, पर मृदा लवणता इनका कार्यक्षेत्र नहीं है।
चंबल घाटी की उत्खात (बीहड़) भूमि किस प्रकार के अपरदन का परिणाम है?
- A.परत अपरदन
- B.अवनालिका (रिल) अपरदन
- C.गली अपरदन
- D.वायु अपरदन
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. गली अपरदन
व्याख्या
सही उत्तर C, गली अपरदन है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश की चंबल द्रोणी में बहते पानी ने मुलायम जलोढ़ में गहरी और खड़ी दीवारों वाली नालियां काट दी हैं, और जब ये नालियां बढ़ती और चौड़ी होती जाती हैं तो भूमि खेती योग्य नहीं रहती। ऐसी कटी-फटी भूमि को उत्खात भूमि या बीहड़ कहते हैं, और चंबल के बीहड़ गली अपरदन का मानक भारतीय उदाहरण हैं। A गलत है क्योंकि परत अपरदन में ऊपरी मिट्टी की पतली और समान तह बड़े क्षेत्र से उतरती है और कोई दृश्य नाली नहीं बनती, इसीलिए यह सबसे छिपा हुआ रूप माना जाता है। B गलत है क्योंकि अवनालिका अपरदन बीच की अवस्था है जिसमें छोटी अंगुली जैसी नालियां बनती हैं जिन्हें जोतकर मिटाया जा सकता है। D गलत है क्योंकि वायु अपरदन बालुका स्तूप और अपवाहन गर्त बनाता है और पश्चिमी राजस्थान में प्रमुख है।
UNCCD का सचिवालय किस शहर में स्थित है?
- A.जिनेवा
- B.नैरोबी
- C.बॉन
- D.पेरिस
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. बॉन
व्याख्या
सही उत्तर C, बॉन है। मरुस्थलीकरण रोकथाम संबंधी संयुक्त राष्ट्र अभिसमय का स्थायी सचिवालय 1999 से जर्मनी के बॉन में है, उसी संयुक्त राष्ट्र परिसर में जहां UNFCCC का सचिवालय भी है; यह याद रखने की अच्छी कड़ी है क्योंकि दोनों रियो अभिसमय हैं और दोनों के सचिवालय एक ही जर्मन शहर में हैं। A गलत है क्योंकि जिनेवा में विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व मौसम विज्ञान संगठन, विश्व व्यापार संगठन और जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल का सचिवालय है, UNCCD नहीं। B गलत है क्योंकि नैरोबी संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम और यूएन-हैबिटेट का मुख्यालय है, जिसे अक्सर इससे मिला दिया जाता है। D गलत है क्योंकि पेरिस में 1994 में यह अभिसमय अपनाया गया था और वहां यूनेस्को का मुख्यालय है, पर अभिसमय का कार्यकारी सचिवालय वहां नहीं है।
निम्नलिखित में से कौन-सा तीन रियो अभिसमयों में शामिल नहीं है?
- A.जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क अभिसमय
- B.जैव विविधता अभिसमय
- C.मरुस्थलीकरण रोकथाम संबंधी संयुक्त राष्ट्र अभिसमय
- D.आर्द्रभूमि पर रामसर अभिसमय
उत्तर देखें
सही उत्तर: D. आर्द्रभूमि पर रामसर अभिसमय
व्याख्या
सही उत्तर D, आर्द्रभूमि पर रामसर अभिसमय है। रामसर अभिसमय 1971 में ईरान के रामसर में हस्ताक्षरित हुआ और 1975 में लागू हुआ, अर्थात पृथ्वी शिखर सम्मेलन से दो दशक पहले, और इसका सचिवालय स्विट्जरलैंड के ग्लांड में है; इसलिए इसका रियो से कोई संबंध नहीं है। तीन रियो अभिसमय वे हैं जो 1992 में रियो डी जनेरियो में हुए पर्यावरण एवं विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन से निकले। A उत्तर के रूप में गलत है क्योंकि UNFCCC 1992 में रियो में हस्ताक्षर हेतु खोला गया और 1994 में लागू हुआ। B उत्तर के रूप में गलत है क्योंकि जैव विविधता अभिसमय भी 1992 में रियो में खोला गया और 1993 में लागू हुआ। C उत्तर के रूप में गलत है क्योंकि UNCCD यद्यपि 1994 में पेरिस में अपनाया गया, पर इसका आदेश रियो के एजेंडा 21 से आया था और इसे तीसरा रियो अभिसमय गिना जाता है।
भूमि क्षरण तटस्थता किस सतत विकास लक्ष्य के अंतर्गत एक लक्ष्य है?
- A.एसडीजी 6
- B.एसडीजी 13
- C.एसडीजी 14
- D.एसडीजी 15
उत्तर देखें
सही उत्तर: D. एसडीजी 15
व्याख्या
सही उत्तर D, एसडीजी 15 है। सतत विकास लक्ष्य 15 का नाम भूमि पर जीवन है, और इसका लक्ष्य 15.3 देशों को मरुस्थलीकरण से लड़ने, मरुस्थलीकरण, सूखे और बाढ़ से प्रभावित भूमि तथा मृदा को पुनर्स्थापित करने और भूमि क्षरण की दृष्टि से तटस्थ विश्व बनाने के लिए प्रतिबद्ध करता है। भूमि क्षरण तटस्थता का अर्थ है कि स्वस्थ और उत्पादक भूमि की मात्रा स्थिर रहे या बढ़े, क्योंकि जितनी भूमि क्षरित हो उतनी ही पुनर्स्थापित भी की जाए। A गलत है क्योंकि एसडीजी 6 स्वच्छ जल और स्वच्छता है। B गलत है क्योंकि एसडीजी 13 जलवायु कार्रवाई है, जो सूखे और कार्बन हानि के रास्ते भूमि क्षरण से जुड़ा तो है पर तटस्थता का लक्ष्य नहीं रखता। C गलत है क्योंकि एसडीजी 14 जल के नीचे जीवन है और महासागरों तथा समुद्री संसाधनों से संबंधित है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण में क्या अंतर है?
भूमि क्षरण भूमि की उत्पादक क्षमता में किसी भी स्थायी गिरावट को कहते हैं और यह कहीं भी हो सकता है। मरुस्थलीकरण वह भूमि क्षरण है जो विशेष रूप से शुष्क, अर्ध-शुष्क और शुष्क उप-आर्द्र क्षेत्रों में होता है। मौजूदा रेगिस्तान का नई भूमि में फैलना उसका केवल एक रूप है; मुख्यतः यह शब्द कभी उपजाऊ रही शुष्क भूमि के बंजर होने के लिए प्रयुक्त होता है।
मरुस्थलीकरण से संबंधित अभिसमय कौन-सा है और वह कब अपनाया गया?
मरुस्थलीकरण रोकथाम संबंधी संयुक्त राष्ट्र अभिसमय, जो 17 जून 1994 को पेरिस में अपनाया गया और दिसंबर 1996 से लागू है। इसका सचिवालय जर्मनी के बॉन में है और यह UNFCCC तथा जैव विविधता अभिसमय के साथ तीन रियो अभिसमयों में तीसरा है।
कौन-सी भारी धातुएं मिट्टी को प्रदूषित करती हैं और उनसे कौन-से रोग होते हैं?
कैडमियम से इटाई-इटाई रोग, पारे से मिनामाता रोग, सीसे से रक्ताल्पता और तंत्रिका क्षति, आर्सेनिक से त्वचा के घाव तथा ब्लैक-फुट रोग और चर्मशोधन से निकले क्रोमियम से त्वचा और फेफड़ों को क्षति होती है। धातु और रोग की ये जोड़ियां मृदा प्रदूषण का सबसे अधिक पूछा जाने वाला भाग हैं।
मृदा अपरदन के मुख्य प्रकार कौन-से हैं?
जल अपरदन छींट, परत, अवनालिका और गली अवस्थाओं से गुजरता है, जिसमें गली अपरदन चंबल जैसी उत्खात भूमि बनाता है। वायु अपरदन अपवाहन, अपघर्षण और संनिघर्षण से होता है और पश्चिमी राजस्थान में प्रमुख है। नदी तट अपरदन, भूस्खलन, लवणीकरण और जलभराव भूमि क्षरण के अन्य सामान्य रूप हैं।
रक्षक मेखला किसलिए लगाई जाती है?
रक्षक मेखला प्रचलित हवा की दिशा के आर-पार लगाई गई वृक्षों की कतार या पट्टी होती है। यह हवा के खेत तक पहुंचने से पहले उसका वेग घटाती है, वायु अपरदन और बालुका स्तूपों के खिसकने को रोकती है, और पश्चिमी राजस्थान जैसे शुष्क क्षेत्रों तथा खुले तटों पर यही उपाय अपनाया जाता है।
भूमि क्षरण पर कौन-से भारतीय संस्थान कार्य करते हैं?
जोधपुर का काजरी शुष्क क्षेत्र पर, करनाल का केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान लवणीय और क्षारीय मृदा के सुधार पर, भोपाल का भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान मृदा स्वास्थ्य पर और अहमदाबाद का इसरो अंतरिक्ष उपयोग केंद्र भारत का मरुस्थलीकरण एवं भूमि क्षरण एटलस प्रकाशित करने का कार्य करता है।
स्रोत
- भारत: भौतिक पर्यावरण (कक्षा XI), मृदा अध्याय — एनसीईआरटी
- मरुस्थलीकरण रोकथाम संबंधी संयुक्त राष्ट्र अभिसमय — संयुक्त राष्ट्र
- भारत का मरुस्थलीकरण एवं भूमि क्षरण एटलस — अंतरिक्ष उपयोग केंद्र, इसरो





