संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन: कॉप स्थल और परिणाम
परीक्षा के लिए यूएनएफसीसीसी कॉप सम्मेलनों के पूरे नोट्स: रियो अभिसमय, क्योटो प्रोटोकॉल, पेरिस समझौता, जलवायु निधियां, भारत का पंचामृत और कॉप स्थलों की सूची।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 6 मिनट

हर साल जलवायु अभिसमय पर हस्ताक्षर करने वाले देश दो सप्ताह के लिए मिलते हैं, इस पर बहस करते हैं कि उत्सर्जन कौन घटाएगा और पैसा कौन देगा, और पीछे मेजबान शहर के नाम वाला एक दस्तावेज छोड़ जाते हैं। वही दस्तावेज जलवायु राजनीति का परीक्षा-योग्य केंद्र हैं, और जो विद्यार्थी शहर, वर्ष और परिणाम का मेल बैठा लेता है वह इस विषय के अधिकांश प्रश्न हल कर लेता है। ये बैठकें फिर समाचार में हैं: अक्टूबर 2026 में फिजी में हुई यूएनएफसीसीसी प्री-कॉप31 वार्ता, जिसकी सह-मेजबानी ऑस्ट्रेलिया, फिजी और तुवालू ने की, में भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने समता तथा साझी पर अलग-अलग जिम्मेदारियों के सिद्धांत को अक्षरशः निभाने पर जोर दिया। यह नोट अभिसमय, उसके दो समझौते, निधियां और याद रखने योग्य सम्मेलन सामने रखता है।
वह अभिसमय जिसके ये सम्मेलन हैं
जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क अभिसमय जून 1992 में रियो डी जेनेरो के पृथ्वी शिखर सम्मेलन में हस्ताक्षर के लिए खोला गया और 21 मार्च 1994 को प्रभाव में आया। इसका सचिवालय जर्मनी के बॉन में है। अभिसमय उत्सर्जन लक्ष्य तय नहीं करता; वह सिद्धांत तय करता है, और उनमें दो हर बाद के विवाद का निपटारा करते हैं। पहला है साझी पर अलग-अलग जिम्मेदारियां और संबंधित क्षमताएं, जिसके अनुसार सभी देशों को कार्य करना है पर औद्योगिक देशों ने संचित उत्सर्जन का बड़ा भाग किया है, इसलिए वे पहले कार्य करेंगे और दूसरों की मदद करेंगे। दूसरा है पूर्वोपाय सिद्धांत, जो कहता है कि वैज्ञानिक अनिश्चितता देरी का बहाना नहीं है। अभिसमय देशों को अनुसूची एक यानी औद्योगिक तथा संक्रमणशील अर्थव्यवस्थाओं, अनुसूची दो यानी वे धनी देश जिन्हें वित्त और प्रौद्योगिकी देनी है, तथा गैर-अनुसूची एक यानी विकासशील देशों में बांटता है, जिनमें भारत और चीन हैं।
पक्षकारों का सम्मेलन या कॉप अभिसमय का सर्वोच्च निर्णयकारी निकाय है और 1995 से हर वर्ष, संयुक्त राष्ट्र के पांच क्षेत्रीय समूहों में क्रम से, बैठता है। दो स्थायी निकाय उसका कार्य तैयार करते हैं: वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकीय सलाह हेतु सहायक निकाय और कार्यान्वयन हेतु सहायक निकाय। क्योटो प्रोटोकॉल के पक्षकार साथ में सीएमपी के रूप में और पेरिस समझौते के पक्षकार सीएमए के रूप में बैठते हैं। विज्ञान अभिसमय के बाहर से जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल देता है, जिसे 1988 में विश्व मौसम विज्ञान संगठन तथा संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने बनाया और जिसे 2007 में नोबेल शांति पुरस्कार साझा रूप में मिला।
क्योटो प्रोटोकॉल
1997 में जापान के क्योटो में हुए तीसरे कॉप ने बाध्यकारी लक्ष्यों वाला पहला समझौता दिया। क्योटो प्रोटोकॉल 11 दिसंबर 1997 को अंगीकृत हुआ और रूस के अनुसमर्थन के बाद 16 फरवरी 2005 को प्रभाव में आया। अनुसूची एक के देशों ने 2008 से 2012 की पहली प्रतिबद्धता अवधि में अपने 1990 के उत्सर्जन स्तर से औसतन लगभग पांच प्रतिशत कटौती स्वीकार की; विकासशील देशों पर कोई लक्ष्य नहीं रखा गया। तीन लचीले तंत्र किसी देश को सस्ते में लक्ष्य पूरा करने देते हैं: उत्सर्जन व्यापार, नियत मात्रा इकाइयों की खरीद-बिक्री; संयुक्त कार्यान्वयन, किसी अन्य विकसित देश में परियोजना; और स्वच्छ विकास तंत्र, किसी विकासशील देश में परियोजना जो प्रमाणित उत्सर्जन कटौती कमाती है। भारत ने ऐसी बड़ी संख्या में परियोजनाएं मेजबानी में लीं। 2012 के दोहा संशोधन ने 2013 से 2020 की दूसरी प्रतिबद्धता अवधि जोड़ी, और इसके बाद प्रोटोकॉल की जगह पेरिस समझौता आया।
पेरिस समझौता
इक्कीसवें कॉप ने 2015 में पेरिस में 12 दिसंबर 2015 को पेरिस समझौता अंगीकृत किया; यह 4 नवंबर 2016 को प्रभाव में आया। इसने ऊपर से थोपे लक्ष्यों की जगह राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान रखे, जो हर देश स्वयं लिखता है और हर पांच वर्ष में बढ़ाकर प्रस्तुत करता है। इसका तापमान लक्ष्य वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तर से दो डिग्री सेल्सियस से स्पष्ट रूप से नीचे रखना है, और साथ ही डेढ़ डिग्री तक सीमित करने का प्रयास करना है। सामूहिक प्रगति की वैश्विक समीक्षा हर पांच वर्ष में होती है, जिसमें पहली 2023 में पूरी हुई। अनुच्छेद 6 स्वच्छ विकास तंत्र की जगह सहयोगात्मक उपायों तथा नए बाजार तंत्र का प्रावधान करता है। समझौता अपनी प्रक्रियाओं, जैसे रिपोर्टिंग और समीक्षा, में कानूनी रूप से बाध्यकारी है, पर लक्ष्य हर देश स्वयं तय करता है, और इसी कारण उसे लगभग सार्वभौमिक सदस्यता मिली।
निधियां
- वैश्विक पर्यावरण सुविधा 1991 में बनी और अभिसमय का पहला वित्तीय तंत्र थी; यह आज भी अनुकूलन और रिपोर्टिंग का वित्तपोषण करती है।
- अनुकूलन निधि क्योटो प्रोटोकॉल के अंतर्गत तय हुई और स्वच्छ विकास तंत्र परियोजनाओं की आय के दो प्रतिशत हिस्से से वित्तपोषित होती थी।
- हरित जलवायु निधि 2010 में कानकुन में तय हुई और उसका मुख्यालय कोरिया गणराज्य के सोंगदो में है; कोपेनहेगन में की गई सालाना सौ अरब डॉलर की प्रतिज्ञा का यह मुख्य माध्यम है।
- 2013 का वारसॉ अंतरराष्ट्रीय तंत्र हानि एवं क्षति के लिए पहली संस्था थी, अर्थात उस नुकसान के लिए जिसे अनुकूलन अब रोक नहीं सकता; समर्पित हानि एवं क्षति निधि 2022 में शर्म अल-शेख में तय हुई और 2023 में दुबई में स्थापित हुई।
याद रखने योग्य सम्मेलन
| कॉप | वर्ष और स्थल | परिणाम |
|---|---|---|
| कॉप1 | 1995, बर्लिन | बर्लिन अधिदेश, बाध्यकारी लक्ष्यों पर वार्ता का निर्णय |
| कॉप3 | 1997, क्योटो | अनुसूची एक के बाध्यकारी लक्ष्यों वाला क्योटो प्रोटोकॉल |
| कॉप8 | 2002, नई दिल्ली | विकास और जलवायु परिवर्तन पर दिल्ली घोषणा |
| कॉप13 | 2007, बाली | बाली कार्य योजना और रोडमैप |
| कॉप15 | 2009, कोपेनहेगन | कोपेनहेगन समझौता; दो डिग्री लक्ष्य और वित्त की प्रतिज्ञा |
| कॉप16 | 2010, कानकुन | हरित जलवायु निधि और कानकुन अनुकूलन ढांचा |
| कॉप17 | 2011, डरबन | उन्नत कार्रवाई हेतु डरबन मंच |
| कॉप19 | 2013, वारसॉ | हानि एवं क्षति हेतु वारसॉ अंतरराष्ट्रीय तंत्र |
| कॉप21 | 2015, पेरिस | पेरिस समझौता; भारत और फ्रांस द्वारा अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन की शुरुआत |
| कॉप24 | 2018, काटोविस | रिपोर्टिंग और समीक्षा के लिए पेरिस नियमपुस्तिका |
| कॉप26 | 2021, ग्लासगो | ग्लासगो जलवायु संधि; कोयले की चरणबद्ध कमी; भारत का पंचामृत |
| कॉप28 | 2023, दुबई | पहली वैश्विक समीक्षा और हानि एवं क्षति निधि |
सम्मेलनों में भारत
भारत हर कॉप में यह तर्क रखता आया है कि शेष कार्बन बजट में किसी देश का हिस्सा उसके पिछले उत्सर्जन और विकास की आवश्यकताओं के अनुरूप हो। 2015 में पेरिस में भारत और फ्रांस ने अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन शुरू किया, जिसका सचिवालय गुरुग्राम में है। 2021 में ग्लासगो में भारत ने पंचामृत नाम से पांच संकल्प रखे: 2030 तक पांच सौ गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता, 2030 तक देश की आधी ऊर्जा आवश्यकता नवीकरणीय स्रोतों से, 2030 तक अनुमानित उत्सर्जन में एक अरब टन की कटौती, 2030 तक अर्थव्यवस्था की उत्सर्जन तीव्रता 2005 के स्तर से पैंतालीस प्रतिशत कम, और 2070 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन। 2022 के अद्यतन राष्ट्रीय निर्धारित योगदान में इनमें से अंतिम दो औपचारिक रूप से अभिसमय को सौंपे गए। भारत ने मिशन लाइफ यानी पर्यावरण हेतु जीवनशैली का विचार भी सम्मेलन के सामने रखा, यह कहते हुए कि उत्सर्जन केवल उत्पादन से नहीं, व्यक्तिगत मांग से भी चलता है।
परीक्षा की दृष्टि से
चार तरह के प्रश्न बार-बार आते हैं। पहला, स्थल और वर्ष का मेल: क्योटो 1997, कोपेनहेगन 2009, कानकुन 2010, पेरिस 2015, ग्लासगो 2021 और दुबई 2023 याद रखने योग्य जोड़े हैं, तथा नई दिल्ली 2002 इसलिए पूछा जाता है कि मेजबानी भारत ने की। दूसरा, कौन दस्तावेज किस सम्मेलन से आया, जहां हरित जलवायु निधि और हानि एवं क्षति तंत्र सामान्य उत्तर हैं। तीसरा, दोनों समझौतों का अंतर: क्योटो में विकसित देशों पर ऊपर से बाध्यकारी लक्ष्य थे, पेरिस में सभी के लिए स्वनिर्धारित योगदान हैं। चौथा, क्योटो के तंत्र, जहां विकासशील देश में परियोजना के प्रश्न का उत्तर लगभग सदा स्वच्छ विकास तंत्र होता है। आम जाल पेरिस समझौते को कॉप21 के बजाय कॉप20 में रखना, आईपीसीसी को अभिसमय का निकाय मान लेना जबकि वह 1988 में डब्ल्यूएमओ तथा यूएनईपी ने बनाया, और हरित जलवायु निधि को 1991 की वैश्विक पर्यावरण सुविधा से मिला देना है।
महत्वपूर्ण तथ्य
| यूएनएफसीसीसी अंगीकरण | पृथ्वी शिखर सम्मेलन, रियो डी जेनेरो, जून 1992; 21 मार्च 1994 को प्रभावी |
|---|---|
| यूएनएफसीसीसी सचिवालय | बॉन, जर्मनी |
| क्योटो प्रोटोकॉल | कॉप3 में 11 दिसंबर 1997 को अंगीकृत; 16 फरवरी 2005 को प्रभावी |
| क्योटो के लचीले तंत्र | उत्सर्जन व्यापार, संयुक्त कार्यान्वयन और स्वच्छ विकास तंत्र |
| पेरिस समझौता | कॉप21 में 12 दिसंबर 2015 को अंगीकृत; 4 नवंबर 2016 को प्रभावी |
| पेरिस का तापमान लक्ष्य | पूर्व-औद्योगिक स्तर से दो डिग्री सेल्सियस से स्पष्ट नीचे, डेढ़ डिग्री का प्रयास |
| वैश्विक समीक्षा | पेरिस समझौते के तहत हर पांच वर्ष; पहली 2023 में पूरी |
| हरित जलवायु निधि | कॉप16, कानकुन, 2010 में तय; मुख्यालय सोंगदो, कोरिया गणराज्य |
| हानि एवं क्षति | वारसॉ अंतरराष्ट्रीय तंत्र, कॉप19, 2013; समर्पित निधि 2022 में तय |
| आईपीसीसी | 1988 में डब्ल्यूएमओ और यूएनईपी द्वारा स्थापित; 2007 का नोबेल शांति पुरस्कार साझा |
| भारत में हुआ कॉप | 2002 में नई दिल्ली में कॉप8, जिसने दिल्ली घोषणा अंगीकृत की |
| भारत का पंचामृत | 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म क्षमता, एक अरब टन उत्सर्जन कटौती, 2070 तक शुद्ध शून्य |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क अभिसमय किस सम्मेलन में हस्ताक्षर के लिए खोला गया?
- A.मानव पर्यावरण पर स्टॉकहोम सम्मेलन, 1972
- B.रियो डी जेनेरो का पृथ्वी शिखर सम्मेलन, 1992
- C.सतत विकास पर विश्व शिखर सम्मेलन, जोहानसबर्ग, 2002
- D.ओजोन परत पर मॉन्ट्रियल सम्मेलन, 1987
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर B, 1992 का रियो डी जेनेरो पृथ्वी शिखर सम्मेलन है। जून 1992 में हुआ पर्यावरण एवं विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन, जिसे पृथ्वी शिखर सम्मेलन कहा जाता है, तीन समझौते हस्ताक्षर के लिए खोल गया: जलवायु अभिसमय, जैव विविधता अभिसमय और एजेंडा 21। जलवायु अभिसमय 21 मार्च 1994 को प्रभाव में आया और उसका वार्षिक पक्षकार सम्मेलन 1995 में बर्लिन से शुरू हुआ। A यानी 1972 का स्टॉकहोम सम्मेलन पहला विश्व पर्यावरण सम्मेलन था और उससे संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम बना, जो जलवायु अभिसमय से बीस वर्ष पहले की बात है। C यानी 2002 का जोहानसबर्ग शिखर सम्मेलन रियो की प्रतिबद्धताओं की समीक्षा थी, उसने कोई नया अभिसमय नहीं खोला। D से मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल निकला, जो ओजोन क्षयकारी पदार्थों से जुड़ा है, ग्रीनहाउस गैस लक्ष्यों से नहीं।
बाध्यकारी उत्सर्जन लक्ष्यों वाला पहला जलवायु समझौता क्योटो प्रोटोकॉल किस पक्षकार सम्मेलन में अंगीकृत हुआ?
- A.बर्लिन का कॉप1
- B.क्योटो का कॉप3
- C.नई दिल्ली का कॉप8
- D.बाली का कॉप13
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर B, क्योटो का कॉप3 है। यह प्रोटोकॉल 11 दिसंबर 1997 को उसी जापानी नगर में अंगीकृत हुआ जिससे उसका नाम पड़ा, और अनुसूची एक के उत्सर्जन के आवश्यक हिस्से वाले देशों के अनुसमर्थन के बाद 16 फरवरी 2005 को प्रभाव में आया। अनुसूची एक के देशों ने 2008 से 2012 की अवधि के लिए 1990 के स्तर से औसतन लगभग पांच प्रतिशत कटौती स्वीकार की। A यानी 1995 के बर्लिन कॉप1 ने केवल बर्लिन अधिदेश अंगीकृत किया, अर्थात ऐसे लक्ष्यों पर वार्ता शुरू करने का निर्णय। C यानी 2002 के नई दिल्ली कॉप8 ने जलवायु कार्रवाई को विकास से जोड़ने वाली दिल्ली घोषणा दी। D यानी 2007 के बाली कॉप13 ने बाली कार्य योजना दी, जिससे वे वार्ताएं शुरू हुईं जो पेरिस समझौते पर समाप्त हुईं।
क्योटो प्रोटोकॉल का कौन तंत्र किसी विकसित देश को विकासशील देश में स्वच्छ परियोजना के वित्तपोषण से उत्सर्जन क्रेडिट कमाने देता था?
- A.संयुक्त कार्यान्वयन
- B.उत्सर्जन व्यापार
- C.स्वच्छ विकास तंत्र
- D.वैश्विक समीक्षा
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर C, स्वच्छ विकास तंत्र है। इसके अंतर्गत क्योटो लक्ष्य वाला देश किसी विकासशील देश में पवन ऊर्जा संयंत्र, बायोमास संयंत्र या अधिक कुशल भट्ठी जैसी परियोजना का वित्तपोषण करता था, और बचा हुआ उत्सर्जन उसे प्रमाणित उत्सर्जन कटौती के रूप में जारी होता था जो उसके लक्ष्य में गिना जाता था, जबकि मेजबान देश को निवेश तथा प्रौद्योगिकी मिलती थी। A यानी संयुक्त कार्यान्वयन इसी तरह चलता था पर केवल लक्ष्य वाले दो विकसित देशों के बीच, इसलिए परियोजना किसी अन्य अनुसूची एक देश में होनी थी। B यानी उत्सर्जन व्यापार में लक्ष्य से अधिक कटौती करने वाले देश से अतिरिक्त नियत मात्रा इकाइयां सीधे खरीदी जाती थीं, कोई परियोजना नहीं होती थी। D पेरिस समझौते का अंग है, जहां वह सामूहिक प्रगति की पांच वर्षीय समीक्षा है, क्रेडिट कमाने का तंत्र नहीं।
पेरिस समझौता दिसंबर 2015 में पक्षकार सम्मेलन के किस सत्र में अंगीकृत हुआ?
- A.कॉप19
- B.कॉप20
- C.कॉप21
- D.कॉप24
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर C, कॉप21 है, जो पेरिस में हुआ, जहां समझौता 12 दिसंबर 2015 को अंगीकृत हुआ और अप्रैल 2016 में हस्ताक्षर के लिए खुला; वह 4 नवंबर 2016 को प्रभाव में आया। उसकी केंद्रीय विशेषता राष्ट्रीय निर्धारित योगदान है, जिसे हर देश स्वयं लिखता है और हर पांच वर्ष में संशोधित करता है, तथा साथ में तापमान वृद्धि को दो डिग्री से स्पष्ट नीचे रखने का लक्ष्य है। A यानी 2013 के वारसॉ कॉप19 ने हानि एवं क्षति का अंतरराष्ट्रीय तंत्र बनाया। B यानी 2014 के लीमा कॉप20 ने जलवायु कार्रवाई हेतु लीमा आह्वान दिया और देशों से इच्छित योगदान मांगे, इसी कारण वह यहां सबसे पसंदीदा भ्रामक विकल्प है। D यानी 2018 के काटोविस कॉप24 ने तीन वर्ष पहले अंगीकृत समझौते के कार्यान्वयन की नियमपुस्तिका तय की।
जलवायु अभिसमय का मुख्य वित्तीय माध्यम हरित जलवायु निधि किस सम्मेलन में तय हुई और उसका मुख्यालय कहां है?
- A.कॉप15 कोपेनहेगन; जेनेवा
- B.कॉप16 कानकुन; सोंगदो
- C.कॉप21 पेरिस; बॉन
- D.कॉप26 ग्लासगो; नैरोबी
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर B, 2010 में कानकुन का कॉप16, मुख्यालय सोंगदो है, जो कोरिया गणराज्य में है। 2009 के कोपेनहेगन ने 2020 तक सालाना सौ अरब डॉलर की राजनीतिक प्रतिज्ञा दी थी, और अगले वर्ष कानकुन के निर्णयों ने वह संस्था बनाई जो यह धन पहुंचाए, तथा साथ में कानकुन अनुकूलन ढांचा भी दिया। A में प्रतिज्ञा ठीक है पर सम्मेलन और नगर गलत हैं। C दोनों दृष्टि से गलत है, क्योंकि बॉन में अभिसमय का सचिवालय है, निधि नहीं, और पेरिस ने कोई नई निधि नहीं बनाई। D कल्पित है; 2021 के ग्लासगो ने ग्लासगो जलवायु संधि और कोयले की चरणबद्ध कमी का आह्वान दिया, जबकि नैरोबी संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम का मुख्यालय है। इस जोड़ी को स्मृति में कानकुन के निर्णय और सोंगदो के कार्यालय के रूप में बैठा लें, तो विकल्प भ्रमित नहीं करते।
2013 में कॉप19 में स्थापित वारसॉ अंतरराष्ट्रीय तंत्र किस विषय से संबंधित है?
- A.जलवायु प्रभावों से हानि एवं क्षति
- B.कार्बन बाजार और क्रेडिट व्यापार
- C.वन प्रमाणन और इमारती लकड़ी का व्यापार
- D.ओजोन क्षयकारी पदार्थों का मापन
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर A, जलवायु प्रभावों से हानि एवं क्षति है। शमन और अनुकूलन के बाद हानि एवं क्षति जलवायु नीति का तीसरा स्तंभ है और उस नुकसान को समेटती है जिसे अब रोका नहीं जा सकता: समुद्र में समाई भूमि, चरम घटना से नष्ट फसल, रहने लायक न बचा द्वीप। छोटे द्वीपीय देश वर्षों से इसके लिए संस्था मांग रहे थे, और 2013 का वारसॉ तंत्र पहली संस्था थी। समर्पित निधि 2022 में शर्म अल-शेख में तय हुई और 2023 में दुबई में स्थापित हुई। B क्योटो के तंत्रों तथा पेरिस समझौते के अनुच्छेद 6 के अधीन आता है। C रेड-प्लस और अभिसमय से बाहर के वन प्रमाणन निकायों का विषय है। D मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल का काम है, जो ओजोन परत पर अलग समझौता है।
साझी पर अलग-अलग जिम्मेदारियां और संबंधित क्षमताओं का सिद्धांत किस दस्तावेज में रखा गया है?
- A.यूएनएफसीसीसी, 1992 का अनुच्छेद 3
- B.मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल, 1987
- C.रामसर अभिसमय, 1971
- D.स्टॉकहोम घोषणा, 1972
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर A, 1992 के यूएनएफसीसीसी का अनुच्छेद 3 है। यह अनुच्छेद पक्षकारों को निर्देश देता है कि वे समता के आधार पर तथा अपनी साझी पर अलग-अलग जिम्मेदारियों और संबंधित क्षमताओं के अनुरूप जलवायु प्रणाली की रक्षा करें, और जोड़ता है कि विकसित देश नेतृत्व करेंगे। भारत तथा अन्य विकासशील देश सभी पर एक समान बाध्यता का विरोध करने में इसी पर टिके रहते हैं। B क्लोरोफ्लोरोकार्बन तथा अन्य ओजोन क्षयकारी पदार्थों को हटाने से जुड़ा है और रियायत अवधि के रूप में भिन्न प्रकार का भेद रखता है। C आर्द्रभूमि संरक्षण की संधि है, जिस पर ईरान के रामसर नगर में हस्ताक्षर हुए। D व्यापक पर्यावरणीय सिद्धांतों की घोषणा है, जो जलवायु अभिसमय से पहले की है और जिसमें यह सूत्र नहीं है।
2021 के ग्लासगो सम्मेलन में भारत द्वारा घोषित पंचामृत में शुद्ध शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य वर्ष क्या है?
- A.2050
- B.2060
- C.2070
- D.2080
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर C, 2070 है। कॉप26 में भारत द्वारा घोषित पांच अमृत तत्व इस प्रकार हैं: 2030 तक पांच सौ गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता, 2030 तक देश की आधी ऊर्जा आवश्यकता नवीकरणीय स्रोतों से, 2030 तक अनुमानित उत्सर्जन में एक अरब टन की कमी, 2030 तक अर्थव्यवस्था की उत्सर्जन तीव्रता 2005 के स्तर से पैंतालीस प्रतिशत कम, और 2070 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन। A वह वर्ष है जो कई विकसित देशों तथा यूरोपीय संघ ने अपनाया है और भ्रम के लिए दिया गया है। B चीन द्वारा घोषित वर्ष है, जिसे विद्यार्थी अक्सर भारत पर चढ़ा देते हैं। D किसी प्रतिबद्धता में नहीं है। भारत का तर्क है कि बाद की तिथि समता के अनुरूप है, क्योंकि उसका प्रति व्यक्ति उत्सर्जन और ऐतिहासिक हिस्सा दोनों कम हैं।
पेरिस समझौते के अंतर्गत सामूहिक प्रगति की वैश्विक समीक्षा कितने अंतराल पर होती है?
- A.हर वर्ष
- B.हर तीन वर्ष
- C.हर पांच वर्ष
- D.हर दस वर्ष
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर C, हर पांच वर्ष है। समझौता पांच वर्षीय महत्वाकांक्षा चक्र पर चलता है: पक्षकार राष्ट्रीय निर्धारित योगदान सौंपते हैं, उन्हें लागू करते हैं, और फिर वैश्विक समीक्षा आंकती है कि शमन, अनुकूलन तथा कार्यान्वयन के साधनों पर विश्व कहां खड़ा है, जिससे अगला दौर अधिक मजबूत हो सके। पहली समीक्षा 2023 में दुबई के कॉप28 में पूरी हुई और उसने पाया कि विश्व डेढ़ डिग्री की सीमा की राह से भटका है। A स्वयं पक्षकार सम्मेलन की आवृत्ति है, और इसी प्रश्न का जाल वही है। B द्विवार्षिक पारदर्शिता रिपोर्टिंग चक्र के अधिक निकट है, वैश्विक समीक्षा का नहीं। D समझौते की किसी प्रक्रिया का अंतराल नहीं है और महत्वाकांक्षा बढ़ाने के उद्देश्य को ही निष्फल कर देगा। ध्यान रखें कि सम्मेलन हर वर्ष होता है, पर वैश्विक समीक्षा उनमें से हर पांचवें वर्ष ही आती है।
सम्मेलनों में प्रयुक्त आकलन रिपोर्ट तैयार करने वाले जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल की स्थापना 1988 में किसने की?
- A.विश्व मौसम विज्ञान संगठन और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम
- B.यूएनएफसीसीसी के पक्षकारों के सम्मेलन
- C.संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद
- D.विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर A, विश्व मौसम विज्ञान संगठन और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम है। पैनल 1988 में बना, अर्थात जलवायु अभिसमय के अस्तित्व में आने से चार वर्ष पहले, इसी कारण B गलत है: आईपीसीसी अभिसमय का अंग नहीं है, भले उसकी रिपोर्ट हर सम्मेलन का एजेंडा तय करती हैं और 1990 की पहली आकलन रिपोर्ट से सीधे अभिसमय की वार्ता निकली। पैनल स्वयं शोध नहीं करता; वह भौतिक विज्ञान, प्रभाव तथा शमन पर कार्य समूहों के जरिए प्रकाशित विज्ञान का आकलन करता है, और उसे 2007 का नोबेल शांति पुरस्कार अल गोर के साथ साझा मिला। C का जलवायु विज्ञान से कोई संबंध नहीं। D वित्तीय संस्थाएं हैं, और विश्व बैंक जलवायु निधियों की मेजबानी करता है पर उसने पैनल नहीं बनाया। इसलिए प्रश्न में 1988 का वर्ष दिखे तो उत्तर आईपीसीसी की स्थापना और उसके दो जनक संगठन ही होंगे।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौते में क्या अंतर है?
1997 के क्योटो प्रोटोकॉल ने बाध्यकारी उत्सर्जन कटौती केवल विकसित अनुसूची एक देशों पर रखी और विकासशील देशों को लक्ष्य से मुक्त छोड़ा, इसी कारण कई बड़े उत्सर्जक उससे बाहर रहे या अलग हो गए। 2015 का पेरिस समझौता हर देश से अपना राष्ट्रीय निर्धारित योगदान मांगता है, साझा नियमपुस्तिका के तहत प्रगति की रिपोर्ट मांगता है और हर पांच वर्ष में महत्वाकांक्षा बढ़ाने को कहता है। क्योटो ऊपर से थोपा और आंशिक था; पेरिस नीचे से बना और लगभग सार्वभौमिक है।
स्वच्छ विकास तंत्र क्या करता है?
यह क्योटो प्रोटोकॉल के तीन लचीले तंत्रों में एक है। लक्ष्य वाला कोई विकसित देश किसी विकासशील देश में उत्सर्जन घटाने वाली परियोजना का वित्तपोषण करता है, जैसे पवन ऊर्जा संयंत्र या स्वच्छ सीमेंट भट्ठी, और उसे प्रमाणित उत्सर्जन कटौती मिलती है जो उसके अपने लक्ष्य में गिनी जाती है। मेजबान देश को निवेश और प्रौद्योगिकी मिलती है। इस तंत्र में पंजीकृत परियोजनाओं का बड़ा हिस्सा भारत और चीन में था।
सीबीडीआर-आरसी का अर्थ क्या है?
साझी पर अलग-अलग जिम्मेदारियां और संबंधित क्षमताएं यूएनएफसीसीसी के अनुच्छेद 3 में लिखा सिद्धांत है। यह मानता है कि जलवायु परिवर्तन साझी चिंता है, पर जो देश पहले औद्योगिक हुए वे वायुमंडल में जमा कार्बन के बड़े भाग के जिम्मेदार हैं, इसलिए उन्हें पहले कटौती करनी है और शेष देशों को वित्त तथा प्रौद्योगिकी देनी है। भारत इसी का हवाला देकर सभी देशों के लिए एक समान मार्ग का विरोध करता है।
वैश्विक समीक्षा क्या है?
यह पेरिस समझौते के तहत हर पांच वर्ष में होने वाली वह समीक्षा है जिसमें पक्षकार तापमान तथा अनुकूलन लक्ष्यों की दिशा में सामूहिक प्रगति और वित्त के प्रवाह का आकलन करते हैं। इसमें किसी एक देश का मूल्यांकन नहीं होता; इसके निष्कर्ष अगले दौर के राष्ट्रीय निर्धारित योगदान तय करने में काम आते हैं। पहली वैश्विक समीक्षा 2023 में दुबई के कॉप28 में पूरी हुई और उसने दर्ज किया कि विश्व डेढ़ डिग्री की सीमा की राह पर नहीं है।
स्रोत
- जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क अभिसमय, 1992, अभिसमय का मूल पाठ — संयुक्त राष्ट्र
- पेरिस समझौता, 2015, समझौते का मूल पाठ — संयुक्त राष्ट्र
- भारत का अद्यतन राष्ट्रीय निर्धारित योगदान, 2022 — पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय
- भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत तथा पर्यावरण, कक्षा ग्यारह — एनसीईआरटी





