इंटरनेट और ईमेल: प्रोटोकॉल, पोर्ट और शब्दावली
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए इंटरनेट और ईमेल के नोट्स: अरपानेट से वर्ल्ड वाइड वेब, आईपी पते, डोमेन, प्रोटोकॉल के पोर्ट नंबर तथा ईमेल विंडो के भाग।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 4 मिनट

इंटरनेट नेटवर्कों का नेटवर्क है: करोड़ों कंप्यूटर, सर्वर और मोबाइल केबल, ऑप्टिकल फाइबर, उपग्रह और रेडियो कड़ियों से जुड़े हुए, और सब एक ही नियम-समूह टीसीपी/आईपी का पालन करते हैं। ईमेल इस पर चलने वाली सबसे पुरानी सेवा है। एसएससी, रेलवे और बैंकिंग परीक्षाओं के कंप्यूटर जागरूकता भाग में इस जोड़ी से दो-तीन प्रश्न हर बार आते हैं, और वे गिने-चुने स्थानों से आते हैं: किसने क्या और कब बनाया, किसी संक्षेपाक्षर का पूरा रूप, पोर्ट संख्या, डोमेन नाम और मेल विंडो के खाने।
इंटरनेट का विकास
इंटरनेट का आरंभ अरपानेट से हुआ, जो संयुक्त राज्य अमेरिका के रक्षा विभाग की एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेंसी की परियोजना थी और जिसने 1969 में चार विश्वविद्यालयी कंप्यूटरों के बीच पहला संदेश भेजा। अरपानेट 1 जनवरी 1983 को टीसीपी/आईपी प्रोटोकॉल समूह पर आया, और यही तिथि आज के इंटरनेट का जन्म मानी जाती है। टीसीपी/आईपी की रचना विंटन सर्फ और रॉबर्ट कान ने की, इसीलिए इन्हें इंटरनेट का जनक कहा जाता है। 1989 में स्विट्ज़रलैंड के सर्न में कार्यरत टिम बर्नर्स-ली ने वर्ल्ड वाइड वेब का प्रस्ताव रखा और 1991 में पहली वेबसाइट चालू हुई। भारत ने अपना पहला शैक्षिक नेटवर्क अर्नेट 1986 में बनाया, और जनता के लिए इंटरनेट सेवा 15 अगस्त 1995 को आरंभ हुई, जब वीएसएनएल ने अपना गेटवे खोला।
इंटरनेट, वर्ल्ड वाइड वेब और इंट्रानेट
परीक्षार्थी इन तीनों को एक मान लेने से अंक गँवाते हैं। इंटरनेट स्वयं नेटवर्क है। वर्ल्ड वाइड वेब उस पर चलने वाली केवल एक सेवा है, अर्थात ब्राउज़र से पढ़े जाने वाले जुड़े हुए पृष्ठों का संग्रह। ईमेल, फाइल हस्तांतरण और वीडियो कॉल इंटरनेट का उपयोग करते हैं, वेब का नहीं। इंट्रानेट किसी एक कार्यालय, बैंक या परिसर का निजी नेटवर्क है, जो केवल उसके सदस्यों के लिए खुला रहता है, जबकि एक्स्ट्रानेट में चुने हुए बाहरी पक्ष, जैसे आपूर्तिकर्ता और वितरक, भी प्रवेश पाते हैं।
पते: आईपी, डोमेन और यूआरएल
इंटरनेट पर हर मशीन का एक आईपी पता होता है। आईपीवी4 पता 32 बिट लंबा होता है और बिंदुओं से अलग किए गए 0 से 255 तक के चार अंक-समूहों में लिखा जाता है, जैसे 192.168.1.1। आईपीवी6 पता 128 बिट लंबा होता है और हेक्साडेसिमल में लिखा जाता है; इसे इसलिए लाया गया क्योंकि आईपीवी4 पते समाप्त होने लगे थे। संख्याएँ याद रखना कठिन है, इसलिए डोमेन नेम सिस्टम एक निर्देशिका रखता है जो india.gov.in जैसे नाम को उसके आईपी पते में बदल देती है। यूआरएल अर्थात यूनिफॉर्म रिसोर्स लोकेटर किसी पृष्ठ का पूरा पता है और इसके तीन भाग होते हैं: प्रोटोकॉल, डोमेन नाम और फाइल का पथ।
| डोमेन | किसके लिए |
|---|---|
| .com | व्यापारिक संस्थान |
| .org | गैर-लाभकारी संगठन |
| .net | नेटवर्क प्रदाता |
| .edu | शिक्षण संस्थान |
| .gov | सरकारी निकाय |
| .mil | सैन्य प्रतिष्ठान |
| .int | अंतरराष्ट्रीय संधि निकाय |
| .in | भारत का देश कोड |
प्रोटोकॉल और उनके पोर्ट
प्रोटोकॉल दो मशीनों के बीच बातचीत का तय तरीका है, और पोर्ट वह क्रमांकित द्वार है जिसे प्रोटोकॉल खटखटाता है। ये जोड़े सीधे पूछे जाते हैं, इसलिए तालिका जैसी है वैसी याद कर लें।
| प्रोटोकॉल | काम | पोर्ट |
|---|---|---|
| एचटीटीपी | वेब पृष्ठ पहुँचाना | 80 |
| एचटीटीपीएस | वेब पृष्ठ कूटबद्ध रूप में पहुँचाना | 443 |
| एफटीपी | सर्वर से फाइलें भेजना और लाना | 20 और 21 |
| एसएमटीपी | बाहर जाने वाला मेल भेजना | 25 |
| पीओपी3 | आया हुआ मेल उतारना | 110 |
| आईमैप | सर्वर पर रखा मेल पढ़ना | 143 |
| टेलनेट | दूर के कंप्यूटर में लॉग-इन करना | 23 |
| डीएनएस | नाम को आईपी पते में बदलना | 53 |
ईमेल और उसके भाग
पहला नेटवर्क ईमेल रे टॉमलिंसन ने 1971 में भेजा और उपयोगकर्ता के नाम को कंप्यूटर के नाम से अलग करने के लिए @ चिह्न चुना। इसलिए हर पते के दो भाग होते हैं, उपयोगकर्ता नाम और डोमेन, जो @ से जुड़ते हैं। मेल विंडो में मुख्य प्राप्तकर्ताओं के लिए To खाना होता है, कार्बन कॉपी अर्थात Cc खाना, जिसके पते सब देख सकते हैं, ब्लाइंड कार्बन कॉपी अर्थात Bcc खाना, जिसके पते कोई दूसरा प्राप्तकर्ता नहीं देख सकता, विषय की पंक्ति और पत्र के साथ भेजी जाने वाली फाइलों के लिए अटैचमेंट बटन।
- इनबॉक्स में आया हुआ मेल रहता है।
- ड्राफ्ट्स में लिखे परंतु भेजे न गए पत्र रहते हैं।
- आउटबॉक्स में बाहर जाने की प्रतीक्षा करते पत्र रहते हैं।
- सेंट में भेजे गए पत्रों की प्रतियाँ रहती हैं।
- स्पैम या जंक में अवांछित थोक मेल जमा होता है।
- ट्रैश या बिन में हटाया गया मेल खाली किए जाने तक रहता है।
एसएमटीपी पत्र को आपके कंप्यूटर से बाहर धकेलता है। पीओपी3 उसे एक ही उपकरण पर उतारता है और सामान्यतः सर्वर से हटा देता है, जबकि आईमैप उसे सर्वर पर छोड़ देता है, जिससे वही मेलबॉक्स मोबाइल, लैपटॉप और कार्यालय की मशीन पर एक जैसा दिखता है।
बार-बार पूछे जाने वाले शब्द
- आईएसपी अर्थात इंटरनेट सेवा प्रदाता वह कंपनी है जो कनेक्शन बेचती है।
- ब्राउज़र जैसे क्रोम, फायरफॉक्स या एज पृष्ठ दिखाता है; सर्च इंजन जैसे गूगल या बिंग उन्हें खोजता है। दोनों एक नहीं हैं।
- कुकी वह छोटी फाइल है जो कोई साइट आपको पहचानने के लिए आपकी मशीन पर छोड़ती है; कैश पृष्ठ की सामग्री रखता है जिससे अगली बार वह जल्दी खुले।
- बैंडविड्थ बिट प्रति सेकंड में मापी जाती है, और मॉडेम का पूरा रूप मॉड्युलेटर-डीमॉड्युलेटर है।
- फिशिंग वह नकली मेल या पृष्ठ है जो पासवर्ड और कार्ड नंबर उगलवाता है; स्पैम अवांछित थोक विज्ञापन है।
- डाउनलोड फाइल को आपकी मशीन पर लाता है; अपलोड उसे बाहर भेजता है।
परीक्षा की दृष्टि से
इस विषय से परीक्षक पाँच बातें पूछते हैं। पहली, तिथियाँ और नाम: अरपानेट 1969, टीसीपी/आईपी 1983, वेब 1989 और 1991, भारत में जन-सेवा 1995। दूसरी, संक्षेपाक्षरों के पूरे रूप, जिनमें एचटीटीपी, एचटीटीपीएस, एफटीपी, एसएमटीपी, पीओपी3, आईमैप, डीएनएस, डीएचसीपी, आईएसपी, यूआरएल और वाई-फाई आते हैं। तीसरी, पोर्ट नंबर, जो अक्सर सीधा एक प्रश्न बनते हैं। चौथी, मेल विंडो के खाने और फोल्डर, जहाँ Cc बनाम Bcc तथा ड्राफ्ट्स बनाम आउटबॉक्स सामान्य भ्रमजाल हैं। पाँचवीं, मिलते-जुलते जोड़ों का अंतर: इंटरनेट और वर्ल्ड वाइड वेब, ब्राउज़र और सर्च इंजन, डाउनलोड और अपलोड, पीओपी3 और आईमैप, इंट्रानेट और एक्स्ट्रानेट। जो प्रश्न 1989 को इंटरनेट का जन्म बताए, वह यही परख रहा है कि आप वेब को नेटवर्क से अलग कर सकते हैं या नहीं।
महत्वपूर्ण तथ्य
| अरपानेट पर पहला संदेश | 1969, अमेरिका के चार विश्वविद्यालयी कंप्यूटरों के बीच |
|---|---|
| इंटरनेट के जनक | विंटन सर्फ और रॉबर्ट कान, टीसीपी/आईपी के लिए |
| वर्ल्ड वाइड वेब के आविष्कारक | टिम बर्नर्स-ली, सर्न, 1989 |
| पहली वेबसाइट | 1991 में चालू हुई |
| भारत में इंटरनेट | 15 अगस्त 1995 से वीएसएनएल द्वारा जन-सेवा |
| भारत का पहला शैक्षिक नेटवर्क | अर्नेट, 1986 में आरंभ |
| आईपीवी4 और आईपीवी6 की लंबाई | 32 बिट और 128 बिट |
| पहला ईमेल | रे टॉमलिंसन ने 1971 में भेजा; उन्होंने @ चिह्न चुना |
| एचटीटीपी और एचटीटीपीएस के पोर्ट | 80 और 443 |
| मेल प्रोटोकॉल के पोर्ट | एसएमटीपी 25, पीओपी3 110, आईमैप 143 |
| एफटीपी के पोर्ट | आदेशों के लिए 21 और सामग्री के लिए 20 |
| डीएनएस का पोर्ट | 53 |
| मॉडेम | मॉड्युलेटर-डीमॉड्युलेटर, डिजिटल और एनालॉग संकेत बदलता है |
| बैंडविड्थ की इकाई | बिट प्रति सेकंड, बीपीएस |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
हटाए गए ईमेल कहाँ संचित रहते हैं?
- A.ड्राफ्ट्स
- B.ट्रैश
- C.इनबॉक्स
- D.सेंट मेल
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. ट्रैश
व्याख्या
सही उत्तर B, ट्रैश है। मेलबॉक्स से कोई पत्र हटाने पर वह तुरंत मिट नहीं जाता। वह ट्रैश नामक फोल्डर में चला जाता है, जिसे कुछ सेवाएँ बिन कहती हैं, और नियत दिनों तक वहीं रहता है, जिससे भूल से हटाया गया पत्र वापस पाया जा सके। फोल्डर खाली करने पर या अवधि बीतने पर ही पत्र सदा के लिए हट जाता है।
विकल्प A, ड्राफ्ट्स, में वे पत्र रहते हैं जो लिखे गए परंतु भेजे नहीं गए, इसलिए हटाया गया पत्र वहाँ नहीं जाता। विकल्प C, इनबॉक्स, वह फोल्डर है जिसमें आया हुआ मेल रहता है, और हटाने का अर्थ ही उसे इनबॉक्स से बाहर करना है। विकल्प D, सेंट मेल, में भेजे गए पत्रों की प्रतियाँ रहती हैं, जो बाहर गए डाक का लेखा है, हटाए गए का नहीं। इसलिए ट्रैश ही एकमात्र सही विकल्प है।
जीमेल में प्राप्तकर्ताओं का ईमेल पता किस खाने में भरा जाता है?
- A.सब्जेक्ट
- B.To
- C.मैसेज
- D.From
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. To
व्याख्या
सही उत्तर B, To है। मेल विंडो का To खाना उन व्यक्तियों के पतों के लिए है जिन्हें पत्र लिखा गया है। वहाँ अल्पविराम से अलग कर एक से अधिक पते लिखे जा सकते हैं और हर प्राप्तकर्ता पूरी सूची देख सकता है। प्रतियाँ Cc खाने से भेजी जा सकती हैं, जिसे सब देखते हैं, या Bcc खाने से, जिसे कोई दूसरा प्राप्तकर्ता नहीं देखता।
विकल्प A, सब्जेक्ट, वह एक पंक्ति का शीर्षक है जो बताता है कि पत्र किस विषय पर है, और वहाँ लिखा पता गंतव्य नहीं माना जाएगा। विकल्प C, मैसेज, पत्र का मुख्य भाग है जिसमें विषय-वस्तु लिखी जाती है। विकल्प D, From, भेजने वाले का अपना पता दिखाता है और मेल सेवा द्वारा स्वयं भर दिया जाता है, अर्थात यह लेखक बताता है, पाठक नहीं। इसलिए प्राप्तकर्ताओं के पते केवल To खाने में जाते हैं।
इंटरनेट का पूर्वज अरपानेट किस वर्ष अपना पहला संदेश भेज सका?
- A.1959
- B.1969
- C.1979
- D.1989
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. 1969
व्याख्या
सही उत्तर B, 1969 है। अरपानेट को अमेरिकी रक्षा विभाग की एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेंसी ने धन दिया, और 1969 में इसने अमेरिका के चार विश्वविद्यालयों के कंप्यूटर जोड़कर उनके बीच पहला संदेश भेजा। इस प्रयोग ने सिद्ध किया कि पैकेट दूर की मशीनों के बीच भेजे जा सकते हैं, और यही आगे इंटरनेट बना।
विकल्प A, 1959, बहुत पहले है: तब पैकेट स्विचिंग की कल्पना ही पूरी नहीं हुई थी और ऐसा कोई नेटवर्क नहीं था। विकल्प C, 1979, अरपानेट के चालू होने के बहुत बाद पड़ता है और आरंभिक न्यूज़ग्रुप के लिए याद किया जाता है। विकल्प D, 1989, वह वर्ष है जब टिम बर्नर्स-ली ने सर्न में वर्ल्ड वाइड वेब का प्रस्ताव रखा, जो इंटरनेट पर चलने वाली सेवा है, नेटवर्क नहीं; इसी कारण प्रश्नपत्र इसे भ्रमजाल बनाते हैं। जोड़ी याद रखें: अरपानेट 1969, वेब 1989।
वर्ल्ड वाइड वेब का आविष्कार किसे माना जाता है?
- A.विंटन सर्फ
- B.चार्ल्स बैबेज
- C.टिम बर्नर्स-ली
- D.रे टॉमलिंसन
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. टिम बर्नर्स-ली
व्याख्या
सही उत्तर C, टिम बर्नर्स-ली है। स्विट्ज़रलैंड के सर्न में कार्य करते हुए उन्होंने 1989 में जुड़े हुए दस्तावेज़ों की प्रणाली का प्रस्ताव रखा, पहला ब्राउज़र और सर्वर लिखा, और 1991 में पहली वेबसाइट चालू की। एचटीएमएल, एचटीटीपी और यूआरएल उनकी ही रचना से आए, इसीलिए वे वेब के आविष्कारक कहे जाते हैं।
विकल्प A, विंटन सर्फ, ने रॉबर्ट कान के साथ टीसीपी/आईपी बनाया और इंटरनेट के जनक कहे जाते हैं, जो नेटवर्क है, वेब नहीं। विकल्प B, चार्ल्स बैबेज, उन्नीसवीं सदी के हैं और डिफरेंस तथा एनालिटिकल इंजन के कारण कंप्यूटर के जनक हैं। विकल्प D, रे टॉमलिंसन, ने 1971 में पहला नेटवर्क ईमेल भेजा और पतों के लिए @ चिह्न चुना। तीनों प्रसिद्ध हैं, परंतु वेब से केवल बर्नर्स-ली जुड़े हैं। ध्यान रखें कि इंटरनेट का आरंभ 1969 में अरपानेट से हुआ, जबकि वेब उसके बीस वर्ष बाद आई एक सेवा है, इसलिए दोनों के आविष्कारक अलग-अलग हैं।
ईमेल पते में उपयोगकर्ता नाम को होस्ट नाम से अलग करने के लिए रे टॉमलिंसन ने कौन-सा चिह्न चुना?
- A.#
- B.&
- C.@
- D.*
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. @
व्याख्या
सही उत्तर C, @ चिह्न है। रे टॉमलिंसन ने 1971 में अरपानेट पर दो कंप्यूटरों के बीच पहला संदेश भेजा और उन्हें ऐसा अक्षर चाहिए था जो किसी के नाम में कभी न आए। उन्होंने @ चुना, जिसका अर्थ व्यापारिक बिलों में पहले से ही पर होता था, जिससे पता इस तरह पढ़ा जा सके कि कोई उपयोगकर्ता किस स्थान पर है। तब से हर ईमेल पते का रूप user@domain है।
विकल्प A, हैश, सामाजिक मंचों पर टैग बनाने और कुछ भाषाओं में टिप्पणी चिह्न के रूप में चलता है, मेल पते में विभाजक के रूप में नहीं। विकल्प B, ऐम्परसैंड, का अर्थ और है और यह कार्यक्रमों के नाम तथा फाइल पथ में आता है। विकल्प D, तारांकन, खोज में वाइल्ड कार्ड है और स्प्रेडशीट तथा प्रोग्रामिंग में गुणा का चिह्न है। ईमेल पते के दो भाग केवल @ अलग करता है।
एचटीटीपीएस का डिफॉल्ट पोर्ट नंबर क्या है?
- A.21
- B.80
- C.110
- D.443
उत्तर देखें
सही उत्तर: D. 443
व्याख्या
सही उत्तर D, 443 है। एचटीटीपीएस वही एचटीटीपी है जो कूटलेखन में लिपटा होता है, और वेब सर्वर इसके लिए पोर्ट 443 पर प्रतीक्षा करते हैं। जब पता https से आरंभ होता है तो ब्राउज़र उसी पोर्ट पर सुरक्षित माध्यम खोलता है, और पते के आगे दिखता ताला बताता है कि उस पर चलने वाली सामग्री कूटबद्ध है।
विकल्प A, 21, एफटीपी का पोर्ट है, जो आदेशों के लिए 21 और सामग्री के लिए 20 का उपयोग करता है। विकल्प B, 80, साधारण अर्थात बिना कूटलेखन वाले एचटीटीपी का पोर्ट है और सबसे लुभावना भ्रमजाल है, क्योंकि दोनों प्रोटोकॉल वही काम करते हैं। विकल्प C, 110, पीओपी3 का पोर्ट है, जो सर्वर से आया मेल उतारता है। एचटीटीपी 80, एचटीटीपीएस 443, एफटीपी 21 और पीओपी3 110 का यह समूह याद रखने से पोर्ट के अधिकांश प्रश्न एक साथ सध जाते हैं।
ईमेल में किस खाने से ऐसे व्यक्ति को प्रति भेजी जाती है जिसका पता अन्य प्राप्तकर्ता नहीं देख सकते?
- A.To
- B.Cc
- C.Bcc
- D.सब्जेक्ट
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. Bcc
व्याख्या
सही उत्तर C, Bcc है। Bcc का पूरा रूप ब्लाइंड कार्बन कॉपी है। वहाँ लिखे पते पर पत्र पहुँचता है, परंतु वह सूची के शेष सब से छिपा रहता है, और Bcc में रखे लोग एक-दूसरे को भी नहीं देख पाते। कार्यालय इसी से किसी सूचना को बहुत लोगों तक भेजते हैं और पते उजागर नहीं होने देते।
विकल्प A, To, में मुख्य प्राप्तकर्ता रहते हैं और उसका हर पता सब को दिखता है। विकल्प B, Cc, का पूरा रूप कार्बन कॉपी है और यह जानकारी के लिए प्रति भेजता है, परंतु वे पते सब को दिखते हैं; प्रश्न इसी अंतर की परीक्षा ले रहा है। विकल्प D, सब्जेक्ट, पत्र का शीर्षक है और उसमें कोई पता नहीं होता। जोड़ी में याद रखें: Cc खुली प्रति है और Bcc छिपी प्रति।
आईपीवी6 पता कितने बिट का होता है?
- A.32 बिट
- B.64 बिट
- C.128 बिट
- D.256 बिट
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. 128 बिट
व्याख्या
सही उत्तर C, 128 बिट है। आईपीवी6 इसलिए बनाया गया क्योंकि पुरानी व्यवस्था के पते समाप्त होने लगे थे, और इसकी 128 बिट लंबाई से पतों का भंडार इतना बड़ा हो जाता है कि कमी की चिंता ही नहीं रहती। ऐसा पता कोलन से अलग किए गए हेक्साडेसिमल अंकों के आठ समूहों में लिखा जाता है।
विकल्प A, 32 बिट, आईपीवी4 पते की लंबाई है, जो बिंदुओं से अलग 0 से 255 तक के चार दशमलव अंक-समूहों में लिखा जाता है, और भूल से सबसे अधिक यही चुना जाता है। विकल्प B, 64 बिट, किसी आईपी पते का माप नहीं है; यह प्रोसेसर और रजिस्टर की चौड़ाई बताता है। विकल्प D, 256 बिट, एईएस-256 जैसी कूटलेखन कुंजियों में मिलता है, पते में नहीं। इसलिए जोड़ी याद रखें: आईपीवी4 32 बिट और आईपीवी6 128 बिट, अर्थात चार गुना।
क्लाइंट से मेल सर्वर तक बाहर जाने वाला ईमेल भेजने के लिए किस प्रोटोकॉल का उपयोग होता है?
- A.एसएमटीपी
- B.पीओपी3
- C.आईमैप
- D.एफटीपी
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. एसएमटीपी
व्याख्या
सही उत्तर A, एसएमटीपी है। एसएमटीपी का पूरा रूप सिंपल मेल ट्रांसफर प्रोटोकॉल है और यही नियम-समूह पत्र को आपके मेल कार्यक्रम से सर्वर तक और आगे एक सर्वर से दूसरे सर्वर तक धकेलता है, जब तक वह पाने वाले के मेलबॉक्स में न पहुँच जाए। इसका सामान्य पोर्ट 25 है।
विकल्प B, पीओपी3 अर्थात पोस्ट ऑफिस प्रोटोकॉल संस्करण 3, उलटी दिशा में काम करता है: यह आया हुआ मेल एक उपकरण पर उतारता है और सामान्यतः सर्वर से हटा देता है। विकल्प C, आईमैप, भी आने वाला मेल सँभालता है, परंतु पत्रों को सर्वर पर रखता है जिससे वही मेलबॉक्स हर उपकरण पर एक जैसा दिखे। विकल्प D, एफटीपी, फाइल ट्रांसफर प्रोटोकॉल है और मेल से इसका कोई संबंध नहीं। भेजना एसएमटीपी है; पाना पीओपी3 या आईमैप।
india.gov.in जैसे डोमेन नाम को अंकों वाले पते में बदलने वाली प्रणाली कहलाती है
- A.डीएनएस
- B.डीएचसीपी
- C.एचटीटीपी
- D.यूआरएल
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. डीएनएस
व्याख्या
सही उत्तर A, डीएनएस है। डोमेन नेम सिस्टम इंटरनेट की निर्देशिका है। लोग नाम याद रखते हैं, जबकि मशीनें अंकों से मार्ग तय करती हैं, इसलिए डीएनएस सर्वर ब्राउज़र में लिखा नाम खोजकर उससे मिलता आईपी पता लौटाता है और तब पृष्ठ लाया जाता है। यह पोर्ट 53 पर सुनता है।
विकल्प B, डीएचसीपी अर्थात डायनैमिक होस्ट कॉन्फ़िगरेशन प्रोटोकॉल, किसी मशीन के नेटवर्क में जुड़ने पर उसे आईपी पता देता है; यह पते बाँटता है, नाम नहीं बदलता। विकल्प C, एचटीटीपी, पता ज्ञात होने के बाद पृष्ठ पहुँचाता है और कोई रूपांतरण नहीं करता। विकल्प D, यूआरएल अर्थात यूनिफॉर्म रिसोर्स लोकेटर, पृष्ठ का लिखित पता है और उसमें डोमेन नाम रहता है, परंतु वह पते का रूप है, पता हल करने वाली सेवा नहीं। रूपांतरण केवल डीएनएस करता है।
किसी वेब पते में .gov डोमेन बताता है कि वह साइट किसकी है?
- A.व्यापारिक कंपनी की
- B.सरकारी निकाय की
- C.शिक्षण संस्थान की
- D.नेटवर्क प्रदाता की
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. सरकारी निकाय की
व्याख्या
सही उत्तर B, सरकारी निकाय की है। डोमेन नाम का अंतिम भाग टॉप-लेवल डोमेन कहलाता है और बताता है कि स्वामी किस प्रकार का है। सरकारी कार्यालय .gov का प्रयोग करते हैं, अक्सर देश कोड जोड़कर, जैसे भारत सरकार के राष्ट्रीय पोर्टल का पता india.gov.in है।
विकल्प A गलत है क्योंकि व्यापारिक संस्थान .com लेते हैं, जिसका अर्थ कमर्शियल है और जो वेब पर सबसे प्रचलित डोमेन है। विकल्प C गलत है क्योंकि शिक्षण संस्थान .edu लेते हैं और भारत में महाविद्यालय तथा विश्वविद्यालय इसी काम के लिए ac.in लेते हैं। विकल्प D गलत है क्योंकि नेटवर्क प्रदाता .net लेते हैं। इनके साथ दो और याद रखने योग्य हैं: गैर-लाभकारी संगठनों के लिए .org और सैन्य प्रतिष्ठानों के लिए .mil। इस प्रकार पते का अंतिम भाग पढ़ते ही पता चल जाता है कि साइट किस प्रकार की संस्था चलाती है।
इंटरनेट पर किसी दूरस्थ सर्वर पर फाइलें चढ़ाने और उससे उतारने के लिए किस प्रोटोकॉल का उपयोग होता है?
- A.एसएमटीपी
- B.टेलनेट
- C.एफटीपी
- D.आईमैप
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. एफटीपी
व्याख्या
सही उत्तर C, एफटीपी है। एफटीपी का पूरा रूप फाइल ट्रांसफर प्रोटोकॉल है। यह सर्वर के साथ दो माध्यम खोलता है, एक आदेशों के लिए पोर्ट 21 पर और एक सामग्री के लिए पोर्ट 20 पर, और पूरी फाइलें दोनों दिशाओं में ले जाता है; इसी से वेब पृष्ठ होस्टिंग सर्वर पर चढ़ाए जाते हैं।
विकल्प A, एसएमटीपी, बाहर जाने वाला ईमेल ले जाता है और किसी फाइल को केवल पत्र के अनुलग्नक के रूप में भेज सकता है, सीधे हस्तांतरण के रूप में नहीं। विकल्प B, टेलनेट, उपयोगकर्ता को पोर्ट 23 से दूर के कंप्यूटर में लॉग-इन कर आदेश देने देता है; यह मशीन पर नियंत्रण देता है, परंतु स्वयं फाइलें नहीं ले जाता। विकल्प D, आईमैप, मेल पढ़ने का प्रोटोकॉल है जो पत्र सर्वर पर रखता है। केवल फाइल हस्तांतरण के लिए उत्तर सदा एफटीपी है, अथवा उसके सुरक्षित रूप एफटीपीएस और एसएफटीपी।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इंटरनेट और वर्ल्ड वाइड वेब एक ही हैं?
नहीं। इंटरनेट जुड़ी हुई मशीनों का नेटवर्क है, जबकि वर्ल्ड वाइड वेब उस पर चलने वाली एक सेवा है, अर्थात ब्राउज़र से पढ़े जाने वाले जुड़े पृष्ठ। ईमेल और फाइल हस्तांतरण वेब के बिना भी इंटरनेट का उपयोग करते हैं, इसलिए परीक्षा में दोनों शब्द एक-दूसरे के स्थान पर नहीं चलते।
ईमेल में Cc और Bcc में क्या अंतर है?
दोनों पत्र की प्रति भेजते हैं। Cc अर्थात कार्बन कॉपी में लिखे पते हर प्राप्तकर्ता को दिखते हैं। Bcc अर्थात ब्लाइंड कार्बन कॉपी में लिखे पते शेष सब से छिपे रहते हैं, और Bcc वाले लोग एक-दूसरे को भी नहीं देख पाते।
कौन-सा प्रोटोकॉल मेल भेजता है और कौन-सा प्राप्त करता है?
एसएमटीपी, पोर्ट 25 पर, मेल बाहर भेजता है। पीओपी3, पोर्ट 110 पर, मेल एक उपकरण पर उतारता है और सामान्यतः सर्वर से हटा देता है, जबकि आईमैप, पोर्ट 143 पर, मेल सर्वर पर रखता है जिससे वही मेलबॉक्स हर उपकरण पर एक जैसा दिखे।
आईपीवी4 चल रहा था, तब आईपीवी6 क्यों लाया गया?
आईपीवी4 पता केवल 32 बिट का होता है, इसलिए जुड़े उपकरणों की संख्या बढ़ने पर पतों का भंडार कम पड़ गया। आईपीवी6 128 बिट लेता है, जिससे भंडार बहुत बड़ा हो जाता है, और यह कोलन से अलग हेक्साडेसिमल अंकों के आठ समूहों में लिखा जाता है।
भारत में जनता के लिए इंटरनेट सेवा कब आरंभ हुई?
15 अगस्त 1995 को, जब विदेश संचार निगम लिमिटेड ने जन-उपयोग के लिए अपना गेटवे खोला। उससे पहले 1986 से शैक्षिक और शोध नेटवर्क अर्नेट संस्थानों के लिए संचार चलाता था।
गूगल ब्राउज़र है या सर्च इंजन?
गूगल सर्च इंजन है, जो पृष्ठ खोजता है। गूगल क्रोम ब्राउज़र है, जो उन्हें दिखाता है। फायरफॉक्स, एज और सफारी ब्राउज़र हैं, जबकि बिंग, याहू और डकडकगो सर्च इंजन हैं, और प्रश्नपत्र अक्सर दोनों सूचियाँ एक ही प्रश्न में मिला देते हैं।
स्रोत
- वेब का संक्षिप्त इतिहास — सर्न
- सर्विस नेम एंड ट्रांसपोर्ट प्रोटोकॉल पोर्ट नंबर रजिस्ट्री — इंटरनेट असाइन्ड नंबर्स ऑथोरिटी
- .आईएन रजिस्ट्री के विषय में — नेशनल इंटरनेट एक्सचेंज ऑफ इंडिया





