मेगा विज्ञान परियोजनाएं: आईटीईआर, सर्न, लाइगो और आईएनओ
परीक्षा के लिए मेगा विज्ञान परियोजनाएं: सर्न और एलएचसी, आईटीईआर संलयन, लाइगो तथा लाइगो-इंडिया, न्यूट्रिनो वेधशाला और इनमें भारत की भूमिका, एमसीक्यू सहित।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 5 मिनट

भौतिकी के कुछ प्रश्न इतने बड़े हैं कि उनका उत्तर कोई एक देश अकेले नहीं खोज सकता, इसलिए सरकारें मिलकर ऐसी प्रयोगशालाएं बनाती हैं। अरबों की लागत और दशकों का समय लेने वाली ये मेगा विज्ञान परियोजनाएं सामान्य विज्ञान और समकालीन घटनाओं के प्रश्नपत्रों की पसंदीदा हैं, क्योंकि प्रत्येक का उद्देश्य स्पष्ट है, स्थान प्रसिद्ध है और भारत की भूमिका निर्धारित है। सबसे महत्वपूर्ण चार हैं कण भौतिकी के लिए सर्न और उसका वृहद हैड्रॉन संघट्टक, संलयन ऊर्जा के लिए आईटीईआर, गुरुत्वीय तरंगों के लिए लाइगो और न्यूट्रिनो के लिए भारत आधारित न्यूट्रिनो वेधशाला। आगे प्रत्येक की स्थायी बातें दी गई हैं, अर्थात वह क्या है, कहां है और भारत उसमें क्या करता है।
सर्न और वृहद हैड्रॉन संघट्टक
सर्न अर्थात यूरोपीय नाभिकीय अनुसंधान संगठन की स्थापना 1954 में हुई और यह स्विट्जरलैंड तथा फ्रांस की सीमा पर जेनेवा के निकट मेरिन में स्थित है। इसका वृहद हैड्रॉन संघट्टक विश्व का सबसे बड़ा और सर्वाधिक शक्तिशाली कण त्वरक है, जिसकी गोलाकार सुरंग की परिधि लगभग 27 किलोमीटर है और जो धरातल से करीब 100 मीटर नीचे है। इसमें प्रोटॉन की दो धाराएं अतिचालक चुंबकों से नियंत्रित होकर, जिन्हें द्रव हीलियम से ठंडा किया जाता है, प्रकाश की गति के निकट टकराई जाती हैं। टकराव का अध्ययन चार बड़े संसूचक करते हैं, जिनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध एटलस और सीएमएस हैं, तथा उनके साथ एलिस और एलएचसीबी हैं। वर्ष 2012 में एटलस और सीएमएस ने हिग्स बोसॉन की खोज की घोषणा की, जो उस क्षेत्र से जुड़ा कण है जिससे अन्य कणों को द्रव्यमान मिलता है, और इस सिद्धांत के लिए 2013 का भौतिकी नोबेल पुरस्कार पीटर हिग्स तथा फ्रांस्वा एंगलर को मिला। दो भारतीय कड़ियां याद रखने योग्य हैं: बोसॉन शब्द भारतीय भौतिकशास्त्री सत्येंद्रनाथ बोस के नाम पर है, और भारत 2002 से प्रेक्षक रहने के बाद जनवरी 2017 में सर्न का सहयुक्त सदस्य राष्ट्र बना। वर्ल्ड वाइड वेब का जन्म भी सर्न में हुआ, जिसे 1980 के दशक के अंत में टिम बर्नर्स-ली ने लिखा था।
आईटीईआर: संलयन ऊर्जा
आईटीईआर, जिसका लैटिन में अर्थ है मार्ग, दक्षिणी फ्रांस के कादाराश क्षेत्र में सेंट-पॉल-ले-दुरांस में बन रहा है। यह एक टोकामाक है, अर्थात छल्ले के आकार की मशीन, जिसमें ड्यूटीरियम और ट्राइटियम नामक हाइड्रोजन के दो भारी रूपों का प्लाज्मा चुंबकीय क्षेत्रों से बांधकर लगभग पंद्रह करोड़ डिग्री सेल्सियस तक गर्म किया जाता है, जिससे हल्के नाभिक जुड़कर हीलियम बनाते हैं और ऊर्जा निकलती है। इसका उद्देश्य यह दिखाना है कि संलयन से प्लाज्मा को गर्म करने में लगाई गई ऊर्जा से लगभग दस गुना अधिक तापीय शक्ति मिल सकती है। इसे सात भागीदार बना रहे हैं: यूरोपीय संघ, चीन, भारत, जापान, रूस, दक्षिण कोरिया और संयुक्त राज्य अमेरिका। भारत 2005 में इसमें शामिल हुआ और उसका हिस्सा गांधीनगर स्थित प्लाज्मा अनुसंधान संस्थान की इकाई आईटीईआर-इंडिया देती है, जो भारत के अपने टोकामाक आदित्य और स्टेडी स्टेट सुपरकंडक्टिंग टोकामाक अर्थात एसएसटी-1 भी चलाता है। संलयन वर्तमान परमाणु बिजलीघरों के विखंडन से भिन्न है: विखंडन यूरेनियम जैसे भारी नाभिक को तोड़ता है, जबकि संलयन हल्के नाभिकों को जोड़ता है, इसमें दीर्घजीवी उच्च स्तरीय अपशिष्ट नहीं बनता और शृंखला अभिक्रिया बेकाबू नहीं होती।
लाइगो और लाइगो-इंडिया
अल्बर्ट आइंस्टीन ने 1916 में सामान्य सापेक्षता के परिणाम के रूप में गुरुत्वीय तरंगों की भविष्यवाणी की थी, जो दिक्काल में उठने वाली लहरें हैं। इनका पहला सीधा संसूचन 14 सितंबर 2015 को अमेरिका में लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रेविटेशनल-वेव ऑब्जर्वेटरी के दो संसूचकों ने किया, जो वाशिंगटन के हैनफोर्ड और लुइसियाना के लिविंग्स्टन में हैं; संकेत दो कृष्ण विवरों के विलय से आया था और इसकी घोषणा फरवरी 2016 में हुई। प्रत्येक संसूचक अंग्रेजी के एल अक्षर जैसा व्यतिकरणमापी है, जिसकी भुजाएं चार किलोमीटर लंबी हैं और जिनमें लेजर किरण प्रोटॉन से भी बहुत छोटे लंबाई परिवर्तन को मापती है। इस कार्य के लिए 2017 का भौतिकी नोबेल पुरस्कार रेनर वाइस, बैरी बैरिश और किप थॉर्न को मिला। इसी डिजाइन का तीसरा संसूचक भारत में लाइगो-इंडिया के रूप में महाराष्ट्र के हिंगोली जिले के औंढा में बनना है; केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इसे 2016 में सैद्धांतिक और अप्रैल 2023 में पूर्ण स्वीकृति दी, और इसे परमाणु ऊर्जा विभाग तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग प्लाज्मा अनुसंधान संस्थान, इंदौर के राजा रामन्ना प्रगत प्रौद्योगिकी केंद्र तथा पुणे के अंतर विश्वविद्यालय खगोल विज्ञान एवं खगोल भौतिकी केंद्र के साथ बना रहे हैं। अमेरिकी जोड़ी से दूर स्थित संसूचक भविष्य के प्रत्येक स्रोत की आकाशीय स्थिति अधिक सटीक बताएगा।
भारत आधारित न्यूट्रिनो वेधशाला
न्यूट्रिनो लगभग द्रव्यमान रहित और विद्युत उदासीन कण हैं, जो पदार्थ से लगभग बिना टकराए निकल जाते हैं; वोल्फगांग पाउली ने 1930 में इनकी कल्पना की और एनरिको फर्मी ने इन्हें नाम दिया। भारत आधारित न्यूट्रिनो वेधशाला, जिसे केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2015 में स्वीकृति दी, तमिलनाडु के थेनी जिले की बोदी वेस्ट हिल्स में पोट्टिपुरम में लगभग 1,300 मीटर चट्टान के नीचे बनाई जानी है, और इसका आतिथेय संस्थान टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान है। इसका मुख्य संसूचक 50,000 टन का चुंबकित आयरन कैलोरीमीटर अर्थात आईकैल होगा, जिसे प्रतिरोधी प्लेट चैंबरों से पढ़ा जाएगा और जो यह अध्ययन करेगा कि वायुमंडलीय न्यूट्रिनो एक प्रकार से दूसरे प्रकार में कैसे बदलते हैं; न्यूट्रिनो दोलन की इसी परिघटना के लिए 2015 का नोबेल पुरस्कार दिया गया था। भारत का इस क्षेत्र में इतिहास है, क्योंकि कर्नाटक की कोलार स्वर्ण क्षेत्र की गहरी खदानों में हुए प्रयोगों ने 1965 में वायुमंडलीय न्यूट्रिनो दर्ज किए थे।
परीक्षा में पूछी जाने वाली अन्य बड़ी सुविधाएं
| परियोजना | स्थान | क्षेत्र | भारत की भूमिका |
|---|---|---|---|
| वृहद हैड्रॉन संघट्टक (सर्न) | मेरिन, जेनेवा के निकट | कण भौतिकी | 2017 से सहयुक्त सदस्य राष्ट्र |
| आईटीईआर | कादाराश, फ्रांस | संलयन ऊर्जा | 2005 से भागीदार, आईटीईआर-इंडिया के माध्यम से |
| लाइगो-इंडिया | हिंगोली, महाराष्ट्र | गुरुत्वीय तरंगें | तीसरे संसूचक का आतिथेय देश |
| भारत आधारित न्यूट्रिनो वेधशाला | थेनी, तमिलनाडु | न्यूट्रिनो भौतिकी | टीआईएफआर के साथ आतिथेय और निर्माता |
| थर्टी मीटर टेलीस्कोप | मौना किया, हवाई | प्रकाशिक खगोल विज्ञान | इंडिया-टीएमटी के माध्यम से भागीदार |
| स्क्वायर किलोमीटर ऐरे | ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका | रेडियो खगोल विज्ञान | वेधशाला का सदस्य |
| जायंट मीटरवेव रेडियो टेलीस्कोप | खोडद, पुणे के निकट | रेडियो खगोल विज्ञान | एनसीआरए-टीआईएफआर की भारतीय सुविधा |
प्रत्येक परियोजना को उसके एक पंक्ति के उद्देश्य और स्थान से याद करें, क्योंकि प्रश्न इसी रूप में आता है। कणों का टकराव अर्थात जेनेवा का सर्न, संलयन अर्थात फ्रांस का आईटीईआर, दिक्काल की लहरें अर्थात लाइगो और हिंगोली, तथा न्यूट्रिनो अर्थात थेनी और आयरन कैलोरीमीटर।
परीक्षा की दृष्टि से
प्रश्न जोड़ी मिलान वाले होते हैं: परियोजना और देश, परियोजना और क्षेत्र, परियोजना और भारतीय नोडल संस्थान। सर्वाधिक पूछे जाने वाले बिंदु हैं एलएचसी की 27 किलोमीटर परिधि और जेनेवा के निकट उसका स्थान, 2012 का हिग्स बोसॉन और 2013 का नोबेल पुरस्कार, 2017 में सर्न की सहयुक्त सदस्यता, फ्रांस में संलयन टोकामाक आईटीईआर और 2005 से भारत की भागीदारी, 2015 में गुरुत्वीय तरंगों का पहला संसूचन तथा महाराष्ट्र के हिंगोली जिले में लाइगो-इंडिया का स्थल, और थेनी जिले की न्यूट्रिनो वेधशाला का आईकैल संसूचक। बचने योग्य भूलें: आईटीईआर को विखंडन रिएक्टर कहना, सर्न को केवल फ्रांस में मानना, दोनों अमेरिकी लाइगो स्थलों को भारतीय स्थल से मिला देना, और न्यूट्रिनो वेधशाला को तमिलनाडु के बजाय केरल में बताना।
महत्वपूर्ण तथ्य
| सर्न की स्थापना | 1954, जेनेवा के निकट मेरिन, स्विट्जरलैंड |
|---|---|
| एलएचसी का छल्ला | परिधि लगभग 27 किलोमीटर, धरातल से करीब 100 मीटर नीचे |
| हिग्स बोसॉन | सर्न के एटलस और सीएमएस प्रयोगों द्वारा 2012 में घोषित |
| हिग्स क्रियाविधि का नोबेल | भौतिकी, 2013: पीटर हिग्स और फ्रांस्वा एंगलर |
| सर्न में भारत | 2002 से प्रेक्षक, जनवरी 2017 से सहयुक्त सदस्य राष्ट्र |
| आईटीईआर का स्थल और अर्थ | कादाराश, फ्रांस; आईटीईआर का लैटिन में अर्थ मार्ग |
| आईटीईआर के भागीदार | यूरोपीय संघ, चीन, भारत, जापान, रूस, दक्षिण कोरिया, अमेरिका |
| आईटीईआर के लिए भारतीय नोड | आईटीईआर-इंडिया, प्लाज्मा अनुसंधान संस्थान, गांधीनगर |
| गुरुत्वीय तरंगों का पहला संसूचन | 14 सितंबर 2015, लाइगो द्वारा, कृष्ण विवरों के विलय से |
| लाइगो संसूचक की भुजाएं | चार किलोमीटर, हैनफोर्ड (वाशिंगटन) और लिविंग्स्टन (लुइसियाना) में |
| लाइगो-इंडिया का स्थल | औंढा, हिंगोली जिला, महाराष्ट्र; पूर्ण स्वीकृति अप्रैल 2023 |
| न्यूट्रिनो वेधशाला का स्थल और संसूचक | पोट्टिपुरम, थेनी जिला, तमिलनाडु; 50,000 टन का आयरन कैलोरीमीटर (आईकैल) |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
सर्न का वृहद हैड्रॉन संघट्टक लगभग कितनी परिधि वाला छल्ला है?
- A.7 किलोमीटर
- B.17 किलोमीटर
- C.27 किलोमीटर
- D.47 किलोमीटर
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर C, 27 किलोमीटर है। वृहद हैड्रॉन संघट्टक लगभग 27 किलोमीटर परिधि वाली गोलाकार सुरंग में है, जो जेनेवा के निकट स्विट्जरलैंड और फ्रांस की सीमा पर धरातल से करीब 100 मीटर नीचे है, और यह अब तक बना सबसे बड़ा तथा सर्वाधिक शक्तिशाली कण त्वरक है; यह सुरंग मूलतः सर्न की पुरानी मशीन वृहद इलेक्ट्रॉन-पॉजिट्रॉन संघट्टक के लिए खोदी गई थी। विकल्प A, 7 किलोमीटर, बहुत छोटा है और किसी मध्यम आकार के त्वरक छल्ले के करीब बैठता है। विकल्प B, 17 किलोमीटर, लोकप्रिय भ्रामक विकल्प है, क्योंकि संख्या पास की है और जिन्हें केवल इतना याद रहता है कि आंकड़ा बीस के ऊपर है, वे यही चुन बैठते हैं। विकल्प D, 47 किलोमीटर, एलएचसी से बड़ा है और इस प्रकार का आंकड़ा भविष्य के प्रस्तावित संघट्टकों की चर्चा में आता है। जोड़ी याद रखें: 27 किलोमीटर और 100 मीटर गहराई, तथा भीतर प्रोटॉन को द्रव हीलियम से ठंडे अतिचालक चुंबक नियंत्रित करते हैं।
वृहद हैड्रॉन संघट्टक चलाने वाले सर्न की प्रयोगशाला किस शहर के निकट है?
- A.जेनेवा
- B.वियना
- C.डार्मस्टाट
- D.ग्रेनोबल
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व्याख्या
सही उत्तर A, जेनेवा है। वर्ष 1954 में स्थापित यूरोपीय नाभिकीय अनुसंधान संगठन का परिसर स्विट्जरलैंड में जेनेवा के बाहरी भाग मेरिन में है, और चूंकि उसकी सुरंगें सीमा के नीचे जाती हैं, प्रयोगशाला का कुछ भाग फ्रांस में भी पड़ता है। विकल्प B, वियना, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी का मुख्यालय है, जो परमाणु सुरक्षा और सुरक्षोपायों से जुड़ी पूरी तरह भिन्न संस्था है। विकल्प C, जर्मनी का डार्मस्टाट, जीएसआई प्रयोगशाला तथा फेयर अर्थात एंटीप्रोटॉन और आयन अनुसंधान सुविधा का स्थान है, जिसमें भारत भागीदार है, इसलिए वह इसी परिवार के प्रश्नों में आता है, परंतु सर्न से उसका संबंध नहीं है। विकल्प D, फ्रांस का ग्रेनोबल, यूरोपीय सिंक्रोट्रॉन विकिरण सुविधा और इंस्टीट्यूट लाउए-लांजेवां का घर है। स्मरण सूत्र है सर्न, जेनेवा, 1954 और 27 किलोमीटर का छल्ला।
वर्ष 2012 में हिग्स बोसॉन की खोज की घोषणा सर्न के किन दो प्रयोगों ने की थी?
- A.एलिस और एलएचसीबी
- B.एटलस और सीएमएस
- C.सुपर-कामिओकांडे और एसएनओ
- D.आईकैल और आरपीसी
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व्याख्या
सही उत्तर B, एटलस और सीएमएस है। ये एलएचसी के छल्ले पर लगे दो सर्वोद्देश्यीय संसूचक हैं, और जुलाई 2012 में दोनों ने स्वतंत्र रूप से लगभग 125 गिगा इलेक्ट्रॉनवोल्ट का नया कण पाने की सूचना दी, जो हिग्स बोसॉन से मेल खाता था, अर्थात उस क्षेत्र से जुड़ा कण जिससे अन्य कणों को द्रव्यमान मिलता है; सिद्धांत के लिए 2013 का भौतिकी नोबेल पीटर हिग्स और फ्रांस्वा एंगलर को मिला। विकल्प A, एलिस और एलएचसीबी, भी एलएचसी के प्रयोग हैं, परंतु एलिस भारी आयनों के टकराव में क्वार्क-ग्लूऑन प्लाज्मा का अध्ययन करता है और एलएचसीबी बॉटम क्वार्क वाले कणों का। विकल्प C, जापान का सुपर-कामिओकांडे और कनाडा का एसएनओ, न्यूट्रिनो संसूचक हैं, जिनके न्यूट्रिनो दोलन संबंधी कार्य को 2015 का नोबेल मिला। विकल्प D भारत आधारित न्यूट्रिनो वेधशाला के प्रस्तावित संसूचक और पठन चैंबरों के नाम हैं, सर्न से इनका संबंध नहीं। बोसॉन शब्द स्वयं सत्येंद्रनाथ बोस के सम्मान में है।
विश्व का सबसे बड़ा संलयन प्रयोग आईटीईआर किस देश में बनाया जा रहा है?
- A.जापान
- B.जर्मनी
- C.फ्रांस
- D.संयुक्त राज्य अमेरिका
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व्याख्या
सही उत्तर C, फ्रांस है। आईटीईआर दक्षिणी फ्रांस के कादाराश क्षेत्र में सेंट-पॉल-ले-दुरांस में बन रहा है, और इसके सात भागीदार हैं यूरोपीय संघ, चीन, भारत, जापान, रूस, दक्षिण कोरिया तथा संयुक्त राज्य अमेरिका; इस नाम का लैटिन में अर्थ मार्ग है। विकल्प A, जापान, भागीदार है और यूरोप के साथ व्यापक समझौते के अंतर्गत जेटी-60एसए टोकामाक जैसे संलयन कार्य का आतिथेय भी है, इसलिए यह विकल्प लुभाता है, परंतु आईटीईआर मशीन फ्रांस में है। विकल्प B, जर्मनी, ग्राइफ्सवाल्ड में वेंडेलश्टाइन 7-एक्स स्टेलरेटर चलाता है, जो चुंबकीय परिरोध की भिन्न युक्ति है। विकल्प D, अमेरिका, भागीदार है और पहले टीएफटीआर जैसे बड़े टोकामाक का आतिथेय रहा, परंतु आईटीईआर का नहीं। कड़ी याद रखें: आईटीईआर, टोकामाक, फ्रांस का कादाराश, भारत 2005 से। आईटीईआर का उद्देश्य बिजली बेचना नहीं, बल्कि यह सिद्ध करना है कि चुंबकीय परिरोध से संलयन को औद्योगिक पैमाने पर चलाया जा सकता है, इसलिए इसे प्रायोगिक रिएक्टर कहा जाता है और इसकी लागत सातों भागीदार मिलकर उठाते हैं।
आईटीईआर में भारत का योगदान आईटीईआर-इंडिया देता है, जो किस संस्थान की इकाई है?
- A.प्लाज्मा अनुसंधान संस्थान, गांधीनगर
- B.भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र, मुंबई
- C.भारतीय तारा भौतिकी संस्थान, बेंगलुरु
- D.भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला, अहमदाबाद
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व्याख्या
सही उत्तर A, गांधीनगर का प्लाज्मा अनुसंधान संस्थान है। परमाणु ऊर्जा विभाग का यह संस्थान प्लाज्मा और संलयन अनुसंधान का राष्ट्रीय केंद्र है, इसमें वह घरेलू अभिकरण आईटीईआर-इंडिया है जो मशीन में भारत का हिस्सा देता है, और यही संस्थान भारत के अपने टोकामाक आदित्य तथा एसएसटी-1 अर्थात स्टेडी स्टेट सुपरकंडक्टिंग टोकामाक चलाता है। विकल्प B, भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र, विखंडन रिएक्टरों, रेडियो समस्थानिकों और नाभिकीय ईंधन चक्र का प्रमुख केंद्र है, आईटीईआर का घरेलू अभिकरण नहीं। विकल्प C, भारतीय तारा भौतिकी संस्थान, दूरबीनों और सौर भौतिकी पर काम करता है तथा थर्टी मीटर टेलीस्कोप जैसी परियोजनाओं से जुड़ा है। विकल्प D, भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान की जन्मस्थली है और ग्रहीय तथा वायुमंडलीय विज्ञान पर कार्य करती है। सूत्र यह है कि प्लाज्मा और संलयन का अर्थ गांधीनगर है।
हाइड्रोजन बम किस नाभिकीय प्रक्रिया पर आधारित है?
- A.तापीय संलयन
- B.भारी जल क्षमता
- C.तापीय विखंडन
- D.त्वरित प्रजनक अभिक्रिया
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व्याख्या
सही उत्तर A, तापीय संलयन है। हाइड्रोजन बम, जिसे तापनाभिकीय बम भी कहा जाता है, विखंडन विस्फोट का उपयोग केवल उद्दीपक के रूप में करता है; मुख्य ऊर्जा लाखों डिग्री ताप पर हाइड्रोजन के भारी समस्थानिकों ड्यूटीरियम और ट्राइटियम के हीलियम में संलयन से मिलती है, इसलिए इस प्रक्रिया को तापनाभिकीय या तापीय संलयन कहा जाता है। यही अभिक्रिया सूर्य को ऊर्जा देती है और इसी को शांतिपूर्ण ऊर्जा के लिए साधने हेतु आईटीईआर बनाया जा रहा है। विकल्प B, भारी जल क्षमता, कोई नाभिकीय प्रक्रिया ही नहीं है; भारी जल भारतीय दबावित भारी जल रिएक्टरों में मंदक और शीतलक के रूप में काम आता है। विकल्प C, तापीय विखंडन, मंद न्यूट्रॉनों द्वारा यूरेनियम-235 जैसे भारी नाभिक का टूटना है और यह परमाणु बम तथा साधारण परमाणु बिजलीघरों की प्रक्रिया है। विकल्प D, प्रजनक अभिक्रिया, वह विखंडन है जिसमें खपत से अधिक विखंडनीय पदार्थ बनता है, जैसे प्रजनक रिएक्टर में।
नाभिकीय संलयन अभिक्रिया के दौरान -
- A.तापीय न्यूट्रॉनों की बमबारी से एक हल्का नाभिक टूट जाता है।
- B.तापीय न्यूट्रॉनों की बमबारी से एक भारी नाभिक टूट जाता है।
- C.दो हल्के नाभिक जुड़कर भारी नाभिक और संभवतः अन्य उत्पाद देते हैं।
- D.एक भारी नाभिक स्वयं दो टुकड़ों में टूट जाता है।
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर C है। संलयन दो हल्के नाभिकों का जुड़कर भारी नाभिक बनना है, जिसमें न्यूट्रॉन या अन्य उत्पाद निकलते हैं और बहुत अधिक ऊर्जा प्रकट होती है, क्योंकि उत्पाद का द्रव्यमान अभिकारकों के द्रव्यमान से कुछ कम होता है; आईटीईआर में यह अभिक्रिया ड्यूटीरियम और ट्राइटियम को जोड़कर हीलियम तथा एक न्यूट्रॉन देती है। विकल्प A गलत है, क्योंकि तापीय न्यूट्रॉन से टकराने पर हल्का नाभिक उपयोगी रूप से नहीं टूटता; मंद न्यूट्रॉन से प्रेरित विखंडन भारी विखंडनीय नाभिकों पर होता है। विकल्प B नाभिकीय विखंडन का वर्णन करता है, अर्थात तापीय न्यूट्रॉनों द्वारा यूरेनियम-235 जैसे भारी नाभिक का टूटना, जो संलयन का उलटा है। विकल्प D स्वतः विखंडन बताता है, जिसमें अत्यंत भारी नाभिक बिना टकराव स्वयं विभाजित हो जाता है और जो रेडियोसक्रिय क्षय का एक रूप है। संलयन के लिए दो नाभिकों के विद्युत प्रतिकर्षण को पार करने हेतु अपार ताप और दबाव चाहिए, इसीलिए टोकामाक प्लाज्मा को चुंबकीय क्षेत्रों से बांधता है।
सितंबर 2015 में लाइगो द्वारा पहली बार संसूचित गुरुत्वीय तरंगों की भविष्यवाणी एक शताब्दी पूर्व किसने की थी?
- A.आइजैक न्यूटन
- B.अल्बर्ट आइंस्टीन
- C.नील्स बोर
- D.स्टीफन हॉकिंग
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर B, अल्बर्ट आइंस्टीन है। गुरुत्वीय तरंगें दिक्काल में उठने वाली लहरें हैं, जो दो कृष्ण विवरों के विलय जैसी प्रचंड घटनाओं से निकलती हैं, और ये उस सामान्य सापेक्षता सिद्धांत से निकलती हैं जिसे आइंस्टीन ने 1915 में प्रकाशित किया तथा तरंगों की भविष्यवाणी 1916 में रखी। लाइगो ने पहला सीधा संकेत 14 सितंबर 2015 को दर्ज किया और फरवरी 2016 में उसकी घोषणा की, तथा 2017 का भौतिकी नोबेल रेनर वाइस, बैरी बैरिश और किप थॉर्न को मिला। विकल्प A, आइजैक न्यूटन, ने गुरुत्वाकर्षण का व्युत्क्रम वर्ग नियम दिया, जिसमें गुरुत्व तत्क्षण कार्य करता है और तरंगों का कोई स्थान नहीं है। विकल्प C, नील्स बोर, ने परमाणु और क्वांटम सिद्धांत पर कार्य किया। विकल्प D, स्टीफन हॉकिंग, कृष्ण विवर विकिरण और ब्रह्मांड विज्ञान के लिए प्रसिद्ध हैं, इसीलिए उनका नाम भ्रमित करता है, परंतु उनका जन्म इस भविष्यवाणी के बहुत बाद हुआ।
लाइगो नेटवर्क का तीसरा संसूचक लाइगो-इंडिया किस स्थान पर स्थापित किया जा रहा है?
- A.औंढा, हिंगोली जिला, महाराष्ट्र
- B.हानले, लद्दाख
- C.पोट्टिपुरम, थेनी जिला, तमिलनाडु
- D.खोडद, पुणे जिला, महाराष्ट्र
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर A, महाराष्ट्र के हिंगोली जिले का औंढा है। यह स्थल समतल और भूकंपीय दृष्टि से शांत भूमि के कारण चुना गया, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने परियोजना को 2016 में सैद्धांतिक तथा अप्रैल 2023 में पूर्ण स्वीकृति दी, और इसे परमाणु ऊर्जा विभाग तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग प्लाज्मा अनुसंधान संस्थान, इंदौर के आरआरकैट और पुणे के आईयूकैक के साथ बना रहे हैं। विकल्प B, लद्दाख का हानले, खगोल विज्ञान का स्थल है, जहां भारतीय खगोलीय वेधशाला और मेस गामा किरण दूरबीन हैं। विकल्प C, थेनी जिले का पोट्टिपुरम, भारत आधारित न्यूट्रिनो वेधशाला का प्रस्तावित स्थल है, जो भिन्न मेगा विज्ञान परियोजना है। विकल्प D, पुणे के निकट खोडद, जायंट मीटरवेव रेडियो टेलीस्कोप का स्थान है। जोड़ियां अलग रखें: गुरुत्वीय तरंगें हिंगोली में, न्यूट्रिनो थेनी में, रेडियो खगोल विज्ञान खोडद में और प्रकाशिक खगोल विज्ञान हानले में।
थेनी जिले में प्रस्तावित भारत आधारित न्यूट्रिनो वेधशाला का मुख्य संसूचक क्या होगा?
- A.जल चेरेनकोव टंकी
- B.50,000 टन का चुंबकित आयरन कैलोरीमीटर
- C.द्रव आर्गन टाइम प्रोजेक्शन चैंबर
- D.अतिचालक टोकामाक
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर B, 50,000 टन का चुंबकित आयरन कैलोरीमीटर है, जिसे आईकैल कहा जाता है और जिसे प्रतिरोधी प्लेट चैंबरों से पढ़ा जाएगा। बोदी वेस्ट हिल्स के पोट्टिपुरम में लगभग 1,300 मीटर चट्टान के नीचे बनी गुफा में रखा जाने वाला यह संसूचक वायुमंडलीय न्यूट्रिनो पकड़ने और यह मापने के लिए बना है कि वे एक प्रकार से दूसरे प्रकार में कैसे बदलते हैं, अर्थात न्यूट्रिनो दोलन; चुंबकीय क्षेत्र के कारण यह न्यूट्रिनो और प्रतिन्यूट्रिनो में अंतर बता सकता है। विकल्प A, जल चेरेनकोव टंकी, जापान के सुपर-कामिओकांडे का डिजाइन है, आईकैल का नहीं। विकल्प C, द्रव आर्गन टाइम प्रोजेक्शन चैंबर, अमेरिकी ड्यून प्रयोग की तकनीक है। विकल्प D, अतिचालक टोकामाक, भारत के एसएसटी-1 जैसी संलयन मशीन है और न्यूट्रिनो से उसका कोई संबंध नहीं है। वेधशाला का आतिथेय संस्थान टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान है, और भारत ने 1965 में कोलार स्वर्ण क्षेत्र की खदानों में वायुमंडलीय न्यूट्रिनो दर्ज कर लिए थे।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
वृहद हैड्रॉन संघट्टक क्या है और कहां स्थित है?
यह विश्व का सबसे बड़ा कण त्वरक है, जिसे सर्न स्विट्जरलैंड और फ्रांस की सीमा पर जेनेवा के निकट मेरिन में चलाता है। लगभग 27 किलोमीटर लंबे छल्ले में, धरातल से करीब 100 मीटर नीचे, प्रोटॉन विपरीत दिशाओं में दौड़कर एटलस और सीएमएस जैसे संसूचकों के भीतर टकराते हैं, जिन्होंने 2012 में हिग्स बोसॉन खोजा।
आईटीईआर विखंडन रिएक्टर है या संलयन मशीन?
यह संलयन मशीन है। आईटीईआर एक टोकामाक है, जिसमें ड्यूटीरियम और ट्राइटियम को लगभग पंद्रह करोड़ डिग्री सेल्सियस के प्लाज्मा में बदलकर चुंबकीय क्षेत्रों से बांधा जाता है, जिससे हल्के नाभिक जुड़कर हीलियम बनते हैं। वर्तमान परमाणु बिजलीघरों का विखंडन इसके विपरीत यूरेनियम जैसे भारी नाभिक को तोड़ता है।
लाइगो-इंडिया कहां और किसके द्वारा बनाया जा रहा है?
महाराष्ट्र के हिंगोली जिले के औंढा में। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2016 में सैद्धांतिक और अप्रैल 2023 में पूर्ण स्वीकृति दी, और इसे परमाणु ऊर्जा विभाग तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग प्लाज्मा अनुसंधान संस्थान, इंदौर के आरआरकैट और पुणे के आईयूकैक के साथ बना रहे हैं।
भारत आधारित न्यूट्रिनो वेधशाला किसका अध्ययन करेगी?
न्यूट्रिनो दोलन का, अर्थात वायुमंडलीय न्यूट्रिनो का एक प्रकार से दूसरे प्रकार में बदलना। इसके लिए प्रतिरोधी प्लेट चैंबरों से पढ़ा जाने वाला 50,000 टन का चुंबकित आयरन कैलोरीमीटर तमिलनाडु के थेनी जिले के पोट्टिपुरम में लगभग 1,300 मीटर चट्टान के नीचे रखा जाएगा और आतिथेय संस्थान टीआईएफआर होगा।
सर्न में भारत की क्या भूमिका है?
भारत सहयुक्त सदस्य राष्ट्र है, जो दर्जा उसने 2002 से प्रेक्षक रहने के बाद जनवरी 2017 में लिया। भारतीय संस्थान और परमाणु ऊर्जा विभाग एलएचसी के प्रयोगों में उपकरण, सॉफ्टवेयर और वैज्ञानिक देते हैं, तथा भारतीय उद्योग उसके त्वरकों के लिए पुर्जे बनाता है।
स्रोत
- सर्न और वृहद हैड्रॉन संघट्टक के बारे में — सर्न
- आईटीईआर क्या है — आईटीईआर संगठन
- लाइगो-इंडिया परियोजना — परमाणु ऊर्जा विभाग, भारत सरकार
- भारत आधारित न्यूट्रिनो वेधशाला: आईकैल संसूचक — टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान





