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GK नोट्सविज्ञान और प्रौद्योगिकीभारत की दूरबीनें और वेधशालाएं

भारत की दूरबीनें और वेधशालाएं: स्थल और तथ्य

परीक्षा के लिए भारत की दूरबीनों और वेधशालाओं के नोट्स: जीएमआरटी, देवस्थल, हनले, कवालूर, कोडईकनाल तथा ऊटी, एस्ट्रोसैट, आदित्य-एल1 और जंतर मंतर के साथ।

लेखक · प्रकाशित · 5 मिनट

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भारत की दूरबीनें और वेधशालाएं: स्थल और तथ्य — GK24 title card
भारत की दूरबीनें और वेधशालाएं: स्थल और तथ्य — GK24 title card

भारत आकाश को चार तरह की जगहों से देखता है: सूखे पठारों पर रेडियो सरणियां, ऊंची पर्वत श्रेणियों पर प्रकाशिक दूरबीनें, जल के किनारे सौर वेधशालाएं, और वायुमंडल के ऊपर उपग्रह। इनमें से हर एक तैयार प्रश्न है, क्योंकि परीक्षक को केवल यह पूछना होता है कि कोई यंत्र कहां है या किस तरंगदैर्घ्य पर देखता है। विषय समाचार में भी है, क्योंकि अक्टूबर 2026 में ब्लेजार ओजे 287 और उसके युगल कृष्ण विवरों पर दस वर्ष के अध्ययन की रिपोर्ट आई, जिसका समन्वय नैनीताल की आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान से हुआ और जिसमें 18 देशों के 106 वैज्ञानिक शामिल थे। यह नोट हर सुविधा को उसके स्थान, तरंगदैर्घ्य और संचालक संस्थान से जोड़ देता है।

रेडियो दूरबीनें

जायंट मीटरवेव रेडियो टेलीस्कोप महाराष्ट्र के पुणे जिले में नारायणगांव के पास खोडद में है और इस अध्याय की सबसे अधिक पूछी जाने वाली सुविधा है। यह तीस पूर्णतः घुमावदार परवलयिक तश्तरियों की सरणी है, प्रत्येक पैंतालीस मीटर व्यास की, जो लगभग पच्चीस किलोमीटर में अंग्रेजी के वाई आकार में फैली हैं, और मीटर तरंगदैर्घ्य पर काम करने वाली विश्व की सबसे बड़ी दूरबीनों में गिनी जाती है। इसकी कल्पना और निर्माण गोविंद स्वरूप के नेतृत्व में हुआ और इसका संचालन टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान का राष्ट्रीय रेडियो खगोल भौतिकी केंद्र करता है। हल्के तार-जाल की डिजाइन, जिसे स्मार्ट संकल्पना कहा गया, ने लागत इतनी कम रखी कि सरणी भारत में ही बन सकी।

तमिलनाडु की नीलगिरि पहाड़ियों में स्थित ऊटी रेडियो टेलीस्कोप पुरानी और आकार में अनोखी है: पांच सौ तीस मीटर लंबा और तीस मीटर चौड़ा बेलनाकार परवलयिक एंटीना, जो उस पहाड़ी ढलान पर बिछा है जिसका ढाल अक्षांश के बराबर है, जिससे बेलन को केवल उसकी लंबी धुरी पर घुमाकर दिशा दी जा सकती है। यह भी राष्ट्रीय रेडियो खगोल भौतिकी केंद्र की है। कर्नाटक के गौरीबिदनूर में रमन शोध संस्थान एक रेडियोहेलियोग्राफ चलाता है, जो सूर्य को निम्न रेडियो आवृत्तियों पर देखता है।

प्रकाशिक और अवरक्त दूरबीनें

उत्तराखंड के नैनीताल जिले में लगभग 2,450 मीटर ऊंची पर्वत श्रेणी देवस्थल भारत का मुख्य प्रकाशिक स्थल है। बेल्जियम के सहयोग से बनी और 2016 में सक्रिय हुई 3.6 मीटर देवस्थल प्रकाशिक दूरबीन देश की सबसे बड़ी प्रकाशिक दूरबीन है, और उसके साथ 1.3 मीटर देवस्थल फास्ट ऑप्टिकल टेलीस्कोप तथा चार मीटर अंतरराष्ट्रीय द्रव दर्पण दूरबीन खड़ी हैं, जो पारे की घूमती तश्तरी को दर्पण की तरह प्रयोग करती है और सिर के ऊपर से गुजरती आकाश-पट्टी का सर्वेक्षण करती है। तीनों का संचालन आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान करता है, जो विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग का स्वायत्त संस्थान है और पुरानी उत्तर प्रदेश राज्य वेधशाला से विकसित हुआ।

तमिलनाडु की जवादी पहाड़ियों में कवालूर की वैणु बाप्पू वेधशाला भारतीय तारा भौतिकी संस्थान चलाता है, और उसमें 1986 में चालू हुई 2.34 मीटर वैणु बाप्पू दूरबीन है, जो वर्षों तक एशिया की सबसे बड़ी रही। कवालूर से किए प्रेक्षणों ने 1977 में यूरेनस के वलयों की खोज में योगदान दिया। लद्दाख के हनले में, लगभग 4,500 मीटर पर, संस्थान की भारतीय खगोलीय वेधशाला में दो मीटर की हिमालयन चंद्र दूरबीन है, जिसे बेंगलुरु के पास होसकोटे से दूर-नियंत्रण द्वारा चलाया जाता है; वहां की पतली, शुष्क और अंधेरी हवा विश्व की सर्वोत्तम में है, और आसपास का क्षेत्र डार्क स्काई रिजर्व अधिसूचित हुआ है। हनले में मेजर एटमॉस्फेरिक चेरेनकोव एक्सपेरिमेंट भी है, जो भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र द्वारा बनी इक्कीस मीटर की गामा किरण दूरबीन है और गामा किरण के वायुमंडल से टकराने पर बनी प्रकाश-कौंध पकड़ती है। राजस्थान के गुरुशिखर पर माउंट आबू अवरक्त वेधशाला भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला चलाती है, जो अवरक्त में काम करती है।

सौर वेधशालाएं

  • तमिलनाडु की कोडईकनाल सौर वेधशाला 1899 में स्थापित हुई और अब भारतीय तारा भौतिकी संस्थान के पास है; इसमें सूर्य के सौ वर्ष से अधिक के दैनिक चित्र सुरक्षित हैं, जो विश्व के सबसे लंबे अभिलेखों में हैं।
  • भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला की उदयपुर सौर वेधशाला फतहसागर झील के एक द्वीप पर है, क्योंकि चारों ओर का जल हवा को स्थिर रखता है और प्रतिबिंब तीक्ष्ण बनाता है; उसकी बहु-उपयोग सौर दूरबीन सौर वायुमंडल का अध्ययन करती है।
  • लद्दाख की स्वच्छ और ऊंची हवा के लिए राष्ट्रीय बृहत सौर दूरबीन लंबे समय से प्रस्तावित है।

वायुमंडल के ऊपर की वेधशालाएं

कई तरंगदैर्घ्य का प्रकाश धरती तक पहुंचता ही नहीं, इसलिए कुछ वेधशालाएं छोड़ी जाती हैं। एस्ट्रोसैट, भारत की पहली समर्पित बहु-तरंगदैर्घ्य अंतरिक्ष वेधशाला, 28 सितंबर 2015 को पीएसएलवी-सी30 से छोड़ी गई और उसमें पांच पेलोड हैं, जिनमें पराबैंगनी इमेजिंग दूरबीन, सॉफ्ट एक्स-रे दूरबीन, बृहत क्षेत्र एक्स-रे प्रपोर्शनल काउंटर तथा कैडमियम जिंक टेल्यूराइड इमेजर शामिल हैं, जिससे एक ही स्रोत को पराबैंगनी तथा मृदु और कठोर दोनों एक्स-रे में साथ देखा जा सकता है। आदित्य-एल1, देश की पहली अंतरिक्ष आधारित सौर वेधशाला, 2 सितंबर 2023 को छोड़ी गई और सूर्य-पृथ्वी के पहले लैग्रांज बिंदु के चारों ओर हेलो कक्षा में रखी गई, जहां से सूर्य कभी ढकता नहीं; उसका मुख्य यंत्र दृश्य उत्सर्जन रेखा कोरोनाग्राफ कोरोना का अध्ययन करता है। भारत थर्टी मीटर टेलीस्कोप परियोजना में भागीदार भी है और गुरुत्वीय तरंग संसूचक लाइगो-इंडिया बना रहा है, जिसे केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2023 में महाराष्ट्र के हिंगोली में स्थल के लिए मंजूरी दी।

दूरबीन से पहले की वेधशालाएं

भारत में प्रेक्षण लेंस से पुराना है। आमेर के सवाई जयसिंह द्वितीय ने अठारहवीं सदी के आरंभ में जयपुर, दिल्ली, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी में चिनाई के यंत्र बनवाए, और इन जंतर मंतर वेधशालाओं ने केवल छाया और दृष्टि-रेखा से समय, क्रांति तथा ग्रहों की स्थिति मापी। जयपुर का सम्राट यंत्र विशाल सूर्यघड़ी है, जिसकी छाया लगभग एक मिलीमीटर प्रति सेकंड चलती है, और जयपुर का स्थल 2010 में यूनेस्को विश्व विरासत सूची में अंकित हुआ। पुणे का अंतर-विश्वविद्यालय खगोल विज्ञान एवं खगोल भौतिकी केंद्र, जो 1988 में जयंत नार्लीकर के नेतृत्व में बना, इस परंपरा को आज विश्वविद्यालयी शोध में आगे बढ़ाता है।

परीक्षा की दृष्टि से

लगभग हर प्रश्न मिलान का होता है, इसलिए प्रत्येक सुविधा को उसके राज्य और तरंगदैर्घ्य के साथ याद करें। सबसे अधिक पूछे जाने वाले जोड़े हैं जीएमआरटी के साथ महाराष्ट्र का पुणे, ऊटी रेडियो टेलीस्कोप के साथ तमिलनाडु, देवस्थल के साथ उत्तराखंड, हनले के साथ लद्दाख, कवालूर तथा कोडईकनाल के साथ तमिलनाडु, और उदयपुर के साथ राजस्थान। दूसरा पसंदीदा रूप अंक हैं: जीएमआरटी की पैंतालीस मीटर वाली तीस तश्तरियां, देवस्थल की 3.6 मीटर, कवालूर की 2.34 मीटर, हनले की 2 मीटर और ऊटी का 530 मीटर बेलन। तीसरा रूप पूछता है कि कौन संस्थान क्या चलाता है, जहां एनसीआरए-टीआईएफआर, भारतीय तारा भौतिकी संस्थान, आर्यभट्ट संस्थान और भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला आपस में न मिलें। अंतरिक्ष वेधशालाओं से 2015 का एस्ट्रोसैट और 2023 का आदित्य-एल1 आते हैं, और आम जाल एस्ट्रोसैट को सौर मिशन कह देना या आदित्य-एल1 को एल1 बिंदु के बजाय सूर्य की कक्षा में बता देना है।

महत्वपूर्ण तथ्य

जायंट मीटरवेव रेडियो टेलीस्कोपनारायणगांव के पास खोडद, पुणे जिला, महाराष्ट्र; 45 मीटर की 30 तश्तरियां; एनसीआरए-टीआईएफआर
ऊटी रेडियो टेलीस्कोपनीलगिरि, तमिलनाडु में 530 मीटर गुणा 30 मीटर का बेलनाकार परवलयिक एंटीना
देवस्थल प्रकाशिक दूरबीन3.6 मीटर, नैनीताल जिला, उत्तराखंड; भारत की सबसे बड़ी प्रकाशिक दूरबीन; आर्यभट्ट संस्थान
अंतरराष्ट्रीय द्रव दर्पण दूरबीनदेवस्थल पर पारे के घूमते दर्पण वाली 4 मीटर दूरबीन
वैणु बाप्पू दूरबीनकवालूर, तमिलनाडु में 2.34 मीटर; भारतीय तारा भौतिकी संस्थान
भारतीय खगोलीय वेधशालाहनले, लद्दाख, लगभग 4,500 मीटर; 2 मीटर हिमालयन चंद्र दूरबीन
मेसहनले में 21 मीटर की मेजर एटमॉस्फेरिक चेरेनकोव एक्सपेरिमेंट गामा किरण दूरबीन
कोडईकनाल सौर वेधशालातमिलनाडु, 1899 में स्थापित; सौ वर्ष से अधिक के दैनिक सौर चित्र
उदयपुर सौर वेधशालाफतहसागर झील के द्वीप पर, राजस्थान; भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला
एस्ट्रोसैट28 सितंबर 2015 को पीएसएलवी-सी30 से प्रक्षेपित; यूवीआईटी तथा एसएक्सटी सहित पांच पेलोड
आदित्य-एल12 सितंबर 2023 को प्रक्षेपित; लैग्रांज बिंदु एल1 के चारों ओर हेलो कक्षा; वेल्क कोरोनाग्राफ
जंतर मंतरसवाई जयसिंह द्वितीय की जयपुर, दिल्ली, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी की चिनाई वेधशालाएं

इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ

Q1.विज्ञान और प्रौद्योगिकीआसान

जायंट मीटरवेव रेडियो टेलीस्कोप (जीएमआरटी) किस नगर के पास है?

  1. A.उत्तराखंड का नैनीताल
  2. B.महाराष्ट्र का पुणे
  3. C.तेलंगाना का हैदराबाद
  4. D.केरल का तिरुवनंतपुरम
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. महाराष्ट्र का पुणे

व्याख्या

सही उत्तर B, महाराष्ट्र का पुणे है। यह सरणी नारायणगांव के पास खोडद में है, पुणे से लगभग अस्सी किलोमीटर उत्तर, उस समतल भूमि पर जिसे कम मानव-जनित रेडियो व्यवधान के कारण चुना गया, और इसका संचालन टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान का राष्ट्रीय रेडियो खगोल भौतिकी केंद्र करता है। A यानी नैनीताल वह जिला है जिसमें देवस्थल है, जहां आर्यभट्ट संस्थान की प्रकाशिक दूरबीनें हैं, इसलिए विकल्पों में ये दोनों स्थल अक्सर बदल दिए जाते हैं। C में इस प्रकार की कोई बड़ी रेडियो सरणी नहीं है, भले वहां अन्य वैज्ञानिक संस्थान हों। D विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र का नगर है, जो प्रक्षेपण यान बनाता है, वेधशाला नहीं है। जीएमआरटी को मीटर तरंगदैर्घ्य और महाराष्ट्र के साथ याद रखें। यह सरणी लगभग 100 से 1,500 मेगाहर्ट्ज की पट्टी में काम करती है, जिसमें पल्सर और हाइड्रोजन बादलों का अध्ययन होता है।

Q2.विज्ञान और प्रौद्योगिकीमध्यम

जीएमआरटी सरणी में कितनी परवलयिक तश्तरियां हैं और प्रत्येक का व्यास कितना है?

  1. A.पैंतालीस मीटर की तीस तश्तरियां
  2. B.तीस मीटर की पंद्रह तश्तरियां
  3. C.तीस मीटर की पैंतालीस तश्तरियां
  4. D.पचास मीटर की बारह तश्तरियां
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. पैंतालीस मीटर की तीस तश्तरियां

व्याख्या

सही उत्तर A, पैंतालीस मीटर की तीस तश्तरियां है। इनमें चौदह तश्तरियां लगभग एक किलोमीटर के केंद्रीय वर्ग में पास-पास खड़ी हैं, और शेष सोलह तीन भुजाओं में वाई आकार में लगभग पच्चीस किलोमीटर तक फैली हैं, जिससे सरणी को भरे छिद्र की संवेदनशीलता और चौड़े छिद्र का विभेदन दोनों मिलते हैं। तश्तरियां रस्सी के ढांचे पर तने हल्के तार-जाल से बनी हैं, और यही डिजाइन उन्हें भारत में बनाने योग्य सस्ता बनाया। B दोनों अंक कम बताता है। C दोनों आंकड़े आपस में बदल देता है, और परीक्षक ठीक यही जाल जल्दबाज विद्यार्थी के लिए रखता है। D किसी भारतीय सुविधा से मेल नहीं खाता। केंद्रीय वर्ग में चौदह और तीन भुजाओं पर सोलह तश्तरियां, यही बंटवारा परीक्षा कक्ष तक साथ ले जाने योग्य है।

Q3.विज्ञान और प्रौद्योगिकीमध्यम

भारत की सबसे बड़ी प्रकाशिक दूरबीन, 3.6 मीटर देवस्थल प्रकाशिक दूरबीन, किस संस्थान द्वारा संचालित है?

  1. A.भारतीय तारा भौतिकी संस्थान
  2. B.आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान
  3. C.भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला
  4. D.रमन शोध संस्थान
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान

व्याख्या

सही उत्तर B, आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान है, जो नैनीताल में विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग का स्वायत्त संस्थान है और पुरानी उत्तर प्रदेश राज्य वेधशाला से विकसित हुआ। यह दूरबीन बेल्जियम के सहयोग से बनी और लगभग 2,450 मीटर ऊंची देवस्थल श्रेणी पर 2016 में सक्रिय हुई, और उसी स्थल पर 1.3 मीटर फास्ट ऑप्टिकल दूरबीन तथा चार मीटर द्रव दर्पण दूरबीन हैं। A कवालूर, हनले और कोडईकनाल चलाता है, देवस्थल नहीं। C यानी अहमदाबाद की प्रयोगशाला उदयपुर सौर वेधशाला तथा माउंट आबू की अवरक्त दूरबीनें चलाती है। D बेंगलुरु में है और गौरीबिदनूर का रेडियोहेलियोग्राफ चलाता है, इसलिए हर विकल्प एक वास्तविक संस्थान है पर दूरबीनें भिन्न हैं। देवस्थल श्रेणी के विकास से पहले यही संस्थान नैनीताल के मनोरा शिखर की पुरानी दूरबीनें चलाता था।

Q4.विज्ञान और प्रौद्योगिकीआसान

भारतीय खगोलीय वेधशाला की दो मीटर हिमालयन चंद्र दूरबीन किस स्थल पर है?

  1. A.लद्दाख का हनले
  2. B.माउंट आबू का गुरुशिखर
  3. C.तमिलनाडु का कवालूर
  4. D.महाराष्ट्र का खोडद
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. लद्दाख का हनले

व्याख्या

सही उत्तर A, लद्दाख का हनले है। भारतीय खगोलीय वेधशाला वहां ठंडे रेगिस्तान में लगभग 4,500 मीटर पर है, जो विश्व के सबसे ऊंचे और शुष्कतम प्रेक्षण स्थलों में है, जहां जलवाष्प बहुत कम और कृत्रिम प्रकाश लगभग शून्य होने से आकाश असाधारण रूप से स्वच्छ तथा अंधेरा रहता है। दूरबीन को बेंगलुरु के पास होसकोटे केंद्र से उपग्रह संपर्क द्वारा दूर-नियंत्रण से चलाया जाता है, जिससे प्रेक्षकों की यात्रा बच जाती है। B पर भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला की अवरक्त दूरबीनें हैं। C पर उसी संस्थान की 2.34 मीटर वैणु बाप्पू दूरबीन है जो हनले भी चलाता है, इसी कारण दोनों में भ्रम होता है। D जीएमआरटी रेडियो सरणी का स्थल है और वहां कोई प्रकाशिक दूरबीन नहीं है। उसी स्थल पर परमाणु ऊर्जा प्रतिष्ठान की उच्च तुंगता गामा किरण दूरबीनें भी हैं, जिन्हें इतनी ही स्वच्छ हवा चाहिए।

Q5.विज्ञान और प्रौद्योगिकीमध्यम

निम्नलिखित में कौन 1899 में स्थापित वह सौर वेधशाला है जिसमें सूर्य के सौ वर्ष से अधिक के दैनिक चित्र सुरक्षित हैं?

  1. A.वैणु बाप्पू वेधशाला, कवालूर
  2. B.कोडईकनाल सौर वेधशाला
  3. C.गौरीबिदनूर रेडियो वेधशाला
  4. D.देवस्थल वेधशाला
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. कोडईकनाल सौर वेधशाला

व्याख्या

सही उत्तर B, कोडईकनाल सौर वेधशाला है, जो तमिलनाडु की पलनी पहाड़ियों में 1899 में तब बनी जब सौर कार्य पुरानी मद्रास वेधशाला से स्वच्छ हवा वाले पर्वतीय स्थल पर ले जाया गया। यह अब भारतीय तारा भौतिकी संस्थान का अंग है, और सौर बिंब, सौर कलंक तथा वर्णमंडल के दैनिक चित्रों का उसका अंकीकृत अभिलेख विश्व के सबसे लंबे सतत सौर अभिलेखों में है, जिससे वह दीर्घ सौर चक्रों के अध्ययन के लिए बहुमूल्य है। A तारों और मंदाकिनियों की रात्रिकालीन प्रकाशिक वेधशाला है। C सूर्य को देखती है पर रेडियो आवृत्तियों पर और बहुत बाद में बनी। D इक्कीसवीं सदी का प्रकाशिक स्थल है, जहां इस प्रकार का सौर कार्यक्रम नहीं है। उसके सौर कलंक चित्र तथा स्पेक्ट्रोहेलियोग्राम आज पिछली सौ वर्ष की सौर सक्रियता का पुनर्निर्माण करने में काम आते हैं।

Q6.विज्ञान और प्रौद्योगिकीकठिन

1977 में यूरेनस के वलयों की खोज में किस भारतीय वेधशाला के प्रेक्षणों का योगदान था?

  1. A.तमिलनाडु का कवालूर
  2. B.राजस्थान का उदयपुर
  3. C.लद्दाख का हनले
  4. D.उत्तराखंड का नैनीताल
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. तमिलनाडु का कवालूर

व्याख्या

सही उत्तर A, तमिलनाडु का कवालूर है। 1977 में जवादी पहाड़ियों की वेधशाला से खगोलशास्त्रियों ने यूरेनस को एक दूरस्थ तारे के सामने से गुजरते देखा, और ग्रह के पार करने से पहले तथा बाद में तारे के प्रकाश में आई गिरावट ने दिखाया कि यूरेनस के चारों ओर वलय हैं। उसी स्थल पर बाद में 2.34 मीटर दूरबीन लगी, जिसका नाम वेधशाला के संस्थापक वैणु बाप्पू पर है, और वह भारतीय तारा भौतिकी संस्थान की है। B सौर वेधशाला है और ऐसा प्रेक्षण नहीं कर सकती थी। C प्रेक्षण स्थल के रूप में बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में विकसित हुआ, अर्थात घटना के दो दशक बाद। D पर प्रकाशिक दूरबीनें हैं पर इस विशेष खोज में उसका भाग नहीं था। किसी पिंड के सामने से गुजरने पर तारे के मंद पड़ने को देखने की इस विधि को ओट या ऑकल्टेशन कहते हैं।

Q7.विज्ञान और प्रौद्योगिकीआसान

भारत की पहली समर्पित बहु-तरंगदैर्घ्य अंतरिक्ष वेधशाला एस्ट्रोसैट किस वर्ष प्रक्षेपित हुई?

  1. A.2008
  2. B.2013
  3. C.2015
  4. D.2019
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. 2015

व्याख्या

सही उत्तर C, 2015 है। एस्ट्रोसैट 28 सितंबर 2015 को श्रीहरिकोटा से पीएसएलवी-सी30 द्वारा पृथ्वी की लगभग विषुवतीय निम्न कक्षा में छोड़ा गया। उसमें पांच पेलोड हैं, जिनमें पराबैंगनी इमेजिंग दूरबीन, सॉफ्ट एक्स-रे दूरबीन, बृहत क्षेत्र एक्स-रे प्रपोर्शनल काउंटर, कैडमियम जिंक टेल्यूराइड इमेजर तथा स्कैनिंग स्काई मॉनिटर शामिल हैं, जिससे एक ही स्रोत का अध्ययन पराबैंगनी तथा मृदु और कठोर एक्स-रे में साथ हो सकता है, जो कुछ ही वेधशालाएं कर पाती हैं। A पहले चंद्र मिशन चंद्रयान-1 का वर्ष है और B मंगल ऑर्बिटर मिशन का, और विद्यार्थी इन्हें एस्ट्रोसैट से मिला देते हैं क्योंकि तीनों पहली उपलब्धियां हैं। D चंद्रयान-2 का वर्ष है। उसका स्कैनिंग स्काई मॉनिटर उन स्रोतों को भी खोजता है जो अचानक चमक उठते हैं, जैसे उद्भेदन में आए एक्स-रे युगली तारे।

Q8.विज्ञान और प्रौद्योगिकीमध्यम

भारत की पहली अंतरिक्ष आधारित सौर वेधशाला आदित्य-एल1 को कहां रखा गया?

  1. A.पृथ्वी के चारों ओर ध्रुवीय कक्षा में
  2. B.सूर्य-पृथ्वी तंत्र के लैग्रांज बिंदु एल1 के चारों ओर हेलो कक्षा में
  3. C.चंद्रमा के चारों ओर कक्षा में
  4. D.शुक्र की दूरी पर सूर्य के चारों ओर कक्षा में
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. सूर्य-पृथ्वी तंत्र के लैग्रांज बिंदु एल1 के चारों ओर हेलो कक्षा में

व्याख्या

सही उत्तर B, सूर्य-पृथ्वी तंत्र के लैग्रांज बिंदु एल1 के चारों ओर हेलो कक्षा है, जो पृथ्वी से सूर्य की दिशा में लगभग पंद्रह लाख किलोमीटर दूर है। उस बिंदु पर सूर्य और पृथ्वी के गुरुत्वीय खिंचाव कक्षीय गति के साथ मिलकर ऐसा संतुलन बनाते हैं कि यान पृथ्वी के साथ चलता रहता है, और वहां से सूर्य को किसी ग्रहण या ओट के बिना निरंतर देखा जा सकता है। यह वेधशाला 2 सितंबर 2023 को छोड़ी गई और उसमें सात पेलोड हैं, जिनमें मुख्य सौर कोरोना के लिए दृश्य उत्सर्जन रेखा कोरोनाग्राफ है। A दूर संवेदन उपग्रहों की कक्षा है। C चंद्रयान मिशनों की कक्षा है। D किसी भारतीय मिशन का वर्णन नहीं है। छह अन्य पेलोड सौर पवन, ऊर्जावान कणों तथा यान के चारों ओर के चुंबकीय क्षेत्र का मापन करते हैं।

Q9.विज्ञान और प्रौद्योगिकीआसान

जयपुर, दिल्ली, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी की जंतर मंतर वेधशालाएं किसने बनवाईं?

  1. A.सवाई जयसिंह द्वितीय
  2. B.राजा टोडरमल
  3. C.मिर्जा राजा जयसिंह प्रथम
  4. D.महाराजा रणजीत सिंह
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. सवाई जयसिंह द्वितीय

व्याख्या

सही उत्तर A, सवाई जयसिंह द्वितीय है, जो आमेर और जयपुर के शासक थे और जिन्होंने अठारहवीं सदी के आरंभ में उस समय प्रचलित खगोलीय सारणियों को सुधारने के लिए पांच चिनाई वेधशालाएं बनवाईं। उनके यंत्र, जैसे विशाल सूर्यघड़ी सम्राट यंत्र और अर्धगोलाकार जय प्रकाश यंत्र, केवल छाया और दृष्टि-रेखा से समय, क्रांति तथा ग्रहों की स्थिति मापते थे, और जयपुर का स्थल 2010 में यूनेस्को विश्व विरासत सूची में अंकित हुआ। B अकबर के राजस्व मंत्री थे और भूमि बंदोबस्त के लिए याद किए जाते हैं, खगोल के लिए नहीं। C मुगल सेवा में आमेर के पहले के शासक थे। D ने उन्नीसवीं सदी में सिख साम्राज्य पर शासन किया, अर्थात इन वेधशालाओं के बनने के बहुत बाद। दिल्ली की वेधशाला, जो कनॉट प्लेस के पास खड़ी है, पाठ्यपुस्तकों के चित्रों में सबसे अधिक दिखाई जाती है।

Q10.विज्ञान और प्रौद्योगिकीकठिन

2023 में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकृत गुरुत्वीय तरंग संसूचक लाइगो-इंडिया किस राज्य में बनाया जा रहा है?

  1. A.महाराष्ट्र
  2. B.कर्नाटक
  3. C.उत्तराखंड
  4. D.असम
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. महाराष्ट्र

व्याख्या

सही उत्तर A, महाराष्ट्र है, जहां हिंगोली जिले में स्थल चुना गया है। गुरुत्वीय तरंग संसूचक अंग्रेजी के एल आकार का व्यतिकरणमापी है, जिसकी दोनों भुजाएं चार-चार किलोमीटर लंबी हैं और उनकी लंबाई में उस सूक्ष्म परिवर्तन को देखा जाता है जो टकराते कृष्ण विवरों या न्यूट्रॉन तारों से आई तरंग पृथ्वी से गुजरते समय पैदा करती है। स्रोत की दिशा तय करने के लिए संसूचक दूर-दूर होने चाहिए, इसलिए भारतीय वेधशाला संयुक्त राज्य के दो तथा इटली के एक संसूचक के साथ काम करेगी। B, C और D स्थल के रूप में गलत हैं, भले वहां अन्य शोध सुविधाएं हों, और विद्यार्थी इस परियोजना को कर्नाटक में रख देते हैं क्योंकि खगोल विज्ञान के अनेक संस्थानों के कार्यालय बेंगलुरु में हैं। हर भुजा में निर्वात नली होगी जिसमें लेसर किरणें चलेंगी, और बहुत सा उपकरण अमेरिकी परियोजना से आ रहा है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जायंट मीटरवेव रेडियो टेलीस्कोप कहां है?

यह महाराष्ट्र के पुणे जिले में नारायणगांव के पास खोडद में है, पुणे नगर से लगभग अस्सी किलोमीटर उत्तर। स्थल का चयन वहां के कम मानव-जनित रेडियो व्यवधान और समतल भूभाग के कारण हुआ, जिससे पैंतालीस मीटर की तीस तश्तरियां पच्चीस किलोमीटर में वाई आकार में फैलाई जा सकीं। सरणी का संचालन टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान का राष्ट्रीय रेडियो खगोल भौतिकी केंद्र करता है और इसका उपयोग विश्व भर के खगोलशास्त्री करते हैं।

भारत की सबसे बड़ी प्रकाशिक दूरबीन कौन है?

उत्तराखंड के नैनीताल जिले में 3.6 मीटर देवस्थल प्रकाशिक दूरबीन, जिसका संचालन आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान करता है और जो बेल्जियम के सहयोग से बनी। यह समुद्र तल से लगभग 2,450 मीटर ऊंची पर्वत श्रेणी पर 2016 में सक्रिय हुई, जहां हवा पतली, शुष्क और स्थिर रहती है। उसी स्थल पर 1.3 मीटर फास्ट ऑप्टिकल दूरबीन और चार मीटर द्रव दर्पण दूरबीन भी हैं।

लद्दाख के हनले का उपयोग खगोल विज्ञान में क्यों होता है?

हनले लगभग 4,500 मीटर ऊंचे ठंडे रेगिस्तान में है, जहां जलवाष्प बहुत कम है, बादल लगभग नहीं रहते, धूल कम है और कृत्रिम प्रकाश नगण्य है। ये स्थितियां हवा को स्थिर और आकाश को अंधेरा रखती हैं, और प्रकाशिक, अवरक्त या गामा किरण दूरबीन को इसी की आवश्यकता होती है। वहां की भारतीय खगोलीय वेधशाला भारतीय तारा भौतिकी संस्थान चलाता है और उसे बेंगलुरु के पास से दूर-नियंत्रण द्वारा संचालित किया जाता है; आसपास का क्षेत्र डार्क स्काई रिजर्व अधिसूचित है।

एस्ट्रोसैट और आदित्य-एल1 में क्या अंतर है?

सितंबर 2015 में छोड़ा गया एस्ट्रोसैट पृथ्वी की निम्न कक्षा में सामान्य प्रयोजन की अंतरिक्ष वेधशाला है, जो तारों, मंदाकिनियों, कृष्ण विवरों और युगली तारों का अध्ययन पराबैंगनी तथा एक्स-रे में एक साथ करती है। सितंबर 2023 में छोड़ा गया आदित्य-एल1 एक ही पिंड, सूर्य, के लिए समर्पित है और पृथ्वी से लगभग पंद्रह लाख किलोमीटर दूर लैग्रांज बिंदु एल1 के चारों ओर हेलो कक्षा में है, जहां से सूर्य कभी पृथ्वी या चंद्रमा से ढकता नहीं।

स्रोत

  • एस्ट्रोसैट मिशन पृष्ठ तथा पीएसएलवी-सी30 प्रक्षेपण विवरण — भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन
  • आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान की देवस्थल तथा नैनीताल सुविधाएं — विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग
  • भारतीय तारा भौतिकी संस्थान की दूरबीनें: कवालूर, हनले और कोडईकनाल — भारतीय तारा भौतिकी संस्थान
  • जायंट मीटरवेव रेडियो टेलीस्कोप, वेधशाला विवरण — राष्ट्रीय रेडियो खगोल भौतिकी केंद्र, टीआईएफआर
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