आदित्य-एल1 और अंतरिक्ष विज्ञान मिशन: नोट्स और प्रश्न
विज्ञान और प्रौद्योगिकी नोट्स, आदित्य-एल1 तथा भारतीय अंतरिक्ष मिशन, लैग्रेंज बिंदु एल1, उसके उपकरण, चंद्रयान, मंगलयान, एस्ट्रोसैट और गगनयान।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 4 मिनट

अंतरिक्ष मिशन विज्ञान और प्रौद्योगिकी का वह भाग है जिससे बिना किसी भौतिकी के एक पंक्ति के प्रश्न बन जाते हैं, अर्थात मिशन, उसका प्रक्षेपण यान, उसकी तिथि और उसका उद्देश्य। आदित्य-एल1 इस विषय का स्वाभाविक केंद्र है, क्योंकि यह सूर्य के अध्ययन के लिए बना पहला भारतीय मिशन है और इसके पीछे का विचार, अर्थात लैग्रेंज बिंदु पर खड़ा अंतरिक्षयान, आजकल के प्रश्नपत्रों के आधे अंतरिक्ष प्रश्नों की जड़ है। इन नोट्स में आदित्य-एल1 को उससे पहले और साथ के भारतीय मिशनों के बीच रखा गया है।
आदित्य-एल1, भारत का सौर मिशन
आदित्य-एल1 को 2 सितंबर 2023 को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से पीएसएलवी-सी57 द्वारा प्रक्षेपित किया गया। यह सूर्य के अध्ययन के लिए बनी भारत की पहली अंतरिक्ष वेधशाला है। पृथ्वी के चारों ओर चरणों में कक्षा ऊँची करने के बाद इसे जनवरी 2024 में सूर्य और पृथ्वी के लैग्रेंज बिंदु एल1 के चारों ओर प्रभामंडल कक्षा में स्थापित किया गया, जो पृथ्वी से लगभग पंद्रह लाख किलोमीटर दूर है, अर्थात सूर्य तक की दूरी का लगभग सौवाँ भाग।
लैग्रेंज बिंदु वह स्थान है जहाँ सूर्य का खिंचाव, पृथ्वी का खिंचाव और यान की गति इस प्रकार संतुलित होते हैं कि यान बिना अधिक ईंधन खर्च किए पृथ्वी के साथ-साथ चलता रहता है। किन्हीं दो पिंडों के लिए ऐसे पाँच बिंदु होते हैं। एल1 सूर्य और पृथ्वी के बीच पड़ता है, इसलिए वहाँ खड़े यान को सूर्य का अटूट दृश्य मिलता है, जिसे न ग्रहण रोकता है न पृथ्वी की रात वाली ओर। यही अटूट दृश्य एल1 चुनने का पूरा कारण है।
इस मिशन में सात उपकरण हैं। इनमें चार सूर्य को दूर से देखते हैं और तीन उन कणों तथा क्षेत्रों को नापते हैं जो यान तक पहुँचते हैं। मुख्य उपकरण विजिबल एमिशन लाइन कोरोनाग्राफ है, जिसे वीईएलसी कहते हैं, जो सूर्य की चमकीली बिंब को ढक देता है ताकि उसका मंद बाहरी वायुमंडल यानी कोरोना देखा जा सके। इसके साथ पराबैंगनी दूरबीन, मृदु तथा कठोर एक्स-किरण स्पेक्ट्रोमीटर, कण प्रयोग, प्लाज्मा विश्लेषक और चुंबकत्वमापी हैं। ये सब मिलकर कोरोना, सौर ज्वालाओं और कोरोनीय द्रव्य उत्सर्जन का अध्ययन करते हैं, जो अंतरिक्ष मौसम बनाते हैं और पृथ्वी पर उपग्रहों तथा बिजली के जाल को बिगाड़ सकते हैं।
इससे पहले के भारतीय मिशन
| मिशन | प्रक्षेपण | क्यों पूछा जाता है |
|---|---|---|
| आर्यभट | 19 अप्रैल 1975 | पहला भारतीय उपग्रह, सोवियत संघ से प्रक्षेपित |
| रोहिणी आरएस-1 | 18 जुलाई 1980 | भारतीय प्रक्षेपण यान एसएलवी-3 से कक्षा में पहुँचा पहला उपग्रह |
| चंद्रयान-1 | 22 अक्टूबर 2008 | पहला भारतीय चंद्र मिशन, जिसने चंद्रमा पर जल अणुओं की पुष्टि की |
| मंगलयान या मार्स ऑर्बिटर मिशन | 5 नवंबर 2013 | भारत पहले ही प्रयास में 24 सितंबर 2014 को मंगल कक्षा में पहुँचा |
| एस्ट्रोसैट | 28 सितंबर 2015 | भारत की पहली समर्पित बहु-तरंगदैर्घ्य अंतरिक्ष वेधशाला |
| चंद्रयान-2 | 22 जुलाई 2019 | ऑर्बिटर अब भी काम कर रहा है, विक्रम लैंडर सतह के पास खो गया |
| चंद्रयान-3 | 14 जुलाई 2023 | विक्रम 23 अगस्त 2023 को प्रज्ञान रोवर के साथ चंद्र दक्षिण ध्रुव के निकट उतरा |
चंद्रयान-3 सबसे अधिक पूछा जाता है। इसे एलवीएम3-एम4 यान से भेजा गया, इसके अवतरण स्थल को शिव शक्ति बिंदु नाम दिया गया, और 23 अगस्त अब राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसके लैंडर पर चेस्ट उपकरण था, जिसने नापा कि चंद्र मिट्टी में गहराई के साथ तापमान कैसे बदलता है, साथ ही चंद्र कंपन दर्ज करने और सतह के पास के प्लाज्मा को देखने वाले उपकरण थे, जबकि रोवर पर मिट्टी की बनावट जानने वाले दो उपकरण थे।
याद रखने योग्य शब्द और पड़ाव
- इसरो की स्थापना 15 अगस्त 1969 को हुई और विक्रम साराभाई को भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक कहा जाता है। मुख्यालय बेंगलुरु में है।
- भारत का पहला रॉकेट 21 नवंबर 1963 को तिरुवनंतपुरम के पास थुंबा से छोड़ा गया था।
- गगनयान भारत का मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम है, जिसकी चालक दल बचाव प्रणाली की पहली मानवरहित परीक्षण उड़ान टीवी-डी1 अक्टूबर 2023 में हुई।
- राकेश शर्मा 1984 में सोवियत सोयुज यान से अंतरिक्ष जाने वाले पहले भारतीय बने।
- भूस्थिर उपग्रह भूमध्य रेखा से लगभग 36,000 किलोमीटर ऊपर रहता है और आकाश में स्थिर दिखता है, इसीलिए संचार उपग्रह उसी कक्षा में रखे जाते हैं, जबकि दूर संवेदन उपग्रह नीची ध्रुवीय कक्षा में रहते हैं।
- नाविक भारत की क्षेत्रीय दिशासूचक प्रणाली है, इनसैट तथा जीसैट शृंखला संचार का काम करती है और आईआरएस तथा कार्टोसैट शृंखला दूर संवेदन का।
संसार के सौर मिशन
एल1 पर आदित्य अकेला नहीं है। नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी की सोहो वेधशाला वहाँ से नब्बे के दशक से सूर्य को देख रही है। 2018 में छोड़ा गया पार्कर सोलर प्रोब कहीं अधिक निकट जाकर कोरोना के बाहरी भाग से होकर गुजरता है, और 2020 में छोड़ा गया सोलर ऑर्बिटर सूर्य के ध्रुवों का अध्ययन करता है। 2021 में छोड़ा गया जेम्स वेब अंतरिक्ष दूरबीन एल2 पर है, जो सूर्य से पृथ्वी की दूसरी ओर पड़ता है, जहाँ उसके दर्पण ठंडे और छाया में रह सकते हैं। कौन सा उपकरण किस लैंग्रेंज बिंदु पर है, यह एक पंक्ति का प्रिय प्रश्न है।
परीक्षा की दृष्टि से
इस विषय से प्रश्न जोड़ों और तिथियों के रूप में आते हैं। पहला, मिशन और प्रक्षेपण यान का मेल, जैसे आदित्य-एल1 के साथ पीएसएलवी-सी57, चंद्रयान-3 के साथ एलवीएम3-एम4, चंद्रयान-1 के साथ पीएसएलवी-सी11 और मंगलयान के साथ पीएसएलवी-सी25। दूसरा, मिशन और तिथि, जैसे चंद्रयान-3 के अवतरण की 23 अगस्त 2023, आदित्य-एल1 के प्रक्षेपण की 2 सितंबर 2023, मंगल पहुँचने की 24 सितंबर 2014, आर्यभट का 1975 और राकेश शर्मा का 1984। तीसरा, उपकरण और उसका काम, जैसे कोरोना के लिए वीईएलसी, चंद्र मिट्टी के तापमान के लिए चेस्ट और मिट्टी की बनावट के लिए रोवर के उपकरण। चौथा, लैग्रेंज बिंदुओं पर सैद्धांतिक प्रश्न, कि एल1 क्यों चुना गया और एल2 पर क्या है। भ्रम प्रक्षेपण वर्ष और पहुँचने के वर्ष में तथा 2023 के दोनों मिशनों के यानों में होता है।
महत्वपूर्ण तथ्य
| आदित्य-एल1 प्रक्षेपण | 2 सितंबर 2023, श्रीहरिकोटा से पीएसएलवी-सी57 द्वारा |
|---|---|
| आदित्य-एल1 की कक्षा | लैग्रेंज बिंदु एल1 के चारों ओर प्रभामंडल कक्षा, पृथ्वी से लगभग पंद्रह लाख किलोमीटर |
| मुख्य उपकरण | विजिबल एमिशन लाइन कोरोनाग्राफ, वीईएलसी, कोरोना के अध्ययन के लिए |
| उपकरणों की संख्या | सात, चार दूर संवेदन और तीन स्थानिक |
| चंद्रयान-3 का अवतरण | 23 अगस्त 2023, चंद्र दक्षिण ध्रुव के निकट, स्थल का नाम शिव शक्ति बिंदु |
| राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस | 23 अगस्त, चंद्रयान-3 के अवतरण की स्मृति में |
| मार्स ऑर्बिटर मिशन | 5 नवंबर 2013 को प्रक्षेपण, 24 सितंबर 2014 को मंगल की कक्षा में |
| एस्ट्रोसैट | 28 सितंबर 2015, भारत की पहली बहु-तरंगदैर्घ्य अंतरिक्ष वेधशाला |
| पहला भारतीय उपग्रह | आर्यभट, 19 अप्रैल 1975, सोवियत संघ से प्रक्षेपित |
| अंतरिक्ष जाने वाला पहला भारतीय | राकेश शर्मा, 1984, सोयुज टी-11 से |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
कैप्टन राकेश शर्मा सोवियत अंतरिक्ष कार्यक्रम के अंतर्गत किस वर्ष अंतरिक्ष गए थे?
- A.1981
- B.1982
- C.1983
- D.1984
उत्तर देखें
सही उत्तर: D. 1984
व्याख्या
सही उत्तर D, 1984 है। विंग कमांडर राकेश शर्मा अप्रैल 1984 में सोवियत संघ और भारत के संयुक्त कार्यक्रम के अंतर्गत सोवियत यान सोयुज टी-11 से अंतरिक्ष गए और साल्युत 7 अंतरिक्ष स्टेशन पर लगभग आठ दिन रहे। इस प्रकार वे अंतरिक्ष जाने वाले पहले भारतीय बने। प्रधानमंत्री के यह पूछने पर कि ऊपर से भारत कैसा दिखता है, उनका दिया उत्तर आज भी याद किया जाता है, और उन्हें अशोक चक्र से सम्मानित किया गया।
विकल्प A, B और C क्रमशः 1981, 1982 और 1983 बताते हैं, जो पास-पास के वर्ष हैं और यह परखने के लिए रखे गए हैं कि तिथि पक्की याद है या नहीं। इस वर्ष को उसी दशक के दो और तथ्यों से जोड़ लें, भारत ने अपना उपग्रह आर्यभट 1975 में भेजा और 1980 में भारतीय रॉकेट से रोहिणी को कक्षा में पहुँचाया, तथा उसके चार वर्ष बाद राकेश शर्मा गए। कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स बहुत बाद में अमेरिकी कार्यक्रम से गईं।
निम्न में से किसे भारत का पहला मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम कहा गया है?
- A.मंगलयान 2
- B.गगनयान
- C.चंद्रयान 2
- D.आदित्य एल-1
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. गगनयान
व्याख्या
सही उत्तर B, गगनयान है। गगनयान वह कार्यक्रम है जिसके अंतर्गत भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन अपने ही चालक दल मॉड्यूल से भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी की नीची कक्षा में भेजने और सुरक्षित लौटाने की तैयारी कर रहा है। इस कार्यक्रम में मानवरहित परीक्षण उड़ानें, चालक दल बचाव प्रणाली और मानव के लिए प्रमाणित प्रक्षेपण यान शामिल हैं। चालक दल बचाव प्रणाली की पहली परीक्षण उड़ान टीवी-डी1 अक्टूबर 2023 में हुई।
विकल्प A, मंगलयान मार्स ऑर्बिटर मिशन है, जो मानवरहित यान था और 2014 में मंगल की कक्षा में पहुँचा। विकल्प C, चंद्रयान-2 वर्ष 2019 का मानवरहित चंद्र मिशन था, जिसमें ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर थे। विकल्प D, आदित्य-एल1 वर्ष 2023 में लैग्रेंज बिंदु एल1 की प्रभामंडल कक्षा में भेजी गई सौर वेधशाला है। इनमें से किसी पर चालक दल नहीं जाता, इसलिए केवल गगनयान ही उत्तर है।
भारत का पहला पीको उपग्रह कौन सा है?
- A.इनसैट
- B.स्टडसैट
- C.जीसैट-4
- D.अनुसैट
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. स्टडसैट
व्याख्या
सही उत्तर B, स्टडसैट है। स्टडसैट अर्थात स्टूडेंट सैटेलाइट भारत में बना पहला पीको उपग्रह था। पीको उपग्रह वह होता है जिसका भार लगभग एक किलोग्राम से कम हो, और स्टडसैट का भार उससे भी कम था। इसे बेंगलुरु तथा हैदराबाद के अभियांत्रिकी महाविद्यालयों के विद्यार्थियों ने बनाया था और 2010 में पीएसएलवी की एक उड़ान में सहायक भार के रूप में भेजा गया, जिसमें पृथ्वी का चित्र लेने के लिए छोटा कैमरा था।
विकल्प A, इनसैट कोई एक उपग्रह नहीं बल्कि भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह प्रणाली है, जो भूस्थिर कक्षा के भारी संचार उपग्रहों का परिवार है। विकल्प C, जीसैट-4 प्रायोगिक संचार उपग्रह था, जो 2010 में प्रक्षेपण यान की विफलता में खो गया। विकल्प D, अनुसैट अन्ना विश्वविद्यालय ने बनाया था और 2009 में भेजा गया, पर वह लगभग चालीस किलोग्राम का माइक्रो उपग्रह था, पीको नहीं, और यही अंतर प्रश्न परख रहा है।
चंद्रा सरफेस थर्मोफिजिकल एक्सपेरिमेंट (चेस्ट) उपकरण का मुख्य उद्देश्य क्या है?
- A.चंद्रमा की भूवैज्ञानिक संरचना का आकलन करना
- B.चंद्र मिट्टी में गहराई के अनुसार तापमान नापना
- C.चंद्रमा का वायुमंडलीय दाब नापना
- D.चंद्रमा के चुंबकीय क्षेत्र का अध्ययन करना
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. चंद्र मिट्टी में गहराई के अनुसार तापमान नापना
व्याख्या
सही उत्तर B, चंद्र मिट्टी में गहराई के अनुसार तापमान नापना है। चेस्ट चंद्रयान-3 के विक्रम लैंडर पर गया था। इसमें एक छड़ पर तापमान संवेदक लगे थे, जिसे दक्षिण ध्रुवीय क्षेत्र के पास चंद्र मिट्टी में लगभग दस सेंटीमीटर गहराई तक धँसाया गया। इसके पाठों से वैज्ञानिक यह देख सकते हैं कि चंद्रमा की ऊपरी परत में ऊष्मा कैसे चलती है, जिससे उस स्थान की मिट्टी के तापीय गुणों का पता चलता है, जहाँ पहले कभी माप नहीं हुई थी।
विकल्प A, भूवैज्ञानिक संरचना का काम प्रज्ञान रोवर पर लगे दो उपकरणों का था, जिन्होंने अल्फा कणों और लेजर से मिट्टी के तत्व पहचाने। विकल्प C इसलिए गलत है कि चंद्रमा पर गैस का अत्यंत विरल आवरण ही है, सामान्य अर्थ में मापने योग्य दाब वाला वायुमंडल नहीं। विकल्प D, चुंबकीय क्षेत्र चेस्ट का उद्देश्य नहीं था, लैंडर पर चंद्र कंपन और सतह के प्लाज्मा के उपकरण अलग थे।
वर्ष 2021 में डीआरडीओ ने हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की निगरानी क्षमता बढ़ाने के लिए पीएसएलवी-सी51 से कौन सा उपग्रह भेजा था?
- A.सतीश धवन उपग्रह
- B.सिंधु नेत्र उपग्रह
- C.सिंधु दुर्ग उपग्रह
- D.श्री शक्ति उपग्रह
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. सिंधु नेत्र उपग्रह
व्याख्या
सही उत्तर B, सिंधु नेत्र उपग्रह है। सिंधु नेत्र को रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन ने बनाया था और इसे फरवरी 2021 में पीएसएलवी-सी51 उड़ान से कक्षा में पहुँचाया गया, जिसका मुख्य भार ब्राजील का अमेजोनिया-1 उपग्रह था। यह उपग्रह हिंद महासागर क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही देखने तथा उन जलक्षेत्रों से गुजरने वाले युद्धपोतों और व्यापारिक जहाजों की पहचान में सहायता के लिए बनाया गया है, जिससे सशस्त्र बलों को समुद्री जानकारी मिलती है।
विकल्प A, सतीश धवन उपग्रह भी इसी पीएसएलवी-सी51 उड़ान में गया था, पर वह एक निजी भारतीय दल का बनाया छोटा उपग्रह था, निगरानी उपग्रह नहीं। विकल्प C और D, सिंधु दुर्ग तथा श्री शक्ति गढ़े हुए नाम हैं जो सही उत्तर के पास रखे गए हैं। याद रखें कि पीएसएलवी-सी51 का मुख्य भार अमेजोनिया-1 था और सिंधु नेत्र सहयात्री उपग्रहों में था।
भारत की पहली सौर वेधशाला आदित्य-एल1 किस यान से प्रक्षेपित की गई थी?
- A.जीएसएलवी एमके 2
- B.पीएसएलवी-सी57
- C.एलवीएम3-एम4
- D.एसएसएलवी-डी2
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. पीएसएलवी-सी57
व्याख्या
सही उत्तर B, पीएसएलवी-सी57 है। आदित्य-एल1 को 2 सितंबर 2023 को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से पीएसएलवी-सी57 उड़ान द्वारा भेजा गया, जिसमें ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान का सबसे शक्तिशाली रूप प्रयोग हुआ। यान को पहले पृथ्वी की कक्षा में रखा गया, फिर चरणों में कक्षा ऊँची की गई और उसके बाद वह लैग्रेंज बिंदु एल1 की ओर चला, जहाँ जनवरी 2024 में उसे प्रभामंडल कक्षा में स्थापित किया गया।
विकल्प A, जीएसएलवी एमके 2 मुख्यतः भूस्थिर स्थानांतरण कक्षा में जाने वाले संचार उपग्रहों के लिए प्रयोग होता है। विकल्प C, एलवीएम3-एम4 वही यान है जिसने जुलाई 2023 में चंद्रयान-3 भेजा था, और अभ्यर्थी उसी वर्ष के दोनों मिशनों में भ्रमित हो जाते हैं। विकल्प D, एसएसएलवी हल्के भार के लिए बना छोटा प्रक्षेपण यान है। याद रखें, चंद्रयान-3 के लिए एलवीएम3 और आदित्य-एल1 के लिए पीएसएलवी।
आदित्य-एल1 को किस बिंदु के चारों ओर प्रभामंडल कक्षा में रखा गया है और वह पृथ्वी से लगभग कितनी दूर है?
- A.एल2, लगभग 15 लाख किलोमीटर
- B.एल1, लगभग 15 लाख किलोमीटर
- C.एल1, लगभग 3.8 लाख किलोमीटर
- D.एल5, लगभग 15 करोड़ किलोमीटर
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. एल1, लगभग 15 लाख किलोमीटर
व्याख्या
सही उत्तर B, एल1, लगभग 15 लाख किलोमीटर है। सूर्य और पृथ्वी का लैग्रेंज बिंदु एल1 दोनों के बीच पड़ता है और पृथ्वी से लगभग पंद्रह लाख किलोमीटर दूर है। उस बिंदु पर सूर्य तथा पृथ्वी का गुरुत्वीय खिंचाव और यान की गति इस प्रकार मिलते हैं कि यान पृथ्वी के साथ-साथ चलता रहता है। वहाँ खड़ा यान सूर्य को बिना किसी रुकावट के देख सकता है, न ग्रहण बाधा बनता है न पृथ्वी की रात वाली ओर, और इसीलिए आदित्य-एल1 को वहीं भेजा गया।
विकल्प A, एल2 बताता है, जो सूर्य से पृथ्वी की दूसरी ओर लगभग उतनी ही दूरी पर है और वहाँ जेम्स वेब अंतरिक्ष दूरबीन है। विकल्प C में पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी लगभग 3.84 लाख किलोमीटर दी गई है, जो बहुत कम है। विकल्प D में पृथ्वी से सूर्य की दूरी और एक अलग लैग्रेंज बिंदु दिया गया है। याद रखें कि एल1 सूर्य तक की दूरी का लगभग सौवाँ भाग है।
आदित्य-एल1 का मुख्य उपकरण कौन सा है, जो सूर्य की चमकीली बिंब ढककर कोरोना का अध्ययन करता है?
- A.सूट
- B.वीईएलसी
- C.हेलिओस
- D.एस्पेक्स
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. वीईएलसी
व्याख्या
सही उत्तर B, वीईएलसी है। विजिबल एमिशन लाइन कोरोनाग्राफ आदित्य-एल1 पर लगा सबसे बड़ा और प्रमुख उपकरण है। कोरोनाग्राफ उपकरण के भीतर ही सूर्य की चमकीली बिंब को ढककर एक बनावटी ग्रहण बना देता है, जिससे उसका मंद बाहरी वायुमंडल यानी कोरोना दिखाई देने लगता है। वीईएलसी सूर्य की सतह के निकट कोरोना को देख सकता है और यह अध्ययन कर सकता है कि कोरोनीय द्रव्य उत्सर्जन कैसे आरंभ होते हैं, जो अंतरिक्ष मौसम समझने की कुंजी है।
विकल्प A, सूट अर्थात सोलर अल्ट्रावायलेट इमेजिंग टेलीस्कोप सूर्य को पराबैंगनी प्रकाश में चित्रित करता है। विकल्प C, हेलिओस उच्च ऊर्जा एक्स-किरण स्पेक्ट्रोमीटर है, जो सौर ज्वालाओं की कठोर एक्स-किरणें दर्ज करता है। विकल्प D, एस्पेक्स वह कण प्रयोग है जो यान तक पहुँचने वाली सौर पवन का नमूना लेता है। चारों इसी मिशन के असली उपकरण हैं, इसलिए प्रश्न यह परखता है कि मुख्य कौन सा है।
चंद्रयान-3 का विक्रम लैंडर चंद्र दक्षिण ध्रुव के निकट किस तिथि को उतरा था?
- A.14 जुलाई 2023
- B.23 अगस्त 2023
- C.2 सितंबर 2023
- D.6 जनवरी 2024
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. 23 अगस्त 2023
व्याख्या
सही उत्तर B, 23 अगस्त 2023 है। चंद्रयान-3 का विक्रम लैंडर 23 अगस्त 2023 को चंद्रमा के दक्षिण ध्रुवीय क्षेत्र के पास उतरा, जिससे भारत चंद्रमा पर सफलतापूर्वक उतरने वाला चौथा देश बना और चंद्र दक्षिण ध्रुव के निकट उतरने वाला पहला देश। इसके बाद प्रज्ञान रोवर बाहर निकला और एक चंद्र दिवस तक काम करता रहा। अवतरण स्थल को शिव शक्ति बिंदु नाम दिया गया और 23 अगस्त अब भारत में राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस के रूप में मनाया जाता है।
विकल्प A, 14 जुलाई 2023 चंद्रयान-3 के एलवीएम3-एम4 यान से प्रक्षेपण की तिथि है। विकल्प C, 2 सितंबर 2023 आदित्य-एल1 के प्रक्षेपण की तिथि है, जो कुछ ही दिन बाद गया। विकल्प D, 6 जनवरी 2024 वह तिथि है जब आदित्य-एल1 को लैग्रेंज बिंदु एल1 की प्रभामंडल कक्षा में स्थापित किया गया। तीनों उसी काल की असली तिथियाँ हैं, इसीलिए प्रश्न भ्रमित करता है।
भारत का मार्स ऑर्बिटर मिशन, जिसे मंगलयान कहा जाता है, किस वर्ष मंगल की कक्षा में पहुँचा था?
- A.2008
- B.2013
- C.2014
- D.2019
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. 2014
व्याख्या
सही उत्तर C, 2014 है। मार्स ऑर्बिटर मिशन 5 नवंबर 2013 को पीएसएलवी से प्रक्षेपित हुआ और 24 सितंबर 2014 को मंगल की कक्षा में पहुँचा। इसके साथ भारत संसार का पहला ऐसा देश बना जो पहले ही प्रयास में मंगल तक पहुँचा, और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन सोवियत संघ, संयुक्त राज्य अमेरिका तथा यूरोप की एजेंसियों के बाद वहाँ पहुँचने वाली चौथी एजेंसी बना। इस मिशन में पाँच उपकरण थे, जिनमें मीथेन संवेदक और रंगीन कैमरा शामिल थे, और यह बहुत कम लागत में बना था।
विकल्प A, 2008 चंद्रयान-1 का वर्ष है, जो पहला भारतीय चंद्र मिशन था। विकल्प B, 2013 मंगल मिशन के प्रक्षेपण का वर्ष है, पहुँचने का नहीं, और लगभग दस महीने का यही अंतर प्रश्न परख रहा है। विकल्प D, 2019 चंद्रयान-2 का वर्ष है। प्रक्षेपण वर्ष और पहुँचने के वर्ष को अलग रखने की आदत यहाँ बनानी चाहिए।
1975 में सोवियत संघ से प्रक्षेपित भारत का पहला उपग्रह कौन सा था?
- A.भास्कर
- B.आर्यभट
- C.रोहिणी
- D.एप्पल
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. आर्यभट
व्याख्या
सही उत्तर B, आर्यभट है। आर्यभट भारत का बनाया पहला उपग्रह था और इसे 19 अप्रैल 1975 को सोवियत प्रक्षेपण स्थल से भेजा गया, क्योंकि उस समय भारत के पास अपना प्रक्षेपण यान नहीं था। इसका नाम प्राचीन भारतीय खगोलशास्त्री और गणितज्ञ के नाम पर रखा गया, और इसमें एक्स-किरण खगोल विज्ञान, सौर भौतिकी तथा आयनमंडल के अध्ययन के प्रयोग थे। यही भारतीय उपग्रह कार्यक्रम का आरंभ है।
विकल्प A, भास्कर बाद में 1979 में भेजा गया प्रायोगिक पृथ्वी अवलोकन उपग्रह था। विकल्प C, रोहिणी उस शृंखला का नाम है जिसका आरएस-1 भारतीय प्रक्षेपण यान एसएलवी-3 से 18 जुलाई 1980 को कक्षा में पहुँचने वाला पहला उपग्रह बना। विकल्प D, एप्पल 1981 का एरियन पैसेंजर पेलोड एक्सपेरिमेंट था, जो भूस्थिर कक्षा में भारत का पहला प्रायोगिक संचार उपग्रह था। क्रम आर्यभट, भास्कर, रोहिणी, एप्पल याद रखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
आदित्य-एल1 को लैग्रेंज बिंदु एल1 पर क्यों भेजा गया?
एल1 सूर्य और पृथ्वी के बीच पृथ्वी से लगभग पंद्रह लाख किलोमीटर दूर है, जहाँ दोनों पिंडों का गुरुत्वीय खिंचाव और यान की गति इस प्रकार संतुलित होते हैं कि वहाँ बने रहने में बहुत कम ईंधन लगता है। वहाँ खड़ा यान सूर्य को लगातार देख सकता है, न ग्रहण बाधा बनता है न पृथ्वी की रात वाली ओर, और सौर वेधशाला को यही चाहिए।
आदित्य-एल1 पर कितने उपकरण हैं और मुख्य कौन सा है?
इस पर सात उपकरण हैं। इनमें चार सूर्य को दूर से देखते हैं और तीन यान तक पहुँचने वाले कणों तथा क्षेत्रों को नापते हैं। प्रमुख उपकरण विजिबल एमिशन लाइन कोरोनाग्राफ यानी वीईएलसी है, जो सूर्य की चमकीली बिंब ढक देता है ताकि सतह के निकट कोरोना का अध्ययन हो सके।
चंद्रयान-3 ने क्या उपलब्धि पाई?
चंद्रयान-3 को 14 जुलाई 2023 को एलवीएम3-एम4 यान से भेजा गया और उसका विक्रम लैंडर 23 अगस्त 2023 को चंद्रमा के दक्षिण ध्रुवीय क्षेत्र के पास उतरा। इससे भारत चंद्रमा पर सफलतापूर्वक उतरने वाला चौथा देश बना और दक्षिण ध्रुव के निकट उतरने वाला पहला। इसके बाद प्रज्ञान रोवर ने मिट्टी का अध्ययन किया, अवतरण स्थल को शिव शक्ति बिंदु नाम मिला और 23 अगस्त अब राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस है।
एल1 और एल2 में क्या अंतर है?
एल1 सूर्य और पृथ्वी के बीच पड़ता है और उस मिशन के लिए उपयुक्त है जिसे सूर्य सामने रखना हो, जैसे आदित्य-एल1 या सोहो वेधशाला। एल2 सूर्य से पृथ्वी की दूसरी ओर लगभग उतनी ही दूरी पर है, जहाँ उपकरण छाया में और ठंडा रह सकता है, इसलिए वह जेम्स वेब जैसी दूरबीन के लिए उपयुक्त है।
भारत के कौन से मिशन चंद्रमा और मंगल पर गए?
2008 का चंद्रयान-1, 2019 का चंद्रयान-2 और 2023 का चंद्रयान-3 चंद्रमा पर गए, तथा 2013 में भेजा गया मार्स ऑर्बिटर मिशन या मंगलयान 2014 में मंगल की कक्षा में पहुँचा। चंद्रयान-1 ने चंद्रमा पर जल अणुओं की पुष्टि की और मंगल मिशन ने भारत को पहले ही प्रयास में सफल होने वाला पहला देश बनाया।
स्रोत
- आदित्य-एल1 मिशन पृष्ठ तथा चंद्रयान-3 मिशन पृष्ठ — भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन
- भौतिकी पाठ्यपुस्तक कक्षा 11, गुरुत्वाकर्षण और उपग्रह से संबंधित अध्याय — एनसीईआरटी
- वार्षिक प्रतिवेदन: अंतरिक्ष विज्ञान और ग्रहीय अन्वेषण — अंतरिक्ष विभाग, भारत सरकार




