आदित्य-एल1 को किस बिंदु के चारों ओर प्रभामंडल कक्षा में रखा गया है और वह पृथ्वी से लगभग कितनी दूर है?
- A.एल2, लगभग 15 लाख किलोमीटर
- B.एल1, लगभग 15 लाख किलोमीटर
- C.एल1, लगभग 3.8 लाख किलोमीटर
- D.एल5, लगभग 15 करोड़ किलोमीटर
सही उत्तर
B. एल1, लगभग 15 लाख किलोमीटर
व्याख्या
सही उत्तर B, एल1, लगभग 15 लाख किलोमीटर है। सूर्य और पृथ्वी का लैग्रेंज बिंदु एल1 दोनों के बीच पड़ता है और पृथ्वी से लगभग पंद्रह लाख किलोमीटर दूर है। उस बिंदु पर सूर्य तथा पृथ्वी का गुरुत्वीय खिंचाव और यान की गति इस प्रकार मिलते हैं कि यान पृथ्वी के साथ-साथ चलता रहता है। वहाँ खड़ा यान सूर्य को बिना किसी रुकावट के देख सकता है, न ग्रहण बाधा बनता है न पृथ्वी की रात वाली ओर, और इसीलिए आदित्य-एल1 को वहीं भेजा गया।
विकल्प A, एल2 बताता है, जो सूर्य से पृथ्वी की दूसरी ओर लगभग उतनी ही दूरी पर है और वहाँ जेम्स वेब अंतरिक्ष दूरबीन है। विकल्प C में पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी लगभग 3.84 लाख किलोमीटर दी गई है, जो बहुत कम है। विकल्प D में पृथ्वी से सूर्य की दूरी और एक अलग लैग्रेंज बिंदु दिया गया है। याद रखें कि एल1 सूर्य तक की दूरी का लगभग सौवाँ भाग है।
पूरा लेख पढ़ें: आदित्य-एल1 और अंतरिक्ष विज्ञान मिशन: नोट्स और प्रश्न
अभ्यास प्रश्न
सभी देखेंकैप्टन राकेश शर्मा सोवियत अंतरिक्ष कार्यक्रम के अंतर्गत किस वर्ष अंतरिक्ष गए थे?
- A.1981
- B.1982
- C.1983
- D.1984
उत्तर देखें
सही उत्तर: D. 1984
व्याख्या
सही उत्तर D, 1984 है। विंग कमांडर राकेश शर्मा अप्रैल 1984 में सोवियत संघ और भारत के संयुक्त कार्यक्रम के अंतर्गत सोवियत यान सोयुज टी-11 से अंतरिक्ष गए और साल्युत 7 अंतरिक्ष स्टेशन पर लगभग आठ दिन रहे। इस प्रकार वे अंतरिक्ष जाने वाले पहले भारतीय बने। प्रधानमंत्री के यह पूछने पर कि ऊपर से भारत कैसा दिखता है, उनका दिया उत्तर आज भी याद किया जाता है, और उन्हें अशोक चक्र से सम्मानित किया गया।
विकल्प A, B और C क्रमशः 1981, 1982 और 1983 बताते हैं, जो पास-पास के वर्ष हैं और यह परखने के लिए रखे गए हैं कि तिथि पक्की याद है या नहीं। इस वर्ष को उसी दशक के दो और तथ्यों से जोड़ लें, भारत ने अपना उपग्रह आर्यभट 1975 में भेजा और 1980 में भारतीय रॉकेट से रोहिणी को कक्षा में पहुँचाया, तथा उसके चार वर्ष बाद राकेश शर्मा गए। कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स बहुत बाद में अमेरिकी कार्यक्रम से गईं।
निम्न में से किसे भारत का पहला मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम कहा गया है?
- A.मंगलयान 2
- B.गगनयान
- C.चंद्रयान 2
- D.आदित्य एल-1
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. गगनयान
व्याख्या
सही उत्तर B, गगनयान है। गगनयान वह कार्यक्रम है जिसके अंतर्गत भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन अपने ही चालक दल मॉड्यूल से भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी की नीची कक्षा में भेजने और सुरक्षित लौटाने की तैयारी कर रहा है। इस कार्यक्रम में मानवरहित परीक्षण उड़ानें, चालक दल बचाव प्रणाली और मानव के लिए प्रमाणित प्रक्षेपण यान शामिल हैं। चालक दल बचाव प्रणाली की पहली परीक्षण उड़ान टीवी-डी1 अक्टूबर 2023 में हुई।
विकल्प A, मंगलयान मार्स ऑर्बिटर मिशन है, जो मानवरहित यान था और 2014 में मंगल की कक्षा में पहुँचा। विकल्प C, चंद्रयान-2 वर्ष 2019 का मानवरहित चंद्र मिशन था, जिसमें ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर थे। विकल्प D, आदित्य-एल1 वर्ष 2023 में लैग्रेंज बिंदु एल1 की प्रभामंडल कक्षा में भेजी गई सौर वेधशाला है। इनमें से किसी पर चालक दल नहीं जाता, इसलिए केवल गगनयान ही उत्तर है।
भारत का पहला पीको उपग्रह कौन सा है?
- A.इनसैट
- B.स्टडसैट
- C.जीसैट-4
- D.अनुसैट
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सही उत्तर: B. स्टडसैट
व्याख्या
सही उत्तर B, स्टडसैट है। स्टडसैट अर्थात स्टूडेंट सैटेलाइट भारत में बना पहला पीको उपग्रह था। पीको उपग्रह वह होता है जिसका भार लगभग एक किलोग्राम से कम हो, और स्टडसैट का भार उससे भी कम था। इसे बेंगलुरु तथा हैदराबाद के अभियांत्रिकी महाविद्यालयों के विद्यार्थियों ने बनाया था और 2010 में पीएसएलवी की एक उड़ान में सहायक भार के रूप में भेजा गया, जिसमें पृथ्वी का चित्र लेने के लिए छोटा कैमरा था।
विकल्प A, इनसैट कोई एक उपग्रह नहीं बल्कि भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह प्रणाली है, जो भूस्थिर कक्षा के भारी संचार उपग्रहों का परिवार है। विकल्प C, जीसैट-4 प्रायोगिक संचार उपग्रह था, जो 2010 में प्रक्षेपण यान की विफलता में खो गया। विकल्प D, अनुसैट अन्ना विश्वविद्यालय ने बनाया था और 2009 में भेजा गया, पर वह लगभग चालीस किलोग्राम का माइक्रो उपग्रह था, पीको नहीं, और यही अंतर प्रश्न परख रहा है।
चंद्रा सरफेस थर्मोफिजिकल एक्सपेरिमेंट (चेस्ट) उपकरण का मुख्य उद्देश्य क्या है?
- A.चंद्रमा की भूवैज्ञानिक संरचना का आकलन करना
- B.चंद्र मिट्टी में गहराई के अनुसार तापमान नापना
- C.चंद्रमा का वायुमंडलीय दाब नापना
- D.चंद्रमा के चुंबकीय क्षेत्र का अध्ययन करना
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सही उत्तर: B. चंद्र मिट्टी में गहराई के अनुसार तापमान नापना
व्याख्या
सही उत्तर B, चंद्र मिट्टी में गहराई के अनुसार तापमान नापना है। चेस्ट चंद्रयान-3 के विक्रम लैंडर पर गया था। इसमें एक छड़ पर तापमान संवेदक लगे थे, जिसे दक्षिण ध्रुवीय क्षेत्र के पास चंद्र मिट्टी में लगभग दस सेंटीमीटर गहराई तक धँसाया गया। इसके पाठों से वैज्ञानिक यह देख सकते हैं कि चंद्रमा की ऊपरी परत में ऊष्मा कैसे चलती है, जिससे उस स्थान की मिट्टी के तापीय गुणों का पता चलता है, जहाँ पहले कभी माप नहीं हुई थी।
विकल्प A, भूवैज्ञानिक संरचना का काम प्रज्ञान रोवर पर लगे दो उपकरणों का था, जिन्होंने अल्फा कणों और लेजर से मिट्टी के तत्व पहचाने। विकल्प C इसलिए गलत है कि चंद्रमा पर गैस का अत्यंत विरल आवरण ही है, सामान्य अर्थ में मापने योग्य दाब वाला वायुमंडल नहीं। विकल्प D, चुंबकीय क्षेत्र चेस्ट का उद्देश्य नहीं था, लैंडर पर चंद्र कंपन और सतह के प्लाज्मा के उपकरण अलग थे।
वर्ष 2021 में डीआरडीओ ने हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की निगरानी क्षमता बढ़ाने के लिए पीएसएलवी-सी51 से कौन सा उपग्रह भेजा था?
- A.सतीश धवन उपग्रह
- B.सिंधु नेत्र उपग्रह
- C.सिंधु दुर्ग उपग्रह
- D.श्री शक्ति उपग्रह
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. सिंधु नेत्र उपग्रह
व्याख्या
सही उत्तर B, सिंधु नेत्र उपग्रह है। सिंधु नेत्र को रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन ने बनाया था और इसे फरवरी 2021 में पीएसएलवी-सी51 उड़ान से कक्षा में पहुँचाया गया, जिसका मुख्य भार ब्राजील का अमेजोनिया-1 उपग्रह था। यह उपग्रह हिंद महासागर क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही देखने तथा उन जलक्षेत्रों से गुजरने वाले युद्धपोतों और व्यापारिक जहाजों की पहचान में सहायता के लिए बनाया गया है, जिससे सशस्त्र बलों को समुद्री जानकारी मिलती है।
विकल्प A, सतीश धवन उपग्रह भी इसी पीएसएलवी-सी51 उड़ान में गया था, पर वह एक निजी भारतीय दल का बनाया छोटा उपग्रह था, निगरानी उपग्रह नहीं। विकल्प C और D, सिंधु दुर्ग तथा श्री शक्ति गढ़े हुए नाम हैं जो सही उत्तर के पास रखे गए हैं। याद रखें कि पीएसएलवी-सी51 का मुख्य भार अमेजोनिया-1 था और सिंधु नेत्र सहयात्री उपग्रहों में था।