राजस्थान में 1857 और किसान-जनजातीय आंदोलन
राजपूताना में 1857 और उसके बाद के किसान तथा जनजातीय आंदोलनों के नोट्स: नसीराबाद, आउवा, कोटा, बिजोलिया, बेगूं, नीमूचणा, मानगढ़ और एकी आंदोलन।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 5 मिनट

1857 की क्रांति और उसके बाद चले लंबे किसान तथा जनजातीय आंदोलन राजस्थान के आधुनिक इतिहास के वे दो भाग हैं जिन्हें आरपीएससी, आरएसएमएसएसबी और राजस्थान पुलिस की परीक्षाएं बार-बार पूछती हैं। 1857 में राजपूताना की लड़ाई कंपनी की छावनियों के सिपाहियों और कुछ जागीरदारों ने लड़ी, जबकि रियासतों के शासक अंग्रेजों के साथ रहे। उन्नीसवीं सदी के अंत से शुरू हुए किसान और जनजातीय आंदोलन दूसरी तरह के थे: लंबे, स्थानीय और आर्थिक, जो लाग-बाग, बेगार तथा वन और चरागाह के अधिकार छिनने के विरुद्ध लड़े गए और जो आगे 1930 के दशक की प्रजामंडल राजनीति की नींव बने।
क्रांति से पहले का राजपूताना
1817 और 1818 में ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ हुई अधीनस्थ संधियों के बाद राजपूताना में उन्नीस रियासतें, लावा की छोटी ठिकाना-चीफशिप और अंग्रेजों के सीधे शासन वाला अजमेर-मेरवाड़ा जिला थे। पूरे क्षेत्र की निगरानी गवर्नर-जनरल का एजेंट यानी एजीजी करता था, जो 1857 में जॉर्ज सेंट पैट्रिक लॉरेंस था और जिसका मुख्यालय माउंट आबू में था। कंपनी की सेना नसीराबाद, नीमच, एरिनपुरा, देवली, ब्यावर और खैरवाड़ा की छावनियों में रहती थी। चूंकि शासक क्रांति में शामिल नहीं हुए, इसलिए राजपूताना का हर विद्रोह इन्हीं छावनियों में से किसी एक में भड़का और फिर उसने नेतृत्व के लिए किसी जागीरदार की ओर देखा।
नसीराबाद से आउवा तक
राजस्थान में क्रांति 28 मई 1857 को पहुंची, जब अजमेर जिले की नसीराबाद छावनी में 15वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री ने विद्रोह किया और दिल्ली की ओर बढ़ गई। नीमच में 3 जून 1857 को और एरिनपुरा में जोधपुर लीजन ने 21 अगस्त 1857 को विद्रोह किया। एरिनपुरा के सैनिक दिल्ली नहीं गए; वे वर्तमान पाली जिले के मारवाड़ी ठिकाने आउवा पहुंचे, जहां ठाकुर कुशाल सिंह ने अपने किले को पश्चिमी राजस्थान में क्रांति का केंद्र बना दिया। 8 सितंबर 1857 को उन्होंने बिथौड़ा में जोधपुर की राज्य सेना को हराया और 18 सितंबर 1857 को चेलावास में अंग्रेज तथा जोधपुर की मिली-जुली सेना को पराजित किया, जिसमें जोधपुर के पोलिटिकल एजेंट मोंक मेसन मारे गए। आउवा का किला 20 जनवरी 1858 तक टिका रहा; किला गिरने पर सुगाली माता की प्रतिमा अजमेर ले जाई गई और कुशाल सिंह मेवाड़ में भटकने के बाद बाद में आत्मसमर्पण कर गए।
कोटा, तांत्या टोपे और अंतिम महीने
राजपूताना में अपने ही शासक के विरुद्ध राज्य की सेना ने एकमात्र विद्रोह कोटा में 15 अक्टूबर 1857 को किया। जयदयाल और मेहराब खां के नेतृत्व में कोटा की सेना ने पोलिटिकल एजेंट मेजर बर्टन और उनके दो पुत्रों को मार डाला और लगभग पांच महीने शहर पर अधिकार रखा, जब तक मार्च 1858 में जनरल रॉबर्ट्स ने उसे वापस नहीं ले लिया। 1858 में तांत्या टोपे राजस्थान आए और भीलवाड़ा, कोठारिया, नाथद्वारा, टोंक तथा सांगानेर में संघर्ष हुआ; लावा के ठाकुर लक्ष्मण सिंह ने उन्हें शरण दी और इसी कारण अपनी चीफशिप खो दी। बीकानेर के अमरचंद बांठिया, जो ग्वालियर में खजांची थे और क्रांतिकारियों को धन देते रहे, 1858 में फांसी चढ़ा दिए गए और उन्हें 1857 का भामाशाह कहा जाता है।
| केंद्र | विद्रोह की तिथि | नेतृत्व |
|---|---|---|
| नसीराबाद | 28 मई 1857 | 15वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री |
| नीमच | 3 जून 1857 | छावनी के कंपनी सिपाही |
| एरिनपुरा | 21 अगस्त 1857 | जोधपुर लीजन |
| आउवा | सितंबर 1857 | ठाकुर कुशाल सिंह |
| कोटा | 15 अक्टूबर 1857 | जयदयाल और मेहराब खां |
बिजोलिया: भारत का सबसे लंबा किसान आंदोलन
बिजोलिया वर्तमान भीलवाड़ा जिले में मेवाड़ का प्रथम श्रेणी का ठिकाना था। वहां के किसानों, जो अधिकतर धाकड़ थे, से लगभग चौरासी प्रकार की लाग-बाग वसूली जाती थी, जिनमें बेटी के विवाह पर लगने वाला चंवरी कर और नए जागीरदार के गद्दी पर बैठने पर लिया जाने वाला तलवार बंधाई शामिल थे, इनके अलावा बिना मजदूरी की बेगार भी थी। आंदोलन 1897 में शुरू हुआ, जब गिरधारी पाल तथा नानजी और थाकरी पटेल ने शिकायत महाराणा तक पहुंचाई, और यह चरणों में 1941 तक चला, जिससे यह भारत का सबसे लंबा चलने वाला किसान आंदोलन बन गया। साधु सीताराम दास ने पहली किसान पंचायतें बनाईं; बुलंदशहर में भूप सिंह के नाम से जन्मे विजय सिंह पथिक ने 1916 से नेतृत्व संभाला और 1919 में वर्धा में राजस्थान सेवा संघ की स्थापना की; बिजोलिया के ही माणिक्य लाल वर्मा ने 1941 के समझौते तक अंतिम चरण चलाया। 1922 के एक समझौते में कई लागें पहले ही हटा दी गई थीं।
बेगूं, नीमूचणा और शेखावाटी के किसान
चित्तौड़गढ़ का बेगूं आंदोलन 1921 में रामनारायण चौधरी के नेतृत्व में शुरू हुआ; मेवाड़ सरकार को इसका समझौता इतना नापसंद था कि उसने उसे बोल्शेविक समझौता कहा, और 13 जुलाई 1923 को गोविंदपुरा में हुई गोलीबारी में किसान रूपाजी और कृपाजी मारे गए। अलवर रियासत में लगान बढ़ाने के विरोध में नीमूचणा के किसानों पर 14 मई 1925 को गोलियां चलाई गईं; महात्मा गांधी ने इसे दुगुना डायरशाही लिखा और यह गांव राजस्थान का जलियांवाला कहा जाता है। सीकर में शेखावाटी के जाट किसानों ने बढ़े लगान के विरुद्ध 1922 से 1935 तक आंदोलन किया, 1934 में सीकर में जाट प्रजापति महायज्ञ किया और 25 अप्रैल 1935 को कूदन की गोलीबारी में किसान खोए।
भील आंदोलन: गोविंद गुरु और मोतीलाल तेजावत
डूंगरपुर के बंजारा गोविंद गुरु ने 1883 में सम्प सभा बनाई और भगत पंथ का प्रचार करते हुए भीलों से शराब छोड़ने तथा बेगार से इनकार करने को कहा। बांसवाड़ा जिले की मानगढ़ पहाड़ी पर उनकी धूणी पर हजारों भील जुटते थे, और 17 नवंबर 1913 को राज्य तथा अंग्रेज सेना ने उस जमावड़े पर गोलियां चलाईं; मानगढ़ हत्याकांड को आदिवासी जलियांवाला कहा जाता है। उदयपुर के कोलियारी गांव के मोतीलाल तेजावत ने 1921 से मेवाड़, सिरोही और ईडर के भीलों तथा गरासियों के बीच एकी आंदोलन चलाया और उनकी शिकायतें मेवाड़ की पुकार नामक पत्र में रखीं; उनके आंदोलन के भीलों पर 7 मार्च 1922 को सिरोही के नीमड़ा में गोलियां चलीं। अनुयायी तेजावत को एकलिंगजी का दीवान और बावजी कहते थे।
इन आंदोलनों की देन
राजपूताना का कोई भी 1857 का विद्रोह दिल्ली, कानपुर या लखनऊ के मुख्य मोर्चों से नहीं जुड़ सका, और यहां क्रांति की असफलता का सामान्य उत्तर रियासती शासकों की राजभक्ति ही है। किसान और जनजातीय आंदोलन अधिक सफल रहे: उन्होंने कई लागें समाप्त कराईं, जागीरदारों को लिखित समझौते मानने पर विवश किया और पथिक, वर्मा, रामनारायण चौधरी तथा जयनारायण व्यास जैसे नेता तैयार किए, जिन्होंने प्रजामंडल चलाए और आगे राजस्थान के एकीकरण की मांग उठाई।
परीक्षा की दृष्टि से
आरपीएससी, आरएसएमएसएसबी, राजस्थान पुलिस और एसएससी की परीक्षाएं इस अध्याय को स्थान, तिथि और नेता के रूप में पूछती हैं। नसीराबाद को 28 मई 1857, नीमच को 3 जून 1857, एरिनपुरा को 21 अगस्त 1857, आउवा को कुशाल सिंह तथा मोंक मेसन, कोटा को 15 अक्टूबर 1857 तथा मेजर बर्टन और पैट्रिक लॉरेंस को माउंट आबू के साथ याद रखें। आंदोलनों में बिजोलिया को भीलवाड़ा तथा 1897 से 1941, पथिक को 1919 के राजस्थान सेवा संघ, बेगूं को रामनारायण चौधरी तथा गोविंदपुरा, नीमूचणा को अलवर तथा 1925, कूदन को सीकर तथा 1935, मानगढ़ को बांसवाड़ा तथा 1913 और नीमड़ा को सिरोही तथा 1922 के साथ जोड़ें। सामान्य भ्रम ये हैं कि बिजोलिया को भीलवाड़ा के बजाय चित्तौड़गढ़ में रख दिया जाता है, मानगढ़ को डूंगरपुर में, एकी आंदोलन का श्रेय तेजावत के बजाय गोविंद गुरु को दे दिया जाता है और चेलावास को बिथौड़ा समझ लिया जाता है।
महत्वपूर्ण तथ्य
| राजपूताना का पहला विद्रोह | नसीराबाद, 28 मई 1857, 15वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री |
|---|---|
| नीमच विद्रोह | 3 जून 1857 |
| एरिनपुरा विद्रोह | 21 अगस्त 1857, जोधपुर लीजन |
| मारवाड़ में क्रांति का केंद्र | आउवा किला, पाली जिला; ठाकुर कुशाल सिंह |
| बिथौड़ा का युद्ध | 8 सितंबर 1857 |
| चेलावास का युद्ध | 18 सितंबर 1857; मोंक मेसन मारे गए |
| आउवा का पतन | 20 जनवरी 1858; सुगाली माता की प्रतिमा अजमेर ले जाई गई |
| कोटा विद्रोह | 15 अक्टूबर 1857; जयदयाल और मेहराब खां; मेजर बर्टन मारे गए |
| 1857 में राजपूताना का एजीजी | जॉर्ज सेंट पैट्रिक लॉरेंस, मुख्यालय माउंट आबू |
| 1857 का भामाशाह | बीकानेर के अमरचंद बांठिया, 1858 में फांसी |
| भारत का सबसे लंबा किसान आंदोलन | बिजोलिया, भीलवाड़ा जिला, 1897 से 1941 |
| बिजोलिया में विरोध की लागें | लगभग चौरासी लाग-बाग, जिनमें चंवरी और तलवार बंधाई |
| राजस्थान सेवा संघ | 1919 में वर्धा में विजय सिंह पथिक द्वारा स्थापित |
| बेगूं आंदोलन | 1921, चित्तौड़गढ़; रामनारायण चौधरी; गोविंदपुरा गोलीबारी 13 जुलाई 1923 |
| नीमूचणा गोलीबारी | 14 मई 1925, अलवर रियासत |
| कूदन गोलीबारी | 25 अप्रैल 1935, सीकर |
| सम्प सभा | 1883 में गोविंद गुरु द्वारा स्थापित |
| मानगढ़ हत्याकांड | 17 नवंबर 1913, मानगढ़ पहाड़ी, बांसवाड़ा जिला |
| एकी आंदोलन | 1921 से, मोतीलाल तेजावत, मेवाड़ और सिरोही के भील |
| नीमड़ा गोलीबारी | 7 मार्च 1922, सिरोही जिला |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
राजस्थान में 1857 की क्रांति 28 मई 1857 को किस छावनी से शुरू हुई?
- A.नीमच
- B.नसीराबाद
- C.एरिनपुरा
- D.देवली
उत्तर देखें
अजमेर जिले की नसीराबाद छावनी में तैनात 15वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री ने 28 मई 1857 को विद्रोह किया, छावनी जला दी और दिल्ली की ओर बढ़ गई, इसलिए पूरे राजपूताना में क्रांति का पहला केंद्र नसीराबाद ही माना जाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →जोधपुर के पोलिटिकल एजेंट मोंक मेसन 1857 के किस युद्ध में मारे गए?
- A.बिथौड़ा का युद्ध
- B.चेलावास का युद्ध
- C.सांगानेर का युद्ध
- D.कोठारिया का युद्ध
उत्तर देखें
आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह ने 18 सितंबर 1857 को चेलावास में अंग्रेज और जोधपुर की मिली-जुली सेना का सामना किया और उसे हराया, तथा इसी लड़ाई में जोधपुर में तैनात पोलिटिकल एजेंट मोंक मेसन मारे गए।
पूरी व्याख्या पढ़ें →1857 की क्रांति के समय राजपूताना का एजेंट टू द गवर्नर-जनरल कौन था, जिसका मुख्यालय माउंट आबू में था?
- A.मेजर बर्टन
- B.मोंक मेसन
- C.जॉर्ज सेंट पैट्रिक लॉरेंस
- D.जनरल रॉबर्ट्स
उत्तर देखें
पूरे राजपूताना की निगरानी एक ही एजेंट टू द गवर्नर-जनरल करता था, और 1857 में यह पद पैट्रिक लॉरेंस के पास था, जो माउंट आबू से कार्य करते थे और पूरा वर्ष रियासती शासकों को अंग्रेजों के पक्ष में बनाए रखने में लगे रहे।
पूरी व्याख्या पढ़ें →15 अक्टूबर 1857 के विद्रोह में पोलिटिकल एजेंट मेजर बर्टन और उनके दो पुत्र किस स्थान पर मारे गए?
- A.कोटा
- B.टोंक
- C.जयपुर
- D.उदयपुर
उत्तर देखें
15 अक्टूबर 1857 को जयदयाल और मेहराब खां के नेतृत्व में कोटा की राज्य सेना ने अंग्रेजी रेजीडेंसी पर आक्रमण किया, मेजर बर्टन तथा उनके दो पुत्रों को मार डाला और लगभग पांच महीने शहर पर अधिकार रखा, जब तक मार्च 1858 में जनरल रॉबर्ट्स ने उसे वापस नहीं लिया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →बिजोलिया किसान आंदोलन मेवाड़ के जिस ठिकाने में चला, वह आज राजस्थान के किस जिले में है?
- A.चित्तौड़गढ़
- B.भीलवाड़ा
- C.उदयपुर
- D.अजमेर
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बिजोलिया मेवाड़ का प्रथम श्रेणी का ठिकाना था और उसका गांव आज भीलवाड़ा जिले में पड़ता है। वहां के अधिकतर धाकड़ किसानों का लगभग चौरासी प्रकार की लाग-बाग के विरुद्ध आंदोलन 1897 से 1941 तक चला और इसे भारत का सबसे लंबा चलने वाला किसान आंदोलन माना जाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →1919 में वर्धा में राजस्थान सेवा संघ की स्थापना किसने की और 1916 से बिजोलिया आंदोलन का नेतृत्व किसने किया?
- A.माणिक्य लाल वर्मा
- B.विजय सिंह पथिक
- C.सीताराम दास
- D.जयनारायण व्यास
उत्तर देखें
बुलंदशहर में भूप सिंह के नाम से जन्मे पथिक ने 1916 से बिजोलिया आंदोलन की बागडोर संभाली, उसे प्रेस और संगठन दिया, और रियासतों के किसान आंदोलनों में तालमेल के लिए 1919 में वर्धा में राजस्थान सेवा संघ की स्थापना की।
पूरी व्याख्या पढ़ें →1921 का बेगूं किसान आंदोलन, जिसके समझौते को मेवाड़ सरकार ने बोल्शेविक समझौता कहा, किसके नेतृत्व में चला?
- A.रामनारायण चौधरी
- B.मोतीलाल तेजावत
- C.ठाकुर देशराज
- D.हरिभाऊ उपाध्याय
उत्तर देखें
उन्होंने 1921 से वर्तमान चित्तौड़गढ़ जिले में मेवाड़ के बेगूं ठिकाने के किसानों को संगठित किया; उन्हें मिली शर्तें मेवाड़ सरकार को इतनी अप्रिय लगीं कि उसके अधिकारियों ने उस समझौते को बोल्शेविक समझौता कहा, और 13 जुलाई 1923 को गोविंदपुरा की गोलीबारी में किसान रूपाजी तथा कृपाजी मारे गए।
पूरी व्याख्या पढ़ें →14 मई 1925 को नीमूचणा में हुई गोलीबारी, जिसे महात्मा गांधी ने दुगुनी डायरशाही कहा, किस रियासत में हुई थी?
- A.अलवर
- B.भरतपुर
- C.बीकानेर
- D.जयपुर
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नीमूचणा अलवर रियासत का गांव था, जहां के किसानों ने लगान बढ़ाने का विरोध किया; 14 मई 1925 को राज्य की सेना ने उन पर गोलियां चलाईं, और महात्मा गांधी ने इन मौतों पर लिखते हुए इसे दुगुनी डायरशाही कहा, जो जलियांवाला बाग के जनरल डायर से तुलना थी।
पूरी व्याख्या पढ़ें →17 नवंबर 1913 का मानगढ़ हत्याकांड, जिसमें गोविंद गुरु के भील अनुयायियों पर गोलियां चलाई गईं, किस जिले की पहाड़ी पर हुआ था?
- A.डूंगरपुर
- B.बांसवाड़ा
- C.सिरोही
- D.उदयपुर
उत्तर देखें
मानगढ़ पहाड़ी गुजरात की सीमा पर बांसवाड़ा जिले में स्थित है। गोविंद गुरु ने वहीं अपनी धूणी स्थापित की थी, और 17 नवंबर 1913 को राज्य तथा अंग्रेज सेना ने उसके आसपास जुटे भीलों पर गोलियां चलाईं, इसी कारण मानगढ़ को आदिवासी जलियांवाला कहा जाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →1921 में शुरू हुआ मेवाड़ और सिरोही के भीलों तथा गरासियों का एकी आंदोलन किसके नेतृत्व में चला?
- A.गोविंद गुरु
- B.मोतीलाल तेजावत
- C.माणिक्य लाल वर्मा
- D.विजय सिंह पथिक
उत्तर देखें
उदयपुर के कोलियारी गांव के तेजावत ने 1921 में एकी आंदोलन शुरू किया, भीलों और गरासियों से अवैध लागें न देने तथा बेगार से इनकार करने को कहा, और उनकी मांगें मेवाड़ की पुकार नामक पत्र में रखीं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →ग्वालियर में खजांची रहते हुए क्रांतिकारियों को धन देने के कारण 1858 में फांसी पाए बीकानेर के अमरचंद बांठिया को किस नाम से याद किया जाता है?
- A.1857 की क्रांति का भामाशाह
- B.एकलिंगजी का दीवान
- C.राजस्थान केसरी
- D.मारवाड़ रत्न
उत्तर देखें
अमरचंद बांठिया बीकानेर के थे और ग्वालियर में सिंधिया राज्य के खजांची थे; उन्होंने राजकोष क्रांतिकारी सेनाओं के लिए खोल दिया और इसी कारण 1858 में उन्हें फांसी दी गई।
पूरी व्याख्या पढ़ें →राजस्थान के किसान आंदोलनों से संबंधित कौन-सा युग्म सही मेल खाता है?
- A.1935 की कूदन गोलीबारी और सीकर
- B.1923 की गोविंदपुरा गोलीबारी और अलवर
- C.1922 की नीमड़ा गोलीबारी और भीलवाड़ा
- D.1925 की नीमूचणा गोलीबारी और कोटा
उत्तर देखें
शेखावाटी अंचल के जाट किसानों ने बढ़े लगान के विरुद्ध 1922 से 1935 तक आंदोलन किया, 1934 में सीकर में जाट प्रजापति महायज्ञ किया और 25 अप्रैल 1935 को सीकर के कूदन गांव में उन पर गोलियां चलाई गईं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
राजस्थान में 1857 की क्रांति असफल क्यों रही?
जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर तथा अन्य रियासतों के शासकों ने 1817 और 1818 में अधीनस्थ संधियां कर ली थीं और वे अंग्रेजों के साथ रहे, इसलिए नसीराबाद, नीमच तथा एरिनपुरा में उठे सिपाहियों को किसी राज्य का समर्थन नहीं मिला। केवल कोटा में राज्य की सेना ने विद्रोह किया और आउवा के कुशाल सिंह तथा लावा के लक्ष्मण सिंह जैसे कुछ ही जागीरदार साथ आए। रियासती केंद्र के बिना ये विद्रोह दिल्ली, कानपुर या लखनऊ से नहीं जुड़ सके।
भारत का सबसे लंबा किसान आंदोलन कौन-सा है और कहां चला?
बिजोलिया आंदोलन, जो राजस्थान के वर्तमान भीलवाड़ा जिले में मेवाड़ के बिजोलिया ठिकाने में लड़ा गया, चरणों में 1897 से 1941 तक चला और इसे भारत का सबसे लंबा चलने वाला किसान आंदोलन माना जाता है। वहां के किसानों ने लगभग चौरासी प्रकार की लाग-बाग का विरोध किया, जिनमें बेटी के विवाह पर लगने वाला चंवरी कर, नए जागीरदार के गद्दी पर बैठने पर दी जाने वाली तलवार बंधाई तथा बिना मजदूरी की बेगार शामिल थीं। आंदोलन के चरण साधु सीताराम दास, विजय सिंह पथिक और माणिक्य लाल वर्मा के नेतृत्व में बढ़े।
मानगढ़ को आदिवासी जलियांवाला क्यों कहा जाता है?
गोविंद गुरु ने बांसवाड़ा जिले की मानगढ़ पहाड़ी पर अपनी धूणी स्थापित की थी और भगत तथा सम्प सभा आंदोलन के अंतर्गत वहां हजारों भील जुटते थे। 17 नवंबर 1913 को राज्य और अंग्रेज सेना ने उस जमावड़े पर गोलियां चलाईं, जिसमें बड़ी संख्या में भील मारे गए। निहत्थी सभा पर बिना चेतावनी गोली चलने के कारण, जैसा 1919 में जलियांवाला बाग में हुआ, मानगढ़ को आदिवासी जलियांवाला कहा जाता है।
विजय सिंह पथिक कौन थे और उनका वास्तविक नाम क्या था?
विजय सिंह पथिक वे नेता थे जिन्होंने 1916 से बिजोलिया किसान आंदोलन को संगठन और प्रचार दिया। उनका मूल नाम भूप सिंह था और उनका जन्म वर्तमान उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में हुआ था। उन्होंने रियासतों के किसान आंदोलनों में तालमेल के लिए 1919 में वर्धा में राजस्थान सेवा संघ की स्थापना की और माणिक्य लाल वर्मा तथा रामनारायण चौधरी जैसे नेता तैयार किए।
एकी आंदोलन क्या था?
एकी आंदोलन 1921 में मोतीलाल तेजावत ने मेवाड़, सिरोही और ईडर के भीलों तथा गरासियों के बीच शुरू किया था। इसमें उन्हें अवैध लागें न देने, बेगार से इनकार करने और अपने विवाद अपनी पंचायतों में निपटाने को कहा गया, और इसकी मांगें मेवाड़ की पुकार नामक पत्र में रखी गईं। इस आंदोलन के भीलों पर 7 मार्च 1922 को सिरोही के नीमड़ा में गोलियां चलाई गईं।
स्रोत
- राज्य का इतिहास, जिले और गजेटियर सामग्री — राजस्थान सरकार
- हमारे अतीत III (कक्षा आठ), 1857 की क्रांति वाला अध्याय — एनसीईआरटी
- मानगढ़ धाम और जनजातीय स्मारक — संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार





